राजपथ - जनपथ

Date : 13-Nov-2018

राजनीतिक हल्कों में सरकार के ताकतवर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के उस बयान को लेकर हलचल मची है, जिसमें उन्होंने यह कह दिया कि सीएम कौन बनेगा, यह पार्टी तय करेगी। बृजमोहन ने एक यू-ट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में यह भी कहा कि चुनाव जीतने के बाद पार्टी सीएम तय करेगी। जबकि तीन दिन पहले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, सीएम डॉ. रमन सिंह के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव में मतदाताओं से यह अपील कर चुके हैं कि वे विधायक नहीं, बल्कि सीएम चुन रहे हैं। शाह इससे पहले भी कई बार कह चुके हैं कि प्रदेश में रमन सिंह के नेतृत्व में चौथी बार भाजपा की सरकार बनेगी। इन सबके बीच बृजमोहन के इस बयान के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। और उनके इस बयान को पार्टी की अंदरूनी खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है। 
 पिछले दो-तीन बरसों में सीएम और बृजमोहन अग्रवाल के बीच कई मौकों पर दूरियां नजर आई हंै। एक समय ऐसा भी आया था कि बृजमोहन को मंत्री पद से हटाने की चर्चा भी होने लगी थी। तब राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद विवाद सुलझा। अब जब चुनाव चल रहे हैं, ऐसे में बृजमोहन के इस बयान को कुछ लोग रमन सिंह के नेतृत्व को चुनौती के रूप में देख रहे हैं। साथ ही इस बात को लेकर भी चर्चा हो रही है कि पार्टी में सब कुछ अभी सामान्य नहीं है। 

पहले राउंड में किसको कितना?
पहले चरण की सीटों को लेकर कांग्रेस और भाजपा नेताओं के अपने-अपने दावे हैं। भाजपा के रणनीतिकार पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जता रहे हैं और 18 में से 12 सीट का दावा कर रहे हैं। कांग्रेस को पिछले चुनाव से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। यानी 12 से ज्यादा सीट मिलने की बात कह रहे हैं। कुछ टीवी चैनल अपने सर्वे में भाजपा को बढ़त मिलने के बात कह चुके हैं। इन सबके बीच आईएएस डॉ. आलोक शुक्ला की ईवीएम पर लिखित किताब के विमोचन के मौके पर एक वरिष्ठ पत्रकार की उस टिप्पणी पर खूब तालियां बजी, जिसमें उन्होंने तमाम सर्वेक्षण पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि चुनाव के वक्त हम सच नहीं दिखाते या लिखते हैं, हम झूठ लिखते हैं। ऐसे में लोगों को अपने मताधिकार का प्रयोग सोच समझकर अपने विवेक के अनुसार करना चाहिए। फिर भी पहले चरण में किसको ज्यादा सीट मिलेगी, इसको लेकर बहस जारी है। कुछ लोग सट्टा बाजार पर ज्यादा भरोसा करते हंै क्योंकि सटोरियों का अनुमान ज्यादा सटीक होता है। 
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Date : 12-Nov-2018

जोगी कुनबा कड़े मुकाबले में फंस गया है। हाल यह है कि खुद अजीत जोगी को अपने गढ़ मरवाही में ही चुनाव जीतने में मशक्कत करनी पड़ सकती है। चर्चा तो यह भी है कि जोगी चुनाव भले जीत जाए पर लीड उतनी नहीं रहेगी, जितनी पहले रहती थी। प्रदेश में सबसे ज्यादा वोटों से जीतने का रिकॉर्ड अजीत जोगी के नाम पर है। वे 2003 में 54 हजार से अधिक मतों से चुनाव जीते थे। जोगी पहले कांग्रेस टिकट से चुनाव लड़ते रहे हैं, लेकिन इस बार वे अपनी पार्टी के बैनर तले हल चुनाव चिन्ह लेकर मैदान में उतरे हैं। सुनते हैं कि स्थानीय मतदाता नए चुनाव चिन्ह के प्रति आकर्षित नहीं हो पा रहे हैं। जोगी के प्रति लगाव बरकरार दिख रहा है, फिर भी मुकाबला कड़ा हो चला है। इसी तरह कोटा से डॉ. रेणु जोगी भी कड़े मुकाबले में फंस गई हैं। उनकी जीत का अंतर लगातार कम होता रहा है, लेकिन कांग्रेस के परंपरागतगढ़ में नए बैनर तले उनका चुनाव जीतना बेहद कठिन माना जा रहा है। यही हाल, जोगी की बहू ऋचा जोगी का है। ऋचा अकलतरा सीट से बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में है। 
ऋचा त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी हंै। उनका मुकाबला पूर्व विधायक और भाजपा प्रत्याशी सौरभ सिंह व कांग्रेस प्रत्याशी विधायक चुन्नीलाल साहू से है। चर्चा तो यह है कि बसपा के कट्टर समर्थक अभी भी ऋचा के साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं। यद्यपि ऋचा के समर्थन में बसपा सुप्रीमो मायावती यहां सभा ले चुकी हैं। उनकी सभा भीड़ के लिहाज से सफल भी रही है, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ता उन्हें बाहरी मानकर दूरी बनाए हुए हैं। इसका सीधा फायदा चुन्नीलाल साहू और सौरभ सिंह को हो रहा है। हालांकि ऋचा के पति अमित जोगी चुनाव प्रबंधन में माहिर माने जाते हैं। ऐसे में जोगी समर्थक उम्मीद से हैं। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 11-Nov-2018

प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, यह चर्चा आम है। नौकरशाहों में इसको लेकर उत्सुकता ज्यादा दिख रही है। वे दीवाली की बधाई देने आए छोटे अफसरों - आम लोगों से आपसी चर्चा के बीच यह पूछ लेते हैं कि प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। कुछ लोग इतने चालाक होते हैं वे वही जवाब देते हैं, जो साब सुनना चाहते हैं। ऐसे ही चर्चा के बीच एक साब ने सामने बैठे बिजनेसमैन और छोटे अफसरों से पूछ लिया कि प्रदेश में सरकार किसकी बनेगी। 
अफसरों ने एक सुर में जवाब दिया कि ऐन-केन प्रकारेण भाजपा की ही सरकार बनेगी। पर चतुर बिजनेसमैन को साब के रिश्तों का पता था उसने तपाक से बोल दिया कि प्रदेश में जोगी किंगमेकर होंगे और उनके बिना सरकार बन ही नहीं सकती। आखिर में साब ने अपने विचार रखे कि  भाजपा की सीटें 65 प्लस रहेगी। ये बात अलग है कि कट्टर भाजपाई भी इतनी सीटों का दावा नहीं कर पा रहे हैं। 

सिंहदेव अघोषित रूप से घोषित?
क्या कांग्रेस ने टीएस सिंहदेव को सीएम प्रोजेक्ट कर दिया है, यह सवाल पार्टी के अंदर और बाहर चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल, राहुल गांधी और कांग्रेस के बाकी नेता जिस तरह सिंहदेव को महत्व दे रहे हैं, उससे इन अटकलों को बल मिला है। राहुल ने तो घोषणा पत्र जारी करते समय सिंहदेव से यह पूछ लिया कि इन घोषणाओं को किस तरह पूरा करेंगे? सिंहदेव ने अपनी योजनाओं से राहुुल और मीडिया को अवगत कराया। राहुल ने आगे यह भी कहा कि कांग्रेस से जो भी सीएम बनेगा, उसे इन घोषणाओं को पूरा करना होगा। 
हालांकि, कांग्रेस से सीएम की रेस में डॉ. चरणदास महंत और दुर्ग सांसद ताम्रध्वज साहू भी हैं। भूपेश बघेल को स्वाभाविक तौर पर इसका दावेदार माना जाता है, पर सीडी-वीडी के चक्कर में वे पिछड़ गए हैं, ऐसा लगता है। टिकट वितरण में सिंहदेव को महत्व दिया गया। सुनते हैं कि बस्तर और सरगुजा संभाग की सारी टिकटें सिंहदेव के हिसाब से तय हुई हैं। बाकी टिकटों में भी उनकी खूब चली। रमन सिंह के मुकाबले में सिंहदेव कांगे्रस पार्टी का सौम्य चेहरा हैं। हाईकमान ने उनकी पकड़ और पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता को भांपते हुए  महीनाभर पहले ही एक हेलीकॉप्टर उपलब्ध करा दिया था। वे प्रदेश कांग्रेस के अकेले नेता हैं जो बस्तर की सारी सीटों में प्रचार के लिए गए और सभाएं लीं। बाकी सीटों पर भी उनकी मांग बनी हुई है। पार्टी के एक-दो को छोड़ दें, तो सारे प्रत्याशी सिंहदेव के संपर्क में हैं और वे उनकी मदद करते दिख रहे हैं। ऐसे में सीएम पद को लेकर कोई बहस हो रही है, तो वह बेवजह नहीं है। हालांकि राजनीति के जानकार जब पुराने फार्मूले लेकर नए नतीजे निकालने बैठते हैं तो एक नतीजा यह निकलता है कि चरण दास महंत मध्यप्रदेश के समय से सबसे पुराने और अनुभवी मंत्री रहे हैं, वे पिछड़े वर्ग के भी हैं, और कांगे्रस के सभी गुटों को मिलाकर चलना भी जानते हैं। कुछ दूसरे लोगों का यह मानना है कि कोई कांगे्रस नेता अगर अचानक सामने  आने की संभावना रखता है तो वह ताम्रध्वज साहू है। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 10-Nov-2018

भाजपा को बड़ा फायदा यह मिलता है कि चुनाव प्रचार खत्म होते-होते कांग्रेस का प्रबंधन बिखर जाता है। कुछ सीटों पर इस चुनाव में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। राहुल गांधी ने पहले प्रत्याशी की घोषणा 15 अगस्त तक करने की बात कही थी, लेकिन प्रदेश के नेताओं की आपसी खींचतान-विवाद के चलते नामांकन दाखिले की शुरू होने के बाद प्रत्याशियों की घोषणा की गई। देरी से प्रत्याशी की घोषणा का  नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। मसलन, बिलाईगढ़ सीट में कांग्रेस ने शिक्षाकर्मी नेता चंद्रदेव राय को प्रत्याशी बनाया है। प्रत्याशी भी ठीक-ठाक है, लेकिन वे मौजूदा विधायक व भाजपा प्रत्याशी डॉ. सनम जांगड़े के खिलाफ नाराजगी को भुना पाने में फिलहाल सफल होते नहीं दिख  रहे हैं। बिलाईगढ़ में चार सौ गांव आते हैं और वहां प्रचार खत्म होने तक प्रत्याशी का पहुंचना मुश्किल दिख रहा है। इसी तरह जैजेपुर और कुछ अन्य सीटों में भी प्रचार-प्रसार की कमी की वजह से कांग्रेस प्रत्याशी दिक्कत मेें हैं। जानकार मानते हैं कि जल्द ही इन सीटों पर कांग्रेस ने चुनाव प्रबंधन दुरूस्त नहीं किया, तो नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

भात तो था, बकरा चाहिए...
बकरा-भात न खिलाने की बात करते हुए कांग्रेस के स्व. रामचंद्र सिंहदेव ने चुनाव लडऩे से इंकार कर दिया था। चुनाव आयोग की नजरों के कारण गांवों में अब बकरा-भात पकना मुश्किल हो गया है। लिहाजा इसका तोड़ भी निकाल लिया गया है। बसना के एक इलाके में इन दिनों वोटरों के घर बकरे का गोश्त बांटने की चर्चा है। बताया जाता है कि वोटर के सदस्यों के हिसाब से परिवार को गोश्त बांटा जा रहा है। बांटने की होड़ में  निर्दलीय भी पीछे नहीं हैं। गोश्त का मजा ले चुके एक वोटर का कहना था कि भात का इंतजाम तो चाऊंर वाले बाबा ने पहले ही कर दिया है। बांटने वाले का खर्चा भी कम हुआ है। समस्या बकरों की है। आने वाले दिनों में न जाने कितने बकरों की शामत आएगी।    
वैसे बसना का छेरी बाजार मशहूर है। ओडिशा सीमा से लगे होने के कारण यहां से बकरे-बकरियां काफी संख्या में बिकने पहुंचते हैं। वोट पड़ते तक न जाने कितने बकरे चुनावी बलि होंगे और वोटर पता नहीं किसे बकरा बनाएगा?

सोच-समझकर फंसना
सरायपाली-बसना, सोच-समझकर फंसना, यह उक्ति न जाने कितने बरसों से चली आ रही है। कहा जाता है उक्तियां जनपदों के लोक अनुभवों से उपजी होती हैं। यह बसना सरायपाली के संदर्भ में सटीक बैठती है कि पूरे प्रदेश में इन दोनों विधानसभाओं में कांग्रेस और भाजपा ने सोचने-समझने में सबसे ज्यादा वक्त लगाया और अब मतदान के बाद तय होगा कि सबसे ज्यादा समझदार कौन है, जो फंस गया।
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Date : 09-Nov-2018

सरकार के एक मंत्री अपने निर्वाचन क्षेत्र के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों के अपने लोगों को हर साल दीपावली पर मिठाईयां, चाकलेट,फल,पटाखे गिफ्ट में भेजा करते थे। कई कांग्रेसियों के घर भी मंत्रीजी का गिफ्ट पहुंचा करता था। इस बार न जाने क्यों, मंत्रीजी का गिफ्ट नहीं पहुंचा है। हो सकता है कि गिफ्ट की टोकरी जमाने में देर हो गई हो और लोगों के घरों तक एक-दो दिन बाद गिफ्ट पहुंचे। लेकिन वे लोग परेशान हैं। इसी बीच हल्ला है कि कमजोर प्रतिद्धंदी मैदान में आने से मंत्रीजी ने अपना हाथ बांध लिया है।  

टिकट और गरीबी 
पता नहीं क्यों चुनाव की टिकट मिलने के बाद ज्यादातर प्रत्याशी गरीब हो जाते हैं। यह भी संयोग है कि कांग्रेस प्रत्याशियों के साथ ऐसा अक्सर देखने को मिलता है। टिकट की दावेदारी करते समय जो लोग 5, 10, 20 करोड़ रुपए खर्च करने का दंभ भरते हैं, वहीं लोग टिकट मिलने के बाद मदद मांगने निकल पड़ते हैं और बात-बात पर अपनी गरीबी का रोना रोने लगते हैं। इस बार भी यही सबकुछ हो रहा है। भाजपा के धन्ना सेठ प्रत्याशियों का हवाला देकर कांग्रेस के कई प्रत्याशी हाथ बांधे बैठे हैं। पार्टी के ज्यादातर प्रत्याशियों ने वार्डों में तभी फंड बांटा, जब उन्हें पार्टी से फंड मिल गया। कहीं प्रति वार्ड 25-25 हजार रुपए दिए गए तो कुछ प्रत्याशियों ने 20-20 हजार देकर बचत कर ली है, अब आगे देखिये क्या होता है? 

फंड की कमी नहीं 
वैसे, कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव में अपने प्रत्याशियों को भरपूर आर्थिक मदद कर रही है। जानकारों का दावा है कि पिछले चुनाव में 35-35 पेटी की मदद मिली थी।लेकिन इस बार राहुल गांधी के आदेश पर दोगुनी मदद मिल रही है। मदद की पहली किश्त दीपावली के ठीक पहले सभी प्रत्याशियों तक पहुंचा दी गई है। मदद की दूसरी किश्त मतदान के दो-तीन दिन पहले दे दी जाएगी। कांग्रेसियों को जानकारी मिल चुकी है कि पार्टी ने खजाना खोल दिया तो वे अपने प्रत्याशियों से भी दोगुनी राशि मिलने की उम्मीद कर रहे हैं। इसी वजह से चुनाव कार्यालय खोलने के इच्छुक लोगों की संख्या एकाएक बढ़ गई है। 

दूध का जला...
कांंग्रेस के प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया कुछ दिनों से बेहद सक्रिय हैं। हालत यह है कि पुनिया दीपावली के दिन सुबह लखनऊ गए और दूसरे दिन सुबह यहां लौट आए। पार्टी की अंदरूनी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले एक कांग्रेस नेता की मानें तो पुनिया पहले भी सक्रिय थे। लेकिन सीडी कांड के बाद से ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। दूध के जले हैं, इसलिए छाछ को भी फूंक-फूंक कर पी रहे हैं, यानी किसी पर भी जरूरत से अधिक भरोसा नहीं कर रहे हैं। न जाने कौन, कब और कहां निपटा दे इसलिए सफर में भी पूरी सावधानी रख रहे हैं। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 06-Nov-2018

पुलिस के कई रिटायर्ड अफसर भाजपा और कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं। रिटायर्ड डीजी राजीव श्रीवास्तव समेत कई रिटायर्ड पुलिस अफसर भाजपा की फिर सरकार बनाने के लिए माहौल बनाने में जुटे हैं, तो कांग्रेस के पक्ष में भी कुछ रिटायर्ड पुलिस अफसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इनमें चर्चित नाम जीएस बाम्बरा का भी है। 
डीएसपी के पद से रिटायर हो चुके बाम्बरा किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। वे सालों से रायपुर में रहे हैं और हर तरह की गुत्थियां सुलझाने में माहिर माने जाते हैं। रिटायर्ड होने के बावजूद पुलिस शीर्ष अफसर अब भी अलग-अलग मामलों में उनकी सेवाएं और राय लेते हैं। बाम्बरा सिख फोरम से जुड़े हैं। वे रायपुर उत्तर के कांग्रेस प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा को मदद कर रहे हैं। सुनते हैं कि कांग्रेस के ही कई नेता जुनेजा से खफा रहे हैं, लेकिन बाम्बरा ने उन्हें कुलदीप के पक्ष में प्रचार के लिए राजी किया। वे मूलत: सरगुजा के रहवासी हैं और सिंहदेव परिवार से उनके अच्छे संबंध हैं। वे न सिर्फ रायपुर बल्कि अन्य सीटों पर भी पार्टी के बड़े नेताओं को सलाह मशविरा दे रहे हैं। जब बाम्बरा जैसे लोग कोई सलाह देते हैं, तो उनकी बातें बिना किसी किन्तु-परन्तु के मानी जाती है। 

एक पंथ दो काज
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय कांग्रेस प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार करने आए हैं। सहाय पड़ोसी राज्य झारखंड के रहने वाले हैं। वैसे तो वे कोई भीड़ जुटाने वाले नेता तो नहीं है, लेकिन छत्तीसगढ़ से उनका नाता जरूर है। हल्ला है कि सिलतरा स्थित एक स्टील कंपनी में उनकी भागीदारी है, ऐसे में उनका छत्तीसगढ़ आना-जाना लगा रहता है। अब चुनाव चल रहे हैं, तो हिसाब-किताब देखने के साथ-साथ प्रचार भी हो जा रहा है। 
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Date : 05-Nov-2018

सिंधी समाज के नेताओं ने भाजपा हाईकमान पर दबाव बनाकर श्रीचंद सुंदरानी के लिए रायपुर उत्तर की टिकट हासिल तो कर ली है, लेकिन उन्हें जिताने के लिए एकजुटता नहीं दिख रही है। श्रीचंद से नाराज कई सिंधी नेता जोगी पार्टी के प्रत्याशी अमर गिदवानी के समर्थन में आ गए हैं। गिदवानी को चुनाव मैदान से हटाने की भरसक कोशिश हुई, कई स्तरों पर चर्चा भी चली, लेकिन गिदवानी नाम वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुए। ऐसे में सिंधी वोटरों का बंटवारा तय माना जा रहा है। हालांकि सिंधी वोटरों की संख्या कोई बहुत ज्यादा नहीं है। मात्र 12 हजार सिंधी मतदाता हैं, पर जिस अंदाज में रायपुर उत्तर की सीट पर समाज से जुड़े कई लोगों ने हक जताया, उससे फायदा कम नुकसान होता ज्यादा दिख रहा है। 
रायपुर उत्तर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी कुलदीप जुनेजा को दूसरे समाजों का बैठे-बिठाए समर्थन मिल रहा है। सुनते हैं कि गुजराती समाज के एक बड़े तबके ने कुलदीप को समर्थन देने का ऐलान किया है। समाज से जुड़े लोग इस बात से ज्यादा नाराज है कि सिंधी से ज्यादा वोटर रायपुर उत्तर में गुजराती हैं। फिर भी टिकट के लिए सामाजिक दबाव नहीं बनाया। और तो और सिंधी समाज के कांग्रेस नेता अब कुलदीप के पक्ष में प्रचार के लिए तैयार हो गए हैं। पिछले चुनाव में ये नेता एक तरह से तटस्थ हो गए थे। यानी श्रीचंद की राह कठिन हो गई है, लेकिन वे भी एक जीवट विधायक की तरह पूरे 5 बरस अपने विधानसभा क्षेत्र में लगे रहे। सुबह मरीन ड्राइव पर सैकड़ों लोगों से मिलकर दिन शुरू करना, और हर समारोह में पहुंचना, मेकाहारा में मरीजों से संपर्क रखना। ये सारे काम उनके काम भी आ सकते हैं। 

कमाऊ विभागों का यहां भी बोलबाला
कई पूर्व पुलिस और आबकारी अफसर अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ रहे हैं। दो रिटायर्ड डीएसपी आरके राय गुण्डरदेही और श्यामलाल कंवर रामपुर से फिर चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले चुनाव में दोनों ने अच्छे खासे वोटों से जीत हासिल की थी।  इस बार कोटा से नौकरी छोड़ चुके डीएसपी विभोर सिंह कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पूर्व सीएम अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी को टक्कर दे रहे हैं। पूर्व थानेदार अनूपनाग भी अंतागढ़ सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में डटे हैं। इससे परे पूर्व आबकारी अफसर इंद्रशाह मंडावी मानपुर-मोहला सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इससे परे एक अन्य आबकारी अफसर की पत्नी लक्ष्मी ध्रुव भी कांग्रेस टिकट से नगरी-सिहावा सीट से चुनाव मैदान में है। पुलिस और आबकारी अफसरों की राजनीति में सक्रियता चर्चा का विषय है। वैसे भी राजनीति में पैसे का बोलबाला हो गया है। ऐसे में पुलिस और आबकारी अफसर मौजूदा राजनीति की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम दिखते हैं। राजनीतिक दल भी इन्हें टिकट देने में गुरेज नहीं करती, क्योंकि ये चुनावी खर्चे के लिए दल पर निर्भर नहीं रहते हैं। ये फंड का जुगाड़ खुद कर लेते हैं। कभी कभार दूसरों की मदद भी कर देते हैं।
 सुनते हैं कि एक रिटायर्ड पुलिस अफसर ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद एक बड़े राजनेता को करीब 50 लाख उधार दिए थे।  पैसा तो वापस नहीं मिला, लेकिन पार्टी की नीति निर्धारक जरूर बन गए। अफसर को भी पैसे वापसी की जल्दी नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि नेताजी पॉवर में आएंगे तो हिसाब-किताब हो जाएगा। इधर भूपेश बघेल के खिलाफ पाटन से लड़ रही एक ताकतवर महिला प्रत्याशी के पति एक सबसे कमाऊ विभाग में इंजीनियर हैं, और वहां पर करोड़ों के खर्च की चर्चा है। rajpathjanpath@gmail.com


Date : 04-Nov-2018

टिकट बंटने के बाद कांग्रेस में खींचतान और बढ़ गई है। हाल यह है कि प्रत्याशियों को नाराज नेताओं को मनाने में ज्यादा समय देना पड़ रहा है। रायपुर की सीमा से सटे विधानसभा क्षेत्र के प्रत्याशी को अपने ही दल के नेताओं से जूझना पड़ रहा है। राजीव भवन के कर्ता-धर्ता एक पदाधिकारी के भाई-बंधुओं ने प्रचार करना तो दूर, पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ ही माहौल बनाना शुरू कर दिया है। सुनते हैं कि पार्टी पदाधिकारी ने किसी एक को प्रत्याशी बनवाने के लिए प्रॉमिस कर दिया था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। अब उन्होंने पार्टी प्रत्याशी की राह में  रोड़े अटकाने शुरू कर दिए हैं। इसी तरह रायपुर जिले की एक सीट के प्रदेश संगठन के एक बड़े पदाधिकारी प्रत्याशी को पिछले दिनों एक अन्य दावेदार की नाराजगी झेलनी पड़ी। 
हुआ यूं कि संगठन के प्रमुख पदाधिकारी बी-फार्म लेने के लिए पार्टी दफ्तर पहुंचे थे। दफ्तर पहुंचते ही उनका सामना एक नेता से हो गया जो कि उसी सीट से टिकट के दावेदार थे। पहले संगठन के प्रमुख पदाधिकारी ने उनके लिए प्रयास करने का भरोसा दिलाया था, लेकिन बाद में वे उसी सीट से खुद प्रत्याशी बन गए। टिकट के वंचित नेता, पदाधिकारी को देखते ही भड़क गए। आसपास कोई और सुन न ले इसलिए पदाधिकारी उन्हें एक कमरे में ले गए। बाहर सिर्फ तेज आवाज ही सुनी गई। बाहर जब दोनों निकले तो उनके चेहरे पर तनाव साफ दिख रहा था। न सिर्फ रायपुर जिला बल्कि अन्य जगहों पर भी इसी तरह का तनाव देखने को मिल रहा है। 

पुनिया अब पस्त हैं
प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया अब पहले की तरह सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। वे पिछले प्रभारियों की तुलना में ज्यादा सक्रिय रहे हैं। और चुनाव शुरू होने से पहले तकरीबन सभी विधानसभा क्षेत्रों में जा चुके थे। चुनाव को लेकर इतने ज्यादा सक्रिय थे कि उन्होंने पार्टी के एक नेता को किराए का मकान देखने के लिए कह दिया था। मतदान खत्म होने तक यहां रहकर चुनाव संचालन की उनकी योजना थी, लेकिन जैसे ही विधानसभा सीटों की कथित सौदेबाजी की सीडी जारी हुई, वे यहां आने से कन्नी काटने लगे। यह भी हल्ला उड़ा कि पुनिया की भी सीडी जारी हो सकती है, काफी दिनों तक नहीं आए। चर्चा तो यह भी है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ का प्रभार छोडऩे की इच्छा भी जाहिर कर दी थी, लेकिन हाईकमान की समझाइश पर वे फिलहाल पद पर बने रहने के लिए तैयार हो गए। उनकी भूपेश बघेल से मतभेद की खबर मीडिया में छाई हुई है और उन्होंने प्रचार छोड़कर अपने आपको बैठकों तक ही सीमित कर लिया है। चर्चा तो यह भी है कि वे छत्तीसगढ़ के प्रभार से किसी तरह पीछा छुड़ाना चाहते हैं। 

सूत न कपास, जुलाहों में...
भाजपा में कुर्सी को लेकर सूरतेहाल यह है कि राजनांदगांव के शहरी नेता मधुसूदन यादव ने डोंगरगांव का रूख क्या किया, उनकी संभावित जीत के गुमान में महापौर की कुर्सी के लिए अंदरूनी तौर पर दौड़ शुरू हो गई है। विधानसभा चुनाव के नतीजों का अता-पता नहीं है, लेकिन नगर निगम में बहुमत वाली भाजपा में बिना लड़े एक साल की मेयर की कुर्सी को लेकर सियासी बिसात बिछ रही है। बताते हैं कि यादव के विजयी होने की पूरी उम्मीद को लेकर मेयर इन काउंसिल के सदस्य और मुखर महिला पार्षदों ने भी कुर्सी पर टकटकी लगाई  है। यादव के निर्वाचित होने की आस में बैठे भाजपा पार्षद बिना किसी उठापटक के  सीट को हथियाने की जुगत में है। पार्टी में इस  तरह की हड़बड़ाहट को लेकर कई पार्षदों को डपट खानी पड़ी। उत्साही पार्षदों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि महापौर और विधायक के पद पर एक साथ रहने में कानूनी अड़चन नहीं है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 03-Nov-2018

रायपुर उत्तर विधानसभा सीट पर जोगी कांग्रेस ने टिकट के दो दावेदारों को बी-फॉर्म जारी कर दिया है। वैसे तो जोगी कांग्रेस में जो न हो वो कम है, लेकिन इस अनोखी घटना का राज हर कोई जानने को बेताब है, एक टिकट के लिए दो बी-फॉर्म दिए जाने को लेकर तरह-तरह की कहानियां सुनने को मिल रही है। एक तो यह कि टिकट के दोनों दावेदार अमर गिदवानी और नितिन भंसाली जोगी परिवार में अच्छी पकड़ रखते हैं। इसलिए इसे दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी कहानी भाजपा के सेठ प्रत्याशी की ओर इशारा कर रही है। जोगी बंगले के ही एक दमदार नेता की मानें तो अमर गिदवानी के चुनाव लडऩे से भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगेगी। आखिर गिदवानी अपने समाज से ही वोट बटोरेंगे, जो श्रीचंद सुंदरानी के लिए नुकसानदेह साबित होगा। इसीलिए गिदवानी की जगह भंसाली को भी बी-फॉर्म दे दिया गया है, लेकिन गिदवानी को मैदान से हटाने का फैसला अभी फाइनल नहीं हुआ है। 

 प्रत्याशियों की भीड़ का राज 
इस बार विधानसभा चुनाव में लगभग हर सीट पर प्रत्याशियों की भीड़ दिख रही है। चुनाव के पंडितों के अनुसार धनलाभ के लिए चुनाव बेहतर अवसर है। प्रत्याशियों को चुनाव लडऩे को धन मिलता है और चुनाव मैदान से हटने या फिर घर बैठने का भी धन लाभ प्राप्त होता है। रायपुर दक्षिण सीट पर परंपरागत रूप से अधिक प्रत्याशी मैदान में हैं। यहां 50 में से 23 प्रत्याशी मुस्लिम समाज से हैं। दरअसल इस क्षेत्र में पिछले 27 सालों से मुस्लिम समाज एकदम से सक्रिय हो जाता है, और उसकी वजह से कांग्रेस को वोटों का नुकसान लगातार बना हुआ है।  सौ-दो सौ वोट भी पाने वाले मुस्लिम प्रत्याशी को सफल मान लिया जाता है। हजार-हजार वोटों को मिलाकर ही बड़ा फासला बनता है। आखिर में चुनावी मैदान में जो प्रत्याशी बाकी बचेंगे, वे शहर के अलग-अलग हिस्सों से कुछ दर्जन या कुछ सौ वोट पाने के हकदार साबित होंगे। लेकिन इस बार अजमेर जाना कितने लोगों को नसीब होगा, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। 
पिछले चुनाव का नतीजा देखें तो अब्दुल नईम खान को 929, शमशेर अली को 737, रईस फाजिल को 596, श्रीमती नजत अली को 259, मो. सगीरुद्दीन को 264, नियाज भाई को 247, अब्दुल कय्यूम खान को 205, वाशिम अफरीदी को 179, अजमत भाई को 105, अनवर भाई को 91, हबीब भाई को 86, मो. अफजल को 85, मजहर इकबाल को 73, मौलाना सलाम को 65, इलियास हुसैन को 64, महबूब खान को 59, फिरोज खान को 57, मो. वासिम रिजवी को 57, फरहा नाज को 50, ताजदार खान को 49, हाजी सैय्यद हकीमुद्दीन को 40 वोट मिले थे। 

दरबारियों का दुख 
विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल को किनारे लगा दिया है। बघेल की यह हालत यहां उनके कुछ दरबारियों को बेहद खल रही है। वे दुखी हैं और मौका मिलते ही भड़ास भी निकाल रहे हैं। सुनते हैं कि कांग्रेस भवन में रोज दोपहर को कुछ दरबारी एकत्र होते हैं और एक कमरे में बैठकर पुुनिया, सिंहदेव, महंत, जैसों को घंटों कोसते हैं और फिर घर लौट जाते हैं। वो भी दिन थे, जब प्र्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात करने के लिए लोग इन्हीं दरबारियों के आगे-पीछे घूमते थे। 

तोडफ़ोड़ के फायदे 
प्रत्याशियों की सूची जारी होने के बाद कांग्रेस के दफ्तरों में हुई तोडफ़ोड़ और उससे हुए नुकसान को तो लोगों ने घर बैठे देख लिया। कांग्रेसजन अब तोडफ़ोड़ करवाने के फायदे भी देख रहे हैं। पार्टी के प्रदेश मुख्यालय राजीव भवन में जहां तोडफ़ोड़ करवाई गई थी, वहीं शुक्रवार को अजीब नजारा देखने को मिला। तोडफ़ोड़ करवाने वाले युवा पार्षद को पार्टी की ओर से हीरो के रूप में पेश किया गया। बकायदा उस युवा पार्षद की प्रेस कांफ्रेंस करवाई गई। प्र्रेस कांफ्रेंस में उस युवा पार्षद ने तोडफ़ोड़ के लिए माफी मांगी और पार्टी ने उसे माफ भी कर दिया। बताया गया कि तोडफ़ोड़़ से हुए नुकसान की भरपाई युवा पार्षद ही करेंगे। एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने उस पार्षद की तारीफ के कसीदे पढ़ते हुए यहां तक कह दिया कि वो तन-मन और धन से कांग्रेस के साथ हैं। ऐसे में टिकट से वंचित अन्य दावेदार हाथ मल रहे हैं कि उन्होंने हीरो बनने और पब्लिसिटी का एक बेहतर अवसर गवां दिया है।

नोट लाने-ले जाने का इंतजाम...
प्रदेश में नोटों की धरपकड़ ऐसी चल रही है कि नेता तो नेता, कारोबारी भी परेशान हो चुके हैं। ऐसे में एक पार्टी ने नोटों के लिए एक तरकीब निकाली है। इन दिनों राजधानी रायपुर में घर तक खाना पहुंचाकर देने वाले नौजवान मोटरसाइकिलों पर पीछे बड़े-बड़े बैग लिए सरपट आते-जाते हैं। एक पार्टी ने इसी मार्के वाले ऐसे ही बैग का इंतजाम किया है, और आधी रात तक आसानी से उसका इस्तेमाल हो सकता है। एक बैग में करोड़ों के नोट आ सकते हैं, या दर्जनों लीटर दारू।

भाई नहीं तो ससुर की टिकट से खुश
 राज्य पुलिस के एक बड़े अफसर के घर में कुछ दिनों से कांग्रेस की टिकट नहीं मिलने का गम अचानक से खुशियों में बदल गया और यह खुशी छत्तीसगढ़ के रास्ते नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश से होकर घर तक पहुंची। सुनते हैं कि राजधानी में पदस्थ एएसपी प्रफुल्ल ठाकुर के भाई वीरेश ठाकुर कांकेर की भानुप्रतापपुर सीट से कांग्रेस से टिकट की उम्मीद से थे। पर कांग्रेस ने मनोज मंडावी पर फिर भरोसा किया। सुनते हैं कि यह परिवार लंबे समय से कांग्रेस समर्थक रहा है। टिकट नहीं मिलने का मलाल के बीच एएसपी ठाकुर के परिवार में उस वक्त दुख सुख में बदल गया जब मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा के अमरवाड़ा सीट से ससुर प्रेमनारायण ठाकुर को भाजपा ने मैदान में उतारा। चर्चा है कि एएसपी ठाकुर का परिवार इस बात से ही खुश हो गया है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भले ही उनके परिवार को नजरअंदाज किया, लेकिन मध्यप्रदेश भाजपा में उनकी सुनी गई। कभी दिग्विजय सिंह सरकार में परिवहन मंत्री रहे प्रेमनारायण ठाकुर का राजनीतिक रसूख अमरवाड़ा इलाके में बरकरार रहा। गत चुनाव में वहां से एएसपी ठाकुर के साले साहब को भाजपा ने मौका दिया था और वे मामूली अंतर से पराजित हुए थे।   rajpathjanpath@gmail.com


Date : 02-Nov-2018

रायपुर दक्षिण की टिकट नहीं मिलने पर पार्षद एजाज ढेबर के समर्थकों ने पीसीसी दफ्तर में जमकर उत्पात मचाया। ढेबर समर्थकों का गुस्सा स्वाभाविक था। सुनते हैं कि कांग्रेस के बड़े नेता ढेबर परिवार के एक तरह से मेहमान की तरह रहे हैं। वे उनके चार सितारा होटल में ठहरते थे और लजीज व्यंजनों का लुफ्त उठाकर मुंह पोंछकर निकल जातेे थे। होटल में कभी किसी ने उन्हें बिल के लिए नहीं पूछा। और तो और प्रत्याशी चयन के लिए रायपुर आई स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य भी ढेबर के होटल में रूके थे। पिछले दो साल से कांग्रेसियों के लिए ढेबर का होटल एक तरह से गेस्ट हाऊस की तरह उपयोग हो रहा था। अब पता नहीं किस तरह स्क्रीनिंग की गई, जिसके होटल में रूके थे उनका नाम ही पैनल में नहीं रखा गया। लाखों फूंकने के बाद टिकट हाथ नहीं आई तो गुस्सा किसी न किसी पर उतरना था। सो, पीसीसी दफ्तर में बड़े नेताओं नेताओं की गैर मौजूदगी में ढेबर समर्थकों ने उनके कमरों में तोडफ़ोड़ कर खीझ निकाली। कुछ समय पहले तक कांग्रेसियों के लिए गुरुमुख सिंह होरा का होटल ऐसे ही काम आता था, और अब यह एक होटल और जुड़ गया है।

सीडी के बाद की सतर्कता

कांग्रेस में प्रत्याशी चयन में इस बार अतिरिक्त सतर्कता बरती गई। विधानसभा सीटों की सौदेबाजी की कथित सीडी आने के बाद पैसे वाले दावेदारों की पसंदीदा सीटों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया गया था। 
सुनते हैं कि रायगढ़ सीट के लिए एक बड़े कारोबारी ने आसपास की चार सीटों के प्रत्याशियों का खर्च उठाने की पेशकश भी की थी। प्रदेश के  एक-दो नेता तो इसके लिए तैयार भी थे, लेकिन छानबीन समिति ने कारोबारी की टिकट के लिए अनुशंसा करना तो दूर, उनका नाम पैनल में भी नहीं रखा। टिकट भी ऐसे व्यक्ति को दी गई जो कि जातिगत समीकरण के हिसाब से फिट बैठ रहा था। इसी तरह रायपुर उत्तर से पूर्व विधायक कुलदीप जुनेजा सिर्फ इसलिए टिकट पा गए कि वे सर्वे में सबसे ऊपर थे। जबकि प्रदेश के ज्यादातर बड़े नेताओं का रूझान कुकरेजा या प्रमोद दुबे की तरफ था, जिन्होंने बड़े नेताओं की सेवा सत्कार में कभी कोई कमी नहीं की। जबकि कुलदीप हाथ हिलाकर निकल जाते थे। रायपुर उत्तर की सीट पर जब मंथन हुआ तो यह बात सामने आई कि कुलदीप की जीत की संभावना सबसे ज्यादा है। विपरीत परिस्थितियों में भी वे पिछले चुनाव में कम वोटों से हारे थे। ऐसे में स्थानीय नेताओं की अनुशंसा को दरकिनार कर कुलदीप को प्रत्याशी बना दिया गया। 

खरसिया फिर चर्चा में
खरसिया का इस बार का चुनाव इस चुनाव क्षेत्र को दूसरी बार चर्चा में ला रहा है। पहली बार मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जब 80 के दशक में यहां से उपचुनाव लडऩे आए थे, और दिलीप सिंह जूदेव ने उन्हें नाकों चने चबवा दिए थे। उसके बाद इस बार का चुनाव अनोखा है कि एक कलेक्टर भरी जवानी में इस्तीफा देकर मतदाताओं के सामने उतरा हुआ है। ओपी चौधरी भाजपा की टिकट पर लड़ रहे हैं, और कहीं वे शेविंग किट बांट रहे हैं तो कहीं मतदाताओं को चमका भी रहे हैं। कुल मिलाकर वे खबरों में हैं। 
यह सीट नंद कुमार पटेल की परंपरागत सीट मानी जाती है, और जीरम घाटी के नक्सल हमले में उनके शहीद होने के बाद उनका बेटा उमेश पटेल यहां से कांगे्रस विधायक बना। इस हिसाब से यह सीट अफसरी से राजनीति में आए चौधरी के लिए आसान नहीं थी, लेकिन चुनाव में उन्होंने अपने पक्ष में एक लहर खड़ी की है। नंद कुमार पटेल के पूरी जिंदगी के साथी रहे बालक राम पटेल इस बार ओपी चौधरी के चुनाव-प्रचार में रात-दिन जुटे हुए हैं। 
कवर्धा में चौकसी
कवर्धा में पिछले चुनाव में नोटा से कम वोटों से हारने वाले कांगे्रस प्रत्याशी मोहम्मद अकबर ने पिछली बार जो सबक लिए हैं, उनका इस्तेमाल इस बार वे करने वाले हैं। अब वहां पर न तो मतदान के समय किसी एंबुलेंस से कोई सामान इधर-उधर लाया ले जाया जा सकेगा, और न ही नोटा की तरकीब काम लाई जा सकेगी।
हाथी किसके हैं?
छत्तीसगढ़ में जगह-जगह हाथियों के जत्थे खेतों और इंसानों को रौंद रहे हैं। रात-दिन चुनाव में मशगूल एक नेता ने कहा कि चारों तरफ कमल का निशान देखकर हाथियों को लग रहा है कि लक्ष्मीजी कहीं आसपास ही होंगी, और उनके अगल-बगल खड़े होने के लिए हाथी चारों तरफ तलाश कर रहे हैं। दूसरी तरफ राजनीति के कुछ और लोग कहते हैं कि बसपा का हाथी लक्ष्मीजी को ढूंढते घूम रहा है कि वे मिलें तो बैठूं। तीसरी थ्योरी यह है कि छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी बसपा के हाथी के महावत बन बैठे हैं, और उन्होंने जानबूझकर कुछ चुनिंदा इलाकों को कुचलने के लिए हाथियों को ढील दे रखी है, अब उन इलाकों के उम्मीदवारों पर है कि वे इन हाथियों की कैसी आवभगत करते हैं। फिलहाल हाथी अधिक परेशान नहीं है क्योंकि न तो वे चुनावी बातें सुनते, और न ही अखबार पढ़ते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 01-Nov-2018

दिग्गज भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ रायपुर दक्षिण सीट से कांग्रेस प्रत्याशी कौन होगा, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले चुनाव में बृजमोहन ने तेज तर्रार नेत्री किरणमयी नायक को रिकार्ड 37 हजार से अधिक वोटों से हराया था। बृजमोहन के खिलाफ प्रत्याशी को लेकर यह धारणा रहती है कि वे या तो उनके अपने रहते हैं या फिर अपने होने का हल्ला उड़ा दिया जाता है। किरणमयी को लेकर भी कुछ इसी तरह की अफवाह उड़ी थी, जबकि वे चुनाव हारने के बाद बृजमोहन के खिलाफ अलग-अलग मामलों को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रही हैं। खैर, इस बार चुनाव में कांग्रेस से टिकट के कई दावेदार हैं। सुनते हैं कि पार्टी जिन दो-तीन नामों पर गंभीरता से विचार कर रही है उनमें से एक तो पिछले दिनों रामसागरपारा स्थित एक होटल में नजर आए। होटल जाना सामान्य बात है और इसमें किसी आपत्ति भी नहीं हो सकती, लेकिन वहां रायपुर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के भाजपा के रणनीतिकारों की बैठक चल रही थी। इस बैठक में कांग्रेस टिकट के ये प्रबल दावेदार नेता भी मौजूद थेे। अब पार्टी उनके अपने को प्रत्याशी बना देती है, तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। 
वैसे बृजमोहन अग्रवाल कई मायनों में भाजपा के एक मंत्री से बड़े नेता हैं। वे कम से कम एक दर्जन सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की मदद करते हैं, नगद भी, और सामान भी। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के अलावा वे ही अकेले मंत्री हैं जो कि बहुत सी दूसरी सीटों पर, दूसरे जिलों में प्रचार करने को जाएंगे। दूसरी सीटों के लिए जिसे समय निकालना हो, वह अगर अपनी सीट पर विपक्षी चुनने में दिलचस्पी भी ले, तो उसमें नाजायज क्या है? इससे विपक्ष तक पकड़ तो पता लगती ही है।
टिकटों में चली किसकी?
यह चर्चा आम है कि भाजपा में प्रत्याशी का चयन सही नहीं किया गया। पार्टी का एक खेमा इसके लिए राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय को जिम्मेदार ठहरा रहा है। सुनते हैं कि सरोज ने आधा दर्जन से अधिक टिकटें बदलवा दी, जिससे समीकरण एकदम बिगड़ गया। सीएम जगदलपुर-कोण्डागांव सहित कई जगहों पर नया चेहरा चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। 
चर्चा तो यह भी है कि राजिम से चंद्रशेखर साहू और अभनपुर से अशोक बजाज को टिकट देने की सिफारिश की गई थी। इतना ही नहीं, जांजगीर-चांपा से नारायण चंदेल की जगह व्यास कश्यप को टिकट देने का सुझाव दिया गया था। कुछ जगह बृजमोहन अग्रवाल की वजह से टिकट नहीं बदल पाई, तो कई जगहों पर सरोज का अड़ंगा आ गया। टिकट वितरण में सरोज की अच्छी-खासी चल गई, लेकिन वे अपने भाई को टिकट नहीं दिला पाई। अब उनके लिए तेज तर्रार भाई-भाभी को मना पाना मुश्किल हो रहा है। पार्टी हाईकमान नेताओं के बागी तेवर पर निगाह रखे हुए हैं। ऐसे में आज सरोज पाण्डेय अपने भाई को लेकर भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचीं, और उससे माहौल कुछ शांत हुआ है।
भीड़ का इंतजाम मुश्किल
चुनाव आचार संहिता के चलते भाजपा-कांग्रेस नेताओं को भीड़ जुटाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। पिछले दिनों कांकेर की एक सभा में केन्द्रीय मंत्री रामकृपाल यादव की सभा में मात्र 40-50 लोग ही जुटे थे। कांग्रेस के पास संसाधनों की कमी है, ऐसे में प्रदेश के बड़े नेताओं की सभा में गिनती के लोग ही आ रहे हैं। राहुल गांधी की सभा में भी ज्यादा भीड़ जुट नहीं पाई थी, लेकिन भाजपा के लोग भीड़ को लेकर संवेदनशील रहते हैं और बड़े नेताओं की सभा में अच्छी खासी भीड़ जुट जाए, इसकी कोशिश रहती है। 
बावजूद इसके सीएम की चारामा के निकट हलबा गांव की सभा में गितनी के लोग ही पहुंच पाए थे। यह सभा 29 तारीख को हुई थी। सुनते हैं कि एक जिम्मेदार व्यक्ति ने सभा के लिए जरूरी इंतजाम करने के लिए जिला संगठन के प्रमुख पदाधिकारी को पांच पेटी दी थी। इन सबके बावजूद भीड़ नहीं जुटी, तो 30 तारीख को जिले के पदाधिकारी को बुलाकर खोज-खबर ली गई। जिले के पदाधिकारी इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते नजर आए। इस पर पदाधिकारियों को जमकर सुननी पड़ी। 

सीट आखिर सिंधी समाज में रही
आखिरकार काफी जद्दोजहद के बाद रायपुर उत्तर सीट से मौजूदा विधायक श्रीचंद सुंदरानी को टिकट मिल गई। इस बार उन्हें अपने ही समाज के अमर परवानी से लोहा लेना पड़ा। भाजपा हाईकमान मोटे तौर पर सिंधी प्रत्याशी बनाने के लिए सहमत था, लेकिन दोनों में से किसको प्रत्याशी बनाया जाए इसको लेकर अलग-अलग राय थी।  दोनों ने अपनी टिकट के लिए हाईकमान को हिला दिया था। 
सुनते हैं कि सुंदरानी को टिकट दिलाने में शदाणी दरबार के प्रमुख संत युधिष्ठिर लाल की भूमिका अहम रही है। इसके अलावा सुंदरानी के लिए नागपुर के प्रभावशाली सिंधी नेता घनश्याम कुकरेजा लॉबिंग कर रहे थे। कुकरेजा के आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से करीबी रिश्ते बताए जाते हैं, तो परवानी के लिए भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य लद्दाराम प्रयासरत थे। लद्दाराम मुंबई के रहने वाले हैं और वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। पार्टी का एक खेमा श्रीचंद सुंदरानी को टिकट देने के सख्त खिलाफ रहा है और समाज के कई लोग उनके विरोध में मुखर रहे हैं। ऐसे में परवानी का दावा मजबूत दिख रहा था। बुधवार को सरदार पटेल की जयंती के मौके पर मरीन ड्राईव में पार्टी नेता एकत्र हुए। उनमें से कुछ ने सुंदरानी को अग्रिम बधाई भी दे दी थी, लेकिन बाद में परवानी को एक मैसेज मिला, इसके बाद वे और उनके समर्थक सक्रिय हो गए। परवानी ने सिविल लाईन में कार्यालय के लिए जगह भी चिन्हित कर ली थी और वहां साफ-सफाई भी शुरू हो गई थी। दोपहर बाद खबर आई कि सुंदरानी के टिकट क्लीयर हो गई है। इसके बाद परवानी समर्थक कार्यालय बंद कर निकल गए। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 26-Oct-2018

भाजपा के कुछ नेता तेजाबी जुबान बोलते हैं, और कुछ अखबारनवीस भी। अभी एक जगह चल रहे सर्वदलीय चंडूखाने में अखबारनवीस भी बैठे थे और इस बात की चर्चा चल रही थी कि रूचिर गर्ग को कांगे्रस में लाया क्यों गया? और अटकलों के साथ-साथ एक बड़ी अटकल यह भी थी कि एक पत्रकार की वजह से पार्टी को सेक्स-सीडी की जो बदनामी झेलनी पड़ी थी, उसकी भरपाई के लिए दूसरे पत्रकार को लाया गया जिसकी साख चौबीस कैरेट है। रूचिर गर्ग के चुनाव लडऩे से एक ऐसे ईमानदार उम्मीदवार के चुनाव लडऩे की मिसाल कांगे्रस में एक बार फिर जिंदा होगी। रामचंद्र सिंहदेव को राजनीति में ईमानदारी के लिए जाना और माना जाता था, और उन्होंने आखिर में चुनाव लडऩे से मना कर दिया था कि वे बकरा और भात खिलाकर चुनाव जीतना नहीं चाहते, और इसके बिना चुनाव जीतना संभव ही नहीं है। अब कुछ चुनाव बाद एक बार फिर कांगे्रस के पास उन्हीं की टक्कर का एक और ईमानदार उम्मीदवार हो सकता है। रूचिर गर्ग के बारे में सभी पार्टियों के आम और खास लोगों का यह मानना है कि उनके कांगे्रस में जाने से पार्टी को एक ऐसी साख फिर से हासिल हुई है जिसे उसने पिछले कुछ महीनों में सीडी के चक्कर में खो दिया था। रूचिर की साख से कांगे्रस को सिर्फ किसी एक सीट पर फायदा नहीं होगा, बल्कि पूरे प्रदेश में शरीफ मतदाताओं पर उनका असर होगा।

जिनको आगे बढ़ाया, वे ही...
रायपुर उत्तर के विधायक श्रीचंद सुंदरानी अपने समाज के कई नेताओं से बेहद खफा हैं। उनसे जुड़े लोग मानते हैं कि समाज के नेताओं की वजह से ही उनकी टिकट अब तक क्लीयर नहीं हो पाई है। सुंदरानी पिछले दिनों एक सामाजिक कार्यक्रम में अपना आपा भी खो बैठे। उन्होंने समाज के एक साहित्यकार को जमकर लताड़ लगाई। 
सुनते हैं कि सुंदरानी ने साहित्यकार को सरकारी पद दिलाने में मदद की थी, लेकिन संगठन के प्रमुख व्यक्ति ने रायपुर उत्तर से टिकट के लिए उपयुक्त व्यक्ति का नाम सुझाने के लिए कहा, तो उसने खुद का नाम प्रस्तावित कर दिया। वे इस बात को लेकर भी नाराज थे कि समाज के एक कारोबारी, जिसे उन्होंने चेंबर की राजनीति में ऊंचाईयों तक पहुंचाया, वे सुंदरानी को ही कमजोर बताते फिर रहे हैं और खुद के लिए टिकट मांग रहे हैं। समाज के नेताओं की दावेदारी से पार्टी में यह संदेश गया कि सुंदरानी की अपने ही समाज में पकड़ नहीं रह गई है। यही वजह है कि उनकी टिकट अब तक क्लीयर नहीं हो पाई है। वैसे यह एक अलग बात है कि भाजपा के जितने लोगों के नाम इस सीट पर चल रहे हैं, उनमें श्रीचंद सुंदरानी ही सबसे विनम्र भी हैं, और सुबह से रात तक सबसे मिलनसार भी हैं। फिर भी पार्टी की अपनी प्राथमिकताएं रहती हैं, और टिकट किसी को भी मिल सकता है।(rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 18-Oct-2018

कांकेर सांसद विक्रम उसेंडी को पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ाने से मना कर दिया है। पार्टी अंतागढ़ सीट से मंतुराम पवार को चुनाव लड़ाना चाहती थी। उसेंडी को पहले वहां तैयारी करने के लिए कहा गया था। उसेंडी अंतागढ़ विधानसभा में काफी दौरा कर रहे थे कि उन्हें चुनाव समिति की बैठक के पहले बुलाया गया और फिर पार्टी के रणनीतिकारों ने समझा दिया कि उन्हें विधानसभा का चुनाव नहीं लडऩा है। उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ाया जाएगा। पार्टी के इस फैसले से उसेंडी दुखी बताए जाते हैं और वे अगले दिन फ्लाइट पकड़कर चुपचाप दिल्ली चले गए। 
उसेंडी सरकार में मंत्री रहे हैं। मंत्री पद का अलग ही मजा है। जबकि सांसद बनने के बाद कोई पूछ परख नहीं रहती। अब जब पार्टी ने फैसला ले लिया है कि किसी सांसद को चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा, तो उसेंडी के साथ-साथ रामविचार नेताम भी मायूस हैं। वे प्रतापपुर से टिकट चाह रहे थे। उनके चुनाव नहीं लडऩे से गृहमंत्री रामसेवक पैकरा काफी खुश बताए जाते हैं। रामविचार की सक्रियता से पैकरा को अपनी टिकट की चिंता सता रही थी और दोनों के समर्थक आपस में टकरा भी चुके थे। 

दिग्गजों के खिलाफ मोर्चा

टिकट बंटने से पहले ही सरकार के तीन प्रभावशाली मंत्री अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर और रामविचार नेताम के खिलाफ स्थानीय नेताओं ने मोर्चा खोल दिया है। बिलासपुर शहर से अमर की जगह नए चेहरे को टिकट देने की मांग हो रही है। एक महिला नेत्री समेत कुछ दावेदार भी सामने आए हैं। पिछले चुनाव में अमर को इस तरह की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा था, लेकिन उनके बदले व्यवहार से पार्टी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग नाराज है। इसी तरह कुरूद सीट से विधायक और सरकार के मंत्री अजय चंद्राकर को भी प्रत्याशी नहीं बनाने की मांग हो रही है। पार्टी के प्रदेश मंत्री निरंजन सिन्हा ने खुले तौर पर अजय की जगह खुद को प्रत्याशी बनाने की मांग की है। उन्होंने सौदान सिंह से भी मुलाकात की और अजय की कार्यप्रणाली की जानकारी दी। उन्होंने यह भी कहा बताते हैं कि अजय को फिर टिकट देने से पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। इसी तरह प्रतापपुर सीट से रामसेवक पैकरा के खिलाफ भी नाराजगी उभर आई है। कुछ कार्यकर्ताओं ने उनके खिलाफ प्रदर्शन भी किया था। अब हाल यह है कि दिग्गजों को अपने यहां असंतोष दूर करने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है।   

भूपेश की दिक्कतें खत्म नहीं
सेक्स-सीडी के बाद विधानसभा सीटों की कथित सौदेबाजी सीडी जारी होने के बाद पार्टी में भूपेश बघेल की हैसियत थोड़ी घटी है, लेकिन अब उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र में इस पूरे मामले पर सार्वजनिक तौर पर जवाब देना पड़ सकता है। क्योंकि भाजपा एक महिला नेत्री को प्रत्याशी बनाने की सोच रही है। भाजपा यहां भूपेश के खिलाफ सेक्स-सीडी मामले को जोर-शोर से उठाएगी। खुद सीएम ने अटल विकास यात्रा के दौरान इस मामले को लेकर भूपेश पर तीखा वार किया था। अब जब चुनाव प्रचार शुरू होगा तो हमला और तेज होगा। 
(rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 17-Oct-2018

एक खबर उड़ी कि अटलजी के अस्थि कलश अभी तक विसर्जित नहीं हुए हैं और भाजपा दफ्तर के कोने में धूल खाते पड़े हैं। इसकी पड़ताल किए बिना अटलजी की भतीजी और कांग्रेस नेत्री करूणा शुक्ला पूरी पार्टी को लेकर भाजपा दफ्तर पहुंच गईं और उन्होंने जमकर हंगामा किया। पुलिस ने हंगामा कर रही करूणा और भूपेश बघेल समेत पार्टी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस के इस प्रदर्शन से भाजपा नेता हक्के-बक्के रह गए। उस समय सीएम समेत प्रदेश के तमाम बड़े नेता पार्टी दफ्तर में थे। बाद में धरमलाल कौशिक इस पूरे मामले पर आगे आए और कांग्रेसी प्रदर्शन को प्रायोजित करार दिया। उन्होंने अस्थि विसर्जन की वीडियो फिल्म दिखाई।
कांग्रेस को इस प्रदर्शन से कुछ हासिल नहीं हुआ, उल्टे पार्टी की अंदरूनी खींचतान उजागर हो गई। दरअसल, पिछले दो दिन से नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव रायपुर में जन घोषणा पत्र के लिए फीडबैक लेने गली-कूचों में घूम रहे थे। उन्होंने दो दिन में 50 से अधिक संगठनों से मुलाकात की और घोषणा पत्र को लेकर सुझाव लिए। सुबह से रात तक घोषणा पत्र को लेकर मशक्कत चलती रही। इससे अच्छा माहौल भी बना और स्वाभाविक तौर पर मीडिया में भी वे छाए रहे।
 हल्ला है कि सिंहदेव की कसरत से पार्टी के दूसरे नेता सहज नहीं थे। भाजपा दफ्तर में प्रदर्शन का वक्त भी सोच-समझकर चुना गया। जब सिंहदेव की वीआईपी रोड स्थित होटल में प्रेस कॉफ्रेंस चल रही थी उसी वक्त करूणा संग पार्टी नेता भाजपा दफ्तर जा धमके। स्वाभाविक तौर पर भाजपा दफ्तर के बाहर तनाव की स्थिति  थी। इसलिए कवरेज के लिए कई लोग कांफ्रेंस छोड़कर आनन-फानन में भाजपा दफ्तर पहुंच गए। गिरफ्तारी आदि की वजह से सिंहदेव से परे दूसरे नेताओं को भी मीडिया में अच्छी-खासी जगह मिल गई। विधानसभा सीटों की कथित सौदेबाजी मामले के बाद पार्टी हाईकमान ने संचालन समिति बनाकर एक तरह से भूपेश बघेल की हैसियत घटाई है। इससे परे सिंहदेव की पूछपरख बढ़ी है। चर्चा है कि इससे भूपेश समर्थक कई नेता खुश नहीं हैं। इन नेताओं ने भूपेश और सिंहदेव के बीच अपनी लाईन भी खींच ली है। उदाहरण के तौर पर घोषणा पत्र समिति के सचिव राजेश तिवारी, जिन्हें सिंहदेव के साथ होना चाहिए था वे धरना प्रदर्शन करते नजर आए। शैलेष नितिन त्रिवेदी जिन्हें प्रेस कांफ्रेंस में होना चाहिए था वे सिंहदेव के कार्यक्रमों से परहेज करते दिखे। कुल मिलाकर एक ही दिन में एक ही समय में अलग-अलग कार्यक्रमों से पार्टी की कलह भी दिखी है। अगर, धरमलाल कौशिक इस पूरे प्रदर्शन को सोची समझी और प्रायोजित कहते हैं तो पहली नजर में उनका आरोप सही दिखता है। 
सौदान सिंह सब जानते हैं
भाजपा में टिकट के दावेदार नेता सौदान सिंह को सीधे आवेदन देने से परहेज करते हैं। वजह यह है कि सौदान सिंह को टिकट के लायक नेता की, बिना मुलाकात किए पूरी जानकारी रहती है। आवेदन देने पर कई बार वे डपट भी देते हैं। ऐसे ही बेलतरा से टिकट के दावेदार नेता को पिछले चुनाव में फटकार सुननी पड़ी थी, जैसे ही दावेदार ने आवेदन सौदान सिंह को टिकाया, तो उन्होंने पूछ लिया कि आपकी उम्र कितनी है। दावेदार के अपनी उम्र 48 साल बताए जाने पर सौदान ने उन्हें नसीहत दी कि अभी से टिकट के लिए इतना उतावलापन दिखाने की जरूरत नहीं है। लालकृष्ण आडवानीजी ने अपना पहला चुनाव 61 साल की उम्र में लड़ा था। सौदान के इतना कहने भर से दावेदार अपना आवेदन लेकर खिसक लिए। इस बार भी उन्होंने टिकट के लिए आवेदन किया है, लेकिन सौदान सिंह के बजाए अन्य नेताओं के दरवाजे गए। 
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Date : 16-Oct-2018

टिकट कटने की चर्चाओं के बीच रायपुर उत्तर के विधायक श्रीचंद सुंदरानी ने उस वक्त राहत की सांस ली, जब उनकी मुलाकात सरोज पांडेय से हुई। सुंदरानी डॉ. रमन सिंह को जन्मदिन की बधाई देने सीएम हाउस पहुंचे थे। वे प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक के साथ खड़े थे कि   उनका सरोज से आमना-सामना हो गया। सरोज को देखते ही उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया। श्रीचंद की स्थिति भांपकर सरोज ने उनसे कहा कि श्रीचंदजी आप टेंशन में मत रहिए, आपका सब ठीक हो रहा है। फिर क्या था श्रीचंद, धरमलाल कौशिक को छोड़कर सरोज के पीछे-पीछे सीएम हाउस से निकल लिए। अब जब पार्टी की इतनी बड़ी नेता टिकट के लिए आश्वस्त करे, तो किसी के लिए भी खुश होना स्वाभाविक है। 
भुगतान कौन करेगा?
कांकेर में अमित शाह के कार्यक्रम के खर्चे को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया है। हुआ यूं कि जगदलपुर में पिछले दिनों अमित शाह के कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं के आने-जाने के लिए टैक्सी का बंदोबस्त किया गया था। बिहार से आए संगठन के नेता राजेंद्र सिंह के कहने पर स्थानीय नेताओं ने सौ से अधिक वाहन किराए पर लिए थे। चर्चा तो यह है कि किराए का पैसा वनमंत्री महेश गागड़ा को देने के लिए कहा गया था। कहा तो यह भी जा रहा है कि गागड़ा ने पहले भुगतान के लिए हामी भरी थी, बाद में संगठन के नेता जब पैसे के लिए गए, तो उन्होंने  पैसा देने से मना कर दिया। यह राशि करीब सात लाख से अधिक है।  टैक्सी वालों ने अब भाजपा जिलाध्यक्ष को फोन करना शुरू कर दिया है। हालत यह है कि जिलाध्यक्ष ने फोन उठाना ही बंद कर दिया है। टैक्सी वाले अपने पैसे के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। उन्होंने धमकी दी है कि यदि भुगतान नहीं किया गया, तो धरना-प्रदर्शन करेंगे। 
सबके चुनावी रथ तैयार
भाजपा के दिग्गजों का चुनाव रथ तैयार हो गया है। सरकार के मंत्री अजय चंद्राकर अपनी नई फॉच्र्यूनर में वोट मांगने निकलेंगे, तो राजेश मूणत पजेरो में प्रचार के लिए जाएंगे। उच्च शिक्षा मंत्री प्र्रेमप्रकाश पांडेय ने चुनाव प्रचार के लिए नई इनोवा किराए पर ली है। इससे परे बृजमोहन अग्रवाल का सर्वसुविधायुक्त चुनाव रथ इनोवा में तैयार हो रहा है। सीएम का रथ भी तैयार हो रहा है। यह रथ अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। सीएम तकरीबन सभी विधानसभा सीटों पर रोड शो करेंगे। 
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Date : 15-Oct-2018

भाजपा में प्रत्याशी तय करने के लिए वोटिंग कराने से ज्यादातर दावेदार खफा हैं। कुछ माह पहले तक पार्टी के रणनीतिकार यह कहते फिर रहे थे कि सर्वे रिपोर्ट के आधार पर प्रत्याशी तय किए जाएंगे। इसके लिए किसी को आवेदन करने की जरूरत नहीं है। कई जगहों पर टिकट के दावेदार इसके औचित्य पर सवाल खड़ा करते नजर आए। 
बालोद जिले की सीटों के लिए पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए पुन्नूलाल मोहिले तो यह कह गए कि पार्टी यह सब क्यों करा रही है, समझ में नहीं आता। दावेदारों की भीड़ में लीलाराम भोजवानी यह कहते सुने गए कि वोट तो डाल दीजिए, मतपेटी खुलेगी या नहीं, यह पता नहीं है। जिले और मंडल के पदाधिकारियों को वोटिंग का पॉवर दिया गया था। कई जगहों पर जिलाध्यक्ष भी टिकट मांग रहे हैं। उन्होंने अपनी पसंद से मंडल के पदाधिकारी बनाए थे, तो स्वाभाविक रूप से वोटिंग में उनका पलड़ा भारी दिखा। धमतरी शहर के दो टिकट के दावेदार इंदर चोपड़ा और निर्मल बरडिय़ा को पर्यवेक्षक बनाकर भेज दिया गया था। उनको लेकर यह अफवाह उड़ गई कि पार्टी उन्हें टिकट नहीं देगी इसलिए उन्हें पर्यवेक्षक बनाकर बाहर भेजा गया है।  इससे उनके समर्थकों में नाराजगी देखी गई। सरगुजा में तो गृहमंत्री रामसेवक पैकरा का खुला विरोध हुआ।  
रायपुर शहर के चार विधानसभा में से सिर्फ रायपुर उत्तर को लेकर चर्चा ज्यादा होते दिखी। सुनते हैं कि जिले और मंडल के कई पदाधिकारियों ने मौजूदा विधायक श्रीचंद सुंदरानी की जगह संजय श्रीवास्तव और छगन मुंदड़ा के पक्ष में वोट किए हैं। इस सब कसरत के बावजूद  वोटिंग के जरिए प्रत्याशी तय होंगे, इसकी संभावना कम ही दिख रही है। वजह यह है कि दुर्ग जिले के एक मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में सारे पदाधिकारी विरोधी खेमे के हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से मंत्रीजी को प्रत्याशी बनाने के पक्ष में वोटिंग तो होनी नहीं थी, फिर भी यदि उनका नाम तय होता है, तो यह माना जाएगा कि यह सारी कसरत दिखावा है। 
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Date : 14-Oct-2018

चुनाव प्रचार की शुरूआत में ही रामदयाल उइके के पार्टी छोडऩे से कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा है। वे दो दिन पहले ही कार्यकारी अध्यक्ष की हैसियत से पार्टी की छानबीन समिति की बैठक में शामिल हुए थे। कुछ सीटों के लिए योग्य दावेदारों के नाम भी सुझाए थे। सुनते हैं कि उइके ने रायपुर उत्तर सीट से आर्थिक रूप से बेहद सक्षम अजीत कुकरेजा को टिकट देने का सुझाव दिया था। अब जब वे पार्टी छोड़ चुके हैं तो उनकी अनुशंसा को पार्टी किस रूप में लेती है, यह देखना है। 
पुरानों की ताकत का खतरा
भाजपा में प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया चल रही है। जिलों में पर्यवेक्षक भेजकर टिकट के योग्य दावेदारों के नाम मंगाए जा रहे हैं। हालांकि यह सब औपचारिकता है। पार्टी के रणनीतिकारों ने दो को छोड़कर प्रथम चरण की तकरीबन सभी सीटों के लिए नाम तय कर लिए हैं। सुनते हैं कि जिन दो सीटों पर प्रत्याशी को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है, वे बस्तर संभाग की हैं। पार्टी नेताओं को आशंका है कि यदि पार्टी वहां से किसी नये चेहरे पर दांव लगाती है तो वहां स्थापित हो चुके टिकट के दावेदार नेता उन्हें हरा सकते हैं। हाल यह है कि स्थापित नेताओं में से प्रत्याशी चुनती है तो जीत की संभावना बेहद कम है। इसे कहते हैं इधर कुआं, उधर खाई। 
दोस्त दोस्त न रहा...
जोगी पार्टी-बसपा गठबंधन में सीपीआई भी शामिल हो गई है। सीपीआई को कोंटा-दंतेवाड़ा सीट दी गई है। दोनों सीट बसपा के कोटे की थीं। कोंटा से कांग्रेस विधायक दल के उपनेता कवासी लखमा पांचवीं बार विधानसभा में जाने जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। कवासी चाहते थे कि कोंटा से जोगी पार्टी चुनाव नहीं लड़े। सुनते हैं कि उन्होंने इसके लिए जोगी से संपर्क भी साधा था। कवासी, जोगी के करीबी रहे हैं, ऐसे में जोगी ने उनकी बात मानकर पहले सीट बसपा को दे दी। बसपा का वहां कोई आधार नहीं है। सो, कवासी निश्चिंत थे। अब जोगी ने पैंतरा बदलते हुए यह सीट सीपीआई को दिलवा दी। अब जाहिर तौर पर सीपीआई की वहां ताकत थोड़ी बढ़ जाएगी। पिछले चुनाव में सीपीआई दूसरे नंबर पर थी। ऐसे में अब कवासी को चुनाव जीतने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी। 

 


Date : 13-Oct-2018

सरकार के मंत्री केदार कश्यप एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं। उनके निज सचिव पर चुनाव आचार संहिता लगने के बाद पिछली तारीख में जारी आदेश से स्कूलों में फर्नीचर सप्लाई का आर्डर दिलाने के आरोप लगे हैं। केदार के निज सचिव के खिलाफ शिकायतों की अलग-अलग स्तरों पर पड़ताल भी हो रही है। पहले भी उनके खिलाफ ढेरों शिकायतें हुई थीं लेकिन उनका बाल बांका नहीं हुआ। ये अलग बात है कि जिनके साथ वे जुड़े रहे, उन्हें चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा। जब वे बृजमोहन अग्रवाल के शिक्षामंत्री रहते हुए उनके साथ थे, तब भी लायबे्ररी के लिए किताबें खरीदने के लिए एडवांस कमीशन की खुली जानकारी सबको रहती थी।
आरएन सिंह वर्ष-2003 से 08 तक सरकार के पहले कार्यकाल में अजय चंद्राकर के निज सचिव रहे। इसके बाद चुनाव में अजय को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद वर्ष-2008 से 13 तक हेमचंद यादव के स्कूल शिक्षा मंत्री रहते उनके निज सचिव रहे। इसके बाद हेमचंद को भी हार का सामना करना पड़ा। हेमचंद अब इस दुनिया में नहीं है। पिछले पांच साल से आरएन सिंह केदार कश्यप से जुड़े हैं। ऐसे में अब घपले-घोटाले के आरोपों के बाद लोग केदार के राजनीतिक भविष्य को लेकर कयास लगा रहे हैं। केदार कश्यप के खिलाफ एक दूसरा मामला अभी सतह के नीचे दबा हुआ है जिसमें उनकी पत्नी की जगह एक दूसरी रिश्तेदार परीक्षा देते पकड़ाई थी और पूरा मामला रफादफा कर दिया गया था। लेकिन चुनाव का वक्त ऐसा रहता है कि उस पूरे मामले के कागजात और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग लेकर लोग तैयार हैं कि कुछ हफ्तों में जब मामला गर्म होगा तब उसे आदिवासी मतदाताओं के सामने पूरे प्रदेश में पेश किया जाएगा।
केदार कश्यप के बंगले से स्कूलों के लिए फर्नीचर के आदेश बरसों से निकलते आ रहे हैं, और इनके लिए 27 फीसदी एडवांस कमीशन की जानकारी भाजपा के रायपुर के एक विधायक ने पार्टी और सरकार दोनों को दी थी क्योंकि वे अपने एक समर्थक फर्नीचर निर्माता को लेकर मंत्री के पास गए थे कि उन्हें कुछ काम दिलवा दिया जाए। नतीजा यह  निकला था कि शाम को विधायक के दफ्तर पहुंचकर पीए ने बता दिया था कि जितने का ऑर्डर चाहिए उसका 27 फीसदी भिजवा दें। (rajpathjanpath@gmail.com)

 


Date : 12-Oct-2018

चुनाव खर्च पर आयकर चुनाव आयोग की नजर से बचने के लिए कई नेताओं ने एक नया तरीका खोज निकाला है। सुनते हैं कि इन नेताओं ने तेल-शक्कर, किराना और सराफा व्यापारियों को भारी भरकम रकम स्टॉक जमा करने के लिए दी है। चूंकि त्यौहार के सीजन में आम दिनों से कई गुना ज्यादा खरीददारी होती है, ऐसे मौके पर व्यापारी हर रोज नेताजी को उनकी जरूरत के हिसाब से रकम वापस करेंगे। इससे भारी-भरकम रकम लाने ले जाने का जोखिम भी नहीं रहेगा और चुनाव में पैसा खर्च करने में भी कोई दिक्कत नहीं होगी। 
दारू की मुश्किल
सत्तारूढ़ दल के कई नेताओं को उस वक्त निराशा हाथ लगी, जब शराब कारखानेदारों ने उन्हें शराब देने से मना कर दिया। ये नेता दशहरे के लिए अग्रिम स्टॉक रखना चाहते थे। कारखानेदारों ने उन्हें शराब निकासी की निगरानी की बारीकियों से अवगत कराया।  उन्हें यह भी बताया कि आबकारी अमला किस तरह उन पर निगरानी रख रहा है। इसके बाद कुछ नेताओं ने आबकारी के प्रमुख अफसरों के मार्फत जुगाड़ जमाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। सुनते हैं कि आबकारी अफसरों ने यह हिदायत दे रखी है कि फिलहाल चोरी-छिपे किसी को शराब नहीं दी जाएगी। बाद में दोनों ही दलों के नेताओं को थोड़ी बहुत छूट दी जा सकती है। चुनाव में ऊंट किस करवट पर बैठेगा, यह तय नहीं है। इसलिए कारखानेदार-अफसर इसमें संतुलन चाहते दिख रहे हैं।
पर कतरे जाने के बाद
सीडी कांड के चलते न सिर्फ भूपेश बघेल बल्कि पार्टी के कई नेताओं को नुकसान उठाना पड़ा है। हाईकमान ने भूपेश के पर कतर दिए हैं। पार्टी हल्कों में यह चर्चा है कि उनकी सिफारिश को महत्व नहीं मिलेगा। बालोद और भाटापारा-बलौदाबाजार जिले के दो प्रमुख नेताओं को लेकर पार्टी के भीतर यह हल्ला उड़ा कि उन्होंने टिकट पाने के लिए काफी कुछ कर दिया है। इसकी खबर भूपेश विरोधी खेमे को लग गई अब दोनों को टिकट मिलना मुश्किल दिख रहा है।  (rajpathjanpath@gmail.com)