राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : छोटे अफसर का हाल..
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : छोटे अफसर का हाल..
16-May-2020

छोटे अफसर का हाल..

लॉकडाउन के बाद राज्य से बाहर तो दूर, रायपुर से बाहर जाने की अनुमति के लिए लोगों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। बाकी जिले में अनुमति के लिए इतनी समस्या नहीं है, जितनी कि रायपुर में है। इसके लिए एसडीएम प्रणव सिंह को ज्यादा जिम्मेदार माना जा रहा है। प्रशासन ने यात्रा की अनुमति के लिए उनका मोबाइल-टेलीफोन नंबर सार्वजनिक किया है, लेकिन आम लोग तो दूर, कई अफसरों की शिकायत है कि एसडीएम उनका फोन तक नहीं उठाते। एक पूर्व अफसर ने कलेक्टर को फोन किया, तब कहीं जाकर कलेक्टर का मैसेज मिलने के बाद उन्होंने फोन उठाया।

प्रणव सिंह की हरकतों की अलग-अलग स्तरों पर रोजाना शिकायतें हो रही हैं, मगर उनके तेवर नहीं बदले। ताजा मामला एक पेट्रोल पंप कर्मचारी से जुड़ा हुआ है। हुआ यूं कि पेट्रोल पंप कर्मी की बेटी विशाखापटनम के एक स्कूल में पढ़ती है, और वहां छात्रावास में रहती है। लॉकडाउन के बाद छात्रावास में रहने वाले बच्चों के पालक उन्हें किसी तरह निकालकर अपने घरों में ले गए. पेट्रोल पंप कर्मी की बेटी अकेली ही रह गई। स्कूल बंद हो चुका है, लेकिन एक शिक्षिका और एक-दो स्टॉफ सिर्फ अकेली छात्रा के लिए वहां हैं । स्कूल स्टाफ लगातार पेट्रोल पंप कर्मी से बेटी को ले जाने के लिए कह रहा है और अल्टीमेटम भी दे चुका है। मगर पेट्रोल पंप कर्मी का पास नहीं बन पा रहा।

एसडीएम तो पहुंच के बाहर थे, तो उन्होंने किसी तरह एक प्रभावशाली व्यक्ति के जरिए उन्होंने गृह सचिव उमेश अग्रवाल के पास गुहार लगाई। गृह सचिव ने तुरंत इसको संज्ञान में लिया और खुद अनुमति देकर एसडीएम को पास जारी करने कहा। एसडीएम का काम देखिए, अनुमति पास तो जारी हुआ, लेकिन यात्रा का कारण निधन कार्यक्रम में जाना लिखा था। चूंकि आंध्रप्रदेश पुलिस काफी सख्त है। ऐसे में गलत कारण बताकर यात्रा करना जोखिम भरा था।

आखिरकार पेट्रोल पंप कर्मी को यात्रा टालनी पड़ी। एक पूर्व आईएएस कहते हैं कि प्रशासनिक अफसरों का फोन कभी बंद नहीं होना चाहिए। ट्रेनिंग में इसकी सीख भी दी जाती है। पता नहीं कब, किसको जरूरत पड़ जाए है। वैसे भी महामारी के समय प्रशासन को 24 घंटा चौकस रहना चाहिए। मगर एसडीएम की ट्रेनिंग हुई भी है या नहीं, यह समझ से परे है।

राजधानी की पुलिस का रिस्पांस टाईम!

राजधानी रायपुर की एक सबसे पुरानी और संपन्न कॉलोनी, चौबे कॉलोनी में बड़े-बड़े नेता रहते हैं, कई पत्रकार, और बड़े-बड़े कारोबारी रहते हैं। इसके बावजूद कॉलोनी के बीच के अकेले दशहरा-मैदान में दस-बीस लोग रोज इक_ा होकर शाम से रात तक दारू पीते बैठे रहते थे। यह सिलसिला कई साल से चल रहा था, और इस खुले शराबखाने के बगल से सैकड़ों महिलाएं भी गालियां और बेहूदी बातें सुनते हुए शाम की सैर पर निकलती थीं, और सैकड़ों आदमी भी। लेकिन जब-जब किसी ने इसका विरोध करने के लिए पुलिस को खबर की, तो पुलिस ने सबसे पहले इन शराबियों को ही सावधान किया, और शिकायत करने वाले का नाम-नंबर इनको बता दिया। नतीजा यह हुआ कि कॉलोनी के लोग इन मवालियों को बर्दाश्त करने के आदी हो गए, और मामला यहां तक बढ़ गया कि शराब दुकान के कोचिये इनको इसी मैदान पर शराब भी पहुंचाने लगे, और पानी की बोतलें भी। खुलेआम शराबखोरी के बाद दो दिन पहले शराबी सडक़ पर अपने दुपहिए रोककर वहीं पेशाब करने लगे। इसे देखकर कॉलोनी के एक आदमी ने विरोध किया, तो शराबियों ने उसे धमकाना शुरू किया, लेकिन जब रायपुर एसपी को फोन करके इसकी शिकायत की तो भी वे धमकाते हुए खड़े रहे क्योंकि पुलिस की गाड़ी 20 मिनट तक पहुंची नहीं। एसपी बताते रहे कि उन्होंने सरस्वती नगर थाने को कह दिया है, गाड़ी पहुंच रही होगी, लेकिन दो किलोमीटर दूर के थाने की गाड़ी एसपी के कहने के बाद भी 20 मिनट तक नहीं पहुंची। उसके बाद एक किसी दूसरे थाने की गाड़ी पहुंची तब तक शराबी भाग निकले।

इस पूरे मामले की शिकायत डीजीपी डी.एम. अवस्थी से की गई जो कि इसी शहर में एडिशनल एसपी हुआ करते थे। कल उन्होंने खुद फोन करके जब पुलिस अफसरों को भेजा, और वहां पुलिस आकर खड़ी रही, तो शराबियों के हौसले पस्त हुए। हालत यह है कि थाने से दो मिनट की दूरी पर जो सार्वजनिक जगह है, वहां पर शराबियों की भीड़ को पकडऩे के लिए भी पुलिस का रिस्पांस टाईम करीब 25 मिनट था। दुनिया में शायद ही कोई मुजरिम इतना इंतजार करते होंगे। यह हाल राजधानी का है, और पुलिस से अच्छी खासी पहचान वाले आदमी ने एसपी को बार-बार फोन किया, जिसका इतना असर हुआ। अब कितने लोग किसी सार्वजनिक दिक्कत को लेकर डीजीपी को फोन कर सकते हैं, और रायपुर के लोगों की शिकायत के लिए डीजीपी ने पुलिस मुख्यालय में एक सेल बनाया हुआ है, वहां तक रात में कितने लोग पहुंच सकते हैं? वैसे राजधानी के हाल के एक जानकार ने बाद में इस शिकायतकर्ता को कहा कि अगर शराब पीने का जिक्र न किया जाता, और सिर्फ गुंडों की मौजूदगी कही जाती तो शायद पुलिस जल्दी पहुंचती क्योंकि सरकारी धंधे को मंदा करने की कोई नीयत सरकारी विभागों की है नहीं। फिर आते-जाते लोग शराबियों की इस भीड़ के बीच कई बार वायरलैस की आवाज भी सुनते रहते हैं, जो कि जाहिर तौर पर पुलिस की मौजूदगी का सुबूत है।

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार और पुलिस के बड़े-बड़े दावे कॉलोनी की सडक़ पर शराबी-मवालियों की पेशाब में बह गए हैं।

कोरोना से बचाव की मौलिक कोशिशें

कोरोना से बचने के लिए लोग तरह-तरह के मौलिक प्रयोग कर रहे हैं। ऐसा ही एक प्रयोग छत्तीसगढ़ राजस्व मंडल के अध्यक्ष सी.के. खेतान के कोर्ट में देखने मिला। इस महीने पहले हफ्ते में जब राजस्व मंडल का काम फिर से शुरू हुआ तो बिलासपुर में उन्होंने अपनी अदालत में वकीलों पर अपने बीच कांच का एक पार्टीशन खड़ा कर दिया ताकि संक्रमण आरपार न आ सके। कांच के नीचे से कागज और फाईल लेने-देने की जगह भी बनी हुई है। उन्होंने अपने रायपुर के दफ्तर में भी ऐसा ही इंतजाम कर रखा है ताकि लोगों से जरूरी मिलने-जुलने से परहेज भी न करना पड़े, और दोनों तरफ के लोगों की सेहत को कोई खतरा भी न हो।

यह शीशा कुछ उसी तरह का है जिस तरह 15 अगस्त के भाषण में लालकिले पर प्रधानमंत्री के सामने बुलेटप्रूफ शीशा लगाया जाता है। कोरोना के लिए बुलेटप्रूफ की जरूरत तो नहीं है, लेकिन कांच का यह पार्टीशन खतरे को कम करने वाला लगता है।

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर लोगों ने देखा होगा कि किसी तरह एक किसी बैंक में एक काऊंटर पर बैठा व्यक्ति एक इलेक्ट्रिक आयरन और चिमटा लेकर बैठा है, मिलने वाले चेक चिमटे से थामकर टेबिल पर रखता है, और उस पर गर्म आयरन चलाकर उसके बाद उसे थामता है। चूंकि कोरोना के साथ लंबा जीना है, और कम से कम मरना है, इसलिए ऐसी तमाम सूझबूझ से काम लेना ही होगा।

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