राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : वक्त के पहले चल बसेंगे
26-Nov-2020 3:43 PM 286
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : वक्त के पहले चल बसेंगे

वक्त के पहले चल बसेंगे

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस वार्ड में सफाई पर जोर सबसे अधिक रहता है, वहां भी सार्वजनिक मैदान और उद्यान में हालत यह है कि चारों तरफ खाने-पीने की पैकिंग बिखरी रहती है। इस कचरे को देखकर ही समझ पड़ता है कि किसी जन्मदिन का केक काटकर वहां पार्टी की गई थी, और सारी बोतलें, पैकेट, पॉलीबैग वहीं फेंककर लोग निकल गए थे। जानकार लोगों का कहना है कि जन्मदिन मनाने के नाम पर ऐसी गंदगी फैलाने वालों की जिंदगी एक बरस कम हो जाती है क्योंकि अगले कई दिनों तक वहां से गुजरने वाले लोग ऐसे जन्मदिन वाले को जमकर कोसते हैं, खासी गंदी और मोटी-मोटी गालियां देते हैं, और आह तो लगती ही है। जो लोग अपनी खुशी की दावत करके दूसरों के लिए गंदगी छोड़ जाते हैं, वे सावधान हो जाएं क्योंकि जिंदगी की ऐसी आखिरी कई दावतें कर भी नहीं पाएंगे, और वक्त के पहले चल बसेंगे।

बात-बात में गड़ा मुर्दा निकल गया...

शासन-प्रशासन में कभी कभार ऐसा होता है कि आपसी चर्चा में पुरानी गड़बडिय़ों की तरफ ध्यान जाता है, और कार्रवाई शुरू हो जाती है। कुछ इसी तरह बालोद की एक बैठक में भी हुआ। यहां सेंट्रल स्कूल के लिए सरकारी जमीन की तलाश हो रही थी, और फिर चर्चा के दौरान एक हाईप्रोफाइल जमीन घोटाले की तरफ अचानक जनप्रतिनिधियों और प्रशासन का ध्यान चला गया। हुआ यूं कि स्थानीय सांसद ने सेंट्रल स्कूल के लिए जमीन चिन्हित करने जिला प्रशासन को निर्देश दिए थे कि प्रशासन की तरफ से जवाब आ गया कि सरकारी जमीन उपलब्ध नहीं है। फिर किसी ने बताया कि शहर के मध्य 24 एकड़ सरकारी जमीन उपलब्ध है, लेकिन इस पर कुछ लोग दावा कर रहे हैं।

चर्चा के बीच जमीन से जुड़ा किस्सा भी निकल गया। हुआ यूं कि यह जमीन कभी स्थानीय निकाय को आबंटित की गई थी। पिछली सरकार में निकाय को आबंटित जमीन पर गरीबों के लिए मकान बनाना था, लेकिन निकाय के पदाधिकारी जमीन बेचकर निकल गए। तत्कालीन कलेक्टर ने मामले की जांच कराई, और जमीन बिक्री के लिए जिम्मेदार निकाय के पदाधिकारियों और अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की अनुशंसा कर दी। इस पर कार्रवाई इसलिए रूकी रही कि सरकार के लोग नहीं चाहते थे कि अपनी पार्टी के पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो। पदाधिकारियों को कोर्ट जाने का मौका मिल गया, और उन्हें हाईकोर्ट से स्टे मिल गया।

प्रकरण को सात साल हो चुके हैं। मगर किसी ने स्टे वैकेट करने के लिए पहल नहीं की। अब जब सरकार बदल गई है, तो फिर इस पुराने घोटाले की चर्चा होने लगी है। सांसद की बैठक में जमीन को लेकर कोई फैसला तो नहीं हो पाया, लेकिन अब घोटाले पर कार्रवाई के लिए दबाव बन गया है। निकाय के उस समय के पदाधिकारी अब प्रदेश भाजपा में जगह पा गए हैं। स्थानीय भाजपा नेताओं की कोशिश है कि स्कूल कहीं और बन जाए, ताकि घोटाला दबा रहे। मगर कांग्रेस के लोग इस पूरे घोटाले पर कार्रवाई के लिए दबाव बना रहे हैं। देखना है कि घोटाले पर कार्रवाई होती है, या नहीं।

बच्चों को फिट रखने की चुनौती

कोरोना महामारी के चलते स्कूल बंद होने के कारण बच्चों की पढ़ाई का ही नहीं बल्कि खेलकूद का खासा नुकसान हो गया।  साइकिल से भागना, पैदल मार्च करना या दौड़ कर बस पकडऩा, बस्ता उठाये क्लास रूम तक जाना। प्रार्थना के लिये खड़े रहना और फिर पांच छह घंटे बाद स्कूल से घर लौटना। खेलकूद नियमित रूप से न हों तब भी आम दिनों में स्कूलों में इतनी भाग-दौड़ हो जाती है कि शारीरिक सक्रियता बनी रहे।

लॉकडाउन के दौरान तो वे घरों में कैद रह गये। शिक्षा विभाग का ध्यान अब ऑनलाइन पढ़ाई के अलावा उनके फिटनेस की ओर भी गया है। राज्य भर के स्कूलों में प्राचार्यों को शिक्षा विभाग की ओर से चि_ी भेजी गई है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक दिसम्बर से 31 दिसम्बर तक फिटनेस को बढ़ावा देने का कार्यक्रम रखा जाये। यही नहीं उनके बीच क्विज प्रतियोगिता भी रखी जायेगी।

केन्द्रीय खेल व युवा मंत्रालय की ओर से यह निर्देश जारी किया गया है जिस पर राज्यों में भी काम हो रहा है। वैसे यह योजना देर से लाई गई है। अनलॉक होने के बाद खेलने-कूदने का मौका आसपास के मैदानों में बच्चों को मिलने लगा है। इस दौरान एक दूसरी समस्या से भी अभिभावक जूझ रहे हैं वह है ऑनलाइन गेम्स की तरफ बच्चों का झुकाव बढऩा। लॉकडाउन के दौरान दोस्तों और स्कूल से अलग रहने और लगातार घरों में पड़े रहने के कारण मनोदशा भी तो बिगड़ी है। अच्छा हो फिटनेस का यह कार्यक्रम सिर्फ शारीरिक चुस्ती के न होकर मानसिक मजबूती बढ़ाने के लिए भी हो।

कोरोना से छुटकारे के बाद...

बच्चों में ही नहीं, बड़ों में भी कोरोना का असर लम्बे वक्त तक रहने वाला है। कोरोना संक्रमण से गुजरकर स्वस्थ हो चुके लोग राज्य मानसिक चिकित्सालय में बड़ी संख्या मे पहुंच रहे हैं। बहुत से लोग संक्रमण के शिकार नहीं हुए पर कोरोना के डर ने उनको घेर लिया।

हाल ही के दिनों में ऐसे लगभग 500 मरीजों का इलाज किया जा चुका है। इनमें ज्यादातर के मन में डर बैठा था कि कोरोना हो गया तो उससे वे कैसे निपटेंगे। कोरोना से स्वस्थ होने के बाद सब कुछ ठीक हो गया, ऐसा भी नहीं है। इन मरीजों में थकान, सांस लेने में परेशानी, चक्कर आने, बुखार व बेहोशी की शिकायत है। कई केस तो ऐसे आ चुके जिनमें कोरोना से स्वस्थ हुए मरीज की माह, दो माह बाद तबियत बिगड़ी और मौत भी हो गई। इसके लिये अब पोस्ट कोविड ट्रीटमेंट की सुविधा रायपुर और बिलासपुर के मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पतालों में शुरू हुई है।

कोरोना से स्वस्थ होने की दर यदि अब 90 फीसदी से ऊपर बताई जा रही हो तो यह सिर्फ अस्पतालों और होम आइसोलेशन की एंट्री और डिस्चार्ज के आंकड़े हैं। पोस्ट कोविड इफेक्ट्स पर अलग से अध्ययन होगा। फिर आंकड़े कुछ अलग होंगे, जो शायद इस महामारी की गंभीरता को ठीक तरह से परिभाषित करे। 

जेई की मौत, पुलिस जिम्मेदार या नहीं?

बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर पूनम कतलम की कथित रूप से पुलिस पिटाई के चलते मौत हो गई। सूरजपुर जिले के लटोरी थाना इलाके की इस घटना में एसपी ने दावा किया है कि पूनम को हिरासत में नहीं लिया गया था। बिजली विभाग के उप-केन्द्र में ही उससे पूछताछ हो रही थी, इसी दौरान उसे चक्कर आया। उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती कराया गया, जहां उसकी मौत हो गई। इधर जूनियर इंजीनियर के भाई दीपक का आरोप है कि पुलिस ने उससे मारपीट की और उसके भाई के शरीर पर चोटों के निशान हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ह्रदयाघात को मृत्यु का कारण बताया गया है। जेई सहित चार पांच और लोगों को पुलिस ने तब पकड़ा था जब उसे यह जानकारी मिली कि इन लोगों ने शराबखोरी के दौरान एक अपने एक साथी हरीशचंद्र राजवाड़े को पीट-पीट कर मार डाला।

पुलिस हिरासत में मौत के मामले सरगुजा में कम नहीं हैं। इसी सूरजपुर जिले में पिछले साल चंदोरा थाने के लॉकअप में एक ग्रामीण कृष्णा की मौत हुई थी। इसे आत्महत्या बताया गया। अम्बिकापुर में पिछले साल जुलाई में चोरी के एक आरोपी पंकज बेक ने कथित रूप से पुलिस की हिरासत से भागकर एक निजी अस्पताल की छत से लटकी रस्सी के सहारे आत्महत्या कर ली। परिजन अब तक यह मानने के लिये तैयार नहीं कि उसने खुदकुशी की थी। वे इसे पुलिस की पिटाई से हुई मौत बताते हैं।

जेई की मौत के मामले में भी पुलिस खुद को पाक-साफ बता रही है। एसपी राजेश कुकरेजा ने अपनी ओर से ही उच्चाधिकारियों को लिख दिया है कि घटना की उच्चस्तरीय जांच कराई जाये। चौकी प्रभारी सहित सभी 10 स्टाफ निलम्बित कर दिये गये हैं। पंकज बेक और कृष्णा के मामले जिस तरह से अब तक अनसुलझे हैं उसे देखते हुए उम्मीद कम ही है कि जेई पूनम कतलम के मामले में कोई ठोस नतीजा निकलेगा।

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