देश की ‘सेल्फी’ में शामिल होने का वक्त-कार्तिकेया गोयल
‘छत्तीसगढ़’ से खास चर्चा : डिजिटल जनगणना 2026
रायपुर (‘छत्तीसगढ़’)। देश में लंबे अंतराल के बाद होने जा रही जनगणना 2026 इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक और अलग होगी। क्योंकि इस बार जाति जनगणना भी होने जा रही है। कोरोना काल के कारण टली जनगणना अब 16 साल बाद हो रही है और पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल तरीके से संपन्न किया जाएगा। ‘छत्तीसगढ़’ से खास चर्चा में जनगणना एवं नागरिक पंजीयन निदेशक कार्तिकेय गोयल ने इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हुए नागरिकों से सक्रिय भागीदारी की अपील की।
उन्होंने बताया कि जनगणना दो चरणों में पूरी होगी। पहला चरण मकान सूचीकरण का होगा, जो 1 मई से 30 मई 2026 के बीच चलेगा। इसमें हर घर की पहचान और बुनियादी जानकारी दर्ज की जाएगी। इसके बाद फरवरी 2027 में दूसरा चरण होगा, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की विस्तृत जानकारी एकत्र की जाएगी। खास बात यह है कि पहली बार नागरिकों को स्वगणना यानी खुद ऑनलाइन फॉर्म भरने का विकल्प दिया गया है। हालांकि यह पूरी तरह ऐच्छिक है। जनगणना कर्मचारी घर-घर जाकर जानकारी जुटाएंगे। डिजिटल प्रणाली इस जनगणना की सबसे बड़ी खासियत है। अब कागज का उपयोग लगभग खत्म हो गया है और प्रगणक मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे। इंटरनेट न होने की स्थिति में भी ऐप डेटा सुरक्षित रखेगा और नेटवर्क मिलने पर स्वत: सर्वर पर अपलोड हो जाएगा। इस बदलाव से न केवल प्रक्रिया तेज होगी, बल्कि आंकड़ों के विश्लेषण में लगने वाला समय भी काफी कम हो जाएगा। उम्मीद है कि 2027 में जनगणना पूरी होने के छह महीने के भीतर ही प्रमुख आंकड़े सार्वजनिक कर दिए जाएंगे।
जनगणना को लेकर लोगों में फैल रही भ्रांतियों पर भी गोयल ने साफ संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नि:शुल्क है और इसके नाम पर किसी भी प्रकार का शुल्क लेना या देना गलत है। यदि कोई व्यक्ति पैसे की मांग करता है तो उसकी शिकायत तुरंत की जानी चाहिए। साथ ही, साइबर फ्रॉड से बचने के लिए किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करने, कोई फाइल डाउनलोड न करने और किसी को भी भुगतान न करने की सलाह दी गई है।
-दिनेश चौधरी
रुप्पन बाबू ने अकड़ी हुई गर्दन के साथ कहा, ‘हमें नकली अक्ल से कोई खतरा नहीं है। इससे खतरा उन्हें हो सकता है, जिनके पास असली अक्ल होती है। हम ठहरे निपट मूरख। अक्ल के मामले में अपने हाथ बड़े तंग है। जब ऊपर वाले के यहाँ यह बंट रही थी, हम बैद महाराज के पीछे जयकारा लगाने के जरूरी काम में व्यस्त थे। अक्ल न उनके हिस्से में आई न अपने। हमारे पास ठेठ मौलिक किस्म की मूर्खता है, इसलिए हमें नकली अक्ल से कोई खतरा नहीं है। अक्ल है ही नहीं तो असल क्या और नकल क्या?’
स्थान-शिवपालगंज में ग्राम प्रधान का कार्यालय। समय-सनीचर के हाथों पिसी भंग को छानने के बाद वाला। मुख्य वक्ता-युवा दिलों की धडक़न रुप्पन बाबू। वक्तव्य के पीछे की मुख्य प्रेरक शक्ति-भंग की तरंग। मुख्य श्रोता-खन्ना मास्टर, सनीचर, जोगनाथ और बेईमान मुन्नू का भतीजा। मालवीय मास्टर भी होते पर नया सिनेमा लगने के कारण वे छंगामल इंटर कॉलेज के किसी छात्र के साथ नगर-भ्रमण पर थे। बेईमान मुन्नू का भतीजा, जैसा कि आप सब जानते हैं, नवें दर्जे का होनहार विद्यार्थी था और आटा चक्की वाले मास्टर मोतीराम की क्लास में पढ़ता था। मास्टर मोतीराम प्रिंसिपल वाले गुट में थे, इसलिए खन्ना मास्टर गेहूँ पिसवाने के लिए बेईमान मुन्नू की सेवाएँ लेते थे। उनका भतीजा इसी फेर में झोले समेत सभा में शामिल हो गया था, अन्यथा उसके यहाँ होने का कोई औचित्य नहीं था।
रुप्पन बाबू के वक्तव्य को सुनकर सनीचर उनके इस तर्क से बहुत प्रभावित हुआ। न भी होता तो जाहिर तो यही करना पड़ता। सनीचर की इतनी औकात नहीं थी कि रुप्पन बाबू कोई बात कहें और वह प्रभावित न हो। प्रभावित होने के प्रमाण-स्वरूप उसने अपने दाँत बाहर की ओर निकाल लिए, जो पहले से ही बाहर थे और अब वह पहले से भी ज्यादा मूर्ख लगने लगा था। उसे पता था कि परधानी उसे मूर्खता के बल पर ही हासिल हुई है। मूर्ख न होता तो बैद महाराज उसे परधान पद का उम्मीदवार भला क्यों चुनते?
रुप्पन बाबू ने अपने वक्तव्य को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘अब इस तरह समझ लो की नकली अक्ल है क्या? मशीन में हम जो डाटा डालते हैं, उसी की प्रोसेसिंग होती है। जैसे हम बेईमान मुन्नू की चक्की में गेहूँ डालते हैं तो गेंहूँ का आटा निकलता है। चावल डालते हैं तो चावल का आटा निकलता है। सिर्फ फिजिकल प्रॉपर्टी चेंज होती है। अक्ल डालते हैं तो पिसकर अक्ल बाहर निकलती है। अब अगर हम इसमें मूर्खता की बातें डालेंगे तो क्या बुद्धिमानी की बात बाहर निकलेगी? नहीं न! बस यही हमारा मास्टर स्ट्रोक है!’
मास्टर स्ट्रोक के नाम पर सनीचर चौकन्ना होकर सीधा खड़ा हो गया। समझ गया कि इसका सम्बन्ध हो न हो बैद महाराज से है। मास्टर स्ट्रोक लगाने का काम शिवपालगंज में अकेले उन्हीं के बस का था। कोई और होता तो सनीचर कॉपीराइट के वायलेशन के नाम पर उससे भिड़ जाता पर रुप्पन तो उसी खानदान के रोशन चिराग थे। सनीचर कोई और बात कहता, इससे पहले ही खन्ना मास्टर मैदान में कूद पड़े, कहा-‘अक्ल का मुकाबला भला मूर्खता से कैसे किया जा सकता है?’
रुप्पन बाबू के दिल में फौरन यह बात आई कि इस मुल्क में मास्टर लोग जब भी कोई बात कहेंगे, मूर्खता की ही कहेंगे। हमारे पास रिसोर्सेज की कमी नहीं है। स्कूल-कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी तक कच्चा माल इफरात भरा पड़ा है। इनका सही ढंग से दोहन हो तो दुनिया में कोई माई का लाल अपना मुकाबला नहीं कर सकता.. दिल की बात दिल में ही रखते हुए प्रकटत: उन्होंने कहा, ‘अब मास्टर जी बात तो तुम्हारी भी सही है पर मामला होने और न होने का है। इंसान वही चीज इस्तेमाल करेगा जो उसके पास होगी। उनके पास अक्ल है तो वे अक्ल का इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे पास नहीं है तो हम क्या करेंगे? जो साधन होगा, वही न काम में लायेंगे! हमारे पास जो है, उसी का बेहतर इस्तेमाल करने में अपनी भलाई है।’
रुप्पन बाबू ने अपना वक्तव्य जारी रखा, ‘सब तरफ इसी बात को लेकर बहस छिड़ी है कि असली और नकली अक्ल के फेर में दुनिया का क्या होगा? हम कहते हैं कि ये मुद्दा ही गलत है। असली चीज का मुकाबला असली चीज से ही हो सकता है, भले ही वह मूर्खता क्यों न हो। हमको अपनी रिसर्च इसी तरफ आगे बढ़ानी चाहिए।’
खन्ना मास्टर थोड़े कन्फ्यूज हो गये। जब समझदारी का मुकाबला नासमझी से करना हो तो उन्हें समझ में नहीं आया कि वे रुप्पन बाबू की अज्ञानता से प्रभावित हों या उनके ज्ञान से। उन्होंने रुप्पन बाबू से कहा कि वे अपनी बात किसी उदाहरण के साथ सरल भाषा में रखें।
टीचर होने के नाते खन्ना मास्टर का रुप्पन बाबू खूब सम्मान करते थे। वे कॉलेज के प्रिंसिपल का भी उतना ही सम्मान करते थे और चपरासी का भी। वे खन्ना मास्टर, प्रिंसिपल साहब, चपरासी, और सनीचर; उन सबको समभाव से देखते थे जो बैद महाराज की चाकरी करते थे। वे खन्ना मास्टर से उसी सम्मान के साथ सम्बोधित हुए और कहा, ‘सुनो खन्ना मास्टर! इंसान और मशीन का मुकाबला कभी नहीं हो सकता। इंसान, इंसान है और मशीन, मशीन है। जैसे बैद महाराज, महाराज हैं और सनीचर फटीचर है..।’
रुप्पन बाबू के इस वाक्य को सनीचर ने प्रशंसा की तरह ग्रहण किया और उनके आगे रखे खाली प्याले को लबालब भर दिया। रुप्पन बाबू ने ‘थैंक्स’ की मुद्रा में एक घूँट भरते हुए कहा, ‘बात किसी चीज को जानने की नहीं, मानने की है। हम अपने सभी मूर्खतापूर्ण कामों को ही समझदारी बताने लगें तो हमसे कोई क्या खाकर आगे बढ़ जायेगा? आप कितने भी ज्ञानी हों, हम परम-मूर्ख को ही अपना परम-पिता मान लें तो आप क्या कर लेंगे? सच और समझदारी से ज्यादा बड़ी ताकत झूठ और नासमझी में होती है बशर्ते प्रचार तगड़ा हो। जो जितना ज्यादा प्रोपेगंडा कर सके, आज के जमाने में वही सही है। और इस काम में हमारी सहायता कौन करेगा? कोई अक्ल वाला इंसान तो नहीं करेगा। करेगा भी तो लालच में। नि:स्वार्थ सेवा तो हमें असल वालों से ही मिलेगी। इसीलिए हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जरूरत नहीं है, हम ओरिजिनल नॉनसेंस से अपना काम बेहतर ढंग से चला सकते हैं।’
‘ओरिजिनल नॉनसेंस से क्या यह मतलब निकाला जाये कि अर्टिफिशियल नॉनसेंस भी हो सकता है?’ खन्ना मास्टर ने पूछा।
‘हो सकता है पर इसकी जरूरत ही क्या है?’ रुप्पन बाबू ने कहा, ‘जब हमारे पास शुद्ध देसी घी है तो हमें वनस्पति तेल की क्यों खाना चाहिए? हम गांधी के चेले हैं और मशीन पर निर्भरता नहीं रखना चाहते। मास्टरजी! तुम्हें तो पता ही है कि हमारे छंगामल इंटर कॉलेज में साढ़े तीन सौ इस्टूडेंट हैं, जो किताबों में अपना समय बर्बाद नहीं करते। प्रिंसिपल साहब इन्हें व्हाट्सएप पर ज्ञान की सामग्री भेज देते हैं। इनका डेटा यही है। जब हमारे पास असली वाले हैं तो हमें मशीन की क्या जरूरत?’
‘अब एक मजे की बात सुनो’, रुप्पन बाबू ने अपना व्याख्यान जारी रखा, ‘आज मैं मशीन से बात कर रहा था। वो अपने आप को बड़ा सयाना समझता है तो मैंने भी सोचा कि जरा इसे गंजहों की भाषा समझाई जाये। मैंने उससे पूछा कि -तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर?’
‘उसने खटाक से कहा- तीन!’, रुप्पन बाबू बोले, ‘मगर-मैंने कहा कि बीच वाला तीतर भी बोल रहा है कि उसके आगे भी तीन हैं और पीछे भी तीन..यह कैसे हुआ?’
‘मशीन सोच में पड़ गयी। सारी अर्टिफिशियल इंटेलीजेंसी धरी रह गयी। आखिर में मुझसे ही पूछा कि अच्छा तुम्हीं बता दो।’
‘मैंने कहा, बीच वाला तीतर झूठ बोल रहा था। यह सुनते ही मशीन हैंग हो गई। हम अपने ओरिजिनल नॉनसेंस में थोड़ा-सा झूठ और बहुत सारी बेशर्मी मिला लें तो दुनिया की कोई ताकत हमारा मुकाबला नहीं कर सकती।’
इतना सुनते ही सनीचर ने मारे प्रसन्नता के भंग के सारे ग्लास भर दिये। इसके बाद की कार्रवाई का विवरण रिकॉर्ड से निकाल दिया गया है, क्योंकि वह गंजहों की मौलिक, मुहावरेदार, आत्मीय सम्बन्ध बनाने वाली भाषा से होते हुए सर्फरी बोली में पहुँच चुकी थी। शिक्षक होने के नाते खन्ना मास्टर वहाँ से खिसक चुके थे।
(303, राजुल एग्जॉटिका, कजरवाड़ा रोड, बिलहरी, जबलपुर -482020)
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(जबलपुर के लेखक दिनेश चौधरी पिछले कुछ वक्त से सामयिक संदर्भों, और मुद्दों को लेकर श्रीलाल शुक्ल के विख्यात व्यंग्य-उपन्यास ‘राग दरबारी’ के किरदारों को लेकर उसी तर्ज पर लिख रहे हैं। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़’को इन्हें छापने की इजाजत दी है। -संपादक)