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वे कश्मीर में आग से खेल रहे हैं-फारूख अब्दुल्लाह




माजिद जहांगीर
श्रीनगर से, 19 अगस्त । जम्मू-कश्मीर के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख और सांसद डॉक्टर फारूख अब्दुल्लाह ने बीबीसी के साथ कश्मीर के मौजूदा हालात, भारत और पाकिस्तान की सियासत और धारा 35ए पर बात की। पढि़ए उनसे की गई बातचीत के कुछ अहम अंश।
डॉ. साहिब आजकल आप क्या कर रहे हैं?
आपको मालूम है कि आजकल हालात बहुत नाजुक हैं। खासकर कश्मीर के अंदरूनी स्वराज पर हमला किया जा रहा है। हिंदुस्तान की एक खास जमात, जिसे आरएसएस कहते हैं, वो चाहती है कि कश्मीर का जो इलहाक है, जिन बुनियादों पर किया गया था, वह हटाया जाए।
उनका हमला धारा 370 और धारा 35ए पर है, इनको खत्म करने का उन्होंने अज़्म किया है। ये आज नहीं पहले से ही है, मगर आज उनकी सरकार है केंद्र में, वो समझते हैं कि इसको इस्तेमाल करके वह ये करेंगे।
कौन लोग हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका दाखिल की है?
वो आरएसएस के लोग हैं। ये दिल्ली में एक संगठन है, जो ये कर रहा है। ये नहीं जानते हैं कि वो आग से खेल रहे हैं। जो कुछ भी वह कर रहे हैं, उससे उनकी बर्बादी होने वाली है।
एकजमाने में आप बीजेपी के हिस्सा रहे थे?
मैं कभी भी बीजेपी का हिस्सा नहीं रहा हूं।
एनडीए का हिस्सा रहे हैं आप। कैसा तजुर्बा रहा आपका बीजेपी के साथ?
उस समय अटल बिहारी वाजपेयी जी थे, वह बहुत मुख्तलिफ इंसान थे। वो जानते थे कि कश्मीर को अगर साथ रखना है तो सबको साथ लेकर चलना होगा। वो जानते थे कि कोई ऐसी चीज नहीं करनी है जिससे जम्मू-कश्मीर की जनता को ये लगे कि उनके ऊपर कोई हमला किया जा रहा है। इसलिए उन्होंने कभी भी धारा 370 का मामला नहीं उठाया, 35ए का मामला भी नहीं उठाया, बल्कि सिर्फ विकास की बात की। उन्होंने ये भी कोशिश की कि पाकिस्तान से बात हो सके। वो बस लेकर यहां से लाहौर गए और दोस्ती की कोशिश की।
लेकिन कश्मीर का मसला फिर भी सुलझा नहीं है?
बदकिस्मती से जब वो चुनाव हार गए तो वो जो एक मुहिम चली थी वो रुक गई। उनके बाद मनमोहन सिंह ने भी उस मुहिम को आगे चलाने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ उनकी जमात के लोगों ने भी उनका भरपूर साथ नहीं दिया कि वो उस मुहिम को आगे ले जा सकते।
पाकिस्तान में भी एक मुसीबत आ गई थी कि जनरल मुशर्रफ को कोर्ट का सामना करना पड़ा। उसमें वो हार गए और जो एक आगे उठाया हुआ कदम था वो आगे नहीं बढ़ सका।
भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में आपको कैसा लीडर नजर आ रहा है?
वो हिंदुस्तान के लीडर हैं इसमें कोई शक नहीं। लोगों ने उन्हें बहुमत दिया है। हर लीडर के अंदर कमजोरियां भी होती हैं और अच्छाइयां भी। अब आप देखिए उन्होंने लाल किले से कहा कि कश्मीरियों को दिल से गले लगाइए, उनसे बोली से बात करिए गोली से नहीं, ये अच्छी बात है। मगर आगे इस पर अमल होगा या नहीं होगा ये बात देखने की है। तब हमें दिखेगा कि उनकी लीडरशिप में वह दम है।
जिस तरह से आज हमारे वतन में फिरकापरस्ती का आलम बढ़ रहा है, वह गोरक्षा हो या दूसरी चीजें हो, जिसको हम देख रहे हैं। ये खतरे की घंटी है। अब उन्होंने बहुत जोर से इसके बारे में बोला है। अब हम देखेंगे कि क्या वो हिम्मत रखते हैं और ये कि क्या वो इस देश को बचा सकेंगे? 
लेकिन कश्मीर के लोग कह रहे हैं कि आज तक ऐसे कई बयान सामने आए हैं।
बिलकुल सही है। इसमें कोई दो राय नहीं है। इसीलिए लोगों के मन में शक है कि क्या ये सिर्फ सियासी बयानबाजी है या फिर वो इस पर अमल करना चाहते हैं। ये तो समय बताएगा।
लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2017 को तिरंगा फहराते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर के मुद्दे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि न गाली से न गोली से, कश्मीर की समस्या सुलझेगी गले लगाने से।
कश्मीर की जनता को ही क्या सारे हिंदुस्तान की जनता को भी पता लगेगा। हिंदुस्तान में 20-22 करोड़ मुसलमान भी रहते हैं, 
सिख रहते हैं, बौद्ध रहते हैं, जैन और दूसरे धर्मों के लोग भी रहते हैं। क्या उनसे भी बराबरी का सलूक होगा?
क्या ये वतन उस तरफ चलेगा, जिसके लिए इस वतन की लड़ाई लड़ी गई थी?
पार्लियामेंट में अभी याद किया गया 70 साल पहले जब देश की आजादी की जंग हुई थी, वहां किसी मुसलमान का नाम आपने सुना? 
ये भी याद रखें कि मुसलमान आगे-आगे उस लड़ाई में था जो हिंदुस्तान की आजादी के लिए थी। इस बात को मीडिया नजरअंदाज कर रहा है।
भारत की मौजूदा लीडरशिप इसके लिए कितनी जिम्मेदार है?
मैं समझता हूं सब जिम्मेदार हैं। उन्होंने कभी नाम नहीं लिया उनका। सतर साल हो गए, क्या उन्होंने इनमें से किसी का नाम लिया। उन्होंने कभी ये बोला कि मुसलमानों का योगदान क्या है?  अगर उन्होंने बोला होता तो आज देश की ये हालत नहीं होती। आपकी जमात पिछले साल छह महीनों तक चलने वाले प्रदर्शनों में मारे गए प्रदर्शनकारियों पर शोर मचा रही है,लेकिन 2010 में भी 120 प्रदर्शनकारी मारे गए, उस समय आपकी सरकार थी, आप लोगों ने क्या किया उस समय?
क्या करते? किसने करवाया, उनसे पूछें?
सरकार तो आपकी पार्टी की थी।
मुझे बताएं क्या उससे पाकिस्तान बना था? तब्दीलियां आई थीं? क्या उससे यहां पाकिस्तान बन जाता और आजादी आ जाती?
ये उन हुर्रियत के नेताओं से पूछिए जिन्होंने इन बच्चों को कुर्बान करवाया। क्या मिला?
अब लोगों को पता चलेगा, इन नेताओं की जायदादें और पैसा कहां से आया, उसका इस्तेमाल कैसे हुआ। जम्मू-कश्मीर की ही नहीं पूरी दुनिया की आवाम को पता चलेगा कि इन्होंने वो पैसा कैसे इस्तेमाल किया।
इतना ही नहीं, जब चार-ए-शरीफ जलाया गया सैयद अली शाह गिलानी ने उस समय तीन करोड़ का चंदा जमा किया था, मेरा सवाल है कि तीन करोड़ कहां गए?
सरकार आपकी पार्टी की थी। इतने बच्चे मारे गए, आपके सभी सदस्यों ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया?
वो इस्तीफा क्यों देते? वो मारें और हम इस्तीफा दें।
किसी को तो सजा नहीं मिली जो उसमें शामिल थे?
सजा मिलेगी इंशाल्लाह। कोई परवाह नहीं, यहां तो हजारों साल गुजर जाते हैं।
आपके बारे में आमतौर पर कहा जाता हैकि आप जब सत्ता में होते हैं कि कुछ और बताते हैं और बाहर होते हैं तो कुछ और बताते हैं?
ये आप पत्रकारों की मेहरबानी है। फारूख अब्दुल्लाह दिल्ली में भी वही बात करता है और कश्मीर में भी वही बात करता है। मैं इससे कभी हटा नहीं, और कभी नहीं कहा कि हम पाकिस्तान का हिस्सा हैं।
आजकल तो आप पाकिस्तान से बातचीत करने की बात करते हैं। एक बार आपने पाकिस्तान पर बम गिराने की बात की थी। क्यों न गिराओ? मैं उनमें से नहीं हूँ जो कदम पीछे उठाएगा। मेरी माओं के साथ जुल्म हो, मेरा बहनों के साथ बलात्कार हो, तो मैं चुप रहूं? कश्मीरियों को क्या मिला? अफ्सपा और फौज। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो ये मुसीबतें ना होतीं।
क्या कश्मीर के पत्थरबाजों को आम लोगों से माफी मिलनी चाहिए?
देखिए, मैं जब मुख्यमंत्री था उस समय 70 बच्चे थे जिन पर चरमपंथ से जुड़े सख्त मामले थे। अगर आप जगमोहन की किताब पढ़ें तो उसमें उसका जिक्र है। उन्होंने मुझ पर इल्जाम लगाया था। वो कश्मीरी बच्चे हैं। अगर हम उनको मुख्यधारा में नहीं लाएंगे, तो कहां फेंकेंगे। इन बच्चों को छोड़ देना चाहिए। मैं यहां और केंद्र सरकार से भी यहीं कहूंगा कि इनको छोड़ देना चाहिए। जैसे उन्होंने (मोदी ने) खुद फरमाया है गोली से नहीं बोली से उसमें ये भी तो आ सकता है। इन कश्मीरियों को भी दिल से लगाना है। 
बहुत दिनों से कश्मीर में कथित इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा के पैर पसारने की बातें हो रही हैं, इसको आप कैसे देखते हैं?
ये केंद्र सरकार को डराने के लिए किया जा रहा है। मेरे समय में भी पाकिस्तान के झंडे खड़े किए जाते थे, क्या पाकिस्तान बन गया?
अगर एक बेटा बंदूक उठाता हैतो एक माँ-बाप की क्या प्रतिक्रिया हो सकती है? अगर आपके बेटे के हाथ में बंदूक हो तो आप क्या करेंगे?
माँ-बाप करेगा क्या? बेटे ने तो बगावत कर ली। बेटा बाप को कहता है चुप करो, अब मुझे ही कुछ करने दो। ये उसका नजरिया है।
अगर आपकी पार्टी की सरकार आईतो आपकी पहली प्राथमिकता क्या होगी?
पहली प्राथमिकता वही होगी कि केंद्र यहां कश्मीर में सबके साथ बातचीत करे, पाकिस्तान के साथ भी बात करे। कश्मीर का मसला धार्मिक मसला नहीं है। आजकल हमारे हिंदुस्तान के पत्रकार और आरएसएस ये बयान कर रहे हैं कि ये इस्लामी लड़ाई है। लेकिन ऐसा नहीं है, ये एक सियासी लड़ाई है। कश्मीर की समस्या हल होने के बाद यहां शांति होगी।
अगर आप सरकार में आते हैं, तो क्या 2010 और 2016 में जो प्रदर्शनकारी सुरक्षाबलों की कारवाई में मारे गए, उनको सजा मिलेगी?
अफ्स्पा किसने लाया? हमने तो अफ्स्पा लाया नहीं। अफ्स्पा तो इनको इजाजत देता है कि किसी भी घर में घुस सकते हैं, तलाशी कर सकते हैं, गोली मार सकते हैं।
आजकल की दुनिया में इंसाफ का कानून है? अगर आप बेगुनाह को मारते हैं तो आपको मौत की सजा होनी चाहिए। हम इनके गुलाम नहीं हैं, हम हिस्सेदार हैं। इनके दिमाग से ये बात निकालिए।
आप दिल्ली वालों की बात कर रहे हैं?
और क्या? अगर वो समझते हैं की हम उनके गुलाम हैं तो वह खरीद सकते हैं गुलाम। यहां कई गुलाम खरीदे गए हैं, उनकी कमी नहीं है। (बीबीसी)

 




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