राजपथ - जनपथ

02-Jan-2021 3:58 PM (344)

छांछ फूंकती कांग्रेस

मध्यप्रदेश में सरकार गंवाने के बाद कांग्रेस हाईकमान सतर्क हो गई है, और बाकी कांग्रेस शासित राज्यों में मध्यप्रदेश जैसी स्थिति न बन पाए, इस कोशिश में जुटी है। छत्तीसगढ़ में तो टूट-फूट की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। बावजूद इसके हरेक विधायक से फोन पर अलग-अलग सरकार और संगठन को लेकर फीडबैक लिया जा रहा है। इससे पहले तक हाईकमान प्रदेश प्रभारी की रिपोर्ट को ही अंतिम मानकर चलता था, लेकिन अब हाईकमान प्रदेश प्रभारी की रिपोर्ट पर ही निर्भर नहीं रहना चाहता है। कहावत है दूध का जला छांछ को भी फूंक-फूंककर पीता है।

पास्को-आरोपी जिलाध्यक्ष !

भाजपा के मोर्चा-प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों की सूची जारी हो रही है। दुर्ग संभाग के एक जिले में पास्को एक्ट के आरोपी को ही अल्पसंख्यक मोर्चे का जिलाध्यक्ष बना दिया गया। अगले महीने अल्पसंख्यक नेता की पेशी भी है। दिलचस्प बात यह है कि बधाई देने वालों में राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के सदस्य यशवंत जैन भी हैं। चर्चा तो यह भी है कि यशवंत की सिफारिश पर नाबालिग से यौन दुव्र्यवहार के आरोपी को पदाधिकारी बनाया गया है। सोशल मीडिया में आरोपी पदाधिकारी बड़े नेताओं के साथ तस्वीर भी वायरल हुई है। अब इसकी शिकायत भी प्रदेश कार्यालय को भेजने की तैयारी है। देखना है कि पार्टी इस मामले में क्या कदम उठाती है।

ऑनलाइन के भरोसे होगी बोर्ड परीक्षा?

सीबीएसई की परीक्षाओं की तारीखों का ऐलान केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने कर दिया है। इधर छत्तीसगढ़ में तारीखें अब तक तय नहीं की गई है। हालांकि यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सीबीएसई की तरह दो तीन माह आगे खिसकाकर  छत्तीसगढ़ में भी परीक्षा ली जायेगी। पर इतना भी आगे नहीं किया जायेगा कि अगले सत्र की समय-सारिणी बिगड़ जाये। परीक्षाओं की संभावनाओं को देखते हुए छात्र-छात्राओं में तनाव बढऩे लगा है। ऑनलाइन पढ़ाई से शिक्षक और पालक क्या खुद छात्र भी संतुष्ट नहीं हैं। जो समर्थ हैं वे कोचिंग का सहारा ले रहे हैं। पर जिनकी क्षमता नहीं है वे पिछड़ गये हैं। वे सक्षम बच्चों से बराबरी नहीं कर पायेंगे।

पिछले कई वर्षों से देखा गया है ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे, सरकारी स्कूलों में पढक़र, कम संसाधनों के बावजूद अच्छे नतीजे दे रहे हैं। बीते सत्र में 10वीं और 12वीं दोनों ही कक्षाओं के टॉपर ग्रामीण स्कूलों के विद्यार्थी थे। केन्द्रीय मंत्री ने साफ कर दिया है कि बोर्ड परीक्षा ऑनलाइन आयोजित नहीं की जायेगी। यह मुमकिन भी नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी परीक्षायें ऑफ लाइन ही होंगीं।

मध्यप्रदेश सहित कुछ अन्य राज्यों में कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए कक्षायें शुरू कर दी गई हैं पर छत्तीसगढ़ में अब तक इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं दिखाई दे रही है।  बोर्ड परीक्षाओं में यदि समर्थ और वंचित विद्यार्थियों के बीच बराबरी की प्रतियोगिता रखनी है तो कक्षाओं को कुछ दिनों के लिये शुरू किया जाना जरूरी है।

लो अब गोबर के उत्पादों की दुकान भी खुल गई

गोबर की सरकारी खरीदी ने इसे लेकर लोगों की सोच में बड़ा बदलाव लाया है। गांवों में गैस सिलेन्डर पहुंचने के बाद इसका कंडे के लिये इस्तेमाल करना भी बंद हो गया था। खाद भी बाजार से खरीद लिया जाता रहा है। इस बीच ख़बरें आई हैं कि गोबर से कुछ लोगों को इतनी कमाई कर ली कि वे कच्चे घरों की पक्की मरम्मत करा रहे हैं और बाइक जैसे साधन भी खरीद रहे हैं। खाद बनाने का काम तो गोठानों में चल ही रहा है, अब गोबर की लकडिय़ां बनाने की मशीन भी आ गई है। इन लकडिय़ों का दाह-संस्कार करने में इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ शहरों नें नगरीय निकायों ने ठंड से बचाव के लिये अलाव जलाने का काम भी गोबर की लकडिय़ों से किया है।

अम्बिकापुर से तो ख़बर है कि वहां गोबर के उत्पादों की दुकान भी खुल गई है। इसे ‘गोबर एम्पोरियम’ नाम दिया गया है। दावा है कि इससे पेड़ों का काटने की नौबत कम आयेगी। जब गोबर खरीदी की योजना छत्तीसगढ़ में लाई गई तो खूब मजाक उड़ा। विरोधी दलों ने कहा कि पढ़े लिखे बेरोजगारों को नौकरी देने की जगह सरकार गोबर बीनने के काम में लगा रही है। लेकिन अब, जैसा कि विभाग के मंत्री ने दावा किया है, दूसरे राज्यों से भी इस योजना के बारे में पूछताछ हो रही है।

धान खरीदी का बंद हो जाना

धान खरीदी के मामले में पैदा हुए अभूतपूर्व संकट का सबसे ज्यादा किसानों को नुकसान हो रहा है। प्राय: सभी जिलों से खबर आ रही है कि धान का उठाव नहीं होने के कारण खरीदी रुक रही है। सरकारी तौर पर इसे घोषित तो नहीं किया गया है पर सोसाइटी में धान पहले ही से इतना जाम है कि अघोषित रूप से खरीदी बंद कर दी गई है। अकेले बिलासपुर जिले में 10 लाख क्विंटल धान जाम होने की खबर है।

राज्य सरकार का कहना है कि हर साल एफसीआई नवंबर महीने में ही धान का उठाव करने का पत्र जारी कर देती है पर इस बार जनवरी महीना आ गया, उठाव न तो शुरू हुआ है न ही इस बारे में कोई आश्वासन दिया गया है। राज्य सरकार का यह भी कहना है कि केन्द्र सरकार ने आश्वासन के मुताबिक बारदाने नहीं दिये। राइस मिलर्स को पुराने बारदाने लौटाने कहा गया पर वे फटे हुए हैं, समिति प्रबंधकों को इनकी मरम्मत करने में पसीना बहाना पड़ रहा है। किसान अपने खर्च से बारदाने की व्यवस्था कर रहे हैं।

बताया जा रहा है, राजीव न्याय योजना के अंतर्गत धान पर समर्थन मूल्य के अतिरिक्त दी जाने वाली राशि को लेकर केन्द्र को आपत्ति है। छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे केन्द्र की योजना किसान सम्मान निधि की तरह बताया है। प्रदेश में 2500 रुपये क्विंटल से हो रही धान खरीदी ने बाकी फसलों के प्रति किसानों की रुचि कम कर दी है। जबकि बस्तर, सरगुजा और दूसरे इलाकों में गन्ना, आलू जैसी ज्यादा लाभकारी फसलें भी ली जा रही हैं। हो सकता है कि धान के उठाव का संकट दो चार दिनों में खत्म हो जाये पर वह स्थायी समाधान नहीं है। समस्या हर साल खड़ी होने वाली है।

छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने फसल चक्र परिवर्तन का अभियान चलाया था। उनकी सरकार के जाने के बाद इस पर आगे काम नहीं हुआ। अब वक्त है कि धान के अलावा दूसरी फसलें लेने पर विचार किया जाये। और सरकार इन फसलों को धान की तरह ही अच्छी कीमत देकर प्रोत्साहित करे। 

कोरोना के अलग हुई मौतें

जब कोई बड़ी चोट लगती है तो लोग पहले की तकलीफ भूल जाते हैं। साल 2020 में कोरोना ने इतना दर्द दिया कि लोग बाकी बीमारियों, मौतों को मामूली समझने लगे। पर दरअसल ऐसा हुआ नहीं। सरगुजा जिले से एक रपट है कि वहां बीते सालभर में हुए हादसों में 650 से ज्यादा लोगों की जान गई। ये वे मौतें हैं जिनमें पोस्टमार्टम कराने की नौबत आई। ज्यादातर सडक़ हादसे हैं। अम्बिकापुर में ही सामान्य मौतों की संख्या तो करीब 2300 है जो श्मशान गृह और नगर निकाय के दस्तावेजों में दर्ज हैं। और इन सबके बीच कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या बहुत कम केवल 90 है।

इससे मिलता-जुलता आंकड़ा दूसरे जिलों का भी हो सकता है। कोरोना से बचाव के लिये हर जिले में करोड़ों रुपये की नई स्वास्थ्य सुविधायें, संसाधन उपलब्ध कराये गये। अभियान चला अर्जेंट और इमरजेंसी मोड पर। शुक्र है, अब कोविड अस्पतालों के बिस्तर दूसरी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये काम आयेंगे क्योंकि हर जिले में प्राय: 75 प्रतिशत बेड खाली हो चुके हैं। बात ये है कि कोरोना से भी ज्यादा लील लेने वाले सडक़ हादसों को रोकने के लिये भी ऐसी ही कोई मुहिम क्यों नहीं चलाई जाती?  सडक़ों में सही संकेतक हों, लोग हेलमेट पहने, ओवरस्पीड न चलें, शराब पीकर न चलें, वैध ड्राइविंग लाइसेंस रखें, गड्ढ़ों को ठीक करें। शायद यह बंदोबस्त कोरोना पर किये गये खर्च से भी कम बजट में हो जायेगा।


01-Jan-2021 5:24 PM (300)

भगवाधारी कुलपति

वैसे तो कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बलदेवभाई शर्मा को आरएसएस के विचारक के रूप में जाना जाता है। वे आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक भी रहे, और जब राज्यपाल ने सरकार की सिफारिशों को नजरअंदाज कर बलदेवभाई शर्मा को कुलपति नियुक्त किया, तो काफी हल्ला मचा। इसके बाद से ही बलदेवभाई शर्मा अपने को निष्पक्ष बताने की कोशिश में जुटे रहे।

सुनते हैं कि सरकार के करीबी लोगों को अलग-अलग माध्यमों से वे लगातार यह बता रहे थे कि उनका कोई एजेंडा नहीं है, और न ही आरएसएस से भी सीधा कोई नाता है। मगर नए साल में लोग उस वक्त हक्का-बक्का रह गए, जब वे भगवा पोशाक पहनकर विवि पहुंचे। प्रदेश के दूसरे विवि विद्यालयों में आरएसएस अथवा भाजपा से जुड़े कुलपति हैं, मगर इस तरह का पहनावा कभी किसी का नहीं रहा। बलदेवभाई चाहे कुछ भी कहे, लेकिन कपड़े के रंग से उनकी सोच जाहिर हो ही गई।

भाजपा में सौदान की जगह शिव

आखिरकार अ_ारह बरस बाद सौदान सिंह की छत्तीसगढ़ से बिदाई हो गई। उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर चंडीगढ़ भेजा गया, और उनकी जगह बंगाल में संगठन का काम देख रहे शिवप्रकाश को अन्य राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ संगठन का प्रभार दिया गया है। सौदान सिंह  के छत्तीसगढ़ से हटने की खबर सोशल मीडिया में छाई रही। पार्टी के कुछ लोगों ने उन्हें फेसबुक पर जमकर कोसा, और छत्तीसगढ़ में भाजपा की दुर्दशा के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहरा दिया। अंदर की खबर यह है कि प्रदेश के ज्यादातर सांसद उनके खिलाफ मुखर थे, और राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) बीएल संतोष से शिकायत भी की थी।

वैसे तो विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही उन्हें हटाने की मांग जोर पकडऩेे लगी थी। भाजपा विधायक दल के नेता के चयन के बाद से पार्टी के एक खेमे ने तो सौदान सिंह से राजनीतिक चर्चा करना भी बंद कर दिया था। सौदान सिंह पर गुट विशेष को संरक्षण देने का आरोप लगते रहा है। कुछ लोग याद करते हैं कि वर्ष-2002 में जब वे छत्तीसगढ़ आए, तब सबको साथ लेकर चलने पर जोर देते थे। उस समय सौदान सिंह के प्रदेश महामंत्री (संगठन) पद पर होने के बाद भी एकतरफा फैसले नहीं लेते थे। हालांकि उस समय प्रदेश भाजपा में लखीराम अग्रवाल, बलीराम कश्यप, दिलीप सिंह जूदेव, ताराचंद साहू और रमेश बैस जैसे बड़े नेता मौजूद थे। रमन सिंह के साथ सौदान सिंह की तालमेल बढिय़ा रहा। मगर वे रमन विरोधी नेताओं को साध नहीं सके।

लखीराम, बलीराम, दिलीप सिंह जूदेव के निधन और फिर ताराचंद साहू के पार्टी से बाहर चले जाने के बाद सौदान सिंह की पार्टी में पकड़ मजबूत होती चली गई। संघ की पृष्ठभूमि से आए सौदान सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में जिम्मेदारी दी गई, लेकिन छत्तीसगढ़ से उनका मोह नहीं छूटा।

जिलाध्यक्ष तक की नियुक्तियों में सौदान सिंह का सीधा दखल रहता था। प्रदेश और जिला संगठन में नियुक्ति के बाद तो असंतुष्ट नेताओं ने उनके खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया था। नई प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी रायपुर आई, तो कुछ बड़े नेताओं ने मौका पाकर सौदान सिंह के खिलाफ शिकायतें की। वाट्सअप पर प्रदेश प्रभारी को लगातार जानकारी दी जाने लगी थी। पार्टी के भीतर आदिवासी नेता नंदकुमार साय की अगुवाई में लामबंद हो गए थे, और उन्होंने पिछलेेेे दिनों खुले तौर पर बैठक भी की थी। इससे भी पार्टी हाईकमान के कान खड़े हो गए। नंदकुमार साय समेत ज्यादातर पार्टी के बड़े आदिवासी नेता सौदान सिंह के धुर विरोधी माने जाते हैं।

चर्चा है कि पार्टी ने भविष्य में संभावित नुकसान से बचने के लिए सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ से बाहर भेजने का फैसला लिया। बताते हैं कि कुछ साल पहले भी सौदान सिंह को छत्तीसगढ़ के दायित्व से मुक्त करने की कोशिश की गई थी, उस वक्त सौदान सिंह मोबाइल पार्टी दफ्तर में जमा कर अपने गांव चले गए थे। बाद में उन्हें किसी तरह मनाया गया। मगर इस बार पार्टी ने प्रचारक के दायित्व से भी मुक्त कर बड़ा फैसला ले लिया। देखना है कि प्रदेश भाजपा में फैसले का क्या असर होता है।

छापे वाले सेल्फी लेने में लग गए

कोरोना संक्रमण के चलते वैसे तो न्यू ईयर पार्टी पर रोक लगी थी। लेकिन रायपुर के तकरीबन सभी बड़े होटलों में न सिर्फ पूरी रात पार्टी चली, बल्कि जाम भी छलके। एक होटल में तो बकायदा आबकारी अमला पहुंच भी गया था। पार्टी में शामिल लोग थोड़ी देर सहम गए, और जाम से भरी गिलास इधर-उधर छिपाने की कोशिश करने लगे। मगर थोड़ी देर में नजारा बदल गया, जो अमला छापा मारने के लिए आया था वह पार्टी में मशगुल हो गया। एक महिला अफसर तो सेल्फी लेते नजर आई। फिर क्या था, उत्साह दोगुना हो गया। वैसे भी खुशी मनाने का हक सबको होता है।

तथाकथित पैसेवाले, पढ़े-लिखे

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस वार्ड में लोगों ने सफाई की मुहिम छेडऩे वाले अमर बंसल को पार्षद बनाया, उस वार्ड में लोगों की नालायकी का हाल यह है कि थोक में दारू पीकर खाली बोतलें नाली में बहा देते हैं, और बोतल खाली होने की वजह से पानी पर तैरती हुई नाव की तरह जाकर कहीं फंस जाती है। चूंकि लोगों के घरों से कचरा उठाया जा रहा है, रोज दो बार उठाया जा रहा है, इसलिए यह मस्ती छाई हुई है। अगर विकसित और सभ्य देशों की तरह नाली और सडक़ किनारे फेंके गए कचरे की छानबीन करके किसी बिल या रसीद, या किसी कागज के सहारे ऐसे नालायक लोगों तक पहुंचा जा सकता, तो उनके पोस्टर सडक़ किनारे लगाने चाहिए।

दरअसल जब तक सफाई करने के लिए दलित समुदाय के गरीब लोग जिंदा हैं, तब तक ऐसी आपराधिक गैरजिम्मेदारी दिखाना लोग अपना हक समझते हैं। रात-दिन सफाई कर्मचारी नालियों में उतरकर अपनी जिंदगी घटाते हैं, और इस सहूलियत की वजह से लोग नालियों को घूरे की तरह इस्तेमाल करते हैं। किसी बारात में आए हुए मेहमानों की तरह वार्ड के लोगों की ऐसी खातिर भी जायज नहीं है जो दलितों की जिंदगी नाली में ही तय कर दे।

जो लोग सस्ती दारू की दुकानों पर गरीबों की भीड़ को हिकारत से देखते हैं, उन्हें नालियां जाम करने वाले ये महंगे ब्रांड देखने चाहिए जो कि तथाकथित पैसे वाले, और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग ही पी रहे हैं।

सुना है कि दारू पीने से सबके लीवर खराब नहीं होते, जो नालियों को इस तरह पाटते हैं, उन्हें सफाई कर्मचारियों की बद्दुआ लगती है, और उसी से लीवर खराब होता है, दारू नाहक ही बदनाम होती है।

कैदियों के लिये कोरोना खत्म

नये साल पर हर कोई खुशी की उम्मीद करता है। पर पैरोल पर छूटे कैदियों के नसीब में ये नहीं है। ओवर क्राउडेड जेलों में जब कोरोना फैलने का खतरा दिखा तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हाईकोर्ट जज की अनुवाई में, प्रदेश में भी एक समिति बनी और ऐसे कैदियों, विचाराधीन बंदियों को पैरोल पर छोड़ा गया जिनकी कुल सजा 7 साल या उससे कम है। छत्तीसगढ़ में ऐसे मामले करीब 4 हजार थे। इनको बार-बार राहत दी गई। मार्च के आखिरी सप्ताह से लेकर जो छूटे तो रिहाई का वक्त बढ़ता गया। वे अब तक इसका फायदा उठा रहे थे। पर यह अवधि 31 दिसम्बर को खत्म हो गई है। यानि एक जनवरी 2021 की सुबह से इन्हें जेलों में हाजिरी देकर वापस बैरक में चले जाना है। आज दोपहर तक यह आंकड़ा नहीं मिला कि कितने कैदी ईमानदारी के साथ वापस जेलों में बंद होने के लिये खुद से पहुंच गये। हो सकता है कि कुछ लोग जेलों में लौटना मंजूर न करें और बाहर रहकर अपने खिलाफ एक और मुकदमा दर्ज होने के लिये तैयार रहें। एक सजायाफ्ता ने कोरोना खत्म नहीं होने और जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होने का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। उसे राहत मिली, पर सिर्फ 6 जनवरी तक के लिये।


31-Dec-2020 4:44 PM (282)

पासवान की कमी खल रही है...

रामविलास पासवान के नहीं रहने से छत्तीसगढ़ को नुकसान उठाना पड़ रहा है। पासवान मोदी सरकार में खाद्य महकमा संभालते थे। वे विशेषकर छत्तीसगढ़ धान खरीदी से जुड़ी समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए तत्पर रहते थे। मगर उनके गुजरने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार को धान खरीद में गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी विपरीत स्थिति छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से नहीं बनी।

दरअसल, केन्द्र ने सितंबर माह में ही 60 लाख मीट्रिक टन चावल लेने के लिए राज्य को सहमति की चि_ी जारी कर दी थी। मगर एफसीआई को लेने के आदेश जारी नहीं किए। अब हाल यह है कि चावल जमा नहीं होने से मिलिंग नहीं हो रही है, और खरीदी केन्द्रों में धान जाम है। 20 फीसदी केन्द्रों में धान खरीद बंद हो चुकी है। अगले एक हफ्ते में तो पूरे प्रदेश में धान खरीद व्यवस्था चरमराने के आसार दिख रहे हैं।

छत्तीसगढ़ सरकार पिछले दो-तीन महीनों से धान खरीदी व्यवस्था बेहतर हो, इसके लिए भरपूर कोशिश कर रही है। सरकार ने पासवान की जगह खाद्य महकमा संभालने वाले पीयूष गोयल को चावल लेने के लिए एफसीआई को निर्देश देने का आग्रह किया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। हल्ला यह है कि पीयूष गोयल की तरफ से जानबूझकर दिक्कतें पैदा की जा रही है। गोयल, राज्य भाजपा के बड़े नेताओं के संपर्क में भी रहते हैं।

चर्चा तो यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर भूपेश सरकार की किसान हितैषी छवि बनने से भाजपा के लोग परेशान हैं, क्योंकि अकेले छत्तीसगढ़ में सरकार 25 सौ रूपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदती है। ऐसे में गोयल के मार्फत धान खरीद में अव्यवस्था फैलाने की कोशिश हो रही है। मगर यह सच न भी हो, लेकिन सहमति के बाद भी औपचारिक रूप से एफसीआई को चि_ी जारी करने में चार माह की देरी होने से कुछ शंका जरूर पैदा होती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार के लोग पासवान को याद कर रहे हैं, जो कि कांग्रेस के नहीं थे, लेकिन बिना भेदभाव के राज्यों को सहयोग करने के लिए तैयार रहते थे।

अफसर इधर-उधर

साल खत्म होने के पहले दर्जनभर से अधिक आईएएस अफसरों को इधर से उधर किया गया। इसमें कुछ को बेहतर पोस्टिंग मिली है। मसलन, मरवाही जीत के बाद जीपीएम कलेक्टर डोमन सिंह और जिला पंचायत सीईओ अजीत वसंत को बेहतर पोस्टिंग मिलना अपेक्षित था। डोमन सिंह को महासमुंद कलेक्टर बनाया गया है। डोमन सिंह ने अमित जोगी-ऋचा जोगी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर कड़ा और बड़ा फैसला दिया था। इसी तरह वहां के जिला पंचायत सीईओ अजीत वसंत को राजनांदगांव जैसे बड़े जिले में पदस्थ किया गया।

नांदगांव जिला पंचायत सीईओ तनुजा सलाम के खिलाफ कई शिकायतें थीं। जिले के प्रभारी मंत्री भी उनके कामकाज से नाखुश थे। उनका हटना तय माना जा रहा था। इससे परे महासमुंद कलेक्टर कार्तिकेय गोयल को हटाकर एमडी मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन बनाया गया है। गोयल की छह माह पहले ही महासमुंद पोस्टिंग हुई थी। उनका कामकाज भी ठीकठाक ही रहा है। इतनी जल्दी उन्हें बदलने का कोई कारण समझ नहीं आया। अलबत्ता, लंबे समय से प्रतीक्षारत धर्मेश कुमार साहू को आखिरकार कलेक्टरी का मौका मिल गया। उन्हें नारायणपुर कलेक्टर बनाया गया। फेरबदल में दुर्ग कमिश्नर के पद पर भी पोस्टिंग की उम्मीद जताई जा रही थी। दुर्ग कमिश्नर टीएस महावर आज रिटायर हो रहे हैं। चर्चा यह भी है कि आज-कल में एक छोटी सूची और निकल सकती है।

रिश्वतखोरी पर थोक में एक्शन

यह दूसरा मौका है जब एसीबी ने एक साथ तीन चार जगह छापेमारी कर रिश्वत रिश्वत लेने के मामलों में गिरफ्तारी की है। इसके पहले जुलाई माह में एक ही दिन एक साथ चार कर्मचारी, अधिकारी पकड़े गये थे। इनमें एक बेमेतरा की महिला पटवारी थी, जिसे एक जमीन के कागजात के नाम पर 7 हजार रुपये लेते पकड़ा गया था। बिलासपुर जिले के भरौदा में विकास कार्यों के लिये मिली राशि को जारी करने के लिये 35 हजार रुपये की रिश्वत लेते जिला पंचायत के समन्वयक को पकड़ा गया था। साथ ही इसी दिन सूरजपुर के बीईओ को 30 हजार रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया था। अब बुधवार को भी कार्रवाई हुई है। रामचंद्रपुर के जनपद सीईओ को 60 हजार रुपये की रिश्वत लेते, सिगमा में आरईएस के एक सब इंजीनियर को 12 हजार रुपये लेते हुए तथा नारायणपुर जिले में शिक्षा विभाग के एक बाबू को 10 हजार रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया।

एक साथ रेड मारने का फायदा यह होता है कि रिश्वत लेने वालों को सतर्क होने का मौका नहीं मिलता। एसीबी को वाहवाही भी खूब मिल जाती है।

कुछ माह पहले सीएम ने समीक्षा बैठक की थी तब भी यह बात सामने आई थी कि दर्जनों अफसरों के खिलाफ विभागीय मंजूरी नहीं मिलने के कारण आर्थिक अपराध के चालान पेश नहीं हो पाये हैं। सजा तो और भी कम लोगों को मिल पाती है। राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पकड़े गये हैं, पर चालान रुका हुआ है। कुछ प्रकरणों में ये पकड़े गये तो खूब सनसनीखेज घटना के तौर पर सामने आई, पर अधिकारी कुछ साल बाद बरी होकर वापस अपनी ड्यूटी पर वरिष्ठता के साथ वापस पहुंच गये। छापे और रिश्वतखोरों को धरे जाने की खबर तो खूब मिल जाती है पर कितनों का चालान पेश हुआ और ब्यूरो कितने लोगों को सजा दिलाई, ये जानकारी भी तो एसीबी को देते रहना चाहिये। 

बस संचालकों से हमदर्दी...

रेलवे ने ट्रेन किराये में वृद्धि स्पेशल के नाम पर की है तो बसों में अघोषित रूप से किराया ज्यादा वसूल किया जा रहा है। खासकर लम्बी दूरी के यात्रियों से। बस्तर, रायपुर, बिलासपुर, सरगुजा और जशपुर जिलों से चलने वाली अंतर्राज्यीय बसों का किराया अघोषित रूप से 25 से 50 प्रतिशत अधिक वसूल किया जा रहा है। बसों और बस स्टैंड में किराया सूची लगाने का फरमान है पर ज्यादातर जगहों पर इसका पालन नहीं हो रहा है। लगातार शिकायतों के बाद खानापूर्ति के लिये एक दो कार्रवाई कर दी जाती है। शायद कोरोना काल में बसों का संचालन बंद होने का असर सिर्फ बस ओनर्स पर ही नहीं, परिवहन विभाग पर भी पड़ा है। बस संचालक लगातार नुकसान होने की फरियाद करते रहे हैं, इसलिये उन्हें अभी ढील दी गई है। पर यात्री भी तो उसी कोरोना के कारण मंदी के शिकार हुए हैं। हमदर्दी उनके लिये क्यों नहीं?

खरीदी केन्द्र में एसडीएम का आपा खोना

धान खरीदी में आ रही दिक्कतों के चलते हर कोई परेशान है। किसान तो इसे भुगत ही रहा है, खरीदी केन्द्रों के कर्मचारी, फूड, मार्कफेड के अधिकारी और इन सब पर निगरानी करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों पर भी अलग तरह का दबाव बना हुआ है। छोटा कर्मचारी हो या बड़ा अधिकारी, धान खरीदी की प्रक्रिया में लगे हर किसी की भूमिका बड़ी है। पर लोरमी के एसडीएम ने यह बात नहीं समझी और अव्यवस्था देखकर आपा खो दिया।

आरोप है कि न केवल उन्होंने खुडिय़ा में धान खरीदी केन्द्र के प्रभारी के साथ मारपीट की बल्कि अपने गार्ड से भी उसे पिटवाया। मारपीट से व्यवस्था तो सुधरनी थी नहीं, तो ऐसा ही हुआ। पूरे मुंगेली जिले में कर्मचारी हड़ताल पर चले गये। वे एसडीएम को हटाने की मांग कर रहे हैं। कुछ कर्मचारी संगठन भी उनके समर्थन में आ गये हैं। इधर पूरे जिले में धान की खरीदी बंद कर दी गई है। दो दिन खरीदी बंद रहने से हड़बड़ाये जिला प्रशासन ने तहसीलदार और उनके मातहतों को खरीदी शुरू करने कहा है, पर उनसे व्यवस्था नहीं संभल रही है।

किसान वैसे भी टोकन, बोरी, अपनी बारी आने के इंतजार में पस्त हो गये हैं पर एक अधिकारी की नासमझी से व्यवस्था और बिगाड़ दी है। अब कलेक्टर पर है, वे क्या रास्ता निकालते हैं। उन्होंने जांच के बाद कार्रवाई की बात कही है। पर, जांच नायब तहसीलदार से कराई जा रही है, जो उनके अधीन काम करते हैं। क्या एसडीएम की कोई गलती नजर आयेगी?

2020 की एबीसीडी

हिन्दुस्तान के जो प्रमुख उद्योगपति ट्विटर पर लगातार सक्रिय रहते हैं उनमें हर्ष गोयनका भी शामिल हैं। उन्होंने आज दोपहर 2020 के सबसे चर्चित और प्रचलित शब्दों से एबीसीडी बनाकर पोस्ट की है। 

Harsh Goenka
A rnab Goswami
B lack lives matter
C ovid
D istancing
E lections
F armer protest
G reen
H erd immunity
I PL
J oe Biden
K angana
L ockdown
M ask
N RC
O nline
P andemic
Q uarantine
R emote working
S ushant Rajput
T rump
U nemployment
V accine
W FH
X enophobia
Y awn
Z oom call


30-Dec-2020 6:26 PM (189)

अग्रवाल-शर्मा तनातनी 

खबर है कि भाजपा के दो बड़े नेताओं गौरीशंकर अग्रवाल और शिवरतन शर्मा के बीच तनातनी चल रही है। हफ्तेभर पहले जिले की कोर कमेटी की बैठक में दोनों के बीच कहासुनी भी हुई। चर्चा है कि जिला संगठन में गौरीशंकर की पसंद पर सारी नियुक्तियां हो गई, जिससे  शिवरतन उखड़ गए। उन्होंने कमेटी की बैठक में गौरीशंकर का विरोध किया। 
शिवरतन ने यहां तक कहा कि आप एक बार विधायक रहे हैं, लेकिन पूरे जिले में अपनी चलाते हैं। यह ठीक नहीं है। इससे  संगठन कमजोर हो रहा है। सांसद सुनील सोनी ने भी बिना रायशुमारी  के नियुक्तियों पर नाराजगी जताई। गौरीशंकर ने अपनी तरफ से सफाई देने की कोशिश की, लेकिन दोनों नेता शांत नहीं हुए। 
शिवरतन ने तो रायपुर आकर पूर्व सीएम रमन सिंह से गौरीशंकर की शिकायत की है। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी जनवरी के पहले हफ्ते में रायपुर आ रही हैं। शिवरतन और कुछ अन्य नेता बलौदाबाजार में नियुक्तियों की शिकायत प्रदेश प्रभारी से कर सकते हैं। 

अब काम की लगी इंदिरा बैंक घोटाले की सीडी

इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक घोटाले के मामले में तत्कालीन मैनेजर उमेश सिन्हा के नार्को टेस्ट की सीडी पुलिस ने अब जाकर कोर्ट में पेश की थी। सिन्हा ने तब सत्तारूढ़ भाजपा के शीर्ष नेताओं का नाम उगला था और उनके बीच करोड़ों रुपये बांटने की बात कही थी। पुलिस ने तब चालान पेश तो किया पर इस सीडी को ही चालान से हटा दिया। पीडि़त ग्राहकों ने कई बार मांग रखी कि नार्को टेस्ट में कही गई बातों को जांच में शामिल करे लेकिन विवेचना अधिकारियों ने इसे नहीं सुना। सरकार बदलने के बाद परिस्थितियां बदलती हैं। अब पुलिस को समझ में आया है कि न्याय के लिये इस सीडी को भी साक्ष्य के रूप में रखा जा सकता है। गनीमत यह है कि 26 करोड़ के कथित घोटाले वाले 14 साल पुराने मामले में अब तक फैसला नहीं आया है और केस निचली अदालत में ही चल रहा है। यदि अदालत किसी नतीजे पर पहुंच गई होती तो शायद यह सीडी किसी काम की नहीं होती।

टोल टैक्स में यात्रियों को कौन सुनेगा?

नये साल से जो चीजें बदल रही है उनमें नेशनल हाईवे की टोल प्लाजा से गुजरने का नियम भी शामिल है। 1 जनवरी से वाहनों में फास्टैग लगाना अनिवार्य होगा। इससे टोल प्लाजा पर गाडिय़ों की कतार नहीं लगेगी। शीशे पर लगे फास्टैग स्टिकर से ही राशि कटकर एजेंसी के खाते में चली जायेगी।

छत्तीसगढ़ में महाराष्ट्र ओडिशा सीमा पर बस्तर में रायपुर, दुर्ग के बीच आधा दर्जन से ज्यादा टोल प्लाजा हैं, पर रायपुर-बिलासपुर-रायगढ़ नेशनल हाईवे की बात इनमें सबसे अलग है। इस सड़क पर सालभर से ज्यादा वक्त हो गये भोजपुरी में बने टोल नाके में राशि वसूल की जा रही है, सड़क अब तक अधूरी है। लोग सवाल करते रह गये कि जब सड़क अधूरी है तो टैक्स क्यों? यह सड़क तीन हिस्सों में बननी है। रायपुर की ओर सिमगा तक की सड़क भी अधूरी है पर कम से कम राहत है कि अभी टोल टैक्स लेना यहां शुरू नहीं किया गया है। नये नियम में कहा गया है कि फास्टैग नहीं होने पर दुगना टैक्स वसूल किया जायेगा। पर यह नहीं बताया गया है कि लिंक, सर्वर खराब होने का बहाना करके यदि नगद राशि देने के लिये बाध्य किया जायेगा तो एजेंसी पर क्या कार्रवाई होगी?  देखा गया है कि देर रात से सुबह तक वाहन कम गुजरते हैं।

इस दौरान टोल नाकों पर कर्मचारी खड़े जाते हैं और फास्टैग सर्विस खराब होने की बात कहकर नगद राशि वसूल करते हैं। इसकी शिकायत करनी हो तो कोई नंबर डिस्प्ले होता नहीं दिखेगा। इस प्रक्रिया में समय तो लगता है ही, लोगों को फास्टैग में कटने वाली रकम से भी ज्यादा राशि का भुगतान भी करना पड़ता है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने नये नियम में ग्राहकों के हित की तो कोई बात की ही नहीं। होना यह चाहिये कि यदि टोल प्लाजा की गलती से फास्टैग से राशि नहीं कट पा रही है तो वाहन चालकों से कोई वसूली ही न हो।  

चलो नये स्ट्रेन से भी दो-दो हाथ कर लें..

कोरोना के नये स्ट्रेन के खतरे पर शोधकर्ताओं ने जो निष्कर्ष निकाला है वह नये साल की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसा है। ब्रिटेन में सार्स सीवीओ-2 को कोरोना वायरस का नया स्वरूप बताते हुए वहां के वैज्ञानिकों ने शोध किया और कहा है कि यदि इसे लेकर लापरवाही बरती गई तो 2021 में 2020 के मुकाबले ज्यादा लोग महामारी के शिकार होंगे, अस्पतालों में भर्ती होंगे और मारे जायेंगे। ब्रिटेन के बाद कई देशों में इस स्ट्रेन के मरीज पाये जाने के बाद भारत में भी इसके लक्षण मिलने लगे हैं। आज ही ब्रिटेन के लिये हवाई उड़ानों पर प्रतिबंध 7 जनवरी तक बढ़ाने की घोषणा नागरिक उड्डयन मंत्री ने कर दी । कई राज्यों ने नाइट कर्फ्यू लगा दिये जाने से नये साल का मजा भी किरकिरा हो चुका है। भारत सरकार यह भी कह रही है कि नये स्वरूप के वायरस पर भी वैक्सीन कारगर रहेगा। यह भी वैज्ञानिकों के रिसर्च पर ही आधारित निष्कर्ष है।

छत्तीसगढ़ में भी कम से कम छह पॉजिटिव केस नये लक्षण वाले मरीजों के आ चुके हैं। एम्स, सिम्स और दूसरे कोविड अस्पतालों में इनका इलाज बाकी मरीजों से अलग रखकर किया जा रहा है। एक सवाल सोशल मीडिया पर बहुत से लोग उठा रहे हैं कि दूसरी लहर की बात वैक्सीन की जरूरत को बनाये रखने के लिये फैलाई जा रही दहशत तो नहीं है, क्योंकि अरबों रुपये वैक्सीन की खोज और निर्माण पर खर्च हो चुके हैं। फिलहाल अपने प्रदेश में ऐसी कोई बदहवासी, दहशत नहीं है। पहले दौर में लोग इतने भयभीत हो चुके, भुगत चुके हैं कि वे इस नये स्ट्रेन से भी दो-दो हाथ करने के लिये मानसिक रूप से तैयार दिखाई दे रहे हैं।


29-Dec-2020 5:30 PM (319)

दिग्विजय की कोशिशें

वैसे तो मप्र के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह, वोरा परिवार से मिलने आए थे, मगर यहां आने के बाद कांग्रेस में चल रही खींचतान को भी दूर करने की कोशिश की। सीएम भूपेश बघेल हो या फिर टीएस सिंहदेव, यहां कांग्रेस के सभी बड़े नेता दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते हैं।  दिग्विजय सिंह ने पीसीसी से पहले अपने आने की सूचना टीएस सिंहदेव के दफ्तर को भेज दी थी। दिग्विजय भोपाल से दुर्ग में उतरे, तो वहां सिंहदेव भी मिलने पहुंचे थे।

वोरा परिवार से मिलने के बाद दिग्विजय, सिंहदेव के साथ दुर्ग से रायपुर आए। रायपुर आए, तो कुछ देर रूकने के बाद कुलदीप जुनेजा के आग्रह पर उनके देवेन्द्र नगर कार्यालय के लिए निकले। ड्राइविंग सीट पर टीएस सिंहदेव थे, और बगल सीट पर दिग्विजय सिंह। दोनों निकल रहे थे कि संगठन के प्रमुख पदाधिकारी भी कार में बैठ गए। चूंकि संगठन पदाधिकारी दिग्विजय सिंह के भी बेहद करीब माने जाते हैं। ऐसे में दोनों ही उन्हें कार में बैठने से मना नहीं कर पाए।

चर्चा है कि संगठन नेता एक तरह से कबाब में हड्डी बन गए। लिहाजा, कार में ज्यादा कुछ बात नहीं हो पाई। बाद में दिग्विजय और सिंहदेव की अलग से चर्चा हुई। दिल्ली रवाना होने से पहले दिग्विजय सिंह सीएम हाउस भी गए, और वहां सीएम के साथ मंत्रणा हुई। चर्चा का ब्यौरा तो नहीं मिल पाया, लेकिन अंदाज लगाया जा रहा है कि भूपेश और सिंहदेव के बीच आपसी समझबूझ को कायम रखने की कोशिश की है।

बालको के बाद अब नगरनार

नगरनार संयंत्र के निजीकरण की प्रक्रिया निरस्त करने के शासकीय संकल्प पर चर्चा के दौरान कई बातेें विधानसभा में सुनने को मिलीं। पिछली सरकार भी नगरनार संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ थी, और केन्द्र को अवगत कराया था कि प्लांट के निजीकरण से नक्सल समस्या बढ़ेगी। मौजूदा सरकार का भी यही रूख है। निजीकरण पर चर्चा के दौरान विपक्षी सदस्यों ने गेंद सरकार के पाले में डालते हुए सलाह दे दी कि निजी हाथों में जाने से पहले सरकार उसे खरीद ले। सीएम ने तुरंत गेंद लपक ली, और ऐलान कर दिया कि सरकार संयंत्र खरीदने के लिए तैयार है।

निजीकरण की मुखालफत से भूपेश सरकार को पॉलिटिकल माइलेज मिल सकता है। मगर क्या सरकार नगरनार खरीद पाएगी? यह सवाल राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है। नगरनार के लिए 20 हजार करोड़ की जरूरत होगी, जिसे जुटाना सरकार के लिए आसान नहीं है। जोगी सरकार ने भी बालको के निजीकरण का जमकर विरोध किया था, उस समय भी राज्य सरकार ने उसे खरीदने का प्रस्ताव दिया था। मगर बालको वेदांता के पास चला गया। अब नगरनार संयंत्र सज्जन जिंदल के पास चले जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी सरकार ने निजीकरण का विरोध कर और खरीदने का प्रस्ताव देकर अपना कर्त्तव्य तो पूरा कर लिया है।

साल की विदाई की गाइडलाइन

देर से ही सही न्यू ईयर सिलेब्रेशन के लिये प्रशासन ने गाइडलाइन जारी कर दी है। गाइडलाइन के ज्यादातर बिन्दु इसके पहले के उत्सवों और पार्टियों की तरह ही हैं। जैसे, क्षमता से केवल 50 प्रतिशत मेहमान होंगे, सोशल डिस्टेंस, मास्क तथा सैनेटाइजर का प्रयोग करना होगा, एक रजिस्टर रखना होगा जिसमें सबके नाम और मोबाइल फोन नंबर नोट करना होगा। पर गाइडलाइन के कुछ निर्देश डांस और मस्ती में बाधा डालने वाली है जैसे आयोजन स्थल पर सीसीटीवी कैमरा लगे होंगे और उत्सव की वीडियोग्रॉफी कराना जरूरी किया गया है।

बहुत से लोग होंगे जो नहीं चाहते उन्हें खाते, पीते, डांस करते वीडियोग्रॉफी की जाये। नाम और मोबाइल नंबर बताना भी जरूरी है जिसे भी लोग अपनी निजता का हवाला देते हुए नहीं बताना चाहेंगे। किसी तरह का मंच बनाने या पंडाल लगाने की मनाही भी की गई है। ऐसे में स्टेज प्रोग्राम कैसे होंगे और इसके बिना क्या रंग जमेगा? यह सवाल भी लोगों के दिमाग में है। बहुत से लोग परिवार के साथ इन कार्यक्रमों में पहुंचना चाहते हैं पर बच्चों और बुजुर्गों को प्रवेश नहीं देने का नियम बनाया गया है। ऐसे में बहुत से लोग बाहर निकलकर न्यू ईयर मनाने से परहेज कर सकते हैं।

हां, एक छूट जरूर दी गई है कि मदिरा प्रेमियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। पाबंदी सिर्फ पान, गुटखा तम्बाकू पर लगाई गई है। कई आयोजक इसी बात से खुश हैं कि आयोजन की अनुमति तो कम से कम मिल ही गई है। गाइडलाइन की परवाह कौन करे। पहले भी 50 की पार्टियों में 200-300 लोग पहुंचते रहे हैं कोई सख्ती तो हुई नहीं। फिर ये दिन तो मनहूस साल 2020 की विदाई का है। कुल जमा बात है कि कोरोना के खौफ से लोग बाहर आना चाहते हैं।


28-Dec-2020 5:21 PM (297)

तो यू-ट्यूब से यह भी सीख सकते हैं...

2000 रुपये के जिस नोट को काले धन का तोड़ बताते हुए जारी किया गया था और चिप लगे होने की अफवाह तक जिम्मेदार टीवी चैनलों ने फैला रखी थी उसकी नकली छपाई करना कितना आसान है यह महासमुंद में पकड़े गये मामले से पता चलता है। छोटे-छोटे गांवों के लडक़े बिना कम्प्यूटर साधारण कलर प्रिंटर और बॉन्ड पेपर की मदद से वे जाली नोट बनाकर बाजारों में खपा रहे थे।

यू टूयब और गूगल अब अपराधियों का भी गुरु बन बैठा है। इंटरनेट, खासकर यू ट्यूब पर जाकर हत्या करने, आत्महत्या करने, एटीएम काटने, जाली एटीएम कार्ड बनाने, लूटपाट करने, चोरी करने के बाद बच निकलने जैसे अनेक जघन्य अपराध सीखे जा सकते हैं। तरीके ऐसे खतरनाक और बारीक होते हैं कि कई बार पुलिस और जांच एजेंसियों को भी भनक नहीं लगती।

ऐसे अपराधों में लिप्त लोग जब पकड़ में आते हैं तो पता चलता है उनमें ज्यादातर पढ़े-लिखे हैं। कोई आई टी इंजीनियर है, कोई तो नाबालिग भी। इन दिनों हर जिले से ऑनलाइन धोखाधड़ी, एकाउन्ट से पैसे पार होने की ख़बरें लगातार आ रही है। इनमें अंतरराज्य और अंतर्राष्ट्रीय गिरोह भी पकड़े गये हैं। सोशल मीडिया पर उपलब्ध अपराधों की शिक्षा देने वाले इन चैनलों पर लगाम लगाने का कोई कारगर तरीका अब तक नहीं निकाला जा सका है। स्थानीय जांच एजेंसियां अपराधियों को पकडऩे के बाद उन पर कार्रवाई तो कर सकती है पर सोशल मीडिया और इंटरनेट पर मौजूद कंटेन्ट को हटाने के लिये तो केन्द्र सरकार के सम्बन्धित मंत्रालय, विभागों को ही आगे आना होगा।

जमीन बचाने अबूझमाड़ का आंदोलन 

दिल्ली में किसानों के आंदोलन से इसकी तुलना करें या न करें, लेकिन मांगों को सुना तो जाना चाहिये। अबूझमाड़ के हजारों ग्रामीण भी कडक़ड़ाती ठंड में सडक़ पर उतर गये हैं। करीब 25 दिन पहले उन्होंने आंदोलन शुरू किया। पांच दिन तक उन्होंने ओरछा मार्ग पर चक्काजाम कर रखा था। प्रशासन के इस आश्वासन के बाद 15 दिन में उनकी मांगों पर निर्णय लिया जायेगा, आंदोलन खत्म करा दिया गया।

20 दिन तक कोई फैसला नहीं आया और अब वे फिर आंदोलन पर हैं। वे नारायणपुर जिला मुख्यालय की तरफ भी बढ़ रहे हैं। मांगें हैं, आमदई खदान को उत्खनन के लिये दी गई लीज रद्द किया जाये, यहां पुलिस का कोई नया कैम्प बन रहा है उसके लिये मंजूरी नहीं दी जाये। इन दोनों योजना, परियोजना के चलते पेड़ों की कटाई होनी है जिसके लिये वे तैयार नहीं हैं। पिछली बार के आंदोलन में गिरफ्तार 6 ग्रामीणों को रिहा करने की मांग भी वे कर रहे हैं।

बस्तर में खनन कम्पनियों और पुलिस फोर्स का विरोध नई बात नहीं। हर सरकार इसे झेलती आ रही है। वहां विकास और सुरक्षा के सवालों से प्रशासन को हमेशा जूझते रहना पड़ा है। ताजा मामले में वह आदिवासियों का भरोसा और सहमति कैसे हासिल कर पायेगा, यह अहम है।

पोराबाई का बरी हो जाना 

जांजगीर जिले के बिर्रा स्थित सरस्वती शिशु मंदिर की छात्रा पोराबाई ने माध्यमिक शिक्षा मंडल की 2008 की परीक्षा में 99.1 प्रतिशत अंक लेकर प्रावीण्य सूची में पहला स्थान हासिल किया था। करीब 100 फीसदी अंक हासिल करना लोगों को हैरान कर गया। खासकर तब वह जब पिछली बार सन् 2007 में अच्छे नंबर नहीं आने के कारण श्रेणी सुधार के लिये दुबारा परीक्षा में बैठी थी। शिक्षा अधिकारियों ने जांच शुरू की तो तहलका मच गया। जांच से मालूम हुआ कि उत्तर पुस्तिकाओं को किसी और ने लिखा था। उसकी हैंडराइटिंग भी नहीं मिली। पोराबाई के स्कूल के शिक्षक गुलाब सिंह, बाल चंद्र भारती, समेलाल, महेत्तर लाल साहू और संपत लाल के खिलाफ अपराध दर्ज हुआ। पोराबाई सहित सब गिरफ्तार किये गये। पोराबाई को रिजल्ट के बाद शिक्षाकर्मी की नौकरी भी मिल गई थी, जिस पर फैसला आना बाकी है। पर अब 12 साल बाद पोराबाई सहित सभी शिक्षक जालसाजी के आरोप से बरी हो गये हैं। हालांकि यह निचली अदालत का आदेश है जिसे ऊपर की अदालत में चुनौती देने का मंशा शिक्षा अधिकारी जता रहे हैं, पर सवाल यह है कि गड़बड़ी सिर्फ पोराबाई और शिक्षकों ने की या फिर जांच अधिकारियों ने भी?


27-Dec-2020 7:18 PM (610)

बाहर इंतज़ार, और भीतर...

कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही दल में मोर्चा-प्रकोष्ठों के विशेषकर अध्यक्षों की काफी पूछ परख रहती है। विशेषकर छोटे जगहों में तो कार्यकर्ता उनकी खातिरदारी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। ऐसे ही भाजपा के एक मोर्चा के प्रमुख का पिछले दिनों बलरामपुर आगमन हुआ। चूंकि  उनके दल ने कुछ समय पहले ही उन्हें मोर्चा अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है, इसलिए युवा अध्यक्ष कार्यकर्ताओं से मेल मुलाकात के लिए जिलों का भ्रमण कर रहे हैं। जिलों में उनके ठहरने का इंतजाम स्थानीय कार्यकर्ता करते हैं। 

अध्यक्ष महोदय जब बलरामपुर पहुंचे, तो स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अपने प्रभाव का उपयोग कर सर्किट हाउस में ठहरने का इंतजाम किया। युवा अध्यक्ष को बलरामपुर पहुंचते रात हो गई। सर्किट हाउस पहुंचने से पहले ही अध्यक्ष के पूर्व परिचित भरोसेमंद स्थानीय कार्यकर्ता से खाने-पीने का इंतजाम कर रखा था। अध्यक्ष पहुंचते ही अपने साथियों के साथ कमरे में बंद हो गए। 

बाहर मुलाकात के लिए कई छोटे-बड़े नेता आए थे। उन्हें उम्मीद थी कि अध्यक्ष मेल-मुलाकात के लिए बाहर निकलेंगे। काफी देर इंतजार करने के बाद वे बाहर नहीं निकले, तो उन्होंने दरवाजा खटखटाया। युवा अध्यक्ष ने अपने एक साथी से बाहर इंतजार कर रहे कार्यकर्ता को कहलवा भेजा कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस में व्यस्त हैं। इसलिए आज मुलाकात नहीं कर पाएंगे। इससे स्वागत के लिए फूल माला लेकर खड़े कार्यकर्ता नाराज हो गए। युवा अध्यक्ष, अपने साथियों के साथ अंदर क्या कर रहे हैं, इसकी भी जानकारी हो गई। उन्होंने तुरंत अपने सीनियर नेताओं को इसकी जानकारी दे दी, और भविष्य के लिए सचेत करने के लिए भी कह दिया है।

स्काई वाक और अंडरग्राउण्ड सीवरेज...
रायपुर का स्काई वाक और बिलासपुर की अंडरग्राउन्ड सीवरेज परियोजना दोनों की हालत एक जैसी है। दोनों पर करोड़ों रुपये खर्च हो गये। अधिकारियों, ठेकेदारों और जैसा कि विधानसभा में आरोप लगाया गया है नेताओं ने भी इसमें खूब चांदी काटी लेकिन पूरे पैसे बर्बाद हो गये। चुनाव के समय इन परियोजनाओं का अनुपयोगी होना, विफल होना एक बड़ा मुद्दा था पर दोनों का ही कोई समाधान दो साल बीतने के बाद नई सरकार नहीं कर सकी है। स्काई वाक का कुछ दूसरा उपयोग समझ नहीं आया। विशेषज्ञों की समिति ने आम लोगों की राय के आधार पर सिफारिश की है कि पूरा किया जाये, पर आगे काम अब तक शुरू नहीं हुआ। 270 किलोमीटर की बिलासपुर की अंडरग्राउण्ड सीवरेज परियोजना अब भी अधूरी है जबकि इसकी हाइड्रोलिक टेस्ट सिर्फ एक किलोमीटर हुई है। पम्पिंग स्टेशन के रख-रखाव पर ही सालाना करीब एक करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। दोनों ही निर्माण कार्य पूर्ववर्ती सरकार के स्मारक के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

कोरोना पॉजिटिव स्टेटस
कोरोना पीडि़तों के साथ एक स्टेटस सिम्बॉल भी जुड़ जाता है। पीडि़त व्यक्ति कह सकता है कि उसका पाला किसी छोटी-मोटी बीमारी से नहीं बल्कि महामारी से पड़ा था। ऐसे कई लोग जिन्हें कोरोना ने घेरा और स्वस्थ होकर बाहर आये ऐसा लगता है मानो उन्होंने कोई जंग जीत ली है। ऐसे ही एक शख्स ने अपनी बाइक पर शान से लिखवा रखा है-भूतपूर्व कोरोना पॉजिटिव..। 

धान के बाद अब चावल उठने का संकट
धान खरीदी को लेकर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच टकराव रोज नई-नई समस्या लेकर सामने आ रही है। ज्यादातर केन्द्रों में धान के उठाव की समस्या आ रही है। जांजगीर जिले से खबरें आ रही हैं कि कई केन्द्रों में खरीदी ही रोकनी पड़ी है। ऐसा दूसरे जिलों में भी है। बारदाने का संकट तो पहले से ही बना हुआ है। किसान खुद खर्च कर बारदाने खरीद रहे हैं और समितियां उन्हें वापस भी नहीं कर रही है। पर अब एक नई समस्या खड़ी हो रही है। धान उठने के बाद कस्टम मिलिंग में देरी की। खाद्य मंत्री का कहना है कि मिलर्स धान इसलिये नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि उनका चावल मिलों में जाम है। केन्द्र सरकार को 60 लाख टन धान उठाना है पर गति बहुत धीमी है। अब जगह-जगह मिलर्स हाथ खड़े कर रहे हैं और कह रहे हैं कि मिलिंग तो दूर हमारे पास धान रखने की भी जगह नहीं है। इसका नतीजा क्या होगा? पिछले साल भी यही हुआ, कई सालों से होता आ रहा है धान खुले में पड़ा होता है, और खऱाब हो जाता है। विधानसभा सत्र में भी इस मुद्दे पर हंगामा हो चुका है। सियासत जारी है। (rajpathjanpath@gmail.com)


26-Dec-2020 4:39 PM (405)

सतयुग से चल रही सप्लाई...

विधानसभा में हास-परिहास के बीच कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे ने सप्लायरों के संगठित गिरोह पर बेबसी जताई। वे लगातार शिकायतों पर कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन गड़बड़ी है कि रूकने का नाम नहीं ले रही है। वे कह गए, कि कंपनी, सप्लाई और ट्रैक्टर पुण्यात्मा होते हैं। आपके समय में भी थे। हमारे समय में हैं, और मुझे लगता है कि सतयुग और द्वापर में भी इन्हीं के द्वारा ही सप्लाई किया गया होगा।

इससे पहले बीज सप्लाई में गड़बड़ी मामले पर सदन में चर्चा के दौरान धर्मजीत सिंह ने कहा कि दाल तडक़ा लगाने वाला बीज की सप्लाई कर रहा है। बीज निगम-हार्टीकल्चर मिशन में हर साल सैकड़ों करोड़ की बीज व अन्य सामग्री की सप्लाई होती है। पिछली सरकार में तो एक मिलर का बीज-हार्टीकल्चर के सप्लाई तंत्र में काफी दबदबा था। करोड़ों की गड़बड़ी भी हुई, लेकिन किसी का बाल बांका नहीं हुआ।

मौजूदा हाल यह है कि बीज-हार्टीकल्चर सप्लाई तंत्र में होटल कारोबारी का दबदबा है। हल्ला तो यह भी है कि प्रोफेसर को मिशन संचालक बनवाने में कारोबारी की भूमिका थी। करीब सालभर बाद अलग-अलग स्तरों पर हुई शिकायतों के बाद प्रोफेसर को हटाया गया। मगर अनियमितता जारी है। वैसे भी आदिकाल से चल रही व्यवस्था को बदल पाना आसान नहीं है।

बृजमोहन पॉजिटिव, कई संदिग्ध

पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी कोरोना की चपेट में आ गए हैं। उनके संपर्क में आने वाले आधा दर्जन विधायक संदिग्ध हो गए हैं। हुआ यूं कि अग्रवाल को गुरूवार को हल्का बुखार था। उन्होंने विधानसभा में अपना कोरोना टेस्ट कराया। इसके बाद सदन और फिर पार्टी के कार्यक्रमों में व्यस्त हो गए। शुक्रवार को उन्होंने किसान सत्याग्रह में हिस्सा लिया, जिसमें नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, पूर्व सीएम रमन सिंह, अजय चंद्राकर और अन्य पार्टी विधायकों के साथ धरने पर बैठे। कौशिक और अन्य विधायक कोरोना के खतरे को लेकर बेपरवाह थे, और उन्होंने मास्क ठीक से नहीं लगाया था।

कार्यक्रम निपटने के बाद कोरोना टेस्ट रिपोर्ट आई, जिसमें बृजमोहन पॉजिटिव पाए गए। बृजमोहन होम आइसोलेशन में हैं, और उनकी तबीयत भी बेहतर है। मगर कांग्रेस ने कोरोना टेस्ट कराने के बाद भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने पर बृजमोहन के खिलाफ महामारी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग कर दी है। वैसे तो टेस्ट रिपोर्ट आने तक होम आइसोलेशन में रहने का नियम है। हालांकि बृजमोहन अग्रवाल इससे पहले आधा दर्जन बार कोरोना जांच करा चुके हैं।

हर बार उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई। इस बार भी उनका एंटीजन टेस्ट निगेटिव था, लेकिन आरटीपीसीआर टेस्ट पॉजिटिव आ गया। अब वे सदन की कार्रवाई में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। जबकि सत्र में तीन बैठकें और होनी है। बृजमोहन के संपर्क में आने वाले बाकी विधायक भी सदन की कार्रवाई में हिस्सा ले पाएंगे, इसमें संदेह है। ऐसे में 28 तारीख को ही शीतकालीन सत्र का अवसान हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी अनुपूरक बजट तो पास हो ही गया है।

बिजली तारों से पक्षियों को भगाने का आदेश

शहर के किसी भी छोर पर नजर डालें, अक्सर शाम के वक्त हजारों पक्षियां बिजली तारों पर एक कतार में लगी दिखाई देती हैं। ये पक्षियां सब स्टेशन और हाईटेंशन तारों पर ज्यादा मिलेंगीं, क्योंकि वह शहर के कोलाहल से दूर की जगह होती है। चूंकि वे जमीन के सम्पर्क में होते नहीं इसलिये उन्हें झटका नहीं लगता। उनकी जान को कोई खतरा नहीं, ऐसा हम मानकर चलते हैं, पर ऐसा नहीं है। जब पक्षियां दो तारों के चपेट में एक साथ आ जायें तो उनको करंट लगना तय है। कई बार दो अलग-अलग तारों पर बैठी चिडिय़ा एक दूसरे के सम्पर्क में आती हैं। ऐसे मौके पर करंट लगने के कारण कतार की सारी पक्षियां चपेट में आ जाती हैं। बस्तियों में जहां तार नजदीक होते हैं और उलझे हुए भी हों वहां ऐसी घटनायें ज्यादा होती हैं।  विलुप्त हो रही चमगादड़ और सोन चिरैया, गोड़ावन जैसी पक्षियों की मौत तो अक्सर हो जाती हैं क्योंकि उनके बड़े पंख होते है। राजस्थान में जैसलमेर, बाड़मेर जगहों पर तो हर माह 19-20 हजार पक्षियां करंट से मारी जाती हैं। अब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण, एनजीटी ने इसे गंभीर समस्या मानते हुए बड़ा ऑर्डर पारित किया है। विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के बाद एनजीटी के अध्यक्ष ने सभी राज्य सरकारों और केन्द्र से कहा है कि बिजली तारों से पक्षियों को भगाने के लिये उपकरण लगायें। उन्होंने वर्तमान में चल रही और भविष्य में आने वाली परियोजनाओं में भूमिगत केबल लगाने का भी निर्देश दिया है। हालांकि अध्ययन राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में पक्षियों की मौत पर किया गया है पर आदेश को पूरे देश में लागू किया जाना है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पेड़ों के लगातार कटने की वजह से पक्षियों को बिजली तारों पर ठिकाना बनाना पड़ता है। यदि एनजीटी के आदेश का शत-प्रतिशत पालन किया गया तो फिर ये पक्षी कहां जायेंगे?  पेड़ तो पहले से ही छिन चुके हैं।

विद्या बालन कैसी लगेंगीं तीजन बाई के रूप में?

पंडवानी गायकी के चलते देश और दुनिया के कई हिस्सों में छत्तीसगढ़ का नाम ऊंचा कर चुकीं पद्मविभूषण तीजन बाई की जीवन यात्रा पर एक फिल्म बॉलीवुड में बनने जा रही है। उनका किरदार प्रख्यात अभिनेत्री विद्या बालन निभायेंगी। जैसी की खबर है कुछ दिन बाद वह छत्तीसगढ़ी और पंडवानी सीखने के लिये भी रायपुर पहुंचने वाली हैं। अब लोगों ने तीजन बाई और विद्या बालन के चेहरे को एक साथ रखकर अनुमान लगाना शुरू कर दिया है कि वह मेकअप के बाद तीजन की तरह दिखेगी या नहीं?  कुछ यह भी कह रहे हैं कि चेहरा तो मैच कर लेगा पर तीजन बाई के हाव-भाव, उनकी आवाज और शैली विशिष्ट है, जिसको अपनाने में उन्हें खासी मेहनत करनी पड़ेगी। तीजन बाई को आदर्श मानकर छत्तीसगढ़ में पैदा हुए, रचे-बसे यहीं की माटी के कई कलाकारों ने उनकी नकल करने की कोशिश की पर उनका कोई विकल्प नहीं है। लोगों में उत्सुकता है कि विद्या बालन कितना निभा भाती है तीजन की असल जिंदगी को। तीजन के नाना के किरदार में अमिताभ बच्चन भी हैं पर उनके लिये यह थोड़ा आसान होगा क्योंकि नाना के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते, न ही उन्हें देखा। पर तीजन सबके सामने हैं। एक सवाल यह भी है कि इस तरह की पहल छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माताओं की ओर से क्यों नहीं होती, जबकि हर साल सौ से ज्यादा फिल्में आ रही हैं।

टैक्स वसूली का फायदा किसे मिले?

ऐसा नहीं है कि नगर-निगमों के पास अपनी टीम नहीं है पर पता नहीं किस दबाव में तीन साल पहले निजी कम्पनियों के हवाले टैक्स वसूल करने का जिम्मा दे दिया गया। लोगों के घर समय-बे समय पहुंचने, धमकाने की शिकायत मिलने पर नगर निगमों के प्रशासन ने उनके साथ अपने कर्मचारियों को भी लगा दिया। ये वही काम कर रहे हैं जो नगर निगम के राजस्व कर्मी करते आये हैं। हाल यह भी है कि जो नियमित टैक्स जमा कर रहे हैं उन्हें भी बार-बार फोन और एसएमएस कर वसूली के नाम पर तंग किया जाता है। चूंकि धमकाने, दबाव डालने से मना किया गया है, इसलिये ये प्राइवेट कम्पनी वहीं से टैक्स वसूल रही हैं, जहां से नगर निगम के लोग भी आसानी से वसूल कर लेते हैं। जहां दिक्कत हैं और बड़े करदाता हैं निजी कम्पनियां उन्हें छू नहीं रही है। नगर निगम के कर्मचारियों को अब पूरी तनख्वाह के साथ या तो खाली बिठा दिया गया है या फिर वहां लगाया जा रहा है जहां बड़ी रकम फंसी है और वसूली करना टेढ़ी खीर है। तीन माह पहले भुगतान करने पर करदाता को केवल दो प्रतिशत की छूट है जबकि निजी कंपनी ने एक शहर से 100 करोड़ की टैक्स वसूल की हो तो 7.5 करोड़ रुपये उसके खाते में डाले जा रहे हैं। इतना कमीशन तो साहूकारी के अलावा किसी धंधे में नहीं है। बिलासपुर, दुर्ग, भिलाई में यह सिस्टम भाजपा के समय से चल रहा है। रायपुर नगर-निगम ने अब ठीक ही किया जो इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले गहराई से विचार कर रही है। दावा है कि यहां वसूली शत-प्रतिशत हो जाती है। पर जिन नगर निगमों में वसूली का यह तरीका अपनाया जा चुका है वहां भी विचार करना चाहिये कि यह जारी रहे या नहीं।


25-Dec-2020 3:58 PM (304)

विपक्ष का लंच

विधानसभा में गुरूवार को सीएम की तरफ से लंच में विपक्ष के विधायक शामिल नहीं हुए। विपक्ष के विधायकों ने लंच का बहिष्कार नहीं किया था, बल्कि नेता प्रतिपक्ष के कक्ष में सीएम का न्योता आने से पहले ही विपक्ष के विधायकों के लिए अपने लिए अलग लंच का इंतजाम कर रखा था। यह इंतजाम जोगी पार्टी के नेता धर्मजीत सिंह की पहल पर किया गया था, और इसका जिम्मा पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी को दिया गया था।

धर्मजीत की पसंद पर सुंदरानी घर से ढेंस की सब्जी और सिंधी पकवान बनवाकर लाए थे। हालांकि जोगी पार्टी के दो विधायक रेणु जोगी और देवव्रत सिंह, विपक्षी लंच में शामिल नहीं हुए, वे सीएम के लंच में शामिल हुए। सदन की कार्रवाई के बीच लंच का दौर चलता रहा। एक समय ऐसा आया, जब सदन में एक-दो विपक्षी विधायक ही मौजूद थे। तब खाद्यमंत्री अमरजीत भगत नेता प्रतिपक्ष के कमरे में आए, और बृजमोहन अग्रवाल से लंच जल्द खत्म कर सदन की कार्रवाई में हिस्सा लेने का अनुरोध किया, और कहा-भईया आप लोगों के बिना मजा नहीं आ रहा है।

बृजमोहन ने उन्हें बिठा लिया, और उन्हें भी ढेंस की सब्जी खिलाई।  दरअसल, विपक्ष के विधायकों की संख्या इतनी कम है, कि अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, बृजमोहन अग्रवाल, धर्मजीत सिंह और नारायण चंदेल सदन में गैर हाजिर रहे, तो विपक्ष में शून्यता आ जाती है। इसीलिए कहा भी जाता है कि मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है।

आपसी मतभेद भुला रहे आदिवासी नेता

खबर है कि भाजपा के आदिवासी नेता आपसी मतभेद को भुलाकर एकजुट हो रहे हैं। पिछले दिनों नंदकुमार साय ने अपने निवास पर कुछ आदिवासी नेताओं के साथ बैठक की, तो पार्टी में हडक़ंप मच गया। अब इस तरह की बैठकें जिलेवार होंगी। साय की पहल का नतीजा यह रहा कि सरगुजा के एक-दूसरे के धुर विरोधी नेता रेणुका सिंह और रामविचार नेताम, भी अब एक-दूसरे की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।

पिछले दिनों रामानुजगंज के कार्यकर्ता सम्मेलन में रेणुका सिंह ने रामविचार नेताम की जमकर तारीफ की, और कहा कि रामविचारजी के गृहमंत्री रहते प्रदेश में कानून व्यवस्था की स्थिति बेहतर रही है। पार्टी के अंदरखाने में रेणुका सिंह के बदले रूख की जमकर चर्चा है। कहा जा रहा है कि रेणुका सिंह भी नंदकुमार साय की तरह प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में नहीं बुलाए जाने से खफा हैं। रेणुका सिंह रायपुर में थीं, और एकमात्र केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद उन्हें बैठक में नहीं बुलाया गया।

पार्टी के कुछ लोग मान भी रहे हैं, कि कार्यालय में होने के बावजूद साय को बैठक से दूर रखना एक बड़ी चूक थी। जिससे सारे आदिवासी नेता नाराज हो गए हैं। अब जल्द ही आदिवासी एक्सप्रेस को पटरी पर नहीं लाया गया, तो आगामी चुनावों में पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

गोबर के पैसों से पति को गिफ्ट में दी बाइक

ग्रामीण इलाकों में अतिरिक्त पैसे आने पर इन दिनों कौन सा शौक पूरा करने की ओर सबसे पहले सोचा जा रहा है? कर्ज माफी, 2500 रुपये क्विंटल में धान खरीदी और अब गोधन न्याय योजना में गोबर खरीदी। मनेन्द्रगढ़ के पिपरिया की सीता देवी ने बीते कुछ माह में 80 हजार रुपये का गोबर बेचा। इन रुपयों का क्या किया जाये, विचार किया तो उसने पाया कि उसका पति विष्णु, है तो बड़ी गाड़ी का ड्राइवर लेकिन बहुत दिनों से इच्छा है कि वह एक बाइक खरीदे। सीता देवी ने अपने पति को शानदार होंडा बाइक खरीदकर उपहार में दी है। छत्तीसगढ़ सरकार दो साल में ग्रामीणों की तरक्की का आधार बताते हुए कहती है कि आटोमोबाइल की बिक्री में छत्तीसगढ़ सबसे आगे है। सीतादेवी का फैसला इसकी पुष्टि करता है।

नये साल के उत्सव में भी कलाकार खाली..

क्रिसमस और न्यू ईयर किस तरह मनाना है इसकी गाइडलाइन अंतिम समय में जारी की गई। पहले भी ऐसा हो चुका है। गणेशोत्सव, दुर्गोत्सव, ईद, दशहरा और दीपावली में लोगों को एक दो दिन पहले ही पता चला कि किस तरह की पाबंदी या छूट होगी। राजधानी समेत सभी बड़े शहरों में बीते कुछ सालों से न्यू ईयर सिलेब्रेशन के लिये होटलों, रेस्तरां में ग्रैंड गाला कार्यक्रम रखने का चलन बढ़ा है। इसके लिये कलाकारों, सितारों की बुकिंग बहुत पहले करनी होती है। सजावट भी कई दिन पहले शुरू करनी होती है, फिर प्रचार करना होता है ताकि लोग पहुंचें। इस बार होटल और इंवेट मैनेजर लगातार प्रशासन के सम्पर्क में गाइडलाइन के बारे में पूछते रहे, पर राज्य सरकार से दिशा-निर्देश नहीं मिलने का हवाला देकर उन्हें कुछ नहीं बताया जा रहा था। तब उन्होंने खुद से ही तैयारी शुरू कर दी। अब लगभग सभी बड़े होटलों में न्यू ईयर के कार्यक्रम रखे जा रहे हैं। हां, इतना जरूर है कि वे ग्राहकों की भीड़ को लेकर सशंकित हैं। ज्यादा भीड़ जुटने पर कार्रवाई का खतरा भी है। इसलिये इस बार बहुत कम कलाकारों, डांसरों को बुकिंग मिल पाई। इवेंट मैनेजरों को डर था कि पर्याप्त कलेक्शन नहीं होने पर उन्हें भुगतान करने में दिक्कत होगी। इससे पहले कोरोना के बाद से लगातार कलाकारों को घर ही बैठना पड़ा है। पूरे सालभर उन्हें तंगी से जूझना पड़ा। इन्हें अब सन् 2021 से ही कोई उम्मीद है।

हवाई व रेल यात्रा के अलग-अलग पैमाने

कोरोना काल से बंद यात्री ट्रेनों को रेलवे एक के बाद शुरू करने जा रही है लेकिन स्पेशल ट्रेनों के रूप में। यात्रियों की मांग बताकर शुरू की गई कई ट्रेनें खाली जा रही हैं। बिलासपुर से इंदौर चलने वाली नर्मदा एक्सप्रेस को 10 माह के बाद 26 दिसम्बर से शुरू किया जा रहा है, पर स्पेशल ट्रेन के रूप में। ऐसी कई ट्रेनों को स्पेशल नाम से चलाया जा रहा है। इसके बावजूद कि उन्हें लगातार चलाने की बात कही जा रही है। दरअसल, स्पेशल ट्रेनों के नाम पर ज्यादा भाड़ा लेने का रास्ता खुल जाता है। यात्रियों को ट्रेन यात्रा में पहले से कहीं ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं क्योंकि ये साधारण नहीं स्पेशल ट्रेनें हैं। पहले भी ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाकर रेलवे अनेक ट्रेनों को सुपर फास्ट दर्जा दे चुकी है, लोगों का ज्यादा समय तो इससे बचता नहीं पर किराया जरूर ज्यादा देना पड़ता है। इसके ठीक उलट हवाई यात्रा का हाल है। कोरोना काल के मुकाबले सभी प्रमुख शहरों के लिये टिकटों की दर घटी हुई है। न्यू ईयर में ज्यादा बुकिंग के चांस होने के बावजूद। रेलवे ने पहले ही कह दिया है कि कोरोना काल में वह लोगों को अनावश्यक यात्रा के प्रति हतोत्साहित करना चाहती है, इसीलिये सभी तरह की रियायतें बंद की गई है। दूसरी ओर विमानन कम्पनियां हैं जो रियायत देकर यात्रा को प्रोत्साहित कर रही हैं। आखिर क्या सही है, यात्रा करना या नहीं करना?


24-Dec-2020 4:11 PM (229)

लंदन से लौटे पर ऐसी दहशत

ब्रिटेन में कोरोना वायरस के नये स्वरूप वीयूआई के व्यापक फैलाव को देखते हुए देशभर में गाइडलाइन जारी की गई है। छत्तीसगढ़ में भी निर्देश दिया गया है कि विदेश से लौटे प्रत्येक व्यक्ति का कोरोना टेस्ट और संक्रमित पाये जाने पर इलाज कराना है। बिलासपुर में ब्रिटेन से लौटे एक व्यक्ति का दो बार कोरोना टेस्ट कराया गया, दोनों बार रिपोर्ट निगेटिव आई। इसके बावजूद उसे स्वास्थ्य विभाग ने होम आइसोलेशन पर रख दिया है।

इस व्यक्ति को शिकायत यह है कि वह खुद ही अस्पताल में भर्ती अपनी बीमार मां को देखने के लिये हजारों किलोमीटर का सफर तय करके पहुंचा है। अब उसे कोरोना नहीं होने पर भी बीमार बताकर एक कमरे में बंद रहने के लिये क्यों मजबूर किया जा रहा है। डॉक्टरों ने समझाया कि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। पहले भी दूसरे राज्यों, देशों से लौटने वालों को 14 दिन क्वारांटीन पर रहना पड़ता था। रिपोर्ट निगेटिव है या पॉजिटिव इससे असर नहीं पड़ता है। बहरहाल, विदेश से आये बेटे की मजबूरी को समझते हुए अब डॉक्टरों ने उन्हें बहुत जरूरी होने पर घर से निकलने की इजाजत दे दी है, पर पीपीई किट पहनना जरूरी होगा।

अपने ही विधायक डाल रहे मुसीबत में..

विधानसभा के मौजूदा सत्र में विधायक दलेश्वर साहू ने यह बताकर सनसनी फैला दी कि कई राइस मिलें हैं जिन्हें कस्टम मिलिंग के लिये लाइसेंस देकर धान दिया गया लेकिन उनके मिल में बिजली कनेक्शन ही नहीं है। जब कनेक्शन ही नहीं तो मिलिंग हो ही नहीं सकती, लेकिन इन मिलों ने न केवल मिलिंग की बल्कि उसके बाद चावल जमा भी कर दिया।

इधर, विधायक शैलेष पांडेय ने विधानसभा में बिलासपुर की 300 करोड़ की सीवरेज परियोजना की विफलता को लेकर सवाल दागे। कांग्रेस ने चुनाव के समय इसे बड़ा मुद्दा बनाया था, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद न तो सीवरेज परियोजना पूर्णता की ओर बढ़ी न ही दोषी अधिकारी, ठेकेदार और विधायक की मांग के अनुसार तत्कालीन जन-प्रतिनिधियों पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

रायगढ़ के विधायक प्रकाश नायक ने भी एक स्टील प्लांट द्वारा सडक़ खराब करने और प्रदूषण फैलाने का मुद्दा उठाया और इसमें प्रशासन की मिलीभगत का आरोप लगाया।  मंत्री विपक्षी दलों के सवालों से परेशान हों तो बात समझ में आती है लेकिन ऐसा लगता है कांग्रेस के विधायकों ने भी ऐसा करने की ठान ली है। 

सीजी बोर्ड में शून्य पढ़ाई, सौ फीसदी परीक्षार्थी

बीते सत्र में कोरोना संक्रमण के कारण छत्तीसगढ़ में माध्यमिक शिक्षा मंडल के पैटर्न वाली स्कूलों में जनरल प्रमोशन दिया गया था। इसके चलते इस बार परीक्षार्थियों की संख्या डेढ़ से दो लाख बढऩे वाली है। पिछली बार 6.60 लाख के करीब छात्र-छात्राओं ने 10वीं-12वीं बोर्ड परीक्षा दी थी, इस बार सभी को पास कर दिये जाने के कारण संख्या बढक़र 8 लाख पहुंच रही है।

इस समय ऑनलाइन आवेदन भरने की प्रक्रिया चल रही है जो माह के आखिर  तक चलती रहेगी। अंतिम तारीख के बाद ही वास्तविक संख्या कितनी है यह मालूम होगा। परीक्षा फॉर्म भरने की प्रक्रिया तो डेढ़-दो माह आगे खिसकी है पर बोर्ड परीक्षाओं की तारीख भी आगे बढ़ेगी या नहीं अभी तय नहीं है।

अमूमन मार्च में ये परीक्षायें शुरू हो जाती है। कोरोना महामारी का असर कम होता है तो तय वक्त पर परीक्षायें जरूर हो सकती हैं लेकिन 9वीं, 11वीं के सौ फीसदी विद्यार्थियों की परीक्षायें एक साथ लेने की बड़ी जिम्मेदारी माध्यमिक शिक्षा मंडल और प्रशासन पर आने वाली है। स्कूल नहीं खुलने के कारण पढ़ाई ठप हुई, प्रायोगिक परीक्षायें भी नहीं हुई हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षाओं में विद्यार्थियों का परफार्मेंस कैसा रहेगा, यह बड़ा सवाल है।

10वीं बोर्ड में पिछली बार 73 प्रतिशत से कुछ अधिक और 12वीं बोर्ड में 70 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी पास हुए थे। यह परिणाम तब था जब बीते सत्र के लगभग दो तिहाई पढ़ाई हुई थी। इस बार स्कूल बिल्कुल नहीं खुले । उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में यदि उदारता बरतते हुए ज्यादा संख्या में विद्यार्थियों को सफलता दिला दी जाती है तो आगे की प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें दिक्कत हो सकती है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध में नेता-नेत्री

राजनांदगांव में दो बहनों से छेड़छाड़ और मारपीट के आरोप में एक पार्षद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। दो दिन पहले ही तुमगांव (महासमुंद) में एक सेक्स रैकेट को पुलिस ने पकड़ा तो एक आरोपी ने खुद को सांसद का प्रतिनिधि बताया। सचमुच उसके पास से नियुक्ति पत्र भी मिल गया। नवंबर के आखिरी हफ्ते में रायपुर, डोंगरगढ़ और कई कस्बों में फैले मानव तस्करी के मामले में पुलिस ने अन्य लोगों के साथ एक महिला नेत्री को गिरफ्तार किया।

तीनों मामलों की प्रकृति अलग-अलग है पर सभी में महिलाओं के खिलाफ अपराध हैं। यह भले ही संयोग है कि सभी मामले एक ही दल, भाजपा से जुड़े नेताओं, पदाधिकारियों के हैं। इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिये कि बाकी राजनैतिक दलों की स्थिति साफ-सुथरी है। दरअसल, कई बार इसीलिये पद हथियाये, खरीदे जाते हैं ताकि वे इसका कवच के तौर पर इस्तेमाल कर सकें। कई बार पद मिलने के बाद उसका दुरुपयोग शुरू होता है, जैसा राजनांदगांव में हुआ। भीड़ जुटाने, स्वागत सत्कार कराने के मोह में जानकारी होते हुए भी अवैध, अनैतिक गतिविधियों पर नेता खामोश रहते हैं और जैसे ही बदनामी की आहट होती है, उसे बाहर का रास्ता दिखाया करते हैं।


23-Dec-2020 4:33 PM (435)

थानों का इतिहास लेखन...

एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की पुलिस के हर थाने को कहा जाता था कि वह अपने इलाके के सभी किस्म के इतिहास का एक छोटा ब्यौरा बनाकर रखे। अभी बिहार के एक पत्रकार पुष्य मित्र ने वहां अररिया जिले की एक तस्वीर पोस्ट की है जिससे याद आया कि हर थाने को अपने इलाके के इतिहास से थोड़ा तो वाकिफ रहना चाहिए।

बहुत पहले अविभाजित रायपुर जिले में एसपी सीपीजी उन्नी के वक्त थानों से इतिहास लिखवाया गया था। अभी के महासमुंद जिले में उस वक्त तुमगांव थाने  के इतिहास में लिखा था कि थाने के मालखाने में एक डुगडुगी रखी हुई है जो कि वहां के राजा ने एक किसी की खाल खिंचवाकर बनवाई थी, और जो मुनादी के काम आती है। अब फणीश्वरनाथ रेणु की धरती से लेकर थाने की इस डुगडुगी तक बहुत सी दिलचस्प बातें थाने अपने इलाके के बारे में दर्ज कर सकते हैं। कोई कल्पनाशील पुलिसवाले रहें तो वे अपने इलाके का एक आम इतिहास लेखन करवा सकते हैं।

मंत्री से सीधे अध्यक्ष

आखिरकार काफी खींचतान के बाद भाजपा ने दुर्ग में डॉ. शिवकुमार तमेर और भिलाई में विरेन्द्र साहू को जिलाध्यक्ष बना दिया। चर्चा है कि दोनों नियुक्ति में सरोज पाण्डेय की चली है। यानी सांसद विजय बघेल, प्रेमप्रकाश पाण्डेय और विद्यारतन भसीन के सारे प्रयास धरे के धरे रह गए।

डॉ. तमेर तो संघ के पसंदीदा हैं, और वे दुर्ग के मेयर रह चुके हैं। उनकी गिनती छत्तीसगढ़ के नामी न्यूरोलोजिस्ट में हैं। ऐसे में उनका नाम आया, तो किसी तरह का विरोध नहीं हुआ, लेकिन विरेन्द्र साहू के नाम का ऐलान हुआ, तो पार्टी के नेता ही उनका बैकग्राउंड खंगालते रहे। विरेन्द्र साहू जिले के मंत्री रहे हैं, और वे बीएसपी कर्मी थे। जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के अंदरखाने में तीखी प्रतिक्रिया भी हो रही है।

सुनते हैं कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के कक्ष में हास परिहास के बीच एक-दो विधायकों ने रमन सिंह से पूछ लिया, कि विरेन्द्र साहू कौन है? इस पर रमन सिंह ने अनभिज्ञता जताई। एक सीनियर विधायक ने हैरानी जताई, और कहा कि आप लोग नियुक्ति करते हैं, और आपको ही पता नहीं? एक अन्य ने कहा कि विरेन्द्र जिला संगठन मंत्री हैं। इस पर सीनियर विधायक ने कटाक्ष किया कि पार्टी में कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रशिक्षण सत्र इस विषय पर भी होना चाहिए कि जिले के मंत्री से सीधे अध्यक्ष कैसे बन सकते हैं। उनकी टिप्पणी पर वहां मौजूद  विधायकों ने जमकर ठहाका लगाया।

भोपाल आ जाइए

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान छत्तीसगढ़ के विशेषकर बृजमोहन अग्रवाल खेमे के नेताओं से काफी घुले मिले हैं। दोनों युवा मोर्चा में साथ काम कर चुके हैं। मंगलवार को दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा की अंतिम यात्रा में शामिल होने का उनका कार्यक्रम बना, तो एक दिन पहले ही उन्होंने बृजमोहन को फोन किया, और कहा कि उन्हें साथ दुर्ग चलना है। दोनों एयरपोर्ट से भिलाई पहुंचे। वहां प्रेमप्रकाश पाण्डेय उनकी अगवानी के लिए खड़े थे। फिर शिवराज सिंह चौहान, एक ही कार में बृजमोहन और प्रेमप्रकाश के साथ वोराजी के घर गए।

अंतिम संस्कार कार्यक्रम से लौटे, तो एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा, नारायण चंदेल के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीतिक स्थिति पर सामान्य चर्चा की। चर्चा है कि इन नेताओं ने पार्टी की अंदरूनी दिक्कतों को भी गिनाया। उन्होंने अजय चंद्राकर के जुझारू तेवर की सराहना की, और कहा कि वे उन्हें टीवी चैनलों में देखते हैं।  उन्होंने कहा कि जल्द ही वे बिना किसी कार्यक्रम के रायपुर आएंगे, और आप सबके साथ चर्चा करेंगे। या फिर आप लोग समय निकालकर भोपाल आ जाइए। वहां अच्छे से बात हो जाएगी। संकेत है कि शिवराज सिंह अब पार्टी संगठन में हाशिए पर चल रहे बृजमोहन खेमे को मुख्य धारा में लाने के लिए पहल कर सकते हैं।

बोर्ड परीक्षाओं पर चिंता भी, राहत भी

छत्तीसगढ़ के जिन स्कूलों में सीजी बोर्ड परीक्षायें नहीं होतीं उनमें केन्द्रीय परीक्षाओं के लिये सीबीएसई ही अधिक प्रचलित है। कोरोना महामारी के चलते हुए नुकसान के कारण ज्यादातर स्थानीय परीक्षाओं में जनरल प्रमोशन दिया जा रहा है पर बोर्ड परीक्षाओं में ऐसा करना मुश्किल है। विशेषकर केन्द्रीय बोर्ड की। एक-एक परीक्षार्थी की क्षमता का समग्र मूल्यांकन होना जरूरी है क्योंकि आगे इंटरमीडियेट और स्नातक स्तर की परीक्षाओं का रास्ता तय होना है।

केन्द्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ने कल साफ कर दिया है कि जनरल प्रमोशन या ऑनलाइन परीक्षाओं का विकल्प सीबीएसई एग्जाम के लिये तय नहीं किया जा सकता। परीक्षायें ऑफलाइन ही होंगी। हां, छात्रों को तैयारी का कम से कम दो माह का समय और मिल गया है। स्कूलों में ताला लगा है और ऑनलाइन कक्षाओं की तैयारी से अभिभावक, शिक्षक और स्वयं छात्र संतुष्ट नहीं हैं। ऐसे में ऑफलाइन परीक्षायें ली भी नहीं जा सकतीं। दो माह टलने के बाद परीक्षायें निरापद ढंग से हो जायें तब शायद छात्रों का साल खराब होने से बचाया जा सकता है।

10वीं-12वीं बोर्ड के बच्चों के लिये आने वाले दो महीने तनाव के हो सकते हैं क्योंकि इस बीच उन्हें साल भर की तैयारी करनी है। ऐसी परीक्षा के लिये जिसमें सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का दबाव होता है। अभी केन्द्रीय बोर्ड परीक्षाओं की तारीखें घोषित नहीं की गई हैं। शायद आने वाले दिनों में कोरोना के ट्रेंड का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि दो माह बाद भी परीक्षायें नहीं हुई तो विद्यार्थियों, अभिभावकों को यह ज्यादा मायूस करेगा, क्योंकि इससे तो उनका पूरा एक साल व्यर्थ चला जायेगा।


22-Dec-2020 3:54 PM (133)

अंग्रेज चले गए, पुलिस छोड़ गए...

दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में जब मां-बाप अपने बच्चों को किसी मुसीबत की नौबत के बारे में सिखाते हैं तो पहली नसीहत यह रहती है कि कोई खतरा या परेशानी होने पर सबसे पहले पुलिस को फोन करें या आसपास दिख रही पुलिस तक जाएं। यही वजह है कि पश्चिम के विकसित देशों में छोटे-छोटे बच्चे भी असली खतरे के वक्त या नासमझी में भी पुलिस को फोन लगा लेते हैं।

लेकिन हिन्दुस्तान में खुद पुलिस के लोग यह मानते हैं कि यहां पुलिस के अमले में इतनी संवेदनशीलता नहीं है कि बच्चे उनसे जाकर संपर्क कर सकें। इस देश में अंग्रेजों के वक्त से पुलिस को देसी लोगों को कुचलने के हिसाब से तैयार किया गया था, और आजादी की पौन सदी बाद भी उसका मिजाज बदला नहीं है। मुसीबत में पुलिस को बुलाने का एक मतलब एक नई मुसीबत खड़ा करना भी होता है, और लोग यह तौलते रह जाते हैं कि पुलिस को न बुलाना बड़ी मुसीबत होगी, या बुलाना।

अब राजधानी रायपुर में आज जिस वक्त कांग्रेस भवन में मुख्यमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक तमाम लोग मौजूद थे, तब बाहर ट्रैफिक पुलिस के लोग एक ऑटोरिक्शा पर इस तरह रवाना हो रहे थे। ड्राइवर की सीट पर ही एक पुलिसवाला सवार हो गया था जो कि ट्रैफिक के नियमों के भी खिलाफ है और कोरोना से सावधानी के भी खिलाफ।

जब तक पुलिस अपने मिजाज को नियम-कायदे मानने वाला नहीं बनाएगी, तब तक पुलिस पर लोगों का भरोसा बन नहीं पाएगा। किसी मारपीट की नौबत पर पुलिस को बुलाएं तो वह पहुंचते ही गंदी गालियों से शुरूआत करती है, और लाठियों पर बात खत्म होती है। बिना जरूरत पुलिस-गाडिय़ां सायरन बजाते चलती हैं, और सडक़ के बीच में डेरा डाल देती हैं। मुसीबत से बचने के लिए अब अगर ऐसी पुलिस तक जाने की सलाह मां-बाप अपने बच्चों को नहीं देते हैं, तो उसकी वजह यह है कि हिन्दुस्तानी पुलिस अब तक अंग्रेजी राज के मिजाज से बाहर नहीं आ पाई है।

भाजपा में आदिवासियों की पीड़ा

कांग्रेस हो, भाजपा या अग्रिम पंक्ति का कोई दूसरा राजनीतिक दल। अनुसूचित जाति, जनजाति समुदाय से ऐसे नेताओं को आगे रखने की कोशिश करते हैं जिनकी अपने समाज में पकड़ तो अच्छी तो हो पर नेतृत्व के लिये हाथ उठाने, हां में हां मिलाने के लिये तैयार रहें। इसके बाद भी हर पार्टी में एक दो ऐसे मुखर नेता भी होते हैं जिनसे नेतृत्व को खतरा तो रहता है पर उनका अपने क्षेत्र में, समुदाय के बीच प्रभाव इतना अधिक होता है कि हाशिये पर रखा नहीं जा सकता। उनका विकल्प तैयार करने की कोशिश भी कामयाब नहीं हो पाती।

भाजपा में नंदकुमार साय भी ऐसे ही नेता हैं। उन्होंने पार्टी का समर्थन नहीं मिलने बल्कि एक खेमे द्वारा रोड़े अटकाने के बावजूद स्व. अजीत जोगी की जाति को लेकर अदालती लड़ाई जारी रखी। वे अपनी पार्टी में आदिवासी नेतृत्व की मांग भी उठाते रहे। पिछले दिनों जब भाजपा प्रभारी डी. पुरन्देश्वरी यहां आई तो वरिष्ठ नेताओं की बैठक में जाने से उन्हें दरवाजे पर रोक लिया गया। बुरी तरह अपमानित हुए और नाराजगी जताई भी। अब उनका ताजा बयान आया है। कह रहे हैं पार्टी प्रदेश में कमजोर हो गई है। आदिवासी समाज से पकड़ खत्म हो गई है। इसके चलते बस्तर और सरगुजा में पार्टी का सफाया हो गया।

अनुसूचित जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से मुक्त होने के बाद साय को पार्टी ने कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी है। केन्द्र में सरकार है पर वहां भी उनके लिये कुछ नहीं सोचा गया। वे तीन बार लोकसभा और तीन बार विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। दो बार राज्यसभा भी भेजे जा चुके हैं। अब कायदे से उनके अनुभव का इस्तेमाल तो पार्टी को करना ही चाहिये। ये क्या बात हुई कि उन्हें सीनियर लीडर्स की बैठक में भी न घुसने दिया जाये। उन्होंने खुद आदिवासी नेताओं की बैठक बुलाकर बता ही दिया कि जब जरूरत होगी वे समाज के सारे धड़ों को वे अपने साथ ले सकते हैं।

शाकाहारी अंडा छीन लेगा एक सियासी मुद्दा

स्कूल और आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों को पौष्टिक आहार के रूप में जब अंडा वितरित करने की बात आई तो यह एक राजनैतिक मुद्दा बन गया। न केवल छत्तीसगढ़ में बल्कि मध्यप्रदेश में। भाजपा की आपत्ति के बाद छत्तीसगढ़ में सरकार को कहना पड़ा कि अंडे का वितरण सिर्फ उन्हीं बच्चों में किया जायेगा, जो इसे खाना चाहें। बाकी के लिये सोयाबीन से बनी सामग्री या वैकल्पिक प्रोटीन दी जायेगी। पर अब इसका हल निकलने वाला है। आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने शाकाहारी अंडों का अविष्कार किया है। ये अंडे मुर्गियां नहीं बल्कि फैक्ट्रियां पैदा करती हैं। खुश्बू, स्वाद और इनमें मौजूद प्रोटीन असली अंडे की तरह ही है। अविष्कारकों ने खुद इसे कुपोषण के खिलाफ स्वच्छ प्रोटीन की लड़ाई बताया है। हो सकता है आम लोगों तक इस अंडे को पहुंचने में वक्त लग जाये लेकिन जब आयेगा इसे बांटने और खाने पर राजनीति तो खत्म हो जायेगी।

कोरबा में खाद कारखाने का कबाड़

देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने छत्तीसगढ़ में जिन औद्योगिक इकाईयों को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी उनमें कोरबा का खाद कारखाना भी शामिल था। सन् 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने एफसीआई की फैक्ट्री के लिये यहां आधारशिला रखी। रूस, चेक गणराज्य से मशीनें मंगाई गईं और फैक्ट्री लगाने का काम शुरू हुआ। इसी बीच देश के अन्य हिस्सों में लगे एफसीआई की खाद फैक्ट्रियां भारी घाटे में चलने लगीं। तब कोरबा का काम बीच में रोक दिया। बाद में जितने भी सांसद और विधायक इस क्षेत्र से हुए उन्होंने इस कारखाने को शुरू कराने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं रहे।

सन् 2016 में तत्कालीन सांसद स्व. बंशीलाल महतो की कोशिश के बाद केन्द्र की पहल पर अमेरिका की निजी कम्पनियों ने यहां की मशीनों का मुआयना किया और गैस आधारित प्लांट लगाने में दिलचस्पी दिखाई। उस समय अनुमान लगाया गया था कि 9 हजार करोड़ रुपये के खर्च से संयंत्र मुनाफे के साथ चल निकलेगा। पर आगे काम नहीं बढ़ा।

अब हाल ही में फैक्ट्री के सारे साजो-सामान, विदेशी आयातीत मशीनें कबाड़ मानकर 13.84 करोड़ रुपये में बेच दी गई। यहां के मजदूर संगठनों की मांग थी कि गैस आधारित फैक्ट्री शुरू करने की प्रक्रिया को तेज की जाये। पर उनकी नहीं सुनी गई। यह हाल ही की बात है कि कोरबा में विद्युत मंडल ने भी अपनी कई इकाईयों को कबाड़ मानकर बेच दिया। वहां भी यूनियन्स की मांगें थी कि आधुनिकीकरण कर फिर से इनमें उत्पादन शुरू किया जाये। 

खाद कारखाना पिछले कई चुनावों में राजनैतिक मुद्दा रहा। कोरबा जिले के लोग इसके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ गये थे। अभी एफसीआई को आबंटित 900 एकड़ जमीन बची हुई है, जिसे बेचने की कोशिश नहीं हुई तो मान सकते हैं, संयंत्र लगाने की संभावना भी बनी हुई है।


21-Dec-2020 4:59 PM (257)

कैसा रहेगा बुरे साल का थर्टी फर्स्ट

सन् 2020 में कोरोना महामारी ने जिस तरह बर्बादी की उसके चलते लोग मना रहे हैं कि जल्दी से जल्दी यह बुरा साल खत्म हो जाये और नये साल का वेलकम करें। देश में अब कोरोना संक्रमण के नये मामले कम आ रहे हैं और कल ही केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री का बयान आ गया कि जनवरी माह के किसी भी दिन से कोरोना का टीकाकरण शुरू हो जायेगा। ऐसे में न्यू ईयर का ज्यादा गर्मजोशी से स्वागत किया जाना तो बनता है।

दूसरी तरफ, ब्रिटेन में तो कोरोना के अधिक घातक तरीके से लौटने की खबर आ रही हैं। वहां क्रिसमस और न्यू ईयर के लिये कड़े प्रतिबंध हैं। भारत से भी वहां की हवाई सेवा रोकने की मांग उठ रही है। अपने देश में भी अभी दहशत कम नहीं हुई। कर्नाटक जैसे राज्यों ने न्यू ईयर पर सार्वजनिक कार्यक्रम रखने पर रोक लगा रखी है। पर छत्तीसगढ़ में रोक नहीं है। प्रशासन से सम्पर्क कर हर साल न्यू ईयर पार्टियां रखने वाले होटल, रेस्तरां मालिक जानकारी जुटा रहे हैं। बहुत कड़ी पाबंदियां नहीं है। जैसे 100 की क्षमता वाला हॉल है तो 50 को ही अनुमति मिलेगी। सोशल डिस्टेंस का पालन करना, तय समय पर ही पटाखे जलाना, संभवत: रात 11.30 से 12.30 तक तय किया जा रहा है। पटाखे जलाने और पार्टियों को निर्धारित समय पर खत्म नहीं करने पर 20 हजार रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक के जुर्माने की चेतावनी भी दी गई है।

जो लोग न्यू ईयर पार्टियां रखने वाले हैं उन्हें किसी कार्रवाई की ज्यादा परवाह है, ऐसा नहीं लग रहा। ये सब प्रतिबंध तो शादी, ब्याह, बर्थ डे पार्टियों के लिये पहले से ही लागू है। कार्रवाई तो कहीं हो ही नहीं रही।

दूसरी तरफ, अमरकंटक से लेकर चिल्फी, अचानकमार, बारनवापारा, मैनपाट आदि के सरकारी, गैर सरकारी ज्यादातर रिसोर्ट, विश्राम गृह के अधिकांश कमरे भी बुक हो चुके हैं। वहां इत्मीनान से सोशल डिस्टेंस के साथ न्यू ईयर मनाया जा सकेगा।

भाजपा में भी पदों की प्रतीक्षा

कांग्रेस में जहां निगम-मंडलों में नियुक्ति की कार्यकर्ता लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ भाजपा के कार्यकर्ताओं में संगठन के पदों पर नई नियुक्तियों का इंतजार हो रहा है। सत्ता से बाहर रहने पर संगठन के पदों का महत्व बढ़ जाता है और उसका लाभ सरकार बनने पर मिलता भी है। इसलिये बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं को नई नियुक्तियों का इंतजार है।

कुछ दिन पहले जब पार्टी की प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने छत्तीसगढ़ दौरा किया तो कई निर्देश संगठन के नेताओं को देकर गई थीं। उन्होंने सभी जिलों में कार्यकारिणी के पुनर्गठन, रिक्त जिलों में नये अध्यक्षों की नियुक्ति, मोर्चा प्रकोष्ठों में नियुक्ति का निर्देश दिया था। इन सब कामों के लिये 15 दिसम्बर की तारीख तय की गई थी पर कई जिलों में कार्यकारिणी नहीं बनी, कुछ के नये अध्यक्ष भी तय होने हैं। मोर्चा, प्रकोष्ठों में तो प्रदेश स्तर की कार्यकारिणी नहीं बन पाई, जिले के स्तर पर भी अब तक इसे हो जाना चाहिये था, जिसमें जाहिर है काफी वक्त लगेगा।

निर्देशों के मुताबिक अभी-अभी प्रशिक्षण शिविरों की शुरुआत हुई है। ऐसा लगता है कि सत्ता के न होने पर कार्यकर्ताओं को ही नहीं नेताओं को भी रिचार्ज करना मुश्किल हो जाता है। ऐसा तो तब और मुश्किल है जब कम से कम तीन साल का लम्बा इंतजार करना हो।


20-Dec-2020 6:42 PM (336)

रामजन्मभूमि से बड़ा विवाद

माता कौशल्या की जन्मस्थली पर विवाद छिड़ा है। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर इतिहास का हवाला देकर यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि चंदखुरी, माता कौशल्या का जन्म स्थान है। उनका तर्क है कि चंदखुरी का कहीं जिक्र नहीं है बल्कि कोसला का उल्लेख है। हालांकि इस मसले पर उन्हें पार्टी के भीतर आलोचना झेलनी पड़ रही है। बीज निगम के पूर्व अध्यक्ष श्याम बैस ने तो चंद्राकर की मुख़ालफ़त की है। बावजूद इसके अजय चंद्राकर अपने बयान पर कायम हैं।

अजय चंद्राकर अध्ययनशील हैं, और वे तथ्यों के साथ अपनी बात कहने के लिए जाने जाते हैं। दो दिन पहले केंद्रीय संस्कृति-पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल रायपुर आए, तो वे पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय के निवास पर भी गए। पांडेय निवास मेें बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, सुनील सोनी और एक-दो अन्य नेता भी थे। वहां भी माता कौशल्या के जन्म स्थान पर काफी चर्चा हुई। चंद्राकर ने केंद्रीय पर्यटन मंत्री श्री पटेल को अलग-अलग पुस्तकों का हवाला देकर यह बताया कि माता कौशल्या  की जन्मभूमि चंदखुरी नहीं, बल्कि कोसला है। जो कि रायगढ़ जिले में स्थित है।

अजय चंद्राकर के तथ्यों से केंद्रीय राज्यमंत्री और वहां मौजूद अन्य नेता सहमत भी नजर आए। दूसरी तरफ, रामवन गमन पथ को विकसित करने के लिए केंद्र सरकार ने करीब सवा सौ करोड़ रुपये मंजूर भी किए हैं। अब जन्मस्थली पर विवाद छिड़ गया है।

रमन सिंह अफसरों पर बरसे

पूर्व सीएम रमन सिंह अपने गृह जिले कवर्धा के मंच से अफसरशाही पर जमकर बरसे। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अफसरों को तो गिने-चुने दिन रहना है। उन्हें ज्यादा तलवे चाटने की जरूरत नहीं है। आमतौर पर रमन सिंह शालीन नेता माने जाते हैं, लेकिन सरकार जाने के बाद आक्रामक दिख रहे हैं, और कई बार आपा भी खो बैठते हैं। कुछ लोग याद करते हैं कि कांग्रेस शासनकाल में जब रमन सिंह प्रदेश अध्यक्ष थे तब भी वे उस समय कांग्रेस-सरकार में अफसरशाही का आरोप लगाते थे।

जगदलपुर के एक कार्यक्रम में सरकारी तंत्र के कथित हस्तक्षेप पर उन्होंने तत्कालीन कलेक्टर एलएन सूर्यवंशी का नाम लिए बिना उन पर तीखा हमला बोला था, और भाजपा सरकार बनने पर ऐसे अफसरों को देख लेेने की बात तक कही थी। वर्ष-2003 में भाजपा की सरकार बन गई, और सीएम जोगी के करीबी रहे आरपी मंडल, मुकेश गुप्ता, एसआरपी कल्लुरी और एलएन सूर्यवंशी, रमन सिंह के सीएम बनने के बाद ठीक-ठाक पोस्टिंग पा गए।  और तो और, रिटायर होने के बाद सूर्यवंशी को सूचना आयोग के सचिव के पद पर संविदा नियुक्ति भी मिल गई।

भाजपा नेताओं की शिकायत पर मंडल को चुनाव आयोग के आदेश के बाद विधानसभा चुनाव के पहले बिलासपुर कलेक्टर के पद से हटना पड़ा था। मगर रमन सिंह के सीएम बनते ही कुछ दिनों बाद वे रायपुर कलेक्टर बन गए, और रमन सरकार में हमेशा अच्छी पोस्टिंग पाते रहे। भाजपा के एक सबसे बड़े नेता नन्द कुमार साय का पाँव तोडऩे वाली पुलिस के कप्तान रहे मुकेश गुप्ता आगे जाकर रमन सरकार के सबसे ताकतवर पुलिस अफसर बन गए थे.  विधानसभा की कमेटी तक ने उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की थी, लेकिन रमन राज में वे प्रदेश के सबसे ताकतवर पुलिस अफसर रहे। पुलिस और प्रशासनिक हल्कों में उनकी हैसियत डीजीपी से भी ऊंची मानी जाती थी।

कल्लुरी के खिलाफ कई शिकायतों के बाद भी उन्हें अहम पोस्टिंग मिलती रही। वे बस्तर आईजी रहे। उनकी तारीफों के पुल बांधते हुए  पीएम नरेंद्र मोदी से भी मिलवाया गया था। अब जब रमन सिंह मंच से अफसरों को चेताया है, तो न सिर्फ सरकार बल्कि उनकी अपनी पार्टी के असंतुष्ट लोग पुरानी याद ताजा कर मजे भी ले रहे हैं।

धर्मजीत ने की जब सीएम की तारीफ

गुरु घासीदास जयंती सम्मेलन में लालपुर पहुंचे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ लोरमी के विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर को भी मंच साझा करने का मौका मिला। उन्होंने अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री की जमकर तारीफ कर लोगों को चौका दिया। धर्मजीत सिंह ने कहा कि सीएम ने दो साल में उनके लोरमी क्षेत्र को बहुत सी सौगातें दी हैं। खासकर एग्रीकल्चर कॉलेज खोलने की मंजूरी के लिये धर्मजीत सिंह ने आभार जताया। यह मान लें कि यह सौजन्यतावश सार्वजनिक मंच से की गई बात थी लेकिन इसके बाद जो हुआ वह ज्यादा चर्चा में है। मुख्यमंत्री से धर्मजीत सिंह ने काफी देर तक अलग से भी बंद कमरे में चर्चा की। लोग इसका मतलब निकालने में लगे हुए हैं, क्योंकि दो दिन पहले ही बिलासपुर में धर्मजीत सिंह ने पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मुलाकात की थी। हाल ही में निपटे मरवाही उप-चुनाव में धर्मजीत सिंह की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने भाजपा को समर्थन भी दिया था। देखना है कि यह बातें-मुलाकातें किस थाह पर पहुंचेगी। 

संसदीय सचिव की बेफिक्री

संसदीय सचिवों की एक जिम्मेदारी और समझ में आ रही है। वे अपने विभाग की कमियों, गड़बडिय़ों के लिये कवच बनकर खड़े रहेंगे। यदि यदि कोई नौकरशाही के रास्ते से राजनीति में आया हो तो ज्यादा भली-भांति इस जिम्मेदारी को निभा सकता है। ऐसा ही कुछ दिखा जब कांकेर के विधायक रिटायर्ड आईएएस शिशुपाल सौरी मिनी जू कानन पेंडारी के भ्रमण पर पहुंचे। वे वन विभाग के संसदीय सचिव भी हैं। जब पूछा गया कि जंगलों में पेड़ों की अवैध कटाई की घटनायें लगातार सामने आ रही है। जवाब था- पेड़ों की कटाई तो आम बात है, किसी को शिकायत है तो बतायें। मिनी जू में वन्य प्राणियों की लगातार हो रही मौत को लेकर पूछा गया तब भी उनका कहना था कि मौतें तो होती रहती है। ये तो स्वाभाविक घटनाएं हैं। कानन पेंडारी के विकास, विस्तार का काम ठप पड़ा है, पूछने पर कहा कि केन्द्र से राशि अटकी पड़ी है। आगे प्रदेश सरकार की योजना क्या है?, कहा – योजना बना रहे हैं। यानि सब कुछ बढिय़ा चल रहा है।

पहले संगठन, फिर किसान

केन्द्र सरकार और भाजपा ने किसान बिल पर जनसमर्थन जुटाने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चला रखा है। जगह-जगह सभा सम्मेलनों, महापंचायतों के जरिये प्रदेश में भी भाजपा यही कर रही है। बाकी कसर प्रशिक्षण शिविरों से पूरी की जा रही है। अनुशासन में बंधी पार्टी के लिये ऊपर से आया आदेश ही महत्वपूर्ण है। वह यही कर रही है। दिसम्बर की ठंड में छत्तीसगढ़ के किसानों के धान बेचने में पसीने छूट रहे हैं। कहीं रकबा कम है, कहीं तौल में गड़बड़ी हो रही है, कहीं बारदानों की कमी है तो कहीं खरीदी ही रोक दी गई है। लोग कह रहे हैं, विपक्ष में होने के नाते किसानों की आवाज उठाना भाजपा की प्राथमिकता में होनी चाहिये। पर दिल्ली में रिपोर्ट कार्ड ठीक बनाये रखने के लिये किसान कानून पर उन्हें भाषण पिलाया जा रहा है। अब यहां जो किसान कानून का मामला है, ज्यादातर उपज खरीद ली जा रही है। नये कानून का क्या असर होने वाला है इसकी ज्यादा परवाह अभी किसान कर भी नहीं रहे हैं। उनकी असल चिंता है, धान समय पर बिना परेशानी बिक जाये और भुगतान मिल जाये। कांग्रेस सरकार और धान खरीदी में लगे तंत्र के लिये अच्छा है कि भाजपा किसान की नहीं, किसानों के केन्द्रीय कानून की ज्यादा परवाह करती रहे।


19-Dec-2020 4:36 PM (183)

डराने से डर गये अफसर?

केन्द्र सरकार के किसान कानून के समर्थन में कवर्धा में बुलाई गई महापंचायत के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तेवर गरम हो गये। अचानक सभा स्थल की जगह बदलने के आदेश ने उन्हें नाराज कर दिया। जो कुछ उन्होंने कहा उससे एक निष्कर्ष तो निकलता है कि वे तीन साल बाद लौटने को लेकर सौ फीसदी आशान्वित हैं। यह अलग बात है कि जीत-हार का फासला 2018 में इतना बड़ा रहा कि उसे पलट पाना इतना आसान भी दिखाई नहीं देता। 2018 के बाद हुए उप-चुनाव के नतीजे  भी इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं। दूसरी बात यदि नौकरशाह दो साल के भीतर  ही ‘तलुवे चाटने’ लगे हैं तो इस जमात ने 15 साल में क्या नहीं किया होगा?  उन 15 सालों में किस-किस अधिकारी ने विपक्षी कांग्रेसियों को परेशान किया? प्रताडि़त लोगों में तो कुछ सीएम के बेहद करीबी हैं और कुछ मंत्रिमंडल में भी। डेढ़ दशक के जितने पन्ने पलटेंगे उतने ही केस याद आते जायेंगे। इन्होंने भी चेतावनी दी थी कि सरकार आने पर देख लेंगे। सब मन मसोसे बैठे हैं। कोई ‘देख’ पाया? एक दो को छोडक़र बाकी सब अफसर मजे में हैं। कुछ तो पहले भी ज्यादा।  ऐसा कभी हुआ, जो तीन साल बाद हो जायेगा? नहीं लगता कि डॉक्टर साहब के बयान से कोई अफसर घबराया होगा। 

कोरोना की मार स्कूली किताबों तक...

कोरोना का कुछ असर तो लोगों को बीमारी, मौत, और लॉकडाऊन के नुकसानों में देखने मिल गया। लेकिन कोरोना-लॉकडाऊन के बहुत से नुकसान धीरे-धीरे सामने आएंगे। महीनों तक सरकारी दफ्तरों में काम बंद रहा, और शुरू भी हुआ तो कहीं आधे लोगों को एक दिन में काम पर आने दिया गया, दूसरे दफ्तरों से कागजी कार्रवाई धीरे-धीरे चली, और हर दफ्तर का काम पिछड़ते गया। 

सरकार के जिन विभागों में टेंडर होता है वहां पूरी टेंडर प्रक्रिया ही लेट होती चली गई। कई जगहों पर टेंडर भरने वाले लोगों ने आवेदन देकर तारीखें बढ़वाईं क्योंकि उनके पास पूरे कागजात नहीं जुट पा रहे थे। ऐसे जिन-जिन सरकारी विभागों, निगम-मंडलों में टेंडर लेट हुए, वहां पर आगे का काम भी लेट होते जा रहा है। 

इस बरस स्कूलों की अधिकांश कक्षाओं में पढ़ाई नहीं हुई, और साल ऐसे ही खत्म होने का आसार है। लेकिन परीक्षा-सहित या परीक्षा-रहित, जब भी अगले साल की पढ़ाई शुरू होगी, बच्चों को वक्त पर नई किताबें लगेंगी। इस बरस की किताबें पढऩा चाहे न हुआ हो, या कम हुआ हो, अगले बरस की किताबें समय पर देना एक चुनौती का काम भी होगा क्योंकि छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम का काम ही पीछे चल रहा था, और अब उसे खींचतान कर पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है। अभी एक खतरा मंडराते दिख रहा है कि किताबें छपने में देर हो सकती है, अगर छपाई शुरू होने में देर हुई। फिलहाल पाठ्य पुस्तक निगम जितने किस्म की एसीबी-ईओडब्ल्यू जांच से घिरा हुआ है, वहां के अफसर-कर्मचारी किसी किस्म की रियायत देकर आगे फंसना नहीं चाहते। फूंक-फूंककर कदम रख रहे लोगों की रफ्तार वैसे भी कम हो जाती है। 

सरकार के टेंडर वाले बहुत से दूसरे विभागों में भी काम का यही हाल है, न वक्त पर टेंडर, न वक्त पर काम। लेकिन इसमें वित्त विभाग खुश है क्योंकि उसके पास हर काम का भुगतान करने के लिए आज पैसा भी नहीं है। लेकिन यह बात पाठ्य पुस्तकों पर लागू नहीं होती जिनका पैसा केन्द्र सरकार से आता है। 

मोबाइल से थोड़ी बड़ी अल्ट्रासाऊंड मशीन!'

विज्ञान और तकनीक अपने आपमें बिना किसी सामाजिक सरोकार के होते हैं। परमाणु बम एक बड़ी कामयाब तकनीक है, लेकिन जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे बम ने दुनिया की सबसे बड़ी तबाही पैदा की थी। सबसे बड़ी कामयाबी वाली तकनीक, और सबसे अधिक तबाही वाला इस्तेमाल।

अब हिन्दुस्तान में जहां कन्या भ्रूण हत्या एक बड़ा मुद्दा है, वहां सरकार ने बहुत किस्म के नियम-कायदे अल्ट्रासाऊंड सेंटरों पर लगाए हुए हैं। वहां की मशीनें तो कोख में पल रहे बच्चे का सेक्स बता सकती हैं, लेकिन कानून इसके खिलाफ बड़ा कड़ा है। इसके बीच रास्ता निकालने के लिए हरियाणा जैसे कन्या भ्रूण हत्या में कुख्यात राज्य में ऐसे भी डॉक्टर पकड़ाए थे जो कि एक वैन में अल्ट्रासाऊंड मशीन लेकर चलते थे, और चलती वैन में ही जांच करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताकर मोटी कमाई करते थे।

अब दुनिया में टेक्नालॉजी ने और तरक्की की है, और मोबाइल फोन से कुछ बड़े आकार का ऐसा अल्ट्रासाऊंड आ गया है जो इस काम को कर सकता है, और इस मशीन से होने वाली जांच को तुरंत ही मोबाइल फोन पर दुनिया में कहीं भी देखा जा सकता है। अमरीका के जिस कैलिफोर्निया में ऐसी छोटी मशीन विकसित की गई है, वहां की तकनीकी-कंपनियों को हिन्दुस्तान जैसे देश की सामाजिक विकृति का शायद पता भी नहीं होगा कि 340 ग्राम की यह अल्ट्रासाऊंड मशीन यहां कितनी तबाही ला सकती है। इस खबर को छापने से भी कुछ लोगों को लग सकता है कि इसकी जानकारी से कन्या भ्रूण पर खतरा बढ़ेगा, लेकिन बाजार में आ चुकी तकनीक को अनदेखा करके कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। जरूरत तो इस बात की है कि ऐसे उपकरणों के हिन्दुस्तान में आने के खिलाफ कस्टम चौकन्ना रहे, और हिन्दुस्तान की साइबर एजेंसियां भी इस पर नजर रखें कि ऐसे उपकरण से जुड़े सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन कौन डाउनलोड कर रहे हैं, कौन इस्तेमाल कर रहे हैं।

इसी बहाने कोसला भी संवार दो

पिछले साल जब कांग्रेस के कुछ विधायकों ने चंद्रखुरी में माता कौशिल्या मंदिर के नव-निर्माण के लिये मुख्यमंत्री को चेक सौंपा तो महंत राम सुंदर दास ने मां कौशिल्या का जन्म-स्थान बताने पर 11 लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की थी। अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने रामवमन पथ की योजना में चंद्रखुरी को माता कौशिल्या का जन्म-स्थान मानकर शामिल किया है। चंद्रखुरी के लोग तो इस फैसले से गद्गद् हैं। वे मान रहे हैं कि कुछ बरसों में इस जगह को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल जायेगी।

इधर, भाजपा विधायक, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने इस पर आपत्ति की है। उनका कहना है कि कोसला (बिलासपुर जिला) जन्मस्थली है, चंद्रखुरी नहीं। वैसे जन्मस्थल को लेकर तो नेपाल के प्रधानमंत्री ने भी विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा कि राम अयोध्या की जगह बीरगंज नेपाल के किसी गांव में पैदा हुए थे। कई इतिहासकार जन्मस्थली को लेकर अलग-अलग मत रख चुके हैं। बीते साल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे तब मुसीबत में फंस गये जब उन्होंने पाथरी को साईंबाबा का जन्मस्थान बताते हुए वहां के लिये करोड़ों रुपये की की घोषणा कर दी। शिरडी वाले के उबले उपासकों ने तो आंदोलन की चेतावनी दे दी। ठाकरे ने मामला यह कहकर सुलझाया कि पाथरी में साईंबाबा ने जन्म लिया या नहीं, इस पर वे नहीं जायेंगे लेकिन उनकी गतिविधियां वहां रही, इसलिये उसे पर्यटन के लिये विकसित किया जायेगा।

इधर अपने छत्तीसगढ़ में कोसला के सीधे-सादे लोगों ने चंद्रखुरी के नाम पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। मामला तथ्यों से ज्यादा भावनाओं का होता है। चंद्राकर के बयान के समर्थन में उनकी पार्टी के लोग भी अभी नहीं आये हैं। बेहतर तरीका तो यही होगा कि कोसला से भी माता कौशिल्या का रिश्ता होने की मान्यता को देखते हुए यहां भी विकास का पैकेज लाया जाये।

सोशल पेज पर दो साल की बातें...

कांग्रेस सरकार की दो साल की उपलब्धियों पर सोशल मीडिया पेज शानदार ग्रॉफिक्स के साथ बधाईयों, शुभकामनाओं से भरे पड़े हैं। मंत्रिमंडल के सदस्यों, कांग्रेस के पदाधिकारियों, समर्थकों ने सरकार के कामकाज की सराहना की है। यह एक ऐसा खुला मंच है जो इंटरनेट और मोबाइल रखने वाले हर किसी की पहुंच में है और वे प्रतिक्रिया दे सकते हैं। सो, यह अपनी पीड़ा बताने का भी माध्यम है।

दो साल के जवाब में एक मंत्री के फेसबुक पेज पर प्रतिक्रिया- सारे कांग्रेसी अपनी पीठ खुद थपथपा रहे। जरा उन विद्या मितान शिक्षकों से पूछो, जो बस्तर सरगुजा जैसे घोर नक्सल इलाकों में 4-5 सालों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। 10 दिन में नियमितीकरण का वादा था..., 10 माह से बिना वेतन जी रहे हैं। विद्या मितान शिक्षकों का पूरा परिवार रोड पर आ गया है क्यों?...दो माह से लगातार हड़ताल पर हैं...।

पोस्ट में और भी बहुत कुछ है। पर नेकनीयती यह है कि पब्लिक फिगर इन प्रतिक्रियाओं को डिलीट नहीं कर रहे। यह जानते हुए भी कि यह प्रतिक्रिया हजारों लोगों द्वारा पढ़ी जा रही है। पब्लिक फिगर उन्हें ‘रिप्लाई’ भी दें दें तो और अच्छा।


18-Dec-2020 2:32 PM (178)

ईमानदारी महंगा शौक

कहावत है कि ईमानदारी एक महंगा शौक है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है। अब जेल अफसर वर्षा डोंगरे को ही देखिए, इस जुझारू महिला ने पीएससी-2003 के घोटाले को उजागर किया था। राज्य सरकार की जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू-एसीबी से लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट तक ने भी वर्षा के कथन को सही माना। हाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट से घोटाले की जद में आए अफसरों को राहत मिल गई है, और उन्हें आईएएस अवॉर्ड होने जा रहा है।

वर्षा का हाल देखिए, पीएससी घोटाले के बाद जेल में गड़बड़ी का सार्वजनिक खुलासा करने पर पहले निलंबित कर दिया गया, और ट्रांसफर के बाद उनकी करीब 15 महीने की सैलरी रूकी हुई है। जिसके लिए उन्हें विभाग के आला अफसरों से लेकर गृहमंत्री तक की चक्कर काटनी पड़ी है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक वर्ष-2003 के राप्रसे के अफसरों को आईएएस अवॉर्ड न करने के लिए यूपीएससी और डीओपीटी तक गुहार लगाई। मगर इस पर कुछ नहीं हुआ।

आईएएस के छह रिक्त पदों के लिए डीपीसी हो चुकी है। तीन सीनियर अफसर हिना नेताम, संतोष देवांगन और एक अन्य के खिलाफ विभागीय जांच चल रही है, और नियमानुसार तीन पद रोके जाने थे। सिर्फ तीन को ही आईएएस अवॉर्ड होना था। इससे पहले भी ऐसा होता आया है। ओंकार सिंह और आनंद मसीह के लिए तो बरसों तक पद रोके गए थे, क्योंकि दोनों के खिलाफ विभागीय जांच चल रही थी। मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार सभी छह रिक्त पदों पर आईएएस अवॉर्ड हो गया। यानी वर्ष-2003 बैच के सीनियर सभी अफसरों को आईएएस अवॉर्ड हो चुका है। सिर्फ नोटिफिकेशन होना बाकी है। ये सब तब हुआ है, जब यूपीएससी के मौजूदा चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी, जो कि छत्तीसगढ़ पीएससी के चेयरमैन रहे हैं, और वे पीएससी-2003 के घोटाले के पूरी तरह वाकिफ रहे हैं। आईएएस अवॉर्ड के दावेदारों ने अपना सबकुछ झोंक दिया था, और उन्हें सफलता भी मिल गई। ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि ईमानदारी महंगा शौक है।

धर्मजीत सिंह की भाजपा से बढ़ती नजदीकी

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) को क्या एक बार फिर झटका लगने वाला है? यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि जोगी परिवार के विश्वस्त विधायक धर्मजीत सिंह ठाकुर ने एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से उनके बिलासपुर प्रवास के दौरान मुलाकात की। मरवाही उप-चुनाव में भाजपा को समर्थन देने का निर्णय जकांछ ने लिया तो इसके पीछे धर्मजीत सिंह ही थे। जकांछ से दो विधायक देवव्रत सिंह और प्रमोद शर्मा पहले से ही दूरी बनाकर चल रहे हैं और कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं। मरवाही सीट पर कांग्रेस की जीत के बाद एक सीट का नुकसान जकांछ को पहले ही हो चुका है। अब धर्मजीत सिंह भी पार्टी से दूरी बनाते हुए दिख रहे हैं।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर डॉ. रेणु जोगी को जिम्मेदारी दी गई तब भी कुछ लोग सवाल पूछ रहे थे कि उनसे अधिक पुराने नेता धर्मजीत सिंह को यह मौका क्यों नहीं दिया गया। इससे एक ही परिवार की पार्टी होने के आरोप से जकांछ को बचाया जा सकता था। इन दिनों उन्होंने वर्तमान विधानसभा क्षेत्र लोरमी की जगह पंडरिया में सक्रियता बढ़ा दी है। यह जकांछ को मजबूत करने के लिये है या खुद के लिये नये ठिकाने की तलाश, भविष्य बतायेगा। धर्मजीत सिंह का कहना है कि एक वरिष्ठ नेता होने के कारण वे सौजन्यतावश डॉ. रमन सिंह से मिलने गये थे। वैसे, धर्मजीत के लिये अभी रणनीति का खुलासा करना जरूरी भी नहीं है क्योंकि चुनाव तो तीन साल बाद है। मेल-जोल बनाये रखना काफी है।

वैक्सीन की तैयारी और लोगों की जिज्ञासा

कोरोना से बचाव के लिये कौन सी वैक्सीन आयेगी, कब तक आयेगी, कितनी मात्रा में आयेगी अभी कुछ पता नहीं है लेकिन केन्द्र और राज्य सरकार की तरफ से रोजाना नये-नये निर्देश जिला मुख्यालयों में पहुंच रहे हैं। लगभग हर जिले में अधिकारी-कर्मचारियों की बैठकों का सिलसिला चल पड़ा है। वैक्सीन कैसे रखना है, कितनी जगह लगेगी, वितरण कैसे होगा, किनको टीके लगाये जायेंगे तय कर लिया गया है। सरकारी, निजी अस्पताल के डॉक्टरों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, मितानिनों तक को व्यस्त कर दिया गया है।वैक्सीन लगाने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। दूसरी तरफ आम लोगों में दो तरह की प्रतिक्रियायें दिख रही है। एक वर्ग  बेसब्री से वैक्सीन की प्रतीक्षा कर रहा है और आते ही टीका लगवाना चाहता है ताकि कोरोना से चिंतामुक्त हों। दूसरा तबके को लगता है कि एक दिन में तो 100 वैक्सीन ही लगाने की बात हुई है। पहले स्वास्थ्य विभाग के वारियर्स को लगना है तो उनकी बारी आने में तो साल दो साल लग जायेंगे। कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि कोरोना वैक्सीन मुफ्त लगेगी या पैसे देने होंगे। देने होंगे तो कितने?  और क्या यह ब्लैक में भी मिल जायेगी?

कब चलेगी लोकल ट्रेन?

बिलासपुर रेलवे जोन के अधिकारियों को कोरोना को लेकर काफी चिंता दिखाई दे रही है। शायद इसी वजह से लोकल और मेमू ट्रेन अब तक शुरू नहीं की गयी हैं। रायपुर, दुर्ग, कोरबा, रायगढ़, राजनांदगांव, गोंदिया, पेन्ड्रारोड आदि के यात्रियों को परेशानी इससे बढऩे लगी है। कुछ कम दूरी की ट्रेनों को चलाया भी जा रहा है तो उसे फास्ट ट्रेन बनाकर। यानि छोटे स्टेशनों के यात्रियों को लाभ ही नहीं मिल पा रहा है। दूसरे कई राज्यों में लोकल ट्रेन शुरू हो चुकी है। कोरोना की मार बुरी तरह से झेलने वाली दिल्ली भी मेट्रो ट्रेनों को शुरू कर चुकी है। लोकल ट्रेन में गांवों से शहर जाकर फैक्ट्रियों, प्राइवेट संस्थानों में काम करने वाले लोग, मजदूर और छोटे व्यापारी सफर करते हैं। इनका काम धंधा या तो बंद हो चुका है या फिर अपने कार्यस्थल पर पहुंचने के लिये ज्यादा खर्च इन्हें करना पड़ रहा है। रेलवे का कहना है कि लोकल ट्रेनों में सीट रिजर्वेशन कठिन काम है जबकि अभी सिर्फ रिजर्वेशन के बगैर सफर की मंजूरी मिली हुई है। पर व्यवहार में ऐसा नहीं है। जिन ट्रेनों में रिजर्वेशन हो रहा है उनमें भी सोशल डिस्टेंस की धज्जियां उड़ रही है। कोरोना गाइडलाइन का पालन रायपुर, बिलासपुर जैसे बड़े स्टेशनों पर तो रेलवे कर रही है पर बाकी स्टापेज में सावधानी नहीं है। दरअसल, लोकल ट्रेनों का किराया काफी कम होता है और रेलवे के लिये इन्हें चलाना घाटे का सौदा होता है। इसलिये इन ट्रेनों को नहीं चलाने की एक वजह यह भी हो सकती है।


17-Dec-2020 4:30 PM (144)

इस बार उपाध्यक्ष की बारी

विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत भी कोरोना की चपेट में आ गए हैं। वे होम आइसोलेशन में हैं, और उनकी तबीयत भी ठीक है। इससे परे विधानसभा का शीतकालीन सत्र 21 तारीख से शुरू हो रहा है।  और स्वाभाविक है कि डॉ. महंत सदन की कार्रवाई का संचालन नहीं कर पाएंगे। माना जा रहा है कि डॉ. महंत की जगह उपाध्यक्ष मनोज मंडावी सदन की कार्रवाई का संचालन करेंगे। किसान आंदोलन और अन्य विषयों को लेकर शीतकालीन सत्र के गरम रहने के आसार दिख रहे हैं। ऐसे में महंत की तुलना में अपेक्षाकृत कम अनुभवी मनोज मंडावी सदन की कार्रवाई का संचालन किस तरह करते हैं, यह देखना है।

प्रवासी मजदूरों पर शाही खर्च

जिन्हें लगता है कि प्रवासी मजदूरों को अपने गांव वापस लौटने पर क्वारंटीन सेंटर्स में तकलीफ हुई उनको किरारी  ग्राम पंचायत का उदाहरण देखना चाहिए।  जांजगीर जिले के इस गांव में मजदूरों को आलीशान टेंट लगाकर  ठहराया गया। उनको न केवल तरह-तरह के व्यंजन मिले बल्कि मिठाइयां भी खिलाई गई। उनके लिए ट्यूबवेल खोदे गए कूलर लगवाए गए। सरपंच और सचिव ने मिलकर 14वीं और 15वीं वित्त आयोग की राशि लगभग 4 करोड़ रुपये मजदूरों की सेवा में खर्च कर दी।  इस बिल को पास करने के लिए जनपद पंचायत में भेजा गया तब पता चला कि सब कुछ फर्जीवाड़ा था। बौखलाए प्रवासी मजदूरों ने, जिन्हें सरकारी पंचायत भवन और स्कूलों में ठहराया गया था और ढंग से खाना नहीं मिला उन लोगों ने पंचायत सचिव की पिटाई कर दी। हैरानगी की बात है कि  पंचायत सचिव के समर्थन में पूरा संघ उतर आया है। क्या इसका मतलब यह समझा जाए की दूसरी पंचायतों में भी इसी तरह के घोटाले हुए हैं?

 फिलहाल तो अकलतरा विधायक सौरभ सिंह ने अधिकारियों को चि_ी लिखकर बिल को पास नहीं करने की हिदायत दी है।

 कोरोना से बचने क्या करें ना करें?

 जब कोरोना संक्रमण को लेकर दहशत फैली तब बाजार में मास्क और सेनेटाइजर मिल नहीं रहे थे। अनाप-शनाप दामों पर इसकी बिक्री हुई। लोग इसके लिए  200 रुपए भी खर्च कर रहे थे। अब बाजार से खबर आ रही है कि इनकी बिक्री में भारी गिरावट आ गई है। लोग 10 रुपया में भी मास्क बेच रहे हैं और कई शैंपू और साबुन से भी सस्ते  सैनिटाइजर मिलने लगे हैं। इसकी क्या वजह हो सकती है? एक तो लोगों ने देख लिया कितने चुनाव निपट गए मंत्री नेता रैलियाँ सभाएं करते रहे,  ना तो मास्क लगाया न ही सेनिटाइजऱ  का इस्तेमाल किया। स्वास्थ विभाग की ओर से भी पहले तो कहा गया था कि मास्क हमेशा लगाएं लेकिन डॉक्टरों का यह रिसर्च भी सामने आ गया कि लगातार मास्क लगाने से  सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। काढ़ा पीने से और लगातार सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने से भी नुकसान हैं। क्या लोगों को विश्व स्वास्थ्य संगठन की चिंता नहीं है और वह सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ चुके हैं?

फिर हुक्काबार खुल गये...

विधानसभा में हुक्काबारों के संचालन को लेकर सवाल उठा था तब मंत्रिपरिषद् ने इन्हें अवैध घोषित करते हुए संचालन पर रोक लगाई थी। नगर निकायों और पुलिस प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था। पर, कुछ दिन की सख्ती के बाद राजधानी रायपुर सहित बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई आदि शहरों में ये बार फिर शुरू हो गये हैं। दरअसल, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर लगाये गये प्रतिबंध के बाद ये सुविधा भी दी गई जिन रेस्टारेंट्स या होटलों में 30 लोगों के बैठने की जगह हो वहां एक स्मोकिंग जोन बनाया जा सकता है। पर इनमें सिर्फ तम्बाकू उत्पादों की खपत हो सकती है। इसी की आड़ में दूसरी नशीली चीजें बेची जा रही हैं।

हुक्का बारों की तरफ स्कूल कॉलेज के बच्चों का ज्यादा आकर्षण दिखाई दे रहा है। उन्हें तम्बाकू के साथ जो सुगंधित केमिकल मिलाकर दिया जाता है जो काफी खतरनाक है। ऐसा करने पर दो साल की सजा का प्रावधान भी है पर पुलिस ज्यादातर मामलों में धारा 144 के अंतर्गत ही कार्रवाई कर रही है। सख्ती और प्रभावी कार्रवाई के लिये क्या पुलिस और नगर निगमों को किसी ने रोक रखा है? पता नहीं क्यों लोग इस सिलसिले में हफ्ता, और महीना जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं?

ऐन मौके पर पटवारी हड़ताल

लम्बे समय से कोरोना संक्रमण के चलते सरकारी दफ्तरों में छुट्टी रही। राजस्व विभाग भी इससे अछूता नहीं रहा। लोगों को वैसे भी तहसील और पटवारियों के खूब चक्कर लगाने पड़ते हैं, कोरोना काल में दिक्कतें और बढ़ गई। रजिस्ट्री ऑफिस का कामकाज भी इसके चलते प्रभावित हुआ और आमदनी गिरी। इस समय चल रही धान खरीदी के दौरान रकबे में गड़बड़ी की सैकड़ों शिकायतें आ रही हैं, जिन्हें पटवारियों को ही सुधारना है। राजस्व नामांतरण, बंटवारा, फौती के सैकड़ों मामले लटके हैं, जिनके अब रफ्तार पकडऩे की उम्मीद थी। ठीक ऐसे ही वक्त पटवारी बेमियादी हड़ताल पर गये हैं। सिविल सेवा अधिनियम का हवाला देते हुए राज्य शासन ने इन हड़तालों को प्रतिबंधित किया है पर जैसा होता है इसका असर नहीं हुआ, आंदोलन जारी है। वह हड़ताल ही क्या जो ऑफ सीजन में की जाये, इससे तो सरकार को फर्क नहीं पडऩे वाला है न आम जनता को तकलीफ ही महसूस होगी।

हाथियों से नुकसान, समाधान कब?

यूं तो छत्तीसगढ़ के अनेक हिस्सों में हाथियों के दल घूम रहे हैं पर कटघोरा वन मंडल में बीते 10-12  दिनों से स्थिति ज्यादा गंभीर हो चुकी है। दो हफ्तों में हाथियों के हमले से तीन लोगों की मौत हो चुकी है। पश्चिम बंगाल से आई हुल्ला पार्टी भी ग्रामीणों को इनसे नहीं बचा पाई। जो दो हाथी उत्पात मचा रहे हैं वे अपने दल से बिछुड़ गये हैं। हुल्ला पार्टी ट्रैकिंग कर हाथियों के दल से उन्हें मिलाने की कोशिश कर रही है लेकिन उन्हें अभी सफलता नहीं मिल पाई है। राज्य में बीते कई साल से हाथियों के अनुकूल रहवास व प्रवास की योजनाओं पर काम हो रहा है पर समस्या का समाधान नहीं हुआ । कटघोरा रेंज के जिन गांवों में यह घटना हुई है वहां कई कच्चे मकान हैं, जिनमें हाथियों ने नुकसान पहुंचाया। ग्रामीणों को कच्चे मकान की जगह पक्के मकान बनाकर देने, उन्हें टार्च देने, मशाल जलाने, पटाखे फोडऩे कहा जाता है। पर ये साधन नहीं मिलते। वन ग्रामों में सुरक्षा समितियों का गठन भी किया गया है, लेकिन प्रशिक्षण और साधन उपलब्ध नहीं कराने के कारण वे अपना बचाव नहीं कर पाते। क्या सिर्फ जान-माल के नुकसान का आकलन और फिर उसके बाद मुआवजा वितरण का सिलसिला ही चलता रहेगा? 


16-Dec-2020 4:46 PM (318)

शुभ-अशुभ का चक्कर

खरमास शुरू हो गया, लेकिन निगम-मंडल के पदाधिकारियों की लिस्ट जारी नहीं हुई। हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक खरमास में शुभ कार्य वर्जित है। ऐसे में दावेदारों को भरोसा था कि मंगलवार को खरमास शुरू होने से पहले सूची जारी की जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। दुर्ग जिले के एक साहित्यकार ने तो राजभाषा आयोग में अध्यक्ष के कमरे की साज-सज्जा के लिए कह दिया था। साहित्यकार ने संस्कृति विभाग के लोगों को निर्देश दिए थे कि वे ही आयोग का अध्यक्ष बनने जा रहे हैं। ऐसे में सारी तैयारियां पहले से करके रखें। सूची जारी होते ही पदभार ग्रहण करेंगे। अब कमरा तो तैयार हो गया है, लेकिन अध्यक्ष का ही अता-पता नहीं है।  चर्चा यह भी है कि शुभ मुहूर्त में मकर संक्रांति के बाद ही सूची जारी हो सकती है। कुल मिलाकर शुभ-अशुभ के चक्कर में सूची अटकने का अंदेशा जताया जा रहा है।

थाना टूटा, विवाद बरकरार

ब्रिटिश कालीन कोतवाली थाने को तोडक़र नया रूप दिया गया है। निगम के इस फैसले की आलोचना भी हुई। वजह यह है कि कोतवाली थाने से आजादी की लड़ाई की यादें जुड़ी हुई थीं। मगर तमाम आपत्तियों को दरकिनार कर दिया गया। थाना तोडऩे से यातायात की समस्या हल नहीं हुई है, और वहां अब भी जाम लगा रहता है।

एक जनप्रतिनिधि ने पिछले दिनों निगम के एक अफसर को बुलाकर डपटा, और कहा कि आप लोगों के बिना सोचे विचारे थाना तोडऩे से समस्याएं पैदा हो गई हैं। अफसर ने धीरे से कहा कि थाना तोडक़र नया रूप देने का प्लान बड़े साब का था। साब ने ही ड्राइंग डिजाईन तैयार किया था, और साब ही ठेकेदार थे। ऐसे में हमारी सलाह का कोई औचित्य नहीं था।

इसीलिए खफा हैं युद्धवीर...

दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के पुत्र युद्धवीर सिंह खफा हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि भाजपा व्यापारियों की पार्टी बनकर रह गई है। युद्धवीर काफी समय से नाराज चल रहे हैं, उनके पार्टी छोडक़र कांग्रेस में जाने की अटकलें भी हैं। हालांकि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघ से जुड़ाव को देखकर लगता नहीं है कि वे भाजपा छोड़ देंगे।

युद्धवीर चंद्रपुर से दो बार विधायक रहे हैं। उन्होंने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बखूबी संभाला, और जशपुर जिले की तीनों सीट जिताने में उनकी अहम भूमिका रही है। युद्धवीर को उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री पद दिया जाएगा। मगर सिर्फ संसदीय सचिव का दायित्व सौंपा गया। जबकि रमन सरकार में कई पहली बार के विधायक मंत्री बने थे। दूसरी बार जीतकर आए, तो फिर उन्हें मंत्री बनाने के लिए लाबिंग हुई, लेकिन ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन का चेयरमैन बनाकर संतुष्ट करने की कोशिश की गई। तीसरी बार वे खुद चुनाव मैदान में नहीं उतरे, और अपनी पत्नी को टिकट देने की सिफारिश की। युद्धवीर की पत्नी संयोगिता चुनाव मैदान में उतरीं, लेकिन वे हार गईं।

युद्धवीर, रमन सिंह और सौदान सिंह से काफी खफा हैं। उनसे जुड़े लोग मानते हैं कि युद्धवीर के जनाधार को हमेशा कम कर आंका गया। लेकिन दूसरे लोगों का कहना है कि जनाधार ही होता तो उनकी पत्नी चुनाव क्यों हारती? उनकी नाराजगी तब और जाहिर हो गई, जब जांजगीर-चांपा जिलाध्यक्ष पद पर केके चंद्रा की नियुक्ति की गई। चंद्रा, युद्धवीर के प्रबल विरोधी माने जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि पहली बार जब युद्धवीर चंद्रपुर से चुनाव मैदान में थे, तो चंद्रा की वजह से उन्हें पार्टी में अंतर विरोध का सामना करना पड़ा था। और अब जब उन्हें ही जिले की कमान सौंपी गई, तो युद्धवीर सहन नहीं कर पा रहे हैं।

राम के नाम पर उठा विवाद

कथाओं में जिसे राम वनगमन मार्ग माना गया है छत्तीसगढ़ सरकार ने उनको पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए संवारने का निर्णय लिया है। इसकी शुरूआत चंद्रखुरी से होगी जिसे राम की मां कौशिल्या की जन्मस्थली माना जाता है। इसके लिये सुकमा और कोरिया से रथ यात्रा कल शुरू हुई। सुकमा में आदिवासी समाज के एक वर्ग ने इसका विरोध किया। दूसरी खबर जशपुर जिले के दुलदुला ब्लॉक से आई जहां रामकथा के नाम पर दो पक्षों के बीच मारपीट हो गई। दोनों घटनायें छुटपुट हैं और बातें सुलझ भी गईं, पर इस बहाने कांग्रेस भाजपा के बीच राम पर किसका दावा पुख्ता है इस पर बहस शुरू हो सकती है। लोकसभा चुनाव की बात अलग है पर प्रदेश की राजनीति के केन्द्र में अब तक राम तो रहे नहीं। क्या भविष्य में यही स्थिति बनी रहेगी?


15-Dec-2020 6:34 PM (439)

जोगी पार्टी छोड़ कांग्रेस वापिसी

प्रदेशभर से जोगी पार्टी के नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं। बड़ी संख्या में आवेदन भी पीसीसी को मिले हैं। कई जगहों पर तो कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के विरोध की वजह से प्रवेश नहीं हो पा रहा है। अंबिकापुर में तो जोगी पार्टी के नेताओं की टीएस सिंहदेव से बहस भी हो गई। हुआ यूं कि जोगी पार्टी के नेता गोपाल केशरवानी और अतुल सिंह के नेतृत्व में सीएम भूपेश बघेल से मिलने पहुंचे।

जोगी पार्टी के नेताओं को देखकर टीएस ने तंज कसा, और कहा कि क्या जोगी पार्टी से मोह भंग हो गया है? गोपाल केशरवानी ने टीएस की बातों को नजरअंदाज करते हुए सीएम को बताया कि हम सब पुराने कांग्रेसी हैं, और खुद के बारे में बताया कि उनके पिता सरगुजा जिला कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके हैं। अतुल सिंह भी कुछ बोलना चाह रहे थे कि टीएस ने उन्हें टोक दिया, और कहा कि जोगी पार्टी के लोगों के कांग्रेस प्रवेश पर प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम फैसला लेंगे। इस पर अतुल सिंह ने टीएस सिंहदेव को झिडक़ दिया, और कहा कि हम आपसे बात नहीं कर रहे हैं। सीएम से बात करने आए हैं।

विवाद बढ़ता देख सीएम ने तुरंत हस्तक्षेप किया, और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके आवेदनों पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम विचार करेंगे, और वे खुद भी मरकाम से चर्चा करेंगे। कुछ ऐसी ही स्थिति राजनांदगांव में भी बनी। सीएम के करीबी गिरीश देवांगन वहां जोगी पार्टी से कांग्रेस में आने के इच्छुक नेताओं के बारे में पूछा, तो ज्यादातर कांग्रेस नेताओं ने जोगी पार्टी के नेताओं को कांग्रेस में शामिल करने का विरोध किया। भाजपा के एक पुराने नेता को लेकर भी राय मांगी, तो उनके लिए भी सहमति नहीं बनी। ये अलग बात है कि भाजपा छोड़ चुके इस नेता के पुत्र कांग्रेस के पदाधिकारी हैं। विनोद गोस्वामी ने खुद होकर भाजपा छोड़ी और अब वे कांग्रेस में घर वापिसी चाहते हैं. भूपेश बघेल के कुछ करीबी लोगों ने उन्हें विनोद गोस्वामी के लिए सिफारिश भी की है।

बड़े नेताओं से ग्रस्त दुर्ग भाजपा

भाजपा में दुर्ग और भिलाई अध्यक्ष की नियुक्ति स्थानीय बड़े नेताओं  में खींचतान की वजह से अटक गई है। जबकि प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने 15 दिसंबर तक जिलाध्यक्षों की नियुक्ति करने के निर्देश दिए थे। आज डेड लाइन खत्म हो रही है, और नियुक्तियों के आसार नहीं दिख रहे हैं।

सुनते हैं कि सरोज पाण्डेय ने दिनेश देवांगन को दुर्ग ग्रामीण जिलाध्यक्ष  बनाने की वकालत की है, इस पर सांसद विजय बघेल सहमत नहीं हैं। विजय बघेल चाहते हैं कि भिलाई में प्रेमप्रकाश पाण्डेय और विद्यारतन भसीन की सहमति से अध्यक्ष की नियुक्ति की जाए। यहां भी सरोज की अपनी पसंद है। चारों के बीच कटुता इतनी ज्यादा है कि वे एक साथ बैठने के लिए भी तैयार नहीं हैं।

प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी से विजय बघेल और विद्यारतन भसीन ने अलग से चर्चा की थी, और उन्हें दुर्ग जिले में संगठन चुनाव के दौरान विवाद की विस्तार से जानकारी दी थी। सरोज की पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग हैसियत है। ऐसे में नियुक्तियों को लेकर प्रदेश संगठन पशोपेश में हैं।

कहानी में लिखी बात पर घिरे कुलसचिव

छत्तीसगढ़ का कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय अपनी किसी कामयाबी के लिए कम, और किसी न किसी अवांछित और अप्रिय बात के लिए खबरों में बने रहता है। अब ताजा खबर कुलसचिव डॉ. आनंद बहादुर की एक कहानी संग्रह के एक वाक्य को लेकर बनी है जिसमें कहानी का एक पात्र आईएएस और दूसरी परीक्षाओं में कामयाब नहीं हो पाता। और उसके बारे में कहानीकार ने लिखा है- उसके बहुत सारे पढ़ाई में बोदे मित्र आरक्षण की बैसाखी के सहारे मंजिल पा गए थे।

अब इस एक वाक्य को लेकर आरक्षण समर्थकों ने डॉ. आनंद बहादुर की घेरेबंदी की है। अजाक्स के प्रांताध्यक्ष डॉ. लक्ष्मण भारती ने कहा है कि कुलसचिव को आरक्षण पर अध्ययन करने की जरूरत है। एक जिम्मेदारी वाले पद पर रहते हुए ऐसा लिखते समय अपने सामान्य वर्ग के आरक्षण की जानकारी भी उन्हें होना चाहिए। क्या उनके आरक्षण को भी बैसाखी की श्रेणी में रखेंगे?

लोगों में अब सामाजिक और राजनीतिक चेतना इतनी आ गई है कि किसी कहानीकार को भी अपने किरदार के बारे में लिखते हुए अपनी बातों को सावधानी से ही लिखना पड़ेगा। अब अगर पात्र ऐसा सोचता होता तो एक अलग बात होती, लेकिन अगर कहानीकार आनंद बहादुर के शब्द यह लिख रहे हैं तो लोग सवाल उठा सकते हैं।

अधिक शिष्टाचार भारी पड़ा

जाते-जाते एक कलेक्टर ने अपने मातहत तहसीलदार को ऐसा जख्म  दिया है कि कलेक्टर के हटने के बाद भी तहसीलदार के जख्म नहीं भर पाए हैं। हुआ यूं कि कलेक्टर ने तहसीलदार को अपने गेस्ट को भेंट करने के लिए अच्छी-सी सात-आठ साड़ी भिजवाने कहा। तहसीलदार जब दुकान गए, तो दुकानदार ने सलाह दी कि आप 80 साड़ी ले जाइए,  जो साब को पसंद आएगी वे रख लेंगे। बाकी लौटा दीजिएगा। तहसीलदार को दुकानदार की बात जंच गई, वे 80 साड़ी लेकर बंगले पहुंचे, तो सभी साडिय़ों को रखवाकर जाने के लिए कह दिया गया। साडिय़ों की कीमत के बारे में किसी ने पूछा ही नहीं। थोड़े दिन बाद कलेक्टर भी रिटायर होकर चले गए, अब हाल यह है कि बेचारे तहसीलदार को साडिय़ों की कीमत अदा करनी पड़ रही है।

बगावत करेंगे युद्धवीर?

जशपुर जिले में जूदेव परिवार भारतीय जनता पार्टी का पर्याय रहा है। जब तक स्व. दिलीप सिंह जूदेव जीवित थे, पार्टी का हर फैसला उनसे पूछकर लिया जाता था। इधर, इन दिनों चंद्रपुर से दो बार विधायक रह चुके युद्धवीर सिंह जूदेव की भाजपा पर की गई टिप्पणी इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। मीडिया में उन्होंने भाजपा को न केवल व्यापारियों की पार्टी बताया, बल्कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के संघर्ष की तारीफ भी की। उनके रिश्ते टीएस सिंहदेव से भी अच्छे हैं। सन् 2018 में सिंहदेव ने साफ कर दिया था कि वे युद्धवीर के खिलाफ चुनाव प्रचार करने नहीं जायेंगे।

चंद्रपुर से 10 साल विधायक रहने के बाद युद्धवीर सिंह का जशपुर से सम्पर्क कम हो गया था पर बाद में पंचायत चुनाव में जिम्मेदारी दी गई। रायगढ़ से गोमती साय का लोकसभा चुनाव के लिये नाम तय किया गया तो कहा जाता है, उनकी ही सिफारिश थी। सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय युद्धवीर सिंह ने भाजपा से सम्बन्धित पहचान हटा ली है।

इन सबसे यह अटकल भी लगाई जा रही है कि वे कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर कई पोस्ट उन्होंने हाल के दिनों में डाली है जो  कांग्रेस सरकार की आलोचना में है। इनमें सहकारिता विभाग में कम्प्यूटर ऑपरेटरों की भर्ती में भ्रष्टाचार व बारदानों की कमी के कारण धान खरीदी व्यवस्था में आई दिक्कतों की चर्चा भी है।

सन् 2018 के उप-चुनाव में जशपुर की तीनों सीट कांग्रेस के पास आई थी और भाजपा साफ हो गई थी। यह करीब 35 साल बाद हुआ। यदि युद्धवीर कांग्रेस में आ जाते हैं तो जशपुर के फिसले जनाधार को दुबारा हासिल करना भाजपा के लिये और कठिन हो जायेगा।

पत्रवार्ता नहीं, केवल उद्बोधन

किसान कानून के समर्थन में कल भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेशभर में मीडिया से बात की। प्राय: सभी जिला मुख्यालयों में इन वार्ताओं का आयोजन किया गया था। दिल्ली से जो बातें केन्द्रीय मंत्रियों के हवाले से टीवी चैनलों में कही जा रही है लगभग वही बातें स्थानीय स्तर पर भी दोहराई गई। तीनों कानूनों को किसानों के लिये फायदेमंद बताया गया और आंदोलनकारियों को अराजक, अर्बन नक्सली, टुकड़े-टुकड़े गैंग भी कहा। बस यही नहीं बताया गया कि आंदोलनकारी किसानों की शंकायें जिन बिन्दुओं पर हैं उसका केन्द्र सरकार के पास समाधान क्या है। प्राय: हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक लम्बा वक्तव्य दिया गया और जब प्रश्न-प्रतिप्रश्न का मौका आया तो प्रवक्ता जवाब देने से बचते रहे और जैसे ही असहज हुए वार्ता समाप्त करने की घोषणा कर दी गई।


14-Dec-2020 4:34 PM (151)

सफाई के ठेके में मलाई...

नगरीय निकायों में सफाई का ठेका लेना कमाई का बढिय़ा जरिया है। ठेके के लिये बड़ी मारामारी होती है, सिफारिशें चलती हैं। सत्ता पक्ष के करीबियों को काम सौंपा जाता है। प्रदेश के कई निकायों में पार्षदों ने दूसरे नामों से ठेके ले रखे हैं। ठेके लेने के लिये ऐसी होड़ रहती है कि हाल ही में एक ठेकेदार ने टेंडर में भाग लेने से रोकने पर हाईकोर्ट में केस कर दिया। ठेके में अनुबंध होता है कि वे कितने कर्मचारी लगायेंगे और कितनी बार सफाई होगी। पर एक बार ठेका मिल जाने के बाद शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं यह कोई नहीं देखता। अक्सर बीच-बीच में जब अधिकारी वार्डों का दौरा करते हैं तो गंदगी देखकर ठेकेदारों पर जुर्माना लगा देते हैं। ठेकेदार की सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि कम संसाधनों से काम करते हुए वह काफी बचा चुका होता है।

इन दिनों राजधानी रायपुर में सेजबहार हाउसिंग बोर्ड के लोग गुस्से में हैं। टैक्स वसूलने के लिये न सिर्फ नोटिस भेजी गई है बल्कि कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। पानी का कनेक्शन काटने की चेतावनी भी दी गई है। पहले पंचायत के जिम्मे में सफाई थी तो व्यवस्था ठीक थी पर अब टैक्स भी भारी और सफाई की व्यवस्था भी खराब।

बाबा लायेंगे क्रांति?

वेब सीरिज ‘आश्रम’ में मुख्य किरदार निगेटिव करैक्टर का एक बाबा है। इस सीरिज में थीम सांग है-बाबा लायेंगे क्रांति...। इन दिनों सरगुजा में सोशल मीडिया पर मीम वायरल हो रहा है जिसमें पाश्र्व में यही गीत बज रहा है। बताया जाता है कि ये टीएस बाबा के ही किसी फालोअर ने बनाया है और उनके समर्थक इसे शेयर कर रहे हैं। सन् 2018 में सरगुजा से कांग्रेस को बम्पर वोट मिले तो इसकी एक वजह यह भी थी कि बहुत से लोग बाबा को भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे थे। चुनाव के समय उन्होंने अपनी इस इच्छा को साफ-साफ जाहिर भी किया था। दूसरी तरफ, हाल ही में प्रदेश में ढाई साल वाले फॉर्मूले पर मुख्यमंत्री से सवाल भी पूछ लिया गया था और जिस पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। बहुत से लोग समझ रहे हैं कि उनका इशारा किस ओर था। इन दिनों सीएम सरगुजा संभाग के 5 दिनों के लम्बे प्रवास पर हैं। उनकी सभाओं के पहले दो दिन टीएस बाबा नहीं थे। वे चार्टर प्लेन से दिल्ली चले गये थे, पर रविवार को लौटकर शामिल हुए। सीएम के इस दौरे में लोगों ने देखा कि इन सभाओं में कभी बाबा के अलावा किसी को महत्व देने की जरूरत नहीं समझने वाले भी सीएम के आगे-पीछे हो रहे हैं। जो सीएम तक नहीं पहुंच पाये वे उनके मंत्रियों तक पहुंचने की कोशिश में लगे हैं। शायद इनका धैर्य जवाब दे चुका है और बदलाव की उम्मीद छोड़ चुके हैं। एक समर्थक का कहना है कि मंत्रीजी के करीब कुछ लोग हैं जिनकी वजह से वह छिटक रहे हैं। ऐसे में क्रांति आयेगी?

एबीवीपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी

कवर्धा में एबीवीपी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का मुद्दा गरमाया हुआ है। उन्होंने प्रतिबंधित कलेक्टोरेट क्षेत्र में प्रदर्शन किया था। वे एक आदिवासी नाबालिग से गैंगरेप के मामले में पुलिस से कार्रवाई की मांग करने के लिये पहुंचे थे। उन पर गंभीर धारायें लगाई गई हैं जिन्हें छोडऩे की मांग को लेकर भाजपा ने भी प्रदर्शन किया। कवर्धा के अलावा राजनांदगांव में भी विरोध दर्ज कराया गया है। प्रशासन की कार्रवाई पहली नजर में कुछ सख्त लगती है। आम तौर धरना प्रदर्शनों में गिरफ्तारियां होती है और कुछ घंटे बाद छोड़ भी दिये जाते हैं। बेरिकेड्स तोडऩे और प्रतिबंधित परिसर तक पहुंचने की घटनायें भी होती रही हैं। फिर क्या जवानों के साथ धक्का मुक्की और कांग्रेस भवन में चूडिय़ां फेंकना एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर भारी पड़ा?