विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां : बदलते राज बदलती राजकाज की भाषा

Posted Date : 04-Dec-2017



बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

इतिहास पर गहरी दृष्टि डाले तो बस्तर की आम भाषा और राजकीय भाषा को अलग अलग कर के देखना होगा। इसके साथ ही यह रेखांकित करना भी आवश्यक है कि राजकीय भाषा ने आम भाषा-बोली पर और जन सामान्य की भाषा-बोलियों ने राजकीय भाषा पर अपनी गहरी छाप निरंतर छोड़ी है। बस्तर में नल शासन काल (600 ईसा पूर्व से 760 ई. तक) राजकार्यों तथा प्राप्त शिलालेखों में प्रयुक्त भाषा संस्कृत है जिसपर प्राकृत एवं स्थानीय प्रभाव भी दृष्टिगोचर होते हैं। डॉ. हीरालाल शुक्ल नें अपनी पुस्तक चक्रकोट के छिन्दक नाग में उल्लेख किया है कि उन्होंने नागयुगीन बस्तर (760 ई से 1324 ई तक) के कुल तैतीस अभिलेखों की खोज की है जिसमें से 16 अभिलेख तेलिगु में एवं 17 अभिलेख संस्कृत में हैं। डॉ. शुक्ल का मंतव्य है कि इन्द्रावती नदी एक स्पष्ट विभाज्य देखा है जिसके उत्तर का क्षेत्र संकर संस्कृत का तथा दक्षिण का अंचल संकर तेलुगु का रहा है। नागयुगीन राजा भाषा को ले कर स्पष्ट सोच रखते थे तथा समय समय पर उन्होंने एक भाषा नीति बनायी थी। 
नागयुगीन बस्तर की प्रथम राजभाषा (925-1062 ई.) तेलुगु थी चूंकि तब नाग दक्षिण से बस्तर आ कर स्थापित हुए थे एवं स्वयं का विस्तार करने के लिये अपनी भाषा को माध्यम बनाना उन्हें उचित लगा होगा। मधुरांतक देव (1062-1069 ई.) ने भाषानीति को बदल कर संस्कृत को राजभाषा घोषित किया। संभवत: इसका कारण सोमवंशी, कलचुरी, ओडिशा तथा चोल शासकों से सहसम्बन्ध बढ़ाना रहा होगा। इसके बाद तीसरी राजभाषा नीति का काल 1069-1218 के मध्य का है जहाँ तेलुगू एवं संस्कृत दोनों को ही राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। सोमेश्वर देव (1069-1111ई.) नें कुल नौ आज्ञा पत्र जारी किये जिनमें से पाँच संस्कृत में तथा चार तेलुगु में थे। इस अवधि के विषय में डॉ. शुक्ल लिखते हैं कि भाषा-बोलियों का सम्मिश्रण जनजातियों में इसी प्रकार नागयुग में होता रहा। आन्ध्र के प्रभाव वाले क्षेत्रों में तेलुगु नें माडिय़ा तथा धुर्वी के साथ मिल कर द्विभाषिकता की स्थिति को निर्मित किया तथा हलबाओं के संपर्क में ओडिया भाषा आई। अबूझमाडिय़ा कबीले तब शक्तिशाली थे तथा एकभाषीय बने रहे। कालांतर में द्विभाषी स्थिति तो यथावत बनी रही लेकिन एकलिपि (1218 -1224 ई.) का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। इस काल में संस्कृत तथा तेलुगु दोनों ही भाषाओं के अभिलेख नागरी लिपि में लिखे जाने लगे। शनै: शनै: तेलुगु भाषा की परम्परा समाप्त हो गयी तथा संकर संस्कृत (1224-1324 ई.) का विकास हुआ जिसमें स्थानीयता का तेजी से सम्मिश्रण भी होने लगा। एक ऐसी भाषा में संस्कृत बदलने लगी जिसके बहुत निकट आज की हलबी प्रतीत होती है। इस कारण को प्रमुखता से पकडऩा होगा कि क्यों हलबी सभी जनजातियों के बीच बोली जाती है जाहे वे गोंड हो या हलबा (हीरालाल शुक्ल, चित्रकोट के छिंदक नाग)।
यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि भूगोल का भाषा के प्रसार में कितना और कैसा महत्व होता है। चालुक्य शासन समय (1324 -1947) में राजकाज की भाषा ने तेलुगू और संस्कृत से आरम्भ करने के पश्चात हलबी जैसी जनभाषा को राजकीय भाषा का दर्जा दिया जो कि स्वंत्रता प्राप्ति तक कायम था। चालुक्यों ने राजकीय भाषा हलबी को घोषित करते हुए वस्तुत: शासन में आमजन की सहभागिता को सुनिश्चित किया था। विषय के अंत में यह जोडऩा चाहूंगा कि बस्तर की भाषा-बोलियाँ तेजी से विलुप्ति की कगार पर हैं अंत: यह आवश्यक है कि उनके संरक्षण की दिशा प्रशस्त की जा सके। 




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