विचार/लेख
भ्रष्टाचार से लड़ने में जिन अमेरिका, स्वीडन जैसे देशों की कभी मिसाल दी जाती थी, अब वहां भी इसमें गिरावट देखी जा रही है. करप्शन परसेप्शन इंडेक्स के अनुसार, कमजोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण इन देशों में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है.
डॉयचे वैले पर निक मार्टिन की रिपोर्ट –
अमेरिका और स्वीडन जैसे देश जो कभी भ्रष्टाचार से लड़ने में आदर्श माने जाते थे. अब इस रवैये में गिरावट झेल रहे हैं. करप्शन परसेप्शन इंडेक्स के अनुसार, कमजोर राजनीतिक नेतृत्व के कारण इन देशों में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है.
दुनिया के बड़े-बड़े लोकतंत्रिक देश भी धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के सामने घुटने तक रहे हैं. पिछले मंगलवार को जारी हुए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 2025 करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) में पश्चिमी देशों में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए नेतृत्व की कमी सामने आई है.
सीपीआई की 31वीं रिपोर्ट में 180 से ज्यादा देशों और क्षेत्रों को पब्लिक सेक्टर में भ्रष्टाचार के आधार पर रैंक किया गया है. रिपोर्ट में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और स्वीडन जैसे देशों के स्कोर में गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, यह देश पहले मजबूत प्रदर्शन करने वाले देशों में से थे.
2025 करप्शन इंडेक्स में पश्चिमी देशों की गिरावट
2025 इंडेक्स के अनुसार, 80 से ज्यादा स्कोर पाने वाले देशों की संख्या पिछले 10 सालों में 12 से घटकर सिर्फ पांच रह गए हैं. इन देशों को पहले अच्छी शासन व्यवस्था का मानक माना जाता था.
इस इंडेक्स में डेनमार्क ने लगातार आठवीं बार सबसे ज्यादा 89 अंक हासिल किए हैं. उसके बाद फिनलैंड (88) और सिंगापुर (84) रहे. साथ ही, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने दुनिया भर में "मजबूत राजनीतिक नेतृत्व” की कमी की आलोचना की, जो कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर कर रहा है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के प्रमुख फ्रांसुआ वैलेरियन ने डीडब्ल्यू से कहा, "कई सरकारें अब भ्रष्टाचार से लड़ना अपनी प्राथमिकता नहीं मानती हैं. सरकारों को शायद यह लगने लगा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए काफी कुछ कर लिया है और अब उन्हें अन्य जरूरी चीजों पर ध्यान देना चाहिए.”
अमेरिका का भ्रष्टाचार स्कोर इतना क्यों गिर रहा है?
करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) हर देश को 0 से 100 के पैमाने पर रैंक करता है. जिसके अनुसार 0 का मतलब बहुत ज्यादा भ्रष्टाचार और 100 का मतलब साफ छवि वाला देश है. इस पैमाने के अनुसार अमेरिका का स्कोर गिरकर 64 पर पहुंच गया है, जो कि अब तक का उनका सबसे कम स्कोर है. साल 2016 के मुकाबले देखे तो यह तब से दस अंक नीचे गिर चुका है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने साझा किया कि अमेरिका का राजनीतिक माहौल पिछले एक दशक से तेजी से बिगड़ा है. संस्था के अनुसार हालिया आंकड़े पूरी तरह उस बदलाव को नहीं दिखाते, जो पिछले साल डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद हुए हैं.
हालांकि, बाइडेन सरकार के दौरान अमेरिका की रैंकिंग काफी हद तक स्थिर रही थी. लेकिन रिपोर्ट में पिछले साल अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से जुड़े बड़े नैतिक घोटालों को स्कोर गिरने की बड़ी वजह बताया गया.
वैलेरियन ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम हर चीज के लिए ट्रंप को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि कुछ चिंताजनक चीजें उनके आने से पहले ही शुरू हो चुके थे.”
इसके अलावा, रिपोर्ट ने अमेरिका में इन खतरनाक प्रवृत्तियों का भी जिक्र किया. जैसे "सरकारी पद का इस्तेमाल स्वतंत्र आवाजों को दबाने के लिए करना, स्वार्थ और लेन-देन वाली राजनीति को सामान्य बनाना, प्रॉसिक्यूशन फैसलों का राजनीतिकरण करना और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने वाले कदम उठाना.” ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने कहा कि यह कदम "संकेत देते हैं कि भ्रष्टाचार स्वीकार्य बनता जा रहा है.”
डॉनल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिसके लिए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने चेतावनी दी है. जिसके तहत वॉइस ऑफ अमेरिका जैसे सरकारी प्रसारकों को खत्म किया गया और सरकारी एजेंसियों का राजनीतिक विरोधियों जैसे बाइडेन प्रशासन और अन्य शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया है. उन पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करने और फॉरेन कर्रप्ट प्रैक्टिसेज एक्ट (एफसीपीए) के सख्त पालन को कमजोर करने के आरोप भी लगे हैं. यह कानून अमेरिकी नागरिकों और कंपनियों को विदेशी अधिकारियों को रिश्वत देने से रोकने के लिए बनाया गया था.
डीडब्ल्यू को दिए एक इंटरव्यू में वैलेरियन ने ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने कार्यकारी आदेश के जरिए एफसीपीए में बदलाव करके उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के औजार में बदल दिया. उन्होंने ट्रंप के क्रिप्टोकरेंसी (जैसे बिटकॉइन) के समर्थन की भी आलोचना की है, जिसका इस्तेमाल अक्सर मनी लॉन्ड्रिंग में किया जाता है. इसके अलावा, उन्होंने अमीर विदेशियों के लिए तेजी से नागरिकता/वीजा देने की योजना की भी आलोचना की है. जिसे आलोचक अक्सर "ट्रंप गोल्ड कार्ड” कहते हैं. वैलेरियन ने कहा, "हमारे अंतरराष्ट्रीय अनुभव के अनुसार, ऐसे वीजा कार्यक्रम भ्रष्ट लोगों को आकर्षित करते हैं और अपराधियों को भी आकर्षित कर सकते हैं.”
यूरोप में क्यों कमजोर पड़ रहा भ्रष्टाचार विरोधी अभियान?
पिछले 10 सालों में पश्चिमी देशों में भ्रष्टाचार की धारणा सबसे ज्यादा ब्रिटेन में गिरी है. ब्रिटेन का स्कोर 11 अंक गिरकर 70 पर पहुंच गया है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार, इसकी वजह मंत्रियों, सांसदों और सरकारी अधिकारियों के लिए नैतिक नियमों को ठीक से लागू न कर पाना है.
रिपोर्ट में कोविड-19 के दौरान घोटालों का भी जिक्र किया गया है, जब सत्ता के करीबी लोगों को बिना पर्याप्त जांच के पीपीई (मास्क, मेडिकल सामान) सप्लाई करने के बड़े ठेके मिल गए थे.
इसके अलावा कई अन्य पश्चिमी देशों में भी गिरावट देखी गई है. जैसे न्यूजीलैंड 9 अंक गिरकर 81, स्वीडन 8 अंक गिरकर 80, कनाडा 7 अंक गिरकर 75 पर आ गए हैं. साथ ही, जर्मनी पिछले 10 साल में 4 अंक गिरकर 77 पर आ गया है. हालांकि, यह आंकड़ा पिछले साल से दो अंक बढ़ा है. इस इंडेक्स के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में फ्रांस का स्कोर चार अंक गिरकर 66 हो गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर हुई है और अधिकारियों तथा निजी कंपनियों के बीच मिलीभगत बढ़ी है.
हालांकि, रिपोर्ट ने पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति, निकोला सारकोजी की सजा को एक सकारात्मक कदम बताया. लेकिन सरकोजी को अवैध फंड लेने का दोषी ठहराया गया था, जिसमें लीबिया के पूर्व नेता मुआम्मर गद्दाफी से मिला पैसा भी शामिल था, जिसे राष्ट्रपति चुनाव के अभियान में इस्तेमाल किया गया था. वैलेरियन ने कहा, "कई यूरोपीय देश भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में आगे थे.” लेकिन अब यूरोपीय संघ ने अपने भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर कर दिया गया है. जिस कारण यूरोप की "भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ सकती है.”
कहां कमजोर पड़ रही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई?
रिपोर्ट के अनुसार, 2012 के बाद से 50 देशों की रैंकिंग में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. खास तौर पर तुर्की, हंगरी और निकारागुआ में भारी गिरावट आई है. जिसका कारण लोकतंत्र का कमजोर होना, संस्थाओं की कमजोरी, कानून का सही से लागू न होना, सत्ता के करीबी लोगों को फायदा देना और भ्रष्ट तरीके से लाभ कमाना है.
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने चेतावनी दी है कि भ्रष्टाचार अब संगठित अपराध (माफिया/ड्रग कार्टेल) को लैटिन अमेरिका की राजनीति में घुसने का मौका दे रहा है. यहां तक कि कोस्टा रिका और उरुग्वे, जिन्हें पहले क्षेत्र के सबसे मजबूत लोकतंत्र माना जाता था. वह अब कोलंबिया, मेक्सिको और ब्राजील जैसे देशों की तरह भ्रष्टाचार का सामना कर रहे हैं.
रिपोर्ट में कहा गया कि यह गिरावट "तेज, लंबे समय तक रहने वाली और जिसका पलटना बहुत मुश्किल हो” वाली होती हैं. चूंकि, भ्रष्टाचार राजनीति और प्रशासनिक सिस्टम में गहराई से जड़ जमा लेता है. वैलेरियन ने डीडब्ल्यू से कहा, "सत्ता जितनी ज्यादा कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित होती है, उतना ही सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है और जितनी ज्यादा सत्ता गोपनीय होती है, उसका दुरुपयोग करना उतना ही आसान हो जाता है.”
इस भ्रष्टाचार रिपोर्ट में जेफ्री एप्सटीन की हाल ही में जारी फाइल्स शामिल नहीं हैं, जो पिछले महीने ही सामने आई थी. इन फाइल्स में कई देशों के अधिकारियों पर गलत काम, भ्रष्टाचार या दोषी यौन अपराधी जेफ्री एप्सटीन से संदिग्ध संबंधों के आरोप लगे हैं.
साथ ही, संस्था ने यह भी चिंता जताई है कि कई देशों में सरकारें गैर-सरकारी संगठनों के काम में राजनीतिक हस्तक्षेप कर रही हैं, खासकर उन संगठनों के खिलाफ जो सरकार की आलोचना करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जॉर्जिया, इंडोनेशिया और पेरू में ऐसे संगठनों पर कार्रवाई और फंडिंग कटौती बढ़ी है.
कुछ देशों में तो अब स्वतंत्र पत्रकारों, नागरिक संगठनों और व्हिसलब्लोअर्स (भ्रष्टाचार उजागर करने वालों) के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना मुश्किल होता जा रहा है. साथ ही, रिपोर्ट में यूक्रेन की भ्रष्टाचार विरोधी कोशिशों की भी तारीफ की गई है. बेशक यह देश रूस के साथ युद्ध लड़ रहा है. लेकिन हाल में रक्षा क्षेत्र में सामने आए घोटाले ने उजागर किया है कि भ्रष्टाचार अभी भी एक समस्या है.
रिपोर्ट में कहा गया कि इन मामलों का सार्वजनिक रूप से सामने आना और अदालत में उजागर होना दिखाता है कि यूक्रेन का नया भ्रष्टाचार विरोधी सिस्टम सुचारू तरीके से काम कर रहा है. वैलेरियन ने कहा, "एक देश यानी यूक्रेन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का फैसला किया, जबकि रूस ने इसके उलट रास्ता चुना है.” उन्होंने बताया कि रूस ने भ्रष्टाचार रोकने और सजा देने वाले कई कानून खत्म कर दिए हैं. करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में रूस का स्कोर 22 है और वह नीचे के देशों में बना हुआ है. जबकि, यूक्रेन का स्कोर 36 है, जो पिछले 10 सालों में सात अंक बढ़ा है.
सबसे ज्यादा भ्रष्ट देशों की स्थिति कैसी है?
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, तानाशाही वाले देशों जैसे वेनेजुएला और अजरबैजान में भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा है, क्योंकि "वहां हर स्तर पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है.”
नए भ्रष्टाचार इंडेक्स में दुनिया के दो-तिहाई से ज्यादा देशों का स्कोर 50 से नीचे रहा है. इसका मतलब है कि "दुनिया के अधिकांश हिस्सों में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है.”
रिपोर्ट में कहा गया कि जिन देशों का स्कोर 25 से कम है. वह आमतौर पर युद्ध, हिंसा या सख्त दमनकारी शासन से प्रभावित हैं. इसमें 13 अंक के साथ लीबिया, यमन, इरिट्रिया देश हैं. साथ ही, सोमालिया और साउथ सूडान जैसे देश 9 अंक के साथ शामिल हैं.
हालांकि, रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक बातें भी कही गई हैं. कुछ देश जैसे अल्बानिया, अंगोला, द आइवरी कोस्ट, लाओस, सेनेगल, यूक्रेन और उज्बेकिस्तान ने अपनी रैंकिंग में सुधार किया है. इसके अलावा, उच्च अंक पाने वाले एस्टोनिया, दक्षिण कोरिया, भूटान और सेशेल्स जैसे देशों ने लंबे समय में अच्छा प्रदर्शन किया है.
असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले से ही बांग्लाभाषी मुसलमानों के खिलाफ मुहिम चलाते रहे हैं. लेकिन हाल ही में असम बीजेपी के सोशल मीडिया पर पोस्ट हुए एक वीडियो पर विवाद बढ़ने के बाद अब पुलिस ने शिकायत दर्ज की है.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट –
असम प्रदेश बीजेपी ने बीते सप्ताह अपने एक्स हैंडल से मुख्यमंत्री का एक वीडियो जारी किया था. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से बनाए गए उस वीडियो में उनको राइफल से मुस्लिम पहचान से जुड़े टोपी और दाढ़ी वाले लोगों पर बेहद करीब से निशाना साधते दिखाया गया था. उसमें 'विदेशी-मुक्त असम' और 'बांग्लादेशियों को कोई माफी नहीं' जैसे कैप्शन भी लगाए गए थे. वीडियो में मुख्यमंत्री के निशाने पर रहे लोगों में से एक चेहरा राज्य के कांग्रेस सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पुत्र गौरव गोगोई से मिलता-जुलता बताया जा रहा है.
लेकिन यह वीडियो सामने आते ही विवाद तेज हो गया. कांग्रेस ने इसे बेहद भड़काऊ और नरसंहार भड़काने का प्रयास बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. सीपीएम और सीपीआई ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है.
विवाद बढ़ने के बाद बीजेपी ने वीडियो को डिलीट करते हुए सफाई दी है कि समुचित जांच के बिना ही उसे अनधिकृत रूप से जारी किया गया था. प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने पत्रकारों से कहा, "बिना समुचित मंजूरी के अपरिपक्व तरीके से काम करने के लिए एक सह-संयोजक को हटा दिया गया है."
मुख्यमंत्री की सफाई: बांग्लादेश से अवैध रूप से आने वाले यानी मिया मुसलमानों के खिलाफ हैं, असमिया मुसलमानों के खिलाफ नहीं
दिलचस्प बात यह है कि बीते साल अगस्त में ही सैकिया ने पार्टी का सोशल मीडिया सेल के प्रबंधन के लिए चार लोगों को सह-संयोजक बनाया था. सैकिया डीडब्ल्यू से कहते हैं, "पार्टी असम में वाले अवैध अप्रवासी बांग्लादेशियों को लेकर चिंतित है. समाज में इनके खिलाफ आंदोलन जरूरी है. लेकिन पार्टी लेकिन पार्टी दुर्भावनापूर्ण तरीके से मुसलमानों को गोलियों से निशाना बनाने के विचार का समर्थन नहीं करती. संज्ञान में आते ही उस वीडियो को हटा दिया गया."
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ने भी अपनी सफाई में कहा है कि वो बांग्लादेश से अवैध रूप से राज्य में आने वाले यानी मिया मुसलमानों के खिलाफ हैं, असमिया मुसलमानों के खिलाफ नहीं. सरमा ने गुवाहाटी में पत्रकारों को बताया, "वीडियो के खिलाफ कांग्रेस की शिकायत पर दिसपुर थाने में एक मामला दर्ज किया गया है. बीजेपी के एक कार्यकर्ता ने भी ऐसी ही शिकायत दर्ज कराई है."
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यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि असम में 'मिया' शब्द का इस्तेमाल बांग्लाभाषी मुसलमानों के लिए किया जाता है. मिया को अपमानजनक माना जाता है. उन पर अवैध रूप से बांग्लादेश से आकर राज्य में बसने के आरोप लगाए जाते रहे हैं.
सीएम बिस्वा सरमा के सोशल मीडिया पोस्ट पर पहले भी हुए हैं विवाद
असम में प्रदेश बीजेपी के एक्स हैंडल से पोस्ट कंटेंट पर विवाद का यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले बीते साल सितंबर में एआई से बना एक और वीडियो पोस्ट किया गया था जिसका शीर्षक था बीजेपी के बिना असम. उसमें मुसलमान समुदाय के लोगों को पारंपरिक पोशाक और महिलाओं को बुर्के में राज्य के विभिन्न इलाकों में दिखाया गया था. वीडियो में ऐसे कुछ लोग सीमा पर लगी कंटीले तारों की बाड़ के करीब से गुजरते नजर आते हैं. उसी समय वीडियो पर कैप्शन लिखा आता है अवैध अप्रवासी. उसका मकसद यह दिखाना था कि बीजेपी के सत्ता में नहीं रहने की स्थिति में असम पर घुसपैठियों का कब्जा हो जाएगा. करीब एक महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के आधार पर असम बीजेपी और एक्स से उस वीडियो को हटाने का निर्देश दिया था.
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मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मुख्यमंत्री हिमंता सरमा के विवादास्पद बयानों का सिलसिला काफी लंबा है. वोमा इससे पहले मुस्लिम समुदाय पर बाढ़ जिहाद और खाद जिहाद के आरोप भी लगा चुके हैं. उसके बाद राज्य में मतदाता सूची का विशेष संशोधन शुरू होने पर उन्होंने दावा किया था कि सूची से चार से पांच लाख मिया वोटरों के नाम कट जाएंगे. हालांकि अंतिम सूची में 2.4 लाख नाम ही कटे हैं. उन्होंने लोगों से मिया समुदाय को परेशान करने की अपील करते हुए कहा था कि परेशान होने पर ही वो असम छोड़ कर बाहर जाएंगे. मुख्यमंत्री ने इसी साल 28 जनवरी को कहा था, मिया समुदाय का रिक्शावाला अगर पांच रुपए किराया मांगे तो उसे चार रुपए ही देना चाहिए.
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य की आबादी में 34.22 फीसदी मुसलमान थे. मोटे अनुमान के मुताबिक, अब यह बढ़कर करीब 40 फीसदी तक पहुंच गई है. राज्य के 11 जिले मुस्लिम बहुल हैं. इनमें सबसे ज्यादा करीब 95 फीसदी मुस्लिम आबादी साउथ सालमारा जिले में रहती है. बांग्लादेश की सीमा से सटे इस इलाके को धुबड़ी जिले से काटकर अलग जिला बनाया गया था. इसके बाद क्रमशः धुबड़ी (79.67 फीसदी) और बरपेटा (70.74 फीसदी) का स्थान है. इन जिलों में बीते दो साल से बड़े पैमाने पर चलाया गया अतिक्रमण अभियान भी सुर्खियों में रहा है. इसके निशाने पर भी बांग्लाभाषी मुसलमान ही रहे हैं. असम में मतदाता सूची का 'गहन' नहीं 'विशेष पुनरीक्षण' क्यों?
राजनीतिक विश्लेषक: बीजेपी का निशाना असम नहीं पश्चिम बंगाल है
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री सरमा पर राज्य में हिंसा को बढ़ावा देने के लिए भड़काऊ बयान देने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि इससे राज्य में बड़े पैमाने पर अशांति पैदा होने की आशंका है. कांग्रेस नेता अमन वदूद वे भी ऐसा ही आरोप लगाया है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "बीजेपी ने बार-बार साबित कर दिया है कि उसे कानून या बुनियादी शिष्टाचार की कोई परवाह नहीं है. इससे पार्टी की हताशा जाहिर होती है. उसे अगले चुनाव में हार का खतरा सता रहा है."
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने भी 'एक्स' पर अपनी एक पोस्ट में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों से सरमा के उस वीडियो का संज्ञान लेने की अपील की है. लेकिन देश के बाकी हिस्सों में जहां एक मामूली टिप्पणी या सोशल मीडिया पोस्ट पर गिरफ्तारिया हो जाती हैं वहीं सरमा के ऐसे वीडियो के बावजूद अब तक उनके या इसे पोस्ट करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी है?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हिमंता सरमा को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने काफी ढील दे रखी है. इसकी वजह उनका पूर्वोत्तर की राजनीति में चाणक्य की भूमिका में होना है. इलाके के तमाम राज्यों में होने वाले चुनाव और सरकार के गठन में उनकी अहम भूमिका रही है.
राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी की निगाहें दरअसल असम से सटे बंगाल पर है. वो यहां बांग्लादेशी मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर मुहिम चला कर बंगाल में रहने वाले कथित बांग्लादेशियों को कड़ा संदेश देना चाहती है." उनका कहना था कि बीजेपी की प्राथमिकता बंगाल है, असम नहीं.
आदिवासी बनाम बिहारी के झगड़े ने भड़काई असम में हिंसा
कोलकाता में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे देवाशीष सेन डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हिमंता सरमा मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से ही बांग्ला भाषी मुसलमानों को निशाना बनाते रहे हैं. उनका एक मकसद खुद को असम के सबसे बड़े हितैषी बताकर सत्ता पर काबिज रहना है. यही वजह है कि वो बांग्लाभाषी मुसलमानों के साथ ही कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई पर भी लगातार हमले कर रहे हैं."
लेकिन उनके खिलाफ ऐसे बयानों के लिए अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी है? इस पर सेन ने उल्टे सवाल किया कि आखिर कार्रवाई कौन करेगा? उनके सर पर बीजेपी के केंद्रीय नेताओं का हाथ है. अगर पहले ही उनको ऐसी टिप्पणियों के लिए टोका गया होता तो अब ऐसे वीडियो सामने नहीं आते.
दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में हिंदी विरोध की जड़ें दशकों पुरानी हैं। इस पर पहले काफी हिंसा हो चुकी है। अब त्रिभाषा फार्मूले के तहत कथित तौर पर जबरन हिंदी थोपने के विरोध में एक बार फिर यह मुद्दा तेजी से उभर रहा है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम। के। स्टालिन ने हाल में कहा था कि राज्य में हिंदी के लिए न कोई जगह थी, न है और न ही रहेगी। मुख्यमंत्री ने 'भाषा शहीद' के मौके पर यह बात कही थी। 'भाषा शहीद' शब्द का इस्तेमाल उनके लिए किया जाता है जिन लोगों ने वर्ष 1964-65 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन के दौरान अपनी जान दी थी। इनमें से अधिकतर ने आत्मदाह किया था। दिलचस्प बात है कि स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार जहां हिंदी का भारी विरोध कर रही है वहीं पूर्वोत्तर के गैर-हिंदी भाषी राज्य मिजोरम में सरकार ने अब स्कूलों में हर महीने एक दिन तमाम काम-काज हिंदी में करने का फैसला किया है। उस दिन तमाम शिक्षक और छात्र हिंदी में ही बात करेंगे।
दो-भाषा और तीन-भाषा फॉर्मूले का सवाल
तमिलनाडु सरकार ने राज्य में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू नहीं किया है। यह दक्षिणी राज्य दो भाषा (अंग्रेजी और तमिल) फॉर्मूले का पालन करता है जबकि नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत हिंदी को भी शामिल करने की बात कही गई है। लेकिन डीएमके सरकार का आरोप है कि केंद्र सरकार इस नीति के जरिए राज्य पर जबरन हिंदी थोपने का प्रयास कर रही है।
मुख्यमंत्री के अलावा कई अन्य मंत्री और नेता भी अक्सर हिंदी-विरोधी टिप्पणी करते रहे हैं। सत्तारूढ़ डीएमके की सांसद कनिमोझी अक्सर राज्य में रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों पर हिंदी के इस्तेमाल का मुद्दा उठाते हुए केंद्र पर तमिल की बजाय हिंदी को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है। राज्य के मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम ने भी हाल हिंदीभाषी आबादी को मजदूरों से जोड़ते हुए विवादास्पद टिप्पणी की थी। पनीरसेल्वम ने कहा था, उत्तरी भारत से लोग यहां टेबल साफ करने, निर्माण मजदूर के तौर पर काम करने और पानी पुरी बेचने जाते हैं। इसकी वजह यह है कि वो सिर्फ हिंदी जानते हैं।
सांसद दयानिधी मारन के अलावा कई अन्य नेता भी समय-समय पर हिंदी के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। पार्टी का दावा है कि वो राज्य में तमिल के हितों की रक्षा के लिए कृतसंकल्प है और जबरन हिंदी थोपने के प्रयासों को कामयाब नहीं होने देगी। हालांकि कांग्रेस समेत कई पार्टियो के नेताओं ने पनीरसेल्वम की इस टिप्पणी का विरोध किया है। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा है कि तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था काफी हद तक दूसरे राज्यों से आने वाले मजदूरों पर ही निर्भर है।
केंद्र की ओर से कथित रूप से जबरन हिंदी थोपने के विरोध में राज्य में वर्ष 1938 के अलावा 1965 और 1986 में बड़े पैमाने पर हिंसक आंदोलन हो चुके हैं। उसी दौर से राज्य में द्विभाषा फार्मूला लागू है। स्टालिन पहले भी कह चुके हैं कि तमिलनाडु में हिंदी थापना मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने जैसा होगा। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सहयोगी रही एआईएडीएमके ने भी साफ कर दिया है कि वह राज्य की द्विभाषा नीति का ही समर्थन करती है।
पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित किताब को लेकर शुरू हुआ विवाद ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार इस किताब को लेकर सरकार पर हमलावर हैं, वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस ने इस मामले में एफ़आईआर भी दर्ज कर ली है।
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने दिल्ली पुलिस से इस एफ़आईआर के बारे में कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।
नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ की प्रकाशक कंपनी पेंगुइन इंडिया ने सफाई भी जारी कर दी है।
पेंगुइन ने कहा है कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है। अब खुद नरवणे ने भी पेंगुइन के इस दावे पर अपनी मुहर लगा दी है, लेकिन इसके बावजूद यह मामला शांत होता नहीं नजऱ आता।
बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि नरवणे के स्पष्टीकरण के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि राहुल गांधी के दावे महज़ कोरी कल्पना थी।
वह कहते हैं, ‘राहुल गांधी ने जिस मनोहर कहानी को सुनाने का प्रयास सदन के पटल पर किया था, वो उनकी उस तथाकथित प्रकाशित बुक के प्रकाशक और लेखक दोनों के द्वारा स्पष्ट रूप से ध्वस्त हो गया है। राहुल गांधी कल पूछ रहे थे कि प्रकाशक झूठ बोल रहे हैं या फिर जनरल नरवणे, लेकिन अब तो दोनों के ही बयान सामने हैं, जिससे साफ़ है कि असल झूठ बोल कौन रहा है।’
दरअसल, राहुल गांधी ने मीडिया चैनलों से बात करते हुए नरवणे की अप्रकाशित किताब से जुड़ी दिल्ली पुलिस की एफ़आईआर पर सवाल उठाए थे।
उन्होंने जनरल नरवणे के साल 2023 के एक ट्वीट को पढ़ते हुए कहा, ''मैं यह कहना चाहता हूं कि या तो जनरल नरवणे सच नहीं बोल रहे या फिर पेंगुइन। मुझे नहीं लगता कि एक पूर्व सेना प्रमुख झूठ बोलेंगे। पेंगुइन का कहना है कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन वह किताब अमेजन पर उपलब्ध है। जनरल नरवणे ने ट्वीट किया है।। कृपया मेरी किताब 2023 में खरीदें।
‘मैं पेंगुइन की बजाय नरवणे जी की बात पर भरोसा करता हूं। मेरा मानना है कि नरवणे जी ने अपनी किताब में सरकार और प्रधानमंत्री के लिए कुछ असहज बातें लिखी हैं। इसलिए अब आपको तय करना है कि सच कौन बोल रहा है। पेंगुइन या देश के पूर्व सेना प्रमुख।’
पेंगुइन इंडिया ने इसे लेकर क्या सफ़ाई दी है, नरवणे ने खुद क्या कहा है ये जानने से पहले नरवणे के उस ट्वीट में क्या लिखा है, जिसका जिक्र राहुल गांधी कर रहे हैं, ये जान लेते हैं।
तो नरवणे का यह ट्वीट 15 दिसंबर, साल 2023 का है। इसमें वह लिखते हैं, ''हैलो दोस्तों। मेरी किताब अब उपलब्ध है। बस लिंक को फॉलो कीजिए। हैपी रीडिंग। जय हिंद।''
राहुल गांधी ने इसी पोस्ट को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि जब नरवणे कह रहे हैं कि किताब उपलब्ध है तो प्रकाशक कंपनी झूठ क्यों बोल रही है। लेकिन अब नरवणे ने ख़ुद पेंगुइन के दावे को सही बताया है।
बीते दो दिनों में इस पूरे विवाद को लेकर पेंगुइन इंडिया ने दो बार अपनी सफ़ाई जारी की है।
पहली सफ़ाई नौ फऱवरी को आई, जिसमें कंपनी ने एक बयान जारी कर कहा, ‘हाल की चर्चा और मीडिया रिपोर्ट्स को देखते हुए पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया स्पष्ट करना चाहता है कि 'फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी' को प्रकाशित करने का एक मात्र अधिकार हमारे पास है।’
‘यह किताब पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने लिखी है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है। किताब की कोई भी कॉपी-प्रिंट में या डिजिटल फॉर्म में। अभी तक प्रकाशित, वितरित, बेची या पब्लिक के लिए हमारे द्वारा उपलब्ध नहीं कराई गई है।’
‘जो भी कॉपी अभी सर्कुलेशन में हैं। चाहे वह पूरी किताब हो या उसके अंश, चाहे प्रिंट में, डिजिटल में, पीडीएफ़ में, किसी भी फॉर्मेट में, ऑनलाइन या ऑफलाइन, किसी भी प्लेटफॉर्म पर।।। वो पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के कॉपीराइट का उल्लंघन है और इसे तुरंत रोकना होगा। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ग़लत माध्यम से किताब की प्रतियां सर्कुलेट करने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी रास्ता अपनाएगा।’
दूसरी सफ़ाई राहुल गांधी के उस सवाल के बाद जारी की गई जिसमें उन्होंने नरवणे के द्वीट का हवाला देते हुए किताब के प्रकाशित होने का दावा किया था।
अपनी दूसरी सफ़ाई में पेंगुइन इंडिया ने यह स्पष्ट किया है कि भारत में किताबों के प्रकाशन से जुड़ी उसकी प्रक्रिया क्या है।
पेंगुइन इंडिया के अनुसार, किसी किताब की घोषणा होना, उसका प्री-ऑर्डर पर उपलब्ध होना और उसका वास्तव में प्रकाशित होना ।।।ये तीनों अलग-अलग चीज़ें और स्टेज हैं। किसी किताब का अमेजऩ जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर प्री-ऑर्डर के लिए दिखना या उसकी भविष्य की रिलीज़ तारीख़ तय होना, यह नहीं दर्शाता कि वह किताब प्रकाशित हो चुकी है। पेंगुइन का कहना है कि किताब को तभी प्रकाशित माना जाता है जब वह रिटेल प्लेटफ़ॉर्म पर सीधे खरीदने के लिए उपलब्ध हो।
मंगलवार को ही इस मामले में जनरल नरवणे का भी एक पोस्ट सामने आया है। नरवणे ने किताब के स्टेटस को लेकर सफ़ाई दी है और लिखा है कि पेंगुइन जो कह रहा है, किताब का स्टेटस भी वही है।
इसके बावजूद किताब की उपलब्धता को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं।
जैसे आरजेडी सांसद मनोज झा ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए दावा किया कि उन्होंने यह किताब पढ़ी है।
वह कहते हैं, ''मैंने वो किताब पढ़ी है। किताब उपलब्ध है। डिजिटल दुनिया में हर चीज़ उपलब्ध है। कहां रोकेंगे आप सूचना के इस युग में। यह हमारी सल्तनत की असुरक्षा दिखाता है। दिल्ली पुलिस को आप बिना वजह बदनाम कर रहे हैं। एफ़आईआर तो किसी के इशारे पर हुआ है, किसी के इरादे पर हुआ है। मैंने पेंगुइन रैंडमहाउस का वो सर्कुलर भी सोशल मीडिया पर देखा, मुझे दुख हुआ।
-इल्मा हसन
असम बीजेपी के एक्स हैंडल पर पोस्ट किए गए एक वीडियो को विवाद खड़ा होने के बाद हटा लिया गया है। इस वीडियो में राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को एक राइफल संभालते हुए दिखाया गया था।
वीडियो में एआई से तैयार किया गया पार्ट जोड़ा गया था, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों की तस्वीरों पर गोलियाँ लगती हुई दिखाई गईं। यह वीडियो 7 फरवरी को असम बीजेपी हैंडल पर पोस्ट किया गया था और आलोचना बढऩे के बाद इसे 8 फरवरी को हटा दिया गया।
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई यूज़र्स ने इसे भडक़ाऊ और ख़तरनाक बताया। आलोचकों का कहना है कि वीडियो एक समुदाय को निशाना बनाता है और इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है।
इस वीडियो में ‘फॉरेनर फ्री असम’ और ‘नो मर्सी’ जैसे वाक्य भी स्क्रीन पर दिखाए गए थे।
वीडियो में एक तस्वीर में दो लोगों को दिखाया गया था, जिनमें से एक की पहचान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के रूप में की जा रही थी। दोनों को सफेद टोपी पहने हुए दिखाया गया था।
करीब 17 सेकंड के इस वीडियो के अंत में मुख्यमंत्री को काउबॉय अंदाज में दिखाया गया था। इस दृश्य में वह राइफल और काउबॉय हैट के साथ दिखाई देते हैं।
वीडियो में कुछ संदेश भी दिखाई दिए जिनका अर्थ था, ‘तुम पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए?’ और ‘बांग्लादेशियों के लिए कोई माफी नहीं है।’
यह वीडियो ऐसे समय में साझा किया गया जब असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी पहले से तेज़ हो गई है।
हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या कहा
इस विवाद के बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने वीडियो नहीं देखा था। उन्होंने कहा कि वह हर सोशल मीडिया पोस्ट को व्यक्तिगत रूप से नहीं देखते और कई बार पार्टी के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अलग टीम संभालती है।
हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि वह ‘मियां’ मुसलमानों के खिलाफ बोलते रहते हैं।
इस बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने असम के सीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई है।
इस पर न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में सरमा ने कहा, ‘मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं, मैं क्या कर सकता हूं? मुझे किसी भी वीडियो के बारे में कुछ नहीं पता। अगर उन्होंने मेरे खिलाफ मामला दर्ज कराया है तो मुझे गिरफ़्तार कर लीजिए। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मैं अपने शब्दों पर कायम हूं। मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ हूं और आगे भी उनके खिलाफ रहूंगा।’
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
इस वीडियो पर कांग्रेस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, ‘बीजेपी के असम प्रदेश के आधिकारिक हैंडल ने एक वीडियो पोस्ट किया, जो अल्पसंख्यकों की ‘पॉइंट-ब्लैंक’ हत्या को महिमामंडित करता हुआ दिखाई देता है। यह बेहद घृणित और परेशान करने वाला है और इसे किसी सामान्य ट्रोल सामग्री के तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता। यह बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार के लिए उकसाने जैसा है।’ वहीं कांग्रेस नेता और वकील अमन वदूद ने इस वीडियो को लेकर बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने कहा, ‘वीडियो बिल्कुल साफ तौर पर बड़े पैमाने पर हिंसा भडक़ाने की कोशिश है। यह नरसंहार जैसी सोच को बढ़ावा देने वाला है।’
उन्होंने कहा, ‘वीडियो का संदेश इतना भद्दा और स्पष्ट था कि हर जगह इसकी आलोचना हो रही थी। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक में बीजेपी पर हमला हो रहा था। लगभग हर कोई अदालतों और संस्थाओं से पूछ रहा था कि इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है।’
अमन वदूद ने कहा, ‘असम में बीजेपी पूरी तरह भटक चुकी है। विकास के उनके दावे काम नहीं कर रहे हैं। बीजेपी नहीं चाहती कि लोग इन मुद्दों पर बात करें। अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए ‘मियां’ समुदाय पर लगातार हमला किया जा रहा है।’ जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा, ‘कल्पना कीजिए, एक निर्वाचित मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के वीडियो में मुसलमानों पर पॉइंट-ब्लैंक गोली चलाने का अभिनय कर रहे हों, जो इतना आपत्तिजनक था कि तीखी प्रतिक्रिया के बाद उसे हटाना पड़ा।’ टीएमसी ने इसे ‘राज्य समर्थित कट्टरपंथीकरण’ बताया है।
-दिपाली अग्रवाल
जगजीत सिंह जालंधर के डीएवी कॉलेज के साइंस के छात्र थे। उस कॉलेज में रवीन्द्र कालिया, मोहन राकेश, उपेन्द्रनाथ अश्क, सुदर्शन फाकिर जैसे कितने ही प्रसिद्ध और कमाल के लोग भी पढ़े। रवीन्द्र कालिया ने अपनी आत्मकथा ग़ालिब छुटी शराब में जगजीत सिंह का जिक्र किया है, चूंकि वे उनके दो-तीन साल सीनियर थे इसलिए कॉलेज के दिनों का जिक्र कम है। मगर एक मजे की बात बताती हूं कि उसी कॉलेज में प्रसिद्ध पल्प लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक भी पढ़े हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा में-कॉलेज के दिनों को याद करते हुए जगजीत सिंह पर पूरे दस पन्ने लिखे हैं। कल ही उस किताब को पढ़ा, आज जगजीत सिंह का जन्मदिन भी है। कुछेक किस्से जो बताते हैं कि कैसे पूत के पांव पालने में पलते हैं और कैसे एक कलाकार बचपन से ही उस एक कला की मिट्टी के साथ पैदा तो होता है लेकिन अपनी मेहनत से उसे लगातार आकार में ढालता रहता है कि वह कहीं बिखर न जाए।
पाठक लिखते हैं कि कॉलेज के बच्चों को कमरे चुनने की सुविधा होती थी लेकिन कोई भी तीन कमरे नहीं चाहता था, सीढिय़ों के पास वाला (शोर के कारण), वॉशरूम के पास वाला (बदबू के कारण), जगजीत सिंह के बगल वाला (उनके 5 बजे उठकर रियाज के कारण)। जगजीत सिंह ने एक बार सुरेन्द्र मोहन पाठक को भी गाते सुना और कहा कि उनकी आवाज अच्छी है, उन्हें और गाना चाहिए और बाकी का रियाज वो खुद उन्हें करवा देंगे, रियाज का समय जब सुबह 5 बजे का पता चला तो पाठक जी ने मना कर दिया। फिर वो लिखते हैं कि उस इंकार का जगजीत ने न ही बुरा माना और न ही दोबारा पेशकश दी। वह एक खुशमिजाज लडक़े थे।
जगजीत सिंह को बच्चे अपने कमरे में बुलाकर फरमाइशी कार्यक्रम करते थे और वे ख़ूब मनोयोग से उन्हें गीत सुनाते थे। कभी उनका इतना गाने का मूड होता कि बरामदे में खड़े लडक़े को गाना सुनाने लग जाते थे और तब वो खीज कर कहता कि तुझे तो पास होना नहीं है, हमें तो पढऩे दे। इस पर जगजीत कहते कि नाशुकरों, एक दिन टिकट खरीदकर मेरे गाना सुनोगे (और ये बात आने वाले दिनों में सच हुई, रवीन्द्र कालिया को तो बड़े पापड़ बेलने पड़े थे)।
एक कमाल का हुनर जो शायद जगजीत सिंह के चाहने वालों को नहीं ही पता होंगी कि फिजिक्स की क्लास में रेजोनेन्स एक्सपेरिमेंट के दौरान दो तारों को एक ही फ्रीक्वेंसी पर झंकृत करना होता था, ये काम ट्यूनिंग फोर्क करता था लेकिन जगजीत सिंह बिना ट्यूनिंग फोर्क के वो सेट कर देते थे, जब परीक्षक चेक करता तो वो एकदम रेजोनेट होती थीं और वो विस्मय से भर जाता था जबकि जगजीत ख़ुद भी नहीं समझ पाते थे कि वो ये कैसे कर लेते थे।
-चित्रगुप्त
1724 का वह काला अध्याय इतिहास में दर्ज है, जब पश्चिम अफ्रीका के घने जंगलों से मात्र चौदह वर्षीय थॉमस फुलर को गुलाम बनाने वाले अपहरणकर्ता बेडिय़ों में जकडक़र अमरीका ले आए। औपनिवेशिक वर्जीनिया की ज़मीन पर उतरा यह बच्चा न पढऩा जानता था, न लिखना। लेकिन उसके दिमाग में जो था, वह किसी भी सभ्य समाज की कल्पना से कहीं आगे था। गुलामी की जंजीरों के भीतर बंद यह किशोर एक चलता-फिरता गणित था। इसलिए लोग उसे ‘वर्जीनिया कैलकुलेटर’ कहने लगे।
1780 के दशक में जब दो शिक्षित क्वेकर सज्जन-विलियम हार्टशॉर्न और सैमुअल कोट्स—ने उसकी परीक्षा ली, तो सभ्यता खुद कटघरे में खड़ी हो गई। डेढ़ साल में कितने सेकंड होते हैं-थॉमस ने बिना कागज़़-कलम, एक मिनट से कम में सही उत्तर दे दिया। 70 साल, 17 दिन और 12 घंटे में कितने सेकंड-यह भी उसने लगभग डेढ़ मिनट में गिन दिया। जब शिक्षित व्यक्ति ने उत्तर को ग़लत बताया, तो गुलाम लडक़े ने शांति से कहा-आप लीप ईयर भूल गए हैं। दोबारा गणना हुई, और वही सच निकला जो एक अनपढ़ गुलाम ने कहा था।
यह घटना इसलिए दर्ज हुई क्योंकि इसे डॉ. बेंजामिन रश जैसे प्रतिष्ठित विद्वान ने लिखा। नहीं तो इतिहास अक्सर ऐसी प्रतिभाओं को चुपचाप दफऩा देता है। थॉमस फुलर 1790 में मर गया, लेकिन वह यह सवाल छोड़ गया कि अगर बुद्धि रंग, नस्ल, शिक्षा या हैसियत की मोहताज नहीं है, तो इंसानी समाज उसे इन जंजीरों में क्यों बाँधता है?
यूरोप और अमरीका ने लंबे समय तक नस्ल के नाम पर यह झूठ फैलाया कि कुछ लोग जन्म से ही श्रेष्ठ होते हैं और कुछ जन्म से ही हीन। थॉमस फुलर जैसी कहानियाँ उस झूठ को तार-तार कर देती हैं। यह बताती हैं कि प्रतिभा प्राकृतिक होती है, सामाजिक नहीं। वह किसी चमड़ी, किसी कुल, किसी धर्म या किसी दर्जे से नहीं निकलती—वह इंसान से निकलती है।
लेकिन अगर हम यह सोचते हैं कि नस्ल का यह ज़हर सिफऱ् पश्चिमी इतिहास की बीमारी थी, तो हम खुद को धोखा दे रहे हैं। भारत में यही धारणा जाति व्यवस्था के रूप में आज भी जि़ंदा है। यहाँ भी जन्म के आधार पर यह तय करने की कोशिश होती है कि कौन तेज होगा, कौन योग्य होगा, और कौन सिर्फ ‘आरक्षण का लाभार्थी’ कहलाएगा। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ गुलामी की जंजीरें दिखाई नहीं देतीं—वे अंकतालिकाओं, इंटरनल असेसमेंट, मौखिक परीक्षाओं और ‘मेरिट’ के दावों में छुपी होती हैं।
मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने हाल ही में दिल्ली पुलिस को दी एक शिकायत में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है।
हर्ष मंदर का आरोप है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा संवैधानिक पद पर होते हुए देश की अल्पसंख्यक मुसलमान आबादी के खिलाफ नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हर्ष मंदर के इन आरोपों के बाद एक सार्वजनिक बयान में हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि वह उनके खिलाफ सौ से अधिक एफ़आईआर दर्ज करवा देंगे।
हाल के सालों में भारत में नफऱत भरी भाषा, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर बहस तेज हुई है।
सेंटर फॉर स्टडी ऑन हेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में देशभर में 1,318 नफरती भाषणों की घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2024 के मुकाबले 13 प्रतिशत ज़्यादा है और 2023 के मुकाबले लगभग दोगुनी हैं।
इस रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल औसतन हर दिन चार नफरती भाषण हुए। इन घटनाओं का सबसे बड़ा निशाना धार्मिक अल्पसंख्यक, ख़ासतौर पर मुस्लिम और ईसाई समुदाय रहे।
रिपोर्ट यह दावा भी करती है कि नफरत अब सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक निरंतर और संगठित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक़, ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘पॉपुलेशन जिहाद’ जैसे साजि़शी नैरेटिव्स, हिंसा के खुले आह्वान, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार और धार्मिक स्थलों को तोडऩे की मांगें, सार्वजनिक मंचों से सामान्य रूप से कही जा रही हैं।
खास बात यह है कि ऐसी 88 प्रतिशत घटनाएं उन राज्यों में दर्ज हुईं जहां बीजेपी या उसकी सहयोगी पार्टियां सत्ता में हैं, जबकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इन भाषणों को बड़े पैमाने पर फैलाने का माध्यम बने।
इसी बीच, मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के कुछ बयानों को ‘नफरत भरा’ बताते हुए दिल्ली पुलिस को शिकायत दी है, जिस पर अभी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है।
बीबीसी हिन्दी के संवाददाता दिलनवाज पाशा से हुई लंबी बातचीत में हर्ष मंदर ने न केवल इस शिकायत के पीछे के कारण बताए, बल्कि नफरत की राजनीति, प्रशासन की भूमिका, न्यायपालिका, मीडिया और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी पर भी तीखे सवाल उठाए।
‘नफरती भाषण अब अपराध जैसा नहीं रह गया’
हर्ष मंदर का कहना है कि पिछले एक दशक में नफरत भरे भाषण इतने सामान्य हो गए हैं कि वे रोजमर्रा की राजनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। हर्ष मंदर कहते हैं, ‘ऐसा लगने लगा है कि नफरत कोई अपराध ही नहीं रहा। लेकिन इतिहास हमें चेतावनी देता है, नाजी जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार गैस चैंबर से नहीं, बल्कि नफरती भाषण से शुरू हुआ था।’
हर्ष मंदर इस बात पर भी जोर देते हैं कि लिंचिंग या हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए कानूनी लड़ाई जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी है नफरत भरी भाषा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लडऩा।
मंदर कहते हैं, ‘लिंचिंग और हिंसा के खिलाफ हम लड़ते हैं, लेकिन उतनी ही शिद्दत से नफरती भाषण का भी सामना करना होगा, क्योंकि वही आगे चलकर नफऱती हिंसा में बदलता है।’
इसी संदर्भ में वे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयानों को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ मानते हुए कहते हैं, ‘अगर कोई मुख्यमंत्री यह कहे कि ‘मेरा काम एक समुदाय को परेशान करना है’, तो यह सिर्फ बयान नहीं, बल्कि एक संदेश है, जो नीचे तक जाता है।’
‘धमकियों से मेरी आवाज नहीं रुकेगी’
हर्ष मंदर की पुलिस को दी गई शिकायत के बाद दिए एक बयान में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि वह हर्ष मंदर के खिलाफ सौ एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं।
हालांकि, मंदर का कहना है कि उन्हें इस तरह के बयानों या पुलिस की कार्रवाई से डर नहीं लगता।
हर्ष मंदर कहते हैं, ‘अगर डिटेंशन सेंटरों में बंद लोगों की मदद करना अपराध है, अगर एनआरसी से प्रभावित लोगों के साथ खड़ा होना अपराध है, तो मैं यह अपराध करता रहूंगा।’
मंदर कहते हैं, सरकार पुलिस का डर दिखाकर मेरी आवाज दबाना चाहती है, मेरे हौसले को तोडऩा चाहती है लेकिन ‘मेरे हौसले, जमीर और काम पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।’
‘सत्ता, प्रशासन और नफरत की मशीनरी’
भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हर्ष मंदर लंबे समय तक प्रशासन का हिस्सा रहे।
साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के बाद उन्होंने आईएएस की अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। हर्ष मंदर, जो ख़ुद कऱीब 20 साल तक प्रशासनिक सेवा में रहे, कहते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा अचानक नहीं होती।
वे तर्क देते हैं, ‘नफरत का उत्पादन होता है, दंगे ऐसे ही होते हैं जैसे कोई केमिकल रिएक्शन। हथियार, अफवाहें, भीड़, सब कुछ एक प्रक्रिया के तहत आता है। लेकिन इसके बावजूद हिंसा तब तक नहीं होती, जब तक सरकार उसे होने न दे।’ वे 2020 के दिल्ली दंगों का उदाहरण देते हैं। उनके अनुसार, देश की राजधानी में, जहां गृह मंत्रालय और तमाम सुरक्षा एजेंसियां मौजूद हैं, अगर चाहते तो हिंसा घंटों में रोकी जा सकती थी।
वे कहते हैं, ‘सरकार कहती है कि यह साजि़श थी। मैं मानता हूं कि साजिश थी। लेकिन वह साजिश प्रदर्शनकारियों की नहीं, सत्ता की थी।’
दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़े 758 एफआईआर दर्ज किए थे। खबरों के मुताबिक, पुलिस ने दो हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था।
‘यह आरोप गंभीर है, लेकिन अनुभव से निकला है’
जब उनसे पूछा गया कि क्या वे सीधे तौर पर सरकार को अपने नागरिकों के खिलाफ साजिश का दोषी ठहरा रहे हैं, तो हर्ष मंदर अपने प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हैं।
वे साल 1984 के सिख विरोधी दंगों और गुजरात दंगों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘हफ्तों तक चलने वाली हिंसा सरकार की सहमति के बिना संभव नहीं।’
इंदौर में 1984 के दौरान अपने अनुभव को साझा करते हुए वे बताते हैं कि कैसे एक जूनियर अफसर होने के बावजूद उन्होंने सेना बुलाकर कुछ ही घंटों में हिंसा रोकी।
हर्ष मंदर ने तब एसडीएम रहते हुए सेना को भीड़ पर गोली चलाने के आदेश दिए थे और कुछ ही घंटों के भीतर हिंसा पर काबू पा लिया गया था। वे कहते हैं, ‘अगर एक अफसर छह घंटे में दंगे रोक सकता है, तो पूरे राज्य में हफ्तों तक हिंसा कैसे चलती रही? इसका जवाब साफ है।’
बुलडोजर और ‘तुरंत इंसाफ’
मंदर का एक बड़ा सवाल ‘बुलडोजर न्याय’ पर भी है।
वे कहते हैं, ‘किसी पर आरोप लगा, और उसी दिन उसका घर तोड़ दिया गया। यह कौन तय कर रहा है कि वह अपराधी है? कानून की प्रक्रिया कहां गई?’
उनके मुताबिक, यह सब प्रशासन की मिलीभगत से हो रहा है। हर्ष मंदर कहते हैं, ‘जो अफ़सर संविधान के उल्लंघन के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत कर सकते थे, वे चुप हैं।
हर्ष मंदर कहते हैं, ‘ये प्रशासनिक अधिकारी ही हैं जो लोगों के घर बुलडोजर लेकर पहुंच रहे हैं। इस संवैधानिक अपराध को न्याय बताया जा रहा है।’
-सनियारा खान
मक़बूल शेरवानी वह नाम है, जिसे भारतीय सेना ने हमेशा एक जांबाज देशप्रेमी के रूप में सम्मान दिया है। इसी लडक़े के बारे में मुल्क राज आनंद जी ने ‘डेथ ऑफ़ ए हीरो’ लिखा था।
अक्टूबर 1947 का यह वाकय़ा है। आज़ादी को ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था। सीमावर्ती इलाक़ों में बारूद की गंध फैली हुई थी। पाकिस्तानी सेना कश्मीर हथियाने की पुरज़ोर कोशिश में थी। श्रीनगर विमानतल पर उन लोगों की ख़ास नजऱ थी, क्योंकि उन्हें मालूम था कि अगर वे विमानतल पर कब्जा कर लेते, तो भारतीय सेना कश्मीर में कदम नहीं रख पाती और उस सूरत में हिंदुस्तान कश्मीर को खो देता।
कश्मीर जल रहा था। अराजक तत्वों द्वारा लूट-पाट, हत्या और बर्बादी का भयानक मंजऱ चल रहा था। उन्हें रोकने के लिए भारतीय सेना अभी कश्मीर नहीं पहुँच पाई थी। दिल्ली भी उस वक़्त पूरी तरह स्थिर नहीं थी।
उसी समय बारामुला के राजपथ पर उन्नीस साल का एक मामूली कश्मीरी लडक़ा खड़ा था। उसका नाम था मक़बूल शेरवानी। यह लडक़ा राष्ट्रीय कांग्रेस सम्मेलन का एक युवा सदस्य होने के साथ-साथ एक देशप्रेमी और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी माना जाता था। एक बार इस लडक़े ने मोहम्मद अली जिन्ना को भी सांप्रदायिक राजनीति को लेकर खरी-खोटी सुनाई थी।
पाकिस्तानी दुश्मनों का सामना इसी मक़बूल से हुआ। उन्होंने मक़बूल से श्रीनगर विमानतल पहुँचने का सबसे जल्दी वाला रास्ता पूछा। मक़बूल को माजरा समझ में आ गया। उसके दिल में एक ही बात थी—उन लोगों को इधर-उधर भटकाए रखना, ताकि उनसे पहले भारतीय सेना किसी तरह श्रीनगर विमानतल पहुँच जाए।
-रामजी तिवारी
मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’ एक मस्ट रीड किताब है।
यह किताब आज से 40 वर्ष पहले मराठी में प्रकाशित हो चुकी थी। सुखद यह कि हिंदी के पाठकों को अब जाकर इसका अनुवाद हासिल हुआ है। मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’ का हिंदी अनुवाद सुनीता डागा ने किया है। और बहुत अच्छा अनुवाद किया है। एकदम सरल और प्रवाहमय।
मलिका अमर शेख हालाँकि चाहती हैं कि उनका परिचय उनके नाम से दिया जाए लेकिन फिर भी उनका नाम आते ही मराठी के प्रसिद्ध कवि और दलित पैंथर के संस्थापक नामदेव ढसाल का जिक्र जरूर आ जाता है, जिनसे मलिका की शादी हुई थी। कहें तो जिनसे मलिका ने प्रेम विवाह किया था।
किताब कई सवालों को सामने रखती है। मसलन कि जिस नामदेव ढसाल को हम एक क्रांतिकारी सामाजिक कार्यकर्ता और मानिंद कवि के रूप में जानते हैं, वे अपने व्यक्तिगत जीवन में क्यों इतने अराजक, नशेबाज, वेश्यागामी और हिंसक थे? उन्होंने न सिर्फ अपनी पत्नी और बच्चों के साथ मारपीट की, बल्कि किताब में इस बात का भी जिक्र आता है कि उन्होंने अपनी माँ पर भी हाथ उठाया था।
इस किताब से पता चलता है कि उन क्रांतिकारी लोगों के दलित पैंथर आंदोलन की भीतरी परतें बेहद अराजक और घिनौनी थी। निजी जीवन भी नामदेव ढसाल की तरह ही अराजक और दुहरा था, जो समाज बदलने के नारे के साथ इस आंदोलन में उतरे थे।
क्रांतिकारी और कवि होने के बरक्स यह किताब उनके आचरण को छील कर हमारे सामने रख देती है कि तुम जिनकी कविताओं और आंदोलनों पर मुग्ध हुए जाते हो, उनका एक चेहरा यह भी है। जरा इसे भी ठहर कर देखते जाओ।
मलिका ने अपनी इस आपबीती में विवाह संस्था को भी बहुत निर्ममता से प्रश्नांकित किया है। और कुल मिलाकर उसे स्त्री के विरुद्ध बताया है। साथ ही इस बात पर जोर दिया है कि स्त्री को अपने पैरों पर जरूर खड़ा होना चाहिए।
किताब का एक अंश देखिए...
‘नामदेव झुंझलाता था कि मैं अपने बेटे को ब्राहमनी संस्कार देकर लल्लू पंजू बना रही हूँ। निहायत दब्बू।
मैं कहती- ‘अगर वह ब्राह्मणी संस्कार लेकर दब्बू बनता है तो बने। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। पर मैं नही चाहती हूँ कि तुम्हारी एक भी बुरी आदत उसमें आए। गाली गलौज करते हुए लोगों पर दबंगई करने से बेहतर है कि मेरा बेटा पूर्णत: मध्यवर्गीय बने। भ्रष्ट क्रांतिकारी बनने की बनिस्बत वह मिडिल क्लास में बैठे तो मुझे आपत्ति नहीं। मैं चाहती हूँ कि मेरा बेटा खुश रहे। सुसंस्कृत बने।’
किताब राधाकृष्ण प्रकाशन से छपी है। और मस्ट रीड की श्रेणी में आती है। पढ़ जाइए।
जिस वक्त मैंने अखबार में काम करना शुरू किया था, उसी वक्त के आसपास मीडिया में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था। हमारा अखबार जो फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन तक नही छापता था, भाषा की शुद्धता और शिष्टता का खासा खयाल रखा जाता था, उस पर इस बात के आरोप लगने लगे थे कि इस अखबार की भाषा बहुत मुश्किल है।
उस वक्त मार्केटिंग टीम बार-बार ये फीडबैक लेकर आती थी कि यूथ अखबार की भाषा से कनेक्ट नहीं हो पा रहा है। ऐसा नहीं है कि मैं क्लिष्ट भाषा की समर्थक हूँ, मगर मुझे लगता है कि अखबार की जिम्मेदारी सिर्फ खबरें परोसना ही नहीं, जनमत तैयार करना, सामाजिक मूल्यों की सृष्टि और भाषा के संस्कार देना भी है।
मगर वो तेज आँधी थी, जिसने हिंदी अखबार की भाषा को हिंग्लिश नामक एक नई भाषा दी। भाषा से शुरू होने वाली ये प्रक्रिया बाद में पत्रकारिता और सामाजिक मूल्यों में बदलाव तक पहुँची। आज हम पत्रकारिता में देख रहे हैं कि पत्रकार किस तरह से हमारे समाज को पथभ्रष्ट करने की योजना में प्राणपण से जुटे हुए हैं।
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जिस वक्त स्मिता पाटील ने मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया, उसी वक्त से वे इन फिल्मों को लेकर बहुत सहज नहीं थीं। बताया जाता है कि नमकहलाल फिल्म के गाने "आज रपट जाए तो" की शूटिंग के बाद वे बहुत डिस्टर्ब रहीं और रात भर रोती रहीं। अमिताभ ने उनसे इस सिलसिले में बात की औऱ भी साथी कलाकारों से बात करने के बाद वे सैटल हो पाईं।
किसी इंटरव्यू में लता मंगेशकर से जब ये सवाल किया गया कि उन्हें किसी गाने के लेकर अफसोस हुआ कभी, तो उन्होंने बताया कि "मैं का करूं राम मुझे बुडढा मिल गया" गाने को लेकर आज तक अफसोस है, ये गाना मुझे नहीं गाना चाहिए था।
अमोल पालेकर अपनी आत्मकथा में फिल्म "तीसरा कौन" का किस्सा बताते हैं। फिल्म में एक साधारण सा लगने वाला व्यक्ति अंत में खलनायक के रूप में उभरता है, वे लिखते हैं कि ‘इसलिए इस भूमिका के लिए मैंने अपनी रजामंदी दे दी कि मैं अभिनय के विभिन्न पहलू दिखा सकूं। इस बारे नहीं सोचा था कि इसमें खलनायक की किस तरह की प्रवृत्ति दिखानी होगी।‘
शूटिंग के अंत में जब यह पता चला कि इस भूमिका को बेटी का यौन शोषण करने वाले बाप के रूप में भी समझा जा सकता है। इस पर मैं बहुत बेचैन हो गया। निर्माता ने दलील दी कि किसी प्रकार का दुष्कृत्य होते हुए नहीं दिखाया गया था और अंत में केवल डायलॉग्स से ही वह बात सामने आई थी। हर तरह की दलील के बावजूद, वे उस भूमिका को नहीं करने पर अड़े रहे।
घर घर और हर हाथ तक पहुंच रहे डिजिटल डिवाइसेज के साथ ही भारत में केवल टीनएजर्स ही नहीं बल्कि छोटे बच्चों तक भी पोर्न की पहुंच आसान हो रही है। इसका सीधा असर उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है।
डॉयचे वैले पर रामांशी मिश्रा की रिपोर्ट –
उत्तर प्रदेश के कानपुर में 13 साल और 8 साल के दो लडक़ों ने कथित तौर पर पॉर्न वीडियो देखकर छह साल की बच्ची के साथ गैंगरेप किया। बच्ची के चिल्लाने की आवाज सुनकर आसपास के लोग पहुंचे और आरोपियों को पुलिस के हवाले किया। पुलिस की पूछताछ में दोनों लडक़ों ने माना कि वे मोबाइल में पॉर्न वीडियो देखते हैं।
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में 13 साल के एक लडक़े पर ढाई साल की बच्ची का रेप करने का आरोप है। कोरबा पुलिस के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि बच्ची के अभिभावकों की शिकायत के बाद नाबालिग आरोपी के खिलाफ पॉक्सो के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस के अनुसार, जांच में पता चला कि आरोपी बच्चे को मोबाइल पर पॉर्न देखने की लत है। अब उसकी काउंसलिंग की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट पवन दुग्गल भी ऐसे एक मामले के बारे में बताते हैं। पवन दुग्गल के मुताबिक, उनके पास एक केस आया था जिसमें महज साढ़े पांच वर्ष के बच्चे ने हस्तमैथुन करते हुए एक वीडियो बनाया और उसे अपने साथ पढऩे वाली एक लडक़ी के नंबर पर भेज दिया।
पवन दुग्गल बताते हैं कि वीडियो देखने के बाद दोनों बच्चों के माता-पिता काफी हैरान थे। लडक़े के माता-पिता को इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि बच्चा इस तरह की हरकतें कर रहा है। इस पूरे मामले में दोनों ही पक्षों के अभिभावक किसी तरह की कार्रवाई नहीं चाहते थे, लेकिन वे प्रकरण को संज्ञान में लाना चाहते थे। अब दोनों बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है।
भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों में बच्चों के बीच पोर्नोग्राफी देखने के मामले बढ़ रहे हैं। इसके नकारात्मक प्रभावों की सूची भी लंबी है। कई देशों ने पोर्नोग्राफी को बच्चों की पहुंच से दूर करने के लिए कुछ प्रभावी कदम उठाए हैं। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में इसपर लगाम कस पाना एक चुनौती से कम नहीं है।
उत्तर प्रदेश और केरल के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में बतौर मनोचिकित्सक अपनी सेवाएं दे चुके डॉ। जयनाथ भंडारा पुराइल कहते हैं कि पोर्नोग्राफी की लत का पता चलने पर प्रोफेशनल या चिकित्सकीय मदद जरूरी है। अगर समय पर सहायता न ली जाए, तो इसके परिणाम घातक भी हो सकते हैं। किशोरों में अवसाद, अपराधबोध और अकेलेपन की भावना घर कर सकती है। इसके अलावा वे अपनी पढ़ाई, शौक या दोस्तों और परिवार से दूरी बढ़ाना भी शुरू कर देते हैं। स्कूल और खेलकूद की गतिविधियों में रुचि कम होने लगती है और उनके प्रदर्शन पर भी असर पड़ता है। डॉ। पुराइल बताते हैं, ‘समुचित सहायता न मिलने पर किशोरों में सेक्शुअल डिसफंक्शन, यानी यौन विकार जैसी कुछ अन्य शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं।’
कैसे लगती है पोर्नोग्राफी की लत?
इस समय ब्रिटेन के सीएनटीडब्ल्यू एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के जनरल एडल्ट सायकेट्री विभाग में कार्यरत डॉ। पुराइल बताते हैं कि पॉर्न की लत कई कारणों से हो सकती है। मनोवैज्ञानिक कारणों की बात करें, तो बचपन में ही यौन सामग्री यानी सेक्शुअल कंटेंट का आसानी से मिलना सबसे अहम है। इसके अलावा चिंता, अवसाद या तनाव से जूझने पर भी पोर्नोग्राफी की लत लग सकती है। किशोरों में हमउम्र साथियों के कारण भी पोर्नोग्राफी की लत लग सकती है। साथियों के प्रभाव में किशोर पोर्न को देखना शुरू करते हैं और धीरे-धीरे इसके लती हो जाते हैं। उन्हें ये लत सामान्य लगने लगती है।
उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया, ‘पोर्नोग्राफी की लत एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति बार-बार अश्लील सामग्री देखने की आदत में इस हद तक उलझ जाता है कि अपनी आदतों पर नियंत्रण खो बैठता है। यह उसकी मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थिति को प्रभावित करने लगता है। इस लत में व्यक्ति अपने काम, पढ़ाई और रिश्तों को नुकसान पहुंचाने लगता है।’ इसके अन्य कारणों के बारे में डॉ। पुराइल बताते हैं, ‘आजकल किशोरों में सेक्स हॉर्मोन, जैसे कि एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन के स्तर जल्दी बढऩे लगे हैं। इसके कारण उनकी यौन इच्छा बढ़ जाती है। इसके चलते भी वे पोर्नोग्राफी वीडियो देखने के लती होने लग जाते हैं।’
इसके अलावा इंटरनेट की सहज उपलब्धता और पॉर्न साइट्स की संख्या में हो रही वृद्धि भी बड़ी वजह है। ऐसे कॉन्टेंट आसानी से मोबाइल फोन और लैपटॉप पर पहुंच जाते हैं। एडवोकेट पवन दुग्गल बताते हैं कि वर्तमान में जिस तरह दुनिया डिजिटाइजेशन की ओर जा रही है, उसके फायदों के साथ नुकसान भी सामने आ रहे हैं। वह बताते हैं, ‘मेरे पास ही एक ऐसा मामला आया, जिसमें आठ साल के बच्चे ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से अपनी ही टीचर का एक अश्लील वीडियो बनाया। इसके बाद उसने अपने स्कूल के ही अन्य टीचरों की मेल आईडी पर वह वीडियो भेजा। यह कंटेंट पूरी तरह से डीप फेक पर आधारित था।’
डिजिटल तरक्की के कारण असली कंटेंट के साथ डीप फेक और एआई जनरेटेड कंटेंट आसानी से उपलब्ध हैं और बच्चों तक भी पहुंच रहे हैं। एआई का आसानी से इस्तेमाल कर अश्लील सामग्री बनाई जा सकती है। जरूरी है कि इस दिशा में बच्चों के भीतर जागरूकता बढ़ाई जाए।
पोर्नोग्राफी की लत किशोरों के जीवन पर जितना नकारात्मक असर डालती है, उसे लक्षणों के आधार पर पकडऩा उतना ही मुश्किल भी होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अक्सर देखा जाता है कि पोर्नोग्राफी के लती किशोरों में झूठ बोलने, पॉर्न देखने की आदत छिपाने और ब्राउजिंग हिस्ट्री मिटाने की कोशिश होती है। इसके बावजूद लती किशोरों में कुछ मनोवैज्ञानिक लक्षण पहचाने जा सकते हैं। पोर्नोग्राफी के लती किशोरों से इस बारे में पूछे जाने पर आमतौर पर उनमें चिड़चिड़ापन और गुस्सा देखने को मिलता है। डॉ। पुराइल बताते हैं कि पॉर्न देखने की मनाही पर प्रभावित किशोर आक्रामक या उदासीन हो सकता है। कुछ टीनएजर्स अपना मूड बदलने या तनाव कम करने के लिए पॉर्न देखते हैं। लती होने के बाद उनमें पॉर्न देखने की तीव्र इच्छा होने लगती है।
-अमरेन्द्र पांडेय
बीएचयू में भर्ती पद्मश्री डॉ. टी.के.लाहिड़ी के प्रति क्यों है इतना प्रेम। कैसे प्रधानमंत्री और कुलपति को भी मिलने से कर दिया था मना-कहा कि मैं मरीजों से सिर्फ ओपीडी में मिलता हूं, 20-25 की थाली किसी छोटे से होटल में खाते हैं, आइए आज सब कुछ पढ़ें।
त्याग, तपस्या और सेवा का दुर्लभ उदाहरण।आचरण, सादगी, प्रतिबद्धता और मानव सेवा से चिकित्सा पेशे को गौरवान्वित किया है, तो वह नाम है पद्मश्री प्रो. डॉ. तपन कुमार लाहिड़ी (टी.के. लाहिड़ी)। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के विख्यात कार्डियोथोरेसिक सर्जन और लाखों मरीजों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं।
वाराणसी की जनता उन्हें ‘धरती का भगवान’ कहकर पुकारती है। यह उपाधि यूँ ही नहीं मिली। बीएचयू के सामान्य अस्पताल की गलियों में रोज एक परिचित दृश्य नजर आता है, एक हाथ में बैग और दूसरे हाथ में काली छतरी लिए, एक वृद्ध डॉक्टर पैदल चलते हुए अस्पताल की ओर आने वाला।वही साधारण-सा वृद्ध दरअसल दुनिया के ख्यातिप्राप्त कार्डियोथोरेसिक सर्जन-डॉ. टी.के. लाहिड़ी होते हैं।
साल 1994 से उन्होंने अपनी पूरी तनख्वाह गरीब मरीजों की मदद के लिए समर्पित कर दी। 2003 में सेवानिवृत्ति के बाद भी यह क्रम नहीं टूटा वे आज भी उतनी ही पेंशन अपने पास रखते हैं, जिससे उनका साधारण जीवन चल सके। बाकी पूरी राशि बीएचयू के गरीब मरीज सहायता कोष में जमा कर दी जाती है।
उन्होंने अपने भविष्य निधि (पीएफ) तक का पैसा विश्वविद्यालय को दान कर दिया-ताकि किसी गरीब की जान बच सके। 35 वर्ष की सेवा, सैकड़ों डॉक्टर तैयार, पर खुद के लिए एक वाहन तक नहीं। 1974 में बीएचयू में मात्र 250 रुपये मासिक वेतन पर लेक्चरर नियुक्त हुए।
जिनके शिष्य आज देश-विदेश के बड़े अस्पतालों का नेतृत्व कर रहे हैं, उसी शिक्षक ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी एक कार तक नहीं खरीदी। आज भी वे पैदल ही अस्पताल जाते थे-गर्मी, सर्दी या बारिश, मौसम कोई भी हो।
उनकी सादगी जितनी प्रेरणादायक है, उनकी ईमानदारी और सिद्धांतों पर अडिग रहने की क्षमता उतनी ही दुर्लभ। एक बार देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर वाराणसी आए और किसी कारणवश उनसे निजी तौर पर मिलना चाहते थे।
-पुष्य मित्र का लिखा
चचेरे-ममेरे भाई बहनों के बीच प्रेम या विवाह उत्तर भारतीय हिंदू समाज की नैतिकता में भले ही फिट नहीं बैठता हो, मगर यह कोई अपराध नहीं अगर बालिग अवस्था में आपसी सहमति से किया गया हो। उसी तरह विवाहेतर प्रेम संबंध भले ही कानूनन ठीक नहीं हो, मगर इस मामले में भी हमें समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया के उस विचार तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए, जिसमें वे कहते हैं कि दो बालिग स्त्री पुरुष बंद कमरे में आपसी सहमति से जो कुछ करते हैं, उसमें कुछ अनैतिक नहीं है। इन दोनों मामलों में मूल बात आपसी सहमति और प्रेम है।
इसलिए सांसद निशिकांत दुबे के विवाह पर भी सवाल नहीं उठने चाहिए और नेहरू-एडविना प्रेम संबंधों पर भी। हमारे देश में तो अटल बिहारी वाजपेयी और मिसेज कौल के प्रेम संबंध की बेहतरीन मिसाल है। वह संबंध मुझे हमेशा अच्छा लगा।
हां, नेहरू-एडविना के प्रेम संबंधों पर सवाल तब उठ सकते हैं, जब इस संबंध का लाभ ब्रिटिश पक्ष या पाकिस्तान को हुआ हो, भारतीय हितों की बलि दी गई हो।
इन दिनों मैं न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार डीक्लान वाल्स की किताब द नाइन लाइव्स ऑफ पाकिस्तान पढ़ रहा हूं। इस किताब के हिसाब से पाकिस्तान के लोग मानते हैं कि नेहरू-एडविना प्रेम संबंध का लाभ भारत को हुआ। इसी वजह से पंजाब और बंगाल प्रांत आधा-आधा बंटा। नहीं तो वाजिबन दोनों राज्य पूरे के पूरे पाकिस्तान को मिलने चाहिए थे।
उस वक्त माउंटबेटन के प्रेस अटैची एलन कैम्पबेल और एडविना की बेटी पामेला ने जो लिखा है, उस लिहाज से सच यह है कि माउंटबेटन और नेहरू पहली ही मुलाकात से एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। इसी मुलाकात में भावुक होकर माउंटबेटन ने नेहरू से कह दिया था कि वे उन्हें आखिरी ब्रिटिश वायसराय के रूप में न देखकर नये भारत के पहले वायसराय के रूप में देखें। जवाब में नेहरू ने कहा, अब समझा लोग आपको इतना खतरनाक क्यों कहते हैं?
जबकि जिन्ना से मिलकर माउंटबेटन की राय अच्छी नहीं बनी। मिलकर उन्होंने प्रतिक्रिया दी, ‘वह तो बर्फ से भी ज्यादा ठंडे हैं, आधा वक्त तो उनको पिघलाने में गुजर जाता है।’ जिन्ना के बारे में ऐसी राय कई लोगों की थी। उनकी एक महिला मित्र तो मजाक में कहती थीं, ‘वे इतने ठंडे हैं कि मुझे उनके पास शॉल ओढक़र बैठना पड़ता है।’ आगे भी जिन्ना से माउंटबेटन की बातचीत हमेशा तनावपूर्ण माहौल में टकराव भरी ही रही। निश्चित तौर पर इस वजह से माउंटबेटन भारत के पक्षधर बने रहे और आजादी के बाद भी लंबे अरसे तक भारत में रहे। माउंटबेटन और एडविना दोनों के संबंध नेहरू से बहुत सहज और मित्रवत थे।
-अमिता नीरव
वो ग्लोबलाइजेशन के शुरुआती परिणामों के चमकीले साल थे। मीडिया में समाज के समृद्ध होने के किस्से तैरने लगे थे। ये बताते हुए माता-पिता खुश हुआ करते थे कि उन्हें रिटायरमेंट के समय जितना पीएफ मिला, उतना उनके बेटे की पहली नौकरी का एनुअल पैकेज है।
उन्हीं दिनों एक स्टोरी पढ़ी कि 30 से 35 साल की उम्र के प्रोफेशनल्स अपने करियर के पीक पर अध्यात्म की तरफ मुड़ गए। उनमें से एक दो तो शायद हिमालय में भटक रहे हैं। जाहिर है जिन भौतिक सुविधाओं को उनके माता-पिता रिटायरमेंट के बाद हासिल कर पाए उन्होंने तीस की उम्र तक आते आते पा लिया।
एक कार और एक घर... बस यही तो मध्यमवर्गीय परिवारों का सपना हुआ करता था। इसे हासिल कर लिया तो अब किस सपने का पीछा कर जिंदगी में लक्ष्य तय किया जाए? जब पाने को कुछ न बचा हो तो फिर दौड़ किस तरफ होगी? तब तक की समझ ये थी कि एक उम्र के बाद ही अध्यात्म की तरफ रुझान बढ़ता है।
उस वक्त पहली बार एक विचार आया कि समृद्धि के शिखर से एक रास्ता विरक्ति की तरफ और दूसरा विकृति की तरफ जाता है। तब पहली बार लगा कि समृद्धि से एक रास्ता विरक्ति की तरफ भी जा सकता है। क्योंकि इससे पहले अमीरों की अय्याशी के कई उदाहरण समाज में मौजूद थे।
कुछ सालों बाद एक स्टोरी और पढ़ी। पुणे, बेंगलुरु जैसे द्बह्ल हब में युवाओं में नशे का चलन बढ़ गया है। शराब से आगे अब ड्रग्स को उस वर्ग में मान्यता हासिल हो चली है और पार्टियों में इसका चलन बढ़ गया है। इन्हीं दिनों रेव पार्टी के बारे में भी सुना। तरह-तरह की पिल्स और पाउडर का खुलेआम उल्लेख था।
जब बिग बॉस का पहला सीजन आया तो लगा ये दूसरी तरह के रियलिटी शो की तरह का ही एक और शो होगा। फिर उसकी खबरें आने लगीं, उसके विवाद मीडिया में जगह पाने लगे। एक-के-बाद-एक उसके सीजन में कंटेस्टेंट के तौर पर उस वक्त के विवादास्पद लोग आने लगे। चकित हुई कि वो लोग भी उसे देखते हैं, जो अन्यथा बौद्धिक समझे जा सकते हैं।
ओटीटी की शुरुआत में जो सीरीज बहुत लोकप्रिय हुई, जिन पर सोशल मीडिया पर पोस्ट बनती, मीम बनते और जिसके डायलॉग मशहूर हुए, उन्हें देखने पर उबकाई आने लगी थी। इतनी गालियाँ, अश्लीलता, हिंसा और सेक्स सीन कि दिमाग चकराने लगा। उस पर तुर्रा ये कि उन सीरीज पर मध्यमवर्गीय तबके में सहज चर्चा हो रही है। इस बीच जानबूझकर विवाद पैदा करना और मीडिया में जगह पा लेने की ट्रिक से कई लोग रातों रात स्टार बन गए। कई लोगों ने इस ट्रिक को अपनाया और अब भी अपना रहे हैं। कभी मुस्तफा खाँ शेफ्ता का यह शेर ‘हम तालिब-ए-शोहरत हैं, हमें नंग से क्या काम बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा!’, को बस हँसी-मजाक में इस्तेमाल किया जाता था, अब उसे अमल में भी लाया जाने लगा।
हमारे महाप्रभु के उदय ने समाज में बेहूदगी, अभद्रता और चरित्र हनन को लीगलाइज किया और समाज में इन सारी चीजों को स्वीकार्यता मिली। कभी इस माँग के बारे में पढ़ा था कि भ्रष्टाचार को लीगल कर दिया जाना चाहिए। इसके पीछे का तर्क भी बड़ा सुंदर था, ऐसा करने से भ्रष्टाचार में कमी होगी?
उदारीकरण के बाद जिस तेजी से हमारे समाज में पैसे का प्रवाह हुआ और फिर जिस तरह से उसका केंद्रीयकरण होने लगा उसने हमारे सामाजिक मूल्यों को भी एडवर्सली प्रभावित किया। जीवन के हर क्षेत्र में बेहूदगी, तुरत-फुरत प्रसिद्धि के लिए अपनाए जाने वाले उल्टे-सीधे रास्ते और नैतिक-अनैतिक, वैधानिक-अवैधानिक तरीके से पाई जाने वाली सफलता को लेकर समाज में निषेध दिखाई देना बंद हो गया।
-हाफीज किदवई
क्या इस फाइल में नाम आने भर से आप यौन अपराधी बन जाते हैं, नही मगर आप संदिग्ध जरूर हो जाते हैं। यह नाबालिग बच्चियों के साथ यौन अपराध ही नहीं, बल्कि दुनिया भर की डील की भी कलाई खोलती हैं। कैसे बड़े बड़े राष्ट्राध्यक्ष अपने मतलब की डील व्यापारियों से करते,उसके बदले क्या लेते, क्या देते और कैसे चारा बनती कम उम्र की लड़कियां। यह फाइल हमारे दौर के सबसे घिनौने दस्तावेज में से एक है।
एपस्टीन फ़ाइल का इंतेज़ार तो सबको था। लाख के करीब तस्वीरों में से अभी सौ भी बाहर नही आई हैं कि दुनिया में हलचल मच गई थी। अब तो लाखों दस्तावेज़ ईमेल बाहर आ रहे हैं। कितने ही शराफत के पर्दे उतर रहे हैं। इसमें नाम भर आ जाना आपको घिनौनेपन के सन्दिग्ध पिंजड़े की तरफ ढकेल देगा। हो सकता है कि यह नाम गुनहगार न हों मगर धुआं तो वहीं होगा,जहां आग होगी । सब कुछ जब तक स्पष्ट नहीं हों जाता,क्लीनचिट के सर्टिफिकेट भी नही बाटे जा सकते। जेफरी एपस्टीन के साथ किया गया संवाद,कालिख़ पोतने के लिए काफी है।
जेफरी एपस्टीन एक ऐसा अपराधी जिसका होना कथित सभ्य, अमीर, अरबपति, नेता, लेखक, विचारकों के बुरे कामों पर पर्दा था। मगर यह पर्दा उतरा कैसेअगर यह जानिएगा, तो समझियेगा की पत्रकारिता क्या चीज़ होती है।
आज दुनिया को पत्रकार जूली के ब्राउन का शुक्रिया कहना चाहिए, जिन्होंने मियामी हेराल्ड में एपस्टीन के अपराध को खोजी पत्रकारिता की सिलसिलेवार सीरीज में प्रकाशित किया। जिसके सामने व्हाइट हाउस को झुकना पड़ा और दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति को हस्ताक्षर करने पड़े, जो एपस्टीन फाइल को दबाए बैठे थे।
जूली के ब्राउन ने अपने सिलसिलेवार कॉलम को किताब की शक्ल में भी सामने रखा। उनकी रिपोर्ट पर बातें हुईं,कोर्ट ने वह दरवाज़ा खोलने का आदेश दिया, जिसके पीछे अथाह स्याही पड़ी है।
जेफरी एपस्टीन वह हैवान था,जो नाबालिग उम्र की लड़कियों को फंसाकर यौन अपराध में उन्हें ढकेलता था। उसके कस्टमर थे दुनिया के रईस व्यापारी,उद्योगपति, नेता,अभिनेता वगैरह। यह बच्चियों को नोचते थे। यह इतने घिनौने हैं कि इन्हें कोई नजदीक न बैठाए मगर इनके पैसों की ताकत के सामने सब चुप रहेंगे।
एपस्टीन फाइल में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण करने वालों की तस्वीरें हैं। एक पत्रकार ने किस मुश्किल से यह काम अंजाम दिया होगा। जबकि ख़ुद जेफरी एपस्टीन जेल में ही सन 2019 में सन्दिग्ध अवस्था में मरा हुआ मिला। मगर जुली के ब्राउन ने हिम्मत नहीं हारी और न ही मियामी हेराल्ड ने, दोनों ने उनको भी बेनकाब करने की कोशिश करी, जो बच्चियों को अपने पैसे या किसी डील की एवज में मांगते थे।
एपस्टीन फाइल उन अदालतों में दर्ज दस्तावेज़ों, गवाहियों, ई-मेल, फ्लाइट लॉग्स और बयानों का सामूहिक नाम है, जो अमेरिकी अरबपति जेफ्री एपस्टीन के यौन शोषण और से क्स ट्रैफिकिंग नेटवर्क से जुड़े हैं। इस पूरे मामले को दुनिया के सामने लाने में सबसे अहम भूमिका निभाई मियामी हेराल्ड और उसकी खोजी पत्रकार जूली के. ब्राउन ने.
2018 में जूली के. ब्राउन की जाँच रिपोर्ट ‘क्कद्गह्म्1द्गह्म्ह्यद्बशठ्ठ शद्घ छ्वह्वह्यह्लद्बष्द्ग’ ने यह उजागर किया कि कैसे एपस्टीन को 2008 में बेहद हल्की सज़ा दी गई थी और कैसे अभियोजन एजेंसियों ने पीडि़त लड़कियों को अनदेखा किया। इसी रिपोर्ट के बाद अमेरिकी न्याय व्यवस्था पर दबाव बढ़ा और मामला दोबारा खुला। यही वह मोड़ था, जहाँ से एपस्टीन फ़ाइलें सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनीं।
दरअसल, सालों तक एपस्टीन से जुड़े कई दस्तावेज अदालतों में सीलबंद रखे गए थे। मियामी हेराल्ड और पीडि़तों के वकीलों ने अदालत में याचिकाएँ दायर कर यह सवाल उठाया कि न्याय के नाम पर सच्चाई को क्यों छिपाया जा रहा है। इसी दबाव के चलते 2023-24 में अमेरिकी अदालतों ने कई दस्तावेज सार्वजनिक करने का आदेश दिया। इन्हीं को आज ‘एप्सटीन फाइल’ कहा जाता है।
इन फाइलों में राजनेताओं, उद्योगपतियों, शिक्षाविदों और प्रभावशाली हस्तियों के नाम सामने आए। हालांकि, जैसा कि मियामी हेराल्ड ने बार-बार जोर देकर लिखा किसी फ़ाइल में नाम आना, अपराध साबित होना नहीं है। लेकिन यह ज़रूर दिखाता है कि सत्ता और पैसे के गलियारों में एपस्टीन की पहुँच कितनी गहरी थी।
-डॉ. परिवेश मिश्रा
ठीक एक साल पहले एक तीस वर्षीय महिला रेल इंजन ड्राइवर (नाम परिवर्तन से पद के महिमामंडन के इस युग में उन्हें लोको पायलट कहा जाता है) महारानी कुमारी की मृत्यु हो गयी थी। वे अपनी मालगाड़ी बीच की पटरी पर खड़ी कर मालदा स्टेशन के टॉयलेट में अपने नित्य कर्म से फ़ारिग होने के बाद पटरियाँ पार कर इंजन की ओर लौट रही थीं कि एक दूसरी ट्रेन उनके शरीर के चीथड़े करते हुए ऊपर से गुजऱ गई।
भारत में आने के एक सौ सत्तर साल बाद इंजन ड्राइवर को अब तक इंजन में टॉयलेट नहीं मिला है। सरकार के लिए इस तथ्य की स्वीकारोक्ति का मुद्दा हमेशा असुविधाजनक रहा है। इंजन में टॉयलेट न होने और इससे उत्पन्न परेशानियों वाली बातों पर हमेशा ढक्कन लगाने का प्रयास किया गया। रेल श्रमिक संगठनों की मांगों में यह मुद्दा सदा शामिल रहने के बावजूद कभी प्रचार नहीं पा सका।
जब तक इंजन भाप से चलाये जाते थे ड्राइवरों के लिए काम की स्थिति कहीं अधिक कष्टदायक थी। एक ओर भ_ी की आग दूसरी ओर दो पड़ावों के बीच टॉयलेट की ज़रूरत को टालने के लिये पानी कम पीने की ओढ़ी गई आदत।
1985 के आसपास भारतीय रेल से भाप वाले इंजनों की बिदाई हो गयी। डीज़ल और बिजली के इंजन आ गए। ये इंजन बाहर से देखने पर आधुनिक और ख़ूबसूरत दिखते हैं। किन्तु टॉयलेट अब भी नहीं मिला। पहले की अपेक्षा रेलगाडिय़ों अधिक तेज और अधिक दूरी तक चलती हैं। दो स्टेशनों के बीच के सफऱ की न केवल अवधि बढ़ी है, स्टेशनों में ठहराव का समय भी कम हुआ है। रेलगाड़ी के समय पर चलने का दबाव बढ़ा है। विशेषकर मालगाडिय़ों पर। ऐसे अनेक अवसर आ चुके हैं जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाने पर ड्राइवर ने गाड़ी को बीच राह, बीच पटरी रोका, ब्रेक लगाया, डेटोनेटर फि़ट किया, गार्ड को चेताया और फ़ारिग होने चले गये। डेटोनेटर बड़े पटाखे या बम की आवाज़ करने वाले बारूद जैसी चीज़ होती है जिसे चमड़े के पट्टे की मदद से पटरी पर बाँधा जाता है। आमतौर पर ट्रैक पर खड़ी ट्रेन की दोनों दिशाओं में कुछ दूरी पर। इस उम्मीद पर कि अचानक आने वाली किसी ट्रेन का पहिया जैसे ही इस पर पड़ेगा, उसके वजन से फटने वाला यह डेटोनेटर अपनी तेज आवाज़ से ड्राइवर को चेतावनी देगा।
ड्राइवरों के फ़ारिग होने की ऐसी तरकीबें ट्रेनों के विलंब का कारण और एक्सीडेंट का खतरा बनती रही हैं। ऐसे मामलों की जांच का प्रावधान है सो डिविजऩ स्तर पर विलम्ब के कारणों की जांच भी होती हैं। किंतु अब तक की ऐसी सभी जांच रिपोर्टों में देरी को ‘मानवीय कारणों से’ करार दिया जा कर मामलों को रफा-दफा किया गया है। एक जांच रिपोर्ट में लिखा गया-‘यह ठहराव किसी परिचालन लापरवाही के कारण नहीं था, बल्कि स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में अत्यधिक लंबी ड्यूटी अवधि के दौरान उत्पन्न हुई अपरिहार्य मानवीय आवश्यकता के कारण हुआ।’
वंदे भारत युग से लगभग सौ साल पहले - सन 1928 के सितम्बर में - भारत में एक ट्रेन चली थी। फ्ऱंटियर मेल। बम्बई से दिल्ली, लाहौर और रावलपिंडी होते हुए पेशावर तक। लगभग अड़तालीस घंटों का सफर एक तरफ का होता था। 1930 में लंदन से प्रकाशित होने वाले ‘द टाइम्स’ ने फ्ऱंटियर मेल को ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे तेज़ रेलगाड़ी बताया था। यह भारत की पहली ट्रेन है जिसमें ‘एयर कंडीशंड’ डिब्बे लगाए गए थे। हालाँकि तकनीकी रूप से यह एयर कूलिंग ही थी। बफऱ् की सिल्लियां कोच में रखी जाती थीं।
नॉर्मा प्रोबर्ट उस महिला का नाम था जिनके पिता पर्सीवल मिडिलकोट उस शुरुआती दौर में फ्ऱंटियर मेल में इंजन ड्राइवर थे। नॉर्मा प्रोबर्ट इंग्लैण्ड में बस गई थीं और वहीं उनकी मृत्यु हुई। भारत में राजेन्द्र अकलेकर ने जब भारतीय रेल पर पुस्तक ‘हॉल्ट स्टेशन इंडिया’ लिखी तो नॉर्मा प्रोबर्ट का पत्राचार के द्वारा इंटरव्यू लिया और उनके बचपन के साथ साथ ट्रेन तथा ड्राइवर पिता के बारे में जानकारी ली।
फ्ऱंटियर मेल में अधिकांश पैसेंजर रास्ते में पडऩे वाले स्टेशनों के अलावा ख़ैबर दर्रे से/तक इंग्लैंड जाने और इंग्लैण्ड से आने वाले ब्रिटिश फ़ौज के सैनिक और अधिकारी होते थे। इनके अलावा आम नागरिक भी।
इंजन ड्राइवरों के साथ एक असिस्टेंट होता था जो स्टेशन पर गाड़ी के खड़े होने के दौरान प्लेटफार्म पर भाग-दौड़ कर आवश्यक सामान लाना, संदेश लाना/पहुँचाना जैसे कार्य करता था। सौ साल पहले की वह रेल समय पर अपने स्टेशन पर पहुँचने के मामले में घड़ी की सुई की तरह पाबंद थी। ड्राइवर के लिए इंजन में टॉयलेट तब भी नहीं थे। आवश्यकता पडऩे पर दो स्टेशनों के बीच ड्राइवर साथ के सवारी कोच के टॉयलेट का इस्तेमाल करते थे। और टॉयलेट की कमी कभी रेल के विलंब से चलने का कारण नहीं बन पाती थी।
भारत और अमेरिका के बीच सोमवार को जिस ट्रेड डील की घोषणा डोनाल्ड ट्रंप ने की उसे लेकर बहस हो रही है कि यह किसके पक्ष में ज़्यादा झुकी हुई है.
ट्रंप ने भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाया था, जिसे अब घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका स्वागत किया है. 50 प्रतिशत की तुलना में 18 प्रतिशत टैरिफ़ भले कम लग रहा है लेकिन कई विश्लेषक ट्रंप के पहले वाले टैरिफ़ का हवाला देते हुए 18 प्रतिशत को भी बहुत ज़्यादा बता रहे हैं.
2012 से 2014 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कम्युनिकेशन एडवाइजर रहे पंकज पचौरी ने एक्स पर लिखा है, ''अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान 2004 तक भारत पर औसत अमेरिकी टैरिफ़ 3.31% थे.''
''यही टैरिफ़ उस समय भी लागू था, जब भारत के परमाणु कार्यक्रम के बाद प्रतिबंध लगाए गए थे. 2014 तक मनमोहन सिंह के अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद औसत टैरिफ़ घटकर 2.93% रह गए. अब हम 18% टैरिफ़ का जश्न मना रहे हैं.''
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू सहायकों को न्यूनतम वेतन देने की याचिका पर कहा कि इससे हर घर कानूनी विवाद में फंसेगा. अदालत ने माना कि शोषण होता है, लेकिन इसके समाधान के और तरीके मौजूद हैं.
डॉयचे वैले पर शिवांगी सक्सेना का लिखा-
शोभा कुमारी (बदला हुआ नाम) काम की तलाश में दस साल पहले बिहार के मुजफ्फरपुर से दिल्ली आई थीं. तब से वह अपने पति के साथ शाहबाद डेरी की एक बस्ती में रह रही हैं. पिछले साल जिस घर में शोभा काम करती थीं, वहां के मालिक ने उन पर चोरी का झूठा आरोप लगा दिया. शोभा को अपमानित किया गया और उनके साथ मारपीट भी की गई. पुलिस ने शोभा को दो दिन तक थाने में बैठाकर रखा.
शोभा के पति, जो ई-रिक्शा चलाते हैं, दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन के लोगों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचे. यूनियन के हस्तक्षेप के बाद ही पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की जांच की. फुटेज देखकर पता चला कि पैसे की चोरी मालिक के बेटे ने ही की थी.
डीडब्ल्यू ने शोभा से बात की. उस घटना के बारे में वह बताती हैं, "उन्होंने मुझे धक्का दिया और गंदे शब्द कहे. मेरा मोबाइल छीन लिया और पुलिस के आने तक मुझे घर में बंद करके रखा."
शोभा दिल्ली के कई घरों में खाना पकाने, सफाई और कपड़े धोने का काम करती हैं. सुबह सात से शाम सात बजे तक काम करने पर उन्हें महीने का दस हजार रूपए मिलता है. उनकी बुजुर्ग मां भी घरों में काम करने के लिए जाती हैं.
पिछले साल 29 जनवरी को घरेलू कामगारों के लिए अलग कानून की आवश्यकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति का गठन किया था. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि घरेलू कामगारों को पहले से ही देश के चार नए लेबर कोड में शामिल किया गया है. साथ ही उन्हें सरकार की बीमा योजना, आरोग्य योजना, आत्मनिर्भर योजना और ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड' जैसी सरकारी सुविधाओं का भी लाभ मिलता है.
ठीक एक साल बाद 29 जनवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु आधारित घरेलू कामगार संगठन, पेन थोजिलालार्गल संघम की याचिका पर सुनवाई की. उन्होंने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन और कानूनी सुरक्षा की फिर से मांग उठाई. इस पर न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ऐसा किया गया, तो घरेलू श्रम की मांग घट सकती है. मध्यम वर्ग के घरों के लिए घरेलू कामगार रखना महंगा और मुश्किल हो जाएगा. साथ ही उन्होंने कहा कि ट्रेड यूनियनों की वजह से कई बार उद्योगों का विकास रुक जाता है और और उन्हें बंद करना पड़ता है.
ऐसे में घरेलू कामगारों की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल बने हुए हैं.
घरेलू काम को कानूनी दर्जा नहीं
सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 2.9 करोड़ पंजीकृत घरेलू कामगार हैं. इनमे 96 प्रतिशत महिलाएं हैं. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने 2011 में पहली बार घरेलू काम को श्रम के रूप में मान्यता दी थी. भारत में घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए कई बार बिल लाए गए. लेकिन आज तक कोई भी कानून की शक्ल नहीं ले सका.
शोधकर्ताओं और ट्रेड यूनियनों का कहना है कि घरेलू काम को अब भी महिलाओं की प्राकृतिक जिम्मेदारी या घरेलू कर्तव्य का विस्तार माना जाता है. इसे प्रोडक्टिव काम की तरह नहीं गिना जाता. आईएलओ के अनुसार घरेलू काम और बिना वेतन किए जाने वाली देखभाल वैश्विक जीडीपी का लगभग 9 प्रतिशत है (लगभग 11 खरब अमेरिकी डॉलर), जिसमें महिलाओं का योगदान लगभग 6.6 प्रतिशत है.
मार्था फैरेल फॉउंडेशन के साथ जुड़े पियूष पोद्दार बताते हैं कि अधिकतर घरेलू कामगार प्रवासी हैं. इसलिए उन्हें वोट बैंक नहीं समझा जाता और उनकी समस्याओं को राजनीतिक ध्यान कम मिलता है. सरकार घरों को कानून की निगरानी में लाने का प्रयास नहीं करना चाहती क्योंकि इससे मध्यम वर्ग और मालिकों को असंतुष्ट करने का डर रहता है.
अलग कानून की जरुरत क्यों?
घरेलू कामगार असंगठित क्षेत्र के सबसे आखिर में खड़े हैं. मालिक का घर ही उनका कार्यस्थल है. उनके काम के घंटे तय नहीं होते. कानूनी सुरक्षा की कमी के कारण महिलाओं और बच्चों का गंभीर शोषण किया जाता है. घरों में उन्हें टॉयलेट, भोजन और सोने की जगह भी नहीं दी जाती. डीडब्ल्यू से बात करते हुए शोभा बताती हैं, "मैं हफ्ते में सातों दिन काम करती हूं. कभी-कभी अगर घर पर मेहमान आए या फंक्शन हुआ तो खाना बनाना और बच्चे को संभालने जैसा एक्स्ट्रा काम भी रहता है. इसके लिए मुझे अतिरिक्त कोई पैसा नहीं मिलता."
घरेलू कामगारों को अक्सर एजेंट भी परेशान करते है. नाम न बताने की शर्त पर एक एजेंसी के मालिक ने बताया, "अक्सर इन महिलाओं और लड़कियों को तय पैसों से कम तनख्वाह मिलती है. कामगारों के खाने के पैसे काट लिए जाते हैं. बोनस और छुट्टी नहीं मिलती. ज्यादा देर तक काम कराया जाता है. उन्हें एजेंट को भी रजिस्ट्रेशन फीस और प्लेसमेंट चार्ज देना होता है. जो उनकी दो या तीन महीने की कमाई के बराबर है."
इस शोषण या उत्पीड़न की शिकायतों के लिए कोई प्रभावी तंत्र मौजूद नहीं है. इन कामगारों के पास कोई लिखित कॉन्ट्रेक्ट नहीं होता. नौरीन सबा दिल्ली घरेलू कामगार यूनियन का काम देखती हैं. वह बताती हैं कि सरकार जिन बीमा, पेंशन और अन्य योजनाओं की बात कर रही है, वे कोई कानून नहीं हैं. ये योजनाएं एक निश्चित समय के लिए होती हैं. सरकार बदलने के साथ योजनाओं के नाम और स्वरूप भी बदल जाते हैं. वह डीडब्ल्यू से कहती हैं, "ये महिलाएं गरीब और वंचित समाज से आती हैं. लोग इनकी गरीबी का फायदा उठाकर कम पैसा देते हैं. दिल्ली में 12 घंटा काम के लिए केवल दस हजार रूपए मिल रहे हैं."
पियूष पोद्दार बताते हैं कि कानून या लेबर कोड फैक्ट्री, कार्यालय, दुकान या अन्य औपचारिक प्रतिष्ठानों पर लागू होते हैं. जबकि घरेलू कामगारों के काम की प्रवृत्ति अलग है. यहां मजदूर और मालिक जैसा कोई रिश्ता नहीं होता है. भारत में केवल पॉश कानून (2013) ही घर को कार्यस्थल के रूप में मान्यता देता है. पियूष कहते हैं, "सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अलावा घरेलू कामगारों को किसी लेबर कोड में जगह नहीं दी गई है. जब तक केयर वर्क को हमारी अर्थव्यवस्था का अंग नहीं माना जाता, तब तक घरेलू कामगारों को श्रम अधिकारों से वंचित रखा जाएगा."
नौरीन एक अहम बात करती हैं. स्नेबिट और बुक माय बाई जैसी ऐप-आधारित सेवाएं जरुरत के अनुसार तुरंत घरेलु कामगार उपलब्ध कराने का दावा करते हैं. पैसा पहले से तय होता है. एप के जरिए कोई भी तुरंत बुकिंग और पेमेंट कर सकता है. नौरीन का कहना है कि इन एप्स पर कम रेटिंग देने और 'ब्लैकलिस्टेड मेड्स' का विकल्प ग्राहकों के पास होता है. वह कहती हैं, "घरेलू कामगार को ग्राहक की कोई जानकारी नहीं होती. ग्राहक अगर आरोप लगाए तो बिना जांच और जवाबदेही के एक्शन कामगार पर लिया जाता है. जबकि कामगार शिकायत नहीं कर सकती.”
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घरेलू कामगारों को पहचान देने वाला तंत्र बेहाल
भारत सरकार ने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की पहचान, पंजीकरण और सामाजिक सुरक्षा के उद्देश्य से साल 2021 में ई-श्रम पोर्टल शुरू किया. यह केवल योजनाओं से जोड़ने का माध्यम है. लेकिन घरेलू कामगारों में न तो पर्याप्त जागरूकता है और न ही सीधी पहुंच. डोमेस्टिक वर्कर राइट्स यूनियन की ज्वाइंट सेक्रेटरी गीता मेनन ने डीडब्ल्यू को बताया कि ई-श्रम कार्ड के लिए कामगार यूनियनों और गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर निर्भर है, जो पंजीकरण शिविर आयोजित करते हैं.
गीता मेनन ने कर्नाटक सरकार के साथ मिलकर घरेलू कामगारों के लिए बनाए गए ड्राफ्ट बिल पर काम किया है. वह बताती हैं, "पोर्टल के माध्यम से स्वयं ऑनलाइन पंजीकरण करना अधिकांश कामगारों के लिए बेहद कठिन है. इस प्रक्रिया में उनसे पैसे भी वसूले जा रहे हैं. कर्नाटक में घरेलू कामगारों के लिए स्मार्ट कार्ड की व्यवस्था है. लेकिन उसके लिए भी रजिस्टर करना आसान नहीं होता. ई-श्रम कार्ड से केवल दुर्घटना बीमा का लाभ मिलता है. यह असंगठित क्षेत्र के सभी श्रमिकों को समान रूप से दिया जाता है."
भारत में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों में घरेलू कामगारों के लिए विशेष प्रावधान हैं. लेकिन कामगारों में इसकी बहुत कम जानकारी है. जितनी अधिक जागरूकता होती है, उतने ही बेहतर तरीके से वे अपनी शर्तों पर मेहनताना तय कर पाते हैं. दक्षिण भारत में यूनियनें अधिक सक्रिय हैं. वे कामगारों को संगठित कर यह सिखाती हैं कि काम के घंटे, कमरों की संख्या, परिवार के सदस्यों और अलग-अलग कामों के हिसाब से मजदूरी कैसे तय की जाए.
-ललित मौर्य
खेतों और घरों के आसपास छिडक़ा जाने वाला एक आम कीटनाशक इंसानी दिमाग को धीरे-धीरे बीमार बना सकता है। एक नए वैज्ञानिकअध्ययन में सामने आया है कि क्लोरपाइरीफॉस के लंबे समय तक संपर्क में रहने से पार्किंसन का खतरा कई गुणा तक बढ़ सकता है।यह अध्ययन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजिल्स (यूसीएलए) से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल मॉलिक्यूलर न्यूरोडीजेनेरेशन में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन न सिर्फ आंकड़ों के जरिए खतरे की पुष्टि करता है, बल्कि प्रयोगशाला में यह भी दिखाता है कि यह कीटनाशक दिमाग की उन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है जो शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं।
पार्किंसन एक धीरे-धीरे बढऩे वाला तंत्रिका संबंधी रोग है, जिसमें हाथ-पैर कांपने लगते हैं, शरीर अकडऩे लगता है और चलने-फिरने में कठिनाई होती है। अकेले अमेरिका में ही करीब 10 लाख लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं।
दुनिया में तेजी से पैर पसार रहा है यह रोग
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल (बीएमजे) में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि अगले 24 वर्षों में पार्किंसंस के मामलों में नाटकीय रूप से बढ़ोतरी हो सकती है। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में ढाई करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से जूझ रहे होंगे। मतलब की यदि 2021 से तुलना करें तो इससे पीडि़त लोगों की संख्या बढक़र दोगुनी से भी अधिक हो जाएगी।
गौरतलब है कि अब तक पार्किंसन को मुख्य रूप से आनुवंशिक बीमारी माना जाता था, लेकिन नए शोध बताते हैं कि पर्यावरण और खासकर कीटनाशक भी इसके बड़े कारण हो सकते हैं। क्लोरपाइरीफॉस दशकों तक खेती में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता रहा है।
अमेरिका में घरों में इसका इस्तेमाल 2001 से बंद हो चुका है, जबकि कृषि में 2021 में इसके उपयोग को सीमित कर दिया गया, लेकिन आज भी कई देशों में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है।
कैसे हुआ अध्ययन?
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पार्किंसन से पीडि़त 829 मरीजों और 824 स्वस्थ लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। कैलिफोर्निया के कीटनाशक उपयोग संबंधी रिकॉर्ड और लोगों के घर-काम के पते देखकर यह आकलन किया गया कि कौन कितने समय तक इस कीटनाशक के संपर्क में रहा।
इसके बाद चूहों और जेब्राफिश पर प्रयोग किए गए। उन्हें उसी तरीके से कीटनाशक के संपर्क में रखा गया, जैसा इंसान आमतौर पर सांस के जरिए झेलता है।
भारत का अमीर वर्ग अब महंगे पानी पर पैसा खर्च करने लगा है. ना सिर्फ देश में मिलने वाले बोतल बंद पानी बल्कि विदेशी कपंनियों के पानी की मांग भी भारत में तेजी से बढ़ रही है.
डॉयचे वैले पर रीतिका का लिखा-
भारत का अमीर वर्ग अब महंगे पानी पर पैसा बहा रहा है. भारत में कुछ लग्जरी फूड स्टोर अब इटली और फ्रांस से महंगे पानी मंगाकर उनका स्वाद चखने के लिए बड़े आयोजन कर रहे हैं. हालांकि, ऐसे आयोजन फिलहाल भारत के अमीर वर्ग से आने वाले लोगों तक ही सीमित हैं. अवंति मेहता जो ऐसे आयोजन करवा रही हैं बताती हैं कि यहां आने वाले लोग पानी के सैंपल के मिनरल, कार्बन और खारेपन की जांच करते हैं. रॉयटर्स की एक खास रिपोर्ट के मुताबिक यहां फ्रांस की पहाड़ियों से एवियां, दक्षिणी फ्रांस से पेरिये, इटली से सैन पेलग्रिनो और भारत की अरावली की पहाड़ियों से आवा जैसे बोतल बंद पानी के ब्रैंड मौजूद होते हैं.
अवंति कहती हैं कि सारी कंपनियों के पानी का स्वाद अलग अलग होता है और लोगों को ऐसा पानी चुनना चाहिए जिससे उन्हें किसी तरह का पोषण हासिल हो. वह खुद को भारत में पानी की सबसे युवा पानी 'सोम्मेलिएर' बताती हैं. यह शब्द अब तक वाइन के स्वाद की परख रखने वाले जानकारों के लिए इस्तेमाल होता था. अवंति का खुद का परिवार भी 'आवा मिनरल' नाम की कंपनी चलाता है.
लग्जरी बनता जा रहा है बोतल बंद पानी
बेहद खास गुणवत्ता वाले पानी का व्यापार आज भारत में 400 मिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है. यहां की बढ़ती आबादी को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह व्यापार और आगे बढ़ेगा. खासकर भारत का अमीर वर्ग अब इसे एक स्टेटस सिंबल के तौर पर भी देखने लगा है. भारत में सबसे महंगे और खास मिनरल वाले एक लीटर बोतल बंद पानी की कीमत 80 से 100 रुपये के बीच है. वहीं, विदेशों से आने वाले पानी की एक बोतल की कीमत 275 रुपये के आसपास है.
1.4 अरब की आबादी वाले देश भारत में पीने का साफ पानी एक विशेषाधिकार बन गया है. शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत का 70 फीसदी भूजल प्रदूषित हो चुका है. नल से आने वाला पानी पीने लायक नहीं है. बीते साल दिसंबर के महीने में ही इंदौर में गंदा पानी पीने से 16 लोगों की मौत हो गई थी. भारत में कई लोग अब बोतल बंद पानी को एक जरूरत मानते हैं. किराना दुकानों में पानी की एक लीटर की बोतल 20 रुपये में मिलती है. पीने के पानी के कारोबार की सालाना कीमत करीब पांच अरब डॉलर है. 24 फीसदी की बढ़त के साथ भारत में यह बाजार दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रहा है.
बोतल बंद पानी का बढ़ता बाजार
30 अरब डॉलर से अधिक के बाजार वाले बोतल बंद पानी की मांग चीन और अमेरिका में सुविधाओं की बुनियाद पर टिकी है. हर साल इस बाजार में यहां चार से पांच फीसदी की बढ़त देखी जा रही है. मार्केट रिसर्च कंपनी यूरोमॉनिटर के मुताबिक भारत में प्रीमियम पानी की मांग बढ़ती जा रही है. 2021 में यह मांग 1 फीसदी थी जो 2025 में बढ़कर 8 फीसदी हो गई.
यूरोमॉनिटर में बतौर सीनियर कंसल्टेंट काम कर रहे अमूल्य पंडित कहते हैं कि नगर निगम से आने वाले पानी पर कम होते भरोसे के कारण बोतल बंद पानी की मांग बढ़ गई है. पंडित बताते हैं, "अब लोगों को समझ आ गया है कि मिनरल वॉटर स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. यह महंगा है लेकिन इसका बाजार और आगे बढ़ने वाला है. भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली 20 रुपये की पानी की बोतल ज्यादातर पेप्सी, कोका कोला और बिसलेरी जैसी कंपनियां बनाती हैं. जो लोग इसका खर्च नहीं उठा सकते वे वॉटर प्यूरिफायर से काम चलाते हैं जो पानी तो साफ करता है लेकिन उसके मिनरल भी हटा देता है."
स्पार्कलिंग और स्प्रिंग वॉटर की मांग
भारत में अब स्टिल वॉटर के साथ साथ स्पार्कलिंग और स्प्रिंग वॉटर की भी मांग में तेजी दिखने लगी है. भारतीय कंपनी टाटा ने खुद स्पार्कलिंग वॉटर का प्लांट शुरू किया है और स्प्रिंग वॉटर के उत्पादन में भी उतरने की सोच रहा है ताकि लोगों को वह और अधिक विकल्प दे सके. खुद आवा कंपनी की सेल भी पिछले साल अपने रिकॉर्ड स्तर 9 मिलियन डॉलर पर जा पहुंची. वहीं, टाटा के मुताबिक उसके पानी के कारोबार की हर साल 30 फीसदी के हिसाब से आगे बढ़ने की संभावना है.
अवंति कहती हैं कि जब आप नल से पानी पीते हैं तो आपको वहां से आवा या एवियां नहीं मिलता और आप इसकी ही कीमत चुकाते हैं. पानी का स्वाद चखने आए कुछ लोग बताते हैं कि उन्हें यह अनुभव तो अच्छा लगा लेकिन पानी की कीमत निगलना उनके लिए थोड़ा मुश्किल रहा.
-अपूर्व गर्ग
छत्तीसगढ़ को अलग प्रदेश बने हुए पच्चीस बरस ज़रूर हो गए पर अब भी छत्तीसगढ़ के इतिहास पर बड़े पैमाने पर रिसर्च और ऐतिहासक तथ्यों की छानबीन होनी चाहिए .
यही नहीं जनता के बीच सही ऐतिहासक तथ्य जाएँ ऐसे भी बड़े प्रयास हों .
सोनाखान के ज़मींदार शहीद क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह पर अब चर्चा होने लगी पर अभी लम्बा सफर तय करना है .
सबसे दुःखद है आज भी शहीदों ,क्रांतिकारियों को लेकर सूचनाएँ और अध्ययन अपर्याप्त है .
कभी कहीं पढ़ने को मिलता है शहीद वीर नारायण को तोप से उड़ा दिया गया था या जयस्तंभ चौक पर फाँसी दी गयी या फांसी के बाद तोप से उड़ा दिया गया . ये बात भी सामने आयी कि उनकी गलत तस्वीर का प्रकाशन हुआ था .
ये भी पढ़ने में आया कि उन्हें तत्कालीन जेल के बाहर फांसी दी गयी थी . तथ्य ये है कि 1857 के दौरान जेल तो घडी चौक के आस-पास थी , अब विचार करिये .
छत्तीसगढ़ के इतिहासकार रमेन्द्रनाथ मिश्र जी ने कहा है :
-रमेंद्रनाथ मिश्र कहते हैं कि शहीद वीर नारायण सिंह को लेकर अविभाजित मध्यप्रदेश में भी जानकारी उपलब्ध कराई गई है. बावजूद उसके डाक विभाग ने सुधार नहीं किया है. शहीद वीर नारायण सिंह को लेकर भारतीय अभिलेखागार में भी तमाम दस्तावेज उपलब्ध हैं. लेकिन इससे पहले के इतिहासकारों ने गलती की है. भारतीय डाक विभाग की ओर से जारी किए गए डाक टिकट में वीर नारायण सिंह की जगह किसी किसान की तस्वीर लगा दी गई है. जिसमें किसान को तोप में जंजीर से बांधकर दिखाया गया है. जबकि वीर नारायण सिंह को लेकर अंग्रेज सरकार की ओर से लिखे गए तमाम पत्र भी मौजूद हैं. इसमें साफ तौर पर उल्लेख है कि वीर नारायण सिंह को सेंट्रल जेल के बाहर क्रांतिकारियों की मौजूदगी में फांसी की सजा दी गई थी.[स्रोत -ETV प्रकाशित रिपोर्ट]
-रमेंद्रनाथ बताते हैं कि शहीद वीर नारायण सिंह को तोप से नहीं उड़ाया गया था. बल्कि उन्हें फांसी दी गई थी. पत्र क्रमांक 286 जो कि 10 दिसंबर 1857 को अंग्रेज अफसरों ने लिखा था, इसमें बताया गया है कि 10 दिसंबर 1857 को वीर नारायण सिंह जो सोनाखान का जमींदार था, उसे सभी अधिकारियों और सेना के सामने फांसी पर लटका दिया. [ स्रोत- ETV प्रकाशित रिपोर्ट ]
अब आता हूँ इसी से जुड़े दूसरे ज़रूरी मुद्दे पर . अंग्रेजों ने 10 दिसंबर 1857 को जब वीर नारायण सिंह को फांसी दी ,उस वक़्त बड़ी संख्या में दूसरे सैनिक भी मौजूद थे . वे डरे नहीं बल्कि उन्होंने इसका बदला लेने की ठानी .
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
‘आज मैं आपको पश्चिम में फैले रेगिस्तान में बने प्राचीनतम पिरामिड को दिखाने ले जा रही हूँ जो सक्कारा में स्थित है।’ हमारी गाइड ने बताया।
सक्कारा नील नदी के पश्चिम में है जो मिस्र की राजधानी काहिरा से लगभग 20 किलोमीटर के दूरी पर है। यहां के पिरामिड का प्रवेश-द्वार चूना-पत्थर से बना हुआ, दस मीटर ऊंचा यह द्वार चिकना और अत्यंत आकर्षक है। अंदर हम घूम-घूम कर उसकी दीवारें देख रहे थे, मोबाइल से तस्वीरें ले रहे थे, तभी एक खूबसूरत लडक़ी हमारे सामने पड़ी। हम लोग एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए। उसने हमसे पूछा- ‘आप कहाँ से आए हैं ?’
‘अरे, आप हिन्दी जानती हैं ? हम लोग भारत से आए हैं।’ मैंने उत्तर दिया और पूछा- 'आप कहाँ से आई हैं ?’
‘हम आपके दुश्मन हैं, पाकिस्तान से हूँ।’ उसकी आवाज़ में थोड़ा तल्खी, थोड़ी मुस्कान और थोड़ी जिज्ञासा थी।
‘अरे, हम आपके दुश्मन कैसे हो गए ? दुश्मन हों हमारे दुश्मन।’ मैंने कहा। मेरी बात सुनकर वह खुश हो गई। उसने चेहरे में प्रसन्नता के अद्भुत भाव उभर गए। वह बोली- ‘सच में ?’
‘हां, सच में। हमारी-तुम्हारी क्या दुश्मनी ?’
‘आप सही कह रहे हैं, हम दोनों में कैसी दुश्मनी ?’
‘तुम्हारा नाम क्या है ?’
‘मेरा नाम इसरा है, मेरे पापा आगरा के हैं और मम्मी सहारनपुर की।’
‘ऐसा क्या ?’
‘हूँ।’ वह खुशी में झूम रही थी।
‘तुम्हारी शादी हो गई क्या ?’
‘अभी नहीं, कुछ दिन और जी लूँ।’
‘अरे, क्या शादी के बाद जि़ंदगी नहीं होती ?’
‘सुना है, जि़ंदगी होती है लेकिन जि़ंदादिली नहीं होती।’ वह बोली।
‘तुम्हारी फोटो ले लूँ ?’ मैंने पूछा।
‘श्योर।’ उसने मुस्कान फेंकी और मिस्र की यात्रा में पहली मिसरी के डली हमारे मुंह में घुल गई।
प्तयह चित्र पाकिस्तानी युवती इसरा का है जो हमें मिस्र में मिली।
- निखिल इनामदार
भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जब इस रविवार को पेश किए जाने वाले सालाना बजट की तैयारी कर रही हैं, उस समय ऊपर से देखने पर देश की अर्थव्यवस्था ठीक-ठाक हालत में दिखती है।
भारत का यह वित्तीय वर्ष 7.3% की आर्थिक वृद्धि के साथ पूरा होने जा रहा है। जीडीपी के मामले में यह चार ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में जापान को पीछे छोडऩे वाला है।
खुदरा महंगाई दो फ़ीसदी से नीचे है और आने वाले महीनों में इसके केंद्रीय बैंक के तय लक्ष्य से नीचे ही रहने की उम्मीद है।
कृषि उत्पादन, जो देश की कऱीब आधी आबादी का सहारा है, मज़बूत रहा है। अनाज का उत्पादन अच्छा हुआ है और सरकारी गोदामों में भरपूर भंडार है, जिससे ग्रामीण आय में उछाल आया है।
पिछले साल की गई इनकम टैक्स में कटौती और उपभोग पर लगने वाले, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को सरल बनाए जाने से भी उपभोक्ता मांग बढ़ी है और खर्च करने को बढ़ावा मिला है।
भारत के केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने तेज विकास और कम महंगाई के इस मेल को ‘गोल्डीलॉक्स’ दौर बताया है- यह शब्द अमेरिकी अर्थशास्त्री डेविड शुलमैन ने गढ़ा था, जो ऐसी अर्थव्यवस्था के बारे में बताता है, जो बिल्कुल सही रफ्तार से बढ़ रही हो और जहां नौकरियों की वृद्धि भी अच्छी हो।
लेकिन ये मज़बूत दिखने वाले आंकड़े कुछ गहरी चुनौतियों को छिपा लेते हैं।
सरकार का कहना है कि बेरोजगारी घट रही है, फिर भी अस्थिर गिग जॉब्स की मांग ऊंची बनी हुई है।
भारत की पांच सबसे बड़ी आईटी कंपनियां, जो दशकों तक हर तिमाही हजारों नौकरियां दिया करती थीं, ने 2025 के पहले नौ महीनों में कुल मिलाकर सिर्फ 17 कर्मचारियों की बढ़ोतरी की। ये श्रम बाज़ार की कमज़ोरी के साफ संकेत हैं।
1990 के दशक से भारत के मध्यम वर्ग को जन्म देने वाले सॉफ़्टवेयर सेक्टर में भर्ती पर लगी रोक देश की विशाल बैक ऑफिस अर्थव्यवस्था में एआई की वजह से बढ़ती बाधाओं को उजागर करती है।
व्हाइट कॉलर नौकरियों में आई सुस्ती के साथ-साथ, भारत के श्रम प्रधान निर्यात उद्योगों में जारी संकट भी बना हुआ है। भारत ने 2026 में प्रवेश ट्रंप के 50' टैरिफ़ की लंबी छाया के साथ किया है, एक ऐसा गतिरोध जो उम्मीद से कहीं ज़्यादा समय तक चल गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने व्यापार में विविधता लाने के लिए तेजी दिखाई है और एक के बाद एक मुक्त व्यापार समझौते या एफटीए किए हैं, जिनमें सबसे हालिया समझौता इसी हफ्ते यूरोपीय संघ के साथ हुआ, लेकिन निर्यात पर पडऩे वाला दबाव अब साफ दिखने लगा है।
एचएसबीसी रिसर्च के मुताबिक, ‘50% अमेरिकी टैरिफ लागू होने के बाद अमेरिका को होने वाला निर्यात लगातार कमज़ोर होता गया है जबकि दुनिया के बाकी हिस्सों में इसमें सिर्फ मामूली बढ़त दिखी है।’
विश्लेषकों का कहना है कि एफटीए लंबे समय में मदद करेंगे लेकिन गैर अमेरिकी बाज़ारों में भारत वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से मुक़ाबला कर पाएगा या नहीं, यह कई दूसरी बातों पर निर्भर करेगा-जैसे गुणवत्ता, कीमत और पैमाना।
सोने और चांदी की क़ीमतों में लगातार जाती बढ़ोतरी शुक्रवार को बड़ी गिरावट के साथ थमी.
30 जनवरी को सोने की क़ीमत में 12 प्रतिशत और चांदी में 26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई जबकि प्लैटिनम में 18 प्रतिशत की गिरावट आई.
इससे पहले की रैली से दोनों धातुओं की क़ीमत ऐतिहासिक रूप से बढ़ गई थी.
यूके के इन्वेस्टमेंट बैंक पैनम्योर लिबेरम के कमोडिटीज़ विश्लेषक टॉम प्राइस ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा, "यह बाज़ार के शिखर पर पहुंचने का क्लासिक रवैया है. भ्रम और अनिश्चितता है. हर कोई स्पष्टता की तलाश में है."
ट्रेडिंग सर्विस से जुड़ा ग्रुप एमकेएस पैम्प की विश्लेषक निकी शील्स ने कहा कि गुरुवार और शुक्रवार को हुए ये तेज़ उतार-चढ़ाव उस महीने के अंत में आए हैं, जिसे "क़ीमती धातुओं के इतिहास का सबसे अधिक अस्थिर महीना" कहा जा सकता है.
वैश्विक उथल-पुथल, वेनेज़ुएला से लेकर ग्रीनलैंड और ईरान तक और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की अनिश्चितता को लेकर बढ़ती चिंता ने निवेशकों को क़ीमती धातुओं की ओर भागने पर मजबूर कर दिया.
शील्स ने कहा, "अकल्पनीय घटनाएं रोज़ हो रही हैं. यह तेज़ी साफ़ तौर पर बहुत ज़्यादा और बहुत जल्दी थी."
पिक्टेट एसेट मैनेजमेंट में सीनियर मल्टी-एसेट स्ट्रैटिजिस्ट अरुण साई ने फ़ाइनैंशियल टाइम्स से कहा, "इससे पहले जिस तरह की ज़्यादा क़ीमतों में तेज़ हलचल देखने को मिली है, उसे देखते हुए ऊंची अस्थिरता की उम्मीद की जानी चाहिए."
कंपनी अपने इस आकलन पर कायम है कि केंद्रीय बैंक रिज़र्व प्रबंधकों और अन्य निवेशकों की ओर से निवेश में विविधीकरण के कारण सोने को लाभ मिलता रहेगा.
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, यह गिरावट 1980 के दशक की शुरुआत के बाद सबसे बड़ी इंट्राडे गिरावट है. चांदी में भी यह रिकॉर्ड इंट्राडे गिरावट है. इस बिकवाली का असर पूरे मेटल बाज़ार पर पड़ा.
शेयर बाज़ार के जानकारों का मानना है कि इन धातुओं में तेज़ वृद्धि के बाद दामों में क्रैश की आशंका थी और कुछ ख़बरों ने इसका बहाना दे दिया.
रिकॉर्ड गिरावट क्यों?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों से भी बाज़ार लगातार सहमा रहा है.
पिछले एक साल में सोने की क़ीमतों में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
पिछले एक साल में क़ीमती धातुओं में निवेशकों की भारी मांग देखी गई, जिससे एक के बाद एक रिकॉर्ड बने.
इस तेज़ी ने अनुभवी ट्रेडरों को भी चौंका दिया और क़ीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव पैदा किया.
जनवरी में यह रुझान और तेज़ हुआ, जब निवेशकों ने करेंसी की कमज़ोर होती क़ीमत, फ़ेडरल रिज़र्व की स्वतंत्रता को लेकर चिंता, ट्रेड वॉर और भू-राजनीतिक तनाव के बीच पारंपरिक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख़ किया.
ब्लूमबर्ग ने ओवरसीज-चाइनीज बैंकिंग कोर के रणनीतिकार क्रिस्टोफर वोंग के हवाले से कहा कि द बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स ऑफ़ द फे़डरल रिज़र्व के चेयरमैन के लिए केविन वार्श के नामांकन की ख़बर इस 'महागिरावट' की एक ट्रिगर रही, लेकिन पहले से ही करेक्शन ज़रूरी हो गया था.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने द बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स ऑफ द फे़डरल रिज़र्व के चेयरमैन के लिए केविन वार्श के नाम की घोषणा की है.
ट्रंप की इस घोषणा का स्वागत कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी किया है. कार्नी ने कहा है कि मुश्किल वक़्त में दुनिया के सबसे अहम केंद्रीय बैंक के नेतृत्व के लिए केविन बेहतरीन चुनाव हैं.
क्रिस्टोफ़र वोंग ने कहा, "यह वैसा ही बहाना है, जिसका बाज़ार ऐसे तेज़ और असामान्य उछाल को ख़त्म करने के लिए इंतज़ार करता है."


