राजपथ - जनपथ

Date : 05-Apr-2019

चुनाव में कालेधन का उपयोग हमेशा होते आया है। प्रमुख राजनीतिक दल अपने प्रत्याशियों को चुनाव आयोग द्वारा तय सीमा से अधिक राशि  उपलब्ध कराती है। मगर, खुफिया कैमरे के सामने इसको कबूल करने से बिलासपुर सांसद लखनलाल साहू मुश्किलों में घिर गए हैं। सुनते हैं कि इस चुनाव में दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस अपने उम्मीदवारों को तय सीमा 75 लाख से अधिक  राशि उपलब्ध करा रही है। भाजपा ने 70-70 लाख रूपए सभी प्रत्याशियों के खाते में जमा भी करा दिए हैं। लेकिन पार्टी में सबको मालूम है कि इससे परे दो-दो करोड़ अलग से कैश उपलब्ध कराए जाएंगे। इसी तरह कांग्रेस की भी पहली किश्त जारी हो गई है। कांग्रेस उम्मीदवारों को भी पार्टी 70-70 लाख रूपए दे रही है। मगर, व्यक्तिगत तौर पर सभी प्रत्याशियों को ज्यादा से ज्यादा राशि खर्च करने के लिए कहा गया है। कांग्रेस के सभी प्रत्याशी आर्थिक रूप से सक्षम हैं और उन्होंने टिकट मिलने से पहले ही अपनी क्षमता का ब्यौरा पार्टी के रणनीतिकारों को दिया था। इसके बाद भी एक-दो प्रत्याशी खर्च करने में कंजूसी कर रहे हैं। इस पर एक मंत्री ने राजनांदगांव लोकसभा के प्रत्याशी को फटकार भी लगाई। 

जोगी के विधायक किधर जाएं?
खबर है कि पूर्व सीएम अजीत जोगी ने अपने विधायकों को किसी का भी समर्थन करने की छूट दे दी है। चर्चा है कि पार्टी के कोर ग्रुप की बैठक में विधायक प्रमोद शर्मा ने रायपुर लोकसभा प्रत्याशी प्रमोद दुबे को समर्थन देने की इच्छा जताई। प्रमोद शर्मा ने कहा कि कांग्रेस प्रत्याशी उनके राजनीतिक गुरू रहे हैं। ऐसे में अब पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही है, तो वे कांग्रेस की मदद करना चाहते हैं। धर्मजीत सिंह बिलासपुर से कांग्रेस प्रत्याशी अटल श्रीवास्तव का समर्थन कर रहे हैं। देवव्रत सिंह पहले ही रमन सिंह से मिल आए हैं। इन सबसे परे अजीत जोगी वैसे तो बसपा गठबंधन के साथ रहने की बात कह चुके हैं। वे जांजगीर में बसपा प्रमुख सुश्री मायावती के साथ मंच भी साझा करेंगे, लेकिन खुद बसपा का खुलकर प्रचार करेंगे। इसमें कुछ लोगों को संदेह है, क्योंकि ऐसा करने से उनके कांग्रेस में आने की संभावना खत्म हो जाएगी।
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Date : 04-Apr-2019

प्रदेश में लोकसभा के पहले और दूसरे चरण की सीटों के लिए मतदान में 15 दिन से कम समय बाकी रह गया है। दोनों चरणों में कुल चार सीटों पर वोटिंग होगी। इन सीटों पर प्रचार तेजी से चल रहा है। कांग्र्रेस और भाजपा प्रत्याशी प्रचार के बीच कुछ न कुछ ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे मतदाताओं के दिलों में उनके लिए जगह बने। ऐसे ही महासमुंद सीट से कांग्रेस प्रत्याशी धनेन्द्र साहू ने कलार समाज के सम्मेलन में तेली-कलार, भाई-भाई का नारा दिया। 

सम्मेलन में धनेन्द्र ने कहा कि तेली और कलार, एक ही पिता की संतान हैं। पुराने जमाने में महुआ का उत्पादन काफी होता था। एक ही पिता की संतान, जो महुआ से शराब बनाने में लग गए वे कलार कहलाए, जबकि महुआ के बीज से तेल निकालने का जो काम करने लगे वे तेली हो गए। उन्होंने खुद को कलार समाज से जुड़ा बताकर समर्थन मांगा। महासमुंद इलाके में कलार समाज के लोगों की संख्या अच्छी खासी है। धनेन्द्र के तर्कों से प्रभावित होने के बाद भी कलार समाज के लोग इस दुविधा में हैं कि दोनों ही मुख्य दल भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशी तेली समाज से हैं। ऐसे में उनके लिए भाई-भाई में से किसी एक भाई का चुनाव करना आसान नहीं है। 

बदले-बदले से नजर आते हैं...

सरगुजा जिले की राजनीति में राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम और पूर्व मंत्री रेणुका सिंह एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते हैं, लेकिन रेणुका के प्रत्याशी बनने के बाद रामविचार का रूख काफी बदला-बदला सा दिख रहा है। उन्होंने रेणुका को जिताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है। रामविचार के बदले तेवर से भाजपा के कई लोग हैरान हैं। 
सुनते हैं कि रामविचार ने रमन सिंह के विरोधियों को एकजुट करना शुरू कर दिया है। रामविचार से जुड़े लोगों का मानना है कि पार्टी में व्यवसायी तबके के लोगों का दबदबा रहा है। रमन राज में व्यवसायी नेता काफी फले-फूले हैं। आम छत्तिसगढिय़ा और आरएसएस से जुड़े पुराने लोग उपेक्षित रहे हैं। इस वजह से पार्टी की छवि भी छत्तीसगढ़ी विरोधी बन गई है। इन्हें दूर करने के लिए रामविचार आगे आए हैं। चर्चा है कि वे दिग्गज आदिवासी नेता नंदकुमार साय, ननकीराम कंवर के संपर्क में हैं, तो अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल जैसे नेताओं से मेल-जोल बढ़ा रहे हैं। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी का भी साथ मिल रहा है। ऐसे में लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी में एक नए खेमें का उदय होने का संकेत भी है। 

कांग्रेस को जोगी से राहत
छत्तीसगढ़ की 11 में से जिन 3 सीटों पर अजीत जोगी की ओर से खतरा खड़ा हो सकता था, वह टल गया है। जोगी ने इसे राष्ट्रीय चुनाव मानकर अपनी क्षेत्रीय पार्टी को इससे बाहर कर लिया है, और तमाम 11 सीटों पर मायावती की बसपा के हाथी छाप उम्मीदवारों का साथ देने की घोषणा की है। इससे कांग्रेस में लोगों ने राहत की सांस ली है, लेकिन कांग्रेसी नेता चौकन्ने भी हो गए हैं। कल कांग्रेस का राष्ट्रीय घोषणापत्र जारी हुआ, तो अजीत जोगी ने उसकी तारीफ करते हुए राहुल गांधी की भी तारीफ की। कल एक टीवी चैनल पर इक_ा लोगों ने जब कैमरे से परे राजनीति पर चर्चा की, तो बात निकली कि जोगी ने राहुल और उनके घोषणापत्र की तारीफ नहीं की है, कांग्रेस वापिसी की अर्जी लगा दी है जो कि दिखने में घोषणापत्र की तारीफ जैसी दिखती है। 

नाम और काम
छत्तीसगढ़ के बहुत से अस्पतालों को लेकर आए दिन मरीजों से लूटपाट की शिकायतें सामने आती हैं, और यह भी लगातार खबरों में रहता है कि निजी अस्पताल किस तरह सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजना का बेजा इस्तेमाल करते हुए कभी जवान महिलाओं का गर्भाशय निकाल देते हैं, तो कभी बच्चों के दांतों में वायरिंग करने का एक फ्रॉड करते हैं। कुल मिलाकर निजी अस्पतालों में से बहुत से ऐसे बदनाम हैं कि उनके काम सरकारी अस्पतालों के काम के मुकाबले बहुत अधिक खराब हैं। 

ऐसे में एक सामाजिक कार्यकर्ता उचित शर्मा ने आज फेसबुक पर लिखा है कि छत्तीसगढ़ के अधिकतर अस्पतालों के नाम देवी-देवता और ईश्वर के नाम पर रखे गए हैं, और हरकतें डाकू मलखान सिंह की तरह की हैं। ऊपर वाला भी इनकी हरकतों को देखकर केवल अपील ही करता होगा कि हमारे नाम को बख्श दे। 

इस पर जब इंटरनेट पर मौजूद छत्तीसगढ़ के निजी अस्पतालों के नाम देखे गए, तो अधिकतर अस्पतालों के नाम इसी तरह मिले। गायत्री हॉस्पिटल, रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल, धनवंतरी हॉस्पिटल, सांई बाबा नर्सिंग होम, अग्रसेन हॉस्पिटल, श्री मां शारदा आरोग्यधाम, बाल गोपाल हॉस्पिटल, नारायणा हॉस्पिटल, अष्टविनायक हॉस्पिटल, सांई कल्याण हॉस्पिटल, महादेवम हॉस्पिटल, जगन्नाथ हॉस्पिटल, श्रीनारायणा हॉस्पिटल, श्रीबालाजी इंस्टीट्यूट, देवी लक्ष्मी हॉस्पिटल, श्रीराम हॉस्पिटल, महादेव हॉस्पिटल, श्री सांईराम हॉस्पिटल, श्री स्वामिनारायण हॉस्पिटल, श्री कृष्ण हॉस्पिटल, श्री सांई केयर हॉस्पिटल, वगैरह-वगैरह। अब अपने आस्था के केन्द्र के नाम पर अस्पताल खोलकर भी अगर लोग वहां मरते हुए मरीजों से धोखाधड़ी करते हैं, तो इससे उनके ईश्वर की ताकत का भी पता लगता है। 


Date : 03-Apr-2019

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव में भाजपा की जैसी बुरी हार हुई थी उसे लेकर लोग प्रदेश के भाजपा नेताओं को खारिज करने में इस कदर जुट गए कि हार की वजहों में से एक वजह पर किसी ने चर्चा भी करना मुनासिब नहीं समझा क्योंकि उससे राज्य के भाजपा नेताओं को खारिज करने में कुछ दिक्कत होती। जब लोकप्रिय और लुभावनी सुनामी मौजूद हो, तो उसकी लहरों के खिलाफ जाकर कौन अपनी बाहों को थकाए? लेकिन जब विधानसभा चुनाव की टिकटों की घोषणा हुई थी, तो भाजपा की करीब 70 नामों की जो लिस्ट आई थी, उसमें 20 नाम ऐसे थे जिन्हें भाजपा के प्रदेश के नेताओं ने पहली नजर में ही हारा हुआ मान लिया था। फिर यह हताशा बढ़ते-बढ़ते मतदान तक बुरे हाल में पहुंच गई। भाजपा के कुछ बड़े लोगों ने उसी वक्त बताया था कि किस तरह दिल्ली में जब बैठक में रमन सिंह के रखे हुए बहुत से नामों को खारिज कर दिया गया था, तो उन्होंने बाहर निकलकर तुरंत रायपुर लौटने के लिए विमान का इंतजाम करने को कहा था जबकि उनका अगली सुबह रायपुर आना तय था। उनके करीबी लोगों का कहना था- साहब ने बैठक से निकलकर कहा कि अब घर लौट चलो, यहां रायता पूरी तरह फैल चुका है। विधानसभा चुनाव में शर्मनाक हार की वजह से, और उसके बाद, सार्वजनिक रूप से भाजपा ने इस पर चर्चा ही नहीं होने दी कि हारने वाले वे नाम किसके कहे तय हुए थे जिनसे कि रमन सिंह असहमत थे। 
लेकिन आज इस चर्चा की एक वजह यह है कि इस बार भाजपा ने दिल्ली में ही तमाम 11 नाम तय किए हैं, और इनका क्या होगा, यह राज्य के भाजपा नेता भी बंद कमरों में अटकल लगाते हैं, और खुले में मोदी पर भरोसा जताते हैं। 

दुर्ग में कांग्रेस की पहेली
प्रदेश में कांग्रेस की सबसे कमजोर सीट दुर्ग को माना जा रहा है। वहां पर जनचर्चा यह है कि विधानसभा चुनाव में जब प्रचार में लगी हुई घोषित कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिमा चंद्राकर को यह खबर लगी कि उन्हें हटाकर ताम्रध्वज साहू को विधायक-प्रत्याशी बनाया गया है, तो वे बिफर पड़ीं। वे तुरंत ताम्रध्वज साहू के घर पहुंचीं जहां साहू समाज के लोग ताम्रध्वज के साथ बैठकर खुशी मना रहे थे।
इस मौके के बारे में चर्चा यह है कि प्रतिमा चंद्राकर ने अपनी निराशा और गुस्से के बीच ताम्रध्वज साहू को भला-बुरा कहा, और फिर प्रतीक के रूप में वे वहां पर थूककर लौट गईं। अब इस बात का कोई सुबूत तो चलन में नहीं है, लेकिन इसकी चर्चा बहुत है। लोग इसके साथ इसके पहले के चुनाव का तजुर्बा गिनाते हैं कि लोकसभा चुनाव में सरोज पांडेय ने किस तरह एक साहू को थप्पड़ मार दिया था, और वे पूरे प्रदेश में चुनाव हारने वाली अकेली भाजपा-उम्मीदवार बन गईं थीं। अब दुर्ग की कमजोरी की इस चर्चा के साथ एक दूसरी बात यह भी है कि वहां भाजपा के उम्मीदवार विजय बघेल भी कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिमा चंद्राकर की तरह कुर्मी समाज के हैं। इसलिए कुर्मी वोट तो दोनों तरफ बंटेंगे, लेकिन साहू वोट कांग्रेस या प्रतिमा के खिलाफ जाएंगे, ऐसा लोगों का अंदाज है। विजय बघेल के साथ भाजपा के बड़े नेताओं का यह अंदाज भी फायदे का है कि उनकी छवि सरोज पांडेय के विरोधी की है, और इसका उन्हें फायदा मिलेगा। लेकिन इन सब बातों के बीच यह बात अपनी जगह है कि दुर्ग की लोकसभा सीट वहीं से आने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और तकरीबन मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए ताम्रध्वज साहू दोनों का गृह जिला भी है, और इसके साथ-साथ कई दूसरी बातें भी पर्दे के पीछे चर्चा में हैं कि जीत और हार से किसका क्या नफा होगा, किसका क्या नुकसान होगा, और अगर कांग्रेस की हार हुई तो ठीकरा किस सिर फूटेगा। ताम्रध्वज इस सीट से अपने बेटे के लिए टिकट पाने को जान पर खेल गए थे, और अब उनके सामने यह दुविधा भी रहेगी कि जो साहू समाज उन्हें मुख्यमंत्री देखना चाह रहा था, उसे आज कैसे समझाएं, कितना समझाएं, और समझाएं तो क्यों समझाएं?

अब लडऩे का वक्त गया?
क्या पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और दिग्गज नेता बृजमोहन अग्रवाल में 'पैचअप' हो गया है, यह चर्चा पार्टी के अंदरखाने में हो रही है। दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंदिता रही है, लेकिन सरकार के पिछले कार्यकाल में कटुता बढ़ गई थी। एक दफा तो रमन, जलकी कांड की आड़ में बृजमोहन को कैबिनेट से बाहर करने के लिए भी तैयार बैठे थे। तब हाईकमान ने इसकी अनुमति नहीं दी। रमन के करीबी मानते हैं कि दोनों के बीच दूरियां बढ़ाने में 'सुपर सीएम' की अहम भूमिका रही है।  सरकार से हटने के बाद रमन सिंह की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 
अंतागढ़ प्रकरण में रमन सिंह खुद जांच के घेरे में आ गए हैं। नान मामले में भी अब तब घिर सकते हैं। दामाद पुनीत गुप्ता पुलिस से भागे-भागे फिर रहे हैं। ऐसे समय में बृजमोहन के उस बयान से रमन को झटका लगा, जिसमें उन्होंने पुनीत के खिलाफ जांच पर यह कह दिया कि सरकार अपना काम कर रही है। जबकि रमन, सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगा रहे थे। 
सुनते हैं कि बदली परिस्थितियों में रमन सिंह को बृजमोहन की जरूरत महसूस हुई है और दोनों के बीच दूरियां खत्म करने की पहल भी की गई। पिछले दिनों दोनों हेलीकॉप्टर में भाटापारा कार्यकर्ता सम्मेलन में साथ-साथ गए। दोनों के बीच काफी कुछ चर्चा की भी खबर है। इसके बाद रमन सिंह ने बृजमोहन के विधानसभा क्षेत्र रायपुर दक्षिण के कार्यकर्ता सम्मेलन में भी शिरकत की। काफी दिनों बाद वे बृजमोहन के क्षेत्र के किसी कार्यक्रम में गए।
हल्ला तो यह भी है कि जिस 'सुपर सीएम' की वजह दोनों के बीच दरार आई थी, उससे रमन सिंह ने किनारा कर लिया। जबकि 'सुपर सीएम' कुछ दिन पहले तक पूर्व सीएम को नान प्रकरण में कानूनी सलाह दे रहे थे। जांच रूकवाने में कामयाबी नहीं मिल पाई, तो सरकार के खिलाफ सड़क की लड़ाई लडऩा ही एकमात्र विकल्प रह गया है, ऐसे में बृजमोहन का साथ भी जरूरी है। वैसे भी अब सत्ता नहीं रह गई है। बेटे की टिकट कट गई, तो आपसी लड़ाई का कोई फायदा नहीं है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 02-Apr-2019

भाजपा की प्रचार सामग्री तैयार हो गई है और एक-एक कर सभी लोकसभा क्षेत्रों में पहुंचाई जा रही है। प्रचार सामग्री में पीएम मोदी का कटआऊट भी है। साथ ही डॉ. रमन सिंह के भी कटआऊट भेजे जा रहे हैं। सुनते हैं कि एक-दो लोकसभा क्षेत्र से डॉ. रमन सिंह का कटआऊट नहीं भेजने का आग्रह किया गया। रायपुर में भी चुनाव प्रबंधन से जुड़े लोगों की बैठक में डॉ. रमन सिंह का कटआऊट नहीं लगाने का सुझाव भी दिया गया। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि डॉ. रमन सिंह के खिलाफ मुहिम चल रही है और उनके दामाद की गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है। ऐसे में उनका कटआऊट-पोस्टर लगाने से चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

दिलचस्प बात यह है कि कभी डॉ. रमन सिंह पार्टी का मुख्य चेहरा हुआ करते थे। वर्ष-2008 और वर्ष-2013 का विधानसभा का चुनाव उन्हीं के चेहरे पर लड़ा गया था, और पार्टी को जीत हासिल हुई थी। पिछले लोकसभा चुनावों में भी डॉ. रमन सिंह राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के स्टार प्रचारक हुआ करते थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद पार्टी के लोग उनसे कन्नी काटने लग गए हैं। हाल यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्टार प्रचारकों की सूची में उनका नाम नहीं है जबकि मप्र के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान का नाम प्रमुखता से रखा गया है। फिलहाल मोदी के चेहरे और उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार कर वोट मांगे जा रहे हैं। इससे पार्टी को कितना फायदा होता है, यह देखना है।  फिलहाल तो हाल यह है कि भाजपा की राष्ट्रीय लीडरशिप ने छत्तीसगढ़ के सारे के सारे बल्ब एक साथ बदल दिए हैं, इसलिए चुनावी नतीजे भी यह साबित नहीं कर पाएंगे कि जीत के जिम्मेदार कौन रहेंगे, या हार का जिम्मा किसका रहेगा। छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार नीरज मिश्रा ने एक समाचार-विचार पोर्टल पर छत्तीसगढ़ का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि अमित शाह-नरेन्द्र मोदी ने इस राज्य को तीसरे और चौथे स्तर की भाजपा-लीडरशिप को परखने की प्रयोगशाला बनाया है। पहले और दूसरे स्तर की सारी लीडरशिप खारिज कर दी गई है। नीरज ने लिखा है कि अगली संसद में देश भर से भाजपा के ऐसे चेहरे रहेंगे जो कि सीधे मोदी-शाह की पसंद रहेंगे।

एक और आईना भेंट
एक-दूसरे को आईने भेंट करने का सिलसिला कुछ और आगे बढ़ा है। कांगे्रस पार्टी से जुड़े हुए एक प्रमुख चिकित्सक, डॉ. राकेश गुप्ता ने अजय चंद्राकर को एक आईना भिजवाया है, और ऑनलाइन खरीदी की रसीद ट्विटर पर पोस्ट करते हुए लिखा है- स्वास्थ्य मंत्री रहते आपकी चौकीदारी में सरकार का दामाद करोड़ों की हेराफेरी करके भाग गया है। अस्पताल को गिरवी रख देने के लिए छत्तीसगढ़ की जनता आपसे जवाब मांग रही है। तोहफे में आईना भिजवा रहा हूं, अपना मुंह देखकर जवाब दें।

दुधारी तलवार
पिछली भाजपा सरकार में प्रदेश के मंत्री रहे, बस्तर के नेता महेश गागड़ा ने आज फेसबुक पर लिखा है- लोकसभा चुनाव के बीच एक बात सभी वर्गों के बीच से सुनाई दे रही है कि लोकसभा चुनाव होने दो, तब पता चलेगा। बाप रे?

इस पर जब लोगों ने पूछा कि महेश गागड़ा का इशारा किस तरफ है तो उन्होंने जवाब दिया- प्रदेश सरकार की ओर से आहट है, उनसे जुड़े हुए लोगों का इशारा है। इस पर एक ने लिखा- आपके कार्यकाल में विकास तो हुआ, पर इन पन्द्रह वर्षों में आपके कार्यकर्ताओं में घमंड उफान पर था। केवल और केवल अपना व्यक्तिगत हित साधने के लिए कुछ लोगों ने पार्टी के नाम और जिम्मेदारी का गलत फायदा उठाया है। मतलब यह कि सोशल मीडिया दुधारी तलवार रहता है, आप कोई चर्चा तो छेड़ सकते हैं, लेकिन वह किस तरफ मुड़ जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। 

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Date : 01-Apr-2019

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नरेन्द्र मोदी को आईना भेजकर एक शुरूआत कर दी है। कुछ मिनटों के भीतर ही भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव ने सांसद अभिषेक सिंह को आईना भेज दिया और कहा कि अपना चेहरा देखें। आने वाले दिन जैसे-जैसे मतदान करीब आएगा, हो सकता है कि कई और भाजपा नेताओं को आईने मिलें। यह बात कुछ सौ रुपये के आईने के एवज में लाखों की शोहरत दिलाने वाली है, और भूपेश बघेल की पहल कल सुबह तक देश भर के मीडिया में कई जगहों पर अच्छी खासी जगह पा लेगी। अब भाजपा के नेता इसके मुकाबले, मैंभीचौकीदार, जैसा कोई अभियान शुरू करें तो अलग बात है वरना कांगे्रस के इस चुनावी औजार में जो कल्पनाशीलता है, वह मुफ्त में प्रचार पाने वाली है। 

नींद हराम होने का सामान
एक वक्त के छोटे कस्बे धमतरी से निकली हुई एक लड़की बीमा एजेंट बनकर मॉडलिंग और छत्तीसगढ़ी फिल्मों तक तो पहुंची, लेकिन लोगों को ब्लैकमेल करते हुए वह जेल भी पहुंच गई, और उसका रंग-ढंग ऐसा रहा कि भाई ने ही थककर उसका कत्ल कर दिया, और लाश ठिकाने लगाने में मां ने भी मदद की। अब उसके रायपुर के घर से पुलिस को जो तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग मिली हैं, उसके फोन पर जो मैसेज और कॉल डिटेल्स मिले हैं, वे जांच के दर्जनों करोड़पतियों के दरवाजे तक ले जाने वाले हैं। यह अलग बात है कि कातिल को पुलिस पकड़ा जा चुका बता रही है, लेकिन ब्लैकमेलिंग का जो बाकी सिलसिला है, उसका सामने आना बाकी है, और लोगों को यह भी अंदेशा है कि जिन हाथों में ब्लैकमेलिंग के लायक इतनी रिकॉर्डिंग है, उन हाथों से उसका बेजा इस्तेमाल भी हो सकता है। फिलहाल जिन लोगों ने इस युवती या इसके साथ की दूसरी युवतियों के साथ रातें जागते हुए गुजारी होंगी, अब वे फिक्र में रातें जागते हुए गुजार रहे हैं। 


Date : 31-Mar-2019

महासमुंद लोकसभा सीट हमेशा हाईप्रोफाइल रही है। यहां से दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल, दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री बृजलाल वर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सांसद रहे हैं। ये सब नेता राष्ट्रीय राजनीति में दखल रखते थे। इसी सीट से संत कवि पवन दीवान भी सांसद रहे जो कि पृथक छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन को चलाने वाले शुरूआती लोगों में से एक थे, और जनता पार्टी के दिनों में वे अविभाजित मध्यप्रदेश के जेल मंत्री थे। अपने साधू जैसे हुलिए की वजह से वे मंत्री बनते ही खूब खबरों में रहते थे। महासमुंद सीट पर बड़े नेताओं के लगातार लडऩे की वजह से यहां प्रचार में काफी खर्च किया जाता रहा है। पिछले चुनाव में चंदूलाल साहू ने अजीत जोगी को हराकर सबको चौंका दिया था। चुनाव में चंदूलाल साहू को निपटाने के लिए दर्जन भर दूसरे चंदूलाल साहू खड़े किए गए थे, और उन सबको मिलाकर आधा-पौन लाख वोट मिले भी थे। इस बार चंदूलाल चुनाव मैदान में नहीं हैं। भाजपा ने उनकी जगह चुन्नीलाल साहू को चुनाव मैदान में उतारा है। कांग्रेस से दिग्गज नेता पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू मुकाबले में हैं। 

धनेन्द्र और चुन्नीलाल, दोनों ही साहू समाज से हैं। वर्ष-2009 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनी थी। तब भाजपा से चंदूलाल और कांग्रेस से मोतीलाल साहू, चुनाव मैदान में थे। दोनों नेताओं ने एक तरह से मिलकर चुनाव लड़ा था। उन्होंने अघोषित रूप से प्रचार के नाम पर फिजूल खर्च को रोक दिया था। तब प्रचार के लिए पैसे की आस रखने वाले दोनों ही पार्टी के कार्यकर्ता काफी निराश थे और ग्रामीण इलाकों में नारा चर्चा में था कि लादेन न बुश, दोनों डहर साहू खुश। अब दस साल बाद फिर साहू आमने-सामने हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या इस बार पुराना नारा गूंजेगा। 

सबकी इज्जत रह गई
राजेश मूणत पार्टी की सरकार और अपना मंत्रीपद जाने के बाद कल पहली बार आक्रामक तेवर लेकर सामने आए। कांगे्रस पार्टी के एक पदाधिकारी ने कांगे्रस भवन से भाजपा कार्यालय तक घोटालों की बारात निकालने का एक नाटक किया था जिसमें घोड़ी सवार दूल्हे भी भ्रष्टाचार का प्रतीक बने चल रहे थे। सुबह-सुबह ही मूणत ने ट्विटर पर पोस्ट कर दिया था कि भाजपा कार्यालय आकर देखें, ऐसा जवाब दिया जाएगा कि आबर-बाबर सब याद आ जाएगा। चूंकि यह बारात एक मुस्लिम पदाधिकारी ने निकाली थी, इसलिए बाबर का उलाहना मायने रखता था। इसके बाद भाजपा के कार्यकर्ता अपने दफ्तर एकात्म परिसर के बाहर सड़क पर जूते लेकर बैठ गए थे कि बारात आए, तो उसका स्वागत करें। लेकिन पुलिस को सारे माहौल का अंदाज था, और उसने रास्ते में ही बारात का विसर्जन करवा दिया। राजेश मूणत की चेतावनी पर अमल की नौबत नहीं आई। राजनीतिक तनातनी के बहुत से ऐसे ही प्रदर्शन रहते हैं जिनमें पुलिस और फोटोग्राफर न हों, तो प्रदर्शन ही न हों, और न ही उनका जवाब हो। फिलहाल बारात निकलने से एक पार्टी की इज्जत रह गई, और स्वागत की असल नौबत न आने से दूसरी पार्टी की इज्जत रह गई। मीडिया और पुलिस अलग-अलग काम करते हुए भी कई लोगों की इज्जत बचाने का काम करते हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 30-Mar-2019

दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के मंझले पुत्र पूर्व संसदीय सचिव युद्धवीर सिंह सोशल मीडिया में ही ज्यादा सक्रिय हैं। उनकी अपने पिता की तरह जशपुर इलाके में अच्छी पकड़ है, लेकिन पार्टी से नाराजगी की वजह से खुद को एक तरह से किनारे कर लिया है। वे विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़े थे। उन्होंने अपनी जगह पत्नी को चुनाव लड़ाया। सुनते हैं कि उनकी नाराजगी का एक बड़ा कारण यह था कि डॉ. रमन सिंह ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया, जबकि इलाके के साथ-साथ आरएसएस के लोग भी उन्हें मंत्री के रूप में चाहते थे। खैर, अब वे ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, तो पार्टी को विशेषकर रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र में नुकसान का अंदेशा जताया जा रहा है। 

कहा तो यह भी जाता है कि दिलीप सिंह जूदेव यदि गोरखनाथ पीठ के प्रमुख महंत अवैद्यनाथ का सलाह मानते, तो योगी आदित्यनाथ की जगह युद्धवीर ही वहां के महंत होते। बात 90 के दशक की है। जूदेव, एक बार महंत अवैद्यनाथ से मिलने गोरखपुर गए। चर्चा के बीच महंत अवैद्यनाथ ने जूदेव से उनके परिवार का हाल-चाल पूछा। जूदेव ने उन्हें बताया कि उनके तीन बेटे हैं और वे स्कूल की पढ़ाई कर रहे हैं। इस पर महंत ने मंझले पुत्र युद्धवीर को पीठ में छोडऩे के लिए कहा ताकि यहां शिक्षा-दीक्षा लेकर आगे उन्हें तैयार किया जा सके। मगर, युद्धवीर पूरे परिवार के लाड़ले हैं और इस वजह से जूदेव, महंत का प्रस्ताव स्वीकार नहीं कर सके। बाद में अजय सिंह बिष्ट नाम के युवक को महंत ने शिक्षा-दीक्षा देकर तैयार किया जो कि आज योगी आदित्यनाथ के नाम से चर्चित हंै और गोरखपीठ के सर्वेसर्वा होने के साथ-साथ उत्तरप्रदेश के सीएम भी हैं। 

डीकेएस में इतने घपले कैसे हुए?
डीकेएस सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल के घोटाले में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता फंस गए हैं। पुलिस यहां-वहां उन्हें खोज रही है। अस्पताल के सर्वेसर्वा रहे डॉ. गुप्ता के खिलाफ ढेरों शिकायतें रही है। चूंकि पिछली सरकार में ससुरजी सीएम थे तो कोई आंख उठाकर अस्पताल की तरफ नहीं देखता था। पहले राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से अस्पताल के उद्घाटन का प्रस्ताव था, लेकिन वहां से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। इसके बाद केन्द्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा से उद्घाटन कराने की तैयारी की गई, वे तैयार भी हो गए थे, उन्होंने समय भी दे दिया था। लेकिन चर्चा है कि किसी ने अस्पताल में गड़बड़ी की खबर उन तक पहुंचा दी और वे पीछे हट गए। फिर किसी तरह डॉ. रमन सिंह और स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने उद्घाटन कर किसी तरह अस्पताल शुरू करवाया। सरकार बदलने के बाद जांच-पड़ताल भी आसान नहीं थी। क्योंकि कांग्रेस में भी डॉ. गुप्ता के अच्छे संपर्क हैं। अस्पताल में घपले-घोटाले का मामला लगातार उठा रहे डॉ. राकेश गुप्ता जब प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के पास पहुंचे तो कहीं जाकर जांच शुरू हो पाई। कुछ जानकार लोगों का यह मानना है कि रमन सिंह के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर ने जानबूझकर डीकेएस अस्पताल में अंधाधुंध और लापरवाही से सौ-दो सौ करोड़ खर्च करने का पूरा अधिकार गैरकानूनी तरीके से डॉ. पुनीत गुप्ता को दे दिया था जिससे उनके किए गलत काम दिखाकर अजय चंद्राकर डॉ. रमन सिंह को चुप रख सकें, और पंचायत-स्वास्थ्य जैसे मंत्रालय अपनी मर्जी से चला सकें।
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Date : 29-Mar-2019

प्रदेश के सारे भाजपा सांसदों की टिकट क्यों कटी, इसको लेकर पार्टी के भीतर कई तरह की चर्चा है। पार्टी के शीर्षस्थ नेता प्रदेश के नेताओं से काफी नाखुश बताए जा रहे हैं। सुनते हैं कि पीएम मोदी ने एक जगह सवालिया अंदाज में यह तक कहा कि छत्तीसगढ़ में कैसी सरकार चल रही थी कि चुनाव में बुरी हार से पार्टी कार्यकर्ता खुश हैं। जबकि मध्यप्रदेश और राजस्थान के कार्यकर्ता बहुमत नहीं मिल पाने से काफी दुखी हैं। 

प्रदेश के कई भाजपा सांसद रमन सरकार की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कैमरे पर अपनी नाराजगी का भी इजहार किया था, लेकिन पार्टी हाईकमान का सोचना था कि उन्होंने (सांसदों) ने भी अपनी जिम्मेदारी का ठीक से निर्वहन नहीं किया। ज्यादातर सांसद अपने लोकसभा क्षेत्र में पार्टी को बढ़त नहीं दिला पाए। उनकी परफार्मेंस रिपोर्ट भी अच्छी नहीं रही है। पीएम के बार-बार निर्देश के बाद भी रमेश बैस जैसे कई सांसद फेसबुक-ट्विटर से नहीं जुड़े थे। इसके बाद पार्टी हाईकमान ने जो फैसला लिया, वह अपने आप में अनोखा है। हाईकमान ने चुनावी हार-जीत की परवाह किए बिना सभी सांसदों की टिकट काट दी और भविष्य की राजनीति के लिए नई टीम तैयार करने के अपने इरादे भी साफ कर दिए हैं। 

पार्टी के भीतर एक चर्चा यह है कि पहले अभिषेक सिंह की टिकट कटना तय हुआ तो फिर पार्टी के दूसरे खेमे ने दिल्ली में कोशिश करके रमेश बैस की टिकट भी कटवा दी। फिर जब बृजमोहन अग्रवाल को रायपुर से टिकट मिलने की बात आई, तो रमन सिंह को भी नांदगांव से टिकट मिलने की चर्चा थी। इन दोनों को एक साथ रोकने के लिए दिल्ली में फिर एक पैमाना बना दिया गया कि किसी जीते-हारे विधानसभा उम्मीदवार को टिकट नहीं दी जाएगी, किसी रिश्तेदार को टिकट नहीं दी जाएगी, किसी मौजूदा सांसद को टिकट नहीं दी जाएगी। कुल मिलाकर हर खेमे की कोशिश यही रही कि पैमाने ऐसे बन जाएं कि अकेले उन्हीं की बेइज्जती न हो, पैमाने के तहत ऐसा हुआ है यह कहने का बहाना रहे।

कमल अभी कसावट से दूर
भाजपा ने सभी सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, लेकिन  कुछ प्रत्याशियों को अपने ही हाल पर छोड़ दिया गया है। मसलन, राजनांदगांव प्रत्याशी संतोष पाण्डेय का प्रचार तंत्र पूरी तरह बिखरा हुआ है। संतोष की छवि साफ सुथरे नेता की है और वे आरएसएस के पसंदीदा हैं। वे अच्छे वक्ता और संगठनकर्ता भी माने जाते हैं, लेकिन उन्हें पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के समर्थकों  का साथ नहीं मिल रहा है। 

वैसे तो, रमन सिंह के सांसद पुत्र अभिषेक सिंह उनके चुनाव संचालक हैं। पर टिकट कटने से वे दुखी बताए जा रहे हैं। चर्चा हैं कि अभिषेक को टिकट देने के लिए कवर्धा और राजनांदगांव जिले के पदाधिकारी गुपचुप हस्ताक्षर अभियान चला रहे थे, लेकिन सोशल मीडिया में लीक हो जाने के बाद अभियान बंद करना पड़ा। 

सुनते हैं कि रमन सिंह समर्थकों और संघ के लोगों के बीच शह-मात का खेल भी चल रहा है। चर्चा है कि पीएम मोदी की सभा सबसे पहले राजनांदगांव लोकसभा के डोंगरगढ़ में तय हुई थी। यह सभा सात तारीख को होने वाली थी, लेकिन कुछ प्रभावशाली नेताओं के कहने पर सभा स्थल राजनांदगांव के बजाए बालोद तय कर दिया गया। पार्टी के कुछ लोग इसको संतोष पाण्डेय को कमजोर करने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 28-Mar-2019

चर्चित मॉडल आंचल यादव की हत्या के आरोपियों का सुराग नहीं मिल पाया है, लेकिन घटना से विशेषकर फारेस्ट के कई अफसर  सहम गए हैं। सुनते हैं कि आंचल बीमा एजेंट भी थीं और एक साल में ही उसने करोड़ों का बिजनेस किया था। इसमें अफसरों-नेताओं ने भरपूर मदद की थी। हल्ला तो यह भी है कि मॉडल के चक्कर में एक आईएफएस अफसर गृहकलह से घिर गया था। बाद में किसी तरह उसने मॉडल से संबंध विच्छेद कर गृहकलह शांत किया। बारनवापारा के देव-हिल्स रिसार्ट में भी मॉडल को कई बार फारेस्ट के लोगों के साथ देखा गया। एक रेंजर ने जब मॉडल के खिलाफ ब्लैकमेलिंग की रिपोर्ट लिखाई, तो वह सुर्खियों में आई। चर्चा तो यह भी है कि प्रदेश के एक दिग्गज नेता के पुत्र से भी मॉडल के करीबी रिश्ते रहे हैं। हल्ला तो यह भी है कि नेता पुत्र दो-तीन साल पहले मॉडल के साथ गोवा ट्रिप पर भी जा चुके हैं। खैर, मॉडल के बीमा ग्राहकों की सूची सामने आती है, तो कई चौंकाने वाले नाम सामने आ सकते हैं। वैसे इस मॉडल की मौत के बाद उसका फेसबुक पेज बंद करने वाले भी कोई नहीं हैं, इसलिए उस पर सैकड़ों तस्वीरों और वीडियो में लोग उसके साथ किसी पब या बार में नाचते-गाते दिख रहे हैं, और जांच के लिए ये सारे सुबूत पुलिस के हाथ आसानी से लगे हुए हैं जिन्हें अब कोई मिटा भी नहीं सकता। उसने खुद अपने-आपको एक सोशल बटरफ्लाई लिखा है, और साथ ही लिखा है कि वह खतरों की कगार पर बिना किसी मलाल जीती है। 
बहुत से लोगों के साथ उसकी तस्वीरें और वीडियो हैं, और अब लोग उसके पेज पर उसके कत्ल की खबरों की कतरनें भी पोस्ट करते चल रहे हैं। एक वीडियो में वह रात की सुनसान सड़क पर किसी गाड़ी की रौशनी में एक दूसरी लड़की के साथ डांस करते दिख रही है। अगर कातिल जल्द नहीं पकड़े गए तो पुलिस के सामने पूछताछ के लिए बड़ी लंबी लिस्ट रहने वाली है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 27-Mar-2019

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के बेटे नितिन ने बलौदाबाजार विधानसभा क्षेत्र का चुनाव संचालक बनने की इच्छा जताई है। नितिन के प्रस्ताव से भाजपा के रणनीतिकार उलझन में हैं, क्योंकि नितिन ने कसडोल में अपने पिता के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी और वहां गौरीशंकर को रिकॉर्ड 52 हजार वोट से हार का सामना करना पड़ा। 
सुनते हैं कि विधानसभा चुनाव में बुरी हार के बाद नितिन कसडोल के बजाए बलौदाबाजार में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते हैं। कसडोल से सटे होने के कारण बलौदाबाजार उन्हें अनुकूल लग रहा है, मगर, पार्टी के लोग उन पर भरोसा नहीं जता पा रहे हैं। वजह यह है कि कसडोल के लोगों की नाराजगी अब तक खत्म नहीं हुई है और बलौदाबाजार में नितिन को प्रचार की कमान सौंपने से नुकसान भी हो सकता है। 
चूंकि नितिन को सौदान सिंह के पीए गौरव तिवारी का बेहद करीबी माना जाता है और पार्टी हल्कों में यह चर्चा है कि दोनों के बीच कारोबारी रिश्ते भी हैं। गौरव भाजयुमो के राष्ट्रीय पदाधिकारी भी हैं, ऐसे में नितिन की पार्टी के भीतर ताकत को देखकर उन्हें चुनाव संचालन के लिए मना करना मुश्किल भी हो रहा है। 

स्टार प्रचारकों की लिस्ट से गायब !
भाजपा ने अपने स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है। प्रचारकों में  पीएम मोदी, अमित शाह से लेकर भीमा मण्डावी तक कुल 40 नाम हैं। प्रचारकों में पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर और प्रेमप्रकाश पाण्डेय के नाम या तो छूट गए हैं या फिर जानबूझकर छोड़ा गया है। कंवर ने विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और धरमलाल कौशिक की जोड़ी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। 
उन्होंने प्रदेश प्रभारी डॉ. अनिल जैन से मिलकर दोनों के खिलाफ लंबी चौड़ी शिकायत भी की है। दूसरी तरफ कांगे्रसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मिलकर ननकीराम कंवर लगातार रमन सिंह के सबसे करीबी रहे अफसरों के खिलाफ तरह-तरह के जुर्म के आरोप लगाकर शिकायतें कर रहे हैं, और उनकी शिकायतों पर भूपेश बघेल इस रफ्तार से पुलिस जांच के आदेश दे रहे हैं जैसी रफ्तार ननकीराम कंवर ने कभी भाजपा सरकार ने भी नहीं देखी थी। हकीकत तो यह है कि ननकीराम की तमाम शिकायतें उन्हीं की पार्टी की सरकार में सिर्फ कचरे की टोकरी की शोभा बढ़ा पाई थीं। ऐसे में इस दिग्गज आदिवासी नेता का स्टार प्रचारकों की सूची से नाम गायब होना स्वाभाविक था। जबकि प्रेमप्रकाश पाण्डेय अभी भी संगठन के पसंदीदा नहीं बन पाए हैं। प्रचारकों में सुभाष राव का नाम है, जिन्हें कभी किसी ने चुनाव प्रचार करते नहीं देखा। उन पर कार्यालय में रहकर प्रबंधन की अहम जिम्मेदारी रहती है। खैर, मौजूदा हालत में प्रचारकों की सर्वमान्य सूची तैयार करना भी कठिन है। 

पार्टी में नहीं, पर समझ पूरी
एक वक्त भाजपा के महत्वपूर्ण पदाधिकारी रहे विरेंद्र पाण्डेय बरसों पहले पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने रायपुर के ताकतवर मंत्री राजेश मूणत के खिलाफ बागी उम्मीदवार होकर चुनाव लड़ा था। इसके बाद वे लगातार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में रमन सरकार को घेरते रहे, और कई तरह की जनहित याचिकाएं भी लगाते रहे। इन दिनों वे गोविंदाचार्य के बनाए एक राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं और खबरों से कुछ परे हैं। अभी एक समाचार चैनल, आईएनएच, ने एक बहस में उन्हें बुलाया कि भाजपा ने राज्य में 11 के 11 बल्ब जिस अंदाज में बदले हैं, उस पर उनका क्या कहना है? वे लंबे समय तक भाजपा में रहे और फिर विरोधी रहते हुए भी भाजपा को बारीकी से देखते रहे। इसलिए तमाम 11 लोकसभा सीटों पर उनका बारीकी से अंदाज भी सामने आया, और हर सीट, हर उम्मीदवार की संभावना पर उन्होंने बात रखी। घंटे भर से अधिक के इस कार्यक्रम के बाद समझ आया कि वे भाजपा से बाहर चाहे हों, वे भाजपा के बारे में जानकारी और समझ खूब रखते हैं, और किसी भी पार्टी को अपने विरोधियों की समझ का इस्तेमाल करने का भी कोई रास्ता निकालना चाहिए। भाजपा और विरेन्द्र पाण्डेय के सीधे बातचीत के रिश्ते नहीं रह गए हैं, लेकिन उम्मीदवारी घोषित होने के बाद इस चैनल ने जैसी जानकारी उनसे निकलवाई है, वैसा भाजपा के कोई रणनीतिकार पहले भी कर सकते थे। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 26-Mar-2019


लोकसभा टिकट की घोषणा के बाद भाजपा अंदरूनी कलह शांत करने की कोशिश में जुटी है। सरगुजा, कांकेर, रायगढ़ में प्रत्याशियों को दिक्कत भी हो रही है। सरगुजा में तेज तर्रार नेत्री रेणुका सिंह प्रत्याशी हैं, लेकिन पार्टी ने रामप्रताप सिंह को प्रभारी और भीमसेन अग्रवाल को चुनाव संचालक बना दिया है। हाल यह है कि भीमसेन की रेणुका सिंह से बोलचाल तक नहीं है। रामप्रताप सिंह पहले ही रेणुका के खिलाफ रहे हैं। अब बड़े नेताओं ने कुछ पहल की, तो मध्यस्थ के जरिए सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है।

कांकेर में भाजपा प्रत्याशी मोहन मंडावी के खिलाफ पूर्व विधायक सुमित्रा मारकोले ने मोर्चा खोल दिया है। उनके साथ पार्टी के असंतुष्ट नेता जुट रहे हैं। सुमित्रा को पार्टी छोड़ चुके पूर्व सांसद सोहन पोटाई समर्थन हासिल है। ऐसे में उन्हें समझाने में दिक्कत हो रही है। रायगढ़ का हाल भी कोई अच्छा नहीं है। रायगढ़ में पार्टी ने पहले गणेश राम भगत को चुनाव लडऩे के लिए तैयार रहने का संकेत दे दिया था, लेकिन जूदेव परिवार के विरोध के चलते उन्हें टिकट नहीं दिया गया। इससे उनके समर्थकों में नाराजगी है। भगत अभी तक मुंह फुलाए हैं और उन्हें समझाने की कोशिश हो रही है। फिर भी, पार्टी के लोगों को भरोसा है कि यहां रमन सिंह चुनाव नहीं लड़ रहे हैं और मोदी के नाम पर कुछ दिनों में सबकुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। 

बृजमोहन की वजह से भरोसा
रायपुर से सुनील सोनी की उम्मीदवारी से भाजपा के बृजमोहन अग्रवाल के खेमे में खुशी की लहर है। बृजमोहन ने उन्हें जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। सभी का मानना है कि अब जब बृजमोहन चुनाव संचालक हो गए हैं, तो साधन-संसाधन की कमी नहीं रहेगी। सुनते हैं कि बृजमोहन के चुनाव प्रचार की कमान संभालने से भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के लोग भी खुश हैं। बृजमोहन अपने विरोधियों का पूरा ख्याल रखते हैं। उनके लोगों ने कांग्रेस उम्मीदवार से असंतुष्ट-मददगार कांग्रेसियों की सूची बनानी भी शुरू कर दी है। इस बार सूची लंबी हो रही है, क्योंकि सभी 9 विधानसभा के लोग रहेंगे। लिहाजा, खर्च भी ज्यादा होगा। ये अलग बात है कि कुछ नेताओं ने सुनील सोनी को पहले ही चुनावी खर्च को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं। श्रीचंद सुंदरानी ने उन्हें कह दिया है कि तन-मन से पूरा साथ रहेगा। चूंकि वे खुद विधानसभा चुनाव में काफी कुछ खर्च कर चुके हैं, इसलिए वे धन नहीं उपलब्ध करा सकते हैं। खैर, सुनील सोनी चिंतित नहीं है, क्योंकि बृजमोहन वार्ड चुनाव में भी विधानसभा जितना खर्च करने की इच्छा रखते हैं और इसके लिए व्यवस्था भी खुद करते हैं। 
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Date : 25-Mar-2019

खबर है कि भाजपा के प्रत्याशी चयन में पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह की राय को महत्व नहीं दिया गया है। पहले फॉर्मूला बनाकर उनके सांसद पुत्र अभिषेक का पत्ता साफ कर दिया गया। वे खुद चुनाव लडऩा चाह रहे थे, लेकिन पार्टी हाईकमान ने उन्हें महत्व नहीं दिया। और तो और उनकी इच्छा के खिलाफ संतोष पाण्डेय को चुनाव मैदान में उतारा गया। जबकि वे रजिन्दरपाल सिंह भाटिया को प्रत्याशी बनवाना चाहते थे। विधानसभा चुनाव में बुरी हार से खफा हाईकमान ने सारे दिग्गजों को किनारे लगा दिया।

प्रत्याशी चयन में न सिर्फ डॉ. रमन सिंह बल्कि पार्टी की राष्ट्रीय महामंत्री सरोज पाण्डेय की भी नहीं चली। सरोज गुंडरदेही के पूर्व विधायक विरेन्द्र साहू को दुर्ग सीट से टिकट दिलवाना चाह रही थीं, लेकिन पार्टी ने उनके धुर विरोधी विजय बघेल को टिकट दे दी।  बस्तर में बरसों बाद कश्यप परिवार से बाहर प्रत्याशी तय किए गए। इसी तरह दिवंगत पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव के भतीजे राज्यसभा सदस्य रणविजय सिंह और छोटे पुत्र प्रबल प्रताप सिंह, दोनों ही कोरबा से टिकट चाह रहे थे। 

रणविजय सिंह की राज्यसभा सदस्यता का कार्यकाल एक साल से भी कम बाकी है। भाजपा विधायकों की संख्या इतनी कम है कि यहां से एक भी नेता को राज्यसभा में नहीं भेजा जा सकता। यह देखकर रणविजय और प्रबल प्रताप, दोनों ने ही कोरबा टिकट के लिए ताकत झोंक दी थी, लेकिन पार्टी ने उन्हें महत्व नहीं दिया। विधानसभा चुनाव में जशपुर जिले की तीनों सीटों में हार के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया गया। बिलासपुर सीट से पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल भी टिकट की आस में थे। वे अरूण जेटली सहित कई बड़े नेताओं से मिल भी आए थे। उन्हें टिकट देना तो दूर, उनका नाम पैनल में भी नहीं रखा गया। पार्टी ने संतोष पाण्डेय और सुनील सोनी जैसे चेहरों को आगे किया गया जो कि संगठन के लिए खूब मेहनत करते हैं। संकेत साफ है कि पार्टी यहां दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे लाना चाहती है। 

एक स्कूल कमाल की

रायपुर की कालीबाड़ी स्कूल के कई पूर्व छात्र इन दिनों प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं और लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। रायपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी महापौर प्रमोद दुबे और भाजपा प्रत्याशी पूर्व महापौर सुनील सोनी, दोनों ही कालीबाड़ी स्कूल से पढ़े हैं। यही नहीं, दुर्ग लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल भी रायुपर की कालीबाड़ी स्कूल के विद्यार्थी रहे हैं। लोकसभा के इन तीनों प्रत्याशियों से परे सरकार के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग और राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा ने भी कालीबाड़ी स्कूल से पढ़ाई की है। भाजपा के एक नौजवान मुखर नेता राजीव चक्रवर्ती ने भी स्कूल की पढ़ाई कालीबाड़ी स्कूल से की है, जबकि उनके पिता एएम चक्रवर्ती घोर वामपंथी हैं। अब राजीव चक्रवर्ती अपनी स्कूल का गौरवगान करने में लगे हुए हैं।
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Date : 24-Mar-2019

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में राज्य सरकार, उसकी जांच एजेंसियों, और जांच में फंसे हुए पिछली सरकार के कुछ अफसरों के बीच चल रही मुकदमेबाजी खासी खर्चीली है। दिल्ली से महंगे वकील विशेष विमानों में आ-जा रहे हैं, और अब अनायास सबकी दिलचस्पी इसमें अधिक हो गई है कि बिलासपुर में जल्द से जल्द हवाई अड्डा शुरू हो जाए। एक जानकार ने यह भी कहा कि ऐसे अफसरों के पास वकीलों की सुविधा सरकार से कहीं अधिक दिख रही है, और कुछ ऐसा ही हाल उनमें से कुछ अफसरों के बचने का भी दिख रहा है। हाईकोर्ट के जजों का रूख भी राज्य सरकार के लिए किसी रहमदिली का दिख नहीं रहा है, और जानकारों का कहना है कि आने वाले दिन भी कई वजहों से कुछ ऐसे ही रहने वाले हैं। मतलब यह कि सरकार को अपने हर फैसले और हर काम के लिए बारीक नुक्ताचीनी का सामना करना पड़ेगा, और जवाबदेह रहना पड़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोगों का यह भी कहना है कि पिछली सरकार के ऐसे कुछ चर्चित अफसर गिरफ्तारी की नौबत से बचने के लिए फिलहाल अघोषित रूप से कहीं-कहीं रह रहे हैं क्योंकि गिरफ्तारी होने पर जमानत पाने में भी कुछ दिन लग सकते हैं। फिलहाल राज्य की एक बड़ी जांच एजेंसी इस बात को बड़ी कामयाबी मान रही है कि पिछली सरकार के वक्त की जासूस-महिला अधिकारी की खबर लग गई है, और अब वह लगातार निगरानी में है।

रमन सिंह के आसपास
कुर्सी से हटते ही डॉ. रमन सिंह के इर्द-गिर्द मंडराने वाली अफसरों की टोली स्वाभाविक रूप से छंट गई है। कुछ पुराने लोग अभी भी साथ देखे जा सकते हैं। इनमें पूर्व खेल सलाहकार विक्रम सिसोदिया, ओपी गुप्ता हैं। पत्रकारों की सीडी मामले में उलझे अरूण बिसेन भी पूर्व सीएम के आगे-पीछे होते देखे जा सकते हैं। बिसेन ऑफिशियल तौर पर साथ नहीं हैं। सरकार बदलने के बाद जनसंपर्क विभाग में अनियमितता की जांच-पड़ताल चल रही है। 
कुछ लोगों का अंदाजा है कि देर-सवेर अरूण बिसेन भी इसके लपेटे में आ सकते हैं। इन चर्चित चेहरों के बीच एक और ठाकुर की इंट्री हुई है। नाम-डॉ. एसएस गहरवार। रायपुर दुग्ध महासंघ के पूर्व एमडी डॉ. एसएस गहरवार भी पूर्व सीएम के निवास में सक्रिय हो गए हैं। उनके जिम्मे पूर्व सीएम से लोगों को मिलाने-जुलाने का काम है। गहरवार पशु चिकित्सक के पद से एमडी तक पहुंचे। इसमें पूर्व सीएम की भी भूमिका अहम रही है। रिटायर होने के बाद उन्हें संविदा पर भी रखा गया था। अब ऐसे में बिना कोई पारिश्रमिक लिए गहरवार सेवा दे रहे हैं।

भाजपा में सब उम्मीद से
सांसदों को टिकट नहीं देने के फैसले के बाद भाजपा में दावेदारों की फौज खड़ी हो गई है। हाल यह है कि पंचायत स्तर के नेता भी लोकसभा की टिकट मांग रहे हैं। ऐसे ही आरंग इलाके का एक सरपंच अपने कुछ साथियों के साथ पिछले दिनों पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह से मिलने गया। सरपंच ने पूर्व सीएम को धन्यवाद दिया और कहा कि सांसदों को टिकट नहीं देने के फैसले के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के पक्ष में वातावरण बन रहा है। उन्होंने अपना बायोडाटा देते हुए कहा कि उनके जैसे को टिकट दी जाएगी, तो पार्टी की जीत सुनिश्चित है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पूर्व सीएम के निवास पर लोगों की आवाजाही बेहद कम हो गई थी, लेकिन जैसे ही यह संदेश गया कि लोकसभा चुनाव में पार्टी नए चेहरे को आगे लाएगी, टिकट के दावेदार उनके आसपास देखे जाने लगे हैं। 

जाकी रही भावना जैसी...
चुनाव में उम्मीदवार कैसे हों, यह सबके अपने-अपने नजरिए से तय होता है। जाति के आधार पर राजनीति करने वाले लोग खुद की उम्मीदवारी न होने पर अपनी जाति का उम्मीदवार ढूंढते हैं, ताकि जाति के भीतर दबदबा बना रहे, और आगे मौका आने पर लोगों को याद रहे कि नेताजी ने अपनी जाति को मौका दिलवाया था। दूसरी तरफ जिन लोगों को मुख्यमंत्री बनने की चाह रहती है, वे ऐसे उम्मीदवार चाहते हैं जो पार्टी के भीतर शक्ति परीक्षण होने की नौबत आने पर उनके साथ टिके रहें। फिर चाहे ऐसे उम्मीदवारों की जीत की संभावना थोड़ी कम ही क्यों न हो, वे उन्हें टिकट दिलाना चाहते हैं क्योंकि हर उम्मीदवार जीतता तो है नहीं, कम से कम जीते तो साथ रहे। अखबारों के रिपोर्टरों से पूछें तो वे ऐसे नेता की उम्मीदवारी की सिफारिश करते हैं जो मीडिया के साथ उठने-बैठने और अच्छे रिश्ते रखने में भरोसा रखते हैं। दूसरी तरफ मीडिया मालिकों से अगर बात करें, तो वे ऐसे उम्मीदवारों के नाम सुझाते हैं जिनके नाम के साथ चुनाव में अच्छे पैकेज की उम्मीद रहती है। मीडिया मालिकों की चले, तो वे हर पार्टी से हर सीट पर बड़े-बड़े पैकेज वालों के नाम सुझा दें क्योंकि चुनाव के वक्त महीनों तक आचार संहिता के चलते विज्ञापनों का जो सूखा छाया रहता है, उससे उबरने का भी कोई रास्ता तो होना चाहिए। फिलहाल एक संपादक ने एक अनौपचारिक दावत में एक गंभीर किस्म का मजाक करते हुए कहा- निन्यानबे फीसदी मीडिया मालिकों के चक्कर में एक फीसदी मीडिया मालिक नाहक ही बदनाम होते हैं!
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Date : 23-Mar-2019

जब कभी हिन्दुस्तान के सरकारी बैंकों की बात होती है तो लोग तरह-तरह से मखौल उड़ाने लगते हैं। एसबीआई के बारे में अनगिनत मजाक चलते हैं कि वहां जब जाएं, लंच ही चलते रहता है। अब इस अखबार के दफ्तर से इंटरनेट बैंकिंग से 20 मार्च की दोपहर कई लोगों के नाम रकम ट्रांसफर करने के लिए जोड़े गए। ऐसे में बैंक का कम्प्यूटर एक निर्धारित फोन पर ऐसे नाम जोडऩे के समय के साथ तुरंत ही एसएमएस भेजता है कि अगर यह नाम अकाऊंट चलाने वाले व्यक्ति ने नहीं जोड़ा है तो बैंक के होम पेज पर तुरंत ही अपने अकाऊंट को लॉक कर दें, और बैंक को तुरंत ही खबर करें। बीस तारीख की दोपहर दो बजे से तीन बजे के बीच जोड़े गए ऐसे कई नामों के एसएमएस आज 23 मार्च को दोपहर 12 बजे के बाद लगातार पहुंच रहे हैं। अब तीन दिन बाद कोई क्या तो अकाऊंट को लॉक कर दे, और क्या तो बैंक को खबर करे? 

पहले कटी, फिर मिली
जांजगीर-चांपा से गुहाराम अजगले को टिकट देने का फैसला आसान नहीं था। पहले उनकी टिकट सिर्फ इसलिए काटी गई कि परिसीमन के बाद उनका क्षेत्र (सारंगढ़) रायगढ़ लोकसभा में जुड़ गया है। यानी वे जांजगीर-चांपा लोकसभा के लिए बाहरी हो गए हैं। अब जब मौजूदा सांसद कमला पाटले की टिकट कटी, तो उन्हें इसलिए उम्मीदवार बनाया गया कि लोकसभा क्षेत्र के ज्यादातर हिस्सों के लोग उन्हें जानते हैं। 
गुहाराम अजगले यूपीए-वन यानी 2004 से 2009 तक सांसद रहे। गुहाराम यह खुलासा करने में संकोच नहीं करते कि उन्हें 22 जुलाई 2008 को यूपीए की तरफ से लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान सदन में अनुपस्थित रहने के लिए करोड़ों रुपये की पेशकश की गई थी। यह सब उस समय हुआ जब उनका गृह गांव परिसीमन के चलते जांजगीर-चांपा लोकसभा से बाहर हो गया था। ऐसे में उन्हें टिकट मिलने की संभावना कम थी। फिर भी वे प्रलोभन में नहीं आए और सदन में उपस्थित रहकर यूपीए सरकार के खिलाफ मतदान किया। ये अलग बात है कि यूपीए सरकार फिर भी बच गई। वे मानते हैं कि पार्टी अनुशासन में रहकर काम करते रहने के कारण उन्हें प्रत्याशी बनाया गया। 

जूदेव का खतरा देखकर
भाजपा में मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं देने के फैसले के बाद नए प्रत्याशी तय करने में पार्टी नेताओं को काफी मशक्कत करनी पड़ी। रायगढ़ सीट से पहले केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साय की जगह पूर्व मंत्री गणेशराम भगत का नाम तय किया गया था, लेकिन जशपुर राजघराने के युवराज युद्धवीर सिंह ने आंखें तरेरीं तो पार्टी नेताओं को फैसला बदलना पड़ा। युद्धवीर की पसंद पर पार्टी ने गोमती साय को टिकट दी। 
विधानसभा चुनाव में जशपुर की सीटों पर युद्धवीर को महत्व न देकर  उनके चचेरे भाई राज्यसभा सदस्य रणविजय सिंह के सुझाव पर प्रत्याशी तय किया गया था। फिर क्या था युद्धवीर ने बागी उम्मीदवार खड़े कर दिए। तीनों सीटों पर पार्टी को हार का मुख देखना पड़ा। भाजपा नेताओं को यह साफ हो गया कि जशपुर में दिलीप सिंह जूदेव के बाद युद्धवीर की ही पकड़ है। ऐसे में उनकी राय को अनदेखा करना जोखिम भरा था। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 20-Mar-2019

पंद्रह साल राईस मिल एसोसिएशन का चेयरमैन रहने के बाद योगेश अग्रवाल ने अपना पद छोड़ दिया। योगेश की भाजपा सरकार में तूती बोलती थी। वे भाजपा के ताकतवर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के छोटे भाई हैं। वैसे तो उनके खाद्य मंत्री मोहम्मद अकबर से भी उनकी पुरानी जान-पहचान है। योगेश, अकबर को खाद्य विभाग मिलते ही बड़ा गुलदस्ता लेकर बधाई देने गए थे। अब सरकार नहीं रही, तो कारोबार पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। कारोबारी हितों के लिए नए सिरे से जुगाड़ बिठाना जरूरी है। ऐसे में योगेश ने कारोबारी नेतागिरी से थोड़ा ब्रेक ले लिया, तो गलत नहीं कहा जा सकता। दूसरी तरफ चेंबर हो या कोई दूसरा उद्योग-व्यापार संगठन, ऐसा माना जाता है कि सत्ता के साथ संबंध ठीक न हों तो सिर्फ पदाधिकारियों का नहीं, सभी का बड़ा नुकसान होता है, और कारोबार के हित में सरकार की नीतियां नहीं बनवाई जा सकतीं। आज की पीढ़ी को याद नहीं होगा कि एक वक्त कांगे्रस के सबसे करीबी रहने वाले चावल कारोबारी संगठन के नेता नेमीचंद श्रीश्रीमाल प्रदेश के राईस किंग कहे जाते थे, और मुख्यमंत्री जब भोपाल से पहली बार रायपुर आते थे तो रामसागर पारा में नेमीचंद के घर चांदी की थालियों में उनकी दावत होती थी, और प्रदेश सरकार की चावल नीति बनवाने में सेठजी कहे जाने वाले नेमीचंद श्रीश्रीमाल का खासा दखल रहता था। वैसे दबदबे और पहुंच-असर वाला कोई दूसरा व्यापारी-नेता बाद में हुआ ही नहीं।

ऐसों के राज में राष्ट्रीय खेल?
रायपुर में राष्ट्रीय खेल का आयोजन होना है, लेकिन खेल विभाग फिलहाल इसके लिए तैयार नहीं दिख रहा है। खेल संघों के प्रतिनिधि  विभाग के कई लोगों के काम से संतुष्ट नहीं हैं। विशेषकर दो आला अफसरों के खिलाफ तो अलग-अलग स्तरों पर शिकायतें भी हुई है। सुनते हैं कि शिकायतों पर दोनों का तबादला भी हुआ था, लेकिन वेे रूकवाने में सफल रहे। ये दोनों अफसर पिछली सरकार में भी बेहद पावरफुल रहे। चूंकि तत्कालीन सीएम खुद खेल संघों से जुड़े थे।  खेलकूद आयोजनों के चलते इन दोनों की सीएम हाऊस में भी पूछ परख होती थी। दोनों ने इसका जमकर फायदा भी उठाया। सरकार बदलने के बाद दोनों पर नकेल कसने की कोशिश भी हुई, लेकिन जल्द ही वे अपने संपर्कों के जरिए पुरानी हैसियत में आ गए। चर्चा है कि खेल संघों से जुड़े लोग दोनों के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा सीएम को देने वाले हैं। इन लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि राष्ट्रीय खेलों का आयोजन होना है और विभाग में साफ-सुथरी छवि के लोगों को महत्व नहीं मिलेगा, तो इसका सीधा असर आयोजनों पर पड़ सकता है। 
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Date : 19-Mar-2019

सत्ता खोने के बाद विपक्ष के दमदार नेता भी किसी न किसी बहाने नई सरकार के करीब होने की जुगत में हैं। इन्हीं में से एक पूर्व विधायक श्रीचंद सुंदरानी भी हैं, जो पिछले दिनों सीएम भूपेश बघेल से चेट्रीचंड महोत्सव में आमंत्रण के बहाने गुपचुप मिल आए। सुंदरानी भाजपा के मुख्य प्रवक्ता हैं और वे टीवी चैनलों में अक्सर भूपेश सरकार के खिलाफ आग उगलते देखे-सुने जा सकते हैं। अब जब सुंदरानी की सीएम से मेल-मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हुई है, तो भाजपा से जुड़े लोग इस पर तीखी प्रतिक्रिया भी जता रहे हैं। 

सुंदरानी से पहले एक अन्य भाजपा प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास ने सीएम से अकेले में मुलाकात की कोशिश की थी, तो उन्हें कड़ी फटकार सहनी पड़ी। चर्चा है कि सुंदरानी ने पिछले दिनों सिंधी समाज के मंच से सीएम के स्वागत की इच्छा भी जताई थी, लेकिन आयोजकों ने उन्हें आगे आने नहीं दिया। दिग्गज भाजपा नेताओं की सरकार से करीब रहने की इच्छा के पीछे कारोबारी वजह भी है।
 सुनते हैं कि श्रीचंद का परिवार मोबाइल कारोबार से जुड़ा है। माइक्रोमैक्स मोबाइल के वितरक भी हैं। पिछली सरकार ने माइक्रोमैक्स मोबाइल मुफ्त बांटी थी। श्रीचंद अप्रत्यक्ष रूप से मुफ्त मोबाइल वितरण योजना से जुड़े रहे हैं। सरकार बदलते ही इस पूरी योजना में अनियमितता को लेकर जांच बिठा दी गई है। श्रीचंद के परिवार पर सीधे आंच भले न आए, लेकिन कंपनी मुश्किल में पड़ गई है। इस तरह के विवाद बिना सरकार के सहयोग के नहीं निपट पाएंगे। ऐसे में श्रीचंद के सीएम से मेल-मुलाकात को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। 

होली भी सुविधानुसार
शहरों में कामकाजी दंपत्ति अब अपने बच्चों का जन्मदिन या शादी की सालगिरह जैसा आयोजन रविवार को करने लगे हैं। क्योंकि दोनों की छुट्टी होती है, अलग से छुट्टी नहीं लेनी पड़ती फिर आमंत्रित कामकाजी परिचितों-रिश्तेदारों को भी इस दिन आने में सहूलियत होती है, यानी सहूलियत को देखकर आयोजन। आज की इस भागमभाग में यह एक तरह से अच्छा भी है, लेकिन गांव-देहातों में होली जैसा पर्व भी सहूलियत से मनाया जाने लगा है इसकी जानकारी शायद बहुत कम को होगी।
बसना-सरायपाली के गांवों में होली कल बुधवार को मनाई जा रही है। आज रात को होलिका दहन होगा। एक दिन पहले मनाने का कारण भी दिलचस्प है। दरअसल होली गुरुवार को है और इस दिन कई हिंदू परिवार दारू-मुर्गा, मटन-मछली नहीं खाते हैं। गांवों में इस दिन बकरा कट नहीं सकता,  शराब भी नहीं पी सकते। इसलिए यहां के गांवों में अक्सर फुसपुन्नी भी गुरुवार को नहीं मनाया जाता, इसके आगे या फिर पीछे मनाया जाता है। इस बार होली भी गुरुवार की चपेट में आ गया लिहाजा इसे एक दिन आगे मनाया जा रहा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


Date : 18-Mar-2019

पूर्व सीएम अजीत जोगी कोरबा से चुनाव मैदान में उतरेंगे। यह घोषणा उनके बेटे और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने की है। पर वाकई अजीत जोगी चुनाव लड़ेंगे, इसमें संदेह जाहिर किया जा रहा है। क्योंकि पहले भी वे चुनाव लडऩे की घोषणा कर पलट चुके हैं। विधानसभा चुनाव में रमन सिंह के खिलाफ चुनाव लडऩे की घोषणा भी की थी। अपनी बहू ऋचा जोगी को चुनाव संचालक भी बना दिया था, पर बाद में वे पीछे हट गए। इसी तरह कसडोल से चुनाव लडऩे की घोषणा कर गौरीशंकर अग्रवाल को भी डरा चुके हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद से जोगी की हैसियत घटी है।
हाल यह है कि कांग्रेस के नेता कोरबा से चुनाव लडऩे की घोषणा को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं और न ही उनसे किसी तरह की दोस्ती रखना चाहते हैं। इसके उलट जोगी के तीन विधायक तो पार्टी छोडऩे के लिए तैयार बैठे हैं। यानी जोगी पार्टी को कांग्रेस से किसी तरह मोल-भाव की गुंजाइश नहीं दिख रही है। अलबत्ता, उनके करीबी लोग चाहते हैं कि जोगी चुनाव न लड़कर धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एकजुट होने का हवाला देकर कांग्रेस को ही समर्थन दे दें। जनता कांग्रेस विधायक दल के नेता धर्मजीत सिंह को बिलासपुर से चुनाव लडऩे के लिए कहा गया है, लेकिन वे असमंजस में हैं क्योंकि उनकी जीत की संभावना नहीं है। ऐसे में अंतिम क्षणों में जोगी-धर्मजीत चुनाव मैदान से हट जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। जोगी के कई शुभचिंतकों का मानना है कि कांग्रेस के साथ आगे किसी भी तरह के तालमेल का रास्ता झुककर ही तय किया जा सकता है, कांगे्रस को नुकसान पहुंचाकर नहीं।

रमन सिंह सुनते सबकी हैं पर...
भाजपा के अंदरखाने में पार्टी के कई प्रभावशाली नेता पूर्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय को टिकट दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर इसकी अगुवाई कर रहे हैं। सुनते हैं कि पिछले दिनों पार्टी दफ्तर में वे पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह का हाथ पकड़कर अलग कमरे में ले गए। वहां पहले से ही बृजमोहन अग्रवाल, धरमलाल कौशिक, नारायण चंदेल, शिवरतन शर्मा मौजूद थे। सबने एक सुर में प्रेमप्रकाश की टिकट के लिए रमन सिंह का समर्थन मांगा। सब दिग्गजों को साथ देखकर उन्होंने तुरंत इसके लिए हामी भर दी। पर कई लोगों को रमन सिंह की भूमिका पर अभी भी शंका है। 
वे पिछले 15 साल में कईयों को छका चुके हैं। सुनते हैं कि नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान अजय चंद्राकर से लेकर ननकीराम तक सबको समर्थन करने का वादा किया था, लेकिन चयन की बारी आई, तो वे पार्टी हाईकमान के कान में धरमलाल कौशिक का नाम फूंककर आ गए। कौशिक के नाम का जब ऐलान हुआ तो कई विधायकों ने रमन सिंह को भी खरी-खोटी सुनाई। अब लोकसभा प्रत्याशी चयन में उनका रूख किस तरह का होता है, यह देखना है। 

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Date : 17-Mar-2019

जोगी पार्टी के अधिकांश नेता कांग्रेस में शामिल होना चाहते हैं और वे इसके लिए जी-तोड़ मेहनत भी कर रहे हैं। मगर, कांग्रेस के नेता गंभीर नहीं है और उन्हें मजाक में ले रहे हैं। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी लंबे समय तक जोगी के साथ रहे हैं। स्वाभाविक तौर पर जोगी पार्टी के ज्यादातर नेता उन्हीं के संपर्क में बताए जाते हैं। 
सुनते हैं कि पिछले दिनों जोगी पार्टी के पदाधिकारियों ने कांग्रेस प्रवेश की इच्छा जताई, तो उन्होंने अजीब सुझाव दे दिया। शैलेष ने कहा बताते हैं, आप लोग नई पार्टी का गठन कर लो। चुनाव में अच्छा प्रदर्शन रहा, तो सम्मानजनक ढंग से कांग्रेस में विलय हो जाएगा। इससे कांग्रेस में उन्हें महत्व भी मिलेगा। शैलेष की बातें सुनकर जोगी पार्टी के नेता मायूस हो गए। 
कुछ इसी तरह का वाक्या जोगी पार्टी के कुछ नेताओं के साथ हुआ जब ये नेता, मंत्री मोहम्मद अकबर से मिलने गए। उन्होंने अकबर से कहा कि वे आना चाहते हैं। बताते हैं कि अकबर ने मजाकिए लहजे में उनसे कहा कहां आना चाहते हैं। कहां से कहां, किसका तबादला चाहते हैं? नेताओं ने कहा कि वे तबादले के लिए नहीं, कांग्रेस में शामिल होने आए हैं। इस पर अकबर ने गंभीर मुद्रा में कहा कि अभी नहीं, कांग्रेस में वैसे ही ओवर-फ्लो है। कुछ समय इंतजार कीजिए, अपनी जमीन मजबूत कीजिए तब कांग्रेस में शामिल किया जाएगा। 

कश्यप बंधुओं की आर्थिक ताकत
बस्तर भाजपा में दिवंगत बलीराम कश्यप का दबदबा रहा है। बलीराम के गुजरने के बाद भी उनके परिवार की हैसियत में कोई कमी नहीं आई। उनके एक बेटे दिनेश सांसद हैं और केदार 15 साल मंत्री रहे, लेकिन विधानसभा चुनाव में हार के बाद कश्यप परिवार की ताकत पार्टी के भीतर घटी है। कम से कम प्रत्याशी चयन प्रक्रिया के दौरान जिस तरह कश्यप बंधुओं के खिलाफ विरोध के स्वर सुनाई दिए, उससे ऐसा ही लगता है। 
सुनते हैं कि बस्तर लोकसभा अंतर्गत सात जिलों के अध्यक्षों ने दिनेश या फिर केदार की जगह किसी नये चेहरे को टिकट देने की वकालत की है। इनमें से एक जिला अध्यक्ष ने तो खुद को योग्य प्रत्याशी बताया है। ऐसे में बस्तर में किसी एक के नाम पर सहमति बनाना पार्टी के रणनीतिकारों के लिए कठिन हो चला है। आरएसएस ने पूर्व मंत्री महेश गागड़ा का नाम आगे किया है, तो संगठन में हावी खेमा लता उसेंडी को प्रत्याशी बनाना चाहता है। इन सबके बावजूद कश्यप बंधु एक बड़ी आर्थिक ताकत भी हैं। ऐसे में उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। 
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Date : 16-Mar-2019

आमतौर पर जनहित याचिकाओं में जांच की मांग होती है। राज्य बनने के बाद विपक्ष के नेता रहे क्रमश: नंदकुमार साय, महेंद्र कर्मा, टीएस सिंहदेव भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के प्रकरणों पर कार्रवाई न होने अदालत की शरण में गए थे। साय ने तत्कालीन सीएम अजीत जोगी पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर चुनाव लडऩे का आरोप लगाया था और इसको लेकर अभी तक अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। 
कर्मा तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ पुष्पस्टील को नियम विरूद्ध खदान आबंटन पर जांच की मांग को लेकर अदालत गए थे। सिंहदेव भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा अगुस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद में अनियमितता पर जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में लड़ाई लड़ी। प्रदेश में सत्ता गंवाने के बाद विपक्षी भाजपा भी सरकार के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ रही है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक भी हाईकोर्ट गए हैं, लेकिन भ्रष्टाचार की जांच नहीं, बल्कि रोकने गए हैं। कौशिक ने नान घोटाले की एसआईटी जांच को ही गलत ठहराया है। पिछले दिनों कौशिक की याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई भी हुई।
 कौशिक चाहते थे कि जांच रोकी जाए, लेकिन सरकार की पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पी. चिदम्बरम ने कौशिक की याचिका पर तंज कसा, कि पहली बार जनहित याचिका देख रहे हैं, जिसमें भ्रष्टाचार की जांच रोकने की मांग की गई है। जबकि जनहित याचिकाओं में जांच की मांग होती है। चिदम्बरम की तर्कों का प्रतिफल यह रहा कि नान घोटाले की जांच रोकने की तमाम कोशिशें सफल नहीं हो पाई। 29 अप्रैल को अगली सुनवाई होगी।  

अब दूसरे अस्पताल की बारी
सरकार बदलते ही सत्ता प्रतिष्ठानों में भी बदलाव हुआ। कई बदले गए और कुछ प्रक्रियाधीन है। सीएस, डीजीपी और पीसीसीएफ के बाद निचले क्रम में कई अहम पदों पर नई पदस्थापना हुई है। इससे परे सुपरस्पेशलिटी डीकेएस अस्पताल अधीक्षक पद से पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता को हटाया गया। अब मेकाहारा के अधीक्षक डॉ. विवेक चौधरी को बदलने की चर्चा चल रही है। 
वैसे डॉ. चौधरी बेहद काबिल डॉक्टर माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ के आसपास के प्रदेशों में भी उनके जैसा कैंसर विशेषज्ञ दूसरा नहीं है। बावजूद उनके खिलाफ यह शिकायत चर्चा में है कि वे पीते हैं। सुनते हैं कि डॉ. चौधरी को हटाने का प्रस्ताव तैयार भी हो गया था। स्वतंत्रता सेनानी डॉ. महादेव पांडेय के पुत्र डॉ. राजीव पांडेय को अधीक्षक बनने का प्रस्ताव भी तैयार हो गया। फाइल आगे बढ़ी, तभी उनका सीआर खंगाला गया। डॉ. पांडेय का 11 साल का सीआर ही नहीं मिला। वे पहले रमेश बैस के केंद्रीय मंत्री रहते उनके निजी चिकित्सक थे। इसके बाद अलग-अलग जगहों पर पदस्थ रहे। अब सीआर नहीं था तो आगे की प्रक्रिया रूक गई। डॉ. चौधरी की जगह नए अधीक्षक के लिए फाइल दौड़ रही है। इसमें डॉ. फुलझेले का नाम सबसे ऊपर बताया जा रहा है। फिर भी कुछ लोग लगे हैं कि डॉ. चौधरी को ही रहने दिया जाए। चुनाव आचार संहिता हटने के बाद इसको लेकर फैसले की उम्मीद है। 

अब किस मुंह से मना करें?

कांग्रेस ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया के बेटे को बाराबंकी सीट से प्रत्याशी बनाया है। अब पुनिया को उन नेताओं को टिकट देने से मना करना मुश्किल हो गया है, जो कि अपने बेटे-रिश्तेदारों के लिए टिकट मांग रहे थे। इनमें कैबिनेट मंत्री ताम्रध्वज साहू अपने दुर्ग लोकसभा क्षेत्र से अपने बेटे के लिए टिकट चाह रहे हैं। पूर्व मंत्री अमितेश शुक्ला अपने पुत्र भवानीशंकर और धनेंद्र साहू अपने पुत्र प्रवीण की टिकट के लिए प्रयासरत हैं। इसी तरह  पूर्व विधायक देवती कर्मा भी अपने पुत्र छविंद्र या दीपक के लिए टिकट चाहती हैं। सुनते हैं कि पुनिया ने फिलहाल सभी को आश्वासन देकर शांत करने की कोशिश की है, लेकिन वे अपने बेटे की तरह दूसरों के लिए कितना कुछ कर पाते हैं, यह देखना है। 

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Date : 15-Mar-2019


सरकार बदलते ही आधा दर्जन से अधिक आईएफएस अफसर अपने मूल विभाग में भेज दिए गए। यह फैसला कोई गलत भी नहीं था।  सरकार ने वन विभाग की बेहतरी के लिए ऐसा किया। वन विभाग में लौटने वालों में वर्ष-90 बैच के आईएफएस अफसर संजय ओझा भी हैं, जो कि दिल्ली में आवासीय आयुक्त पद पर थे। वैसे तो आवासीय आयुक्त का पद आईएएस के कैडर का है, लेकिन ओझा की पदस्थापना करते समय इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया था। 
खैर, ओझा एपीसीसीएफ स्तर के अफसर हैं। भाजपा सरकार आने के बाद सीनियर आईएएस डॉ. कल्याण चक्रवर्ती केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए, तो ओझा को भी प्रतिनियुक्ति पर साथ ले गए थे। संजय ओझा ने लंबे समय तक केन्द्र सरकार में काम किया। केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से वापस लौटे, तो ओझा के आग्रह पर पिछली सरकार ने उन्हें दिल्ली में ही रहने दिया। दरअसल, उनकी माता बीमार रहती हैं और उनका दिल्ली के अस्पताल में इलाज चल रहा है। यहां लौटने पर वन मुख्यालय में पोस्टिंग हो गई। वे केन्द्र सरकार में संयुक्त सचिव पद के लिए सूचीबद्ध तो हो चुके थे, जल्द ही उनकी पोस्टिंग भी तय हो गई। केन्द्र सरकार ने संजय ओझा को रिलीव करने के लिए राज्य सरकार को पत्र भेजा। 
सुनते हैं कि सीएम भूपेश बघेल को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने बाकायदा नोटशीट पर इसके लिए अनुमति दे दी। अब विभाग को मात्र रिलीव करना था, लेकिन रिलीविंग की फाइल अफसरों के बीच घूमती रही। संजय ओझा मिन्नतें करते रहे कि उनकी माता बहुत बीमार है और उनकी देखरेख करने के लिए दिल्ली में रहना जरूरी है। वे यहां-वहां रिलीविंग के लिए घूमते रहे। रिलीव न होने पर दो दिन पहले केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति निरस्त हो गई।
यह अफसरशाही का अनोखा नमूना है जिसमें सीएम-मिनिस्टर से लेकर सीएस तक उन्हें केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की अनुमति देना चाह रहे थे, पर उन्हें रिलीव नहीं किया गया। जबकि हाल यह है कि कई सीनियर आईएफएस अफसरों के पास कोई काम नहीं है। अरण्य भवन में कई आला अफसर दो महीने से खाली बैठे हैं।  

पार्ट-2
कुछ दिन पहले रिटायर हुए आईएफएस अफसर पीसी मिश्रा को ग्रामीण विकास का जानकार माना जाता है। वर्ष-85 बैच के अफसर मिश्रा केन्द्रीय ग्रामीण विकास विभाग में काम कर चुके हैं। उन्होंने केन्द्र सरकार में रहते छत्तीसगढ़ के लिए कई योजनाओं को मंजूरी दिलाई। मिश्रा जब प्रतिनियुक्ति से लौटे, तो उनकी पोस्टिंग पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में की गई। वे हर मर्ज की दवा थे। कलेक्टर हो या जिला पंचायत सीईओ, मिश्रा हर किसी को मार्गदर्शन देते थे। वे सबसे ज्यादा लंबे समय तक ग्रामीण विकास विभाग में काम करने वाले अफसर रहे। विभाग में कई घपले-घोटाले भी हुए, लेकिन मिश्रा के दामन पर कभी दाग नहीं लगे। 
सरकार बदलने पर वे विभाग में लौटे तो उन्हें पीसीसीएफ पद पर पदोन्नत होने की उम्मीद थी क्योंकि उनके बैच के राकेश चतुर्वेदी, कौशलेन्द्र सिंह पीसीसीएफ हो चुके थे। अगले तीन महीने में पीसीसीएफ स्तर के चार अफसर रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में उन्हें एपीसीसीएफ से पीसीसीएफ के पद पर पदोन्नत करने में कोई तकनीकी अड़चन भी नहीं थी। पर विभाग ने ऐसी उदारता नहीं दिखाई। पिछले दिनों उनके रिटायरमेंट पर विभाग के अफसरों ने फेयरवेल पार्टी दी, तो मिश्रा का दर्द झलक उठा। 
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