राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अब हाथी किसे हटाना चाहते हैं?
26-Sep-2020 6:18 PM 2
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अब हाथी किसे हटाना चाहते हैं?

अब हाथी किसे हटाना चाहते हैं?

पिछले तीन दिनों में दो अलग-अलग इलाकों में हाथियों की एक ही किस्म से मौत से अब सवाल उठ खड़े हुए हैं कि क्या गांव-देहात के खेतों और जंगलों में बिछाए गए बिजली के गैरकानूनी तारों से मरने वाले जंगली जानवरों को राजधानी में बैठे राज्य स्तर के कोई अफसर बचा भी सकते हैं? पिछली बार जब लगातार कई हाथी मरे, तो मैदानी आला-अफसरों के साथ-साथ प्रदेश के वन्यप्राणी पीसीसीएफ अतुल शुक्ला को भी हटा दिया गया। उनके कुछ करीबी लोगों ने तनाव के बीच भी उनसे मजाक किया कि बसपा के चुनाव चिन्ह ने बसपा के पुराने नारे की तरह एक ब्राम्हण अफसर को बलि चढ़ा ही दिया। अतुल शुक्ला वाईल्ड लाईफ के मुखिया रहते हुए पूरे प्रदेश में जंगली जानवरों की मौत पर रात-दिन दौड़-भाग करते थे, लेकिन जब हाथी कोरबा और रायगढ़ के इलाके में पट-पट मरने लगे, तो सरकार के लिए आसान यही था कि वन्यप्राणी पीसीसीएफ को हटा दिया जाए।

अब सवाल यह उठता है कि पुलिस, वनविभाग, राजस्व विभाग, और कृषि विभाग सबके ही लोग गांव-जंगल में किसी न किसी काम से जाते हैं, और वहां के अवैध बिजली के तारों को देखते भी हैं। ऐसे में अगर वहां कोई कार्रवाई नहीं होती, अदालत में दिए गए हलफनामे के मुताबिक भी बिजली विभाग कार्रवाई नहीं करता, तो प्रदेश की राजधानी में बैठा जंगल-अफसर किस-किस विभाग के लिए जवाबदेह हो सकता है? अंग्रेजी में एक बात कही जाती है कि बक स्टॉप्स देयर। जिम्मेदारी कहां जाकर रूकती है। सरकार तो सरकार है वह कुछ भी मनमानी कर सकती है, और ईमानदार अफसर के खिलाफ तो कार्रवाई का मौका लोग ढूंढते ही रहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर पीसीसीएफ जिम्मेदार था, तो उसके ऊपर का वनविभाग प्रमुख, और वनमंत्री जिम्मेदार कैसे नहीं थे? जिम्मेदारी तय करते हुए प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत यह सुझाता है कि सिलसिला कहां जाकर थमना चाहिए।

कृषि बिल के बाद छत्तीसगढ़ के चावल का क्या होगा?

केन्द्र सरकार ने जैसे नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के बाद देशभर में ‘गलतफहमियां’ दूर करने के लिये मुहिम चलाई, वैसा ही अब कृषि बिल को लेकर कर रही है। ईश्तहार और ब्रीफिंग्स का ठीक वही सिलसिला चल पड़ा है। छत्तीसगढ़ के लिये इस बिल का एक दूसरा साइड इफैक्ट पडऩे वाला है। किसानों से चुनाव में वादा था, 2500 रुपये क्विंटल में धान खरीदने का। राज्य ने हाथ पसारे, केन्द्र से मदद नहीं मिली। किसी तरह जाकर समझौता हुआ तब केन्द्रीय कोटे में चावल जा सका, वह भी राज्य की अपेक्षा से कम। जानकार कह रहे हैं कि इस बिल के लागू होने के बाद केन्द्र की जवाबदेही खत्म हो जायेगी। तब क्या खरीदे हुए धान को बेचने के लिये राज्य को कार्पोरेट्स की मदद लेनी पड़ेगी? छत्तीसगढ़ सरकार ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना का रास्ता निकाला, तब जाकर वादे के मुताबिक भुगतान किसानों को हो सका है। उसका भी एक हिस्सा देना अभी भी बचा हुआ है। छत्तीसगढ़ ने फिलहाल तो यह बिल अपने यहां लागू करने से मना कर दिया है। कोरोना संकट के काल में उपज खरीदने की पूरी-पूरी जिम्मेदारी उठाना और फिर बेचने के लिये बाजार ढूंढकर भरपाई करना, सरकार के लिये दोहरी चुनौती बनने वाली है।

ये मरवाही के लिये चुनावी घोषणा थी भी?

अटकलें लगाई जा रही थी कि बिहार विधानसभा चुनाव के साथ-साथ चुनाव आयोग मध्यप्रदेश की सीटों और छत्तीसगढ़ के मरवाही सीट के उप-चुनाव की घोषणा कर देगा लेकिन अब यह तीन दिन के लिये टाल दिया गया है। मुख्यमंत्री ने 25 सितम्बर को गौरेला और पेन्ड्रा को नगर पंचायत से नगरपालिका बनाने की घोषणा की। लोगों को एकबारगी लगा कि यह घोषणा उप-चुनाव में मतदाताओं को लुभाने के लिये की गई है। विरोधी दल/दलों के बयान भी इस बारे में तुरंत आने लगे। दिलचस्प यह है कि इन दोनों जगहों के ज्यादातर भाग कोटा विधानसभा क्षेत्र के हिस्से हैं। मरवाही के मतदाताओं को इसका सीधे कोई लाभ मिलता दिखाई नहीं देता। बगल के इलाके में दो नगरपालिका बना देने की घोषणा की गई। मरवाही तो अभी-अभी ग्राम पंचायत से नगर पंचायत बनी है। उस पर भी राज्यपाल द्वारा किये गये सवालों के चलते संकट मंडरा ही रहा है। 

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