इंटरव्यू

  • माजिद जहांगीर
    श्रीनगर से, 19 अगस्त । जम्मू-कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख और सांसद डॉक्टर फारूख अब्दुल्लाह ने बीबीसी के साथ कश्मीर के मौजूदा हालात, भारत और पाकिस्तान की सियासत और धारा 35ए पर बात की। पढि़ए उनसे की गई बातचीत के कुछ अहम अंश।
    डॉ. साहिब आजकल आप क्या कर रहे हैं?
    आपको मालूम है कि आजकल हालात बहुत नाजुक हैं। खासकर कश्मीर के अंदरूनी स्वराज पर हमला किया जा रहा है। हिंदुस्तान की एक खास जमात, जिसे आरएसएस कहते हैं, वो चाहती है कि कश्मीर का जो इलहाक है, जिन बुनियादों पर किया गया था, वह हटाया जाए।
    उनका हमला धारा 370 और धारा 35ए पर है, इनको खत्म करने का उन्होंने अज़्म किया है। ये आज नहीं पहले से ही है, मगर आज उनकी सरकार है केंद्र में, वो समझते हैं कि इसको इस्तेमाल करके वह ये करेंगे।
    कौन लोग हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका दाखिल की है?
    वो आरएसएस के लोग हैं। ये दिल्ली में एक संगठन है, जो ये कर रहा है। ये नहीं जानते हैं कि वो आग से खेल रहे हैं। जो कुछ भी वह कर रहे हैं, उससे उनकी बर्बादी होने वाली है।
    एकजमाने में आप बीजेपी के हिस्सा रहे थे?
    मैं कभी भी बीजेपी का हिस्सा नहीं रहा हूं।
    एनडीए का हिस्सा रहे हैं आप। कैसा तजुर्बा रहा आपका बीजेपी के साथ?
    उस समय अटल बिहारी वाजपेयी जी थे, वह बहुत मुख्तलिफ इंसान थे। वो जानते थे कि कश्मीर को अगर साथ रखना है तो सबको साथ लेकर चलना होगा। वो जानते थे कि कोई ऐसी चीज नहीं करनी है जिससे जम्मू-कश्मीर की जनता को ये लगे कि उनके ऊपर कोई हमला किया जा रहा है। इसलिए उन्होंने कभी भी धारा 370 का मामला नहीं उठाया, 35ए का मामला भी नहीं उठाया, बल्कि सिर्फ विकास की बात की। उन्होंने ये भी कोशिश की कि पाकिस्तान से बात हो सके। वो बस लेकर यहां से लाहौर गए और दोस्ती की कोशिश की।
    लेकिन कश्मीर का मसला फिर भी सुलझा नहीं है?
    बदकिस्मती से जब वो चुनाव हार गए तो वो जो एक मुहिम चली थी वो रुक गई। उनके बाद मनमोहन सिंह ने भी उस मुहिम को आगे चलाने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ उनकी जमात के लोगों ने भी उनका भरपूर साथ नहीं दिया कि वो उस मुहिम को आगे ले जा सकते।
    पाकिस्तान में भी एक मुसीबत आ गई थी कि जनरल मुशर्रफ को कोर्ट का सामना करना पड़ा। उसमें वो हार गए और जो एक आगे उठाया हुआ कदम था वो आगे नहीं बढ़ सका।
    भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में आपको कैसा लीडर नजर आ रहा है?
    वो हिंदुस्तान के लीडर हैं इसमें कोई शक नहीं। लोगों ने उन्हें बहुमत दिया है। हर लीडर के अंदर कमजोरियां भी होती हैं और अच्छाइयां भी। अब आप देखिए उन्होंने लाल किले से कहा कि कश्मीरियों को दिल से गले लगाइए, उनसे बोली से बात करिए गोली से नहीं, ये अच्छी बात है। मगर आगे इस पर अमल होगा या नहीं होगा ये बात देखने की है। तब हमें दिखेगा कि उनकी लीडरशिप में वह दम है।
    जिस तरह से आज हमारे वतन में फिरकापरस्ती का आलम बढ़ रहा है, वह गोरक्षा हो या दूसरी चीजें हो, जिसको हम देख रहे हैं। ये खतरे की घंटी है। अब उन्होंने बहुत जोर से इसके बारे में बोला है। अब हम देखेंगे कि क्या वो हिम्मत रखते हैं और ये कि क्या वो इस देश को बचा सकेंगे? 
    लेकिन कश्मीर के लोग कह रहे हैं कि आज तक ऐसे कई बयान सामने आए हैं।
    बिलकुल सही है। इसमें कोई दो राय नहीं है। इसीलिए लोगों के मन में शक है कि क्या ये सिर्फ सियासी बयानबाजी है या फिर वो इस पर अमल करना चाहते हैं। ये तो समय बताएगा।
    लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2017 को तिरंगा फहराते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर के मुद्दे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि न गाली से न गोली से, कश्मीर की समस्या सुलझेगी गले लगाने से।
    कश्मीर की जनता को ही क्या सारे हिंदुस्तान की जनता को भी पता लगेगा। हिंदुस्तान में 20-22 करोड़ मुसलमान भी रहते हैं, 
    सिख रहते हैं, बौद्ध रहते हैं, जैन और दूसरे धर्मों के लोग भी रहते हैं। क्या उनसे भी बराबरी का सलूक होगा?
    क्या ये वतन उस तरफ चलेगा, जिसके लिए इस वतन की लड़ाई लड़ी गई थी?
    पार्लियामेंट में अभी याद किया गया 70 साल पहले जब देश की आजादी की जंग हुई थी, वहां किसी मुसलमान का नाम आपने सुना? 
    ये भी याद रखें कि मुसलमान आगे-आगे उस लड़ाई में था जो हिंदुस्तान की आजादी के लिए थी। इस बात को मीडिया नजरअंदाज कर रहा है।
    भारत की मौजूदा लीडरशिप इसके लिए कितनी जिम्मेदार है?
    मैं समझता हूं सब जिम्मेदार हैं। उन्होंने कभी नाम नहीं लिया उनका। सतर साल हो गए, क्या उन्होंने इनमें से किसी का नाम लिया। उन्होंने कभी ये बोला कि मुसलमानों का योगदान क्या है?  अगर उन्होंने बोला होता तो आज देश की ये हालत नहीं होती। आपकी जमात पिछले साल छह महीनों तक चलने वाले प्रदर्शनों में मारे गए प्रदर्शनकारियों पर शोर मचा रही है,लेकिन 2010 में भी 120 प्रदर्शनकारी मारे गए, उस समय आपकी सरकार थी, आप लोगों ने क्या किया उस समय?
    क्या करते? किसने करवाया, उनसे पूछें?
    सरकार तो आपकी पार्टी की थी।
    मुझे बताएं क्या उससे पाकिस्तान बना था? तब्दीलियां आई थीं? क्या उससे यहां पाकिस्तान बन जाता और आजादी आ जाती?
    ये उन हुर्रियत के नेताओं से पूछिए जिन्होंने इन बच्चों को कुर्बान करवाया। क्या मिला?
    अब लोगों को पता चलेगा, इन नेताओं की जायदादें और पैसा कहां से आया, उसका इस्तेमाल कैसे हुआ। जम्मू-कश्मीर की ही नहीं पूरी दुनिया की आवाम को पता चलेगा कि इन्होंने वो पैसा कैसे इस्तेमाल किया।
    इतना ही नहीं, जब चार-ए-शरीफ जलाया गया सैयद अली शाह गिलानी ने उस समय तीन करोड़ का चंदा जमा किया था, मेरा सवाल है कि तीन करोड़ कहां गए?
    सरकार आपकी पार्टी की थी। इतने बच्चे मारे गए, आपके सभी सदस्यों ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया?
    वो इस्तीफा क्यों देते? वो मारें और हम इस्तीफा दें।
    किसी को तो सजा नहीं मिली जो उसमें शामिल थे?
    सजा मिलेगी इंशाल्लाह। कोई परवाह नहीं, यहां तो हजारों साल गुजर जाते हैं।
    आपके बारे में आमतौर पर कहा जाता हैकि आप जब सत्ता में होते हैं कि कुछ और बताते हैं और बाहर होते हैं तो कुछ और बताते हैं?
    ये आप पत्रकारों की मेहरबानी है। फारूख अब्दुल्लाह दिल्ली में भी वही बात करता है और कश्मीर में भी वही बात करता है। मैं इससे कभी हटा नहीं, और कभी नहीं कहा कि हम पाकिस्तान का हिस्सा हैं।
    आजकल तो आप पाकिस्तान से बातचीत करने की बात करते हैं। एक बार आपने पाकिस्तान पर बम गिराने की बात की थी। क्यों न गिराओ? मैं उनमें से नहीं हूँ जो कदम पीछे उठाएगा। मेरी माओं के साथ जुल्म हो, मेरा बहनों के साथ बलात्कार हो, तो मैं चुप रहूं? कश्मीरियों को क्या मिला? अफ्सपा और फौज। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो ये मुसीबतें ना होतीं।
    क्या कश्मीर के पत्थरबाजों को आम लोगों से माफी मिलनी चाहिए?
    देखिए, मैं जब मुख्यमंत्री था उस समय 70 बच्चे थे जिन पर चरमपंथ से जुड़े सख्त मामले थे। अगर आप जगमोहन की किताब पढ़ें तो उसमें उसका जिक्र है। उन्होंने मुझ पर इल्जाम लगाया था। वो कश्मीरी बच्चे हैं। अगर हम उनको मुख्यधारा में नहीं लाएंगे, तो कहां फेंकेंगे। इन बच्चों को छोड़ देना चाहिए। मैं यहां और केंद्र सरकार से भी यहीं कहूंगा कि इनको छोड़ देना चाहिए। जैसे उन्होंने (मोदी ने) खुद फरमाया है गोली से नहीं बोली से उसमें ये भी तो आ सकता है। इन कश्मीरियों को भी दिल से लगाना है। 
    बहुत दिनों से कश्मीर में कथित इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा के पैर पसारने की बातें हो रही हैं, इसको आप कैसे देखते हैं?
    ये केंद्र सरकार को डराने के लिए किया जा रहा है। मेरे समय में भी पाकिस्तान के झंडे खड़े किए जाते थे, क्या पाकिस्तान बन गया?
    अगर एक बेटा बंदूक उठाता हैतो एक माँ-बाप की क्या प्रतिक्रिया हो सकती है? अगर आपके बेटे के हाथ में बंदूक हो तो आप क्या करेंगे?
    माँ-बाप करेगा क्या? बेटे ने तो बगावत कर ली। बेटा बाप को कहता है चुप करो, अब मुझे ही कुछ करने दो। ये उसका नजरिया है।
    अगर आपकी पार्टी की सरकार आईतो आपकी पहली प्राथमिकता क्या होगी?
    पहली प्राथमिकता वही होगी कि केंद्र यहां कश्मीर में सबके साथ बातचीत करे, पाकिस्तान के साथ भी बात करे। कश्मीर का मसला धार्मिक मसला नहीं है। आजकल हमारे हिंदुस्तान के पत्रकार और आरएसएस ये बयान कर रहे हैं कि ये इस्लामी लड़ाई है। लेकिन ऐसा नहीं है, ये एक सियासी लड़ाई है। कश्मीर की समस्या हल होने के बाद यहां शांति होगी।
    अगर आप सरकार में आते हैं, तो क्या 2010 और 2016 में जो प्रदर्शनकारी सुरक्षाबलों की कारवाई में मारे गए, उनको सजा मिलेगी?
    अफ्स्पा किसने लाया? हमने तो अफ्स्पा लाया नहीं। अफ्स्पा तो इनको इजाजत देता है कि किसी भी घर में घुस सकते हैं, तलाशी कर सकते हैं, गोली मार सकते हैं।
    आजकल की दुनिया में इंसाफ का कानून है? अगर आप बेगुनाह को मारते हैं तो आपको मौत की सजा होनी चाहिए। हम इनके गुलाम नहीं हैं, हम हिस्सेदार हैं। इनके दिमाग से ये बात निकालिए।
    आप दिल्ली वालों की बात कर रहे हैं?
    और क्या? अगर वो समझते हैं की हम उनके गुलाम हैं तो वह खरीद सकते हैं गुलाम। यहां कई गुलाम खरीदे गए हैं, उनकी कमी नहीं है। (बीबीसी)

     

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  • 5000 दिन

    विशेष साक्षात्कार

    सुनील कुमार

    राज्य में तीसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में 14 अगस्त को 5 हजार दिन पूरा करने वाले डॉ. रमन सिंह से 'छत्तीसगढ़' ने उनके राजनीतिक जीवन से लेकर प्रदेश के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। उनका कहना है कि सामान्यत: अपने बारे में निर्णय तो अभी तक उन्होंने नहीं लिया, पूरी राजनीतिक यात्रा में जो भी दायित्व केंद्रीय नेतृत्व ने दिया, उन्हीं का निर्वहन उन्होंने किया है। उनका कहना है- चौथी बार के बारे में भी कभी नहीं कहूंगा कि मैं ही मुख्यमंत्री बनूंगा। मगर जब केंद्रीय नेतृत्व पूछेगा तो मैं जरूर जाहिर करूंगा कि छत्तीसगढ़़ मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। राज्य की जिम्मेदारी और काम जो मैंने आगे बढ़ाया है, उसको करने की प्राथमिकता आज भी है, और कल भी रहेगी।

     

    सवाल- 5000 दिन लगातार सरकार का मुखिया बने रहना दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र में बहुत कम होता है। आपके लिए यह क्या मायने रखता है? कैसा लग रहा है? 
    जवाब- 5 हजार दिन की यात्रा में जब पलटकर देखता हूं तो लगता है कि एक लंबा समय गुजर गया। लेकिन जनता का जो स्नेह, आशीर्वाद मिला और संगठन के लोगों का जो साथ मिला, तो लगता है कि यह समय जल्द बीत गया। जनता के आशीर्वाद के बदौलत इस लंबी यात्रा को आसानी के साथ पूरा करने में सफल रहा।


    सवाल- पहली बार आपको कब लगा था कि आप मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं? 
    जवाब- जब मैं दिल्ली से प्रदेश भाजपाध्यक्ष बनकर आया। विधानसभा के चुनाव में हम सबकी भागीदारी रही। चुनाव के नतीजे आने लगे, उस समय लोगों से बातचीत होती रहती थी, तब मुझे मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं किया गया था। छत्तीसगढ़ में किसी को मुख्यमंत्री के रूप प्रोजेक्ट नहीं करने का फैसला संगठन ने पहले ही ले लिया था। सबके मन में उत्सुकता थी कि पहले तो हमारी सरकार बने। जब जीतकर हमारे विधायक आए, चर्चा हुई, संगठन के वरिष्ठों से चर्चा हुई, राष्ट्रीय नेतृत्व से बात हुई, तब मुझे लगा कि मैं भी मुख्यमंत्री पद का एक संभावित प्रत्याशी हो सकता हूं।
    मुझे अपने नाम के लिए तब भी दावा करने जैसा नहीं करना पड़ा। मैंने पहले तय भी नहीं किया था। जब केंद्रीय मंत्री के रूप में इस्तीफा देकर आया, मुझे कई लोगों ने कहा कि ये शर्त होनी चाहिए कि आप यदि दिल्ली की सरकार में मंत्री पद छोड़ रहे हैं तो आपको भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करें या आपको मुख्यमंत्री बनाया जाए। मैंने दोनों बातों से सहमति व्यक्त नहीं की थी। मुझे लगा कि स्वाभाविक रूप से विधायकों के बीच से जो आएगा वही मुख्यमंत्री बनेगा। 
    एक अच्छी प्रक्रिया हुई और सबने मिलकर आम सहमति के साथ चुना। पहली बार से लेकर तीसरी बार तक कभी नौबत नहीं आई कि मुख्यमंत्री के लिए मतदान हो, संख्या गिनी जाए। करीब-करीब सौ फीसदी लोगों ने आम सहमति के साथ चुना।


    सवाल- पहले दिन आपने यह सोचा था कि यह सफर तीन कार्यकाल का होगा?
    जवाब- उस समय इस बात का बिल्कुल एहसास नहीं था। पांच साल का जो दायित्व मिला है, उसका बेहतर तरीके से क्रियान्वयन कर सकूं, यही एक लक्ष्य था।


    सवाल- आपने जब शुरुआत की, तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी, लेकिन उन दस से अधिक बरसों में भी आपने केंद्र के साथ बिना टकराहट के कैसे काम कर लिया? और क्या अब केंद्र में आपकी पार्टी की ही सरकार रहने से आपको अधिक सुविधा हो रही है?
    जवाब- मुझे लगता था कि मुख्यमंत्री के नाते मेरा दायित्व राज्य का है और मुझे अपनी बातों को केंद्र सरकार के सामने रखना चाहिए। कई मामलों में मतभेद भी हुआ करते थे, बहुत सारी बातों में सहमति भी बनती थी। लेकिन गंभीर टकराव की स्थिति नहीं आई। तब छत्तीसगढ़ ने बेहतर प्रदर्शन किया और उनके सारे मापदंडों में हम खरे उतरे। इसलिए यूपीए की सरकार में भी सर्वश्रेष्ठ राज्य का अवार्ड मिला। कृषि, उद्योग, सामाज समेत कई क्षेत्रों में पुरस्कृत किया गया।

    सवाल- अपने कार्यकाल में अब आपको सबसे अधिक तसल्ली किस काम से हुई है? किस योजना से या किस कामयाबी से? पीडीएस? नया रायपुर? रेल कॉरिडोर?
    जबाव- सबसे बड़ी तसल्ली, साठ लाख गरीब परिवारों के लिए दो वक्त के भोजन की व्यवस्था। मुख्यमंत्री खाद्यान्न योजना, जिसे देश की सबसे बड़ी, सबसे बेहतर और सफल योजना बनाने में हम सफल रहे।
    और जहां तक नई राजधानी का सवाल है, राजधानी का निर्माण आने वाले सौ बरसों की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है। हमने कम से कम 50 साल की कार्ययोजना बनाई है। मुझे लगता है कि एक बेहतर आकार में नई राजधानी का निर्माण हुआ। जिस प्रकार नया रायपुर विकसित हो रहा है, हम उम्मीद करते हैं कि आने वाली सदी में एक बेहतर राजधानी बनेगा। आज भी देश के लोग मानते हैं कि 21वीं सदी की यह बेहतरीन राजधानी है। अभी तो कुछ साल ही हुए हैं, जिस तरह से यह विकसित हो रही है, उस तरह की सोच किसी अन्य राज्य में देखने में नहीं आ रही है। हमने न केवल सोचा बल्कि अपनी सोच को साकार भी किया। निवेश आने लगे हैं। स्टेडियम बन गया, गॉर्डन, जंगल सफारी बना, सेक्रेटेरिएट आ गया, होटल, मॉल, व्यावसायिक कॉम्लेक्स, आवासीय परिसर तेजी से विकसित हो रहे हैं। हम एक ग्रीन कैपिटल के रूप में इसे विकसित कर रहे हैं।


    सवाल- इसके अलावा और किन बातों को आप इस मौके पर सफलता में गिनेंगे? छत्तीसगढ़ की आपकी कुछ योजनाओं को बाकी प्रदेशों में भी लागू किया गया है? जैसे पीडीएस, या हमर छत्तीसगढ़...
    जवाब- छोटा राज्य होने के बाद भी छत्तीसगढ़ ने देश में एक मॉडल विकसित किया है। हमने खुद की मेहनत से यह मॉडल तैयार किया। खाद्यान्न सुरक्षा कानून के रूप में हमने देश को एक बेहतर मॉडल दिया है। कौशल उन्नयन के लिए न केवल कानून बनाया वरन् क्रियान्वयन भी किया। सभी 27 जिलों में हमारे आजीविका कॉलेज काम कर रहे हैं। धान खरीदी में हमने जो सिस्टम तैयार कर क्रियान्वित किया है वह अपने आप में एक मॉडल है। आदिवासी इलाकों में विकास के लिए बस्तर और सरगुजा विकास प्राधिकरण का गठन ही नहीं किया वरन संभागस्तर पर उन इलाकों में बच्चों की शिक्षा के लिए उड़ान, प्रयास आदि योजनाओं का संचालन कर रहे हैं। दंतेवाड़ा में हमने एक एजुकेशन हब विकसित कर मॉडल बनाया है। जिन स्कूलों के भवन नक्सलियों द्वारा ध्वस्त कर दिए गए थे, उन स्कूलों को पोटाकेबिनों के माध्यम से फिर से शुरू कर शिक्षा-व्यवस्था को कमजोर नहीं पडऩे दिया गया। मुझे लगता है कि आदिवासी विकास के लिए छत्तीसगढ़ ने जो मॉडल विकसित किया है वह अपने आप में पूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी भी ने इसकी तारीफ की है। 


    सवाल- आप प्रदेश को कहाँ से शुरू करके कहाँ तक लेकर आये हैं? छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था आज भी खनिज आधारित ही है, गैरखनिज उद्योगों या कारोबार की कमाई उतनी क्यों नहीं बढ़ पाई? 
    जवाब- छत्तीसगढ़ की ताकत खनिज तो रही है। डीएमएफ (जिला खनिज फंड) आने के बाद हमें और शक्ति मिली है। लेकिन इसके अतिरिक्त जो संसाधन हैं वे भी मजबूत हैं, जो आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ को आर्थिक दृष्टि से और मजबूत करेंगे। उद्योग के क्षेत्र में हमने बेहतर नीतियां बनाई हैं। जीएसटी लगने के बाद सर्विस सेक्टर में बेहतर संभावना बनेगी। छत्तीसगढ़ आत्मनिर्भर राज्य के रूप में आगे बढ़ रहा है और अपने संसाधनों से राजस्व पैदा करने वाला छत्तीसगढ़ देश के एक नंबर के राज्यों में है। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार हिंदुस्तान में हम सामाजिक क्षेत्रों में सबसे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। 
    सवाल- छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या खबरों में हैं, क्या सरकार की किसान-कल्याण की योजनाओं में कोई कमी है?
    जवाब- यह कहा जाए कि किसान आत्महत्या का कारण उसकी किसानी, उसके उत्पादन से, उसके कर्ज से है, तो यह सही नहीं होगा। सारी रिपोर्टों के आधार पर कह सकता हूं कर्ज का ज्यादा असर नहीं हुआ है। सबसे ज्यादा आत्महत्या की प्रवृत्ति सम्पन्न जिलों में ही देखने को मिली है पलायन करने वाले जिलों से नहीं। इसका मतलब तो यह है कि हम बेहतर खेती कर रहे हैं, कर्ज भी ले रहे हैं। मगर ये नहीं कह सकते कि सबसे पिछड़े और सबसे ज्यादा पलायन करने वाला जो जिला है वहां आत्महत्या की दर बहुत कम है। 
    ये आत्महत्या पारिवारिक कलह से होती है बीमारी से होती है अन्य कई कारण भी जुड़ जाते हैं। छत्तीसगढ़ की नब्बे फीसदी जनता तो किसान है उसकी पहचान किसान के रूप में है और इसलिए मरने वाले की पहचान किसान के रूप में ही की जाती है, आत्महत्या का कारण जो भी रहा हो। 
    जो किसान लोन ले रहे हैं वे पटाते भी हैं। उनका कर्ज-भुगतान सबसे अच्छा है। छत्तीसगढ़ के लगभग 85 फीसदी किसान कर्ज पटाते हंै। जो कर्ज पटाते हैं वो जमीन भी लेते हैं। नए खेत लेते हैं, उसके बाद भी आत्महत्या कर रहे हैं। तो यह कारण नहीं है कि कर्ज की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं। बहुत ही कम किसान हंै जो इसके कारण आत्महत्या करते हैं। किसान आत्महत्या का मूल कारण अलग अध्ययन का विषय है कि किसके कारण यह प्रवृत्ति आती है। मुझे नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ का किसान कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। हम शून्य फीसदी ब्याज दर पर कर्ज दे रहे हैं। कर्ज की वजह से जो दबाब रहता है वह तो है नहीं छत्तीसगढ़ में। 


    सवाल- अब कार्यकाल का आखिरी बरस शुरू होने को है, ऐसे कौन से काम रहे जिनको ना कर पाने का आपको मलाल है, या रहेगा? 
    जवाब- काम के नाते कोई मुख्यमंत्री संतुष्ट तो हो सकता नहीं। पर हमने जो यात्रा 2003 से शुरू की और आज 2017 तक पहुंचे हैं, इस यात्रा में हमारा लक्ष्य था कि पूरे छत्तीसगढ़ में शांति हो, इससे कुछ कदम पीछे रह गए। लेकिन भविष्य में शतप्रतिशत सफलता बिल्कुल तय है, इसके लिए हम तैयार हैं।


    सवाल- हिंदुस्तान की राजनीति में ऐसा कम ही होता है कि किसी इतनी बड़ी पार्टी में तीन-तीन कार्यकाल बिना किसी घरेलू राजनीतिक चुनौती के निकल पाए, आपके सामने ऐसी चुनौती नहीं आई? या पार्टी ने आपका कोई बेहतर विकल्प नहीं पाया? 
    जवाब- देखिये, महात्वाकांक्षा सबके अंदर रहती है। जो भी राजनीतिक क्षेत्र में काम करते हैं उनके अंदर एक सोच और नेतृत्व करने की कल्पना रहती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में इस बात का मुझे सौभाग्य मिला कि सत्ता और संगठन में बेहतर तालमेल और केंद्रीय नेतृत्व ने जितना छत्तीसगढ़ को देखा, जो समझा और जो जवाबदारी दी, और जो बेहतर तालमेल बना रहा, उससे तीसरी बार भी नेतृत्व करने का अवसर मिला। इसे देखते हुए मैं कह सकता हूं कि हमारे संगठन की खूबी है कि वह ऐसे बड़े निर्णय ले सकता है।


    सवाल- तीन कार्यकाल के मुख्यमंत्री के बाद क्या? चौथे बार के मुख्यमंत्री? या केंद्र सरकार में कोई भूमिका? या फिर पार्टी में भूमिका? आपकी निजी पसंद क्या होगी?
    जबाव- सामान्यत: अपने बारे में निर्णय तो अभी तक मैंने नहीं लिया अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा में। केंद्रीय नेतृत्व से जो दायित्व मिला, उन्हीं का निर्वहन मैंने किया। चाहे केंद्र में मंत्री बनने की भूमिका रही हो या फिर प्रदेश अध्यक्ष बनने की भूमिका अथवा मुख्यमंत्री बनाने की भूमिका। चौथी बार के बारे में भी कभी नहीं कहूंगा कि मैं ही मुख्यमंत्री बनूंगा। मगर ये कहता हूं कि मुझसे जब केंद्रीय नेतृत्व पूछेगा तो मैं इच्छा जरूर जाहिर करूंगा कि छत्तीसगढ़़ मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। दिल्ली की राजनीति में बड़े-बड़े नेता बहुत हैं। राज्य की जिम्मेदारी और काम जो मैंने आगे बढ़ाया है, उसको करने की प्राथमिकता आज भी है, और कल भी रहेगी।


    सवाल- आप विधानसभा चुनावों के अलावा लोकसभा के चुनाव, पंचायत-म्युनिसिपल के चुनाव तीन-तीन बार जितवा चुके हैं, ऐसा कैसे हो पाया? और क्या इस कामयाबी को आगे निभा पाना मुश्किल नहीं होगा? 
    जबाव- हर चुनाव, नई चुनौती को लेकर आता है, नये मुद्दों को लेकर आता है। मुझे नहीं लगता कि पिछले चुनाव हों या इस चुनाव की तुलना हो, या फिर निकाय, पंचायत, समितियों के हो, विधानसभा के हों या फिर लोकसभा के चुनाव हों, इन सभी चुनावों की अपने अपने समय के अनुसार अपनी-अपनी आवश्यकताएं होती हैं। चौथी बार जब हम चुनाव मैदान में जा रहे हैं तब मैं यह कह सकता हूं कि छत्तीसगढ़ की जनता ने जो बात रखी थी जिस विश्वास को लेकर चुनाव के मैदान में रखा था, आज हम आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि चलिए यह काम हमने पूरा किया, हमने यह वादा किया था इसे पूरा किया, और आज एक विकसित छत्तीसगढ़ आपको दिया है। चौथी बार हम मजबूती के साथ दावा करेंगे कि केंद्र में नरेन्द्र मोदीजी की मजबूत सरकार है, छत्तीसगढ़ के लिए यह सुनहरा अवसर है। जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी तब तो छत्तीसगढ़ को हमने बेहतर किया और अब ये सुनहरा मौका हमारे सामने है कि हम और बेहतर छत्तीसगढ़ बना सकते हैं। चौथी बार भी भाजपा को अवसर मिलेगा तो छत्तीसगढ़ एक लंबी छलांग के लिए तैयार है। इस बार हम इस तैयारी के साथ इस चुनाव मैदान में जाएंगे। 


    सवाल- इस चुनाव में ऐसा कौन सा अकेला ऐसा मुद्दा रहेगा जिससे आप कह सकें कि आप हमें वोट दो?
    जबाव- इस बार सबसे बड़ा मुद्दा यही रहेगा कि मोदीजी के नेतृत्व में देश में जबरदस्त परिवर्तन हो रहा और इस परिवर्तन में हमारी छत्तीसगढ़ की भागीदारी कैसी हो? इसलिए हम न केवल लोकसभा की 11 की 11 सीटों की बात करते हैं बल्कि छत्तीसगढ़ में भी हमने लक्ष्य रखा है 65 प्लस। एक बड़े लक्ष्य को लेकर काम कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि दिल्ली के वातावरण का असर मिलेगा। पहले डॉ. रमन या फिर भाजपा अकेले लड़ते थे, दिल्ली में हमारी सरकार नहीं थी, अब एक और एक दो नहीं, ग्यारह की स्थिति बनेगी। इसलिए हम बेहतर और आरामदायक स्थिति में रहेंगे, इस चुनाव में।


    सवाल- राष्ट्रीय परिस्थितियों और मुद्दों को लेकर राज्य का चुनाव लडऩा, क्या आपको नहीं लगता है कि राज्य का कोई मजबूत मुद्दा आपके हाथ नहीं है जिसे लेकर वोट मांग सकें।
    जवाब- हमारा मुद्दा बहुत स्पष्ट है। विकास के मुद्दे पर ही हम चुनाव में जाएंगे। हमें 2003 में कैसा छत्तीसगढ़ मिला था और आज कैसा है? जब मुझे नेतृत्व करने का मौका मिला तो 16 जिले थे। आज छत्तीसगढ़ में 11 नए जिले बन गए, 27 जिले हो गए। नए विकासखंड बने, नई तहसीलें बन गईं। छत्तीसगढ़ को मजबूत बनाने के लिए हमने अलग-अलग हिसाब से नए संभागों का निर्माण किया। चारों संभागों में नए मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज हो गए, आईआईटी आ गया, आईआईएम, ट्रिपल आईटी, लॉ यूनिवर्सिटी, आ गए। आज 170 से ज्यादा आईटीआई खुल गए। एक बड़ा परिवर्तन आ गया। बीस हजार करोड़ की सड़कों का निर्माण अभी चल रहा है। बेहतर रोड कनेक्टिविटी हम दे रहे हैं। बेहतर जीवन देने के लिए सिस्टम विकसित किए हैं। कुल मिलाकर लोगों ने जिस विकसित छत्तीसगढ़ की कल्पना की थी उस कल्पना के विकास में हम आगे बढ़े हैं।


    सवाल- आप हर बरस महीने-डेढ़ महीने के जनसंपर्क अभियान पर प्रदेश के गांव-गांव तक पहुंचते हैं, क्या इससे आपको बाकी साल भर कामकाज सुधारने का मौका मिलता है?
    जवाब- लोक सुराज से पूरे सरकार की गतिविधियों का, सभी विभागों के क्रियान्वयन का एक प्रकार से निचोड़ सामने आता है। गांव की सच्चाई से सीधे साक्षात्कार होने का मौका मिलता है। तब हमको समझ में आता है कि हम रायपुर में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और क्रियान्वयन में कहीं गड़बड़ी है, चूक हो रही है तो उसे कैसे सुधारा जा सकता है। और यह आंख खोलने वाला रहता है। नई योजनाओं का जन्म भी ग्राम सुराज में हुआ, शहर सुराज, लोक सुराज म

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  • दीप्ति बथानी
    नई दिल्ली, 24 जुलाई। आईसीसी महिला क्रिकेट वल्र्ड कप 2017 के फाइनल मुकाबले तक पहुंची भारतीय टीम की कप्तान मिताली राज का सपना क्रिकेट नहीं कुछ और था।
    मिताली ने किस तरह क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा और किन मुश्किलों को झेलते हुए आज एक सफल कप्तान हैं, इन सब बातों पर बीबीसी से बात की मिताली के पिता दोराय राज और मां लीला राज ने।
    क्या बचपन से मिताली का रुझान क्रिकेट की तरफ था?
    मां- नहीं। उसका इंटरेस्ट डांस पर था। स्पोर्ट्स, क्रिकेट में बायचांस वह आ गईं।
    जब उन्होंने कहा कि वह क्रिकेट खेलना चाहती हैं तो आपका रिएक्शन क्या था?
    पिता- यह उनकी नहीं मेरी कोशिश थी। वह सुबह काफी देर से जागती थीं और आलसी भी थीं। उसे एक्टिव बनाने के लिए मैं बेटे के साथ उसे भी ग्राउंड पर ले जाने लगा।
    वहां कुछ समय बिताने के बाद मैं उन्हें प्लास्टिक बॉल और टेनिस बॉल फेंकने के लिए कहता। उस समय वहां कोच ज्योति प्रसाद थे। वो देखते थे कि लड़की बढिय़ा गेंद फेंकती है। ज्योति प्रसाद ने उन्हें एक हफ्ते के लिए ट्रायल पर रखा और रोज 10 मिनट बैटिंग के लिए देते थे।
    एक दिन उन्होंने कहा कि इस लड़की में टैलेंट है। आप इसे प्रॉपर क्रिकेट कैंप में भेजिए। मैंने पूछा लड़कियों के लिए प्रॉपर कैंप कहां है देश में। उसके स्कूल में संपत कुमार लड़कियों को क्रिकेट की कोचिंग देते थे। हमने उनसे बात की और फिर जो कुछ हुआ वो इतिहास है।
    मिताली बचपन में काफी आलसी थीं, क्या वो उससे बाहर आ चुकी हैं या उन्हें अब भी कड़ी मेहनत करनी पड़ती है?
    मां- मुझे लगता है वो अभी भी आलसी हैं। क्रिकेट ने उन्हें बदला है। पहले उनकी सोने की आदत से परेशान होकर हमने उन्हें क्रिकेट खेलने के लिए भेजा। लेकिन उनका जो आलसीपन था वही उसका प्लस प्वाइंट रहा है। वह अपनी नींद से समझौता नहीं कर सकती हैं। उन्हें आठ घंटे की नींद हर हाल में चाहिए।
    मिताली को हाल ही में मैच के बाद किताब पढ़ते देखा गया है। उनकी कोई और हॉबी है?
    पिता- मुझे लगता है कि किताबों के अलावा म्यूजिक उन्हें पसंद है। बीच में जब दो महीने का रेस्ट था, कोई मैच कोई सीरीज नहीं थी तो वह मेरे पास आईं और कहा कि उन्हें गिटार सीखना है। मैंने उनसे पूछा कि वह अब कैसे करेंगी? तो उन्होंने कहा कि बस आप गिटार टीचर ढूंढ़ो। मैं सीख लूंगी। उन्होंने महीने सीरियस होकर गिटार सीखा। जब क्रिकेट शुरू हो गया तो उन्होंने गिटार हो या कुछ और सब कुछ साइड कर दिया।
    उसके पहले करीब तीन साल पहले उन्होंने अपनी मम्मी से कहा कि उसे पेंटिंग सीखनी है। उसने तीन महीने तक पेंटिंग बनाना सीखा और कुछ अच्छी पेंटिंग उसकी हैं। हम उसकी हर चाहत पूरी करने की कोशिश करते हैं। उसके पास करीब 400-500 किताबें हैं। इनमें से ज्यादातर आत्मकथाएं हैं।
    आपने बताया कि शुरुआत में उन्हें क्रिकेट ट्रेनिंग दिलाने में भी मुश्किल थी। आपको क्या लगता है अभी कुछ बदला है?
    पिता- बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। सिर्फ क्रिक्रेट में ही नहीं सानिया मिर्जा, सिंधु, साइना नेहवाल...खासकर हैदराबाद में। ये सारी लड़कियां हैदराबाद से हैं। लोग पूछते भी हैं हैदराबाद ही क्यों, तो मैं कहता हूं कि यहां के पानी में कुछ ताकत है।
    अब बहुत सी लड़कियां हैं जो क्रिकेट खेल रही हैं। उनके पैरेंट्स भी इसमें सपोर्ट कर रहे हैं। अब चीजें बदल रही हैं। स्पोर्ट्स अब करियर बन चुका है। मैं देखता हूं अब ट्रेनिंग के लिए लड़कियां अलग-अलग कैंप में जा रही हैं।
    मिताली एकेडमिक करियर के बजाय स्पोर्ट्स में जाती हैं। एक मां के तौर पर आने वाले वर्षों में आप इसे किस तरह देखती हैं?
    मां- मुझे लगता है उन्हें सोचना चाहिए कि हम स्पोर्ट्स को करियर बना सकते हैं लेकिन एकेडमिक्स भी जरूरी है क्योंकि आपको वो आत्मविश्वास चाहिए। एजुकेशन के जरिए कई समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं। इससे आपमें आत्मविश्वास आता है। मिताली शायद अपने स्कूल से इकलौती लड़की है जो इंटरनेशनल स्पोर्ट्स में गईं है।
    आपका शुरुआती रिएक्शन क्या था जब आपने देखा कि भारतीय टीम फाइनल में पहुंच गई। मिताली से आपकी क्या बात हुई?
    मां- सच कहूं तो सबको लगता है कि हम क्रिकेट में बात करते होंगे लेकिन ऐसा नहीं है। मेरी उससे क्रिकेट पर कोई बात नहीं होती।
    पिता- मेरी बातचीत हुई उनसे क्रिकेट को लेकर। स्मृति जो प्लेयर है वह अच्छा परफॉर्म नहीं कर रही। मैंने उसे सुझाव दिया कि उसे थोड़ा नीचे रख सकते हैं। लेकिन ये मेरा सुझाव बस है।
    हम वहां के मौसम के बारे में बात करते हैं। पिच के बारे में बात करते हैं। वह हमें सब बताती हैं जितना हमें बताना चाहिए। बाकी कैप्टन और कोच का मामला होता है।
    क्या आप मिताली के खेलने से पहले कुछ सेंटीमेंटल रूटीन फॉलो करते हैं?
    पिता- मैच से पहले उससे बात करते हुए मैं सिर्फ आंखें बंद करके गणेश और साईं बाबा के बारे में सोचता हूं। मुझे लगता है कि ऐसे मैं उन्हें पॉजिटिव तरंगे पास करता हूं। हर मैच से पहले वह हमें फोन जरूर करती हैं। जब भी वह कहीं जाती हैं तो मैं उसे हमेशा छोडऩे जाता हूं और रिसीव करने भी जाता हूं।
    भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं, चाहे वह स्पोर्ट्स हो या साइंस हो। लेकिन एक सवाल है जो हर कोई जानना चाहता है- मिताली कब शादी कर रही हैं? आप इस पर कैसे रिएक्ट करते हैं?
    पापा- हमारे लिए ये कॉमन सवाल हो गया है। हमें अब इससे फर्क नहीं पड़ता। बहुत से लोग पूछते है तो मैं कहता हूं कि आप क्यों इतनी दिलचस्पी ले रहे हैं। यहां तक कि मेरी बहनें भी यही पूछती हैं, लेकिन हम किसी तरह का प्रेशर नहीं डालना चाहते हैं। जब होना होगा पूरी दुनिया को पता चलेगा।
    मिताली कहती है कि क्रिकेट मेरे लिए पहली प्राथमिकता है। शादी दूसरी। मुझे ऐसे आदमी से शादी नहीं करनी जो पूछने लगे कि क्रिकेट कब छोड़ रही हो। वो कहती है मुझे फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या कहते हैं।(बीबीसी)

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  • घुमक्कड़ जंक्शन

     अभनपुर निवासी ललित शर्मा सुपरिचित घुमक्कड़-ब्लॉगरों में से हैं। देश के हर कोनों की यात्राएं की हैं और अनुभवों को अपने ब्लॉग में लिखा है। घुमक्कड़ी के दौरान वे देश के कई दूसरे घुमक्कड़ों से मिले। इन घुमक्कड़ों से उनका साक्षात्कार -घुमक्कड़ जंक्शन- हम हर शनिवार और बुधवार को प्रकाशित कर रहे हैं                               -संपादक

    घुमक्कड़ जंक्शन पर आज मिलवाते हैं आपको ग्रेटर नोएडा निवासी घुमक्कड़ योगेन्द्र सारस्वत से, ये अपनी नौकरी के साथ घुमक्कड़ी  भी कर रहे हैं, इन्होंने अस्थमा जैसे रोग को धता बताते हुए घिया-विनायक एवं सतोपंथ-स्वर्गरोहणी जैसे कठिन ट्रेक भी किए।  
    0 आप अपनी शिक्षा दीक्षा, अपने बचपन का शहर एवं बचपन के जीवन के विषय में पाठकों को बताएं कि वह कैसा समय था?
    00 मेरी पैदाइश और बचपन की यादें उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के छोटे से गाँव सिकतरा सानी में है। किसान परिवार में छह भाई -बहनों के बीच हालाँकि अभाव रहा लेकिन प्यार और सदभाव के रहते कभी महसूस नहीं हुआ। इंटरमीडिएट तक की शिक्षा गाँव से करीब तीन किलोमीटर दूर एक विजयगढ़ नाम के कसबे में हुई। गाँव में हर घर से कोई न कोई इंजीनियर -या सरकारी नौकरी में कार्यरत है तो मेरे गाँव को पढ़ाकुओं का गाँव माना जाता था लेकिन अब व्यवस्था बदल रही है।
    0 वर्तमान में आप क्या करते हैं एवं परिवार में कौन -कौन हैं ?
    00 इंटरमीडिएट करने के बाद झाँसी के राजकीय पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजिनीरिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया और फिर इंडस्ट्री में नौकरी शुरू कर दी। पहली नौकरी प्रोजेक्ट इंजीनियर की थी लेकिन मैं, बचपन से अस्थमा का मरीज था, इस नौकरी में ज्यादा दिन नहीं चल पाया और बीमार रहने लगा।  इस बीच मैं जामिया मिलिया विश्वविद्यालय , दिल्ली से उच्च शिक्षा प्राप्त करता रहा और अब ग्रेटर नॉएडा के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में कार्यरत हूँ। गाँव में माँ-बाप, भाई भाभी बच्चे हैं और मैं वर्तमान में गाजियाबाद में पत्नी और दो बेटों के साथ रहता हूँ। 
    0 घूमने की रूचि आपके भीतर कहाँ से जाग्रत हुई?
    00 घुमक्कड़ी का शौक झाँसी से पॉलिटेक्निक डिप्लोमा करते हुए हुआ। हमारे हॉस्टल के सामने से ट्रेवल्स की बस निकलती थी शाम के समय। ये बस आगरा -ग्वालियर होते हुए जयपुर तक जाती थी और दूसरी तरफ खजुराहो, कानपुर , लखनऊ भी जाती थी। तो हॉस्टल का लगभग हर छात्र इनकी केबिन में बैठकर इन जगहों पर घूम ही आता था। तो  इस तरह झाँसी से जयपुर , खजुराहो , लखनऊ , ग्वालियर आदि जगहें घूम लीं और वहीं से शौक जागृत होने लगा घूमने का।
    0 किस तरह की घुमक्कड़ी आप पसंद करते हैं, ट्रैकिंग एवं रोमांचक खेल भी क्या सम्मिलित है ? कठिनाइयां भी बताएं ?
    00 घुमक्कड़ी को वर्गीकृत करना मेरे लिए बहुत मुश्किल होगा क्योंकि मैं हर तरह की घुमक्कड़ी पसंद करता हूँ। इतिहास समेटे किले भी आकर्षित करते हैं तो ऊँची ऊँची पर्वत चोटियां भी। हिन्दू धर्म की आस्था के प्रतीक मंदिर भी बहुत अच्छे लगते हैं तो घने जंगलों के बीच से ट्रेक करना भी अच्छा लगता है। लेकिन अगर अपनी पसंद की ही बात आ जाए तो मुझे ट्रैकिंग करना और पैसेंजर ट्रेन में यात्रा करना हमेशा अच्छा लगता है। ट्रैकिंग का उजला पहलु ये है कि आप उन जगहों को देख पाते हैं जिन्हें या तो लोगों ने देखा ही नहीं या फिर बहुत कम लोगों ने ही देखा है। आप ट्रैकिंग को प्रसव से जोड़ सकते हैं जो पीड़ा के बाद सुखद परिणाम देता है।  
    0 उस यात्रा के बारे में बताएं जहां आप पहली बार घूमने गए और क्या अनुभव रहा ?
    00 पहली यात्रा! खजुराहो की थी पॉलिटेक्निक के दोस्तों के साथ। अनुभव विचित्र रहा और अनुरोध करूँगा कि इस के आधार पर मेरी इमेज मत बना लीजियेगा। क्योंकि उस बात को 18 वर्ष होने को हैं और तब मैं 20 -22 साल का युवा हुआ करता था अब 40 साल का आदमी और दो बच्चों का पिता हूँ।  हुआ ये था कि जब हम सात लोग खजुराहो पहुंचे तो हमने होटल का एक ही रूम लिया और कुछ बैड पर सो गए , कुछ ने गद्दा खींचकर नीचे जमीन पर लगा लिया। हमने एक दिन का किराया दिया था। अगले दिन हम पूरा दिन घुमते रहे, रेने फॉल भी गए लेकिन शाम को जब लौट रहे थे तब एक आईडिया दिमाग में आ गया कि होटल का एक दिन का किराया कैसे बचाया जाय। तो हम सात में से चार लोग होटल में गए और तीन पीछे खिड़की के नीचे खड़े हो गए, हमने सारा सामान नीचे फेंक दिया खिड़की से। आराम से रिसेप्शन पर आये और चाभी देते हुए कहा -हम खाना खाने जा रहे हैं, हमारे साथ के लोग आएं तो उन्हें चाभी दे देना और वो साथी अब तक नहीं पहुंचे। हा...हा..हा !! मस्ती थी।
    0 घुमक्कड़ी के दौरान आप परिवार एवं अपने शौक के बीच किस तरह सामंजस्य बिठाते हैं?
    00 भगवान की कृपा से पैसे का लालची मैं नहीं रहा कभी। मेरा मन्त्र कुछ इस तरह का है – Enjoy each & Every moment of your life !! शाम छह बजे तक घर पहुँच जाता हूँ और शनिवार -रविवार भी घर होता हूँ। इस पूरे समय में बच्चों के साथ बच्चा बनकर मस्ती मारता हूँ। दूसरी बात कि अगर मैं कहीं ऐसी जगह घूमने जा रहा हों जो जगह बच्चों के मतलब की है और सुरक्षित है तो मैं पूरे परिवार के साथ ही यात्रा करता हूँ।
    0 आपकी अन्य रुचियों के साथ बताइये कि आपने ट्रेवल ब्लॉग लेखन कब और क्यों प्रारम्भ किया ?                         00 घूमना रुचियों में ऊपर ही आएगा तो इसके अलावा मुझे पढऩा हमेशा पसंद आता है। इतिहास, साहित्य, राजनीति कुछ भी। दूसरी पसंद -मुझे अलग अलग भाषाएं सीखना अच्छा लगता है और ये शायद बचपन से ही है। 8 वीं में उर्दू सीख ली थी, गाँव से करीब तीन किमी दूर एक मस्जिद में जाया करता था उर्दू सीखने के लिए ! हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी , उर्दू के अलावा जापानी और पश्तो (अफगानी) भाषा सीखी हुई है। हंगेरियन भाषा भी सीखी थी। 

    वरिष्ठ सहयोगी ने एक समाचार पत्र के ब्लॉग पोर्टल  से परिचय कराया तो वहां राजनीतिक -सामाजिक -साहित्य विषयों पर ब्लॉग लिखने लगा।  मेरे लिए ब्लॉग कोई कमाई का माध्यम नहीं है बल्कि मैं ये सोचता हूँ कि मेरे ब्लॉग से किसी को अपना यात्रा प्लान बनाने में सही जानकारी और रास्ते का दिशा निर्देश मिल सके। अच्छा लगता है जब कोई कहता है कि आपका ब्लॉग पढ़कर ही हम फलां जगह गए।

    0 घुमक्कड़ी ( देशाटन , तीर्थाटन , पर्यटन ) को जीवन के लिए आवश्यक क्यों माना जाता है ?
    00 देशाटन हिन्दू मतलब भारतीय संस्कृति का प्रारम्भ से ही एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। आप मुझसे बेहतर जानते हैं कि आदि शंकराचार्य जी ने देशाटन के माध्यम से ही धर्म को उसकी ऊंचाइयों पर पहुँचाया। घुमक्कड़ी आपको सिर्फ नई जगह ही नहीं दिखाती अपितु घुमक्कड़ी के माध्यम से आप बेहतर इंसान बनते हैं, इंसानी जरूरतों और उसके दु:ख सुख को समझने लगते हैं। अगर एक पंक्ति में कहूं तो घुमक्कड़ी आपको एक बेहतर और बढिय़ा सोच का इंसान बनाती है।

    0 आपकी सबसे रोमांचक यात्रा कौन सी थी, अभी तक कहाँ-कहाँ की यात्राएं कीं और उन यात्राओं से क्या सीखने को मिला ?
    00 ऐसे बहुत यात्राएं की हैं। अभी जून में ही नंदीकुंड-घीया विनायक पास पार किया लेकिन यादगार यात्रा सतोपंथ -स्वर्गरोहिणी की यात्रा मानता हूँ। उसका कारण ये है कि एक तो ये मेरी पहली ट्रैकिंग थी जीवन की और दूसरी बात धार्मिक पक्ष भी इसके साथ जुड़ा था। हम अपने आप को पांडवों के पथ पर आगे चलते हुए प्रसन्न और भाग्यशाली महसूस कर रहे थे। अब तक लगभग उत्तर -पूर्व के सभी राज्य, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश , उत्तराखंड , हिमाचल , जम्मू-कश्मीर, बिहार , झारखंड, राजस्थान आदि राज्यों में घूम चूका हूँ लेकिन दक्षिण की तरफ अभी जाना नहीं हो पाया। हर यात्रा से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है और आप नए नए लोगों से और नई नई संस्कृति से परिचय प्राप्त करते हैं।

    0 नये घुमक्कड़ों के लिए आपका क्या सन्देश है ?
    00 नए लोगों में जोश है, उत्साह है और बड़ी बात कि उनके अंदर घुमक्कड़ी के लिए कुछ भी कर गुजरने का जो जज्बा है , वो प्रभावित करता है। हालाँकि मैं भी अभी लर्निंग स्टेज में ही हूँ तो किसी को सलाह देने लायक नहीं समझता। लेकिन एक अनुरोध जरूर करूँगा, चाहे कितना भी घूमिये लेकिन कभी अपने आपको घमंडी मत बनाइये और प्रकृति को नुक्सान मत पहुंचाइये। आखिर सबसे पहले हम इंसान हैं और इंसानियत को सर्वोपरि रखिए।

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  • धमतरी निवासी ललित शर्मा सुपरिचित घुमक्कड़-ब्लॉगरों में से हैं। देश के हर कोनों की यात्राएं की हैं और अनुभवों को अपने ब्लॉग में लिखा है। घुमक्कड़ी के दौरान देश के कई घुमक्कड़ों से मिले। इन घुमक्कड़ों से उनका साक्षात्कार -घुमक्कड़ जंक्शन- हम हर शनिवार और बुधवार को प्रकाशित कर रहे हैं। - संपादक

    घुमक्कड़ जंक्शन पर आज मिलवाते हैं आपको मुंबई निवासी गृहणी अल्पा दगली से, अल्पा दगली ने अल्प समय में ही घुमक्कड़ी में वो कर दिखाया जो घरेलू महिलाएँ कम ही कर पाती है। इन्होंने घुमक्कड़ी में कठिन ट्रेक के साथ एडवेंचर खेलों में भी हाथ आजमाया है। आईए उनसे ही सुनते हैं उनकी कहानी-

    0 अल्पा जी अपने बचपन, शिक्षा दीक्षा के विषय में कुछ बताईए, आपका जन्म एवं शिक्षा कहाँ हुई, बचपन कहाँ बीता?
    00 गुजरात के पाटन शहर में मेरा जन्म हुआ परंतु उसके बाद मेरा बचपन मुंबई में ही बीता और पढ़ाई भी मुंबई में ही हुई। मध्यमवर्गी परम्परागत धार्मिक विचारों वाले बड़े परिवार में बचपन गुजरा। सभी भाई बहनों में बड़ी थी व पढऩे में होशियार थी तो बस पढ़ाई में ही 21 साल निकल गए, इस दौरान मैं बच्चों को जैन धर्म की शिक्षा भी देती थी। मैंने बीकॉम के बाद सीए की पढ़ाई 2002 में पूरी की और तुरंत ही नौकरी पर लग गई, क्योंकि शादी के लिए भी पैसे जुटाने थे। बचपन में न कभी कहीं घूमा, ना पिक्चर वगैरा देखी, परंतु बोरीवली नेशनल पार्क कभी-कभी जाती थी। उसके पहाड़ व जंगल देखना तथा पक्षियों की चहल-पहल देखना, सुनना बस यही जिंदगी थी तब तो।
    0  वर्तमान में आप क्या करती हैं एवं परिवार में कौन-कौन है?
    00 वर्तमान में गृहणी की भूमिका में हूँ, बारह वर्षीय बेटा है, पति, सास-ससुर, देवर-देवरानी हैं। मायके में माँ पिताजी, दो भाई-भाभी और बच्चे हैं। घर की जिम्मेदारी बढऩे के बाद कुछ साल पहले मैंने नौकरी छोड़ दी। तब तो नौकरी छोडऩे का काफी दुख होता था तभी परंतु अब लगता है कि बच्चे की परवरिश प्राथमिकता है और मेरे अंदर की माँ जीत गयी।
    0 इतनी घरेलू जद्दोजहद के बीच आपके भीतर घूमने की रुचि कैसे पैदा हुई?
    00  सच कहूँ तो घूमना मंैने कुछ साल पहले ही शुरु किया है। क्योंकि इससे पहले बच्चे एवं सास-ससुर की देख रेख के कारण समय नहीं निकाल पाती थी। बचपन से वन विहार में तो रुचि थी ही परन्तु चार साल पहले हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में रुचि बहुत बढ गई। यह मानिए कि जीवन में कुछ खालीपन सा था उसे भरने की कोशिश ने मुझे घुम्मकड़ बना दिया।
    0 पता चला कि आप घुमक्कड़ी के साथ-साथ एडवेंचर खेल एवं ट्रेकिंग भी करती हैं अचानक इनकी तरफ कैसे आकर्षित हुई?
     00 एक घुमक्कड़ के बतौर में मेरा मानना है कि प्रकृति व निसर्ग को करीब से उसके मूल रूप में देखना एवं जानना उसे महसूस करना ही असली घुमक्कड़ी है। ट्रैकिंग करना, जंगल ट्रेल जाना, कोस्टल ट्रेक करना, हिमालय में खुद को खो देना यह सब पसंद करती हूं। किसी एक परिधि में अपने आपको या अपनी घुमकड़ी को सीमित नहीं करती। साहसिक व रोमांचक खेलों में भी चार साल से रुचि जाग उठी। मुझे स्वयं को चैलेंज करना बहुत अच्छा लगता है।
    एक समय था जब कुछ लोगों ने मुझ पर मोटी एवं हैंडीकैप का लेबल लगाया था। तब मैंने उसे चुनौती के रुप में स्वीकार किया और मानो उसी लेबल को तोडऩे के चक्कर में मुझे घुमक्कड़ी का शौक लग गया। मैंने अभी तक साहसिक यात्राओं के अलावा Giant swing, Highest bungeejump, Rappelling 300ft, Tower jump (55th floor) Reverse bungeejump, Chadar trek (sub zero frozen river trek) किया।

    0 आपकी पहली यात्रा कौन सी और कहाँ की थी?
    00 मेरी पहली यात्रा तो वालपराई व परामबिकुलम जंगल की थी। जहाँ मैं अपने बेटे के साथ गयी थी। नेशनल स्पेलिंग बी एक्जाम दिलाने जब बेटे को अंगमली ले के गयी तो वहाँ घुम्मकड़ी भी कर ही ली। पहली बार जंगल पहाड़ में बेटे के साथ घूमी। इतना आत्मविश्वास बढ़ गया कि मानो लगा अब तो बस आसमान छू लूंगी।
    मेरी पहली हिमालय की यात्रा beas कुंड ट्रेक था। उसके बाद तो मैं उन हसीन वादियों के प्यार में ही पड़ गयी। मैने साल में एक बार हिमालय जाने का वादा अपने आप से किया है। मांसपेशियों की कमजोरी एवं घुटने दर्द तथा समान तलवा होने की वजह से काफी व्यायाम करना पड़ता है ट्रेक के पहले। परन्तु मुझे ट्रेकिंग और घूमना अच्छा लगता है, इसलिए यह सब कर लेती हूँ, इतनी तकलीफ एवं व्यायाम कुछ अधिक नहीं है प्रकृति का सामिप्य पाने के लिए।
    0 घुमक्कड़ी के दौरान आप परिवार एवं घुमक्कड़ी के बीच किस तरह तालमेल बैठाती हैं?
    00 परिवार व अपने घुमक्कड़ी के बीच बैलेंस करना काफी प्लानिंग व मेहनत मांगता है। बेटे की परीक्षा व स्कूल के हिसाब से दिन तय करने से लेकर उनके खाने पीने नाश्ता टिफिन इत्यादि काम मैनेज करना होता है। विशुद्ध जैन परिवार है इसलिए काफी कुछ बना के जाती हूँ ताकि उनको दिक्कत न हो। एक माँ हमेशा माँ रहती है तो बेटे की चिंता रहती है। उसके लिए ढेर सारी चि_ियाँ चिपकाती हूँ घर में, फ्रिज पे, अलमारी पे, दरवाजे पे। जाने के पहले व आने के बाद दो दिन तक सिर्फ कामवाली बाई बन जाती हूँ इस घुम्मकड़ी के लगाव में। सारे काम जिम्मेदारी के साथ करो वही असली घुम्मकड़ी है।
    0 घुमक्कड़ी के अतिरिक्त आपको और क्या शौक है?
    00 मुझे गाने गाने व फोटोग्राफी में बहुत रुचि है। कभी कभी समाज सेवा भी अच्छा लगती है। गरीब बच्चों में खुशी बाँट सकूँ या फिर सेक्स वर्कर्स के साथ दीवाली के दीप जला सकूँ तो वो अपने आप में मेरे लिए बड़ी खुशी है।
    0  इस हिसाब से तो आपकी सारी यात्राएँ ही रोमांचक होती हैं, क्या आप समझती है कि घुमक्कड़ी जीवन के लिए आवश्यक है?
    00 बिलकुल, घुमक्कड़ी जीवन के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह आपको आपके कम्फर्ट जोन से बाहर निकलती है। मुश्किलों से लडऩे का रास्ता बनाना, अपनी क्षमता को पहचानना, उसे बढ़ाना एवं अपने अहंकार को, ईगो को त्यागना सिखाती है।
    इतना बड़ा हिमालय आपको सीखा देता है कि आपकी मुश्किल बहुत छोटी है। आपके साथ बुरा करने वाले लोग भी बहोत छोटे है, उनको माफ कर दो। अपेक्षा के बगैर जीना भी सिखाती है।
    0  आपने अभी तक कहाँ-कहाँ की घुमक्कड़ी की और उससे क्या सीखने मिला?  
    00 वैसे तो हर यात्रा से कुछ न कुछ नया सीखने मिलता है। मेरे लिए मेरी सारी यात्रा रोमांचक है परंतु कुछ यात्रा आपसे शेयर करती हूँ- ऋषिकेश एडवेंचर ट्रिप, चादर ट्रेक, लेह, खारदुंगला पास (जनवरी में), सदन घाटी (महाराष्ट्र) याना राक्स (कर्णाटक), कुमता से गोकर्ण ट्रेक, मुरुदेश्वर और मीरजन फोर्ट (कर्णाटक), गन्दीकोट एवं बेलम गुफाएँ (आन्ध्र प्रदेश), दूध सागर जल प्रपात ट्रेक (गोवा), बीसकुंड ट्रेक मनाली, अगुम्बे रेन फारेस्ट कैम्प (कोबरा का घर) पाराम्बिकुलम टायगर रिजर्व, मुदुमलै टायगर रिजर्व, टाड़ोबा टायगर रिजर्व, कान्हा टायगर रिजर्व आदि।
    घुमक्कड़ी के दौरान यात्रा करते-करते जीवन जीने के तरीके के साथ-साथ प्लानिंग भी सीख जाते है। घुमक्कड़ी पूर्व तैयारी, समस्या निवारण एवं हमेशा सब जगह खुश रहना सिखाती है।
    0 नए घुमक्कड़ों, विशेषकर महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी?
    00 घुमक्कड़ी सिर्फ घूमना ही नहीं है, प्रकृति को जीना, लोगों एवं संस्कृति धरोहर को समझना, स्थान की सुंदरता के साथ वहाँ का भोजन, पहनावा, रीति-रिवाजों का अनुभव करना ही घुमक्कड़ी है। नए धुमकड़ दोस्तों से यही कहूंगी कि याद रखें,  आप जो सोचते हों वो जरूर कर पाते हों। महिलाओं से कहना चाहती हूँ कि अपनी खुशी पाना आपका हक है, बस अपने आराम के दायरे से कुछ कदम बाहर निकल के देखना है, सारी कायनात बाहें फैला के आप के लिए खड़ी है। डर के आगे जीत है। सिर्फ सपने मत देखो, उठो खड़े हो, निकल पड़ो व सपने जीना शुरू करो। मेरी शुभकामनाएं हैं। 

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