राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : इस बार उपाध्यक्ष की बारी
17-Dec-2020 4:30 PM 114
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : इस बार उपाध्यक्ष की बारी

इस बार उपाध्यक्ष की बारी

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत भी कोरोना की चपेट में आ गए हैं। वे होम आइसोलेशन में हैं, और उनकी तबीयत भी ठीक है। इससे परे विधानसभा का शीतकालीन सत्र 21 तारीख से शुरू हो रहा है।  और स्वाभाविक है कि डॉ. महंत सदन की कार्रवाई का संचालन नहीं कर पाएंगे। माना जा रहा है कि डॉ. महंत की जगह उपाध्यक्ष मनोज मंडावी सदन की कार्रवाई का संचालन करेंगे। किसान आंदोलन और अन्य विषयों को लेकर शीतकालीन सत्र के गरम रहने के आसार दिख रहे हैं। ऐसे में महंत की तुलना में अपेक्षाकृत कम अनुभवी मनोज मंडावी सदन की कार्रवाई का संचालन किस तरह करते हैं, यह देखना है।

प्रवासी मजदूरों पर शाही खर्च

जिन्हें लगता है कि प्रवासी मजदूरों को अपने गांव वापस लौटने पर क्वारंटीन सेंटर्स में तकलीफ हुई उनको किरारी  ग्राम पंचायत का उदाहरण देखना चाहिए।  जांजगीर जिले के इस गांव में मजदूरों को आलीशान टेंट लगाकर  ठहराया गया। उनको न केवल तरह-तरह के व्यंजन मिले बल्कि मिठाइयां भी खिलाई गई। उनके लिए ट्यूबवेल खोदे गए कूलर लगवाए गए। सरपंच और सचिव ने मिलकर 14वीं और 15वीं वित्त आयोग की राशि लगभग 4 करोड़ रुपये मजदूरों की सेवा में खर्च कर दी।  इस बिल को पास करने के लिए जनपद पंचायत में भेजा गया तब पता चला कि सब कुछ फर्जीवाड़ा था। बौखलाए प्रवासी मजदूरों ने, जिन्हें सरकारी पंचायत भवन और स्कूलों में ठहराया गया था और ढंग से खाना नहीं मिला उन लोगों ने पंचायत सचिव की पिटाई कर दी। हैरानगी की बात है कि  पंचायत सचिव के समर्थन में पूरा संघ उतर आया है। क्या इसका मतलब यह समझा जाए की दूसरी पंचायतों में भी इसी तरह के घोटाले हुए हैं?

 फिलहाल तो अकलतरा विधायक सौरभ सिंह ने अधिकारियों को चि_ी लिखकर बिल को पास नहीं करने की हिदायत दी है।

 कोरोना से बचने क्या करें ना करें?

 जब कोरोना संक्रमण को लेकर दहशत फैली तब बाजार में मास्क और सेनेटाइजर मिल नहीं रहे थे। अनाप-शनाप दामों पर इसकी बिक्री हुई। लोग इसके लिए  200 रुपए भी खर्च कर रहे थे। अब बाजार से खबर आ रही है कि इनकी बिक्री में भारी गिरावट आ गई है। लोग 10 रुपया में भी मास्क बेच रहे हैं और कई शैंपू और साबुन से भी सस्ते  सैनिटाइजर मिलने लगे हैं। इसकी क्या वजह हो सकती है? एक तो लोगों ने देख लिया कितने चुनाव निपट गए मंत्री नेता रैलियाँ सभाएं करते रहे,  ना तो मास्क लगाया न ही सेनिटाइजऱ  का इस्तेमाल किया। स्वास्थ विभाग की ओर से भी पहले तो कहा गया था कि मास्क हमेशा लगाएं लेकिन डॉक्टरों का यह रिसर्च भी सामने आ गया कि लगातार मास्क लगाने से  सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। काढ़ा पीने से और लगातार सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने से भी नुकसान हैं। क्या लोगों को विश्व स्वास्थ्य संगठन की चिंता नहीं है और वह सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ चुके हैं?

फिर हुक्काबार खुल गये...

विधानसभा में हुक्काबारों के संचालन को लेकर सवाल उठा था तब मंत्रिपरिषद् ने इन्हें अवैध घोषित करते हुए संचालन पर रोक लगाई थी। नगर निकायों और पुलिस प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था। पर, कुछ दिन की सख्ती के बाद राजधानी रायपुर सहित बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई आदि शहरों में ये बार फिर शुरू हो गये हैं। दरअसल, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर लगाये गये प्रतिबंध के बाद ये सुविधा भी दी गई जिन रेस्टारेंट्स या होटलों में 30 लोगों के बैठने की जगह हो वहां एक स्मोकिंग जोन बनाया जा सकता है। पर इनमें सिर्फ तम्बाकू उत्पादों की खपत हो सकती है। इसी की आड़ में दूसरी नशीली चीजें बेची जा रही हैं।

हुक्का बारों की तरफ स्कूल कॉलेज के बच्चों का ज्यादा आकर्षण दिखाई दे रहा है। उन्हें तम्बाकू के साथ जो सुगंधित केमिकल मिलाकर दिया जाता है जो काफी खतरनाक है। ऐसा करने पर दो साल की सजा का प्रावधान भी है पर पुलिस ज्यादातर मामलों में धारा 144 के अंतर्गत ही कार्रवाई कर रही है। सख्ती और प्रभावी कार्रवाई के लिये क्या पुलिस और नगर निगमों को किसी ने रोक रखा है? पता नहीं क्यों लोग इस सिलसिले में हफ्ता, और महीना जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं?

ऐन मौके पर पटवारी हड़ताल

लम्बे समय से कोरोना संक्रमण के चलते सरकारी दफ्तरों में छुट्टी रही। राजस्व विभाग भी इससे अछूता नहीं रहा। लोगों को वैसे भी तहसील और पटवारियों के खूब चक्कर लगाने पड़ते हैं, कोरोना काल में दिक्कतें और बढ़ गई। रजिस्ट्री ऑफिस का कामकाज भी इसके चलते प्रभावित हुआ और आमदनी गिरी। इस समय चल रही धान खरीदी के दौरान रकबे में गड़बड़ी की सैकड़ों शिकायतें आ रही हैं, जिन्हें पटवारियों को ही सुधारना है। राजस्व नामांतरण, बंटवारा, फौती के सैकड़ों मामले लटके हैं, जिनके अब रफ्तार पकडऩे की उम्मीद थी। ठीक ऐसे ही वक्त पटवारी बेमियादी हड़ताल पर गये हैं। सिविल सेवा अधिनियम का हवाला देते हुए राज्य शासन ने इन हड़तालों को प्रतिबंधित किया है पर जैसा होता है इसका असर नहीं हुआ, आंदोलन जारी है। वह हड़ताल ही क्या जो ऑफ सीजन में की जाये, इससे तो सरकार को फर्क नहीं पडऩे वाला है न आम जनता को तकलीफ ही महसूस होगी।

हाथियों से नुकसान, समाधान कब?

यूं तो छत्तीसगढ़ के अनेक हिस्सों में हाथियों के दल घूम रहे हैं पर कटघोरा वन मंडल में बीते 10-12  दिनों से स्थिति ज्यादा गंभीर हो चुकी है। दो हफ्तों में हाथियों के हमले से तीन लोगों की मौत हो चुकी है। पश्चिम बंगाल से आई हुल्ला पार्टी भी ग्रामीणों को इनसे नहीं बचा पाई। जो दो हाथी उत्पात मचा रहे हैं वे अपने दल से बिछुड़ गये हैं। हुल्ला पार्टी ट्रैकिंग कर हाथियों के दल से उन्हें मिलाने की कोशिश कर रही है लेकिन उन्हें अभी सफलता नहीं मिल पाई है। राज्य में बीते कई साल से हाथियों के अनुकूल रहवास व प्रवास की योजनाओं पर काम हो रहा है पर समस्या का समाधान नहीं हुआ । कटघोरा रेंज के जिन गांवों में यह घटना हुई है वहां कई कच्चे मकान हैं, जिनमें हाथियों ने नुकसान पहुंचाया। ग्रामीणों को कच्चे मकान की जगह पक्के मकान बनाकर देने, उन्हें टार्च देने, मशाल जलाने, पटाखे फोडऩे कहा जाता है। पर ये साधन नहीं मिलते। वन ग्रामों में सुरक्षा समितियों का गठन भी किया गया है, लेकिन प्रशिक्षण और साधन उपलब्ध नहीं कराने के कारण वे अपना बचाव नहीं कर पाते। क्या सिर्फ जान-माल के नुकसान का आकलन और फिर उसके बाद मुआवजा वितरण का सिलसिला ही चलता रहेगा? 

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