सामान्य ज्ञान

भारतीय सिविल सेवा अधिनियम, 1861


भारतीय सिविल सेवा  अधिनियम 1861 द्वारा कुछ पद अनुबद्ध सिविल सेवकों के लिए आरक्षित कर दिए गए किंतु यह व्यवस्था की गई कि प्रशासनिक सेवाओं में भर्ती के लिए अंग्रेजी माध्यम से एक प्रवेश परीक्षा इंग्लैण्ड में आयोजित की जाएगी, जिसमें ग्रीक एवं लैटिन इत्यादि भाषाओं के विषय होगे। प्रारंभ में इस परीक्षा के लिए आयु 23 वर्ष थी। उसके बाद यह 23 वर्ष से, 22 वर्ष (1860 में), फिर 21 वर्ष (1866 में) और  अंत में घटाकर 19 वर्ष (1878) में कर दी गई।
वर्ष 1863 में, सत्येंद्र नाथ टैगोर ने इंडियन सिविल सर्विस में सफलता पाने वाले प्रथम भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया। 1878-79 में, लार्ड लिटन ने वैधानिक सिविल सेवा  की योजना प्रस्तुत की। इस योजना के अनुसार, प्रशासन के 1/6 अनुबद्ध पद उच्च कुल के भारतीयों से भरे जाने थे। नियम बनाया गया कि इन पदों के लिए प्रांतीय सरकारें सिफारिश करेंगी तथा वायसराय एवं भारत-सचिव की अनुमति के पश्चात उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी जाएगी। इनकी पदवी और वेतन संश्रावित सेवा से कम होता था। लेकिन यह वैधानिक सिविल सेवा असफल हो गई तथा 8 वर्ष पश्चात इसे समाप्त कर दिया गया। 1885 में अपनी स्थापना के पश्चात कांग्रेस ने मांग की कि-   इन सेवाओं में प्रवेश के लिए आयु में वृद्धि की जाए। तथा  इन परीक्षाओं का आयोजन क्रमश: ब्रिटेन एवं भारत दोनों स्थानों में किया जाए। लोक सेवाओं पर एचिसन कमेटी, 1886 का गठन डफरिन ने 1886 में किया। इस समिति ने निम्न सिफारिशें की-    इन सेवाओं में अनुबद्ध   एवं अ-अनुबद्ध  शब्दों को समाप्त किया जाए।
  सिविल सेवाओं को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाए, सिविल सेवा: इसके लिए प्रवेश परीक्षाएं इंग्लैण्ड में आयोजित की जाएं।   
 प्रांतीय सिविल सेवा: इसके लिए प्रवेश परीक्षाएं भारत में आयोजित की जाए।  अधीनस्थ सिविल सेवा: इसके लिये भी प्रवेश परीक्षाएं भारत में आयोजित की जाए।  सिविल सेवाओं में आयु सीमा को बढ़ाकर 23 वर्ष कर दिया जाए।  1893 में, इंग्लैण्ड के हाऊस आफ कामन्स में यह प्रस्ताव पारित किया गया की इन सेवाओं के लिए प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन अब क्रमश: इंग्लैंड एवं भारत दोनों स्थानों में किया जाएगा। किंतु इस प्रस्ताव को कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। भारत सचिव किम्बरले ने कहा कि  सिविल सेवाओं में पर्याप्त संख्या में यूरोपीयों का होना आवश्यक है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसे त्यागा नहीं जा सकता ।

 


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