राजपथ - जनपथ

19-Mar-2020

आरएसएस का कब्जा बरकरार

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आरएसएस से जुड़े बलदेव भाई शर्मा की नियुक्ति को लेकर विवाद चल रहा है। एनएसयूआई ने इसके विरोध में प्रदर्शन भी किया है। इस नियुक्ति को लेकर राजभवन और सरकार के बीच मतभेद उभर आए हैं। 'छत्तीसगढ़Ó के पास कुलपति चयन से जुड़े कुछ दस्तावेज भी मौजूद हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कुलपति की नियुक्ति को लेकर राजभवन और सरकार के बीच किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पाई थी। 

कुलपति चयन के लिए तीन सदस्यीय सर्च कमेटी बनाई गई थी। जिसमें यूजीसी द्वारा कुलदीप चंद अग्निहोत्री, विवि के कार्यपरिषद द्वारा  वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और राज्य शासन द्वारा डॉ. के सुब्रमण्यिम  को सदस्य के रूप में नामांकित किया गया था। सर्च कमेटी ने देशभर से आए आवेदनों का परीक्षण कर 11 नवम्बर 2019 को 6 नामों का पैनल तैयार किया था। इसमें बलदेव भाई शर्मा, दिलीप मंडल, जगदीश उपासने, लवकुमार मिश्रा, मुकेश कुमार और उर्मिलेश के नाम थे। 

दस्तावेज बताते हैं कि राजभवन में सर्च कमेटी द्वारा अनुशंसित नामों के पैनल पर राज्य सरकार से अभिमत मांगा था। राज्य शासन द्वारा कुलपति पद के लिए उर्मिलेश का नाम सुझाया गया। इस पर राज्यपाल ने राज्यशासन के परामर्श से असहमत होते हुए बलदेव भाई शर्मा की नियुक्ति कर दी। छत्तीसगढ़ में पहली बार ऐसा हुआ है जब कुलपति की नियुक्ति को लेकर राजभवन और राज्यशासन के बीच एक राय नहीं दिखी। 

पिछली सरकार में भी राज्यपाल एक-दो मौके पर अपनी पसंद से कुलपति की नियुक्ति कर चुके हैं, लेकिन तब विवाद की स्थिति नहीं बनी थी। एक बार तत्कालीन राज्यपाल ईएलएस नरसिम्हन ने पैनल में अपने स्तर पर नाम छांटकर रविवि में कुलपति पद पर प्रो. एसके पाण्डेय की नियुक्ति की अनुशंसा कर दी थी। राज्य शासन ने तुरंत इसमें हामी भर दी। 

प्रो. पाण्डेय का कार्यकाल इतना बढिय़ा रहा कि राज्य शासन के परामर्श पर उन्हें दोबारा कुलपति नियुक्त किया गया। मगर इस बार मामला कुछ अलग था। यह पत्रकारों के साथ-साथ विचारधारा से भी जुड़ा था। ऐसे में राज्य शासन नहीं चाहती थी कि आरएसएस के कट्टर समर्थक और उसके मुखपत्र के संपादक बलदेव भाई शर्मा जैसे की कुलपति पद पर नियुक्ति हो, मगर ऐसा नहीं हुआ। ऐसे में विवाद होना तो स्वाभाविक है। जानकारों का अंदाजा यह भी है कि आने वाले दिनों में नियुक्ति और अन्य विषयों को लेकर राजभवन और सरकार के बीच खींचतान बढ़ सकती है, मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों एक अनौपचारिक चर्चा में सरकारी बेबसी के बारे में कहा भी था, और राज्य सरकार राजभवन के सामने अपनी इस बेबसी को खत्म करने के लिए तैयारी भी कर रही है। कुल मिलाकर पिछले 15 बरस से इस विश्वविद्यालय पर आरएसएस का कब्जा अब भी जारी है, और भूपेश सरकार हक्का-बक्का है।

एक नजारा रायपुर का
राजधानी रायपुर के पंडरी इलाके की यह तस्वीर फेसबुक पर अभी दोपहर को मनमोहन अग्रवाल ने पोस्ट की है। यह महसूस कर पाना मुश्किल है कि इस तस्वीर को देखकर मुस्कुराया जाए, या रोया जाए। सफाई करने के बीच दो पल को बैठीं ये दोनों महिलाएं अपने-अपने मोबाइल पर जुट गई हैं। दोनों के पास स्मार्टफोन दिख रहे हैं जो कि मुस्कुराने की बात हो सकती है। लेकिन दोनों के चेहरे या गले बिना मास्क के दिख रहे हैं। वे सड़कों पर सफाई कर रही हैं, लेकिन कोई बचाव उनके पास नहीं है। आम लोग आज सुबह रायपुर में कोरोना का एक पॉजिटिव मामला मिलने के बाद दहशत में हैं, घरों में आना-जाना कम कर रहे हैं, बाजार के काम टाल रहे हैं, और ये महिलाएं बिना मास्क सफाई में लगी हैं। अब जनसुविधा के ऐसे कामों में लगे हुए लोगों के बचाव की जिम्मेदारी म्युनिसिपल की है जो कि शहर को स्मार्ट बनाने के नाम पर करोड़ों खर्च कर रहा है, और दसियों लाख रूपए तो दीवारों पर सफाई अभियान के नारे लिखवाने पर खर्च हो रहे हैं। सबको मालूम है कि सफाई कर्मचारी गंदगी और धूल में काम करते हैं, लेकिन उन्हें एक मास्क भी नसीब नहीं है, दस्ताने भी नहीं। 

और एक नजारा इंदौर का भी...
लेकिन यह हाल महज सफाई कर्मचारियों का है ऐसा भी नहीं, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों को भी न दस्ताने मिले हैं, न मास्क। लोग जान पर खेलकर कोरोना जैसी बीमारी से जूझ रहे हैं। अब एक दिक्कत यह है कि धीरे-धीरे शवयात्रा में जाने वाले लोग भी कम होने लगेंगे। अभी एक अंतिम संस्कार में कुल 19 लोग जुटे, जिसमें दो ब्राम्हण थे, और दो नाबालिग। कंधा देने वाले कुल 15 लोग थे, जो बुरी तरह कम पड़ रहे थे। ऐसे में इंदौर के एक अखबार प्रजातंत्र में आज छपी यह तस्वीर देखने लायक है जिसमें एक पूर्व विधायक के परिवार में निधन के बाद शवयात्रा में आए तमाम लोगों को मास्क दिए गए ताकि उन्हें पहनकर ही वे चलें। लेकिन जैसा कि इस तस्वीर में दिख रहा है, शवयात्रा के सामने चल रहे बैंडपार्टी के लोग बिना मास्क के हैं। यह सामाजिक फर्क अब तक लोगों पर हावी है जिसमें महज अपनी नाक ढांक लेने को पूरी हिफाजत मान लिया जा रहा है, और आसपास काम करने वाले लोगों के लिए लोग अब भी बेफिक्र हैं। 

विदेश प्रवास महंगा पड़ा...
कोरोना के साए में दुबई प्रवास से लौटे कांग्रेस नेता रमेश वल्र्यानी को वाट्सएप ग्रुप में काफी भला-बुरा कहा जा रहा है। वल्र्यानी ने विदेश प्रवास से लौटने की जानकारी छिपा ली थी और अब विदेश प्रवास का पता लगने पर स्वास्थ्य विभाग ने उन्हें चिकित्सकीय निगरानी में घर में रहने के लिए कहा है। सुनते हैं कि वल्र्यानी और उनके साथियों ने चार महीने पहले होली के मौके पर दुबई की टिकट बुक करा ली थी। जब वे दुबई यात्रा के लिए रवाना हो रहे थे, तो कोरोना दुनियाभर में कहर मचा रहा था। 

दुबई सरकार ने भारतीयों को छोड़कर बाकी देशों के यात्रियों को प्रतिबंधित कर दिया था। यहां भी वल्र्यानी और उनके साथियों को कई शुभचिंतकों ने सलाह दी कि वे विदेश यात्रा टाल दें। कुछ लोग तैयार भी थे मगर यात्रा स्थगित होने से होटल-टिकट के 25 हजार रूपए नुकसान हो रहा था। इससे बचने के लिए वे दुबई चले गए। लौटकर आए, तो कोरोना को लेकर एडवायजरी को नजरअंदाज कर घूमने लग गए।  बात फैली, तो जिला प्रशासन और पुलिस में शिकायत हुई। आखिरकार वल्र्यानी समेत सभी 70 लोगों को होमआईसोलेसन में रखा गया है। सीएम भूपेश बघेल भी वल्र्यानी से बेहद नाराज बताए जाते हैं। थोड़े नुकसान के चक्कर में वल्र्यानीजी अपना बहुत कुछ नुकसान करा चुके हैं।   (rajpathjanpath@gmail.com)


18-Mar-2020

बाहर की रणनीति सदन में

छत्तीसगढ़ विधानसभा के इतिहास में पहला मौका है जब किसी सदस्य ने नाराजगी दिखाते हुए आसंदी पर कागज फाड़कर फेंक दिया।  वैसे तो, उत्तरप्रदेश के विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण को फाड़कर आसंदी पर फेंकने की घटनाएं कई बार हो चुकी हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस तरह की घटनाएं पहले कभी नहीं हुई थीं। अब जब सदन की कार्रवाई स्थगित करने के विरोध में बृजमोहन अग्रवाल और अजय चंद्राकर ने कार्यसूची फाड़कर आसंदी की तरफ फेंकी, तो मामला तूल पकड़ रहा है। 

सत्तापक्ष के सदस्यों ने विधानसभा सचिवालय को विशेषाधिकार हनन की सूचना देकर बृजमोहन और अजय के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। दोनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बन रहा है। दूसरी ओर, चर्चा है कि यह घटना पूर्व नियोजित थी। यह तय था कि कोरोना के चलते सदन की कार्रवाई नहीं चलेगी। ऐसे में बृजमोहन खेमे ने कार्यसूची फाड़कर फेंकने की रणनीति पहले ही बना ली थी। 

चूंकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है और पार्टी हाईकमान इसके लिए तेजतर्रार नेता की तलाश कर रहा है। अब जब कोरोना के चलते पार्टी की गतिविधियां विज्ञप्तियों तक सीमित होकर रह गई है, ऐसे मौके पर सदन में अपने को आक्रामक साबित करने का इससे बेहतर मौका नहीं था। दोनों विधायकों ने इस मौके को भुनाया भी। अब देखना है कि हाईकमान के प्रदेश अध्यक्ष चयन के मापदण्ड में दोनों नेता खरे उतरते हैं, या नहीं। 

हिन्दी में ब्लैकह्यूमर के खतरे...
बहुत से हौसलामंद लोग इन दिनों सोशल मीडिया पर कोरोना का मजाक उड़ा रहे हैं। ये लोग कोरोना-मौतों से भी न डर रहे हैं, न हिचक रहे हैं। दरअसल अंग्रेजी में मौतों से जुड़े लतीफों को ब्लैक-ह्यूमर कहा जाता है, जिसका चलन हिन्दी में न के बराबर है। हिन्दी में तो मरने वाले को तुरंत ही स्वर्ग अलॉट करके स्वर्गीय लिखना शुरू हो जाता है, फिर चाहे हर किसी को यह गारंटी हो कि मृतक अपनी हरकतों की वजह से नर्क में भी मुश्किल से भी ईडब्ल्यूएस क्वार्टर ही पाएगा। ऐसे में कोरोना के मजाक कुछ लोगों को बुरे भी लग रहे हैं क्योंकि मौत के खतरे के साथ मजाक अच्छी नहीं लगती। हमेशा सिर्फ सफेद कपड़े पहनने वाले एक आदमी ने बिल्कुल सफेदी की चमकार वाला कोरोना-मास्क पहन लिया तो लोगों ने कहा कि रूबिया मैचिंग हाऊस से लेकर आया है। दूसरे ने मजाक को आगे बढ़ाया कि ये बाकी जिंदगी भी सफेद ही पहनेंगे, और गुजर जाएंगे, तो भी (कफन में) यही रंग जारी रहेगा। यहां तक तो बात फिर भी चल गई, लेकिन कोरोना-वैराग्य के बीच किसी ने इस ब्लैकह्यूमर को और दो कदम आगे बढ़ाया, और कहा कि गुजर जाने पर इनका भी यही रंग जारी रहेगा, और इनकी जीवनसंगिनी का भी। 

ऐसे काले मजाक फिर चाहे वे कितने ही सफेद रंग पर टिके हुए हों, लोगों को एकदम से भड़का सकते हैं। इसलिए अंग्रेजी का ब्लैकह्यूमर हिन्दी में कुछ सोच-समझकर, खतरा तौलकर ही इस्तेमाल करना चाहिए। 

कोरोना और सांस्कृतिक-विज्ञान
कोरोना से बचाव के चक्कर में लोग कई किस्म की परंपरागत बातों में विज्ञान ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। घर-परिवार के बीच अधिक समय गुजारने की मजबूरी लोगों के बीच कई किस्म की चर्चा छेड़ रही है। एक किसी ने कहा कि पहले लोग जब पखाने जाते थे, और साबुन का चलन नहीं था तो मिट्टी से तीन बार हाथ धोने का रिवाज था। तीन बार हाथ धोते-धोते कोरोना जैसे तमाम कीटाणु-जीवाणु निकल जाते रहे होंगे। दूसरे ने कहा कि राख का भी इस्तेमाल होता था, और राख से तो तेल वाले बर्तनों की चिकनाहट भी निकल जाती थी, और हाथों को भी वैसा नुकसान नहीं होता था जैसा आज लिक्विड सोप से हाथों को होता है। एक ने कहा कि राख से तो कोरोना भी खत्म हो जाता होगा, तो एक ने सुझाया कि जब तक कोई वैज्ञानिक रिसर्च ऐसा साबित न करे, तब तक ऐसी बात को आगे बढ़ाना खतरनाक होगा। कुल मिलाकर कोरोना से पैदा हुआ एकाकी जीवन लोगों को कहीं भूले-बिसरे दिन याद दिला रहा है, तो कहीं दार्शनिक बना रहा है, तो कहीं सोशल मीडिया पर अधिक सक्रिय कर रहा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


17-Mar-2020

कोरोना और लालबत्ती

मोतीलाल वोरा के करीबी पूर्व विधायक रमेश वल्र्यानी से पार्टी के नेता छिटक रहे हैं। ऐसा नहीं है कि बाबूजी का संसदीय जीवन खत्म होने के कारण वल्र्यानी की पार्टी के भीतर हैसियत में कमी आई है, और इसके कारण पार्टी के लोग वल्र्यानी से कन्नी काट रहे हैं। बल्कि कुछ दिन पहले ही वे दुबई प्रवास से लौटे हैं। पूरी दुनिया में कोरोना का खौफ है। ऐसे में कोरोना के साए में विदेश प्रवास से लौटने पर वल्र्यानीजी को भी शक की नजर से देखा जा रहा है। 

भारत के बाहर विदेशों में कोरोना वायरस बुरी तरह फैला हुआ है।  विदेश से आने वाले लोगों की विशेष रूप से जांच-निगरानी की जा रही है। वल्र्यानीजी सिंधी समाज के 70 लोगों के साथ होली के मौके पर सैर-सपाटे के लिए दुबई गए थे। दुबई में भारत को छोड़कर अन्य देशों से आने वाले लोगों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। वैसे दुबई में समस्या भी नहीं है, लेकिन लौटते ही वल्र्यानीजी की समस्याएं शुरू हो गई। 

दिल्ली एयरपोर्ट पर हेल्थ चेकअप हुआ। वैसे तो वल्र्यानी और उनके साथियों ने कोरोना से बचने के लिए हर संभव तैयारी कर रखी थी। वे पूरी यात्राभर मास्क लगाए रहे और जेब में सैनिटाइजर लेकर चलते थे। रायपुर एयरपोर्ट में भी वल्र्यानीजी और उनके साथियों से फार्म भरवाए गए और दोबारा चेकअप हुआ। सभी स्वस्थ हैं बावजूद इसके वे सभी चिकित्सकीय निगरानी में हैं। रायपुर आने के बाद सभी के घर डॉक्टरों की टीम जा चुकी है। उन्हें हिदायत दी गई है कि 14 दिन तक किसी भी तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो तो तुरंत सूचित करें। किसी को कोई समस्या नहीं आई, लेकिन जिसे भी वल्र्यानी और उनके साथियों के विदेश प्रवास से आने की सूचना मिल रही है, ज्यादातर लोग दूर-दूर हो रहे हैं। अब अगले कुछ दिनों में निगम मंडलों में नियुक्तियां होनी हैं और वल्र्यानीजी को भी उम्मीदें हैं, लेकिन कोरोना के चक्कर में लाल बत्ती में देरी हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 


मिसालों की शौकीन मीडिया...
लोगों को मिसालें ढूंढने में बहुत मजा आता है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी तो सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने उनकी तस्वीर के साथ छत्तीसगढ़ के टी.एस. सिंहदेव और राजस्थान के सचिन पायलट की तस्वीर जोड़कर यह अटकल पोस्ट करना शुरू कर दी कि सिंधिया के बाद अब दूसरे कांग्रेसी राज्यों में भी बगावत हो सकती है, और सीएम बनने के महत्वाकांक्षी भाजपा जा सकते हैं। यह बात टी.एस. सिंहदेव के लिए अपमानजनक थी, जो कि कांग्रेस से परे कुछ नहीं देखते। अभी जब ऐसी अटकलों को लेकर उनको घेरा गया, तो मीडिया के सामने उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि लोग ऐसे दावे कर सकते हैं, लेकिन वे कभी भाजपा नहीं जाएंगे, अगर सौ जिंदगियां मिलेंगी, तो भी वे भाजपा की विचारधारा से कभी नहीं जुड़ेंगे। सिंधिया पर उन्होंने कहा कि ऐसा व्यक्ति जो मुख्यमंत्री न बनाए जाने की वजह से पार्टी छोड़ता है, उसे कभी भी मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहिए। 

राजनीति में ऐसी अटकलें लगाना कुछ लोगों के बारे में सही भी हो सकता है, और लोग सिंधिया के बाद पायलट की अटकल लगा रहे हैं, लेकिन टी.एस. सिंहदेव के बारे में ऐसी अटकल कल्पना की जंगली उड़ान लगती है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


15-Mar-2020

शराबियों से हमदर्दी जारी...

सोशल मीडिया पर छत्तीसगढ़ की शराब दुकानों पर लगी भीड़ की सेहत की फिक्र अभूतपूर्व है। पहले किसी ने यह ध्यान नहीं दिया कि यह गरीब राज्य दारूखोरी में सबसे ऊपर का गरीब राज्य है, और तो और यहां की महिलाएं भी शराबी महिलाओं के मामले में देश में चौथे नंबर पर हैं। लेकिन अब अचानक जब लोगों का सिनेमा जाना, जिम या लाइब्रेरी जाना सरकार ने बंद करवा दिया है, तो लोगों को शराबियों की भीड़ खटकने लगी है। सरकारी शराब दुकानों पर मेला सा लगे रहता है, और भुगतान करके भी दारू लेकर निकलने वाले शराबी उसी अंदाज में बोतल लेकर भीड़ से बाहर आते हैं जिस अंदाज में वन-डे सिरीज जीतने के बाद कप्तान कप लेकर निकलते हैं। ऐसे शराबियों को सरकारी रेट से अधिक भुगतान करना पड़ रहा था, तो भी किसी की हमदर्दी नहीं थी, नशेड़ी से कैसी हमदर्दी? लेकिन अब अचानक लोगों को शराबियों की सेहत की फिक्र होने लगी है, और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में उनके लिए बड़ी हमदर्दी उमड़ी पड़ रही है। ऐसा भी हो सकता है कि जो लोग दारू नहीं पीते हैं, उनको यह हमदर्दी अधिक हो रही हो, कि जब उनकी जिंदगी से सब तरह के मजे छिन गए हैं, तो शराबियों के ही मजे क्यों जारी रहें? दारू का धंधा ही ऐसा मजबूत होता है कि सरकार के लिए किसी एक दिन भी दुकान बंद करवाना मुश्किल हो जाता है, एक पूरा पखवाड़ा भला कैसे बंद हो जाएगी शराब दुकानें? 

कोरोना से सबकी निकल पड़ी...
कोरोना को लेकर बाबा लोगों की भी निकल पड़ी है। कई बाबा ताबीज बेचने लगे हैं, कई बाबा धागा बांधने लगे हैं, रातों-रात पोस्टर छप गए, और चिपकने लग गए हैं। ऐसे माहौल में कोरोना और रजनीकांत की टक्कर के लतीफे बनने लगे हैं, भोजपुरी वीडियो गानों की इंडस्ट्री की निकल पड़ी है, और वयस्क गाने चारों तरफ छा गए हैं। छत्तीसगढ़ी का भी एक गाना कोरोना पर बनकर आ गया है, लेकिन उस ऑडियो रिकॉर्डिंग के साथ अभी नाम नहीं मिला है कि उसे गाया किसने है। दूसरी तरफ ऐसे कई वीडियो आ रहे हैं जिनमें मारवाड़ी महिलाएं कोरोना को भगाने के लिए गीत-संगीत के साथ धमकियां गा रही हैं। कुल मिलाकर कोरोना की वजह से कुछ अधिक ही ठलहा और बेरोजगार हो गया यह देश तरह-तरह से अपनी कल्पनाशीलता बता रहा है। मेडिकल साईंस की सीमा है, लेकिन कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं है। फिलहाल इसी दौर में कई किस्म के झूठे इलाजों की अफवाह फैल रही है, यूनिसेफ और सरकारों की तरफ से कई किस्म की ऐसी चेतावनियां फैल रही हैं जिन्हें फर्जी बताया जा रहा है। 

जानवरों में भी भेदभाव...
कुछ लोगों को लगता है कि भेदभाव महज इंसानों में ही होता है, धर्म का, जाति का, और अमीरी-गरीबी जैसी बातों का। लेकिन रायपुर के एक ऑटोरिक्शा से यह पता लगता है कि भेदभाव जानवरों में भी होता है, और घोड़े गधों को हिकारत की नजर से देखते हैं, वे गधों को अपनी दौड़ में शामिल नहीं करते। ठीक है, अभी कोरोना घोड़ों में फैला नहीं है, जिस दिन फैलेगा सब घुड़दौड़ धरी रह जाएगी।  (rajpathjanpath@gmail.com)


14-Mar-2020

मोबाइल कोरोनाग्रस्त?
दिल्ली से लौटने के बाद सीएम भूपेश बघेल ने कोरोना को लेकर आपात बैठक बुलाई, तो इसमें सरकार के दो मंत्री रविंद्र चौबे और मोहम्मद अकबर मौजूद थे। मगर स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव को बैठक की सूचना नहीं मिल पाई और वे रायपुर में रहने के बावजूद बैठक में शामिल नहीं हो पाए। सिंहदेव इससे खफा बताए जा रहे हैं। उन्होंने खुले तौर पर अपनी नाराजगी का इजहार किया और इसके लिए सीएम सचिवालय के अफसरों पर दोषारोपण किया। सिंहदेव की नाराजगी को भाजपा ने लपक लिया और नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने यहां तक कह दिया कि भविष्य में छत्तीसगढ़ से भी कोई सिंधिया निकल जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

कुछ नेता तो इसको भूपेश और सिंहदेव के बीच मतभेद से जोड़कर देखने लगे। मगर अंदर की खबर यह है कि स्वास्थ्य मंत्री सिंहदेव रायपुर में हैं, इसकी जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को नहीं दी गई थी। बैठक में स्कूलों को भी बंद करने का फैसला लिया गया, लेकिन स्कूल शिक्षामंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह को भी बैठक की जानकारी नहीं थी। जबकि वे भी रायपुर में थे। बाद में प्रेमसाय ने संसदीय कार्यमंत्री रविंद्र चौबे से बैठक की सूचना नहीं मिलने की बात कही, तो संसदीय कार्यमंत्री ने उनसे कहा कि वे (स्कूल शिक्षामंत्री) रायपुर में हैं, इसकी जानकारी नहीं थी। विभाग के लोगों ने भी नहीं बताया। चूंकि कोरोना को लेकर भय का वातावरण बन रहा है। इसलिए आनन-फानन में बैठक बुलाकर विभागीय मंत्री की गैर मौजूदगी में कुछ फैसले ले लिए गए। प्रेमसाय तो संतुष्ट हो गए, लेकिन सिंहदेव को कोई यह बात बता पाता, इससे पहले उनकी नाराजगी छलक गई। अब आज मोबाइल के वक्त में भी अगर अफसर कुछ दूरी पर बैठे मंत्रियों का पता नहीं लगा पाए, तो यह फोन के कोरोनाग्रस्त होने का मामला लगता है। सिंहदेव ने भी जिम्मेदार अफसरों को ही माना है।

निगम-मंडल की तैयारी
अपै्रल में निगम-मंडलों में नियुक्ति हो सकती है। इसको लेकर दावेदार काफी सक्रिय भी हैं और इसके लिए बड़े नेताओं के चक्कर काट रहे हैं। सुनते हैं कि मलाईदार खनिज निगम के लिए कांग्रेस के दो ताकतवर पदाधिकारियों में रस्साकसी चल रही है। नई रेत नीति प्रभावशील होने के बाद खनिज निगम के चेयरमैन का पद काफी पावरफुल हो गया है। 

खास बात यह है कि दोनों ही पदाधिकारी सीएम के खास माने जाते हैं। एक पदाधिकारी तो राज्यसभा टिकट के दावेदार थे। और उन्हें पूरी उम्मीद है कि राज्यसभा टिकट न मिलने की भरपाई पार्टी उन्हें जरूर करेगी। जबकि दूसरे पदाधिकारी अपने आपको अनुभवी बता रहे हैं। दरअसल, इस पदाधिकारी के नजदीकी रिश्तेदार रमन सरकार में निगम के पदाधिकारी रह चुके हैं। ऐसे में वहां के सारे खेल-तिकड़म से परिचित हैं। चर्चा तो यह भी है कि भाजपा नेता के नजदीकी रिश्तेदार कांग्रेस पदाधिकारी ने पार्टी के रणनीतिकारों को खबर भिजवाई भी है कि यदि उन्हें निगम की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो पार्टी को इसका भरपूर लाभ मिलेगा। देखना यह है कि पार्टी निगम की कमान किसे सौंपती है। 

कब्र फाड़कर निकला इतिहास 
लोग कहते हैं कि किसी की जिंदगी को नंगा करना हो तो उसे चुनाव लड़वा दो। और जब इतने से भी हसरत पूरी न हो, तो उसका दलबदल करवा दो। बहुत से लोग जो पुराने दल के हमदर्द हैं, वे धोखे की शिकायत करते हुए दलबदलू के खिलाफ सौ किस्म की बातें लिखने लगते हैं, और जो लोग गंदगी पाने वाले दल के लिए हमदर्दी रखते हैं, वे ऐसी आती हुई गंदगी के खिलाफ सौ किस्म की दूसरी बातें लिखने लगते हैं। अब सिंधिया के भाजपा में जाने से लोगों को सिंधिया के इतिहास की इतनी याद आई कि हद हो गई। सिंधिया राजघराने ने अंग्रेजों का साथ दिया था जिसकी वजह से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई शहीद हो गई थी, यह जानकारी इतिहास से निकालकर लोगों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की, और खूब लड़ी मर्दानी कविता को स्कूली किताबों से निकालकर पोस्ट किया जिसमें सिंधिया की अंग्रेजों से यारी का जिक्र चले आ रहा है। कुछ लोगों ने मध्यप्रदेश की शिवराज-भाजपा सरकार के वक्त के चुनाव अभियान का जिक्र किया जिसका निशाना सिंधिया थे। कई लोगों ने इतिहास की यह जानकारी निकालकर दी कि महाराष्ट्र का एक प्रचलित सरनेम शिंदे, अंग्रेजों ने बिगाड़कर सिंधिया कर दिया था, और तब से सिंधिया लोग उसी कुलनाम को ढो रहे हैं, अपना खुद का मूल कुलनाम शिंदे फिर वापिस नहीं लाए। इतिहास के किताबों में भी ऐसा ही जिक्र मिलता है कि 1755 तक इस वंश के मुखिया जयप्पाराव शिंदे थे, जो कि इसके तुरंत बाद जानकोजी राव सिंधिया हो गए। सन् 1755 के आसपास अंग्रेजों ने शिंदे को सिंधिया बना दिया, और तब से यह नाम वैसा ही चले आ रहा है। ऐसी तमाम बातें एक दलबदल के साथ कब्र फाड़कर निकलकर सामने आ रही है। अब दलबदलू को कुछ तो भुगतना ही होता है।

नया रायपुर और एक मजाक...

पिछले दिनों मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विधानसभा में बजट पेश किया, तो उसी शाम संपादकों को चाय पर बुलाया। बातचीत की अधिकतर बातें तो छप गईं, कुछ उनके नाम से, कुछ अनौपचारिक चर्चा की तरह बिना नाम के, लेकिन उनकी कही एक बात कुछ अधिक गहरी थी, और वह कहीं चर्चा में नहीं आई। न सोशल मीडिया पर लिखा गया, और न ही उस पर समाचार दिखे। 

दरअसल जब यह चर्चा चल रही थी कि नया रायपुर कब तक बसेगा, तो भूपेश बघेल का कहना था कि वे तो जल्द से जल्द मंत्री-मुख्यमंत्री के बंगले बनवा रहे हैं, और तुरंत वहां रहने चले जाएंगे। उनका कहना था कि वे जाएंगे तो अफसर भी जाएंगे, और धीरे-धीरे, तेजी से नया रायपुर बस जाएगा। उन्होंने इस बसाहट की एक ऐसी मिसाल दी जो बातचीत के बीच में खो गई, लेकिन वह थी बहुत मजेदार। उन्होंने बहुत शरारत के अंदाज में यह कहा कि फिल्म मंडी याद है या नहीं?

श्याम बेनेगल की फिल्म मंडी जिन्हें याद हो वे इसकी कहानी का वह हिस्सा भूल नहीं सकते जिसमें म्युनिसिपल कमेटी चकलाघर को शहर के बाहर भेजने का फैसला लेती है, और जब चकलाघर बाहर वीरान जगह पर जाकर शुरू होता है, तो धीरे-धीरे आबादी भी उसी तरफ बढऩे लगती है। अब ऐसी बात खुद मुख्यमंत्री तो बोल सकते थे, कोई और तो ऐसा मजाक कर नहीं सकता था। (rajpathjanpath@gmail.com)


13-Mar-2020

केटीएस तुलसी का नाम कैसे आया?

बीती कल दोपहर के पहले छत्तीसगढ़ में किसी को यह अंदाज नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील के.टी.एस. तुलसी को यहां से राज्यसभा भेजा जाएगा। कांग्रेस ने मोतीलाल वोरा की जगह इस नामी वकील को भेजना तय किया, तो लोग हैरान हुए। ऐसा तो लग रहा था कि उम्र को देखते हुए वोराजी को अब कांग्रेस मुख्यालय में बैठने के लिए राजी कर लिया जाएगा, और राज्यसभा में किसी ऐसे को भेजा जाएगा जिसकी सक्रियता अधिक हो। नब्बे बरस से अधिक के होने की वजह से राज्यसभा में बाकी लोग वोराजी से एक सम्मानजनक फासला भी बनाकर चलते थे, और कांग्रेस को वहां मेलजोल का फायदा नहीं मिल पा रहा था। वोराजी खुद भी आश्वस्त नहीं थे कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल उनका नाम सुझाएंगे, हालांकि ऐसी चर्चा है कि टी.एस. सिंहदेव, चरणदास महंत, और ताम्रध्वज साहू वोराजी के नाम के साथ थे। ताम्रध्वज को वोराजी का अहसान भी चुकता करना था जिन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपना सारा दमखम लगा दिया था, और सोनिया गांधी को लेकर राहुल के घर तक चले गए थे। खैर, वोरा के संसदीय कार्यकाल का एक बहुत लंबा अध्याय पूरा हुआ, और वे अपनी ताकत संगठन में लगा सकेंगे।

अब के.टी.एस. तुलसी की बात करें, तो एक वक्त था जब 2007 में वे गुजरात सरकार के वकील थे, लेकिन उन्होंने शोहराबुद्दीन मुठभेड़ मौतों में गुजरात सरकार की तरफ से खड़े होने से इंकार कर दिया था। एक वक्त वे अमित शाह को बचाने के लिए अदालत में खड़े होते थे। और आगे जाकर एक वक्त ऐसा आया जब वे सीबीआई के वकील थे, और अमित शाह के खिलाफ खड़े थे, तो सुप्रीम कोर्ट ने ही तुलसी को कहा था कि वे चूंकि शाह के वकील रह चुके हैं, इसलिए उनके खिलाफ खड़े होना ठीक नहीं है, वे अपना नाम वापिस लें, और तुलसी ने नाम वापिस ले लिया था।

यह एक दिलचस्प बात है कि जिस शोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ हत्या/मौत मामले में के.टी.एस. तुलसी वकील नहीं बने, उस केस में शोहराबुद्दीन के एक करीबी सहयोगी की भी हत्या हुई थी, और उसका भी नाम तुलसी (प्रजापति) था।

7 नवंबर 1947 को पंजाब के होशियारपुर में पैदा तुलसी ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से वकालत शुरू की थी। फिर सुप्रीम कोर्ट तक आते-आते वे कई राज्य सरकारों और सुप्रीम कोर्ट के बड़े चर्चित मामले लड़ चुके थे। वे राजीव हत्याकांड से जुड़े मामलों में भी भारत सरकार की ओर से खड़े हुए, और तमिलनाडू सरकार की तरफ से शंकराचार्य के खिलाफ केस लड़ा। सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के जमीन-जायदाद के मामले भी उन्होंने लड़े हैं। 2014 में यूपीए सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति के कोटे से राज्यसभा में भेजा था।

के.टी.एस. तुलसी महंगी पार्टियां देने के शौकीन हैं, और पुरानी कारों को जमा करने के भी। 2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक वे हर पेशी पर खड़े होने की पांच लाख रूपए फीस लेते थे, लेकिन जरूरतमंद लोगों को मुफ्त में भी मदद करते हैं। वे एक ऐसे क्रिमिनल लॉयर हैं जो कि सरकारों की तरफ से भी केस लडऩे का काम करते हैं।

उनका नाम छत्तीसगढ़ की तरफ से भेजना कैसे तय हुआ, यह बात कुछ दिनों में सामने आएगी, लेकिन वे राजीव गांधी से लेकर रॉबर्ट वाड्रा तक के केस लड़ते हुए गांधी परिवार के करीब रहे हैं, और अपने खुद के दमखम से देश के प्रमुख वकीलों में उनका नाम है। छत्तीसगढ़ सरकार आज जितने तरह की कानूनी कार्रवाई में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक व्यस्त है, वैसे में राज्यसभा सदस्य के रूप में के.टी.एस. तुलसी की सलाह उसके काम भी आ सकती है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत राज्यसभा की दोनों सीटों पर जीत की गारंटी है, और यहां कांग्रेस पार्टी में न कोई मतभेद हैं, न कोई बागी महत्वाकांक्षी हैं, ऐसे में यहां से राज्य के बाहर के तुलसी को उम्मीदवार बनाने में कोई दिक्कत नहीं थी। पहले भी मोहसिना किदवई यहां से दो बार राज्यसभा की सदस्य रह चुकी हैं, यह एक और बात है कि उनका कोई योगदान न राज्य में रहा, न संसद में।

एमपी में सिंहदेव की मदद से...

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोडऩे का थोड़ा-बहुत असर छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी पड़ सकता है। सिंधिया के करीबी और मप्र सरकार में मंत्री महेन्द्र सिंह सिसोदिया, स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के समधी हैं। सिसोदिया की पुत्री ऐश्वर्या की शादी सिंहदेव के भतीजे आदित्येश्वरशरण सिंहदेव से हुई है। सिसोदिया उन 20 कांग्रेस विधायकों में शामिल हैं, जिन्होंने सिंधिया के साथ भाजपा में जाने का फैसला लिया है। हालांकि अभी सिसोदिया के मान-मनौव्वल की कोशिश हो रही है।

सुनते हैं कि कांग्रेस के रणनीतिकार टी.एस. सिंहदेव के छोटे भाई (और आदित्येश्वरशरण सिंहदेव के पिता) एएस सिंहदेव के जरिए सिसोदिया को मनाने की कोशिश हो रही है। फिलहाल तो सिसोदिया को मनाने में कामयाबी नहीं मिल पाई है। दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ में सिंधिया के चुनिंदा समर्थक हैं। इनमें दुर्ग के दीपक दुबे भी हैं।

दीपक के अलावा खैरागढ़ राजघराने के सदस्य देवव्रत सिंह भी सिंधिया के करीबी माने जाते हैं।  वैसे तो देवव्रत जनता कांग्रेस में हैं और वे कांग्रेस से निकटतता बढ़ा रहे हैं लेकिन बदली परिस्थियों में वे धीरे-धीरे भाजपा के करीब आ जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वैसे भी जनता कांग्रेस के दो अन्य विधायक धर्मजीत सिंह और प्रमोद शर्मा ने नगरीय व पंचायत चुनाव में भाजपा का साथ दिया था। ऐसे में माना जा रहा है कि सिंधिया के चलते भाजपा मजबूत हो सकती है।

प्रियंका की नामंजूरी

अब जब पूरे देश के राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम सामने आ चुके हैं, तब यह साफ हो गया है कि प्रियंका गांधी राज्यसभा नहीं जा रहीं। वे चाहतीं तो कई राज्यों से उनका नाम जा सकता था, छत्तीसगढ़ से भी, लेकिन सोनिया गांधी ने छत्तीसगढ़ के कुछ नेताओं से यह कहा था कि प्रियंका राज्यसभा जाना पसंद नहीं करेंगी। दरअसल सोनिया और राहुल लोकसभा में हैं, और अगर प्रियंका राज्यसभा जातीं, तो कुनबापरस्ती की बात एक बार और जोर पकड़ती। छत्तीसगढ़ के कुछ बड़े नेताओं ने सोनिया गांधी से यह अनुरोध जरूर किया था, लेकिन इस पर कोई जवाब नहीं मिला था।

कल की कांग्रेस की लिस्ट में अखिल भारतीय कांग्रेस के संगठन प्रभारी के.सी. वेणुगोपाल को राजस्थान से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। पहले उनका नाम छत्तीसगढ़ से चल रहा था, लेकिन फिर उन्हें राजस्थान की लिस्ट में रखा गया।


13-Mar-2020

फोन रिकॉर्डिंग की दहशत

सरकारों के लिए लोगों के मन में शक रहता ही है कि किसके फोन रिकॉर्ड किए जा रहे हैं। लोगों को याद होगा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद जल्द ही भूपेश बघेल ने रायपुर के साईंस कॉलेज के एक कार्यक्रम में मंच पर ही माईक से कहा था कि ढांढ सर भी पिछली सरकार के वक्त उनसे वॉट्सऐप कॉल पर ही बात करते थे क्योंकि उन्हें आशंका थी कि उनके कॉल रिकॉर्ड हो रहे हैं। इस वक्त स्टेज पर विवेक ढांड भी मौजूद थे जो कि रमन सरकार में अपने कार्यकाल के आखिरी दिन तक मुख्य सचिव थे, और बाद में राज्य की सबसे ताकतवर कुर्सी रेरा पर काबिज हुए। क्योंकि उन्होंने इस बात का कोई खंडन नहीं किया, इसलिए जाहिर है कि भूपेश बघेल की कही बात सही थी। अब जब राज्य के कुछ नए-पुराने अफसरों और कुछ कारोबारी-नेताओं पर आयकर छापे पड़े, और बहुत बड़ा बवाल हुआ, तो यह बात सामने आई कि इन लोगों के टेलीफोन शायद इंटरसेप्ट किए जा रहे थे, और आयकर विभाग पूरी जानकारी लेकर आया था। अफसरों ने छापे के बाद इन तमाम लोगों के फोन पर से जानकारी भी निकाल ली थी, और लोगों को अब यह खतरा दिख रहा है कि फोन पर कोई भी बात सुरक्षित नहीं है, और वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर की जानकारी भी फोन हाथ आने पर वापिस निकाली जा सकती है। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग बड़ी तेजी से वॉट्सऐप से ऐसी दूसरी मैसेंजर सेवाओं पर जाने लगे हैं जो कि लोग वॉट्सऐप से अधिक सुरक्षित मान रहे हैं। 

अभी तीन दिन पहले ऐसी ही एक दूसरी मैसेंजर सर्विस का पेज खोलने पर उन लोगों को बड़ा दिलचस्प नजारा देखने मिला जिनकीफोनबुक पर ऐसे तमाम लोगों के फोन नंबर दर्ज थे। सिग्नल और टेलीग्राम जैसे दूसरे मैसेंजरों के पेज पर यह दिखता है कि फोनबुक के और कौन-कौन लोग उस सर्विस को शुरू कर रहे हैं। तीन दिन पहले दोपहर के दो घंटों में ही छापों से प्रभावित लोगों में से आधा दर्जन ने सिग्नल शुरू किया, और उनके नाम दूसरों की स्क्रीन पर एक के बाद एक दिखते रहे, इनमें अफसर, भूतपूर्व अफसर, कारोबारी सभी किस्म के लोग थे। 

अब वॉट्सऐप या ये दूसरी सेवाएं कितनी सुरक्षित हैं, और कितनी नाजुक हैं, इसका ठीक-ठीक अंदाज कम से कम आम लोगों को तो नहीं है। लेकिन एक दूसरा खतरा यह खड़ा हो रहा है कि किसी मैसेंजर सर्विस को पूरी तरह महफूज मानने वाले लोग उस पर अंधाधुंध संवेदनशील बातें करने लगते हैं, और यह भरोसा पता नहीं कितनी मजबूत बुनियाद पर है। 

फिलहाल राजनीति, मीडिया, सरकार, और कमाऊ-कारोबार के बड़े लोग फोन पर बात हिचकते हुए कर रहे हैं, कुछ को राज्य सरकार की एजेंसियों से खतरा दिखता है, और कुछ को केन्द्र सरकार की एजेंसियों से। बहुत से लोगों को यह भी लगता है कि रमन सरकार के दौरान चर्चित अघोषित-गैरकानूनी इंटरसेप्टर का इस्तेमाल आज भी कोई सरकारी या कोई गैरसरकारी लोग कर रहे हैं। फिलहाल इस खतरे के चलते हुए ही सही, लोग फोन पर बकवास कम करने लगें, वही बेहतर है। 

सिंधिया ने नीयत को मौका दिया
लोगों को राजनीतिक-सार्वजनिक जीवन के वीडियो और उसकी तस्वीरें अपनी नीयत की बात लिखने का मौका देते हैं। अभी ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में गए, तो जाहिर है कि दस-बीस मिनट के कार्यक्रम में किसी पल वे मुस्कुरा रहे होंगे, किसी पल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा मुस्कुरा रहे होंगे, और किसी पल दोनों खुश होंगे, या दोनों उदास होंगे। ऐसे में हर किसी को अपने मन की बात लिखने के लिए एक उपयुक्त फोटो या वीडियो हाथ लग ही गए, और लोगों ने उसकी व्याख्या करते हुए मन की बात लिख डाली। लोगों ने ट्विटर और फेसबुक पर तरह-तरह की भड़ास निकाली, और इस दलबदल से जुड़े, या उसके लिए जिम्मेदार, हर नेता-पार्टी को निशाना बनाया। होली का मौका था, जिस त्यौहार पर लोग आमतौर पर दारू या भांग पीकर मन की बात निकालते हैं, तो लोगों को इस बड़ी राजनीतिक हलचल के बहाने, और इस मौके पर भड़ास का मौका बढिय़ा मिला। 

आज सुबह जब लोगों ने टीवी की खबरों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को केन्द्रीय रक्षा मंत्री, भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मिलते देखा, तो फिर लिखने का मौका मिला। राजनाथ सिंह अपने शिष्ट मिजाज के मुताबिक ठीक से बैठे थे, और ज्योतिरादित्य सिंधिया पांव मोड़कर झूलते हुए दिख रहे थे। फिलहाल भोपाल में क्या होगा इसे लेकर लोगों को सट्टा लगाने का एक बढिय़ा मौका मिला है, और सट्टा बाजार से कोरोना वायरस को थोड़ी सी छुट्टी मिलेगी। 

बंजारा कुत्तों का बुरा मानना तय
जिस तरह मध्यप्रदेश के कांग्रेस और भाजपा के विधायक झुंड में कहीं बेंगलुरू, तो कहीं हरियाणा ले जाकर छुपाए जा रहे हैं, उससे लोगों को बहुत मजा आ रहा है। पार्टियों के कुछ तेज और तजुर्बेकार विधायक ऐसे बागी हो चुके, या बागी होने से बचाए जा रहे विधायकों को घेरकर चल रहे हैं उन्हें देखकर एक जानकार ने कहा- जब भेड़ों के रेवड़ लेकर लंबा सफर किया जाता है, तो गड़रिए बंजारा नस्ल के कुछ तेज कुत्तों को साथ लेकर चलते हैं। ऐसे दो-चार कुत्ते ही दो-चार सौ भेड़ों को दाएं-बाएं होने से रोककर रखते हैं। थोक में दलबदल की नौबत आने पर अतिसंपन्नता वाले ऐसे माहिर नेताओं को विधायकों की खरीदी के लिए, या उन्हें बिक्री से बचाने के लिए तैनात किया जाता है। हालांकि यह बात तय है कि बंजारा नस्ल के कुत्तों को उनकी यह मिसाल अच्छी नहीं लगेगी, फिर भी बात को सरल तरीके से समझाने के लिए यही उदाहरण अभी सबसे सही लग रहा है।  (rajpathjanpath@gmail.com)


09-Mar-2020

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मंथन जारी
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है। सुनते हैं कि पूर्व सीएम रमन सिंह, धरमलाल कौशिक और सौदान सिंह के बीच  गंभीर चर्चा भी हुई है। यह चर्चा सौदान सिंह के दिल्ली के भाजपा के पुराने दफ्तर स्थित कक्ष में हुई। रमन सिंह और धरमलाल कौशिक, पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय को ही अध्यक्ष बनाने के पक्ष में बताए जाते हैं। मगर प्रदेश के सांसद इससे संतुष्ट नहीं हैं। यह भी चर्चा है कि रमन, धरम और सौदान मिलकर शिवरतन शर्मा का नाम आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन ये नेता आदिवासी वोटबैंक को लेकर भी चिंतित हंै। ऐसे में  राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम के नाम पर भी चर्चा हुई है। हल्ला है कि रामविचार के लिए सौदान तो तैयार हैं, लेकिन रमन-धरम की जोड़ी सहमत नहीं है। ऐसे में सभी धड़ों के बीच तालमेल रखने वाले नेता के नाम को आगे किया जा सकता है। ऐसे में कोई नया नाम आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा के एक बड़े नेता ने पार्टी के भीतर चल रही इस मशक्कत पर कहा- समुंद्र मंथन तो कई दिनों से चल रहा है, देखें छत्तीसगढ़ के हाथ अमृत लगता है, या विष...

सरकारी अस्पताल को चुनौती
छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास के खिलाफ अकेले अभियान चलाते हुए डॉ. दिनेश मिश्रा ने देश-विदेश में सब जगह नाम कमाया है, और नीयत नाम कमाने की नहीं थी लोगों को जागरूक करने की थी। अब समाज में जागरूकता को नापने-तौलने की कोई मशीन तो होती नहीं, इसलिए यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि उनकी मेहनत के बाद अंधविश्वास कितना घटा, और जागरूकता कितनी बढ़ी।

बलौदाबाजार जिले के बिलाईगढ़ के ग्राम नरधा में सरकारी उपस्वास्थ्य केंद्र के सामने ही एक बाबा का घर है, और लोग बीमारियों के साथ ही अन्य तकलीफों से मुक्ति पाने झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र वाले बाबा का सहारा ले रहे हैं। इलाज कराने आए लोगों का कहना है बाबा के पास आस्था लेकर लोग काफी दूर-दूर से आते हैं और इलाज कराते हैं। बाबा मां दुर्गारानी के समक्ष मंत्रोच्चार कर हर व्यक्ति का इलाज करते हैं और इसके एवज में पैसा नहीं केवल नारियल और अगरबत्ती लेते हैं। 

दिक्कत यह है कि अनपढ़ समझे या कहे जाने वाले लोग ही ऐसे बाबा के शिकार नहीं होते, पढ़े-लिखे कहे जाने वाले लोग भी अंधविश्वास में कहीं कम नहीं हैं। ऐसे बाबा बीमारियों के साथ-साथ बुरे सायों को हटाने का दावा भी करते हैं, और सरकारी अस्पताल के ठीक सामने सरकार और विज्ञान दोनों को चुनौती दे रहे हंै। अब लोकप्रियता की एक वजह यह भी हो सकती है कि बाबा इलाज के एवज में पैसा नहीं केवल नारियल और अगरबत्ती लेते हैं। दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में क्या लिया जाता है, इस तकलीफ को पूरी जनता जानती है। 

वहां इलाज कराने आए मरीज रजिस्टर में एंट्री कराकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। बाबा बहादुर सिंह प्रधान उर्फ ननकी प्रधान का कहना है कि इनके इलाज से लोग ठीक हो रहे हैं तभी यहां इलाज कराने आ रहे हैं। बाबा ने आगे बताया कि जब वह 7 साल का था तब उनको दुर्गा देवी ने आशीर्वाद के रूप में उन्हें ये प्रदान किया है। तब से लेकर आज तक इलाज करते आ रहे हैं। 

छत्तीसगढ़ में सरकारी डॉक्टरों की बड़ी कमी है, और ऐसे में स्वास्थ्य विभाग ऐसे बाबा लोगों की सेवाएं ले सकता है, डॉ. दिनेश मिश्रा का क्या है, वे तो वैज्ञानिक सोच की बात करते हैं, जो कि आज एक अवांछित चीज है।


08-Mar-2020

कोरोना का खौफ-1
कोरोना वायरस का खौफ बढ़ता ही जा रहा है। दिल्ली और अन्य बड़े शहरों में कोरोना को लेकर डर कुछ ज्यादा ही है। कोरोना के चलते  रायपुर के कई लोगों ने दिल्ली और विदेश यात्रा भी स्थगित कर दी है। पिछले दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के यहां विवाह कार्यक्रम था। प्रदेश के दर्जनभर से अधिक भाजपा नेता कोरोना के खौफ के साये में दिल्ली गए। 

चूंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के यहां कार्यक्रम था, तो जाना ही था। विवाह का रिसेप्शन नड्डा के दिल्ली बंगले में था। बताते हैं कि कोरोना के चलते रिसेप्शन में अतिरिक्त सतर्कता बरती गई थी। मेहमानों की अगुवानी केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, भूपेन्द्र यादव और बीएल संतोष कर रहे थे। कार्यक्रम स्थल में प्रवेश से पहले मुख्य द्वार पर मेहमानों का हाथ सेनिटाइजर से साफ कराया गया। अंदर में भी किसी तरह के इंफेक्शन से बचने के लिए काफी बंदोबस्त किया गया था। एक अलग से काउंटर पर सेनिटाइजर रखा हुआ था। भोजन के काउंटर पर तैनात वेटर मुंह पर मास्क लगाए हुए थे। 

खाने की प्लेट लेने से पहले फिर मेहमानों के हाथ पर सेनिटाइजर लगवाया जाता था। पूरे रिसेप्शन के दौरान ज्यादातर मेहमान एक-दूसरे से हाथ मिलाने से परहेज कर रहे थे और हाथ जोड़कर अभिवादन करते नजर आए। इस समारोह में पीएम समेत पूरा कैबिनेट और अन्य राज्यों के राज्यपाल-सीएम समेत भाजपा के तमाम दिग्गज नेता मौजूद थे। लौटते समय कई नेता तो काउंटर से सेनिटाइजर लेकर निकलते भी नजर आए। 

कोरोना का खौफ-2
छत्तीसगढ़ में कोरोना के दो-तीन ही संदिग्ध मिले हैं, लेकिन इसको लेकर जनता में खौफ साफ दिख रहा है। कोरोना के चलते राजधानी रायपुर में ज्यादातर नेताओं ने होली मिलन के कार्यक्रम भी निरस्त कर दिए हैं। रायपुर में सबसे पहले सांसद सुनील सोनी ने इसकी शुरूआत की। उन्होंने कटोरा तालाब-सिंचाई कॉलोनी स्थित अपने सरकारी बंगले में रविवार को होली मिलन का कार्यक्रम रखा था, इसमें पूरे लोकसभा क्षेत्र से करीब 5 हजार लोगों को न्यौता भेजा गया था। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, लेकिन उन्होंने पीएम के संदेश के बाद होली मिलन का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। 

कोरोना के चलते सतर्कता बरतने के इरादे से सुनील सोनी के होली मिलन कार्यक्रम निरस्त होने की सूचना चारों तरफ फैल गई। बृजमोहन  अग्रवाल और कई नेताओं ने उनका अनुसरण कर अपने यहां कार्यक्रम निरस्त कर दिए। सीएम भूपेश बघेल और संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे ने भी फैसला लिया है कि वे होली मिलन के कार्यक्रम से दूर रहेंगे। कुल मिलाकर सुनील सोनी ने अपने यहां का कार्यक्रम निरस्त कर कोरोना से सतर्क रहने के लिए दूसरों को भी प्रेरित किया। 

कोरोना का खौफ-3

विधानसभाध्यक्ष चरण दास महंत की नातिन अभी पांच हफ्तों की हुई है, और वह अमरीका से भारत आई, तो एक दावत तो बनती ही थी। कोरोना के चलते बहुत से समारोह रद्द हो रहे हैं, लेकिन यह निजी कार्यक्रम था, इसलिए हुआ। महंतजी को कुछ निजी शुभचिंतकों ने यह भी सुझाया कि छोटी बच्ची को लोगों की शुभकामनाओं से कुछ दूर घर के भीतर रखें, लेकिन उत्साही मेहमानों के जोश के सामने ऐसी कोई रोक खड़ी ही नहीं हो पाई, टिकना तो दूर की बात थी। फिर भी अधिकतर लोग साफ-साफ बोलकर एक-दूसरे से हाथ मिलाने से कतराते रहे और वह सावधानी असर करते दिखी जो कि भारत सरकार कल सुबह से मोबाइल फोन पर सुना रही है। फोन करते ही खांसने की आवाज आती है, और कोरोना से बचाव की तरकीब सुनाई जाती है। लोग सावधान हो रहे हैं, मेरा देश बदल रहा है। (rajpathjanpath@gmail.com)


07-Mar-2020

महंत के कामयाब दिन

छत्तीसगढ़ विधानसभा ने कार्य-संचालन के मामले में देश में अलग ही पहचान बनाई है। विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल ने   विधानसभा के कार्य संचालन को लेकर कई नियम बनाए, जिनसे  सदन की कार्रवाई अच्छी तरह से चल रही है। शुक्ल ने सदन की कार्रवाई के दौरान गर्भगृह में जाने पर सदस्य के निलंबित होने का नियम बनाया था, जिसका अब भी पालन हो रहा है। भाजपा शासनकाल में प्रेमप्रकाश पांडेय के अध्यक्षीय कार्यकाल को बेहतर आंका जाता है। उनके बाद धरमलाल कौशिक और गौरीशंकर अग्रवाल भी अध्यक्ष रहे, लेकिन मौजूदा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत अपने पूर्ववर्ती राजेंद्र प्रसाद शुक्ल और प्रेमप्रकाश पांडेय की तरह मजबूत पकड़ वाले नजर आए। उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में सदन के कार्य संचालन मामले में अलग ही छाप छोड़ी है। 

डॉ. महंत पहली बार अविभाजित मप्र में वर्ष-1980 में विधायक बने। वे लोकसभा के भी सदस्य रहे हैं। उन्हें संसद और विधानसभा का गहरा अनुभव है और इसकी झलक उनकी कार्यपद्धति में भी नजर आती है। पिछले दिनों उन्होंने हल्के सवाल पूछने पर एक सदस्य को टोक दिया। उन्होंने कहा कि विधायकों के एक सवाल के जवाब पर 10 लाख रुपये खर्च होते हैं। कॉलेज में कितने पद खाली हैं और खाली पद कब तक भरे जाएंगे, जैसे एकदम सामान्य सवालों का जवाब वे मंत्री से व्यक्तिगत तौर पर मिलकर ले सकते हैं। आसंदी के सुझाव की संसदीय कार्यमंत्री रविंद्र चौबे और पूर्व सीएम अजीत जोगी ने भी तारीफ की। इसी तरह उन्होंने  एक सवाल के परिशिष्ट में 170 पेज के जवाब पर चिंता जताई। उन्होंने फिजूलखर्ची की तरफ सरकार और सचिवालय का ध्यान आकृष्ट कराया। डॉ. महंत के कार्यकाल में महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर 2 दिन का विशेष सत्र हुआ। जिसमें सत्ता और विपक्ष के सदस्य एक ही तरह के पोशाक में आए थे और सदन में महात्मा गांधी के जीवन-दर्शन पर यादगार चर्चा हुई। इस तरह का आयोजन देश में पहली बार किसी विधानसभा में हुआ था। अब तक के तौर-तरीकों से महंत कई मामले में अपने पूर्ववर्तियों से भी बेहतर दिख रहे हैं। 

पिछले दिनों अमरीका के दौरे पर गए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल महंत को साथ ले गए थे। वहां हार्वर्ड विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यक्रम में सीएम से सवाल किया गया कि उन्होंने एक दलित को मुख्य सचिव बनाया है, और एक कबीरपंथी को विधानसभाध्यक्ष, तो भूपेश ने महंत की तारीफ करते हुए उनके लंबे और कामयाब चुनावी और राजनीतिक इतिहास को इस रफ्तार से गिना दिया था कि मानो वे इस जवाब की तैयारी करके गए थे।

म्युनिसिपल में कोई सुनने वाले हैं?
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का सबसे अधिक इस्तेमाल हो चुका श्मशान ऐसे बुरे हाल में है कि देखते नहीं बनता। जाने किस वक्त इसका नाम किस वजह से मारवाड़ी श्मशान रखा गया था। अब वहां अर्थियों के साथ आ जाने वाले गद्दे-तकियों से लेकर दूसरे कपड़ों तक के ढेर भीतर लगे हुए हैं जिनसे लगता है कि हफ्तों से यहां की सफाई नहीं हुई है। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब किसी न किसी अंतिम संस्कार में म्युनिसिपल के पार्षद या वहां के अफसर न पहुंचते हों, लेकिन जिस शहर में दसियों लाख रुपये खर्च करके स्मार्ट सिटी के नाम पर सफाई की तस्वीरों से दीवारों को भर दिया जा रहा है, उस शहर में ऐसी गंदगी को हटाने में दिलचस्पी नहीं दिखती क्योंकि वॉल राईटिंग का महंगा ठेका होता है, और कचरा हटाने में वैसी कमाई शायद नहीं रहती है। पता नहीं केंद्र सरकार के दिल्ली से आने वाले लोग मरघट तक जाने की जहमत उठाते हैं या नहीं, लेकिन अगर शहर के बीच के इस बहुत पुराने श्मशान की गंदगी वे देखें तो इसका दर्जा और नीचे चले जाना तय है। फिर यह भी है कि रोजाना इस जगह पर पहुंचने वाले हजारों लोगों को कम से कम घंटे भर ऐसी ही गंदगी के बीच बैठना पड़ता है। म्युनिसिपल में कोई सुनने वाले हैं? (rajpathjanpath@gmail.com)


05-Mar-2020

धरना खत्म करवाने का राज

छत्तीसगढ़ सहित देश के बहुत से हिस्सों में इस बात को लेकर हैरानी है कि राजधानी रायपुर के बीच चौक किनारे खाली जगह पर रोज रात चलने वाले शाहीन बाग धरने को जिला प्रशासन ने वहां से हटा दिया। यह धरना पूरी तरह शांतिपूर्ण चल रहा था, और मुख्यमंत्री सहित कांग्रेस पार्टी इस बात को लेकर शाहीन बाग धरने की मांग के साथ भी थे कि नागरिकता-संशोधन के नए कानून को लागू नहीं करना चाहिए। ऐसे में अचानक एक रात इस धरने को पुलिस के खत्म करवाने से लोगों को कुछ हैरानी हुई है। लेकिन इसके पीछे की कहानी राज्य में कानून व्यवस्था को बचाने से जुड़ी हुई है। इस शाहीन बाग धरने के जवाब में कुछ हिन्दू संगठनों ने हनुमान चालीसा पाठ जैसा एक मुकाबला शुरू कर दिया था, और इन दोनों को एक साथ देखने पर शासन-प्रशासन को यह समझ आ रहा था कि राज्य में एक निहायत ही गैरजरूरी और नाजायज साम्प्रदायिक तनाव खड़ा हो सकता है। इस राज्य की गौरवशाली  धर्मनिरपेक्ष परंपरा को जारी रखने के लिए तय किया गया कि सभी किस्म के धरनों को खत्म करवाया जाए। (rajpathjanpath@gmail.com)


04-Mar-2020

सरकार और पार्टी की राहत

छत्तीसगढ़ में हाल ही में पड़े आयकर छापों पर कांग्रेस पार्टी और छत्तीसगढ़ सरकार दोनों ने केन्द्र सरकार से जमकर विरोध तो जाहिर किया है कि एक केन्द्रीय सुरक्षा बल, सीआरपीएफ, को साथ लाकर ये छापे डाले गए जो कि देश की संघीय व्यवस्था के खिलाफ है। जो लोग कुछ चुनिंदा टीवी चैनलों पर समाचार देखते हैं, वे अपने समझ के स्तर के मुताबिक इस संघीय ढांचे को संघ यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का ढांचा समझ रहे हैं, और इस बात पर हैरान हो रहे हैं कि मोदी सरकार अगर संघ के ढांचे के मुताबिक काम नहीं करेगी, तो और किस तरह करेगी? लेकिन छापों का दौर खत्म हो जाने के बाद अब सरकार और कांग्रेस पार्टी कम से कम सार्वजनिक रूप से तो राहत की सांस लेते दिख रही हैं क्योंकि छापों में जो नगदी बरामद हुई है, वह बड़ी-बड़ी चर्चाओं में रहने वाले लोगों की बेइज्जती खराब कर रही है। अब इतना बुरा वक्त किसने सोचा था कि महापौर एजाज ढेबर के घर खुद से 25 हजार रूपए मिलेंगे, और उनकी मां के पास से चार लाख रूपए। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि जिस मां के चार-पांच कारोबारी बेटे हों, उसके पास इतनी रकम में हैरानी की कोई बात तो है नहीं। आबकारी विभाग के सबसे खास अफसर त्रिपाठी के पास नोटों से भरी आलमारियां मिलने की खबरें फैली थीं, लेकिन ऐसी सारी आलमारियों की हकीकत 60 हजार रूपए तक सिमट गई। रेरा चेयरमैन विवेक ढांड के घर पर करीब तीन लाख रूपए नगद मिले हैं जो कि उनकी और उनकी पत्नी की एक महीने की तनख्वाह से भी कम रकम है। कांग्रेस के एक पार्षद अफरोज अंजुम से छापे में 18 सौ रूपए मिले हैं, और पार्टी ने उन्हें गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाला बताया है। कांग्रेस का यह भी कहना है कि गुरूचरण होरा के घर और दफ्तर से एक करोड़ रूपए से कुछ अधिक रकम मिली है, और वे भाजपा के सदस्य हैं। अब कांग्रेस पार्षद से 18 सौ, और भाजपा सदस्य से एक करोड़ से अधिक! कोई हैरानी नहीं कि ऐसे में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल यह सुझा रहे हैं कि आयकर विभाग को अपना विशेष विमान का खर्च निकालने के लिए भाजपा के लोगों पर ही छापा डालना चाहिए। 

पड़ोस का भी फायदा
छत्तीसगढ़ के कल के बजट में किसानों को धान का बाकी भुगतान करने का इंतजाम कर दिया गया है जिसे मिलाकर उन्हें 25 सौ रूपए के रेट से भुगतान पूरा हो जाएगा। धान खरीदी के समय केन्द्र सरकार के नियमों की वजह से राज्य सरकार समर्थन मूल्य से अधिक दाम नहीं दे पाई, इसलिए फर्क का पैसा अब दिया जाना है। लेकिन राज्य सरकार का कुछ या अधिक नुकसान इसमें भी हो रहा है कि छत्तीसगढ़ से लगे हुए दूसरे राज्यों से सरहद पार करके धान यहां लाया गया, और इस राज्य के अधिक रेट पर बेचा गया। हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का कहना है कि कड़ी चौकसी की वजह से ऐसा धान अधिक नहीं आया है, लेकिन उनकी अपनी जानकारी यह है कि राज्य की सरहद के जिलों में फसल कम हुई थी, लेकिन हर किसान प्रति एकड़ 15-15 क्विंटल धान बेच रहे हैं। अब इस अधिकतम सीमा तक धान की बिक्री कम फसल की उपज से तो हो नहीं सकती थी, इसलिए पड़ोसी राज्यों से धान आया ही आया है। 

मुख्यमंत्री का चमकदार जोश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बजट की शाम अखबारों के संपादकों को नाश्ते पर बुलाया था, और उनका जोश एक लखपति बजट पेश करने वाले मुख्यमंत्री-वित्तमंत्री जैसा था। दूसरी तरफ मीडिया के चेहरों पर झेंप थी क्योंकि पिछले हफ्ते भर में आयकर छापों को लेकर उसकी खबरों के गुब्बारे की हवा निकल गई थी। हवा भरे गुब्बारे जितने बड़े आंकड़ों से घटते हुए हकीकत हवा निकले गुब्बारे के आकार की बच गई थी, और भूपेश बघेल इस नौबत का मजा तो ले रहे थे, लेकिन उन्होंने कोई जुबानी हिसाब-किताब भी चुकता नहीं किया जो कि उनके आम मिजाज से कुछ हटकर था, और वहां से निकलते हुए मीडिया भी राहत की सांस ले रहा था। दरअसल इस बार के आयकर छापों के दौरान और उसके बाद भी आयकर विभाग ने कोई ठोस आंकड़े जारी नहीं किए, और जिन पर छापे पड़े थे, उनसे जब्त नगदी निराशाजनक थी। ऐसे में सरकार के करीबी कहे और समझे जाने वाले इन लोगों के बारे में प्रकाशित और प्रसारित गलत जानकारी और अटकलों ने मीडिया की कमजोरी उजागर कर दी थी।  नौबत यह थी कि जितने सवाल मीडिया कर रहा था, उससे अधिक पैने सवाल मुख्यमंत्री के पास थे, लेकिन वे अपने सवालों की धार को हवा में लहरा नहीं रहे थे। 

भूकंप के पहले की फाल्टलाईन
छत्तीसगढ़ के पंडित सुंदरलाल शर्मा खुले विश्वविद्यालय के पिछली सरकार के नियुक्त कुलपति अब भी जारी रखे गए हैं। और दूसरी तरफ कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में किसी वामपंथी या कम से कम धर्मनिरपेक्ष कुलपति की नियुक्ति का इंतजार किया जा रहा था, उस जगह पर भी संघ परिवार के एक जाने-माने व्यक्ति को कुलपति बना दिया गया। दो दिनों में ऐसी दो नियुक्तियों से छत्तीसगढ़ राजभवन और केन्द्र सरकार के बीच में, भूगोल की भाषा में, फाल्टलाईन उजागर हो गई है, जहां पर धरती के नीचे चट्टानों के खिसकने से किसी दिन भूकंप आ सकता है। कुलपति नियुक्त करने का सारे का सारा अधिकार पिछली सरकार ने राजभवन को दे दिया था, और वह इस सरकार पर बहुत भारी पड़ा है। बाहर आम जनता यह तो नहीं समझती है कि सरकार और राजभवन के अधिकारों में कहां पर सीमा रेखा है, लोग तो यही समझ रहे हैं कि भूपेश सरकार के चलते संघ के दो-दो कुलपति बन गए। राजभवन अगर बीच का कोई रास्ता निकाल पाता, और दोनों पक्षों की बर्दाश्त के लायक नाम तय किए जाते तो ऐसी नौबत नहीं आती कि राज्य सरकार कानून बनाकर राज्यपाल से अधिकार वापिस लेने की सोचने लगती। मौजूदा राज्यपाल अनुसुईया उइके के साथ शुरूआती महीनों के परस्पर-सम्मान के संबंधों के बाद अब राज्य सरकार एक संवैधानिक चुनौती के दौर में खड़ी हो गई है, या कर दी गई है। 

(rajpathjanpath@gmail.com)


02-Mar-2020

कांग्रेस संगठन पर चर्चा

प्रदेश कांग्रेस में फेरबदल की तैयारी है। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया इस सिलसिले में प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम और सीएम भूपेश बघेल के साथ ही अन्य प्रमुख नेताओं से लगातार चर्चा भी कर रहे हैं। सुनते हैं कि मरकाम के करीबी कोंडागांव के रवि घोष को गिरीश देवांगन की जगह प्रभारी महामंत्री बनाया जा सकता है। गिरीश सीएम भूपेश बघेल के करीबी हैं और चर्चा है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा में भेज सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि यदि राज्यसभा में नहीं गए, तो उन्हें निगम-मंडल में जगह मिल सकती है। 

चर्चा यह भी है कि मप्र के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने अपनी तरफ से दो-तीन नामों की सिफारिश की है। इनमें से एक अल्पसंख्यक नेता भी है। हल्ला तो यह भी है कि प्रदेश संगठन में हिसाब-किताब रखने की पोजिशन में मरकाम अपने किसी विश्वस्त नेता को चाहते थे। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था में बदलाव के लिए दबाव भी बनाया था। इसके लिए मरकाम को एक प्रभावशाली मंत्री का साथ भी मिला। मगर चर्चा है कि पार्टी के कई और प्रभावशाली नेताओं के दबाव के चलते उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पा रही है। यानी हिसाब-किताब के लिए किसी नए पर भरोसा नहीं किया जाएगा। मौजूदा व्यवस्था कायम रहेगी। 

भाजपा संगठन, और अटकलें

प्रदेश भाजपा का मुखिया कौन होगा, इसको लेकर अटकलें लगाई जा रही है। यह तकरीबन तय हो गया है कि सर्वमान्य नेता को ही प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी जाएगी। चर्चा है कि प्रदेश के सांसदों ने पार्टी हाईकमान को साफ तौर पर बता दिया कि जाति समीकरण को ध्यान में रखकर प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पार्टी को नुकसान हो सकता है। अभी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा हुआ है। ऐसे में पार्टी को खड़ा करने के लिए तेजतर्रार अध्यक्ष की जरूरत है। सांसदों की सलाह पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय के नाम को नजर अंदाज कर नए नाम पर विचार हो रहा है। अब तेजतर्रार होने के पैमाने पर खरा माने जाने वाले एक सवर्ण नेता से जब कहा गया कि उन्हें अध्यक्ष बनना चाहिए, तो उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने 15 बरस सरकार चलाई है, वे ही लोग विपक्ष के इन दिनों में संगठन भी चलाएं, उनको पार्टी अगर आखिरी दो बरस में प्रदेश अध्यक्ष बनने कहेगी, तो वे सोचेंगे।

आंदोलन कितना उग्र हो?
धान खरीद मसले पर भाजपा एक बड़ा आंदोलन खड़ा करना चाहती थी। सरकार ने बात मान ली, तो आंदोलन का फैसला वापस ले लिया गया। मगर आंदोलन से पहले ही भाजपा नेताओं में आपसी मतभेद उभरकर सामने भी आ गए। सुनते हैं कि आंदोलन की तैयारी बैठक में एक तेजतर्रार पूर्व मंत्री ने यह सुझाव दिया कि कम से कम एक बेरिकेड्स तोड़कर आगे बढऩा होगा, तब कहीं जाकर माहौल बनेगा। इस पर किसान मोर्चा के एक पदाधिकारी ने उन्हें यह कहकर चुप करा दिया कि आंदोलन की अगुवाई उन्हें (पूर्व मंत्री) ही करना होगा, क्योंकि तोडफ़ोड़ की स्थिति में पुलिस कार्रवाई को सहने के लिए आम कार्यकर्ता तैयार नहीं है। उन्होंने पूर्व मंत्री की यह कहकर खिंचाई की कि पहले भी वे इस तरह की सलाह दे चुके हैं और खुद गायब हो जाते थे। किसान नेता की तीखी प्रतिक्रिया के बाद बैठक में थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई। ( rajpathjanpath@gmail.com)


29-Feb-2020

राज्यसभा, चर्चा नहीं, अटकलें शुरू

राज्यसभा के चुनाव 26 मार्च के लिए तय हुए हैं और महीना भर बाकी रहने पर भी अटकलें तो हर जगह लगती ही हैं क्योंकि राज्यसभा पहुंचना बहुत बड़ी बात होती है, छह बरस के लिए जिंदगी का सुख, दिल्ली में असर, और बाकी जिंदगी की पेंशन-सहूलियतें सब तय हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ से अभी दो सीटें खाली हुई हैं जिनमें एक मोतीलाल वोरा की भी है। दूसरी सीट रणविजय सिंह जूदेव की है, लेकिन भाजपा इस बार विधायकों की कमी से किसी को राज्यसभा भेज नहीं पाएगी, और वह किसी नाम को छांटने की फिक्र से भी मुक्त है। दोनों नाम कांग्रेस के तय होना है, और एक अनार सौ बीमार वाली नौबत है। 

मोतीलाल वोरा कांग्रेस पार्टी के लिए इतनी अधिक अहमियत रखते हैं कि वे दिल्ली में सोनिया गांधी के सबसे करीबी लोगों में तो हैं ही, वे नेशनल हेरल्ड जैसे पार्टी-कारोबार को भी सम्हालते हैं, और यह जिम्मा सम्हालते हुए वे सोनिया और राहुल के साथ अदालती कटघरे में भी पहुंचे हुए हैं। एक नाव में सवार इन तमाम लोगों की एक-दूसरे पर निर्भरता भी मायने रखती है। जानकारों का कहना है कि वोराजी एक बार और राज्यसभा जाने के लिए बिल्कुल तैयार हैं, उनकी सेहत भी उम्र के विपरीत, किसी जवान नेता के टक्कर की है, और वे छत्तीसगढ़ में पैदा न होने पर भी पूरी जिंदगी से छत्तीसगढ़ की राजनीति करते आए हैं। दूसरी तरफ दिल्ली के जानकार कुछ लोगों का यह भी कहना है कि केरल के के.सी. वेणुगोपाल का नाम भी छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के लिए तय हो सकता है, इनके लिए पार्टी अतिरिक्त कोशिश करेगी क्योंकि राहुल गांधी केरल से ही विशाल बहुमत से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए हैं, और केरल ने कांग्रेस की लोकसभा में इज्जत बचाकर रखी है। लेकिन ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जिस तरह छत्तीसगढ़ी-राजनीति कर रहे हैं, एक नाम खालिस छत्तीसगढ़ी का होगा। अब इसमें उनके पास संगठन के अपने सहयोगी गिरीश देवांगन, और राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा के नाम हो सकते हैं, दोनों ही छत्तीसगढ़ी माटीपुत्र हैं, दोनों ही ओबीसी तबके के हैं। हालांकि इस बारे में मुख्यमंत्री के कुछ करीबी लोगों से पूछने पर उनका कहना है कि अभी मुख्यमंत्री के आसपास राज्यसभा को लेकर कोई चर्चा भी शुरू नहीं हुई है, और लोग अपने-अपने अंदाज से अटकलें लगा रहे हैं। 

जब अटकल की ही बात आती है तो मध्यप्रदेश में सिंधिया और दिग्विजय सिंह दोनों को राज्यसभा भेजने की तैयारी बताई जाती है, लेकिन अगर दिग्विजय सिंह को वहां से न भेजकर छत्तीसगढ़ से राज्यसभा में भेजा जाएगा, तो भी छत्तीसगढ़ के तमाम कांग्रेस विधायक खुश होंगे, क्योंकि सारे ही विधायक उन्हीं के साथी और प_े रहे हुए हैं। लेकिन यह बात सिर्फ राजनीतिक संबंधों के आधार पर है, यह अटकल की दर्जे की बात भी नहीं है। फिलहाल जो एक नाम अधिक संभावना रखता है वह मोतीलाल वोरा का है, क्योंकि वे खुद तैयार हैं, दूसरा नाम प्रदेश के भीतर या बाहर कहीं का भी हो सकता है। 

पुराने गुरू काम आए

पूर्व सीएम अजीत जोगी और नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया के बीच चोली-दामन का साथ रहा है। जोगी, डहरिया के राजनीतिक गुरू माने जाते हैं। मगर जोगी ने कांग्रेस छोड़ी तो डहरिया ने उनका साथ छोड़ दिया। इसके बाद दोनों के रिश्तों में खटास आ गई। डहरिया अभी भी जोगी को लेकर सहज नहीं दिखते हैं। इसका नजारा विधानसभा में उस वक्त देखने को मिला जब भाजपा सदस्यों ने डहरिया की टिप्पणी से खफा होकर उनके विभागों के सवालों का बहिष्कार कर दिया। 

पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने तो डहरिया के प्रति अपनी नाराजगी का इजहार करते हुए यहां तक कह दिया कि आसंदी चाहे तो उनके (चंद्राकर) खिलाफ कार्रवाई कर दे, लेकिन वे नगरीय प्रशासन मंत्री से सवाल नहीं पूछेंगे। फिर क्या था, अजीत जोगी, भाजपा सदस्यों और डहरिया के बीच सुलह सफाई के लिए आगे आए। उन्होंने डहरिया के प्रति अपना प्रेम दिखाते हुए छत्तीसगढ़ी में गुजारिश की कि मैं तोर संरक्षक हौं, तोर अभिभावक रहैंव। हॉस्टल से यहां (विधानसभा) लाए हौं। मोर बात मान ले, एक लाईन मीठा बोल दे। सब कुछ ठीक हो जाही। कखरो मन में कोई बात नहीं रहई। डहरिया खड़े हुए और सफाई दी कि चंद्राकर और अन्य विपक्षी सदस्यों का वे सम्मान करते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि वे जोगीजी का भी सम्मान करते हैं। छात्र राजनीति के दौर में जोगीजी जब कलेक्टर थे, तब एक बार हॉस्टल में उनका घेराव भी कर चुके हैं। वे जोगी से जुड़े रहे हैं, लेकिन बोचकने (अलग होने) में काफी समय लगा। उनकी टिप्पणी से जोगी समेत बाकी सदस्य भी हंस पड़े। 

रमन सिंह का बदला मिजाज

पूर्व सीएम रमन सिंह अब बाकी भाजपा सदस्यों को साथ लेने के लिए आतुर दिख रहे हैं। वे अब हरेक मुद्दे पर अपने विरोधी माने जाने वाले पार्टी विधायकों से चर्चा में परहेज नहीं कर रहे हैं।  दरअसल, नेता प्रतिपक्ष के चयन के बाद से रमन सिंह और बृजमोहन-ननकीराम कंवर खेमे के बीच दूरियां बढ़ गई थीं। हाल यह रहा कि ननकीराम कंवर ने रमन सिंह के पीएस रहे अमन सिंह और मुकेश गुप्ता के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा सीएम भूपेश बघेल को सौंप दिया था और सरकार ने जांच के लिए एसआईटी बिठा रखी है। 

कंवर की तरह पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल भी रमन सिंह से छिटके रहे हैं। शीतकालीन सत्र में तो रमन सिंह वकीलों की फीस से जुड़े सवाल पूछकर उलटे घिर गए थे। सीएम भूपेश बघेल और सत्तापक्ष के सदस्यों ने उन पर बुरी तरह चढ़ाई कर दी थी। हालांकि नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक और शिवरतन शर्मा ने थोड़ा बहुत सत्ता पक्ष के सदस्यों का प्रतिकार किया, लेकिन यह काफी नहीं था। बाकी भाजपा सदस्य खामोश रहे। धरमलाल कौशिक को तो बाकी भाजपा सदस्यों का साथ मिल रहा है, लेकिन रमन सिंह के साथ ऐसा नहीं था। सुनते हैं कि यह सब भांपकर रमन सिंह ने अपने खिलाफ नाराजगी को दूर करने के लिए खुद पहल की है। 

विधानसभा में ननकीराम कंवर के पास जाकर उनसे किसानों से जुड़े विषयों पर चर्चा की। यही नहीं, वे अजय और बाकी सदस्यों से भी लगातार बतियाते दिखे। इसका कुछ असर भी हुआ और भाजपा सदस्य विधानसभा में पिछले सत्रों के मुकाबले ज्यादा मुखर दिखे।  ( rajpathjanpath@gmail.com)


24-Feb-2020

जयदीप जर्मनी चले...

छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसर जयदीप सिंह की पोस्टिंग जर्मनी के भारतीय दूतावास में हो गई है। 97 बैच के आईपीएस जयदीप सिंह लंबे समय से आईबी में पदस्थ हैं। पिछले कुछ समय से वे छत्तीसगढ़ में आईबी का काम देख रहे हैं। जयदीप सिंह स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारिक सिंह के पति हैं। चूंकि पति की विदेश में पोस्टिंग हो गई है, तो संभावना जताई जा रही है कि निहारिका बारिक सिंह भी केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर जा सकती हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने इसके लिए आवेदन नहीं किया है। करीबी जानकारों का कहना है कि अभी तुरंत उन्होंने ऐसा कुछ सोचा नहीं है।

अमितेष चुप नहीं रह पाए...
राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान विपक्ष की तरफ से टोका-टाकी की आशंका जताई जा रही है, लेकिन सबकुछ शांतिपूर्ण चल रहा था। तभी अमितेष शुक्ल खड़े हुए और उन्होंने राज्यपाल का अभिभाषण शांतिपूर्वक सुनने के लिए विपक्षी सदस्यों को साधुवाद दे दिया। यानी टोका-टाकी की शुरूआत खुद सत्तापक्ष के सदस्य ने कर दी। अमितेश की टिप्पणी पर सदन में ठहाका लगा। पिछले बरस अक्टूबर में जब गांधी पर विधानसभा का विशेष सत्र हुआ तो अमितेष शुक्ल ने तमाम विधायकों की तरह विशेष कोसा-पोशाक पहनने से इंकार कर दिया था, और नतीजा यह हुआ था कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरण दास महंत ने दो दिन के उस सत्र में अमितेष को बोलने नहीं दिया था, और वे नाराजगी से सदन के बाहर चले गए थे। इस बार उन्हें बोलने का मौका मिला। बाद में अभिभाषण खत्म होने के बाद भाजपा सदस्य बृजमोहन अग्रवाल ने धान खरीदी बंद होने से किसानों की परेशानी का मुद्दा उठाया। 

आडंबर से उबरना भी जरूरी...
अभी-अभी महाशिवरात्रि के मौके पर एक बार फिर यह सवाल उठा कि कुपोषण के शिकार इस देश में जहां बच्चों को पीने के लिए दूध नसीब नहीं है, वहां पर क्या किसी भी प्रतिमा पर इस तरह दूध बर्बाद करना चाहिए? और बात महज हिन्दू धर्म के किसी एक देवी-देवता की नहीं है, यह बात तो तमाम धर्मों के लोगों की है जिनमें कहीं भी, किसी भी शक्ल में सामान की बर्बादी होती है, और लोग उससे वंचित रह जाते हैं। कई धर्मों को देखें, तो हिन्दू धर्म में ऐसी बर्बादी सबसे अधिक दिखती है। शिवलिंग पर चढ़ाया गया दूध नाली से बहकर निकल जाता है, और ऐसे ही मंदिरों के बाहर गरीब भिखारी, औरत और बच्चे भीख मांगते बैठे रहते हैं। जाहिर है कि ऐसे गरीबों को दूध तो नसीब होता नहीं है। 

लेकिन समाज अपने ही धार्मिक रिवाजों से कई बार उबरता भी है। अभी सोशल मीडिया पर एक तस्वीर आई है जिसमें शिवलिंग पर दूध के पैकेट चढ़ाए गए हैं, और उसके बाद ये पैकेट गरीब और जरूरतमंद बच्चों को बांट दिए जाएंगे। धार्मिक रीति-रिवाजों में पाखंड खत्म करके इतना सुधार करने की जरूरत है कि ईश्वर को चढ़ाया गया एक-एक दाना, एक-एक बूंद गरीबों के लिए इस्तेमाल हो। जब ईश्वर के ही बनाए गए माने जाने वाले समाज में बच्चे भूख और कुपोषण के शिकार हैं, तो दूध को या खाने-पीने की किसी भी दूसरी चीज को नाली में क्यों बहाया जाए? यह भी सोचने की जरूरत है कि जब कण-कण में भगवान माने जाते हैं, तो ऐसे कुछ कणों को भूखा क्यों रखा जाए? धार्मिक आडंबर में बर्बादी क्यों की जाए? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब लोगों को ढूंढने चाहिए, और चूंकि धार्मिक आस्था तो रातोंरात घट नहीं सकती, नई तरकीबें निकालकर बर्बादी घटाने का काम करना चाहिए। धर्म के नाम पर पहले से मोटापे के शिकार तबके को और अधिक खिला देना उन्हें मौत की तरफ तेजी से धकेलने का काम है, उससे कोई पुण्य नहीं मिल सकता। खिलाना तो उन्हें चाहिए जिन्हें इसकी जरूरत हो। अभी की शिवरात्रि तो निकल गई लेकिन अगली शिवरात्रि तक समाज के बीच यह बहस छिडऩी चाहिए कि दूध को इस तरह चढ़ाया जाए कि वह लोगों के काम आ सकें, जरूरतमंदों के काम आ सके। (rajpathjanpath@gmail.com)


23-Feb-2020

किस्सा भूतों..., मतलब भूतपूर्वों का

राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष अजय सिंह 29 तारीख को रिटायर हो रहे हैं। उन्हें नाराजगी के चलते सरकार ने सीएस के पद से हटाकर राजस्व मंडल भेज दिया था। बाद में उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया। अब चूंकि वे रिटायर हो रहे हैं, तो उनकी पोस्टिंग को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। यह संकेत हैं कि अजय सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद पर आगे भी बने रहेंगे। वैसे भी, राज्य बनने के बाद जितने भी सीएस रहे हैं, उनमें से आरपी बगई और पी जॉय उम्मेन को छोड़ दें, तो बाकी सभी को रिटायरमेंट के बाद कुछ न कुछ जिम्मेदारी सौंपी गई थी। आरपी बगई और पी जॉय उम्मेन को भी पद का ऑफर दिया गया था, लेकिन दोनों ने यहां सरकार में काम करने से मना कर दिया।  

बगई को पीएससी चेयरमैन का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। बगई का सोचना था कि पीएससी चेयरमैन का पद प्रमुख सचिव के समकक्ष है। वे कोई अहम जिम्मेदारी चाह रहे थे, जिसके लिए रमन सरकार तैयार नहीं थी। बाद में वे दुबई चले गए और एक निजी कंपनी में नौकरी करने लगे। जबकि जॉय उम्मेन को सीएस के पद से हटाने के बाद सीएसईबी और एनआरडीए चेयरमैन के पद पर यथावत काम करने के लिए कहा गया था, लेकिन वे सीएस के पद से हटाए जाने के बाद इतने नाखुश थे कि वे रिटायरमेंट के बाद अपने गृह प्रदेश केरल चले गए, जहां केरल सरकार में वे राज्य वित्त निगम के चेयरमैन हो गए थेे। बाद में वे एक मंत्रालय के सलाहकार बनाए गए थे और जब भ्रष्टाचार के चलते उस मंत्रालय के मंत्री की कुर्सी चली गई, तो उम्मेन का काम भी खत्म हुआ।

राज्य के पहले सीएस अरूण कुमार प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष बनाए गए। उनका बनना भी बहुत दिलचस्प है। सीएस रहते हुए उन्होंने कोई काम नहीं किया, फाईलें उनके कमरे में जाती थीं, वहां से वापिस नहीं आती थीं। लेकिन रिटायर होने के बाद उन्हें पुनर्वास की बहुत तलब थी। अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे, और सुनिल कुमार उनके सचिव थे। रिटायर होने के बाद उन्होंने सुनिल कुमार की ऐसी घेरेबंदी की कि आखिर में थक-हारकर उन्होंने जोगीजी से कहा कि इन्हें कहीं भी कुछ भी बना दें, ताकि परेशान करना बंद करें। ऐसे में एक प्रशासनिक सुधार आयोग बनाकर अरूण कुमार को एक साल के लिए उसमें रखा गया। जिसने नौकरी में रहते काम नहीं किया, उसे प्रशासनिक सुधार का काम दिया गया। सरकार में इस किस्म की बर्बादी को अधिक गंभीर नहीं माना जाता है, और हर सरकार में ऐसे कई पद बर्बाद होते ही हैं।

उनके बाद के सीएस एस के मिश्रा राज्य विद्युत नियामक आयोग के चेयरमैन बनाए गए। इसके बाद भी वे कई अहम पदों पर काम करते रहे। वे रिटायरमेंट के बाद सबसे लंबी पारी खेलने वाले अफसर रहे। एसके मिश्रा के उत्तराधिकारी एके विजयवर्गीय राज्य के पहले मुख्य सूचना आयुक्त बने। उनके बाद शिवराज सिंह भी पहले राज्य निर्वाचन आयुक्त फिर राज्य योजना आयोग और राज्य पावर कंपनी  के चेयरमैन रहे, वे सीएम के सलाहकार के पद पर भी काम करते रहे। शिवराज सिंह के बाद जॉय उम्मेन और फिर सुनिल कुमार सीएस बने। सुनिल कुमार ने भी योजना आयोग के उपाध्यक्ष, और मुख्यमंत्री के सलाहकार के पद पर काम किया। उनके बाद विवेक ढांड रिटायरमेंट के पहले ही इस्तीफा देकर रेरा के चेयरमैन बने और वे इस पद पर काम कर रहे हैं। विवेक ढांड के बाद अजय सिंह सीएस बनाए गए थे। भूपेश बघेल सरकार ने आते ही अजय सिंह को हटाकर सुनील कुजूर को सीएस बनाया गया। कुजूर को रिटायरमेंट के बाद वर्तमान सरकार ने सहकारिता आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। अब अजय सिंह को उनके पूर्ववर्तियों की तरह कोई जिम्मेदारी सौंपी जाती है, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 
(rajpathjanpath@gmail.com)


22-Feb-2020

बापू की कुटिया...

पिछली भाजपा सरकार के दौरान रायपुर के बहुत से बगीचों में एक उत्साही कलेक्टर ने बापू की कुटिया बनवा दी थी। कलेक्टरों के पास जिला खनिज निधि का बहुत सा पैसा मर्जी से खर्च करने के लिए रहता था, जिसमें अब कलेक्टरों की मर्जी काफी कम कर दी गई है। उस वक्त छह या आठ कोने के ऐसे कमरे बगीचों में बनवाए गए थे जो सिर्फ बुजुर्गों के बैठने के लिए रखे गए थे। उनमें टीवी भी लगाया गया था, और जूते-चप्पल बाहर उतारकर आने के नोटिस भी लगाए गए थे। पता नहीं बुजुर्गों को यह रास नहीं आया, या फिर जूते-चप्पल बाहर चोरी होने का खतरा था, ये उजाड़ पड़े हुए हैं, और अब पता चल रहा है कि म्युनिसिपल इन्हें महिलाओं को किटी पार्टी जैसी जरूरतों के लिए किराए पर देने के लिए ठेकेदार तय कर रहा है। अगर पार्टी की बाजारू जगह ही बनानी थी, तो हरियाली की जगह पर नियम तोड़ते हुए क्यों ऐसे निर्माण किए गए? बगीचों का ऐसा इस्तेमाल पूरी तरह नियमों के खिलाफ रहेगा। म्युनिसिपल के अफसरों और नेताओं ने यह भी कोशिश नहीं की कि बापू की कुटिया की जगह बा की कुटिया नाम करके देखा जाता कि क्या महिलाएं वहां बैठने में दिलचस्पी लेती हैं? आम महिलाएं बैठ सकें इसके बजाय अब महंगा भाड़ा देकर पार्टी रखने वाली, और गंदगी फैलाने वाली खास महिलाओं के लिए ये ढांचे अब रह गए हैं। म्युनिसिपल को इनका बाजारू इस्तेमाल करने के बजाय किसी और तरह का सामाजिक उपयोग करना चाहिए क्योंकि ये सामाजिक पैसे से सामाजिक जगह पर बने हुए ढांचे हैं। 

बगीचे और शऊर 
छत्तीसगढ़ के अधिकतर शहरों में बाग-बगीचों में म्युनिसिपलों ने कसरत करने के लिए मशीनें लगाई हैं। किसी भी जगह एक किस्म की एक ही मशीन है, और उस पर एक या दो लोग ही कसरत कर सकते हैं। आठ-दस किस्म की मशीनें, और उस पर दर्जन भर लोगों की गुंजाइश, क्योंकि महिलाओं और आदमियों का आमने-सामने एक ही मशीन पर कसरत करने का यहां के बाग-बगीचों में चलन है नहीं। ऐसे में किसी एक मशीन पर दो महिलाएं बैठकर कमर पर जोर डालने के बजाय जब गप्पें मारने लगती हैं, तो फिर बाकी लोगों का वह कसरत करना हो नहीं पाता। अभी राजधानी रायपुर के ऐसे ही एक बगीचे में दो लड़कियां आमने-सामने जम गईं, एक अपने हाथ में चिप्स के पैकेट से एक-एक चिप्स निकालकर उसके बारे में देर तक घूरते हुए यह सोच रही थी कि मार दिया जाए, या छोड़ दिया जाए। पैकेट खत्म होने के पहले तो उसका वहां से हिलने का सवाल नहीं था, और हर चिप्स उसके सामने जीवन का सबसे बड़ा धर्मसंकट खड़ा करते दिख रहा था कि खाऊं या न खाऊं। उसके ठीक सामने बैठी लड़की मोबाइल फोन पर कुछ देखे जा रही थी, और आधा घंटा गुजर जाने पर भी उसका देखना जारी था। उस मशीन पर कसरत करने की हसरत रखने वाले एक-दो लोग पास की मशीनों पर खड़े उन्हें घूर रहे थे, लेकिन इस जोड़े की एकाग्रता पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। बाद में बगल से निकलते हुए एक आदमी ने इस लड़की के फोन की स्क्रीन पर एक नजर डाली, तो उस पर बिना कपड़ों की एक लड़की की तस्वीर दिख रही थी। यह तुलना करना मुश्किल था कि एक लड़की की देह में एकाग्रता अधिक गहरी थी, या उसके सामने चिप्स में एकाग्रता। जो भी हो, हिन्दुस्तानियों को इतना सलीका और शऊर सीखना चाहिए कि कसरत की मशीनें बैठने की बेंच-कुर्सी नहीं होती हैं। राजधानी के अफसरों की समझ का यह हाल है कि जिन जगहों पर पैदल घूमने या कसरत करने को बढ़ावा देना चाहिए, वहां पर वे मुफ्त का वाईफाई देकर चर्बी को बढ़ावा दे रहे हैं।  (rajpathjanpath@gmail.com)


21-Feb-2020

केंद्रीय कानून के विरोध से अपात्रता?
छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव देवेन्द्र वर्मा भोपाल  शिफ्ट हो गए हैं। उनकी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पाण्डेय और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल से गहरी छनती रही है। देवेन्द्र वर्मा कई और राजनेताओं के करीबी रहे हैं। वे संसदीय मामलों के गहरे जानकार भी माने जाते हैं। वे प्रेमप्रकाश पाण्डेय के पुत्र के विवाह समारोह में शिरकत करने पहुंचे, तो उन्होंने अनौपचारिक रूप से मीडिया से जुड़े लोगों के साथ निजी चर्चा में एनआरसी-सीएए पर अपनी राय रखी। 

छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों के सीएम एनआरसी-सीएए का खुलेतौर पर विरोध कर चुके हैं। उन्होंने अपने राज्यों में एनआरसी-सीएए लागू नहीं होने देने की बात कही है। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने भी दो दिन पहले मीडिया में यही बात दोहराई है। पूर्व प्रमुख सचिव देवेन्द्र वर्मा का मानना है कि केन्द्रीय कानून को रोकने का अधिकार राज्यों को नहीं है। ये बात कानून के खिलाफ टीका-टिप्पणी करने वाले राजनेता भी जानते हैं। मगर उनकी यह टिप्पणी संविधान के खिलाफ भी है।  

वे कहते हैं कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने संविधान की शपथ ली है और ऐसे में उनकी कानून के खिलाफ टिप्पणी असंवैधानिक है। पूर्व पूर्व विधानसभा सचिव का मानना है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का एनआरसी-सीएए को लागू नहीं करने की बात कहना सदन से अयोग्यता का कारण भी बन सकता है। यह उनकी अयोग्यता साबित करने के लिए एकदम फिट केस है। जिस तरह एनआरसी-सीएए के खिलाफ टीका-टिप्पणी हो रही है, उसको लेकर देर सवेर संबंधित नेताओं की सदस्यता समाप्त करने के खिलाफ कोई सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है, क्योंकि संवैधानिक विषयों पर सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में ही सुनवाई हो सकती है। फिलहाल तो गली-मोहल्लों में एनआरसी-सीएए को लेकर बहस ही चल रही है।

भाजपा का समुद्रमंथन जारी

प्रदेश भाजपा के नए मुखिया की तलाश चल रही है। पूर्व सीएम रमन सिंह और बाकी दिग्गज नेताओं की अपनी अलग पसंद बताई जा रही है। इन चर्चाओं के बीच पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, नारायण चंदेल और शिवरतन शर्मा प्रदेश अध्यक्ष को लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के समक्ष बेबाकी से अपनी बात कह चुके हैं। चूंकि नड्डा छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी भी रह चुके हैं। और उनके प्रदेश के इन तीनों समेत कई अन्य से उनके व्यक्तिगत संबंध भी हैं। ऐसे में नड्डा ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना।  

तीनों नेताओं ने इशारों-इशारों में कह दिया कि नेता प्रतिपक्ष की तरह ही प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पार्टी को खड़ा करना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने आक्रामक प्रदेश अध्यक्ष की जरूरत पर बल दिया। तीनों नेताओं को सुनने के बाद नड्डा के कहने पर राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने प्रदेश के सभी सांसदों से भी रायशुमारी की है। सुनते हैं कि सांसदों के विचार भी अजय, नारायण और शिवरतन से मेल खाते दिखे। प्रदेश अध्यक्ष के लिए खुद अजय चंद्राकर, विजय बघेल और रामविचार नेताम का नाम चर्चा में है। पूर्व सीएम रमन सिंह और सौदान सिंह की जोड़ी ने विष्णुदेव साय का नाम बढ़ाया है। चर्चा है कि आरएसएस सहित एक पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल ने बिलासपुर के सांसद अरूण साव को प्रदेश संगठन की कमान सौंपने की वकालत की है। 

खास बात यह है कि हाईकमान ने रमन सिंह की पसंद पर विधायकों के बहुमत को नजरअंदाज कर धरमलाल कौशिक को नेता प्रतिपक्ष बनाया था। देखना है कि प्रदेश अध्यक्ष के चयन में पार्टी चंद्राकर, नारायण और शिवरतन की तिकड़ी की राय को महत्व देती है, अथवा नहीं। कुल मिलाकर नए प्रदेश अध्यक्ष के चयन से हाईकमान के सामने दिग्गजों की अपनी ताकत का भी प्रदर्शन हो जाएगा। 
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20-Feb-2020

टैक्स चोरी और आयकर छापे

टैक्स चोरी के खिलाफ आयकर विभाग का अभियान चल रहा है। प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक कारोबारियों के प्रतिष्ठानों में आयकर जांच चल रही है। देशभर में मंदी का माहौल हैं, ऐसे में कारोबारी आयकर जांच से काफी दिक्कत महसूस करते दिख रहे हैं। पिछले दिनों कैट के एक कार्यक्रम में एक व्यापारी नेता ने तो मुख्य आयकर आयुक्त से गुजारिश भी कर दी थी कि छत्तीसगढ़ से आयकर का लक्ष्य कम रखा जाए, ताकि व्यापारियों पर आयकर का प्रेशर कम रहे। 

आयकर आयुक्त ने साफ तौर पर बता दिया कि आयकर का लक्ष्य कम नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह खुलासा कर व्यापारियों की बोलती बंद कर दी, कि किसी भी कारोबारी को जानबूझकर परेशान नहीं किया जा रहा है, बल्कि आयकर विभाग के पास पूरा डेटा है कि कई व्यापारी आयकर चोरी कर रहे हैं। ऐसे 962 कारोबारी चिन्हित भी किए गए हैं, केवल उन्हीं के यहां जांच-पड़ताल हो रही है। उन्होंने यह भी बताया कि कई कारोबारियों ने जांच में आयकर चोरी की बात मानी थी और इसको पटाने का भी वादा किया था, लेकिन वे सरेंडर राशि जमा नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब टैक्स प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो चुकी है। ऐसे में किसी को बेवजह परेशान नहीं करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

कुछ एसपी बदलेंगे...
प्रदेश के कुछ आईपीएस अफसरों को जल्द ही इधर से उधर किया जा सकता है। इस पर सीएम के अमरीका प्रवास से लौटने के बाद फैसला हो सकता है। फेरबदल की स्थिति बलौदाबाजार एसपी नीतू कमल की वजह से बनी है। नीथू कमल की सीबीआई में पोस्टिंग हो चुकी है। वे सीबीआई में एसपी बनकर जा रही हैं। सीएम के लौटने के बाद उन्हें रिलीव किया जा सकता है। इसके अलावा कवर्धा एसपी लाल उमेद सिंह को भी दो साल से अधिक हो चुके हैं। वे एकमात्र एसपी हैं जिनकी पोस्टिंग पिछली सरकार में हुई थी, और उन्हें बदला नहीं गया है। ऐसे में उनका भी तबादला संभव है। रायपुर एएसपी प्रफुल्ल ठाकुर सहित कुछ नाम है, जिन्हें एसपी बनाया जा सकता है। 

हिचकियों का भयानक राज...
अभी शादियों के एक सैलाब में छत्तीसगढ़ के छोटे-बड़े शहरों में जिस भयानक स्तर तक लाऊडस्पीकर बजे हैं, उनसे लोगों का जीना हराम हो गया है। कई लोग अपने घर के भीतर किसी ऐसे कमरे में सोने लगे हैं जहां आवाज का हमला कुछ कम रहे, लेकिन हर किसी को तो इतने बड़े घर नसीब होते नहीं हैं। चारों तरफ शादियों के ढोल-धमाके, लाऊडस्पीकर, और फिर रही-सही कसर धार्मिक शोरगुल पूरी कर देता है। ऐसे में जब आसपास से बिगड़ैल पैसे वाले भारी-भरकम बुलेट-मोटरसाइकिल का सायलेंसर फाड़कर निकलते हैं, तो लोग खूब गालियां देते हैं। 

एक दिलचस्प कहानी अभी सोशल मीडिया पर तैर रही है। एक परिवार में अचानक कुछ सदस्यों को हिचकियां आने लगती हैं, और बढ़ते-बढ़ते नौबत इतनी बुरी हो जाती है कि उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। डॉक्टर कई किस्म की जांच करवाता है, और उसमें कोई सुराग न निकलने पर वह मरीजों के साथ आए हुए नौजवान से पूछता है- क्या आपके घर में अभी-अभी किसी ने बुलेट खरीदी है? 

डॉक्टर के सवाल से हैरान नौजवान कहता है कि हां ली तो है, लेकिन उससे हिचकियों का क्या लेना-देना? 

डॉक्टर फिर पूछता है कि क्या बुलेट का सायलेंसर बदलकर जोरों की आवाज वाला सायलेंसर लगवाया है? 

और अधिक हैरान होते हुए नौजवान कहता है कि हां लगवाया तो है, लेकिन उससे घरवालों की हिचकियों का क्या लेना-देना?

डॉक्टर अपनी अक्ल के तजुर्बे से कहता है- तुम मोटरसाइकिल का शोर मचाते हुए जितनी जगह घूमते हो, वहां के लोग तुम्हारे घर के लोगों को याद करते हुए गालियां देते हैं, और उसी की वजह से तुम्हारे घर के लोगों को इतनी हिचकियां आ रही हैं। 

अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ऐसे हजारों लोग घूम रहे हैं, जो दूसरों का जीना हराम कर रहे हैं, और लाखों लोगों की बद्द्ुआओं का असर उनके परिवार पर तो होगा ही होगा, आज नहीं हुआ है तो कल की गारंटी है। इसलिए शोर वाला सायलेंसर लगाते हुए अपने परिवार के उन लोगों का ख्याल रखें जिन्हें लोग आमतौर पर गालियां दे सकते हैं, आपकी वजह से। कम लिखे को अधिक समझें, और अपने परिवार पर मेहरबानी रखें।
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19-Feb-2020

बैठक क्यों हुई, अटकलें जारी...

पिछले दिनों राहुल गांधी ने दिल्ली में सीएम भूपेश बघेल, डॉ. चरणदास महंत, टीएस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू के साथ बैठक की। बैठक में प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया और अध्यक्ष मोहन मरकाम भी थे। यह खबर आई कि राहुल ने सरकार के कामकाज की समीक्षा की है, मगर बैठक के औचित्य को लेकर पार्टी के भीतर कयास लगाए जा रहे हैं।

वैसे तो हाल ही में प्रदेश में सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल के लिए समन्वय समिति का गठन किया गया है, लेकिन राहुल की बैठक में समन्वय समिति के कई सदस्यों को नहीं बुलाया गया था।  चुनिंदा नेताओं के साथ बैठक की जरूरत क्यों पड़ी, इसको लेकर भी पार्टी नेता अंदाजा लगा रहे हैं। 

सुनते हैं कि प्रदेश के दिग्गज नेता पिछले कुछ समय से हाईकमान के समक्ष सीएम-सरकार के खिलाफ कानाफूसी कर रहे थे। किसी तरह की अप्रिय स्थिति पैदा हो, उससे पहले ही राहुल गांधी ने प्रमुख नेताओं को एक साथ बिठाकर वस्तुस्थिति जानने की कोशिश की। ताकि समस्या का मौके पर ही इलाज किया जा सके। बैठक में सरकारी योजना और चुनाव नतीजों पर सामान्य चर्चा हुई, मगर बैठक में किसी भी नेता ने सीएम-सरकार के कामकाज पर कोई सवाल खड़े नहीं किए। ऐसे में राहुल करते भी तो क्या, सबको मिलजुलकर काम करने की मसीहाई नसीहत देकर रवाना कर दिया। पीठ पीछे जाकर कोई कुछ भी कहे, सामने जब कुछ कहा नहीं गया तो राहुल क्यों और क्या करते?

दूसरी तरफ अभी मुख्यमंत्री के अमरीका जाने से राजनीतिक उबाल कुछ ठंडा पड़ा हुआ था, लेकिन इस बीच उनके संसदीय सलाहकार राजेश तिवारी ने अपने फेसबुक पेज पर एक फोटो पोस्ट की है जिसमें वे मुख्यमंत्री के दूसरे सलाहकार विनोद वर्मा, और दो अन्य करीबी लोगों के साथ प्रियंका गांधी से मिलते हुए दिख रहे हैं। जाहिर तौर पर यह तस्वीर दिल्ली में मुलाकात की दिखती है, और मुख्यमंत्री के इतने करीबी इतने लोगों को कांगे्रस हाईकमान की इतनी करीबी प्रियंका से मिलने पर काफी कुछ कहने का मौका तो मिला ही होगा।

कबाड़ का बाजार बंगला
अफसरों में बहुत से ऐसे रहते हैं जिन्हें सामानों का भुगतान नहीं करना पड़ता। नतीजा यह होता है कि सामान बढ़ते चलते हैं, और हर बार तबादले पर एक ट्रक बढ़ जाती है। ऐसे लोगों में भी अगर परिवार में किसी को कबाड़ जमा करके रखने का शौक हो, तो मुसीबत और बढ़ जाती है। राज्य में तैनात अखिल भारतीय सेवा के एक जोड़े के साथ ऐसी ही दिक्कत हो गई है। पति-पत्नी में से एक गैरजरूरी सामानों से छुटकारा चाहते हैं, और दूसरे की चाहत अखबारों की रद्दी तक को सम्हालकर रखने की है। नतीजा यह है कि नया सामान आते जाता है, जिसका भुगतान आमतौर पर करना नहीं पड़ता, और पुराना सामान भी जमा रहता है जिससे बंगले के कुछ कमरे भर जाते हैं। जब तक जिलों के बड़े बंगलों में तैनाती रहती थी, तब तक तो किसी तरह काम चल जाता था, वहां भी बंगले के अहाते में टीन के शेड बनवाकर गोदाम की तरह सामान रखना पड़ा, लेकिन राजधानी में तो बंगले सीमित आकार के ही मिलते हैं, और उनमें गोदाम जोडऩे की सहूलियत भी नहीं रहती है। नतीजा यह हुआ है कि यह परिवार इतने सामानों से लद गया है कि जरूरत के वक्त सामान ढूंढना मुमकिन नहीं होता, और तलाश से बचने के लिए एक बार फिर किसी को कहकर सामान बुलवा लिया जाता है। ऐसे ही एक मातहत विभाग के छोटे अफसर को बंगले के इंतजाम के लिए रखा गया है, जिसका कहना है कि बंगले में से ही सामान निकालकर सामने रख दिया जाए तो भी साहब और मैडम को पता नहीं चलेगा कि वह बाजार से आया है, या उनके घर में ही पैक पड़ा हुआ सामान है। ऐसे मातहत विभाग में अब यह मजाक चल निकला है कि मनोचिकित्सक से कहकर कबाड़प्रेम का इलाज करवाया जाए, वरना इससे बड़ा बंगला मिलने में तो अभी दस बरस बाकी हैं। 

खुद नंगे हो रहे हैं...
सोशल मीडिया पर अपनी असहमति पर आधारित आलोचना लिखने में कुछ लोग इतने हमलावर हो जाते हैं कि दूसरे की इज्जत मटियामेट हो या न हो, अपनी खुद की इज्जत जरूर मिट्टी में मिला लेते हैं। खासकर जब किसी महिला पर हमला करना हो, तब अगर उसके साथ बलात्कार की धमकी पोस्ट की जाए, उसके गुप्तांगों के साथ क्या सुलूक करना चाहिए यह पोस्ट किया जाए, तो उस महिला का चाहे जो हो, पोस्ट करने वाला तो बलात्कार की मानसिकड्डता वाला दिखता ही है। अब यह तो इस देश का सबसे कड़ा आईटी कानून लागू करने वाले अफसर केंचुए की तरह के बिना रीढ़ वाले प्राणी हैं, इसलिए वे कुछ चुनिंदा मामलों को छोड़कर और कुछ नहीं करते, वरना हर दिन छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में भी दर्जन भर लोग गिरफ्तार होते, और कुछ हफ्तों में ही जेल के बाहर बचे मर्दों की बलात्कारी मानसिकता ठंडी पड़ जाती। फिलहाल तो दिल्ली से छत्तीसगढ़ आई वामपंथी नेता बंृदा करात के खिलाफ जहर उगलने वालों ने बंृदा का तो नुकसान नहीं किया, खुद अपना चाल-चलन और अपनी सोच जरूर उजागर कर दी। सोशल मीडिया एक ऐसी दुधारी तलवार है जिसमें अपने तरफ की धार अधिक घातक होती है।

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