राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : रिटायर्ड अधिकारी पर अत्याचार!
03-May-2021 6:04 PM (244)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : रिटायर्ड अधिकारी पर अत्याचार!

रिटायर्ड अधिकारी पर अत्याचार!

बाकी सार्वजनिक उपक्रमों की तरह कोल इंडिया की कम्पनी एसईसीएल में भी सबसे ताकतवर पद होता है कार्मिक निदेशक का। व्यवहार में उन्हें कम्पनी के अध्यक्ष अथवा प्रबंध निदेशक से भी अधिक अधिकार मिले होते हैं। सांसद, विधायक यहां तक कि मंत्रियों को भी इनसे काम पड़ता है। हाल ही में जो अधिकारी इस पद से रिटायर हुए, वे अब तक सबसे ज्यादा लम्बे समय तक टिके रहे। रिटायरमेंट की तारीख पहले से तय थी। पर उन्होंने नई जगह तलाश नहीं की और अपने पुराने बंगले में ही रह गये। भवन खाली कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों ने कुछ दिन देखा, बात नहीं बनी तो माली, केयर-टेकर हटा दिये। फिर कैम्पस की बिजली भी काट दी। अधिकारी परेशान हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कल तक जो उनके नीचे एक इशारे पर काम पर लग जाते थे, आज इतनी धृष्टता कैसे दिखा रहे हैं? कितने लोगों का पद पर रहते भला किया, याद नहीं। कोई इतना भी एहसान फरामोश कैसे हो सकता है?

दो ही वजह हो सकती हैं। एक तो यह कि जिन लोगों को रिटायर अफसर ने पद में रहते हुए परेशान किया, वे इसे हिसाब बराबर करने का सही मौका मानकर चल रहे होंगे। या फिर रिटायर्ड अफसर की खाली कुर्सी पर जो नये अधिकारी आकर विराजमान हुए हैं उनका सब्र जवाब दे रहा होगा। वे जल्दी से जल्दी उसी बंगले में शिफ्ट होना चाहते होंगे। इस वक्त तो लॉकडाउन की वजह बताकर अर्जी डाली गई है, देखें पुराने अफसर को कब तक रियायत मिलती है।

कांग्रेस का खुद को दिलासा देना... 

असम विधानसभा चुनाव के दौरान वहां जाकर बड़ी मेहनत करने वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं को चुनाव परिणामों से धक्का लगा है। सत्ता में कांग्रेस की दुबारा वापसी की बड़ी जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के नेताओं पर थी। मुख्यमंत्री सहित अनेक मंत्रियों, विधायकों और प्रदेश पदाधिकारियों ने दौरा किया। एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने नतीजे का आसान सा निष्कर्ष निकाला। चुनाव तो स्थानीय लोगों की मेहनत और चेहरे से ही जीता जाता है। बाहरी तो बाहरी ही होते हैं।

अब पश्चिम बंगाल को ही देखिये। वहां प्रधानमंत्री सहित पूरी भाजपा ने ताकत झोंक दी। सारे संसाधन जुटाने के बाद सीधे मुकाबले की स्थिति जरूर बन गई पर जीत तो तृणमूल की ही हुई न। छत्तीसगढ़ के कार्यकर्ताओं ने मेहनत की इसलिये इतनी सीटें असम में आ पाईं, वरना नतीजे तो इससे भी ज्यादा कमजोर होते। जो भी है, अपने विपक्ष के नेताओं को कहने का मौका तो मिल ही गया कि कांग्रेस का छत्तीसगढ़ मॉडल वहां काम नहीं आया। असम इन पाँच में से दो ऐसे राज्यों में है जहां कांग्रेस की सीटें बढ़ी हैं, अगर छत्तीसगढ़-कांग्रेस की इतनी मेहनत न हुई होती तो वहां भी पुदुचेरी या बंगाल जैसा हाल हो सकता था।

इनके पास ट्विटर नहीं है...

छत्तीसगढ़ की महिलाओं के पास काम की दोहरी जवाबदेही होना आम बात है। घर भी संभालती हैं और व्यवसाय भी। दफ्तरों में काम करने वालों से ज्यादा कठिन उनकी ड्यूटी होती है जिन्हें गांव-गांव धूप में पैदल चलना पड़ता है। वे अपना फर्ज किस तरह निभा रही हैं यह बताने के लिये उनके पास सोशल मीडिया जरूर नहीं होता है। यह तस्वीर छत्तीसगढ़ के ऐसे ही एक गांव की है जहां बिटिया अपनी मां की गोद से उतरकर उसे कौतूहल के साथ ड्यूटी करते हुए देख रही है। मां एक ‘डिजि-सखी’ है, जिसे मनरेगा की रकम का भुगतान घर-घर जाकर करना होता है।

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