विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां : बस्तरिया लोक-जीवन और नशा

Posted Date : 05-Dec-2017




बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

महुआ, शराब और नशा बस्तर में लगभग हर आदिवासीघर की कहानी है। निश्चित ही नशा आदिवासी जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना हुआ है किंतु यह उनका प्रसंशनीय पक्ष नहीं है। बस्तरिया लोकजीवन में जो प्रचलित नशा है उनको प्राप्त करने अथवा तैयार करने की विधियां भी रुचिकर हैं। सर्वप्रथम लांदा बनाने की विधि जान लें। चावल को धो कर पीस लिया जाता है। जरूरत समझी गयी तो चावल के साथ कोसरा और मडिय़ा को भी मिला कर तथा पीस कर इसे तैयार किया जाता है। एक बड़े से घड़े में जिसमे नीचे पानी खौल रहा होता है तथा उसके उपर छिद्रों वाली जाली रखी होती है, इसमें मिश्रण को रख दिया जाता है। अब भांप सारी प्रक्रिया को अंजाम देता है जिसमे इसे सेंक कर उतार लिया जायेगा। फिर अंकुरित जोंदरा के पावडर से मिला कर इसमे थोड़ा पानी डाल कर छ: सात दिनों के लिये रख दिया जायेगा। घड़े में अब खमीर उठने लगेगी। यह लांदा बनने की प्रक्रिया का अंतिम चरण है। लांदा का नशा एकदम से नहीं चढ़ता कितु एक बार चढ़ जाये तो आदिवासी लम्बे समय तक इसके सुरूर के आनंद में झूमते रहते हैं। इसी तरह सुराम बनाने के लिये मुख्य आवश्यकता है महुवे की। महुवे को धो कर देर शाम तक उबाला जाता है तथा फिर उसे उतार कर ढ़क लिया जाता है। अब इसे छान कर दूसरी हांडी में डाल दिया जायेगा। इसमें कुछ लोग आम की फांक का भी कभी कभी प्रयोग करते हैं। जितनी देरी से इसका सेवन होगा उतना ही अधिक नशा सिर पर चढ़ेगा। मंद बनाने के लिये महुआ को पानी में डाल कर किसी हांडी में तीन चार दिनों के लिये रख दिया जाता है। अब यहां अपने घरेलू यंत्र में भाप के योगदान से आगे की प्रक्रिया कीजाती है। इस सम्मिश्रण को हल्की आंच दी जाती है तथा इससे निकलने वाली भाप को बर्तन में उपर उठते ही ठंडा कर दूसरे बर्तन में बूंद बूंद एकत्रित कर लिया जाता है। भाप से ठंडा हो कर एकत्रित हुआ तरल पदार्थ ही मंद कहा जाता है।
सल्फी और ताड़ी की चर्चा के बिना लोकजीवन मे नशे पर चर्चा अधूरी रहेगी। क्षेत्रवार यदि सल्फी के पेड़ की तलाश की जाये तो इसका वितरण उत्तर तथा मध्य बस्तर में अधिक हैं जबकि दक्षिण बस्तर में ये कम पाये जाते हैं। दक्षिण बस्तर में ताड़ के वृक्ष ज्यादा हैं और वहाँ के लोग सल्फी की अपेक्षा ताड़ी पीने के अधिक आदी हैं। यह भी जोडऩा होगा कि यद्यपि ताड़ी का वृक्ष सल्फी के वंश का ही है; तथापि ताड़ी सल्फी से कहीं अधिक मादक होती है। सल्फी का पेड़ गोंडी में गोरगा मर्रा कहलाता है। सल्फी का रस निकालने के लिये पेड़ के अग्रभाग को जिसे 'कलीÓ कहते हैं को काट दिया जाता है। रस को एकत्रित करने के लिये रस्सी के सहारे नीचे एक घड़ा बांध दिया जाता है जिसमे कली से बूंद बूंद टपक कर रस संग्रहित होता रहता है। सल्फी का रंग दूध की तरह सफेद होता है, थोड़ा पतला भी जैसे किसी ने दूध में पानी मिला दिया हो। पीने पर सल्फी थोड़ा खट्टापन लिये हुए मीठी सी होती है। लगभग इसी प्रक्रिया से ताड़ी भी प्राप्त की जाती है अर्थात ताड़ के पेड़ से निकाले गये दूध से बनी मदिरा को ताड़ी कहते हैं। ताजी सल्फी अथवा ताड़ी में नशा नहीं होता और यह सुबह सुबह एक ऊर्जा दायक पेय के रूप में पी जाती है। जैसे जैसे दिन चढ़ता है तथा रस में फरमंटेशन की प्रक्रिया जोर पकडऩे लगती है, रस कडुवा होने लगता है साथ ही अधिक नशीला भी। नशा किसी भी समाज की अवनति का कारक है, एक सीमा से अधिक इसका प्रयोग सर्वथानुकसानदेय होता है। परम्परा बन चुकी आदतें कानूनों के मथ्थे मार कर नहीं छुड़वायी जा सकती वह भी तब जब इसकी आवश्यकता आदमी को ही नहीं उनके बेजुबान देवी-देवताओं को भी रोज ही पड़ती हो? आदिवासी समाज में नशा अवमुक्ति किसी कानून से नहीं अपितु समाज की समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भरे किसी अभियान से ही संभव है। 

 

 

 




Related Post

Comments