राजपथ - जनपथ

28-May-2019 (28)

भारतीय चुनावी राजनीति इतने दिलचस्प रहती है कि उस पर रोजाना अनगिनत लतीफे बनते हैं, और लाखों लोगों को मौका मिलता है कि वे उन्हें अपने नाम से आगे बढ़ाते चलें। अब हरियाणा को लेकर एक लतीफा तीन दिन पहले सामने आया, और उसके देखा-देखी लोगों ने बाकी प्रदेशों पर भी ऐसे लतीफे गढ़ लिए।
हरियाणा
हरियाणा के बारे में किसी मजेदार इंसान ने लिखा- 
सुरजेवाला खुश है कि हुड्डा नाम का कांटा निकाल दिया। 
हुड्डा खुश है कि अशोक तंवर हार गया।
अशोक तंवर खुश है कि शैलजा हार गई।
शैलजा खुश है कि कुलदीप विश्नोई का बेटा हार गया। 
कुलदीप विश्नोई खुश है कि सारी चौटाला फैमिली हार गई।
चौटाला फैमिली खुश है कि राहुल गांधी भी हार गया। 
नवीन जिंदल खुश है कि चुनाव नहीं लड़ा। 
हारी गई तमाम सीटों पर बाकी कांग्रेसी खुश हैं कि अगली बार उनकी बारी उम्मीदवारी के लिए आ सकती है।
कुल मिला के हरियाणा में खुशी का माहौल है।
मध्यप्रदेश
इसके बाद किसी ने मध्यप्रदेश के ऊपर इसे ढाल दिया और लिखा-
कमलनाथ खुश हैं कि दिग्विजय और ज्योतिरादित्य दोनों निपट गए, और अपना बेटा किसी तरह खींचतान कर निकल गया।
दिग्विजय सिंह खुश हैं कि ज्योतिरादित्य चुनाव में निपट गया, और कमलनाथ का पूरा प्रदेश निपट गया, और राहुल गांधी के सामने बेटे की वजह से कमलनाथ खुद भी निपट गया।
ज्योतिरादित्य खुश हैं कि दिग्विजय भी निपटे, और मुख्यमंत्री की हैसियत से कमलनाथ भी। पार्टी अध्यक्ष की हैसियत से भी कमलनाथ निपट गए, और अर्जुन सिंह का बेटा राहुल भी निपट गया। आखिर में उनके खुद के अध्यक्ष बनने के आसार भी आ गए।
दिग्विजय, ज्योतिरादित्य, राहुल सिंह, सभी खुश हैं कि कमलनाथ के बेटे की लीड एकदम शर्मनाक है, और मुख्यमंत्री पर पुत्रमोह में अंधे होने की तोहमत कांग्रेस कार्यसमिति में लगी है।
ये सभी नेता खुश हैं कि राहुल गांधी भी हार गए, और अब किसी का भी कुछ बोलने का मुंह बचा नहीं है, और अगर नया कांग्रेस अध्यक्ष बनना है तो हर कोई अपनी बारी मानकर चल रहा है।
कांग्रेस के सभी उम्मीदवार खुश हैं कि बाकी सभी 28 में से 27 उम्मीदवार भी हार गए हैं, और अकेले वे नाकामयाब नहीं रहे।
हारी गई तमाम सीटों पर बाकी कांग्रेसी खुश हैं कि अगली बार उनकी बारी उम्मीदवारी के लिए आ सकती है।
कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव रिजल्ट के बाद से मध्यप्रदेश में सभी कांग्रेस नेता खुश हैं, और चारों तरफ खुशी का माहौल है।
छत्तीसगढ़
अब छत्तीसगढ़ को देखें, तो यहां टी.एस. सिंहदेव खुश हैं कि भूपेश बघेल और ताम्रध्वज साहू के गृह जिले में कांग्रेस सबसे बुरी तरह हारी है, और पौने चार लाख से अधिक की लीड भाजपा को मिली है।
भूपेश बघेल खुश हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव की एक सीट को उन्होंने दोगुना कर दिया है, जबकि मध्यप्रदेश में दो सीटें घटकर एक हो गई हैं। वे इसलिए भी खुश हैं कि टी.एस. सिंहदेव के सरगुजा में भी कांग्रेस निपट गई, और ताम्रध्वज साहू कहीं भी साहू वोट कांग्रेस को नहीं दिला पाए, धनेन्द्र साहू और भोलाराम साहू दोनों हार गए। वे इसलिए भी खुश हैं कि टी.एस. सिंहदेव को जिस ओडिशा का प्रभारी बनाया गया था, वहां कांग्रेस का सफाया हो गया है।
ताम्रध्वज साहू इसलिए खुश हैं कि भूपेश बघेल की पसंद पर प्रतिमा चंद्राकर और अटल श्रीवास्तव को टिकट मिली थी, और दोनों हार गए। वे इसलिए भी खुश हैं कि सरगुजा और ओडिशा दोनों जगह कांग्रेस की हार की तोहमत टी.एस. सिंहदेव पर लगेगी। वे इसलिए भी खुश हैं कि राहुल गांधी के सामने अब यह आसानी से साबित हो जाएगा कि एक साहू को मुख्यमंत्री न बनाने से नाराज लोगों ने कांगे्रस को करीब-करीब हर सीट पर हरा दिया। वे और टी.एस. सिंहदेव इसलिए भी खुश हैं कि पूरे राज्य का जिम्मा मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल का है जो 11 में से नौ सीटें गंवा बैठे हैं।
मुख्यमंत्री पद के चौथे दावेदार या हकदार रहे चरणदास महंत इसलिए खुश हैं कि उनकी पत्नी ऐसी मोदी-सुनामी में भी सांसद बन गई हैं, और इसके लिए वे अकेले तारीफ के हकदार हैं, और बाकी तीनों सीएम-दावेदारों के इलाकों में कांग्रेस निपट गई।
सभी उम्मीदवार और सभी नेता इसलिए भी खुश हैं कि राहुल गांधी भी हार गए हैं, तो अब उन्हें कोई उलाहना देने वाला कोई बचा नहीं है।
हारी गई तमाम सीटों पर बाकी कांग्रेसी खुश हैं कि अगली बार उनकी बारी उम्मीदवारी के लिए आ सकती है।
कुल मिलाकर पूरे राज्य में कांग्रेस में खुशी का माहौल है।
भोपाल को कांग्रेसी सांसद नसीब
कांग्रेस भले ही भोपाल लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसे एक सांसद जरूर मिल गई। छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत की पत्नी और कोरबा की सांसद श्रीमती ज्योत्सना महंत भोपाल की ही रहने वाली हैं। ज्योत्सना की शिक्षा-दीक्षा भोपाल में हुई। उनके पिता रामसिंह मध्यप्रदेश सरकार में अफसर थे। ज्योत्सना का मायका भोपाल के अरेरा कॉलोनी में है। डॉ. महंत, दिग्विजय सिंह के ही सबसे करीबी साथियों में गिने जाते हैं। ऐसे में भोपाल से भले ही दिग्विजय सिंह की हार हो गई है, लेकिन ज्योत्सना महंत के रूप में भोपाल को कांग्रेसी सांसद मिल गया है। 

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27-May-2019 (37)

भूपेश कैबिनेट के एक रिक्त पद के लिए कई विधायकों की दावेदारी मजबूत हो गई है। इनमें से अमरजीत भगत और रामपुकार सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। दोनों ही लोकसभा चुनाव में अपनी सीट से पार्टी प्रत्याशी को बढ़त दिलाने में सफल रहे। वैसे तो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष धनेन्द्र साहू, सत्यनारायण शर्मा और अमितेश शुक्ल का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता रहा है। तीनों कैबिनेट में जगह नहीं मिलने पर नाराजगी भी जता चुके हैं। मगर, लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उनकी दावेदारी कमजोर कर दी है। 

धनेन्द्र लोकसभा का चुनाव हार गए। जबकि सत्यनारायण शर्मा के क्षेत्र से पार्टी प्रत्याशी बुरी तरह पिछड़ गए। सत्यनारायण के क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी को सर्वाधिक 63 हजार से अधिक मतों की बढ़त मिली। इसी तरह अमितेश भी अपने यहां से बढ़त दिलाने में विफल रहे। और शायद इसी बात को ढांकने के लिए राजिम विधानसभा के बहुत से कांगे्रस पदाधिकारियों ने धनेन्द्र पर ही आरोप लगाते हुए पद छोड़ दिए हैं। 

सुनते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष पद पर भी जल्द नियुक्ति होगी। भूपेश ने पार्टी हाईकमान को अध्यक्ष की जिम्मेदारी से मुक्त करने का आग्रह किया है। ऐसे में माना जा रहा है कि अमरजीत भगत को कोई अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। 

जीत से दिक्कत टली
मी टू मामले में फंसे नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक को फिलहाल राहत मिल गई है। वजह यह है कि प्रदेश में लोकसभा चुनाव में अच्छी सफलता मिली है। आरोप लगने के बाद से कौशिक मीडिया के सामने नहीं आ रहे थे, लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद पार्टी दफ्तर में चहकते दिखे। पार्टी हाईकमान के पास कौशिक के खिलाफ शिकायतों पर चर्चा की फुर्सत नहीं है। पार्टी के रणनीतिकार केन्द्र में सरकार गठन की तैयारियों में जुटे हैं। इन सबके बावजूद प्रदेश संगठन के एक प्रमुख पदाधिकारी ने महामंत्री (संगठन) को कौशिक के प्रकरण को गंभीरता से लेने की सलाह दी है और उन्हें पार्टी हाईकमान से चर्चा करने का आग्रह किया है। हालांकि, कौशिक के खिलाफ आरोपों से जुड़ी वीडियो और अन्य सामग्री पहले ही हाईकमान को भेजी जा चुकी है। भाजपा विधायक दल के कई सदस्य कौशिक को तुरंत पद से हटाने के पक्ष में बताए जाते हैं। बावजूद इसके हाईकमान तुरंत कोई फैसला लेगा, यह नजर नहीं आ रहा है। देश और प्रदेश में भाजपा की भारी जीत कौशिक को किसी खतरे से फिलहाल तो बचा ले गई है।

जांच के बाद भी कुसूरवार...
प्रदेश में सबसे कमाऊ कुर्सियों में से एक, दुर्ग के आरटीओ एक मुसीबत में फंसे। अपने बेटे की एक फिल्म पूरे दफ्तर को दिखाने के लिए दफ्तर में ताला डालकर सबको ले गए, और इसकी शिकायत पर परिवहन मंत्री मोहम्मद अकबर ने जांच के आदेश दिए हैं। जांच हो गई, रिपोर्ट आ गई, लेकिन कार्रवाई के आदेश होने पर भी वह फाईल ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं, कई जगह सोच-समझकर भेजी जाती रही, और कुल मिलाकर आरटीओ को फिलहाल तो जानबख्शी मिल गई दिखती है। अगर कोई फाईल को देखे, तो साफ समझ आ जाएगा कि कैसे-कैसे इस कुसूरवार अफसर को बचाया गया। और बचाने में फाईल से परे की ताकतें भी लगी रहीं जिसका एक ऑडियो-सुबूत दुर्ग जिले में ही मौजूद है। हो सकता है कि चुनाव आचार संहिता के चलते यह काम भी थमा हुआ हो, लेकिन यह ऑडियो रिकॉर्डिंग फैली, तो सवाल उठेगा कि ऐसे अफसर को हटाने में आचार संहिता तो आड़े आ नहीं रही थी। मुख्यमंत्री का अपना जिला ऐसा मामला दर्ज कर रहा है। आगे-आगे देखे होता है क्या।
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26-May-2019 (32)

नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को अपने भाषण में नवनिर्वाचित सांसदों को मंत्री पद के लिए किसी तरह लाबिंग नहीं करने की नसीहत दी है। उन्होंने कहा कि इस देश में कई ऐसे नरेंद्र मोदी बैठ गए हैं जिन्होंने मंत्रिमंडल बना दिया है, ये सबसे बड़ा संकट है। मंत्री बनाने के नाम पर किसी के बहकावे में नहीं आइए। मीडिया वाले जो नाम चला रहे हैं भेद पैदा करने, अफवाह फैलाने के लिए, बदनीयत से कर रहे हैं। दायित्व बहुत कम लोगों को ही दे सकते हैं, कोई पहुंच जाए कि मेरा खास है, कर देता हूं। फोन करके कहते हैं कि मंत्री बना दिया है, ऑफिशियल कॉल भी आए जाए तो वैरिफाई करें।  

उन्होंने एक किस्सा सुनाया कि दिल्ली में एक बार रमन सिंह अपने कैबिनेट के सदस्यों का नाम तय कर रहे थे। इस दौरान उनके पास एक सिफारिश आई, जिसमें कहा गया कि मोदीजी ने फलां विधायक को मंत्री बनाने के लिए कहा है। बाद में वह विधायक मेरे पास गुजरात आ गया। तब मैं मुख्यमंत्री था। उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया कि मोटा भाई मैं आपकी सिफारिश से मंत्री बन रहा हूं। जबकि मैंने किसी की सिफारिश ही नहीं की थी। उन्होंने सांसदों को सतर्क किया कि संगठन के लोग या फिर कोई सांसद, कोई यह कहे कि मैंने आपके लिए मंत्री पद की सिफारिश की है तो उनकी बात भी न मानें। बिजनेसमैन से लेकर हर तरह के लोग ऐसे मौके पर सक्रिय हो जाते हैं। मोदी ने कहा कि सिर्फ अनुभव और योग्यता के आधार पर मंत्री बनाए जाएंगे। इसके लिए किसी तरह की भागदौड़ की जरूरत नहीं है। मोदी का भाषण सुनने के बाद प्रदेश के पार्टी नेता उस विधायक का नाम जानने के उत्सुक हैं जो कि मोदी का नाम लेकर यहां रमन मंत्रिमंडल का हिस्सा बनने की कोशिश कर रहा था। मोदी ने सांसदों को खुद के प्रचार-प्रसार से दूर रहने की सलाह दी।

सुनील सोनी को बधाई मिली
पहली बार संसद पहुंचे सुनील सोनी से पार्टी के बड़े नेताओं ने गर्मजोशी से मुलाकात की। राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने उन्हें  देखते ही कहा, अच्छे दिन आ गए। जगत प्रकाश नड्डा और धर्मेन्द्र प्रधान ने भी सुनील सोनी को बधाई दी। प्रदेश के अन्य नवनिर्वाचित सांसद भी अन्य राष्ट्रीय नेताओं से मेल-मुलाकात और जान-पहचान बढ़ाने में लगे रहे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय ने सभी सांसदों को अपने निवास पर भोज का न्यौता दिया। इसमें सांसदों के अलावा दोनों राज्यसभा सदस्य भी पहुंचे थे। प्रदेश से मंत्री कौन बनेगा, इसको लेकर पार्टी में चर्चा चल रही है, लेकिन नवनिर्वाचित सांसद शांत हैं। क्योंकि मोदी ने सभी को किसी तरह की लाबिंग नहीं करने की सख्त हिदायत दे रखी है।  

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25-May-2019 (34)

भाजपा के लिए कांकेर लोकसभा सीट कठिन रही है। पिछले तीन चुनाव में पार्टी प्रत्याशी मामूली अंतर से जीतते रहे हैं। इस बार का चुनाव पहले की तुलना में ज्यादा कठिन था। विधानसभा चुनाव में यहां की सारी सीटें हाथ से निकल गई, लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा ने वापसी की। पार्टी प्रत्याशी मोहन मंडावी किसी तरह चुनाव जीतने में सफल रहे। मोहन मंडावी को चुनाव जिताने में मोदी फैक्टर के अलावा प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी की अहम भूमिका रही है। 

सुनते हैं कि महामंत्री (संगठन) पवन साय ने प्रचार के शुरूआती दौर में पार्टी प्रत्याशी का बुरा हाल देखकर विक्रम उसेंडी को कांकेर लोकसभा से बाहर कदम नहीं रखने की सलाह दी थी। उसेंडी ने पवन साय का कहा माना और आखिरी दिन तक कांकेर लोकसभा में ही डटे रहे। मोहन मंडावी को सबसे ज्यादा बढ़त अंतागढ़ विधानसभा सीट से मिली, जहां से उसेंडी चार बार विधायक रहे हैं। उसेंडी की मेहनत रंग लाई और सीट पर भाजपा का कब्जा बरकरार रहा। 

रामविचार उम्मीद से
राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम काफी खुश हैं। वजह यह है कि सरगुजा से भाजपा प्रत्याशी रेणुका सिंह ने अपनी जीत का श्रेय मोदी सरकार की नीतियों और रामविचार नेताम को दिया है। सरगुजा जिले की राजनीति में रामविचार और रेणुका सिंह एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते रहे हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव में रामविचार ने रेणुका को जिताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। इससे पहले विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी सिद्धनाथ पैकरा और रामकिशुन सिंह ने अपनी हार के लिए रामविचार नेताम को जिम्मेदार ठहराया था और इसकी शिकायत पार्टी हाईकमान से की थी।

रामविचार आदिवासी मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। ऐसे में उन्हें अपनी साख बचाने के लिए सरगुजा में पार्टी उम्मीदवार को जिताना जरूरी भी हो गया था।  विपरीत परिस्थितियों में भाजपा की जीत से रामविचार का कद बढ़ा है और जिस अंदाज में रेणुका ने उनकी तारीफों के पुल बांधे हैं, उससे अब उनके समर्थक उनके लिए केंद्र में मंत्री पद की आस संजोए हुए हैं। 

अडानी की भी बधाई
रेणुका सिंह को जीत के बाद बधाई देने वालों का तांता लगा है। सुनते हैं कि बधाई देने वालों में अडानी समूह के प्रमुख गौतम अडानी भी थे। यह बात खुद रेणुका ने अपने आसपास के लोगों को बताई। वैसे अडानी का सरगुजा में काफी काम है। ऐसे में समूह के लोग स्थानीय नेताओं से व्यवहार खूब निभाते हैं। इसी चक्कर में टीएस सिंहदेव का कुछ नुकसान भी हो गया था। सिंहदेव सीएम पद के दावेदार रहे हैं, जब उनका नाम प्रमुखता से चल रहा था तब गुजरात के एक कांग्रेस विधायक ने सिंहदेव का नाम लिए बिना ट्वीट किया कि अडानी का मित्र सीएम बनने वाला है। इससे पार्टी हल्कों में खलबली मच गई और सिंहदेव को नुकसान उठाना पड़ा। 

सिंहदेव ने गिनाया दुर्ग संभाग
लोकसभा चुनाव में सरगुजा राजघराने के मुखिया टीएस सिंहदेव अपनी विधानसभा सीट अंबिकापुर से पार्टी प्रत्याशी खेलसाय सिंह को बढ़त नहीं दिला सके। लेकिन उनके विरोधी माने जाने वाले अमरजीत भगत ने अपनी सीट सीतापुर से कांग्रेस प्रत्याशी को अच्छी खासी बढ़त दिलाई। सीतापुर अकेली सीट थी जहां से कांग्रेस प्रत्याशी को बढ़त मिली है। ऐसे में मंत्रिमंडल में अमरजीत का दावा काफी पुख्ता हो गया है। टीएस सिंहदेव के लिए राहत की बात यह रही कि सीएम भूपेश बघेल और गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू के क्षेत्र से भी पार्टी प्रत्याशी को बढ़त नहीं मिल पाई। सिंहदेव ने नतीजों के बाद यह गिना भी दिया है कि दुर्ग संभाग में राज्य के आधे मंत्री हैं, और फिर भी नतीजे ऐसे क्यों आए इस पर सोच-विचार होना चाहिए। दुर्ग संभाग में दुर्ग और राजनांदगांव, दोनों लोकसभा सीटें भाजपा ले गई है, और बात फिक्र की तो है ही। 

कोई और बहाना ढूंढ लें...
आमसभा के चुनावी नतीजे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इज्जत बढ़ा गए, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भाजपा की इज्जत बचा भी गए। लेकिन सबसे बड़ी इज्जत अगर किसी की बची है, तो वह ईवीएम की है, जिसे जालसाजी का सामान बताया जा रहा था, और जिसे हटाकर फिर से कागज का वोट लाने की बात हो रही थी। अभी-अभी चुनाव आयोग के इक_ा किए हुए आंकड़े बताते हैं कि 542 लोकसभा सीटों के तहत आने वाले तमाम चार हजार से अधिक विधानसभा सीटों पर जिन 20625 वीवीपैट मशीनों से कागज की पर्चियां निकालकर ईवीएम में दर्ज वोटों से मिलाकर देखा गया, तो उनमें एक वोट का भी फर्क नहीं आया। उम्मीद है कि अब किसी के शक के आधार पर ईवीएम को घरनिकाला नहीं दिया जाएगा। बीस हजार से अधिक मशीनों पर डले वोटों में एक वोट का भी फर्क न आए, इससे अधिक कठिन अग्निपरीक्षा और क्या हो सकती है? हारने वाले नेताओं और पार्टियों को अगले चुनाव के पहले किसी और बहाने की तलाश करनी चाहिए। वैसे भी झूठे बहानों का नफा पाने वाले लोग आगे चलकर नुकसान के सिवाय और कुछ नहीं पाते।
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24-May-2019 (33)

कांग्रेस विधानसभा चुनाव का प्रदर्शन लोकसभा चुनाव में नहीं दोहरा सकी। जिस तरह विधानसभा चुनाव में जबरदस्त सफलता मिली थी, लोकसभा चुनाव में उसी अंदाज में हार का सामना करना पड़ा। ये अलग बात है कि पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में पार्टी की एक सीट बढ़ी है। जबकि विधानसभा चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन के बाद प्रदेश के नेताओं की पूछ परख काफी बढ़ गई थी। सीएम भूपेश बघेल पार्टी के स्टार प्रचारक थे। वे उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए गए थे। इसी तरह टीएस सिंहदेव को ओडिशा में चुनाव का प्रभारी बनाया गया था। सिंहदेव ने सरगुजा से ज्यादा समय ओडिशा में दिया, लेकिन वहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिल पाई। सीएम भूपेश बघेल भी लाव-लश्कर लेकर अमेठी में राहुल गांधी के चुनाव प्रचार के लिए गए थे, लेकिन राहुल को पहली बार हार का सामना करना पड़ा। यही नहीं, प्रदेश के नेता प्रभारी पीएल पुनिया के बेटे बाराबंकी में चुनाव प्रचार में भी लगे रहे, लेकिन पुनिया के बेटे तनुज पुनिया की जीत तो दूर, उनकी जमानत भी नहीं बच पाई। कुल मिलाकर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, बल्कि दूसरे राज्यों में भी झटका लगा है। 

बैस के जाने से फर्क नहीं पड़ा
सुनील सोनी की रिकॉर्ड वोटों से जीत से भाजपा के ही दिग्गज नेता हैरान हैं। इतनी बड़ी जीत की उम्मीद किसी को नहीं थी। वह भी तब जब सात बार के सांसद रमेश बैस की टिकट  काटकर सुनील सोनी को  दी गई। बैस की ग्रामीण इलाकों में अच्छी पकड़ है, और रायपुर संसदीय सीट का जातिगत समीकरण भी बैस के पक्ष में माना जाता था, इसलिए उनकी टिकट कटने से नुकसान का अंदेशा जताया जा रहा था। मगर, मोदी लहर ने इतनी बड़ी लीड दी जितनी कि राज्य बनने के बाद के तमाम लोकसभा चुनावों की रमेश बैस की लीड जोड़ दिया जाए तो भी वह सुनील सोनी की लीड 3 लाख 48 हजार तक नहीं पहुंचती है। पिछले चुनाव में बैस ने सत्यनारायण शर्मा को पौने 2 लाख वोटों से हराया था, लेकिन इस चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में जीत का अंतर दोगुना रहा है। वैसे भी बैस की नैय्या कभी अटल लहर या कांग्रेस विरोधी लहर के सहारे पार होती रही है, इस बार सुनील सोनी ने रायपुर सीट को बैस के मुकाबले एक नौजवान चेहरा दे दिया है जो इतनी लीड के सहारे अगले चुनाव में जारी भी रह सकता है। 

यह जीत संघ की मेहनत से...

राजनांदगांव सीट से संतोष पाण्डेय की जीत काफी चौंकाने वाली रही है। वजह यह है कि राजनांदगांव में दूसरे चरण में मतदान हुआ था। तब वहां मोदी फैक्टर प्रभावी होगा, ऐसा नहीं लग रहा था। वैसे भी पार्टी ने पूर्व सीएम रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह की टिकट काटकर संतोष पाण्डेय को प्रत्याशी बनाया था। सरल स्वभाव के संतोष पाण्डेय आरएसएस के पसंदीदा रहे हैं। उस समय पार्टी के भीतर यह भी चर्चा रही कि अभिषेक की टिकट कटने की दशा में रमन सिंह, राजिन्दरपाल सिंह भाटिया को टिकट चाहते हैं। होली के बाद रमन निवास पर जनता कांग्रेस के विधायक देवव्रत सिंह और राजिन्दरपाल सिंह भाटिया की मीटिंग भी हुई थी। उससे भी यही संकेत गया था। खैर, संतोष पाण्डेय को आरएसएस के सुझाव पर टिकट दी गई। आरएसएस ने सबसे ज्यादा मेहनत राजनांदगांव में ही की थी। वैसे तो अभिषेक को चुनाव संचालक बनाया गया था, लेकिन रमन सिंह समर्थकों की अरूचि को देखकर समानान्तर संचालन भी होता रहा। चुनाव प्रबंधन में माहिर पूर्व मंत्री मोहम्मद अकबर कांग्रेस प्रत्याशी के चुनाव संचालक थे और कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में जातिगत अंकगणित भी था। फिर भी आरएसएस की सक्रियता के चलते मतदान के पहले तक शहर और कस्बों में मोदी लहर दिखने लग गया था। आखिरकार संतोष पाण्डेय एक बड़े अंतर से चुनाव जीतने में सफल रहे। 

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22-May-2019 (31)

मी टू में फंसे नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। प्रदेश संगठन जरूर कौशिक का बचाव कर रहा है, लेकिन पार्टी हाईकमान इसको लेकर गंभीर दिख रहा है। सुनते हैं कि हाईकमान ने महिला के आरोपों की वीडियो क्लिप मंगवाई है और देर शाम तक सारी जानकारी भेज भी दी गई। यही नहीं, मंगलवार को दिल्ली में अमित शाह के रात्रि भोज के मौके पर भी कुछ नेता इस प्रकरण पर बतियाते रहे। हाईकमान इस पूरे प्रकरण को लेकर गंभीर इसलिए है कि नेता प्रतिपक्ष के चयन के दौरान कौशिक की गैरमौजूदगी में एक पूर्व मंत्री ने उनके आचरण को लेकर काफी कुछ कहा था तब पार्टी नेता सन्न रह गए थे। 

कौशिक का यह बयान भी लोगों को हजम नहीं हो रहा है कि दो साल तक महिला क्या कर रही थी। इस पर महिला के वकीलों का कहना है कि कौशिक के करीबी प्रकाश बजाज के खिलाफ पुलिस से लेकर तत्कालीन सीएम डॉ. रमन सिंह से भी मिलकर महिला ने छेड़छाड़ की शिकायत की थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जब प्रकाश बजाज जैसे मामूली नेता पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही थी तो कौशिक जैसे बड़े प्रदेशाध्यक्ष पर क्या कार्रवाई होती? सरकार बदली तो उनकी शिकायत पर अब जब प्रकाश बजाज पर कार्रवाई हुई, तो इसके बाद शिकायतकर्ता महिला का हौसला बढ़ा। खैर, कांग्रेस ने यह कह दिया कि कौशिक जिस एजेंसी से जांच कराना चाहे, वे इसके लिए तैयार हैं। अब कौशिक के अगले कदम पर निगाहें टिकी हुई है। अभी जब तक दिल्ली में एनडीए की सरकार बन न जाए, तब तक तो कौशिक के हिमायती यह चुनौती भी नहीं दे सकते कि मामले की सीबीआई से जांच करा ली जाए। महिलाओं की शिकायत मनमाने तरीके से खारिज करने के नुकसान देश भर में जगह-जगह समय-समय पर आते रहे हैं, और छत्तीसगढ़ में धरम कौशिक को लेकर पहले से कई अप्रिय चर्चाएं हवा में रही हैं, इसलिए इस शिकायत को खारिज करना भाजपा के कई लोगों के गले नहीं उतर रहा है। फिलहाल भाजपा नेत्री हर्षिता पांडेय महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर नहीं हैं, इसलिए बखेड़ा बढऩे पर इसी आयोग से कोई नोटिस भी आ सकता है।

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21-May-2019 (68)

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के दामाद, एक सरकारी डॉक्टर को प्रदेश का एक वक्त का अकेला मेडिकल कॉलेज अस्पताल  सौंप दिया गया था कि उसे सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाया जाए। दाऊ कल्याण सिंह दानदाता थे, और उनके नाम पर इसे डी.के. अस्पताल नाम से जाना जाता था। बाद में मेडिकल कॉलेज का नया अस्पताल बना तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने पर इसी इमारत में मंत्रालय खुला और एक दशक से ज्यादा चलता रहा। जब मंत्रालय नया रायपुर गया, तो एक बार फिर इसे अस्पताल बनाने का काम हुआ। ऐसे में मेडिकल कॉलेज में नेफ्रोलॉजी के विशेषज्ञ डॉ. पुनीत गुप्ता को यह जिम्मा दिया गया, और जाहिर है कि सीएम का दामाद होने की वजह से उन्हें खुली छूट भी दी गई कि वे तेज रफ्तार से इसे एक शानदार अस्पताल बनाएं।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से ऐसा कोई भी वक्त नहीं रहा जब स्वास्थ्य विभाग प्रदेश का सबसे भ्रष्ट विभाग न रहा हो। हाल ही में यह तस्वीर बदली है जब कांगे्रस सरकार के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव अस्पतालों पर अपनी जेब का पैसा खर्च कर रहे हैं बजाय अस्पतालों के पैसों से जेब भरने के। रमन सरकार में एक सबसे ताकतवर मंत्री अजय चंद्राकर स्वास्थ्य मंत्री थे, और सुब्रत साहू जैसे स्वास्थ्य सचिव थे जिनके पिता ओडिशा में चीफ सेक्रेटरी रह चुके थे। ऐसे लोगों के रहते हुए उनके विभाग में खूब चर्चित डी.के. अस्पताल में जिस रफ्तार से नियम-कायदे तोड़कर करोड़ों खर्च हुए, और बैंक से फर्जी कागजातों पर कर्ज लिया गया, उनमें से कोई भी बात इन दोनों लोगों की अनदेखी से हो नहीं सकती थी। जिस पंजाब नेशनल बैंक से करीब पौन सौ करोड़ रुपये का यह कर्ज लिया गया, वहां के उस वक्त के मैनेजर ने खुलासा किया है कि इस कर्ज के पीछे सरकार की मंजूरी थी, सरकार की गारंटी थी, और अस्पताल की कमेटी में स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य सचिव, और रायपुर के कलेक्टर मेंबर थे। वैसे तो आज पुलिस की जांच डॉ. पुनीत गुप्ता को घेरे में लेकर चल रही है, और अभी बैंक के एजीएम को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है, लेकिन सरकार में जिम्मेदारी महज पुनीत गुप्ता पर खत्म नहीं हो सकती, उसके ऊपर के कई और लोगों की सीधी जिम्मेदारी इसमें बनती है। जब सरकार का कोई विभाग इतनी तेजी से कर्ज लेता है और खरीददारी करता है तो उसके लिए वित्त विभाग की कई तरह की इजाजत लगती है जो कि छोटी-छोटी बातों पर आपत्ति करने वाला विभाग रहता है। ऐसे में डी.के. अस्पताल को एक स्वतंत्र देश की तरह चलाने का यह काम कैसे हुआ यह हैरान करने वाला है। मीडिया में लगातार तस्वीरें आती भी थीं कि मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री इस अस्पताल की बदलती हुई शक्ल को देखने के लिए जाते थे। और स्वास्थ्य विभाग में हजारों करोड़ की खरीदी जिस तरह होती थी, उसकी जानकारी प्रदेश के आम लोगों को भी थी, इसलिए ऐसा तो हो नहीं सकता कि जानकार स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर इससे नावाकिफ रहे हों। देखना है कि पुलिस के हाथ कहां तक पहुंचते हैं।

पुनीत की बुलेटप्रूफ जैकेट
डीकेएस घोटाले में फंसे पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता के खिलाफ कई प्रकरण दर्ज तो हैं, लेकिन पुलिस उनसे कोई राज नहीं उगलवा पाई। पुनीत को अग्रिम जमानत मिली हुई है और बयान देने के लिए वकीलों की फौज लेकर पहुंचते हैं। पुलिस का कोई भी सवाल रहे, उनका एक ही जवाब होता है कि फाइल देखकर ही कुछ बता पाएंगे। फाइलें तो गायब हैं, और अस्पताल प्रबंधन ने इसको लेकर एफआईआर दर्ज करा रखी है। 

पुनीत ने पुलिस को छकाने के लिए बकायदा आरटीआई लगाकर फाइलों की छायाप्रति मांग लिया है। अब फाइलें तो गुम हैं इसलिए उन्हें कोई जानकारी नहीं मिल सकती। ऐसे में पुनीत गोलमोल जवाब देकर पुलिस कार्रवाई से बच रहे हैं। अब सवाल यह है कि आखिर घोटाले की फाइलें कहां गर्इं। पुलिस की मानें तो इसके बारे में सिर्फ पुनीत गुप्ता ही कुछ बता सकते हैं। पुलिस के हाथ बंधे हैं क्योंकि पुनीत ने कानूनी कानूनी बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रखी है। उनकी अग्रिम जमानत खारिज करने के लिए पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है। कोर्ट ने चार हफ्ते के भीतर पुनीत से जवाब मांगा है। इस पर जुलाई में सुनवाई होगी। यह साफ है कि जब तक पुलिस पुनीत को रिमांड में लेकर पूछताछ नहीं करेगी तब तक फाइलों के राज से पर्दा नहीं उठ पाएगा। यह सब आसान भी नहीं दिख रहा है, क्योंकि पुनीत के लिए देश के नामी-गिरामी वकील पैरवी कर रहे हैं, और पुलिस को अदालत में इसका मुकाबला करने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है। 

महिला की शिकायत और धरम कौशिक
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक से पार्टी के कई बड़े नेता नाराज बताए जा रहे हैं। वजह यह है कि कौशिक, छेड़छाड़ के आरोपी प्रकाश बजाज के समर्थन में बयानबाजी करने और आंदोलन छेडऩे के लिए पार्टी नेताओं पर दबाव बनाए हुए हैं। प्रकाश, धरम कौशिक के बेहद करीबी माने जाते हैं, और उनके राजदार भी बताए जाते हैं। सुनते हैं कि सालभर पहले रमन सिंह सरकार के रहते यह मामला प्रकाश में आया था। तब भी धरम कौशिक के दबाव की वजह से आगे कोई पुलिस-कार्रवाई नहीं हो पाई। चूंकि यह महिला से जुड़ा मामला है और महिला अत्याचार को लेकर पार्टी संवेदनशील होने का दावा करते रही है। ऐसे में कौशिक का आरोपी को बिना किसी जांच के क्लीन चिट देकर सरकार पर बदलापुर की राजनीति करने का आरोप लगाना पार्टी नेताओं को गले नहीं उतर रहा है। कुछ नेताओं ने तो कौशिक के बयान की कटिंग पार्टी हाईकमान को भेजी है और उनकी गतिविधियों पर रोक लगाने का आग्रह किया है। 
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20-May-2019 (33)

लोकसभा चुनाव मतदान खत्म होते ही कल शाम जो एग्जिट पोल सामने आया, वह छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के लिए खासी निराशा लेकर आया है। इसमें भाजपा को नुकसान तो बड़ा होते दिख रहा है, और उसकी दस सीटें घटकर छह रह जा रही हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनाव में ग्यारह में से दस लोकसभा क्षेत्र में लीड पाई थी, जो एग्जिट पोल के मुताबिक घटकर पांच सीटों पर रह जा रही है। लेकिन इससे भी अधिक फिक्र खड़ी करने वाला एक दूसरा आंकड़ा आज सुबह आया है। सी वोटर के यशवंत देशमुख ने राज्यों में पार्टियों के वोट की हिस्सेदारी का चार्ट पोस्ट किया है जिसके मुताबिक छत्तीसगढ़ में भाजपा कांग्रेस से साढ़े नौ फीसदी अधिक वोट पाते दिख रही है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा से दस फीसदी अधिक वोट पाए थे। इन छह महीनों में अगर छत्तीसगढ़ के वोटर कांग्रेस से भाजपा की तरफ, या मोदी की तरफ इतने खिसक गए हैं कि दोनों पार्टियों के बीच इन दोनों चुनावों में वोटों का फर्क बीस फीसदी होने जा रहा है तो यह हैरान करने वाली बात रहेगी। और यह भी तब जब जोगी इस चुनाव में मैदान में नहीं थे, और ऐसा माना जा रहा था कि उन्हें मिलने वाले परंपरागत वोट कांग्रेस की तरफ आएंगे। यह तो मतगणना के बाद अलग-अलग बूथ के आंकड़े बताएंगे कि कहां-कहां जोगी को वोट मिले थे, और उन बूथ पर इस चुनाव में उनके न रहने पर ये वोट कांग्रेस को मिले हैं, या नहीं? चुनावी विश्लेषण आंकड़ों से परे भी बहुत सी बातों पर टिका रहता है, लेकिन आंकड़े ही हैं जो कि निर्विवाद होते हैं, और जिनसे कम से कम एक तस्वीर तो बनती ही है। अब सीवोटर के ये आंकड़े सही निकलते हैं, या नहीं यह नहीं पता। कल के एग्जिट पोल की एजेंसियों ने केवल सीटों की संख्या के अंदाज सामने रखे हैं, लेकिन इस एक एजेंसी ने वोट प्रतिशत भी पेश किया है जिसे मतगणना के आंकड़ों से मिलाकर देखा जा सकेगा। 

कांग्रेस के सामने चुनौती...
अब जब पूरे देश में वोट गिर चुके हैं, तब पार्टियों के नेता कुछ अधिक ईमानदारी के साथ अपनी हालत मंजूर कर रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी सात सीटों की बात कर रही है। यह बात प्रदेश के सबसे वरिष्ठ मंत्री टी.एस. सिंहदेव बार-बार कह चुके हैं कि सात से कम सीटें आने पर आत्ममंथन करना होगा, पुनर्विचार करना होगा, हालांकि वे यह नहीं कहते हैं कि किस बात पर पुनर्विचार करना होगा। जाहिर है कि दिल्ली में अगर कांग्रेस किसी तरह सरकार में रहेगी, तो राज्यों में पार्टी की हालत पर उतनी बारीकी से गौर नहीं होगा। लेकिन अगर कांग्रेस दिल्ली में विपक्ष में रहती है तो उसके पास हर प्रदेश की जीत-हार पर गौर करने के लिए समय ही समय रहेगा। यह बात जरूर है कि बहुत से राज्यों में विधानसभा का चुनाव स्थानीय मुद्दों और स्थानीय नेताओं को सामने रखकर लड़ा गया था, और इस बार यह चुनाव मोदी के समर्थन या मोदी के विरोध के बीच हुआ है, और यह राज्य विधानसभाओं से थोड़ा अलग तो रहना ही था। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस आठ से अधिक सीटों की उम्मीद कर रही थी, और अगर उसकी कुल पांच सीटें आती हैं, तो उसे सचमुच ही अपने कई पहलुओं पर सोचना-विचारना पड़ेगा, और जनता के बीच एक बार फिर लोकप्रियता बढ़ाने के लिए मुश्किल कोशिश करनी पड़ेगी।(rajpathjanpath@gmail.com)


19-May-2019 (31)

पिछले कुछ समय से सरकार के मंत्री ताम्रध्वज साहू नाराज चल रहे हैं। वे अपने बेेटे को दुर्ग से टिकट दिलाना चाहते थे, मगर उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी। अभी नाराजगी मंत्रियों के विभाग में छोटे से परिवर्तन को लेकर है। सीएम भूपेश बघेल ने अस्पताल में भर्ती मंत्री रविन्द्र चौबे का विधि-विधायी विभाग मोहम्मद अकबर को दे दिया। सुनते हैं कि ताम्रध्वज इसको लेकर नाराज हो गए। 

हल्ला है कि उन्होंने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और अन्य नेताओं से इस पर आपत्ति भी जताई है। बाद में उन्हें समझाया गया कि चुनाव आचार संहिता हटने के तुरंत बाद विधि-विधायी विभाग से जुड़े कई अहम फैसले होने हैं। चूंकि रविन्द्र चौबे को पूरी तरह ठीक होने में कुछ वक्त और लग सकता है। ऐसे में अकबर को चौबे के स्वस्थ होने तक विधि-विधायी विभाग का प्रभार दिया गया है। इसमें चौबे की भी सहमति रही है। तब कहीं जाकर वे थोड़े बहुत नरम पड़े। वैसे उनका मिजाज उस समय से और ज्यादा बिगड़ा हुआ है जब प्रतिमा चंद्राकर को दुर्ग से प्रत्याशी बनाया गया। प्रतिमा ने विधानसभा चुनाव में अपनी जगह ताम्रध्वज को टिकट देने का विरोध किया था। 

इसके अलावा ट्रांसफर-पोस्टिंग के भी कुछ ऐसे मामले थे जिनमें ताम्रध्वज की बात मुख्यमंत्री ने किन्हीं वजहों से नहीं सुनी, और उन्हें लेकर वे बिफरे हुए रहे। अब लोकसभा चुनाव निपट जाने के बाद कई लोगों के बीच छोटे-छोटे विवाद सामने आ सकते हैं जिनमें कई ऐसे लोगों के मामले भी हैं जिनके खिलाफ चुनाव में कांगे्रस को खासा नुकसान पहुंचाने के सुबूत हैं, लेकिन जो अब तक मजे कर रहे हैं।

रिटायरमेंट के बाद...
प्रदेश में जितने आईएएस-आईपीएस अफसर रिटायर होने वाले हैं, उतनी ही चर्चा चल रही है कि बाद में किसे कौन सी कुर्सी मिलेगी। कुछ रिटायर्ड लोगों ने अपने नाम की चर्चा तरह-तरह से शुरू करवा दी है, और कुछ रिटायर होने वाले लोग मुख्यमंत्री तक अपनी खूबियां पहुंचाने में लगे हुए हैं। कुल मिलाकर कोई भी ऐसे नहीं दिखते जो रिटायर होने के बाद सचमुच रिटायर होना चाहते हों। जाहिर है कि सरकार की ऐसी मेहरबानी पाने के लिए लोग नौकरी के आखिरी एक-दो बरस सरकार की खुशामद में सभी कुछ करने को तैयार रहते हैं। और तो और कुछ कुर्सियों पर रिटायर्ड जजों को ही मनोनीत किया जाता है, और उसके लिए भी लोग चर्चा में रहते हैं कि किसे और क्यों क्या बनाया जाएगा।

आदत क्यों बिगाड़ रहे हैं?
एक तरफ हर सरकार में बहुत से मंत्री भारी कमाई करने के लिए चर्चा में रहते हैं, तो दूसरी तरफ टी.एस. सिंहदेव देश के सबसे संपन्न गिने-चुने अरबपति विधायकों में से एक हैं, और अस्पतालों की जरूरत को पूरा करने के लिए वे अपनी जेब से एसी और कूलर लगवा रहे हैं। अब दूसरे बहुत से नेता यह देखकर परेशान हो रहे हंै जो हैं तो खासे संपन्न लेकिन जो निजी घर का कमोड भी सरकारी खर्च से बदलवा रहे हैं। ऐसे एक सत्तारूढ़ नेता ने कहा कि बाबा (टी.एस. सिंहदेव) के पास ज्यादा पैसा है तो घर पर रखें, सरकारी कामकाज में निजी पैसा खर्च करके जनता की उम्मीद क्यों बढ़ा रहे हैं? ऐसे में हम जनता के पैसों से अपना कुछ भी नहीं कर सकेंगे। अब विधानसभा चुनाव के वक्त से लेकर अब तक टी.एस. सिंहदेव के निजी खर्च को लेकर कई किस्म की कहानियां हवा में हैं जिनकी सच्चाई वे ही बता सकते हैं। कुछ लोगों का कहना और मानना है कि उन्होंने अपनी बहुत सी जमीनें बेचकर विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी को एक बहुत बड़ी रकम दी है, और वे उसी अंदाज में आज भी जनता के कामों पर घर का खर्च कर रहे हैं।

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18-May-2019 (32)

प्रदेश कांग्रेस के नेता यूपी में चुनाव प्रचार कर लौट आए हैं। पार्टी हाईकमान ने सरकार के मंत्रियों और संगठन के प्रमुख नेताओं को यूपी के मुख्य रूप से अमेठी, रायबरेली और बाराबंकी में चुनाव प्रबंधन का जिम्मा सौंपा था। संकेत साफ था कि उन्हें खाली हाथ नहीं आना है। खैर, प्रदेश का चुनाव निपटते ही सीएम-मंत्रिगण और सारे प्रमुख नेता यूपी पहुंच गए। अमेठी से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में ज्यादातर नेता वहीं डटे रहे। 

सुनते हैं कि अमेठी में पार्टी संगठन का हाल ऐसा था कि स्थानीय लोगों को वहां के प्रमुख पदाधिकारियों का नाम तक नहीं मालूम था। किसी तरह खोजबीन कर जिला अध्यक्ष को बुलाया गया। और उनके साथ मिल बैठकर यहां के नेताओं ने चुनाव प्रचार की व्यूह रचना तैयार की। दो दिन बाद प्रियंका गांधी का रोड शो होने वाला था। रोड शो में किसी तरह कमी न रहे, यह सोचकर जिलाध्यक्ष को मंत्रियों की मौजूदगी में साढ़े 3 लाख दे दिए और सभी जरूरी इंतजाम करने कहा गया। 

एक साथ लाखों रूपए देखकर जिलाध्यक्ष महोदय की खुशी का ठिकाना नहीं रहा और वे इंतजामों को लेकर बढ़-चढक़र दावा कर वहां से निकल लिए। अगले दिन तैयारियों पर चर्चा के लिए यहां के नेताओं ने जिलाध्यक्ष को फोन लगाया, तो उनका मोबाइल बंद मिला। जिलाध्यक्ष का कोई पता नहीं चलने पर हैरान-परेशान नेता दूसरे किसी जिम्मेदार स्थानीय पदाधिकारी की खोज में जुट गए। फिर एक नेता को यह कहकर पेश किया गया कि ये ईमानदार हैं और अमेठी में बरसों से पार्टी का झंडा थामे हुए हैं। 

दूध से जले नेताओं ने स्थानीय नेता की ईमानदारी का टेस्ट करने के लिए 50 हजार रूपए दिए और उन्हें रोड शो की तैयारियों में जुटने कहा। पचास हजार रूपए मिलते ही इंतजामों का आश्वासन देकर निकल गए और थोड़ी देर बाद उनका भी मोबाइल बंद हो गया। फिर क्या था, प्रदेश के नेताओं ने अमेठी के नेताओं को छोडक़र खुद ही सारे इंतजाम किए। हाल यह रहा कि छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी महापौर और विधायक सहित अन्य बड़े नेता खुद नारेबाजी करते अमेठी की गलियों में घूमने मजबूर रहे। उन्होंने सफलतापूर्वक रोड शो होने पर राहत की सांस ली। 

इस मांग से कोर्ट बेहतर...
पिछली सरकार में ताकतवर रहे कई अफसर जांच के घेरे में आ गए हैं। इनमें से एक पुलिस अफसर जांच का घेरा तोडऩे की भरसक कोशिश कर रहे हैं। चर्चा है कि अफसर ने कांग्रेस के कई राष्ट्रीय नेताओं से जुगाड़ भी बिठाया, बावजूद इसके उन्हें राहत नहीं मिल पाई है। सुनते हैं कि पुलिस अफसर को अभयदान देने के बदले झीरम कांड का रहस्य लिखित में देने के लिए कहा गया। ऐसी शर्त सुनकर पुलिस अफसर भी हक्का-बक्का रह गए। वे मिन्नतें छोडक़र कानूनी लड़ाई में पूरा ध्यान दे रहे हैं। उन्हें कई और लोगों का साथ मिल रहा है। केन्द्र में एनडीए की सरकार आई, तो उन्हें पूरी राहत मिलने की उम्मीद है। वैसे भी राज्य के आधा दर्जन आईएएस-आईपीएस चुनावी नतीजों की राह देख रहे हैं कि एनडीए लौटे तो वे दिल्ली जाने की अर्जी लगा दें। 

पुराना माल रक्खा हुआ है...

दूसरों की निजी जिंदगी में तांकझांक करने के लिए कानूनी और गैरकानूनी दोनों किस्म की फोन टैपिंग का लालच बहुत से नेता-अफसर छोड़ नहीं पाते, और इसका कानूनी इस्तेमाल चाहे न हो, बंद कमरे में ऐसी रिकॉर्डिंग सुनकर वे खुश भी होते हैं, और इसके आधार पर कुछ लोगों से दोस्ती पाल लेते हैं, कुछ से दुश्मनी। कानून तो गैरकानूनी फोन टैपिंग के खिलाफ बड़ा सख्त है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह धड़ल्ले से हुई, और अब कुछ नेताओं, कुछ अफसरों, और कुछ पत्रकारों तक यह बात पहुंचाई जा रही है कि आज वे किसी को मुसीबत में देखकर अधिक खुश न हों, क्योंकि उनकी कई निजी और नाजुक बातचीत अब तक हार्डडिस्क पर कायम है, और गैरकानूनी होने पर भी उसे गुमनाम तरीके से बाजार में फैलाया तो जा ही सकता है। 


17-May-2019 (34)

महात्मा गांधी पर भाजपा के अलग-अलग लोग जिस अंदाज में हमला कर रहे हैं, उसे देखकर सब हक्का-बक्का हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने ऐसे लोगों को नोटिस देने की बात कही है, लेकिन भाजपा के नेता हैं कि कूद-कूदकर गांधी पर हमला किए जा रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के भाजपा जिलाध्यक्ष राजीव अग्रवाल शायद भाजपा से ऐसे अकेले नेता हैं जिन्होंने खुलकर साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ सोशल मीडिया पर लिखा है- साध्वी प्रज्ञा का नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं हैं। नाथूराम गोडसे केवल हत्यारा था, और इसके अलावा कुछ नहीं। साध्वी को देश से माफी मांगनी चाहिए। बीती दोपहर ही उन्होंने यह पोस्ट कर दिया था, हालांकि अमित शाह का बयान खासा बाद में आया है, आज सुबह। अमित शाह के बयान के बाद भी मध्यप्रदेश भाजपा के प्रवक्ता अनिल सौमित्र ने गांधी को पाकिस्तान का राष्ट्रपिता कहा है। और उनकी इस बात पर देश के बहुत से चौकीदारों ने लिखा है कि जब किसी को राष्ट्रपिता बनाकर दूसरों पर थोपा जाएगा, तो उसकी ऐसी ही प्रतिक्रिया होगी। हालांकि राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि चुनाव के बीच में, अभी जब मतदान का एक दौर बाकी है, भाजपा के नेता गांधी को इस तरह कूद-कूदकर लात मारकर आखिर कौन से वोटरों को प्रभावित कर रहे हैं? क्या अब बाकी सीटों पर महज गोडसेवादी वोटर ही बचे हैं?

मुख्यमंत्री की मेज लबालब

चुनाव प्रचार से मुक्त होकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक बार फिर सरकारी कामकाज पर बैठे हैं, तो उनके टेबिल और कमरे सभी फाइलों से लबालब बताए जा रहे हैं। बहुत से मामलों पर फैसले लेने हैं, और बहुत से नाम भी निगम-मंडल के लिए छांटने हैं। विधानसभा चुनाव को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भूपेश ने जिस खूबी से जीता है, उसके चलते वे मंत्रिमंडल तो पूरी तरह अपनी मर्जी का बना गए, लेकिन अब निगम-मंडल में मनोनयन में पार्टी के दिग्गज विधायकों से लेकर संगठन के वजनदार लोगों तक सबके बीच संतुलन बनाना उतना आसान नहीं रहेगा। लोगों की बड़ी-बड़ी उम्मीदें हैं क्योंकि पन्द्रह बरस बाद पार्टी सत्ता में है, ऐसे में हर कोई सत्ता की बस में सवार हो जाना चाहते हैं। एक बार फिर धर्म, जाति, जिला, और गुट, इन सभी का ख्याल रखते हुए लोगों के नाम छांटने होंगे, और यही मौका मुख्यमंत्री के सामने सरकारी फिजूलखर्ची को घटाने का भी रहेगा कि ऐसे नाम के कागजी निगम-मंडल, आयोग खत्म किए जाएं जो कि मुफ्तखोरी के लिए बनाए गए थे। यह एक कड़ा और कड़वा फैसला हो सकता है, लेकिन कामयाब लीडरशिप ऐसा जरूर कर सकती है क्योंकि इतने बहुमत से आने के बाद भूपेश बघेल के सामने मध्यप्रदेश की तरह सरकार पलटने का खतरा नहीं है।
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16-May-2019 (33)

अब चुनावी नतीजों को करीब हफ्ता भर बाकी है, और लोग उम्मीद कर रहे हैं कि चुनाव आयोग की रोक खत्म होते ही टीवी चैनलों और अखबारों पर एक्जिट पोल के अंदाज आने लगेंगे। ऐसे में कांग्रेस के डेटा  एनालिटिक्स विभाग के मुखिया प्रवीण चक्रवर्ती की एक ट्वीट पर ध्यान देने की जरूरत है जिसमें कहा गया है कि 2014 से लेकर अब तक जिन बड़े राज्यों में सीटों की भविष्यवाणी की गई थी, वह भारी गड़बड़ी निकली थी। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, हरियाणा, कर्नाटक, पंजाब, बिहार, उत्तरप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, दिल्ली, केरल, और तमिलनाडु में पिछले 5 बरस के विधानसभा चुनावों के नतीजों के एक्जिट पोल में सीटों की संख्या का हिसाब चार अलग-अलग एजेंसियों का इस प्रकार रहा- एक्सिस-38 फीसदी सहित, चाणक्य- 25 फीसदी, सी वोटर- 15 फीसदी, और सीएसडीएस- 0 फीसदी। अब जो लोग एक्जिट पोल देखना चाहते हैं, वे इस बात को ध्यान में रखकर आगे अपना मनोरंजन कर सकते हैं।

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15-May-2019 (39)

राजेश मूणत और रमशीला साहू को छोड़कर रमन सरकार के तकरीबन सभी मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कुछ न कुछ प्रकरण हैं, और वे जांच के घेरे में आ गए हैं। बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ उनकी अपनी सरकार ने ही जांच बिठा रखी थी, इसलिए नई सरकार को आगे कुछ करने की जरूरत नहीं है। 

पूर्व गृहमंत्री रामसेवक पैकरा पर गलत जानकारी देकर पत्नी के नाम गैस एजेंसी हासिल करने के मामले की पड़ताल चल रही है। अजय चंद्राकर भी आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच के घेरे में हैं। अमर अग्रवाल और उनके परिवार के कई उद्योगपति सदस्यों के खिलाफ तरह-तरह के केस दर्ज भी हंै, और चर्चा में भी हैं। सुनते हैं कि अमर ने आबकारी में काफी खेल खेला था और एसआर सिंह नाम का अभी लापता या फरार चल रहा भूतपूर्व अफसर अमर की मेहरबानी से ही नौ-नौ बार संविदा नियुक्ति पाकर बड़े-बड़े आईएएस अफसरों से भी ऊपर आबकारी की पूरी साजिश करते रहा, और हजारों करोड़ का दो नंबर का काम उसी दौर में हुआ। राजेश मूणत के खिलाफ अभी तक कोई ठोस प्रकरण नहीं आया है। जबकि खुद डॉ. रमन सिंह कई प्रकरणों में घिर गए हैं। अब 15 साल सरकार में थे, तो गलती होना स्वाभाविक था। कुछ गलतियां अनजाने में हुई, तो कुछ लापरवाही से हुई, शायद यह सोचकर कि सत्ता परिवर्तन होगा ही नहीं। सरकार में बाकी उपेक्षित-तिरस्कृत नेता-अफसरों का यह मानना रहा कि रमन सिंह की टीम यह मानकर चल रही थी कि वे अमर-बूटी पा चुके हैं, और खा चुके हैं। इसी धोखे में बहुत से मामले खड़े रह गए जो कि आज जांच और कटघरे तक पहुंचा रहे हैं। फिलहाल मौजूदा सरकार के लिए अगले चुनाव में जाने तक के लिए काफी कुछ मसाला तैयार हो गया है। 

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14-May-2019 (33)

विधायक भीमा मंडावी के निधन के बाद खाली दंतेवाड़ा सीट पर अगले कुछ महीनों में उपचुनाव होना है। राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा है कि नक्सलियों की गोली से मारे गए विधायक भीमा मंडावी के परिजनों में से भाजपा किसी को प्रत्याशी बनाती है, तो शायद कांग्रेस उम्मीदवार न खड़ा करे। भाजपा के कुछ लोग महाराष्ट्र और एक-दो अन्य राज्यों की परंपरा का हवाला देकर सत्तारूढ़ दल कांग्रेस से कुछ इसी तरह की उम्मीद पाले हुए हैं। 

महाराष्ट्र में पूर्व गृहमंत्री आरआर पाटिल के निधन के बाद एनसीपी ने उनकी पत्नी को उम्मीदवार बनाया, तो सत्तारूढ़ दल भाजपा ने उपचुनाव में प्रत्याशी नहीं खड़े किए। इसी तरह महाराष्ट्र के एक और प्रतिष्ठित नेता पतंगराव कदम के निधन के बाद हुए उपचुनाव में भी भाजपा ने पतंगराव कदम के बेटे विश्वजीत कदम के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारा। पर छत्तीसगढ़ में इस तरह की परंपरा नहीं रही है। बालोद में भाजपा विधायक मदन लाल साहू के निधन के बाद उपचुनाव में पार्टी ने उनकी पत्नी कुमारी बाई को प्रत्याशी बनाया, तो कांग्रेस ने पूरी दमदारी से चुनाव लड़ा था। झीरम नक्सल हमले में मारे गए नंदकुमार पटेल के पुत्र उमेश पटेल के खिलाफ प्रत्याशी खड़ा करने में भाजपा ने जरा भी संकोच नहीं किया। 

इस बार के विधानसभा चुनाव में तो उमेश पटेल को हराने के लिए हर संभव कोशिश की गई।  कुछ लोगों का अंदाजा है कि पार्टी ने सबसे ज्यादा पैसे खर्च खरसिया में उमेश पटेल को हराने के लिए किए। वैसे तो डॉ. रमन सिंह को संवेदनशील सीएम माना जाता रहा है, लेकिन वे चुनावी राजनीति में कठोर रहे। उन्होंने तो दिवंगत पूर्व गृहमंत्री नंदकुमार पटेल के गृहग्राम नंदेली में सभा लेकर एक तरह से कांग्रेस के गढ़ को ध्वस्त करने कोशिश की। ये अलग बात है कि इन तमाम हथकंडों के बावजूद भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा। यह सब देखकर नहीं लगता कि कांग्रेस, दंतेवाड़ा उपचुनाव में मैदान छोड़ेगी। 

परंपराएं तो पहले ही ढह गईं...
इसी किस्म की दूसरी बात छत्तीसगढ़ में यह है कि जोगी के वक्त से विधानसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने की पुरानी परंपरा खत्म कर दी गई थी। वरना अविभाजित मध्यप्रदेश में हमेशा ही उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दिया जाता था। जोगी ने भाजपा के एक दर्जन से अधिक विधायक तोड़े भी थे, और ऐसी कई परंपराएं शुरू की थीं जो कि पुरानी लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ थीं। फिर तो छत्तीसगढ़ में परंपराएं गड्ढे में डाल दी गईं, और विधानसभा अध्यक्ष भी कई ऐसे काम करते दिखे जो कि उनकी गरिमा के लायक नहीं थे। जब डॉ. रमन सिंह अपनी सरकार की सालगिरह पर सीएम हाऊस में मीडिया से बात कर रहे थे, तब उनके बगल में उनके दूसरे मंत्रियों के साथ-साथ विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल भी सीएम से नीची कुर्सी पर बैठे थे। उन्हें एक पिछले विधानसभा अध्यक्ष पे्रम प्रकाश पाण्डेय ने याद भी दिलाया कि क्या उनका सीएम की पे्रस कांफे्रंस में आना ठीक है?

कनक तिवारी के खिलाफ अभियान
छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता कनक तिवारी राज्य के सबसे सीनियर वकील हैं, और भूपेश बघेल ने उनकी वरिष्ठता, काबिलीयत, उनका गांधीवादी मिजाज, कांगे्रसी पृष्ठभूमि, और दुर्ग जिले के होने की तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए उन्हें महाधिवक्ता बनाया। लेकिन उसी वक्त कांगे्रस के कुछ दूसरे लोग एक जातिवाद के तहत एक दूसरे को महाधिवक्ता बनाने में जुटे हुए थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने उस वाद को वजन नहीं दिया। कनक तिवारी कमाई के मामले में भारी नुकसान में हैं क्योंकि आज जितने महंगे मुकदमे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चल रहे हैं, वे कनक तिवारी को करोड़पति तो बना ही देते अगर वे सरकार के खिलाफ लडऩे के लिए उपलब्ध रहते। करोड़पति वे पहले से हैं, पहले से कई मकान और कई गाडिय़ां हैं, वे महंगी वकालत करते हैं इसलिए एजी बनने से उन्हें कमाई का नुकसान हुआ है। और ऐसे में जब कांगे्रस का एक तबका उन्हें हटाने में जुटा हुआ है, तो जाहिर है कि सोशल मीडिया और मीडिया में उनके इस्तीफे की अफवाहें पहला कदम हैं।
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13-May-2019 (29)

हाउसिंग बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह सवन्नी नियम-विरूद्ध मकान आबंटन मामले में फंस सकते हैं। सुनते हैं कि जिस बंगले में वे रहते हैं, वह बोर्ड के अध्यक्ष के लिए था। सवन्नी को बंगला इतना भाया कि सरकारी अनुमति लेकर बंगले को नीलाम करवाकर अपने पास ही रख लिया। यह बंगला उनके ही करीबी समर्थक के नाम पर है। चर्चा तो यह भी है कि इस बंगले पर दो आईएएस अफसरों की नजरें थी। दोनों ने ही अपने नाम पर बंगला कराने के लिए काफी कुछ किया भी, लेकिन वे नीलाम नहीं करवा पाए। पर सवन्नी सबसे तेज निकले और उन पर धरमलाल कौशिक का भरोसा रहा है। कहा जा रहा है कि बंगले की नीलामी की प्रक्रिया में नियम कायदे का ध्यान नहीं रखा गया। कुछ इस तरह की नीलामी हुई कि बंगला अपनों के पास आ गया। अब सरकार बदलते हाउसिंग बोर्ड और अन्य संस्थाओं में एक के बाद एक भ्रष्टाचार के गंभीर प्रकरण सामने आ रहे हैं। कुछ की जांच चल रही है। ऐसे में सवन्नी के खिलाफ एक शिकायत तो ईओडब्ल्यू को पहले ही जा चुकी है। एक-दो और भ्रष्टाचार के प्रकरण जल्द सामने आ सकते हैं। 

ऐसे में आने वाले दिनों में सवन्नी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती है। और यह भी हो सकता है कि उन्हें भी महेश जेठमलानी की सेवाएं लेनी पड़े। जैसे-जैसे सवन्नी पर कोई मुश्किल बढ़ेगी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक के सीने में दर्द बढ़ते चलेगा। शायद यह सोचकर भी सरकार उस तोते के पंख खींच रही है, जिस तोते में कौशिक की जान बसती है। कौशिक की ऐसी ही एक दूसरी जान मुख्यमंत्री के जिले में जंगल दफ्तर में बसी हुई है, यह बात भी अभी-अभी सरकार की जांच एजेंसियों को मालूम हुई है।

ऊंचे दर्जे का आत्मविश्वास
लोकसभा चुनाव के प्रचार में बहुत से लोग छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के इस खुले चुनावी दावे के रहस्य को अब तक सुलझा नहीं पाए हैं कि उनकी सरकार ने कौन-कौन से काम अगर न किए हों, तो जनता उन्हें बिल्कुल वोट न दे। उन्होंने कर्जमाफी से लेकर धान के बढ़े हुए दाम, और धान बोनस तक कई बातों को गिनाया था, और वोटरों को चुनौती दी थी कि अगर उनकी सरकार ने ये काम अब तक नहीं किए हैं तो उन्हें वोट न दें। यह एक खतरनाक दांव था, और जब कोई आत्मविश्वास से खूब भरा रहे तभी ऐसा हो सकता है। 

जनता के लिए नाम-नंबर जारी
अभी ऐसा एक दूसरा मामला सामने आया है जिसमें प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कों की क्वालिटी परखने के लिए बाहर के राष्ट्रीय गुणवत्ता समीक्षक आने वाले हैं। इनके नाम और इनके फोन नंबर उन जिलों के नाम के साथ पीएमजीएसवाई ने जारी कर दिए हैं जहां ये जाने वाले हैं। ठेकेदारों को तो नाम वैसे भी विभागों से मिल जाते हैं कि कौन कहां जाने वाले हैं। यह एक नया अंदाज है कि इनके नाम और नंबर समाचार में जारी कर दिए जाएं ताकि उन जिलों के आम लोग भी इन समीक्षकों को फोन करके सड़कों की गड़बड़ी के बारे में बता सकें। किसी सरकारी निर्माण विभाग में ऐसा आत्मविश्वास पहले शायद ही रहा हो कि पारदर्शी तरीके से जनता को शामिल किया जाए कि वे अपने इलाके की सड़कों की क्वालिटी के बारे में रिपोर्ट कर सकें। जाहिर है कि ठेकेदारों में इसे लेकर दहशत है कि पुराने अंदाज से काम अब शायद न चले। कुछ ठेकेदार और कुछ हटाए गए अफसर अब सूचना के अधिकार के तहत दूसरे लोगों के मार्फत कई किस्म की जानकारी निकालने में लगे हैं। खाली दिमाग शैतान का घर।
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12-May-2019 (33)

रमन सरकार में ताकतवर रहे अफसरों के खिलाफ जांच-पड़ताल चल रही है। उनके खिलाफ गंभीर शिकायतें हैं। इन शिकायतों को देखकर भाजपा के भी कई नेता हैरान हैं। यह सवाल भी उठा रहे हैं कि आखिर भाजपा सरकार रहते हुए उन पर नकेल डालने की कोशिश क्यों नहीं हुई। सुनते हैं कि जांच-पड़ताल के बावजूद पूर्व सीएम का अमन सिंह-मुकेश गुप्ता जैसे अफसरों पर भरोसा कम नहीं हुआ है। इसकी झलक इस बात से मिलती है कि पूर्व सीएम के दामाद डॉ. पुनीत गुप्ता, निलंबित डीजी मुकेश गुप्ता और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की जनहित याचिका की पैरवी एक ही वकील यानी महेश जेठमलानी कर रहे हैं। अलबत्ता, अमन सिंह की तरफ से सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह और पूर्व एडिशनल सालिसिटर जनरल मानविंदर सिंह पैरवी कर रहे हैं। 

महेश जेठमलानी सुप्रीम कोर्ट के नामी वकील राम जेठमलानी के बेटे हैं। महेश का भी वकालत पेशे में काफी नाम है। उनकी फीस प्रति पेशी 10 लाख के आसपास बताई जाती है। सुनते हैं कि महेश की निलंबित डीजी मुकेश गुप्ता से पुरानी जान-पहचान है। रमन सरकार के समय एक मानहानि मुकदमे के लिए मुकेश गुप्ता की तरफ से पहली बार पैरवी आए थे। तब से छत्तीसगढ़ सरकार के कई मुकदमों की पैरवी सुप्रीम कोर्ट में कर चुके हैं। इन दिग्गज वकीलों की फीस जुटा पाना किसी भी सामान्य नौकरशाह के लिए कठिन है। चूंकि जांच-पड़ताल में घिरे अफसर हरफनमौला माने जाते हैं ऐसे में इन्हें फीस जुटाने में कोई समस्या होगी, ऐसा लगता नहीं है। हल्ला तो यह भी है कि रमन सरकार में एक बार दिग्गज वकील को खुफिया मद से करीब 37 लाख भुगतान किए गए थे। अब खुफिया मद का कोई ऑडिट तो होता नहीं है। इसलिए अब इसकी जांच भी संभव नहीं है। 

छुपाने में लगे अफसर...
छत्तीसगढ़ सरकार में कई विभागों या स्थानीय संस्थाओं के अधिकारियों से मीडिया समाचार के बारे में रोज ही कई सवाल करता है। इससे गलत खबर छपना या दिखना भी रूकती है, और सरकारी सच भी सामने आ जाता है। लेकिन बहुत सी छपी हुई खबरों में सरकार का पक्ष बताने वाले अधिकारियों की भाषा देखें तो लगता है कि वे कोई भी जवाब देने से ठीक उस तरह बचते हैं जिस तरह अदालत के कटघरे में कोई पेशेवर गवाह वकील के पूछे हर सवाल के जवाब में घुमाफिराकर जवाब दे रहा हो। न तो इससे सच सामने आता, और न ही झूठ को प्लांट किया जा सकता है। नतीजा यह निकलता है कि सरकार मानो किसी मुजरिम की तरह बच निकलने की कोशिश कर रही हो। और बहुत से मामलों में ऐसा होता भी है। मीडिया के पास सरकार से जुड़ी हुई वही खबरें तो पहुंचती हैं जिनमें कुछ गड़बड़ी होती है। ऐसे में सरकार अगर जवाब देने को उपलब्ध न हो, तो कुल मिलाकर नुकसान सरकार का ही होता है। अब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री हैं जो कि पन्द्रह बरस के रमन राज, और उसके पहले के तीन बरस के जोगी राज में भी, विपक्ष की तरह ही रहे, मीडिया के साथ उनके दोस्ताना ताल्लुकात रहे। मीडिया के दो पुराने पेशेवर रहे लोग, विनोद वर्मा और रूचिर गर्ग, आज उनके सरकारी सलाहकार भी हैं, लेकिन सरकारी अफसरों का रूख पहले की तरह ही छुपाने या घुमाने का बना हुआ है। अभी तो नई सरकार की गलतियां, या उसके गलत काम सामने आए भी नहीं हैं, और पिछली सरकार के जिन गलत कामों को नई सरकार उजागर करना चाह रही है, उनके बारे में भी आज के अफसर गोलमोल जवाब देकर पहले के गलत कामों को छुपाने में लगे हैं। नुकसान तो मौजूदा सरकार का ही है। 
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11-May-2019 (39)

छत्तीसगढ़ के एक नामी आईएएस रहे ओ.पी. चौधरी पिछली सरकार में सबसे ताकतवर नौकरशाह, अमन सिंह के सबसे पसंदीदा अफसरों में से एक रहे, और फिर छत्तीसगढ़ का माटीपुत्र होने के नाते राजनीतिक महत्वाकांक्षा उन्हें स्वाभाविक लगी, और वे देश की एक सबसे सुरक्षित नौकरी छोड़कर चुनाव में उतर गया। जिन लोगों को भाजपा के सरकार बनाने की गारंटी लग रही थी, उनके बीच इस बात को लेकर बहस होती थी कि विधायक बनने के बाद ओ.पी. चौधरी खेल और युवा कल्याण मामलों के मंत्री बनेंगे या युवा आयोग के अध्यक्ष? खैर, भाजपा की सरकार बनी नहीं, और कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के तेवर पिछली सरकार की गड़बडिय़ों को लेकर इतने आक्रामक हैं कि खुद कांग्रेस विधायकों को ऐसा अंदाज नहीं था। 

अब ओ.पी. चौधरी दंतेवाड़ा की कलेक्टरी के समय के जमीन के एक फैसले को लेकर एक जांच के घेरे में हैं। चौधरी रायपुर के भी कलेक्टर रहे हुए हैं, और इसी कुर्सी पर उनसे बरसों पहले बैठने वाले सी.के. खेतान को चौधरी के जमीन के फैसले की जांच दी गई है। सी.के. खेतान अब एसीएस हैं, और सुनील कुजूर के रिटायर होने के बाद जिन दो अफसरों में से एक की सीएस बनने की संभावना है, वे उनमें से एक हैं। इसलिए इस जांच में वे कोई कसर रखेंगे ऐसा लगता नहीं है। दूसरी तरफ इस जांच को होने से रोकने के लिए जिस तरह से कुछ लोगों ने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाई थी, उससे भी लगता है कि इस जांच में छुपाने लायक कुछ बात है। 

एक वक्त रेणु पिल्ले...
दूसरी तरफ अमन सिंह की पत्नी यास्मीन सिंह के खिलाफ एक जांच शुरू हुई है। वे पीएचई में सलाहकार के पद पर काम करती रहीं, लेकिन साथ-साथ वे पूरे देश में कत्थक के मंच प्रदर्शन में भी लगी रहीं। अब जांच उनकी नियुक्ति से लेकर उनके काम और उनकी छुट्टियों तक फैली हुई है। यह जांच प्रदेश की एक सबसे कड़क समझी जाने वाली आईएएस अधिकारी रेणु पिल्ले को दी गई है जो कि पिछली रमन सिंह सरकार में अपने एक शासकीय फैसले को लेकर पल भर में सरकार से बाहर कर दी गई थीं, और राजस्व मंडल नाम के कालापानी पर भेज दी गई थीं। जिस बैठक में रेणु पिल्ले को हटाने का फैसला हुआ, उसमें रेणु पिल्ले के साथ-साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, मुख्य सचिव विवेक ढांड, राजस्व मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव अमन सिंह मौजूद थे। पिछली सरकार में यह जाहिर था कि जिस बैठक में अमन सिंह रहते थे, उसके फैसले या तो वे ही लेते थे, या उनकी सहमति वाले फैसले ही होते थे। ऐसे में रेणु पिल्ले की साफ-साफ असहमति ने उन्हें पल भर में कुर्सी से हटा दिया गया था, और वे बिना किसी शिकायत सिर ऊंचा किए हुए राजस्व मंडल चली गई थीं। वक्त कैसे बदलता है, आज यास्मीन सिंह के मामले की जांच रेणु पिल्ले कर रही हैं। 

हाथापाई से लेकर जांच तक...
कुछ ऐसी ही एक दूसरी जांच राज्य के एक डीजीपी, निलंबित मुकेश गुप्ता की हो रही है। उनके खिलाफ चल रही कई जांच में से एक पुलिस महानिदेशक डी.एम. अवस्थी करने जा रहे हैं। लोगों को अच्छी तरह याद है कि जब चुनाव आयोग ने कई बरस पहले डीजीपी विश्वरंजन को जबरिया छुट्टी पर भेजा था, और अनिल नवानी को पुलिस विभाग का मुखिया बनाया गया था, तो उनकी टेबिल पर एक बैठक के बीच मुकेश गुप्ता डी.एम. अवस्थी पर चढ़ बैठे थे, दोनों के बीच बुरी जुबान के बाद हाथापाई की नौबत आई थी, और वहां मौजूद दो दूसरे बड़े आईपीएस ने दोनों को पकड़कर खींचकर अलग किया था। उस वक्त उस बैठक में मौजूद एक या दो महिला आईपीएस अधिकारी यह देखकर हक्का-बक्का रह गई थीं। उस पूरी घटना को नवानी की कमजोर लीडरशिप का भी नतीजा माना गया था कि डीजीपी के कमरे में उनके दो मातहत किस तरह ऐसे भिड़ सकते हैं। बैठक में बहस इस बात को लेकर हुई थी कि इंटेलीजेंस के मद से जिलों के एसपी को पर्याप्त रकम दी जा रही है या नहीं? खैर, अब मुकेश गुप्ता की बाकी बची नौकरी से बहुत अधिक लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के तेवर देखते हुए किसी जांच में मुकेश गुप्ता से किसी रियायत के आसार नहीं दिखते हैं। 

एक जांच अफसर रेणु पिल्ले, और एक जांच अफसर डी.एम. अवस्थी, इन दोनों को बदले हुए हालात में इन बदले हुए किरदारों में देखकर लोगों को यह सबक भी लेना चाहिए कि जब वक्त अपना चल रहा हो, तो दिख रहे आज के साथ-साथ न दिख रहे आने वाले कल का भी ध्यान रखना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में किसे कितनी सीटें?
छत्तीसगढ़ के चुनाव में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, इस पर अटकल किनारे चली गई है। यहां की सीटों से न तो दिल्ली की सरकार बननी हैं, न बिगडऩी है। और न ही छत्तीसगढ़ में सरकार की सेहत पर इससे सीधे-सीधे कोई फर्क पडऩे जा रहा है। ग्यारह सीटों में से दस भाजपा के पास थी, और एक पर कांग्रेस के ताम्रध्वज साहू सांसद थे। अब कांग्रेस कहने के लिए तो ग्यारह सीटों का दावा कर रही है, लेकिन उसके वरिष्ठ मंत्री टी.एस. सिंहदेव देश में चुनाव के चलते-चलते भी पता नहीं क्यों सात सीटों तक अपनी बात लाकर रूक जाते हैं। उन्हें बार-बार लगता है कि कांग्रेस सात से अधिक सीटें शायद न भी पाए, और वे सात से कम को कांग्रेस की नाकामयाबी भी बता रहे हैं, जो कि कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि वे इसे मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल की नाकामयाबी बताने की ओर इशारा कर रहे हैं। 

जो भी हो, सीटों के बारे में लोगों का एक मोटा अंदाज यह है कि दोनों ही पार्टियों की कम से कम चार-चार सीटों की गारंटी है, और तीन सीटें डांवाडोल हैं जो कि किसी भी करवट बैठ सकती हैं। ये चार-चार सीटें कौन सी हैं, इसके बारे में भी काफी लोगों को अंदाज है और ऐसी आठ सीटों के बाद तीन सीटों के नाम ही तो बचते हैं। आम चर्चा के मुताबिक सरगुजा, बिलासपुर, रायपुर, और दुर्ग में लोग भाजपा की संभावना देख रहे हैं, और बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव, और कोरबा में कांग्रेस की। अब जो तीन सीटें बच गई हैं वे जांजगीर, रायगढ़, और महासमुंद हैं। कांग्रेस के कम से कम चार दिग्गजों की निजी प्रतिष्ठा तीन सीटों पर लगी हुई है, और भाजपा के मुकाबले कांग्रेस में अधिक बेसब्री से इंतजार है।
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10-May-2019 (41)

 

उत्तरप्रदेश की तीन लोकसभा सीटों पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके एक वरिष्ठ मंत्री मोहम्मद अकबर चुनाव प्रचार करके लौट आए। अमेठी और रायबरेली तो कांग्रेस नेताओं के लिए तीर्थयात्रा जैसी रहती है इसलिए इन दोनों सीटों पर इन दोनों ने अपनी मेहनत भी की, और वहां पर गांव-गांव तक छत्तीसगढ़ के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ड्यूटी पर भी लगाया। लेकिन इसके अलावा एक तीसरी सीट पर भी मेहनत की, बाराबंकी। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रभारी पी.एल. पुनिया का बेटा बाराबंकी से चुनाव लड़ रहा है, और यहां पर कुर्मी मतदाता भी खूब हैं, और मुस्लिम मतदाता भी। ऐसे में कुर्मी मुख्यमंत्री और मुस्लिम मंत्री की यह जोड़ी हिट रही क्योंकि दोनों बोलने में भी तेज हैं। वहां भूपेश बघेल को मुस्लिमों के बीच यह भी साफ करना पड़ा कि मोहम्मद अकबर अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नहीं हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े विभागों के मंत्री हैं जिनमें सस्ता राशन देने वाला विभाग भी शामिल है। दोनों ने सस्ते राशन से लेकर कर्जमाफी तक का सारा श्रेय राहुल गांधी के नीति-निर्देश को दिया, और यह उम्मीद बंधाई कि दिल्ली में राहुल की सरकार बनने पर पूरे देश को इस तरह की मदद मिलेगी। अब उत्तरप्रदेश से लौटने के बाद भूपेश बघेल मध्यप्रदेश में भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और मौजूदा मुख्यमंत्री कमलनाथ के इलाकों में चुनाव प्रचार करने चले गए हैं। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के समय भी दिग्विजय के मंत्री रहे हैं, और उन्हीं के अखाड़े के पहलवान भी हैं। इस चुनाव में प्रदेश के बाहर जिस कांग्रेसी मुख्यमंत्री की सबसे अधिक मांग रही है, वे भूपेश बघेल ही हैं। इसके साथ-साथ अमेठी और रायबरेली की मेहनत भी उनके नाम मजबूती से दर्ज हो गई है। कांग्रेस में इससे अधिक लगता क्या है? 

नब्ज ऑटो-टैक्सी में है
पूरे देश में चुनाव की रिपोर्टिंग करते घूमने वाले मीडिया के लोगों को किसी शहर पहुंचते ही नब्ज टटोलने के लिए सबसे पहले टैक्सी या ऑटो के लोग मिलते हैं। इसलिए सरकार को इस तबके को खुश रखना चाहिए। लोगों को याद होगा कि केजरीवाल जब सरकार में आए, तब दिल्ली के सारे ऑटो वाले उनके साथ थे। हालांकि दिल्ली के वोटर को मीडिया से ऐसा कोई लेना-देना नहीं रहता कि बाहर के आए हुए मीडिया के लोग ऑटो-टैक्सी से पूछकर जो लिखें, उसे सुनकर दिल्ली के वोटर वोट डालते हों। लेकिन बाकी हिन्दुस्तान में तो बाहर से जाने वाला मीडिया चुनाव का रहस्य सबसे पहले ऑटो-टैक्सी वालों से ही समझना चाहता है। इसी तरह सड़क के रास्ते जो रिपोर्टर लंबा सफर करते हैं वे ढाबे वालों से बात करते चलते हैं, और हवा का रूख भांपने की कोशिश करते हैं। अभी छत्तीसगढ़ से कुछ रिपोर्टर उत्तरप्रदेश गए थे, और तरह-तरह से परखने के बाद उनका नतीजा यह था कि तकरीबन पूरा प्रदेश गठबंधन के साथ है। गठबंधन यानी सपा-बसपा गठबंधन। इन दोनों की ऐतिहासिक लड़ाई के बाद यह ऐतिहासिक दोस्ती उत्तरप्रदेश के आम वोटर के लिए बहुत ही वजनदार साबित हो रही है। और अगर यह रूख नतीजों को बता रहा है तो उसका मतलब यह है कि भाजपा को योगीराज में खासे बड़े हिस्से में संन्यास पर भेजा जा रहा है। 

भूमाफिया बनी पुलिस
छत्तीसगढ़ के बहुत से जिलों में पुलिस जमीन-जायदाद के अघोषित कारोबार में ऐसी लग गई है कि किसी थाने में पोस्टिंग का मोलभाव उस थाना इलाके में जमीनों के सौदों को देखकर तय होता है। जमीनों के कब्जों को लेकर, किसी और झगड़े को लेकर जहां पुलिस की दखल नहीं बनती है वहां पर भी पुलिस की दखल के दाम लगते हैं, जहां भी पुलिस दखल बनती है, वहां पर एफआईआर न लिखने के भी दाम लगते हैं। अभी दुर्ग जिले में कल ही एसपी ने एक थानेदार को सस्पेंड किया। उस पर लंबे समय से एक शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज न करने की शिकायतें थीं, और वही बात उसे ले डूबी। मुख्यमंत्री का अपना जिला, गृहमंत्री का भी जिला, और भी ताकतवर विधायकों का यह जिला पुलिस में ऐसे कई मामले देख रहा है जिनमें धड़ल्ले से मोलभाव चलते रहता है। अभी एक-दो ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है लेकिन कुल मिलाकर हाल बुरा ही है। दुर्ग पुलिस का जमीन का एक ऐसा मामला अभी सामने आया है जिसमें एक आदमी ने रिपोर्ट लिखाई, उस पर पुलिस ने सौदा करवाकर, रकम वापिस करवाने की बात तय कर ली, और जब शिकायतकर्ता ने हलफनामा देकर शिकायत वापिस ले ली, तो पुलिस रकम दिलवाने से मुकर गई। नतीजा यह है कि अब शिकायतकर्ता फिर पुलिस में पहुंचा हुआ है कि वह अपना हलफनामा खारिज करवाकर कार्रवाई चाहता है। 

रायपुर के एक अखबार में कल ही रिपोर्ट छपी है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के अपने चुनाव क्षेत्र पाटन में पूरी रात शराब की होम-डिलिवरी चलती रहती है। अब यह जाहिर है कि पुलिस के साथ के बिना तो ऐसा हो नहीं सकता। देखना यह है कि बाकी प्रदेश में जमीनों के सौदागर और दलाल बनी हुई पुलिस की रंगदारी के खिलाफ कब कार्रवाई होगी। दरअसल यह प्रदेश ऐसे बड़े-बड़े धाकड़ और ताकतवर पुलिस अफसरों को जमीन के अवैध कारोबार का मुखिया बना हुआ देख चुका है, और उनकी वजह से विभाग के बाकी छोटे अफसरों की धड़क खुली हुई है। 

भाजपा के घर में खड़कते बर्तन
सीएम भूपेश बघेल के खिलाफ विवादित बयान से भाजपा विधायक  शिवरतन शर्मा ने भले ही पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन पार्टी के भीतर इसको लेकर विवाद जारी है। चर्चा है कि पार्टी का संगठन में हावी खेमा चाहता था कि भूपेश के खिलाफ बयान को किसी भी दशा में वापस नहीं लिया जाना चाहिए। भले ही इसके लिए अदालती कार्रवाई का सामना करना पड़े। 

सुनते हैं कि पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह ने शिवरतन शर्मा को सलाह दी कि बयान वापस लेने की जरूरत नहीं है। मगर पार्टी का दूसरा खेमा इससे सहमत नहीं था। चर्चा है कि एक पूर्व मंत्री ने रमन सिंह से पूछ लिया कि आपत्तिजनक बयान उन्हीं से जुड़े लोगों के नाम से क्यों जारी होती है? कभी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल और राजेश मूणत इस तरह का बयान क्यों नहीं देते। विरोधी खेमे की आक्रामकता को देखकर रमन और बाकी नेताओं को पीछे हटना पड़ा। आनन-फानन में सब कुछ मीडिया विभाग पर थोपकर किसी तरह विवाद का निपटारा  करने की कोशिश हुई। मगर, एक खेमा अभी भी मीडिया विभाग में आमूलचूल परिवर्तन के लिए दबाव बनाए हुए हैं। अब लोकसभा चुनाव निपटने के बाद इन सबको लेकर हाईकमान हस्तक्षेप कर सकता है। 

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09-May-2019 (49)

जम्मू-कश्मीर राज्य के लेह में एक प्रेस कांफ्रेंस के बाद भाजपा पर यह आरोप लगा कि उसने पत्रकारों को नगदी भरे हुए लिफाफे बांटे। खुद पत्रकारों ने इसकी शिकायत निर्वाचन आयोग से की, और इसकी जांच हो रही है। (लोगों को उम्मीद है कि उस पर भी चुनाव आयोग अपनी वही मशहूर हो चुकी क्लीनचिट देगा)। ऐसे में छत्तीसगढ़ के कुछ बरस पहले की एक ऐसी प्रेस कांफ्रेंस याद पड़ती है जो हुई ही नहीं थी। एक केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय कोरबा के किसी बिजलीघर दो देखने के लिए आए थे और लौटते में रायपुर की पिकैडली होटल में उनकी पे्रस कांफे्रंस रखी गई थी। उनको आने में देर होती चली गई, लेकिन तब तक छत्तीसगढ़ राज्य बना नहीं था, और केंद्रीय मंत्री का आना इस इलाके के लिए एक बड़ी घटना थी इसलिए मीडिया इंतजार करते बैठे रहा। वे काफी देर से आए और उड़ान का समय हो गया था। आते ही उन्होंने पूछा कि मीडिया को कुछ खाना-पीना मिला या नहीं? इसके बाद अपने बेतकल्लुफ अंदाज में उन्होंने अपने अफसरों से कहा कि इन्हें ठीक से खिलाओ-पिलाओ। फिर उन्होंने साथ के अफसरों की ओर देखा तो बैग से गिफ्ट पैक किए गए सूट के कपड़े निकाले गए, और कल्पनाथ राय ने पत्रकारों को पैकेट थमाए, और कहा कि देर हो रही है वे निकल रहे हैं।

लेह के पत्रकारों ने शिकायत चाहे जो की हो, चाहे किसी वजह से की हो, लेकिन पत्रकारों के बीच तोहफे या नगदी बंटना कोई बहुत नई बात नहीं है। दशकों पहले रायपुर में तबकी कपड़ों की एक मशहूर कंपनी एस कुमार्स की तरफ से एक फैशन परेड रायपुर में की गई थी, और जो विज्ञापन एजेंसी इसकी प्रेस कांफ्रेंस कर रही थी, उसने चुनिंदा रिपोर्टरों को बता दिया था कि वहां सबको सूट के कपड़े दिए जाएंगे। प्रेस कांफ्रेंस की औसत भीड़ से दो गुना भीड़ वहां लग गई थी। पहले भी यही हाल था, और अब भी यही हाल है कि पत्रकारों को तनख्वाह बहुत कम मिलती है, कहीं-कहीं पर मिलती भी नहीं है। ऐसे में यह इस पेशे के साथ जुड़ा हुआ एक छोटा सा फायदा था जो कि उस वक्त रिश्वत नहीं थी। रिश्वत तो वह पिछले चार-पांच चुनावों से हो गई है जब मीडिया मालिक सत्तारूढ़ पार्टी या करोड़पति उम्मीदवार से मोटा पैकेज पाते हैं, न मिलने पर बांह मरोड़कर ले लेते हैं। ऐसे में अधिक असरदार मीडिया में काम करने वाले अधिक असरदार पत्रकारों का भी राजनीतिक दल ख्याल रखने लगे हैं, जो मंजूर करे उसे पैकेज दे दिया जाता है, लेकिन जो मंजूर न करे उससे डरकर रहा जाता है। जिस तरह सरकार, अदालत, समाजसेवा किसी भी दायरे में अच्छे और बुरे दोनों किस्म के लोग हैं, वैसा ही हाल मीडिया का भी है, बाकी धंधों से न बेहतर, न बदतर।

इन्हें देखकर कुछ तो सीखें...
अभी एक तस्वीर खबरों में आई है जिनमें एक नौजवान मतदाता लड़की वोट डालने गई है, और चुनाव अफसर उसके पांव की ऊंगली पर स्याही का निशान लगा रहा है क्योंकि उसके हाथ नहीं है। हाथ नहीं हैं पर हौसला है, अगली सरकार या अपना सांसद चुनने की हसरत है। इसलिए वह बिना हाथों के भी पहुंचकर, कतार में लगकर वोट डालने पहुंची थी, और यह तस्वीर हिन्दुस्तान के उन करोड़ों लोगों के मुंह पर तमाचा है जो साबुत हाथ लिए हुए घर बैठे रहे, वोट डालने नहीं गए। 

कुछ ऐसा ही हाल हर सुबह देखने मिलता है जब बहुत से जवान लोग उस वक्त सोकर उठते हैं जब सूरज एक बांस चढ़ चुका होता है, फिर मां-बाप की छाती पर मूंग दलना शुरू करते हैं, और चाय की फरमाईश करते हैं। इनके मुकाबले बहुत से बुजुर्ग लोग सुबह से घूमने निकल जाते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के अनुपम उद्यान में आज सुबह कांग्रेस के मीडिया-प्रभारी शैलेष नितिन त्रिवेदी को ऐसा एक नजारा देखने मिला जिसमें एक बुजुर्ग महिला छड़ी टेकते हुए वहां पहुंची, और फिर कसरत की एक मशीन के किनारे अपनी छड़ी लिटाकर रखी, और फिर मशीन पर चढ़कर अपने से दो-तीन पीढ़ी छोटी बच्ची के साथ जमकर कसरत करने लगी। इस तस्वीर को देखकर ऐसे लोगों को सोचना चाहिए जो जवानी में पलंग या कुर्सी तोड़ते पड़े रहते हैं, और बुढ़ापे में फिजियोथैरेपी को मजबूर होते हैं। 
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08-May-2019 (36)

सरकार बदलने के बाद भी कुछ निगम-आयोगों में भाजपा के लोग काबिज हैं, जिन्हें हटाने की कोशिश भी चल रही है। मार्कफेड के अध्यक्ष राधाकृष्ण गुप्ता हटाए जा चुके हैं और अब दुग्ध महासंघ अध्यक्ष रसिक परमार का नंबर है। रसिक परमार भी निर्वाचित हैं और उन्हें हटाने के लिए ग्राउंड तैयार किया जा रहा है। 

वैसे तो मीडिया जगत से आए रसिक परमार की साख अच्छी है और उन पर भ्रष्टाचार के कोई ठोस आरोप नहीं हैं। लेकिन दुग्ध महासंघ के अफसर जरूर मौज-मस्ती वाले रहे हैं। महासंघ में ऊंचे ओहदे पर रहे एक अफसर ने भाजपा की टिकट से विधानसभा चुनाव की तैयारी भी की थी, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिल पाई। अफसर ने मतदाताओं को रिझाने के लिए इलाके में दूध-मठा भी बंटवाया था। खैर, रसिक परमार को हटाने के लिए पार्टी नेताओं का दबाव है। उनका कैबिनेट मंत्री का दर्जा वापस लिया जा चुका है। चूंकि लोकसभा का चुनाव चल रहा है और कृषि मंत्री अस्वस्थ हैं। इसलिए इस पर कोई फैसला नहीं हो पाया है। कहा जा रहा है कि महीने के आखिरी तक उनकी सेवाएं वापस ली जा सकती है।