राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : डराने से डर गये अफसर?
19-Dec-2020 4:36 PM 150
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : डराने से डर गये अफसर?

डराने से डर गये अफसर?

केन्द्र सरकार के किसान कानून के समर्थन में कवर्धा में बुलाई गई महापंचायत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तेवर गरम हो गये। अचानक सभा स्थल की जगह बदलने के आदेश ने उन्हें नाराज कर दिया। जो कुछ उन्होंने कहा उससे एक निष्कर्ष तो निकलता है कि वे तीन साल बाद लौटने को लेकर सौ फीसदी आशान्वित हैं। यह अलग बात है कि जीत-हार का फासला 2018 में इतना बड़ा रहा कि उसे पलट पाना इतना आसान भी दिखाई नहीं देता। 2018 के बाद हुए उप-चुनाव के नतीजे  भी इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं। दूसरी बात यदि नौकरशाह दो साल के भीतर  ही ‘तलुवे चाटने’ लगे हैं तो इस जमात ने 15 साल में क्या नहीं किया होगा?  उन 15 सालों में किस-किस अधिकारी ने विपक्षी कांग्रेसियों को परेशान किया? प्रताडि़त लोगों में तो कुछ सीएम के बेहद करीबी हैं और कुछ मंत्रिमंडल में भी। डेढ़ दशक के जितने पन्ने पलटेंगे उतने ही केस याद आते जायेंगे। इन्होंने भी चेतावनी दी थी कि सरकार आने पर देख लेंगे। सब मन मसोसे बैठे हैं। कोई ‘देख’ पाया? एक दो को छोडक़र बाकी सब अफसर मजे में हैं। कुछ तो पहले भी ज्यादा।  ऐसा कभी हुआ, जो तीन साल बाद हो जायेगा? नहीं लगता कि डॉक्टर साहब के बयान से कोई अफसर घबराया होगा। 

कोरोना की मार स्कूली किताबों तक...

कोरोना का कुछ असर तो लोगों को बीमारी, मौत, और लॉकडाऊन के नुकसानों में देखने मिल गया। लेकिन कोरोना-लॉकडाऊन के बहुत से नुकसान धीरे-धीरे सामने आएंगे। महीनों तक सरकारी दफ्तरों में काम बंद रहा, और शुरू भी हुआ तो कहीं आधे लोगों को एक दिन में काम पर आने दिया गया, दूसरे दफ्तरों से कागजी कार्रवाई धीरे-धीरे चली, और हर दफ्तर का काम पिछड़ते गया। 

सरकार के जिन विभागों में टेंडर होता है वहां पूरी टेंडर प्रक्रिया ही लेट होती चली गई। कई जगहों पर टेंडर भरने वाले लोगों ने आवेदन देकर तारीखें बढ़वाईं क्योंकि उनके पास पूरे कागजात नहीं जुट पा रहे थे। ऐसे जिन-जिन सरकारी विभागों, निगम-मंडलों में टेंडर लेट हुए, वहां पर आगे का काम भी लेट होते जा रहा है। 

इस बरस स्कूलों की अधिकांश कक्षाओं में पढ़ाई नहीं हुई, और साल ऐसे ही खत्म होने का आसार है। लेकिन परीक्षा-सहित या परीक्षा-रहित, जब भी अगले साल की पढ़ाई शुरू होगी, बच्चों को वक्त पर नई किताबें लगेंगी। इस बरस की किताबें पढऩा चाहे न हुआ हो, या कम हुआ हो, अगले बरस की किताबें समय पर देना एक चुनौती का काम भी होगा क्योंकि छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम का काम ही पीछे चल रहा था, और अब उसे खींचतान कर पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है। अभी एक खतरा मंडराते दिख रहा है कि किताबें छपने में देर हो सकती है, अगर छपाई शुरू होने में देर हुई। फिलहाल पाठ्य पुस्तक निगम जितने किस्म की एसीबी-ईओडब्ल्यू जांच से घिरा हुआ है, वहां के अफसर-कर्मचारी किसी किस्म की रियायत देकर आगे फंसना नहीं चाहते। फूंक-फूंककर कदम रख रहे लोगों की रफ्तार वैसे भी कम हो जाती है। 

सरकार के टेंडर वाले बहुत से दूसरे विभागों में भी काम का यही हाल है, न वक्त पर टेंडर, न वक्त पर काम। लेकिन इसमें वित्त विभाग खुश है क्योंकि उसके पास हर काम का भुगतान करने के लिए आज पैसा भी नहीं है। लेकिन यह बात पाठ्य पुस्तकों पर लागू नहीं होती जिनका पैसा केन्द्र सरकार से आता है। 

मोबाइल से थोड़ी बड़ी अल्ट्रासाऊंड मशीन!'

विज्ञान और तकनीक अपने आपमें बिना किसी सामाजिक सरोकार के होते हैं। परमाणु बम एक बड़ी कामयाब तकनीक है, लेकिन जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे बम ने दुनिया की सबसे बड़ी तबाही पैदा की थी। सबसे बड़ी कामयाबी वाली तकनीक, और सबसे अधिक तबाही वाला इस्तेमाल।

अब हिन्दुस्तान में जहां कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ा मुद्दा है, वहां सरकार ने बहुत किस्म के नियम-कायदे अल्ट्रासाऊंड सेंटरों पर लगाए हुए हैं। वहां की मशीनें तो कोख में पल रहे बच्चे का सेक्स बता सकती हैं, लेकिन कानून इसके खिलाफ बड़ा कड़ा है। इसके बीच रास्ता निकालने के लिए हरियाणा जैसे कन्या भ्रूण हत्या में कुख्यात राज्य में ऐसे भी डॉक्टर पकड़ाए थे जो कि एक वैन में अल्ट्रासाऊंड मशीन लेकर चलते थे, और चलती वैन में ही जांच करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताकर मोटी कमाई करते थे।

अब दुनिया में टेक्नालॉजी ने और तरक्की की है, और मोबाइल फोन से कुछ बड़े आकार का ऐसा अल्ट्रासाऊंड आ गया है जो इस काम को कर सकता है, और इस मशीन से होने वाली जांच को तुरंत ही मोबाइल फोन पर दुनिया में कहीं भी देखा जा सकता है। अमरीका के जिस कैलिफोर्निया में ऐसी छोटी मशीन विकसित की गई है, वहां की तकनीकी-कंपनियों को हिन्दुस्तान जैसे देश की सामाजिक विकृति का शायद पता भी नहीं होगा कि 340 ग्राम की यह अल्ट्रासाऊंड मशीन यहां कितनी तबाही ला सकती है। इस खबर को छापने से भी कुछ लोगों को लग सकता है कि इसकी जानकारी से कन्या भ्रूण पर खतरा बढ़ेगा, लेकिन बाजार में आ चुकी तकनीक को अनदेखा करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जरूरत तो इस बात की है कि ऐसे उपकरणों के हिन्दुस्तान में आने के खिलाफ कस्टम चौकन्ना रहे, और हिन्दुस्तान की साइबर एजेंसियां भी इस पर नजर रखें कि ऐसे उपकरण से जुड़े सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन कौन डाउनलोड कर रहे हैं, कौन इस्तेमाल कर रहे हैं।

इसी बहाने कोसला भी संवार दो

पिछले साल जब कांग्रेस के कुछ विधायकों ने चंद्रखुरी में माता कौशिल्या मंदिर के नव-निर्माण के लिये मुख्यमंत्री को चेक सौंपा तो महंत राम सुंदर दास ने मां कौशिल्या का जन्म-स्थान बताने पर 11 लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की थी। अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने रामवमन पथ की योजना में चंद्रखुरी को माता कौशिल्या का जन्म-स्थान मानकर शामिल किया है। चंद्रखुरी के लोग तो इस फैसले से गद्गद् हैं। वे मान रहे हैं कि कुछ बरसों में इस जगह को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल जायेगी।

इधर, भाजपा विधायक, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने इस पर आपत्ति की है। उनका कहना है कि कोसला (बिलासपुर जिला) जन्मस्थली है, चंद्रखुरी नहीं। वैसे जन्मस्थल को लेकर तो नेपाल के प्रधानमंत्री ने भी विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा कि राम अयोध्या की जगह बीरगंज नेपाल के किसी गांव में पैदा हुए थे। कई इतिहासकार जन्मस्थली को लेकर अलग-अलग मत रख चुके हैं। बीते साल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे तब मुसीबत में फंस गये जब उन्होंने पाथरी को साईंबाबा का जन्मस्थान बताते हुए वहां के लिये करोड़ों रुपये की की घोषणा कर दी। शिरडी वाले के उबले उपासकों ने तो आंदोलन की चेतावनी दे दी। ठाकरे ने मामला यह कहकर सुलझाया कि पाथरी में साईंबाबा ने जन्म लिया या नहीं, इस पर वे नहीं जायेंगे लेकिन उनकी गतिविधियां वहां रही, इसलिये उसे पर्यटन के लिये विकसित किया जायेगा।

इधर अपने छत्तीसगढ़ में कोसला के सीधे-सादे लोगों ने चंद्रखुरी के नाम पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। मामला तथ्यों से ज्यादा भावनाओं का होता है। चंद्राकर के बयान के समर्थन में उनकी पार्टी के लोग भी अभी नहीं आये हैं। बेहतर तरीका तो यही होगा कि कोसला से भी माता कौशिल्या का रिश्ता होने की मान्यता को देखते हुए यहां भी विकास का पैकेज लाया जाये।

सोशल पेज पर दो साल की बातें...

कांग्रेस सरकार की दो साल की उपलब्धियों पर सोशल मीडिया पेज शानदार ग्रॉफिक्स के साथ बधाईयों, शुभकामनाओं से भरे पड़े हैं। मंत्रिमंडल के सदस्यों, कांग्रेस के पदाधिकारियों, समर्थकों ने सरकार के कामकाज की सराहना की है। यह एक ऐसा खुला मंच है जो इंटरनेट और मोबाइल रखने वाले हर किसी की पहुंच में है और वे प्रतिक्रिया दे सकते हैं। सो, यह अपनी पीड़ा बताने का भी माध्यम है।

दो साल के जवाब में एक मंत्री के फेसबुक पेज पर प्रतिक्रिया- सारे कांग्रेसी अपनी पीठ खुद थपथपा रहे। जरा उन विद्या मितान शिक्षकों से पूछो, जो बस्तर सरगुजा जैसे घोर नक्सल इलाकों में 4-5 सालों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। 10 दिन में नियमितीकरण का वादा था..., 10 माह से बिना वेतन जी रहे हैं। विद्या मितान शिक्षकों का पूरा परिवार रोड पर आ गया है क्यों?...दो माह से लगातार हड़ताल पर हैं...।

पोस्ट में और भी बहुत कुछ है। पर नेकनीयती यह है कि पब्लिक फिगर इन प्रतिक्रियाओं को डिलीट नहीं कर रहे। यह जानते हुए भी कि यह प्रतिक्रिया हजारों लोगों द्वारा पढ़ी जा रही है। पब्लिक फिगर उन्हें ‘रिप्लाई’ भी दें दें तो और अच्छा।

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