राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : कोरोना से छोडऩी पड़ी ट्रेनिंग
25-Nov-2021 6:29 PM (157)
छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : कोरोना से छोडऩी पड़ी ट्रेनिंग

कोरोना से छोडऩी पड़ी ट्रेनिंग

छत्तीसगढ़ के वन अफसरों की देश की राजधानी नई दिल्ली में विभागीय ट्रेनिंग से दीगर राज्य से आए एक अफसर के कोरोना संक्रमित होने पर ट्रेनिंग छोडकऱ वापस लौटना पड़ा। छत्तीसगढ़ से करीब 9 वन अधिकारी दिल्ली और लखनऊ में माहभर की ट्रेनिंग में शामिल होने गए थे। 8 नवंबर से शुरू हुई इस ट्रेनिंग में समूचे देश से 43 डीएफओ स्तर के अफसर  हिस्सा बने थे। तकरीबन पखवाड़े भर ट्रेनिंग के बीच एक अफसर बीमार हो गए। जांच में उनकी रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आई। साथी अफसर की सेहत खराब होने पर बाकी की जांच की गई। इस रिपोर्ट में तकरीबन 9 अफसर कोरोना संक्रमित हो गए। इसके बाद ट्रेनिंग को रोकना पड़ा और अब अफसर वापस अपने मुख्यालय लौटकर ऑनलाइन ट्रेनिंग में हिस्सा ले रहे हैं। विभागीय ट्रेनिंग में गए अफसरों के प्रभार अब भी दूसरे वन अधिकारी सम्हाल रहे हैं। बताते हैं कि यह ट्रेनिंग विभागीय प्रमोशन और क्रमोन्नति के लिए जरूरी है। छत्तीसगढ़ के अफसर इसका लाभ मिलने और नई वन सुरक्षा और संपदा की जानकारी हासिल करने के लिए ट्रेनिंग में पहुंचे थे। अब प्रत्यक्ष के बजाय ऑनलाइन ट्रेनिंग करने के लिए कोरोना ने मजबूर कर दिया।

सफर ही जारी रहता है

छत्तीसगढ़ में बरस दर बरस लोग नेताओं और अफसरों के खिलाफ अदालती मामले देख-देख कर थक गए हैं। पिछली रमन सिंह सरकार के समय से कई नेताओं, और अफसरों के खिलाफ मामले दायर किए गए, और मौजूदा भूपेश बघेल सरकार के समय भी पिछली सरकार के सबसे ताकतवर कुछ अफसरों के खिलाफ केस दर्ज हुए। लेकिन इन सबका हाल देखें तो हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इतने बड़े-बड़े वकील इतनी संख्या में खड़े रहते हैं की बस. और बिना किसी फैसले के अदालतों में सुनवाई ही आगे बढ़ती रहती है, उसे देखकर लोगों को लगता है कि क्या ताकतवर लोगों के मामलों में कभी इंसाफ की बारी भी आती है या फिर सुनवाई ही चलती रहती है। कुल मिलाकर सरकार की तरफ से दर्ज किए गए केस, या सरकार के खिलाफ दर्ज किए गए केस चलते ही रहते हैं, चलते ही रहते हैं, उन्हें शायद मंजिल कभी मिलती नहीं, सफर ही जारी रहता है।

फटकार कहाँ तक जाएगी?

पदयात्रा पर चर्चा के लिए शहर कांग्रेस की बुधवार को हुई बैठक में जिलाध्यक्ष गिरीश दुबे ने एक महिला नेत्री को फटकार लगाई, तो हर कोई सन्न रह गया। महिला नेत्री फूट फूटकर रो पड़ी। प्रतिमा चंद्राकर, और अमरजीत चावला ने किसी तरह महिला नेत्री को शांत कराया, और शहर जिलाध्यक्ष गिरीश दुबे को बाहर जाने कहा।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि गिरीश दुबे, सभापति प्रमोद दुबे के करीबी हैं। और उन्हें जिलाध्यक्ष बनवाने में प्रमोद दुबे की भूमिका रही है। सुनते हैं कि महिला नेत्री भी पहले प्रमोद दुबे खेमे से जुड़ी हुई थीं। बाद में वो संसदीय सचिव विकास उपाध्याय के खेमे में आ गई।

उन्हें गिरीश के न चाहते हुए भी पदयात्रा के एक क्षेत्र का प्रभारी बना दिया गया। फिर क्या था महिला नेत्री पार्टी नेताओं के बीच आपसी खींचतान की शिकार हो गई, और बैठक में फटकार सुननी पड़ी। कुछ लोग मानते हैं कि ये मामला आने वाले दिनों में तूल पकड़ेगा। क्योंकि महिला नेत्री के साथ अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ विकास उपाध्याय का खेमा गिरीश के खिलाफ मोर्चा खोल सकता है। देखना है कि आगे-आगे होता है क्या।

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