राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : छत्तीसगढ़ का भरोसा, और एमपी
13-Aug-2020 5:52 PM 6
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : छत्तीसगढ़ का भरोसा, और एमपी

छत्तीसगढ़ का भरोसा, और एमपी

वैसे तो प्रदेश में कोरोना का संक्रमण तेजी से फैल रहा है, लेकिन यहां अभी स्थिति नियंत्रण में है। छत्तीसगढ़ में सिर्फ सरकारी अस्पतालों के दम पर कोरोना को बेकाबू होने से रोका जा सका है। अभी कुछ दिनों से निजी अस्पतालों में भी कोरोना के इलाज की सुविधा उपलब्ध हो गई है। छत्तीसगढ़ के पड़ोसी मध्यप्रदेश की स्थिति अलग है। मध्यप्रदेश में  लोग सरकारी अस्पतालों के बजाए निजी अस्पतालों में इलाज कराना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान खुद कोरोना पीडि़त हैं और वे निजी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। जबकि भोपाल में एम्स जैसे उत्कृष्ट संस्थान हैं। रायपुर एम्स के डायरेक्टर डॉ. नितिन एम नागरकर, भोपाल एम्स के भी डायरेक्टर हैं। रायपुर एम्स के कोरोना इलाज को लेकर तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तारीफ हो रही है। छत्तीसगढ़  सरकार के सरकारी अस्पतालों में भी कोरोना अच्छे तरीके से इलाज हो रहा है, और बड़ी संख्या में लोग ठीक होकर लौट रहे हैं।

चूंकि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश से अलग होकर बना है। इसलिए दोनों राज्यों में मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं की तुलना होते रहती है और यहां के पूर्व और वर्तमान अफसर एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं। मध्यप्रदेश सरकार के एक बड़े चिकित्सक ने छत्तीसगढ़ के एक रिटायर्ड आईएएस अफसर से कहा कि मध्यप्रदेश के कोरोना पीडि़त बड़े लोगों को सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं है। खुद सीएम निजी अस्पताल में इलाज करा रहे हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था ठीक नहीं हो पा रही है। जबकि छत्तीसगढ़ में सरकारी अस्पतालों के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा है। छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद भ्रष्टाचार को लेकर स्वास्थ्य विभाग-अस्पताल भले ही कुख्यात रहा है, लेकिन कोरोना ने कुछ हद तक पुरानी छवि को बदलने में मदद की है।

तबादला तो हुआ, पर जाएँ कैसे?

पिछले दिनों सरकार ने राजनांदगांव एसपी जितेन्द्र शुक्ला और ईओडब्ल्यू एसपी सदानंद कुमार को बदल तो दिया, लेकिन वे नया कार्यभार संभाल नहीं पा रहे हैं। शुक्ल को कवर्धा स्थित 17 वीं और कुमार को नारायणपुर के 4वीं बटालियन का कमाडेंट बनाया गया है। जहां पहले से ही दोनों बटालियन में सीडी टंडन और धर्मेंद्र सवाई बतौर कमाडेंट पदस्थ हैं, और इनका तबादला नहीं हुआ है । शुक्ला और कुमार इस तकनीकी पेंच के चलते चाहकर भी पदभार नहीं ले पा रहे हैं। यानी दोनों जगहों पर कुर्सी एक और अफसर दो वाली स्थिति बन गई है। फिलहाल दोनों अफसर इधर-उधर समय काट रहे हैं। सुनते हैं कि दोनों ने डीजीपी को तबादले को लेकर त्रुटि से अवगत भी कराया है। मगर अब तक त्रुटि को ठीक नहीं किया जा सका है। हल्ला तो यह भी है कि दोनों को कामकाज को लेकर नाराजगी के चलते हटाया गया था। और त्रुटि भी अनजाने में नहीं हुई है। ऐसे में इन त्रुटियों को ठीक करने में समय तो लगता है।

गोबर-गणित

छत्तीसगढ़ सरकार जब से गोबर खरीदना शुरू किया है। इसको लेकर तरह-तरह के गुणा-भाग सुनने को मिल रहे हैं। पिछले दिनों ने सरकार ने गोबर संग्राहकों को भुगतान किया। इसके बाद से तो गोबर का गणित अच्छे-अच्छों को पल्ले नहीं पड़ रहा है। दरअसल, भुगतान के बाद संग्राहकों की कहानी को सफलता की कहानी के लिहाज से सरकारी महकमे ने प्रचारित किया। उसमें गोबर से आमदनी से लेकर खरीद-बिक्री के आंकड़े दिए गए थे। ऐसे ही चंद्रखुरी और महासमुंद के संग्राहकों को जिक्र था चंद्रखुरी की एक महिला के बारे में बताया गया कि केवल 10 दिन का गोबर बेचकर 31 हजार कमा लिए। उसके पास 70 गायें है। सोशल मीडिया के विशेषज्ञों ने गुणा-भाग लगाया तो पता चला कि उसकी एक गाय रोजाना 22-23 किलो गोबर दे रहे है, लेकिन महासमुंद के संग्राहकों के गोबर से कमाई का जबकि जमाया गया तो गणित के रोचक आंकड़े सामने। इस संग्राहक ने 13 दिन में 221 क्विंटल गोबर 44 हजार से ज्यादा की कमाई की। जबकि उसके पास 25 गायें है। ऐसे में एक गाय का रोजाना का गोबर 59 किलो के आसपास का आ रहा है। इस तरह के आंकड़े से आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। संभव है कि संग्राहकों ने काफी पहले से गोबर इक_ा करना शुरू कर दिया हो, लेकिन सरकारी आंकड़ों ने कुछ समय के लिए लोगों को उलझा जरुर दिया था। सोशल मीडिया में कई दिनों तक गोबर गणित को समझने और समझाने का खेल चलता रहा।

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