राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अचानक सुनाई देना बंद हो गया !
26-Jun-2021 7:30 PM (285)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : अचानक सुनाई देना बंद हो गया !

अचानक सुनाई देना बंद हो गया !

संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत प्रभारी मंत्री बनने के बाद पहली बार राजनांदगांव पहुंचे, तो कांग्रेसजनों ने उनके स्वागत सत्कार में कहीं कोई कमी नहीं की। भगत ने भी उन्हें भरपूर महत्व दिया। वे डोंगरगढ़ मंदिर दर्शन के लिए भी गए, और बाहर निकले तो पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया। उनसे सवाल किया गया कि आप संस्कृति मंत्री हैं, और शराब पर लगाम नहीं लग रहा है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति इससे भ्रष्ट हो रही है। डोंगरगढ़, और प्रदेश के बाकी जगहों में भी यही स्थिति है। आपका क्या कहना है? भगत ने पूरे ध्यान से सवाल सुना, और फिर कहा कि आप क्या बोल रहे हैं, मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। फिर सवाल दोहराया गया, तो वे यह कहकर आगे बढ़ गए कि उन्हें कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। बुरा बोलने या बुरा देखने से बेहतर है कि बुरा न सुनना। संस्कृति मंत्री ने भी यही किया।

निराश अफसर की मुलाकातें!

सरकार बदलने के बाद कई अफसर लूप लाइन में हैं। इनमें से एक तो पिछली सरकार में कई जिलों के कलेक्टर रहे हैं। काफी हाथ-पांव मारने के बाद भी पूर्व कलेक्टर को अब तक कोई अहम दायित्व नहीं मिल पाया है। ढाई साल हो गए हैं, वे संचालनालय से नहीं निकल पा रहे हैं। अफसर ने दो दिन पहले भाजपा के एक बड़े नेता से मौलश्री विहार स्थित उनके घर पर लंबी चर्चा की।

अफसर की भाजपा नेता से मुलाकात की खबर छनकर बाहर निकली, तो यह पता चला कि अफसर केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जाना चाहते हैं, और इसके लिए भाजपा नेता की मदद चाहते हैं। यह भी अंदाजा लगाया जा रहा कि  पावस सत्र नजदीक है, और विभाग से जुड़े कुछ फीडबैक भी दिए हैं। इसमें सच्चाई कितनी है, यह तो पता नहीं, लेकिन अफसर के भाजपा नेता से मुलाकात को लेकर कई तरह की चर्चा हो रही है।

महिला प्रधान पर, पति पहलवान

दीपका नगरपालिका में टेंडर की प्रक्रिया को लेकर अध्यक्ष के पति और प्रतिपक्ष के नेता के बीच विवाद बढ़ा और अध्यक्ष पति ने प्रतिपक्ष के नेता को तमाचा जड़ दिया। फिर तो दोनों पक्षों में जमकर लात-घूंसे चले। मामला थाने पहुंचा, शिकायत दर्ज कर ली गई।

इन दिनों जिस तरह से एक के बाद एक सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों की ओर से मारपीट, हाथापाई, गाली-गलौच की खबरें आ रही हैं, वह चिंताजनक है। इस मामले में कानूनी तौर पर कौन सही है या कौन गलत यह पुलिस जांच का विषय है। पर दूसरी बात यह भी है कि पंचायतों और नगरीय निकायों में चुनी गई महिला जनप्रतिनिधियों के कामकाज में उनके परिवार के पुरुष सदस्य, खासकर पति की भूमिका अक्सर विवाद में रहती है। बलरामपुर जिले के रामानुजगंज में पंडो आदिवासियों को मछली चुराने के आरोप में बीते सप्ताह पेड़ से बांधकर पीटा गया। इस घटना में दबंगई दिखाने वाला और कोई नहीं बल्कि गांव की महिला सरपंच का पति ही था। समय-समय पर महिला सरपंच और अन्य महिला जन-प्रतिनिधियों को घोटालों में लिप्त पाया जाता है। जांच करने पर मालूम होता है कि ज्यादातर मामलों में महिला की भूमिका केवल दस्तखत करने की रही। कारनामा उसके पति या परिवार के किसी पुरुष सदस्य का है।

संशोधित पंचायती राज कानून 1985 का है, जब महिलाओं का अलग कोटा तय किया गया। आज छत्तीसगढ़ सहित ज्यादातर राज्यों में स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण है।  35-36 साल आरक्षण के बाद भी महिलाओं को विवेक पर पुरुष भरोसा नहीं कर पाते हैं। दरअसल, चुनाव के दौरान मतदाता ही तय कर कर देते हैं कि वे स्वतंत्र क्षमता से काम करने वाली महिला को चुन रहे हैं या परिवार के पुरुष सदस्यों की करतूतों की कवच बनने वाली। शासन ने समय-समय पर सर्कुलर जारी कर बैठकों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की जगह पुरुषों के बैठने पर प्रतिबंध लगा रखा है, पर इन घटनाओं से साफ है कि असल हस्तक्षेप तो बैठकों के बाहर होता है। पंचायतों, जनपदों और पालिकाओं के कार्यपालन अधिकारी भी पुरुष सदस्यों को पश्रय देते हैं। इससे बंदरबांट में आसानी होती है।

इसीलिए जब पंचायती राज्य लागू हुआ और महिला आरक्षण हुआ, तो पाँच-पति के लिए पाप, और सरपंच-पति के लिए साँप शब्द ईजाद हुए थे!

एसपी, कलेक्टर्स इस भीड़ से वाकिफ हैं?

कोरोना केस घटने के बाद प्रदेश में लॉकडाउन को लगभग हटाया जा चुका है, पर हर रिपोर्ट कह रही है कि खतरा कम नहीं हुआ है। अब भी प्रत्येक जिले में कम ही सही पर केस आ रहे हैं। दूसरी लहर का भयंकर प्रकोप देखा गया था, तो इसके पीछे भी लोगों ने माना कि पहली लहर के कमजोर पडऩे पर लोग लापरवाह हो गये थे। अब भी देश में लोग डेल्टा, डेल्टा प्लस वेरियंट और तीसरी लहर को लेकर चिंतित हैं।

सबसे बड़ी बात, अब भी धारा 144 खत्म नहीं की गई है। पांच से ज्यादा लोग बिना मंजूरी के एक जगह इक_े हों, मास्क नहीं लगायें, सोशल डिस्टेंस का पालन नहीं करें तो अब भी महामारी एक्ट के तहत कार्रवाई हो सकती है। सभा-समारोहों में 50 लोगों की अधिकतम उपस्थिति ही तय की गई है, वह भी कोरोना गाइडलाइन का पालन करने के साथ। गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही जिले में दो दिन के भीतर आम लोगों से करीब 75 हजार रुपये का जुर्माना इसलिये वसूल किया गया क्योंकि लोगों ने नियमों को तोड़ा। ये सब आम लोग थे। दूसरी ओर इन दिनों प्रदेश में जगह-जगह प्रभारी मंत्री पहुंच रहे हैं। उनके स्वागत में सडक़ें जाम हो रही है, सभाओं में भीड़ जमा हो रही है। दूसरी ओर कोरोना संक्रमण मत फैले इसलिये जन-दर्शन, राजधानी से लेकर जिलों तक में बंद है। नेताओं, अधिकारियों के आचरण से ही जनता सीखती है। जगह-जगह स्वागत के उतावले मंत्रियों, कार्यकर्ताओं से पूछना चाहिये कि कोरोना इतना ही कमजोर हो चुका है तो सब पाबंदियां क्यों नहीं उठा ली जाती? आम लोगों को जबरन परेशानी में क्यों डाला जा रहा है?

जय हो दिल्ली सरकार...

गौर से देखिये, खंभे पर लटके इस पोस्टर पर किसी मोहल्ला कार्यकर्ता का नाम नहीं है जो, एक स्पीड ब्रेकर बन जाने पर जश्न मना रहा हो। यह दिल्ली सरकार का विज्ञापन है। ऐसे 25-50 पोस्टर लगे हों तो यह तय करना मुश्किल हो जायेगा कि स्पीड ब्रेकर पर ज्यादा खर्च आया या इस बात को प्रचारित करने पर। जिन दलों को दो तिहाई सीटें चाहिये, उन्हें केजरीवाल सीख दे रहे हैं।

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