राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बहिष्कार पर बंटा विधायक दल
06-Mar-2021 5:36 PM 236
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : बहिष्कार पर बंटा विधायक दल

बहिष्कार पर बंटा विधायक दल

विभागवार बजट पर चर्चा के लिए अतिरिक्त समय न मिलने पर भाजपा विधायक सदन की कार्रवाई का बहिष्कार कर रहे हैं। वे पिछले दो दिनों से अनुदान मांगों पर चर्चा में भाग नहीं ले रहे हैं। मगर बजट चर्चा में हिस्सा न लेकर भाजपा सदस्यों ने सरकार को घेरने का बड़ा मौका खो दिया है। गृह जैसे दर्जनभर विभागों के बजट बिना किसी असुविधा के पारित हो गए। चर्चा है कि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक खुद बहिष्कार करने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन बृजमोहन खेमे के दबाव के चलते बाहर जाना पड़ा।

सुनते हैं कि पूर्व सीएम रमन सिंह भी बजट चर्चा के बहिष्कार के फैसले से इतने नाखुश थे कि वे अगले दिन दिल्ली चले गए, और सदन की कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया। हाल यह है कि भाजपा विधायक दल इस फैसले पर दो धड़ों में बंट गया है। भाजपा के कुछ लोग भी मानते हैं कि आसंदी का अतिरिक्त समय नहीं देने का फैसला गलत नहीं है। कौशिक खुद विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। कौशिक और कम से कम अन्य सीनियर विधायक भली भांति जानते हैं कि सदन में दल संख्या के आधार पर चर्चा के लिए समय तय किए जाते हैं। भले आसंदी चाहे तो इसमें छूट दे दे। ऐसे में अतिरिक्त समय के लिए दबाव बनाना कतई उचित नहीं था।

चर्चा है कि संसदीय कार्य मंत्री रविन्द्र चौबे, भाजपा विधायकों को मनाने के लिए गए थे, लेकिन विधायकों के एक खेमे का तर्क था कि विधानसभा अध्यक्ष खुद इसके लिए पहल करे। जबकि कौशिक और उनसे जुड़े विधायक मामले को ज्यादा तूल देने के पक्ष में नहीं थे। विधानसभा अध्यक्ष, इन विधायकों के तौर तरीकों से इतने खफा हैं कि वे चर्चा के लिए तैयार नहीं हैं।

अंदर की खबर यह भी है कि पार्टी हाईकमान ने भी अनुदान मांगों पर चर्चा में हिस्सा नहीं लेने के फैसले को संज्ञान में लिया है। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने संगठन के प्रमुख नेताओं से बात की है। ऐसे में बहिष्कार के फैसले से हड़बड़ाए विधायक अब सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेना चाहते हैं। उनकी कोशिश है कि सत्ता पक्ष की तरफ से कोई पहल हो जाए। देखना है कि सोमवार को कोई रास्ता निकल पाता है, अथवा नहीं।

समय से पहले विधानसभा खत्म ?

विधानसभा का बजट सत्र निर्धारित समय से पहले खत्म हो सकता है। वैसे तो सत्र 26 तारीख तक चलना है, लेकिन मौजूदा हाल यह है कि 15 तारीख के आसपास खत्म हो सकता है। इसकी प्रमुख वजह दो विधायक अरूण वोरा और देवव्रत सिंह का कोरोना संक्रमित पाया जाना भी है।

दोनों विधायक सदन की कार्रवाई में हिस्सा ले रहे हैं, और अन्य विधायकों के संपर्क में भी थे। ऐसे में कुछ विधायकों ने अपना कोरोना टेस्ट भी कराया है। अब कोरोना संक्रमण के और मामले आए, तो विधानसभा का तय समय तक चल पाना मुश्किल है। अरूण और देवव्रत के संपर्क में रहने वाले विधायक डरे हुए हैं। ऐसे में समय से पहले विधानसभा खत्म हो जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

अभी यह कोशिश भी हो रही है कि विधानसभा में ही तमाम विधायकों और विधानसभा स्टाफ का कोरोना टीकाकरण हो जाये।

मुजरिम को भी इंसाफ चाहिये

जांजगीर जिले का एक मामला पिछले एक पखवाड़े से चर्चा में है। एक युवक ने फरवरी माह में पुलिस महानिरीक्षक के दफ्तर के बाहर आत्महत्या की कोशिश की। उसकी अब जाकर हालत सुधरी है और पुलिस में वह बयान दर्ज कराने के लिये राजी है। घटना के तुरंत बाद पुलिस ने जो सफाई दी उसमें यह बात उसने प्रमुखता के साथ बताई कि वह आदतन अपराधी है, उसके खिलाफ आठ मामले दर्ज हैं। जब वह हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया तो हालत इतनी खराब थी कि कई दिन तक होश में भी नहीं आया। उसे उसी हाल में हथकड़ी पहना दी गई। जब पुलिस से पूछा गया कि जो होश में ही नहीं उसके साथ ऐसा क्यों? पुलिस का कहना था कि उसके भागने का खतरा था। मामले ने तूल पकड़ा तो हथकड़ी निकाली गई। अब होश में आने के बाद वह जहर पीने की वजह बता रहा है कि उसकी पत्नी के साथ गांव के एक रसूखदार ने घर के भीतर घुसकर छेड़छाड़ की। जब वह थानेदार के पास शिकायत के लिये पहुंचा तो उसे भगा दिया गया, उल्टे उसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की धमकी दी। आईजी साहब तो थे नहीं, जो मौजूद थे उन्होंने न्याय का कोई आश्वासन नहीं दिया।

पुलिस अपनी छबि सुधारने के लिये बहुत से कार्यक्रम करती है। चौपाल लगाती है। आम लोगों से मित्रता के लिये अभियान चलाती है, पर जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो समझ में आता है कि जनता और पुलिस के बीच आखिर दूरी क्यों है? जिन पहले के अपराधों में खुदकुशी की कोशिश करने वाला जिम्मेदार है, उस पर तो कानून, अदालत काम करेगी, पर उसके साथ कोई नाइंसाफी हो रही हो तो क्या उसे आवाज़ उठाने का हक नहीं?

क्या शराबबंदी इसलिये नहीं?

शराब पर लगाये गये अतिरिक्त कर, सेस का इस्तेमाल स्वास्थ्य विभाग की अधोसंरचना में विकास के लिये लगाया गया कर उस काम के लिये खर्च किया ही नहीं गया। पहले देसी पर 10 रुपये, अंग्रेजी पर 10 प्रतिशत फिर बाद में 5 रुपये और सेस लगाया गया। खर्च कहां किया गया, विधानसभा में विपक्ष को संतोषजनक जवाब मिला ही नहीं। वे महालेखाकार से शिकायत करने पहुंचे थे। यह अलग बात है कि उनकी सरकार के दौरान इससे कई गुना गड़बड़ी होती रही। सन् 2017 में महालेखाकार ने 3000 करोड़ की गड़बड़ी अपनी रिपोर्ट में सार्वजनिक की थी।  समाज विज्ञान के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं ने कई बार बताया है कि शराब के चलते न केवल स्वास्थ्य पर किया जाने वाला खर्च कई गुना बढ़ जाता है बल्कि सडक़ दुर्घटनाओं और अपराधों में वृद्धि होती है। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने अब ढाई साल निकाल दिये हैं। शराबबंदी उन वादों में शामिल है जिन्हें पूरा करने को लेकर वह हिचकिचा रही है। शराब पर मिलने वाला टैक्स तो अपनी जगह है ही, कहीं कल को उनकी समिति यह रिपोर्ट नहीं दे दे, कि जरूरी कामों के लिये सेस सिर्फ शराब पर लगाया जा सकता है इसलिये फिलहाल शराबबंदी नामुमकिन है।

लिविंग इन्डेक्स पर खुश हो जायें

रायपुर और बिलासपुर दोनों को लिविंग इन्डेक्स में केन्द्र सरकार की सर्वे एजेंसियों ने टॉप टेन में जगह दी है। ये आंकड़े किस तरह इक_े किये जाते हैं, इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाती है पर जब रिपोर्ट आती है तो वह पहले पन्ने की ख़बर बनती है। रायपुर और बिलासपुर दोनों ही बड़े शहर हैं। कोरबा भी एक बड़ा शहर है। शायद वह औद्योगिक प्रदूषण के कारण पीछे रह गया होगा। लेकिन इन तीनों शहरों में एक समान बात है कि सिटी बस सेवायें चरमरा चुकी हैं। कोरोना के बाद हालत और बुरी हुई है। जहां नागरिकों को आसान, सस्ती, सुलभ परिवहन सेवा न हो उन्हें रहने के लिये बेहतर शहर के रूप में गिना कैसे जा सकता है। शायद सर्वे में उन आम लोगों को शामिल होने का मौका नहीं मिला, जो इस तकलीफ को भोग रहे हैं।

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