विचार/लेख
3 जून विश्व साइकिल दिवस
-दिलीप कुमार पाठक
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हर व्यक्ति समय की कमी और तनाव की शिकायत करता है, तब एक बेहद साधारण और किफायती समाधान हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है। वह समाधान है - साइकिल। आज 3 जून को पूरी दुनिया ‘विश्व साइकिल दिवस’ मना रही है। यह दिन किसी आधुनिक आविष्कार का जश्न नहीं, बल्कि उस सादगी और उपयोगिता को याद करने का अवसर है, जिसे हमने विकास की अंधी दौड़ में कहीं पीछे छोड़ दिया है। जब पूरी दुनिया महंगे ईंधन, ट्रैफिक जाम और जहरीले धुएं से हांफ रही है, तब साइकिल एक सुगम साधन की तरह नजर आती है। यह कोई साधारण सवारी नहीं, बल्कि बिना धुएं वाली वह मूक क्रांति है जो व्यक्ति की सेहत, जेब और धरती तीनों को एक साथ संवार सकती है।
आजकल की जीवनशैली को देखें तो हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आती हैं। घर से महज दो कदम दूर सब्जी की दुकान या दूध की डेयरी तक जाने के लिए भी लोग तुरंत मोटरसाइकिल या कार की चाबी उठा लेते हैं। नतीजा यह हुआ है कि शहरों की हवा भारी हो चुकी है, सडक़ों पर पैदल चलने की जगह नहीं बची और इंसानी शरीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। लोग शारीरिक रूप से खुद को फिट रखने के लिए हर महीने जिम में हजारों रुपये खर्च करते हैं और एक ही जगह खड़े होकर ट्रेडमिल पर दौड़ते हैं। जबकि इसका सबसे आसान और प्राकृतिक विकल्प हमारी दिनचर्या में ही छुपा है। सुबह या शाम को सिर्फ आधा घंटा साइकिल चलाना दिल को मजबूत करता है, मानसिक तनाव को कम करता है और शरीर को ऊर्जा से भर देता है।साइकिल की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह समाज में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करती। इसके लिए न तो महंगे पेट्रोल-डीजल की जरूरत होती है और न ही किसी भारी-भरकम मेंटेनेंस या सर्विसिंग के खर्च की। यह आत्मनिर्भरता और बचत का सबसे पहला और सच्चा पाठ पढ़ाती है।
-अशोक पांडे
हरियाणे की वही जिद्दी लडक़ी जो पेरिस ओलिम्पिक्स के फाइनल में पहुँचने वाली पहिला हिन्दुस्तानी पहलवान बनी थी। इतने बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं में अमूमन फिसड्डी रहने वाले हमारे देश के लिए यह गौरव का विषय था। सारा देश फाइनल के इंतज़ार में था जब मुकाबले से ठीक पहले उसका वजऩ सौ ग्राम ज़्यादा पाया गया और वह डिसक्वालीफाई हो गई थी।
मुझे उम्मीद है इस त्रासदी की सभी को याद होगी। यह भी याद होगा जब इस घटना को एक साजि़श बताते हुए रोती हुई विनेश ने कुश्ती से संन्यास की घोषणा कर दी थी। वह भारत लौटी तो एयरपोर्ट से घर तक आम जन ने उसका जैसा स्वागत किया वह राष्ट्राध्यक्षों तक में डाह पैदा कर सकता था। हम सब ने उसे अपनी बहन-बेटी माना और उसके रोने में साथ दिया।
फिर एक बदसूरत कहानी के टुकड़े एक-एक कर सामने आने लगे- महिला पहलवानों के साथ होने वाला सेक्सुअल अपमान, प्रशासकों द्वारा किया जाने वाला घनघोर पक्षपात और शर्मनाक बयानबाजी। देश ने देखा कि भारतीय कुश्ती के प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर ऐसे लोग काबिज थे जिनके आपराधिक रेकॉर्ड्स थे और जो खिलाफत में उठने वाली हर आवाज़ को खामोश कर देना जानते थे।
विनेश ने आगे आकर सारे खुलासे किए, लू और बारिश के बीच भूख हड़ताल पर बैठी, और वह सब किया जो कोई भी गैरतमंद इंसान करता। समूचे तंत्र ने नंगे होकर उस छोटी-सी हिम्मती स्त्री को सबक सिखाने के लिए कमर कस ली और जहाँ-जहाँ संभव था उसे अपमानित और बदनाम करने में कोई कमी न छोड़ी।
संन्यास की घोषणा के बाद विनेश ने विधायक का चुनाव जीता और एक बच्चे की माँ बनी। पिछले साल के अंत में उन्हें अहसास हुआ कि कुश्ती से नाता जोडऩे का एक और जतन किया जाना चाहिए। उसने संन्यास वापस ले लिया और घोषणा की कि उनका अगला लक्ष्य 2028 के लॉस एंजेलिस ओलिम्पिक्स में मैडल जीतना है।
पिछले महीने विनेश यूपी के उसी गोंडा में एशियन गेम्स के ट्रायल से पहले के मुकाबलों में भाग लेने पहुँची जो भारतीय कुश्ती के माफिया हिस्ट्रीशीटर मुखिया का ठिकाना है।
सारा सिस्टम एकजुट हो गया कि यह हिम्मती लडक़ी खेल ही न सके। सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा जिसने विनेश के हक़ में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विनेश देश का गौरव हैं।
आप यकीन करेंगे इस मामले में जब भारतीय कुश्ती संघ दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा तो उसने अपनी अर्जी में विनेश के पेरिस में हुए डिसक्वालीफिकेशन को ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया। कोर्ट ने इस बात पर भी संघ को लताड़ा और विनेश के पक्ष में फैसला दिया।
-राहुल सिंह
पिछले दिनों ‘हिन्दुस्तान टाइम्स‘ के पेज पर 30 अप्रैल 2026 को शुभम पांडे के अंग्रेजी समाचार का आशय है कि- 20 लाख डॉलर मूल्य की अवलोकितेश्वर की कांस्य प्रतिमा 1939 में लक्ष्मण मंदिर के पास मिले कांस्य की विशाल धरोहरों में से एक इस प्रतिमा को रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में रखा गया था। यह प्रतिमा संग्रहालय से चोरी हो गई और 1982 तक अमेरिका में तस्करी करके ले जाई गई, और अंततः 2014 तक न्यूयॉर्क में एक निजी संग्रह में पहुंच गई। यही समाचार ‘अमर उजाला‘ के पेज पर ललित कुमार सिंह ने 01 मई 2026 को लिखा कि- अमेरिका ने लौटाई छत्तीसगढ़, रायपुर से चुराई गई कुल कीमत 20 लाख डालर की बेशकीमती ‘अवलोकितेश्वर‘ कांस्य प्रतिमा।
इसी दौरान मई पहले-दूसरे सप्ताह में संग्रहालय के पुरावशेषों के मूल दस्तावेज ‘अवाप्ति पंजियों‘ का दीमक के कारण नष्ट हो जाने की जानकारी भी आई। ऐसी स्थिति में संग्रहालय के पुरावशेषों के मिलान के लिए अवाप्ति पंजी की अन्य प्रति, पुराविदों द्वारा इस संग्रहालय के पुरावशेषों संबंधी शोधपत्र, संग्रहालय के पूर्व प्रकाशनों, लेख, समाचार तथा अन्य संबंधित कार्यालयीन अभिलेख सहायक हो सकते हैं। उक्त अवलोकितेश्वर प्रतिमा, जो रायपुर से चुराई गई बताई जा रही है, के संबंध में जानकारी कि वह कब चोरी हुई थी? चोरी की रिपोर्ट लिखाई गई थी? खोज-बीन के क्या प्रयास हुए थे आदि की जानकारी मुझे अब तक नहीं मिली है। मगर एक स्रोत जिसका हवाला नीचे दिया जा रहा है, सिरपुर की ‘अवलोकितेश्वर पद्मपाणि‘ का उल्लेख तथा चित्र उपलब्ध हुआ है, यदि यह वही प्रतिमा है तो इसका अवाप्ति पंजी क्रमांक-17, दर्शाया गया है।
महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर के पुरावशेषों संबंधी आधारभूत काम यहां सहायक संग्रहाध्यक्ष रहे बालचन्द्र जैन जी ने किया है। उन्होंने 1960 में संग्रहालय के पुरातत्व उपविभाग में संग्रहीत वस्तुओं का सूचीपत्र प्रकाशित कराया था, जिसका भाग 3, धातु-प्रतिमाएं हैं।
पुस्तिका में दस चित्र फलक भी प्रकाशित हैं।
- मृदुलिका झा
सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम पर स्टूडेंट्स, अभिभावक और विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं।
ऐसा दावा किया जा रहा था कि इस सिस्टम को परीक्षा में जांच को सटीक और तेज़ बनाने के लिए लाया गया है, लेकिन यही अब सवालों के घेरे में आ गया है।
12वीं कक्षा के बहुत से स्टूडेंट धुंधली आंसर शीट, पोर्टल क्रैश और यहां तक कि आंसर शीट्स बदलने की शिकायत कर रहे हैं।
मुद्दा इतना तूल पकड़ चुका कि सीबीएसई के 12वीं बोर्ड परीक्षा में बैठे हर चार में से करीब एक छात्र ने अपनी जांची हुई आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है।
सीबीएसई के 26 मई 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक परीक्षा में शामिल 17 लाख 68 हजार 968 छात्रों में से 4 लाख 4 हजार 319 छात्रों ने स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया, जो कुल का करीब 23 फीसदी है।
बीबीसी ने यह समझने की कोशिश की कि स्टूडेंट्स किस-किस तरह की समस्याएं झेल रहे हैं।
विद्यार्थी, वकील और सीबीएसई से जुड़े एक टीचर से बातचीत में 5 सवाल सामने आए, जिनके जवाब लाखों स्टूडेंट्स समेत अभिभावक चाहते हैं।
क्या है पूरा मामला
13 मई को सीबीएसई के 12वीं कक्षा के नतीजे आए। पिछले साल के मुकाबले इस साल करीब 3 फीसदी कम स्टूडेंट पास हुए।
रिजल्ट जारी होते ही सीबीएसई के नए मूल्यांकन सिस्टम ओएसएम (ऑन स्क्रीन मार्किंग) पर सवाल उठने लगे, जिससे डिजि़टल तरीके से मूल्यांकनकर्ताओं ने आंसर कॉपी जांची थीं।
पहले का तरीक़ा यह था कि परीक्षा के बाद छात्रों की आंसर कॉपियां बंडल बनाकर टीचरों के पास भेजी जाती थीं। टीचर उन्हें हाथ में लेकर लाल पेन से जांचते थे, नंबर जोड़ते थे और साइन करते थे।
अब सीबीएसई ने नया तरीक़ा अपनाया है। पहले सभी कॉपियां स्कैन होती हैं यानी उनकी डिजि़टल फ़ोटो खींची जाती है। फिर यह फ़ोटो ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड हो जाती है।
टीचर अब असली कॉपी की जगह कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर वही कॉपी देखकर नंबर देते हैं, बिल्कुल वैसे जैसे हम फ़ोन पर किसी डॉक्युमेंट की पीडीएफ़ पढ़ते हैं।
विवाद बढऩे पर 15 मई को सीबीएसई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस नए ओएसएम सिस्टम का बचाव किया था।
साथ ही बताया था कि उसने बड़े स्तर पर इस सिस्टम के लिए तैयारी की थी और जहां ज़रूरत लगी, कॉपियों की रीस्कैनिंग और मैनुअल चेकिंग भी कराई थी।
सीबीएसई का कहना था कि उसने 100 टीचरों से कॉपी चेक कराकर ड्राईरन भी कराया था।
बोर्ड के मुताबिक़, सभी ख़ामियां ठीक कराने के बाद ही उसने ओएसएम प्रणाली से कॉपी चेक कराई।
लेकिन इसके आगे के घटनाक्रम लगातार विवाद बढ़ाते चले गए। इसी बीच एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि बोर्ड ने उन्हें एक विषय की ग़लत आंसर शीट भेजी है।
मामला तब और बढ़ गया जब उन्हें दूसरे देश का बताकर ट्रोल किया गया। सीबीएसई ने वेदांत के केस में हुई तकनीकी समस्या को हल कर दिया, लेकिन नए असेसमेंट सिस्टम यानी ओएसएम पर लगातार सवाल उठने लगे।
इस पर 24 मई को सीबीएसई ने तकनीकी ख़ामियों की बात स्वीकारी और किसी भी संभावित समस्या की जांच एक्सपर्ट से कराने की बात कही।
फि़लहाल स्थिति ये है कि परीक्षा में बैठे लगभग 18 लाख विद्यार्थियों में से 4 लाख से कुछ ज़्यादा ने आंसर शीट की स्कैन्ड कॉपी की मांग की है। ध्यान रहे कि पुराने बंदोबस्त में मैनुअल चेकिंग होती थी।
1. नए सिस्टम में कॉपी जांचने की ट्रेनिंग क्या पर्याप्त थी?
सीबीएसई ने ओएसएम सिस्टम को लेकर कहा कि इससे जांच की प्रक्रिया ज़्यादा तेज़ और सटीक हो सकेगी। साथ ही मैनुअल ग़लतियां कम से कम रहेंगी, लेकिन अब इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं।
ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर सवाल उठ रहे हैं।
नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध एक स्कूल की शिक्षिका कहती हैं, ‘पहले टीचर ऑफ़लाइन में भी गड़बडिय़ां करते थे। कभी टोटलिंग में नंबर छूट जाते थे, तो कभी सही जवाब को ग़लत मार्क कर दिया जाता था। इन सबसे बचने के लिए ऑन स्क्रीन का कांसेप्ट लाया गया।’
वे कहती हैं, ‘एग्जाम ऑफ़लाइन लिया जा रहा है और जांच ऑनलाइन हो रही है। इस प्रक्रिया के लिए परीक्षकों को लंबी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए थी, लेकिन बोर्ड ने मान लिया कि टीचर तकनीक समझते ही होंगे। काफी सतही प्रशिक्षण के बाद सिस्टम लागू हो गया।’
वहीं एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षाविद डॉ। एसके दत्ता ने कहा कि कुछ शिक्षक ऑनलाइन तकनीक में माहिर हैं तो कुछ को अभी और प्रशिक्षण की जरूरत है और यह सच्चाई है।
सीबीएसई को सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि फि़लहाल ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों विकल्प एक साथ कऱीब एक साल तक चलाए जाएं और छात्रों को चुनने की आज़ादी दी जाए।
उनके अनुसार, जब तक शिक्षकों में इस तकनीक को लेकर पूरी परिपक्वता न आ जाए, तब तक पूरी तरह ऑनलाइन सिस्टम पर न जाएं।
हालांकि इस मामले में सीबीएसई बता चुका है कि आंसर शीट जांचकर्ताओं को प्रक्रिया समझने में मदद करने के लिए मॉक इवेलुएशन करने का मौक़ा दिया गया था।
जैसे किसी बड़े मैच से पहले टीम प्रैक्टिस मैच खेलती है, वैसे ही मॉक इवेलुएशन में परीक्षकों को असली कॉपियां जांचने से पहले नकली या पुरानी आंसर शीट दी जाती हैं।
इसका मकसद यह होता है कि जांचकर्ता नए सिस्टम को समझ सकें और ग़लतियां असली रिजल्ट में न हों।
सीबीएसई का कहना है कि उसने फऱवरी में यही किया था, ताकि टीचर ओएसएम यानी ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर हाथ आज़मा सकें।
2. क्या ओएसएम को लागू करने से पहले उसकी स्वतंत्र तकनीकी जांच हुई थी?
लेकिन इसके लिए हुए ऑडिट और टेस्टिंग जैसी बातों को लेकर पब्लिक डोमेन में सीमित जानकारी है। इसे लेकर नेता विपक्ष राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि कंपनी पहले अलग नाम से तेलंगाना में काम करती थी।
उनका आरोप है कि साल 2019 और 2023 में बोर्ड परीक्षा से जुड़े विवादों में इस कंपनी का नाम आ चुका है। एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया।
उन्होंने कहा, ‘राहुल गांधी कह रहे हैं, जिनकी कर्नाटक और तेलंगाना की सरकारों ने उसी कंपनी को काम पर लगाया। तो क्या राहुल गांधी दिल्ली के लिए अलग मानक रखेंगे और कर्नाटक-तेलंगाना के लिए अलग?’
‘इसके अलावा उसकी चयन प्रक्रिया पर भी कुछ सवाल उठे हैं। भारत सरकार के नीति-नियमों के तहत सेंट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेंट पोर्टल के जरिए इसे लगाया गया था। कंपनी की क्षमता पर भी सवाल आ रहे हैं, इसलिए हमने एक समिति बनाई है जो उसकी तकनीक और प्रक्रिया का मूल्यांकन करेगी।’
उन्होंने कहा, ‘प्रक्रिया का उल्लंघन करने का किसी को भी अधिकार नहीं है और जो भी दोषी होगा उसे जवाबदेही लेनी होगी।’
मामला तूल पकडऩे पर सीबीएसई ने आधिकारिक बयान दिया कि एजेंसी को अनुबंध देने के दौरान सभी नियमों का पालन किया गया। बयान के साथ ही बोर्ड ने टेंडर प्रोसेस का डेटा भी सार्वजनिक किया।
3.क्या स्टूडेंट्स का भरोसा अब रिजल्ट की बजाए वेरिफिक़ेशन पर है?
नीट से लेकर कई परीक्षाओं में पेपर लीक और तरह-तरह की गड़बडिय़ों के आरोपों ने क्या अभिभावकों समेत विद्यार्थियों का भरोसा कमजोर किया है?
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इस मुद्दे पर वेदांत श्रीवास्तव के बड़े भाई सिद्धांत श्रीवास्तव से संपर्क किया। वे आंसर शीट की गड़बड़ी का मुद्दा उठाकर वायरल हो गए थे।
सिद्धांत कहते हैं, ‘नंबर कम होने पर हमने भाई की स्कैन कॉपी मंगाई, जो धुंधली दिख रही थी। गौर से देखने पर समझ आया कि हैंडराइटिंग वेदांत की है ही नहीं।’
‘तब हमने सोशल मीडिया का सहारा लिया था। तब से हमारे पास बहुत से बच्चों के मेल आ रहे हैं कि उन्हें भी ऐसा शक है कि उनके मार्क्स कम हुए हैं या पेपर की अदला-बदली हुई है।’
सिद्धांत कहते हैं, ‘ये समय बहुत क्रूशियल है। इस समय स्टूडेंट कॉलेज में एडमिशन की तैयारी या किसी दूसरी परीक्षा में लगे होते हैं। ऐसे में उन्हें यह डर है कि उनके मार्क्स सही मिले भी हैं या नहीं। वे लगातार स्कैन कॉपी और री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन कर रहे हैं।’
बोर्ड से चार लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स ने अपनी स्कैन आंसर कॉपी की मांग की है, जिसे नए सिस्टम से जोड़ा जा रहा है।
बीबीसी से बातचीत में दिल्ली में रहने वाली 12वीं की छात्रा धृति अग्रवाल कहती हैं, ‘11वीं में मैंने इकॉनॉमिक्स में पूरे स्कूल में टॉप किया था। प्री बोर्ड में भी बहुत हाई स्कोर किया था, लेकिन बोर्ड में कम नंबर मिले।’
उन्होंने कहा, ‘मैंने स्कैन कॉपी मांगी तो पता लगा कि मल्टीपल चॉइस क्वेश्चन के अलावा हर सही सवाल पर आधा-आधा नंबर काटा गया है। इससे बड़ा फर्क आ रहा है। ये कट-ऑफ़ में काफ़ी मायने रखेगा।’
वे कहती हैं कि अगर अब मुझे ये नंबर चाहिए तो हर सवाल के लिए 25 रुपए सबमिट करने होंगे।
बता दें कि सीबीएसई ने हर सवाल के उत्तर के दोबारा मूल्यांकन के लिए चार्ज की जाने वाली फ़ीस को 100 रुपए से घटाकर 25 रुपये कर दिया है।
4. क्या और ज़्यादा कॉपियां मैनुअल चेक करानी चाहिए थीं?
सीबीएसई की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया था कि उसने रिजल्ट जारी करने से पहले करीब 13 हज़ार कॉपियों की मैनुअल चेकिंग करायी थी, क्योंकि स्कैनिंग और री-स्कैनिंग के दौरान ये धुंधली पाई गई थीं और इन्हें डिजि़टली जांचना पर्याप्त नहीं था।
चूंकि सीबीएसई की ओर से आवेदक विद्यार्थियों को जो स्कैन आंसर कॉपियां मिल रही हैं, उनमें भी बड़ी तादाद पर स्कैनिंग या ब्लर दिखने की समस्या देखने को मिल रही है।
ऐसे में क्या और अधिक कॉपियों की मैनुअल जांच नहीं की जानी चाहिए थी?
बीबीसी से बात करने वाले स्टूडेंट्स ने चिंता ज़ाहिर की है कि स्कैन की गई आंसर शीट के कई पन्ने ब्लर मिल रहे हैं। ऐसे में वे किस तरह इनपर लिखे जवाबों के पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर पाएंगे?
साथ ही, कई विद्यार्थियों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि दोबारा कॉपी की चेकिंग भी ओएसएम से ही होनी है, कहीं दोबारा वे उसी समस्या का सामना न करें जो पहले थी।
इन स्टूडेंट्स का कहना है कि नए सिस्टम के कारण 12वीं के बाद अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन चाह रहे छात्र एक या दो नंबर से कट-ऑफ़ से चूक सकते हैं।
यानी मामूली फर्क़ भी उनके भविष्य पर असर डाल सकता है। यह बात भी उठ रही है कि जब मैनुअल जांच पर ही भरोसा करना है तो नया असेसमेंट लागू ही क्यों हुआ?
5. विवाद पर बोलने में क्या शिक्षा मंत्रालय ने देर कर दी?
सीबीएसई की निगरानी करने वाले शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा मंत्री ने 13 मई को रिजल्ट आने के बाद काफ़ी समय तक ओएसएम विवाद पर चुप्पी साधे रखी।
यह मंत्रालय इस विवाद के शुरू होने से पहले नीट परीक्षा में लीक के दावों से घिरा हुआ था। हालांकि 28 मई को सीबीएसई के साथ एक अहम बैठक के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस पर बयान देकर ओएसएम गड़बडिय़ों पर जिम्मेदारी ली है।
उन्होंने कहा, ‘यह पहली बार था जब सीबीएसई ओएसएम का उपयोग कर रहा था। यह छात्र-केंद्रित और वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त प्रणाली है।’
उन्होंने यह भी कहा, ‘परिणामों में कुछ त्रुटियां सामने आई हैं, मैं इसकी जि़म्मेदारी लेता हूँ और आपको आश्वस्त करता हूँ कि इसका समाधान निकाला जाएगा। हम इस पर काम कर रहे हैं। हम किसी भी छात्र के सवाल को अनदेखा नहीं छोड़ेंगे।’
इससे पहले री-इवेलुएशन के लिए सीबीएसई के रिक्वेस्ट पोर्टल पर स्टूडेंट्स लॉगिन फ़ेल होने व पेमेंट गेटवे में गड़बड़ी की समस्याओं का सामना कर रहे थे।
तब शिक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी करके बताया था कि ख़ामियां सुधरवाने के लिए आईआईटी कानपुर व मद्रास के विशेषज्ञ टीम को सीबीएसई की मदद के लिए भेजा गया है।
हालांकि तब भी शिक्षा मंत्रालय ने अभिभावकों व विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कोई बयान नहीं दिया।
इसके बाद 27 मई को राहुल गांधी ने ओएसएम से जुड़ी अनियमितता का मामला उठाया तो 28 मई को शिक्षा मंत्री ने उनके दावे पर प्रतिक्रिया दी।
साथ ही उन्होंने कहा कि ओएसएम को लेकर सीबीएसई अपना पक्ष रख चुकी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि पाकिस्तान और कुछ अन्य मुस्लिम बहुल देश इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करें. अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने से पाकिस्तान को कुछ फायदे मिल सकते हैं, लेकिन इसके कई बड़े परिणाम भी होंगे.
डॉयचे वैले पर शामिल शम्स की रिपोर्ट –
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नई मांग के बाद पाकिस्तान मुश्किल स्थिति में फंस गया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए होने वाले किसी भी समझौते में पाकिस्तान को इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले तथाकथित ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ पर हस्ताक्षर करने चाहिए। ट्रंप ने सोमवार को कहा कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों को भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनना चाहिए। इस समझौते की शुरुआत साल 2020 में डॉनल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी।
सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने लिखा, ‘अमेरिका ने इस जटिल मुद्दे को सुलझाने के लिए जो मेहनत की है, उसके बाद कम से कम इन सभी देशों को एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा होना चाहिए।’ उन्होंने जिन देशों का नाम लिया उनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन (जो पहले से सदस्य है) शामिल हैं। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि सऊदी अरब और कतर को तुरंत इस समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए। बाकी देशों को भी उनका अनुसरण करना है।
अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका की मध्यस्थता में हुए कई समझौतों की श्रृंखला है। इसका उद्देश्य इस्राएल और अरब देशों के बीच आर्थिक और राजनयिक रिश्तों को सामान्य बनाना है। इसके तहत पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को इस्राएल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच हुआ था।
फायदे और नुकसान पर विचार
कुछ पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस मांग को खारिज कर दिया है। लेकिन अब तक सरकार या सेना की ओर से इस पर कोई साफ और एकजुट प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस बीच, पाकिस्तान ईरान और अमेरिका-इस्राएल के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अप्रैल में उसने अमेरिका को 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान पर हमलों को रोकने के लिए राजी कर लिया था।
पाकिस्तान अब भी युद्ध खत्म कराने की कोशिश कर रहा है। मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार पाकिस्तान की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने देश के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अपने 'पसंदीदा' लोगों में भी बताया। ट्रंप से बढ़ती नजदीकी की वजह से इस समय पाकिस्तान की वैश्विक अहमियत बढ़ी है। लेकिन ईरान युद्ध में मध्यस्थता करने की तुलना में अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना पाकिस्तान के लिए कहीं ज्यादा मुश्किल होगा।
राजनीतिक विश्लेषक रजा रूमी ने डीडब्ल्यू से कहा, ‘अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने के फायदे जरूर हैं। लेकिन राजनीतिक तौर पर इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। पाकिस्तान को वॉशिंगटन और कुछ खाड़ी देशों से कूटनीतिक समर्थन मिल जाएगा। साथ ही आर्थिक और तकनीकी अवसर भी खुल सकते हैं।’ हालांकि, रूमी ने चेतावनी दी कि इस कदम से पाकिस्तान को बड़े खतरे भी हो सकते हैं। वह कहते हैं, ‘इससे फिलिस्तीन मुद्दे पर पाकिस्तान की स्थिति कमजोर पड़ सकती है, ईरान के साथ तनाव बढ़ सकता है और देश के अंदर अस्थिरता भी बढऩे की संभावना है।’
पाकिस्तान इस्राएल को आधिकारिक तौर पर नहीं मानता और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं हैं। हालांकि, पहले दोनों पक्षों के बीच कुछ अनौपचारिक संपर्कों की खबरें सामने आ चुकी हैं। रूमी बताते हैं, ‘जब तक फिलिस्तीन को अलग देश का दर्जा देने की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक इस्राएल के साथ रिश्ते सामान्य करना रणनीतिक फैसला कम और दबाव में झुकने जैसा ज्यादा लगेगा। फिलहाल इसके नुकसान, फायदों से ज्यादा दिखाई देते हैं।’
-प्रमोद जोशी
दही होता है या होती है? हाथी चलता है या चलती है? पतंग उड़ती है या उड़ता है? प्याज होती है या होता है? जेब होती है या होता है? चौपाल लगती है या लगता है? ऐसे एक-दो नहीं सैकड़ों शब्द हैं। हिंदी की वर्तनी को लेकर, जितनी ज्यादा बहस है, उतने समाधान नहीं हैं। हिंदी में 'शिकागो मैनुअल ऑफ स्टाइल' जैसा ग्रंथ बनाने की कोशिश नहीं हुई, जिसे कम से कम भाषा-बरतने वाले बड़े वर्ग का समर्थन मिले। केंद्रीय भाषा निदेशालय की वर्तनी पुस्तिका है, पर वह केवल वर्तनी तक सीमित है, और उसे भी पूरा समर्थन प्राप्त नहीं है। हिंदी की पाठ्य पुस्तकों, पत्र सूचना कार्यालय की प्रेस विज्ञप्तियों, रेलवे और मेट्रो स्टेशनों के सूचना पटों, यहाँ तक कि करेंसी नोटों में भी विसंगतियाँ हैं। सरकारी वैबसाइटों के हिंदी संस्करण गूगल ट्रांसलेटर की हिंदी के सहारे चलते हैं।
करीब डेढ़ दशक पहले मुझसे एक पत्रकार मित्र ने पूछा मॉनसून क्यों, मानसून क्यों नहीं? दक्षिण भारतीय भाषाओं में और अंग्रेज़ी सहित अनेक विदेशी भाषाओं में ओ और औ के बीच में एक ध्वनि और होती है। ऐसा ही ए और ऐ के बीच है। ष्टड्डद्यद्य को देवनागरी में काल लिखना अटपटा है। देवनागरी ध्वन्यात्मक लिपि है तो हमें अधिकाधिक ध्वनियों को उसी रूप में लिखना चाहिए। इसलिए वृत्तमुखी ओ को ऑ लिखते हैं। हिंदी के अलग-अलग क्षेत्रों में औ और ऐ को अलग-अलग ढंग से बोला जाता है। मेरे विचार से बाल और बॉल को अलग-अलग ढंग से लिखना बेहतर होगा।
बात औ या ऑ की नहीं। बात मानकीकरण की है। हिंदी का जहाँ भी प्रयोग है वहाँ की प्रकृति और संदर्भ के साथ कुछ मानक होने ही चाहिए। मीडिया की भाषा को सरल रखने का दबाव है, पर सरलता और मानकीकरण का कोई बैर नहीं है। हिंदी के कुछ अखबार अंग्रेज़ी शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। उनके पाठक को वही अच्छा लगता है, तब ठीक है। पर वे ‘टारगेट’ लिखेंगे या ‘टार्गेट’ यह भी तय करना होगा। प्रफेशनल होगा या प्रोफेशनल? वीकल होगा, वेईकल या ह्वीकल? विदेशी शहरों, व्यक्तियों, संस्थाओं वगैरह के नामों का कोई मानक नहीं है।
ऐसा मैं हिंदी के एक अखबार में प्रकाशित प्रयोगों को देखने के बाद लिख रहा हूँ। आसान भाषा बाज़ार की ज़रूरत है, सुसंगत भाषा भी उसी बाज़ार की ज़रूरत है। सारी दुनिया की अंग्रेज़ी भी एक सी नहीं है, पर एपी या इकोनॉमिस्ट की स्टाइल शीट से पता लगता है कि संस्थान की शैली क्या है। यह शैली सिर्फ भाषा-विचार नहीं है। इसमें अपने मंतव्य को प्रकट करने के रास्ते भी बताए जाते हैं।
हिंदी का विकास कम से कम पाँच उपभाषा अथवा बोली समूहों से हुआ है या हो रहा है। 'मैंने आपको बीस बार समझाया है,' इस वाक्य को आप जब 'मैं आपको बीस बार समझाया हूँ' के रूप में सुनते हैं, तब आपको इलाके के अंतर का पता लगता है। हिंदी के अखबारों का विस्तार हो रहा है और भाषा का भी हो ही रहा है। क्षेत्र-विस्तार के बाद भाषा-प्रयोगों में टकराहट भी होती है। जनपद का यूपी में अर्थ कुछ है, एमपी में कुछ और। राजस्थान में जिसे पुलिया कहते हैं वह यूपी में पुल होता है। ऐसा होने पर क्या करें, यह भी मानकीकरण का विषय है।
मानकों का निर्धारण भी स्थिर वस्तु नहीं है, बल्कि गतिशील है। आज नहीं तो कल हिंदी का निरंतर बढ़ता प्रयोग हमें बाध्य करेगा कि मानकीकरण के रास्ते खोजें। हिंदी में हिंदी पत्रकारिता का विस्तार जिस तेजी से हुआ है उस तेजी से उसका गुणात्मक नियमन नहीं हो पाया। एक से सौ तक की संख्याओं को हम कई तरह से लिखते हैं। मसलन सत्रह, सत्तरह, सतरह, सत्रा या अड़तालीस, अड़तालिस, अठतालिस वगैरह। एक विचार है कि एक से नौ तक संख्याएं शब्दों में फिर अंकों में लिखें। तारीखें अंकों में ही लिखें। प्रयोग में ऐसा नहीं हो पाता। प्रयोग करने वाले और इस प्रयोग को जाँचने वाले या तो एकमत नहीं हैं या इसके जानकार नहीं हैं।
-विष्णुकांत तिवारी
1971 में भारत पाकिस्तान समझौता (शिमला समझौता) हो रहा था। इसी दौरान जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को एक शेर अर्ज किया।
‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों।’
यह सुनकर इंदिरा गांधी ने कहा था कि हमारा शेर हमीं को अर्ज कर रहे हैं।
यह कहानी सुनाते हुए डॉ। अंजुम बाराबंकवी भावुक हो उठे।
वे भोपाल में मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र के घर पहुंचे थे। बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे।
परिवार के मुताबिक़, उन्होंने दोपहर करीब 12 बजे अंतिम सांस ली।
बीबीसी से बात करते हुए उनकी पत्नी राहत बद्र ने निधन की पुष्टि की।
बशीर बद्र की दो शादियां हुई। उनकी पहली पत्नी से उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने दूसरी शादी डॉक्टर राहत बद्र से की और उनके एक बेटे हुए तैय्यब बद्र।
तैय्यब बद्र के मुताबिक, ‘बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया से जूझ रहे थे और पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक्कत हो रही थी।’
उर्दू शायरी को आसान और बोलचाल की भाषा में नई पहचान देने वाले बशीर बद्र उन शायरों में रहे, जिनके शेर साहित्यिक महफिलों से निकलकर आम लोगों की जबान तक पहुंचे।
उनकी गज़़लों में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों, बिछडऩे का गम और रोज़मर्रा की जि़ंदगी के अनुभव दिखाई देते थे। उनके कई शेर आज भी मुशायरों, सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक भाषणों और आम बातचीत में अक्सर सुनाई देते हैं।
उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर लोग लगातार उनके शेर साझा कर रहे हैं। उनमें से एक शेर बार बार याद किया जा रहा है, जो उनके घर के बाहर भी तख़्ती में लिखा हुआ है-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जि़ंदगी की शाम हो जाए।
‘डिमेंशिया का पता चला तो महफि़लों में जाना छोड़ दिया’
पिछले कई सालों से डिमेंशिया से जूझ रहे बशीर बद्र को जानने वाले लोग कहते हैं कि यह विडंबना ही थी कि करोड़ों लोगों को अपने शेर याद करा देने वाला शायर धीरे धीरे अपनी याददाश्त खोता चला गया।
उनके बेटे कहते हैं, ‘बशीर साहब को जब ये पता चला था कि उन्हें डिमेंशिया हो गया है तो उन्होंने मुशायरों में शरीक न होने का फैसला लिया। उन्होंने कहा था कि वो एक शोमैन हैं और वो चाहते हैं कि दुनिया उसी बशीर बद्र को याद रखे जिसकी पकड़ हर लफ्ज़़ पर बहुत मजबूत थी।’
मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की मौजूदा निदेशक डॉ। नुसरत मेहदी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘उन्होंने मुश्किल शायरी को आसान अल्फाज़ में कहने का हुनर हासिल किया था। यही वजह है कि हिन्दी और उर्दू, दोनों भाषा के लोग उन्हें पसंद करते थे।’
डॉ. मेहदी ने बताया कि वह मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी में उनके साथ काम कर चुकी हैं। बशीर बद्र कभी इसी अकादमी के अध्यक्ष भी रहे थे।
बशीर बद्र ने शायरी के साथ साथ आलोचना और अकादमिक लेखन में भी महत्वपूर्ण काम किया। उनकी किताबों में ‘इकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘आस’ और ‘कुल्लियाते बशीर बद’ शामिल हैं।
वहीं ‘आजादी के बाद उर्दू गज़़ल का तनक़ीदी मुताला’ और‘बीसवीं सदी में गजल’ जैसी किताबों को उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण माना जाता है।
बढ़ती गरीबी और तालिबान द्वारा महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियां लगाने की वजह से अफगानिस्तान में घरेलू हिंसा बढ़ती जा रही है. हिंसा अब ज्यादा खतरनाक और छिपी हो गई है लेकिन इससे बच पाना ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है.
डॉयचे वैले पर रजा शिरमोहम्मदी का लिखा-
अफगानिस्तान गंभीर मानवीय संकट से गुजर रहा है। देश की आधी आबादी को मदद की जरूरत है। कई परिवार सिर्फ किसी तरह जिंदा रहने की कोशिश कर रहे हैं। भूख, बेरोजगारी और सेवाओं के चरमराने से वे परिवार के सदस्यों पर और ज्यादा निर्भर हो गए हैं।
साल 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से कई सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं जिनकी वजह से महिलाओं की जिंदगी सीमित हो गई है। उनके लिए पढ़ाई, काम करना और बाहर निकलना पहले से बहुत मुश्किल हो गया है। इन हालातों की वजह से घर के अंदर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से बचना, उसकी शिकायत करना और उसे सामने लाना और भी कठिन हो गया है।
जबरन विवाह और निर्भरता
महिला अधिकार कार्यकर्ता और स्थानीय पत्रकार एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। आर्थिक तंगी के कारण लड़कियों की जबरन और कम उम्र में शादी कर दी जाती है। उनकी अपने पति या ससुराल पर निर्भरता बढ़ जाती है। घरेलू हिंसा अक्सर छिपी रहती है या कम दिखाई देती है। जब सुरक्षा देने वाली व्यवस्था काम नहीं करती और परिवारों को लगता है कि कोर्ट से भी कोई मदद नहीं मिलेगी, तब हिंसा जानलेवा रूप लेती है।
अफगानिस्तान के पश्चिमी प्रांत गोर का एक मामला इस परिस्थिति को समझाता है। फरजाना की मौत गोर के पसाबंद जिले में हुई। तब वह केवल 18 साल की थी। स्थानीय स्रोतों ने डीडब्ल्यू को बताया कि उस पर घर के अंदर हमला किया गया था। एक डॉक्टर ने भी बताया कि फॉरेंसिक जांच में फरजाना के शरीर पर पिटाई और यातना के निशान मिले जिससे यह संकेत मिलता है कि उसकी हत्या की गई। फरजाना की शादी 50 वर्ष से अधिक आयु के एक व्यक्ति से हुई थी। उसकी पहले से दो पत्नियां थीं।
स्थानीय सरकारी कर्मचारी आमिर मोहम्मदी (बदला हुआ नाम) ने डीडब्ल्यू को बताया कि पति के दो बेटों पर फरजाना की हत्या में शामिल होने का आरोप है। मोहम्मदी ने फरजाना के परिवार से बात करने की कोशिश की, लेकिन परिवार ने सहयोग करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि वे गरीब हैं। जबकि हत्या के आरोपी अमीर और प्रभावशाली हैं। मोहम्मदी के मुताबिक यह सामाजिक असमानता भी उतनी ही बड़ी समस्या है जितनी खुद यह हत्या।
वह डीडब्ल्यू से कहते हैं, ‘फरजाना जैसी कई लड़कियां गरीबी, जबरन शादी और बाल विवाह का शिकार हो रही हैं। परिवार अक्सर आर्थिक स्थिरता की उम्मीद में अपनी बेटियों की शादी उम्रदराज और पैसे वाले आदमियों से कर देते हैं। बंद दरवाजों के पीछे इन लड़कियों के साथ हिंसा हो रही है।’
पत्रकारों का कहना है कि हिंसा की जानकारी होने के बावजूद भी ऐसे मामले शायद ही कभी सार्वजनिक रिकॉर्ड तक पहुंच पाते हैं। नाम न बताने की शर्त पर अफगानिस्तान के एक स्थानीय पत्रकार ने डीडब्ल्यू से कहा, ‘अब रिपोर्टिंग करना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। तालिबान ने पत्रकारों और मीडिया पर बहुत सख्त नियम लगा दिए हैं। कोई भी इन मामलों पर रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं करता।’
भय और सत्ता के बल पर रुका हुआ न्याय
सामाजिक दबाव भी एक बड़ी वजह है। परिवार डर, बदनामी और प्रतिशोध के डर से शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं। अगर शिकायत दर्ज भी हो जाए, तो कई बार जांच में देरी हो सकती है।
गोर प्रांत के एक तालिबान अधिकारी ने, मीडिया से बात करने की अनुमति न होने के कारण नाम गुप्त रखते हुए, डीडब्ल्यू से बात की। वह बताते हैं कि एक युवती की हत्या के आरोप में पिता और उसके दो बेटों को गिरफ्तार किया गया है। मामले की जांच चल रही है।
हालांकि स्थानीय पत्रकार ने बताया कि उन्हें ऐसी जानकारी मिली है जिससे पता चलता है कि इस तरह के मामलों में आरोपी बाद में कबायली बुजुर्गों की मध्यस्थता से रिहा कर दिए गए। अक्सर पैसों के बदले समझौता कर दिया जाता है और इसमें पीडि़त परिवार की सहमति शामिल होती है। यह दिखाता है कि खासकर दूर-दराज इलाकों में आज भी अनौपचारिक न्याय व्यवस्था का कितना प्रभाव है।
-नासिरुद्दीन
शादी कोई जबरदस्ती बचाने की चीज नहीं है। न ही शादी बचाने का जिम्मा एक शख्स पर है। शादी दो लोगों की भागीदारी और साझेदारी है तो चलाने-बचाने का जिम्मा दोनों पर है।
इसलिए शादी बचाने, घर बसे रहने या घर टूटने से बचाने के मामले में बेटियों-बहनों या किसी भी स्त्री का एक के बाद एक जिंदगी गंवाते जाना जुर्म है। इस जुर्म के हम सब मुजरिम हैं।
दिल्ली के पास नोएडा में दीपिका नहीं रहीं। भोपाल में त्विषा नहीं रहीं। कर्नाटक के बेल्लारी में एश्वर्या की जान चली गई। दिल्ली की वीणा कुमारी भी नहीं रहीं। यह सब चंद दिनों के अंदर की ख़बरें हैं।
अपनी दास्ताँ बताने के लिए निक्की भी कुछ महीने पहले ही इस दुनिया में नहीं रहीं। उनसे पहले लखनऊ में मधु अपने घर में मरी हुई मिलीं।
ये सब युवा थीं। कुछ महीनों की शादीशुदा जि़ंदगी थीं। ख़बरों की मानें तो इनमें से किसी की मौत कुदरती नहीं है। असामान्य है।
सबके मामले में पति और दूसरे ससुराल?ियों पर दहेज के लिए हिंसा के आरोप लग रहे हैं। मुक़दमा भी इसी का हुआ है।
थोड़ी देर के लिए हम इस बहस में न पड़ें कि इनकी जान ली गई या इन्होंने जान दी। अहम बात है कि अब ये इस दुनिया में नहीं हैं। इनकी मौत की जड़ में जो चीज़ है, वह उनका स्त्री होना है।
गैरबराबरी का रिश्ता है शादी
हमारे मौजूदा समाज में शादी एक ग़ैरबराबरी वाला रिश्ता है-एक लडक़ी वाले हैं और एक लडक़ा वाला। आमतौर पर शादी में यही उनकी सामाजिक हालत तय कर देता है।
इसमें तराज़ू के दोनों पलड़े बराबर नहीं रहते हैं। एक का पलड़ा काफ़ी भारी रहता है। दहेज से दूसरे पलड़े को बराबर लाने की कोश?िश की जाती है।
मगर यह होता नहीं है। क्योंकि भारी पलड़े पर बैठे शख़्स का नाम लडक़ा या लडक़े वाला है।
अगर किसी तरह बराबरी हो गई तब तो ठीक है। वरना ताने, उत्पीडऩ और हिंसा का सिलसिला जान जाने तक चलता रहता है।
तब क्या ये सवाल पूछे जा सकते हैं। शादी में दो शख्स शामिल हैं। दहेज इनमें से किसके दिमाग़ की उपज है? किसे, किससे चाहिए?
दहेज की वजह से किसका मन और शरीर घायल होता रहता है? किसका मानसिक सुकून जाता है? दहेज के शोले किसे अपने आगोश में लेते हैं? दहेज की वजह से कौन जान से जाता है?
असल बातें तो ये ही हैं। इससे ही तय होना चाहिए कि इनकी मौत के गुनाहगार कौन हैं?
हर रोज 16 लड़कियों की मौत दहेज की वजह से
दिलचस्प है कि ये चार-पांच छिटपुट घटनाएं नहीं हैं। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में दहेज की वजह से मौत, धारा 304 बी और अब भारतीय न्याय संहता (बीएनएस) के तहत धारा 80 में दर्ज होती है।
ताज़ा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, साल 2024 में इन दोनों धाराओं में दहेज की वजह से मौतों की पाँच हज़ार 737 घटनाएँ दर्ज हुई हैं।
साल 2024 में दहेज हत्या की सबसे ज़्यादा घटनाएँ उत्तर प्रदेश (2,038), बिहार (1,078), मध्य प्रदेश (450), राजस्थान (386), पश्चिम बंगाल (337) से सामने आई हैं।
पति और ससुरालियों की क्रूरता बीएनएस की धारा 85 और आईपीसी धारा 498ए के तहत दर्ज होती हैं।
एनसीआरबी के मुताबिक, साल 2024 में ऐसी एक लाख 20 हजार 227 घटनाएँ दर्ज हुईं।
यानी साल 2024 में देश में हर रोज़ कऱीब 16 लड़कियों की जान दहेज की वजह से गई।
वहीं, लगभग 330 लड़कियों ने हर रोज़ ससुरालियों के उत्पीडऩ के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया।
लेकिन हम इनमें से उन्हीं की कहानी जान पाते हैं जो नहीं रहीं या जिनके मामले में मीडिया का ध्यान जाता है।
ज़्यादातर घटनाएँ हमारे नजर के सामने नहीं आतीं। अगर आती हैं तो वे सरसरी तौर पर गुजर जाती हैं। उससे हमारी जिंदगी के किसी कोने में कोई फर्क नहीं पड़ता।
पितृसत्ता, ग़ैरबराबरी और हिंसा
ताकतवर खासकर पितृसत्ता की ताकत की सोच से लैस लोग सिखा देते हैं कि हर गैरबराबरी और हिंसा पर हम शक़ करने लगे।
यही नहीं पीडि़त और दूसरे लोग ग़ैरबराबरी और हिंसा को आम बात मानकर आसानी से जि़ंदगी का हिस्सा मानकर मंज़ूर कर लें।
बाहर भी यही होता है और घर में भी। जाति और जेंडर आधारित भेदभाव में यह साफ़ देखा जा सकता है।
शादीशुदा जिंदगी में ताना हो या शारीरिक हिंसा- इसे महिला की जिंदगी का हिस्सा मानकर सामान्य बना दिया गया है। इस पर बात करना या फिक्र जाहिर करना गैरजरूरी मान लिया गया है।
हम अपनी बेटियों और बहनों को दहेज की माँग, उत्पीडऩ और हिंसा को जि़ंदगी का हिस्सा मानकर नजरंदाज करने और उससे तालमेल बैठाने या ‘एडजस्ट’ करने की सलाह देते हैं।
हम चेतते तब हैं जब बेटियों या बहनों की जान जा चुकी होती है।
महिलाएं सहती क्यों हैं?
एक सवाल जो बार-बार पूछा जाता है कि आखिर लड़कियाँ सहती क्यों हैं? वे ऐसी हिंसक शादी से बाहर क्यों नहीं निकलतीं?
सहने वालों में ग्रामीण पृष्ठभूमि की कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ ही नहीं हैं, बल्कि शहरों-महानगरों की उच्च मध्य वर्ग की पढ़ी-लिखी लड़कियों की बड़ी तादाद भी है।
सहती इसलिए हैं कि हम उन्हें आँख खोलते ही सहने की ही परवरिश देते हैं। और लडक़ों को परवरिश देते हैं कि कैसे किसी पर काबू रखा जाए और सहने पर मजबूर किया जाए।
अगर दहेज को सिफऱ् क़ानून से रुकना होता तो अब तक रुक गया होता। हमारे समाज में इसके लिए जिस सामाजिक- सांस्कृतिक बदलाव की ज़रूरत है, वह अब तक नदारद दिखता है।
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। पैदा होते ही लड़कियों की जिंदगी का सिरा शादी से जोड़ दिया जाता है। इसका एक इलाज लड़कियों और लडक़ी के घर वालों के पास है।
उनकी पहल के बिनिा मर्दों की व्यवस्था के इस हिंसक रूप से पार पाना मुमकिन नहीं है क्योंकि वे भी इस व्यवस्था के अटूट अंग हैं।
अगर घर वाले लड़कियों को बोझ मानेंगे या पराया धन मानेंगे तो शादी को ही उनकी जिंंदगी का आखिरी मकसद मानेंगे।
अगर वे लडक़ी को लडक़ों से कमतर मानेंगे, तो उस ग़ैरबराबरी के बोझ से हमेशा दबे रहेंगे। इसी का नतीजा है कि वे दहेज के जरिए वे उससे निजात पाने का रास्ता निकालते हैं।
इससे पहले वे बचपन से ही लडक़ी को हर तरह की ग़ैरबराबरी और हिंसा बर्दाश्त करने की आदत डलवाते रहते हैं।
इसलिए जब उसके साथ हिंसा होती और वह बताती है तो वे उसे ख़ुद भी बर्दाश्त करते हैं और उसे भी यही नसीहत देते हैं।
25 मई विश्व फुटबॉल दिवस
-दिलीप कुमार पाठक
फुटबॉल दुनिया का ऐसा खेल है, जिसे समझने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं है, फुटबॉल किसी भी भाषा में आए समझ आता है। मैदान पर पैर की एक जादुई ड्रिबल, एक सटीक पास और नेट से टकराती गेंद-यह वह रोमांच है जो दुनिया के हर कोने को एक धागे में पिरो देता है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र ने 25 मई को आधिकारिक तौर पर ‘विश्व फुटबॉल दिवस’ घोषित किया है। यह फैसला सिर्फ इस खेल की लोकप्रियता का जश्न नहीं है, बल्कि इस बात का सम्मान है कि फुटबॉल दुनिया में शांति, एकजुटता और युवाओं को जोडऩे का सबसे खूबसूरत जरिया है। जब पूरी दुनिया इस खेल के रंग में रंगी है, तब भारत के लिए यह दिन एक नई ऊर्जा और बड़े सपनों के साथ आगे बढऩे का अवसर है।
अक्सर कहा जाता है कि भारत सिर्फ क्रिकेट का दीवाना है, लेकिन सच यह है कि हमारे देश में फुटबॉल को लेकर एक खामोश क्रांति आकार ले रही है। कोलकाता के मैदानों का पारंपरिक जोश हो, केरल की गलियों की दीवानगी हो या पूर्वोत्तर के पहाड़ों से निकलती नई प्रतिभाएं-फुटबॉल का जज्बा हमारी रगों में तेजी से दौड़ रहा है। इंडियन सुपर लीग की सफलता और जमीनी स्तर पर शुरू हुए नए फुटबॉल प्रोजेक्ट्स ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय युवाओं में इस खेल को लेकर गजब का आकर्षण है। अब समय आ गया है कि इस जुनून को एक सही दिशा देकर हम वैश्विक मंच पर अपनी बड़ी पहचान बनाएं। भारत इस क्षेत्र में बहुत कुछ कर सकता है और इसके लिए हमें एक सामूहिक प्रयास की जरूरत है। सबसे बेहतरीन शुरुआत स्कूलों और स्थानीय स्तर पर ‘फुटबॉल फॉर ऑल’ यानी सबके लिए फुटबॉल अभियान चलाकर की जा सकती है।
यदि हर पंचायत और नगरीय निकाय में बच्चों के लिए एक अदद मैदान और बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित कर दी जाएं, तो देश को हुनर खोजने के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। हमारे कॉर्पोरेट जगत के पास सीएसआर फंड के जरिए ग्रामीण इलाकों में छोटी-छोटी फुटबॉल अकादमियां खोलने का शानदार मौका है। जब सरकार, कॉर्पोरेट और समाज मिलकर काम करेंगे, तो भारत में प्रतिभाओं का एक ऐसा ताना-बाना तैयार होगा जो भविष्य में वैश्विक कप्तानों को जन्म देगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल भारत के लिए एक बहुत बड़ी ‘सॉफ्ट पावर’ बन सकता है। खेल एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी राजनीतिक तनाव के दो देशों के लोगों के दिलों को जोड़ देता है।
-प्रमोद भार्गव
देश के न्यायालयों में जजों की कमी और लंबित मामलों की बढ़ती सूची समानांतर है। हालांकि अब षीर्श अदालत में न्यायाधीशों की संख्या बढक़र 37 हो गई है। मुख्य न्यायाधीश को भी जोड़ दें तो यह संख्या 38 हो जाती है। अतएव माना जा रहा है कि अब न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आएगी और लंबित मामले कम होंगे। जजों की जल्द संख्या बढ़ाने के नजरिए से सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या ) अधिनियम 1956 में संशोधन के लिए संसद के सत्र की प्रतीक्षा करने की बजाय रष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी करा लिया।इसे विधि आयोग ने अधिसूचित भी कर लिया।अब जल्दी ही एक साथ छह जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ कर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक बुला सकती है। इस अध्यादेश को मानसून सत्र में पेश किया जाएगा।
देश की अदालतों में मामलों का अंबार इतना है कि इनका बोझ कम करना आसान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय में 93 हजार उच्च न्यायालयों में 63 लाख 98 हजार और जिला अदालतों में 4 करोड़ 88 लाख प्रकरण लंबित हैं। जिला अदालतों में 4721 और हाईकोर्ट में 325 जजों के पद रिक्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तो अनुच्छेद-224-ए को लागू करने का फैसला लेकर जजों की संख्या बढ़ा ली। उच्च न्यायालयों में भी 61 पदों पर भर्ती की सिफारिश कॉलेजियम के मार्फत कर दी।लेकिन निचली अदालतों में जजों की कमी कैसे पूरी हो, इसके उपाय भी होना चाहिए ? दरअसल अनुच्छेद-224-ए का पिछले छह दशकों से इस्तेमाल नहीं किया गया था। इसके तहत न्यायालय बड़ी संख्या में लंबित मामलों को निपटाने के लिए हाईकोर्ट से सेवानिवृत्त जजों की दो से पांच साल के लिए नियुक्ति कर सकती है। तय है, जजों की कमी एक हद तक पूरी होगी। यदि सर्वोच्च न्यायालय अपने स्तर पर कार्य-संस्कृति में बदलाव के लिए ऐसे कुछ और फैसले ले, ले तो लंबित मामले भी जल्द से जल्द निपटने लग जाएंगे।
हमारे यहां संख्या के आदर्श अनुपात में कर्मचारियों की कमी का रोना अक्सर रोया जाता है। ऐसा केवल अदालत में हो,ऐसा नहीं है। पुलिस,शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों में भी गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध न कराने का यही बहाना है। जजों की कमी कोई भी नई बात नहीं है, 1987 में विधि आयोग ने हर 10 लाख की आबादी पर जजों की संख्या 10 से बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी। फिलहाल यह संख्या 22 है। हालांकि हमारे यहां अभी भी 14,000 अदालतों में करीब 18,000 न्यायाधीश काम कर रहे हैं। अदालतों का संस्थागत ढांचा भी बढ़ाया गया है। उपभोक्ता, परिवार और किषोर न्यायालय अलग से अस्तित्व में आ गए हैं। फिर भी काम संतोषजनक नहीं हैं। उपभोक्ता अदालतें अपनी कार्य संस्कृति के चलते अब बोझ साबित होने लगी हैं। बावजूद औद्योगिक घरानों के वादियों के लिए पृथक से वाणिज्य न्यायालय बनाने की पैरवी की जा रही है।
अलबत्ता आज भी ब्रिटिश परंपरा के अनुसार अनेक न्यायाधीश ग्रीष्म ऋतु में छुट्टियों पर चले जाते हैं। सरकारी नौकरियों में जब से महिलाओं को 33 प्रतिषत आरक्षण का प्रावधान हुआ है, तब से हरेक विभाग में महिलाकर्मियों की संख्या बढ़ी है। इन महिलाओं को 26 माह के प्रसूति अवकाश के साथ दो बच्चों की 18 साल की उम्र तक के लिए दो वर्श का ‘चाइल्ड केयर अवकाश‘ भी दिया जाता है। अदालत से लेकर अन्य सरकारी विभागों में मामलों के लंबित होने में ये अवकाष एक बड़ा कारण बन रहे हैं। इधर कुछ समय से लोगों के मन में यह भ्रम भी पैठ कर गया है कि न्यायपालिका से डंडा चलवाकर विधायिका और कार्यपालिका से छोटे से छोटा काम भी कराया जा सकता है। इस कारण न्यायलयों में जनहित याचिकाएं बढ़ रही हैं,जो न्यायालय के बुनियादी कामों को प्रभावित कर रही हैं। जबकि प्रदूशण, यातायात, पर्यावरण और पानी जैसे मुद्दों पर अदालत की दखल के बावजूद इन क्षेत्रों में बेहतर स्थिति नहीं बनी है। अदालतों के फैसलों में एकरूपता की बजाय विरोधाभास भी देखने में आ रहा है। यह भी मामले बढऩे का कारण बन रहा है।
न्यायिक सिद्धांत का तकाजा तो यही है कि एक तो सजा मिलने से पहले किसी को अपराधी न माना जाए,दूसरे आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति का फैसला तय समय-सीमा में हो। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहां ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। इसकी एक वजह न्यायालय और न्यायाधीशों की कमी जरूर है,लेकिन यह आंशिक सत्य है, पूर्ण नहीं मुकदमों को लंबा खिंचने की एक वजह अदालतों की कार्य-संस्कृति भी है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति राजेंद्रमल लोढ़ा ने कहा भी था ‘न्यायाधीष भले ही निर्धारित दिन ही काम करें, लेकिन यदि वे कभी छुट्टी पर जाएं तो पूर्व सूचना अवष्य दें। ताकि उनकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।‘ इस तथ्य से यह बात सिद्ध होती है कि सभी अदालतों के न्यायाधीष बिना किसी पूर्व सूचना के आकस्मिक अवकाष पर चले जाते हैं। गोया,मामले की तारीख आगे बढ़ानी पड़ती है। इन्हीं न्यायमूर्ति ने कहा था कि ‘जब अस्पताल 365 दिन चल सकते हैं तो अदालतें क्यों नहीं ?‘ यह बेहद सटीक सवाल था। हमारे यहां अस्पताल ही नहीं,राजस्व और पुलिस विभाग के लोग भी लगभग 365 दिन ही काम करते हैं। किसी आपदा के समय इनका काम और बढ़ जाता है। इनके कामों में विधायिका और खबरपालिका के साथ समाज का दबाव भी रहता है। बावजूद ये लोग दिन-रात कानून के पालन के प्रति सजग रहते हैं। जबकि अदालतों पर कोई अप्रत्यक्ष दबाव नहीं होता है।
यही प्रकृति वकीलों में भी देखने में आती है। हालांकि वकील अपने कनिष्ठ वकील से अकसर इस कमी की वैकल्पिक पूर्ति कर लेते हैं। लेकिन वकील जब प्रकरण का ठीक से अध्ययन नहीं कर पाते अथवा मामले को मजबूती देने के लिए किसी दस्तावेजी साक्ष्य को तलाष रहे होते हैं तो वे बिना किसी ठोस कारण के तारीख आगे खिसकाने की अर्जी लगा देते हैं। विडंबना है कि बिना कोई ठोस पड़ताल किए न्यायाधीश इसे स्वीकार भी कर लेते हैं। तारीख बढऩे का आधार बेवजह की हड़तालें और न्यायाधीषों व अधिवक्ताओं के परिजनों की मौतें भी हैं। ऐसे में श्रद्वांजली सभा कर अदालतें कामकाज को स्थगित कर देती हैं। जबकि इनसे बचने की जरूरत है। लिहाजा कड़ाई बरतते हुए कठोर नियम-कायदे बनाने का अधिकतम अंतराल 15 दिन से ज्यादा का न हो,दूसरे अगर किसी मामले का निराकरण समय-सीमा में नहीं हो पा रहा है तो ऐसे मामलों को विषेश प्रकरण की श्रेणी में लाकर उसका निराकरण त्वरित और लगातार सुनवाई की प्रक्रिया के अंतर्गत हो। ऐसा होता है, तो मामलों को निपटाने में तेजी आ सकती है। ऐसी ही सोच के चलते मुख्यमंत्रियों और न्यायाधीशों के एक सम्मेलन में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने कहा था, ‘हम पूरी कोशिश करेंगे कि अदालतों में कोई भी मुकदमा पांच साल से ज्यादा न खिंचे।’ यह न्याय प्रक्रिया के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण था।
-गरिकिपति उमाकांत
शेख़ अम्मी रोजगार की तलाश में खाड़ी देशों में गई थीं। वहाँ उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ा, इसलिए गृह राज्य आंध्र प्रदेश लौट आईं।
सोशल मीडिया पर ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें पुरुष और महिलाएं वीडियो पोस्ट कर कह रहे हैं कि वे ख़तरे में हैं और उन्हें मदद की ज़रूरत है।
विदेश में कठिनाइयों का सामना कर रहे लोगों को वापस लाने के लिए, डॉक्टर बीआर आंबेडकर कोनासीमा जि़ले में एक प्रवासन केंद्र की स्थापना की गई है।
जि़ला कलेक्टर इसके अध्यक्ष हैं। केंद्र का कहना है कि वह उत्पीडऩ के आरोपों की गहन जांच करेगा।
हालांकि, बीबीसी ख़ुद अम्मी के आरोपों की पुष्टि नहीं करता है। यह सवाल भी उठ रहे हैं कि खाड़ी के देशों में रोजग़ार के लिए जाने वालों को समस्याओं का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
शेख़ अम्मी के साथ क्या हुआ?
कोनासीमा जि़ले के द्राक्षारामम की निवासी अम्मी, दिसंबर 2025 में कडियाम क्षेत्र की सुल्ताना (महिला का नाम बदल दिया गया है) के माध्यम से क़तर गई थीं। वहाँ उन्होंने एक घर में रसोइया और अन्य घरेलू सहायिका के रूप में काम किया।
अम्मी ने बीबीसी को बताया, ‘उन्होंने मुझसे वहाँ बहुत काम करवाया, लेकिन मुझे ठीक से खाना नहीं दिया। मुझे मिर्च के साथ थोड़े से चावल खाने को मिलते थे। उससे मेरे पेट में दर्द होने लगा। मुझे वहीं सोना पड़ता था। दो महीने के अंदर ही मैं बीमार पड़ गई। मुझे दौरे पडऩे लगे और एक दिन हालत गंभीर हो गई और मुझे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा, ‘मैं थक गई हूं, मैं कोई काम नहीं कर सकती।’ मालिकों ने मुझसे दो लाख रुपये वापस मांगे।’
‘उन्होंने कहा कि जब तक पैसे नहीं मिल जाते, वे मुझे नहीं भेजेंगे। उन्होंने कहा कि एजेंट को फ़ोन करने से उनका कोई लेना-देना नहीं है। एक पल तो मुझे लगा कि मैं वहीं मर जाऊंगी।
द्राक्षारामम में मेरे बेटे ने पैसे जुटाने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उसे पैसे नहीं दिए। आखिरकार, उसने अधिकारियों से शिकायत की। उन्होंने कार्रवाई की और वहाँ के दूतावास से बात की लेकिन मुझे जाने नहीं दिया।’
हालांकि, उन्हें क़तर भेजने वाली सुल्ताना अम्मी के आरोपों से इनकार करती हैं।
सुल्ताना ने बीबीसी को बताया कि वह एजेंट नहीं हैं, लेकिन दुबई में उनके कुछ परिचित लोग हैं। अगर कोई उनसे काम के लिए वहां जाने को कहता है, तो वह उन्हें भेज देती हैं।
सुल्ताना ने यह भी कहा कि उन्होंने शेख़ अम्मी को उनके कहने पर भेजा था, लेकिन वहां जाने के बाद उन्हें वहां का माहौल ठीक नहीं लगा। उनके साथ गए लोग ठीक थे।
गोदावरी जि़ले से खाड़ी देशों तक
गोदावरी जि़ले के हज़ारों लोग लंबे समय से रोजग़ार की तलाश में खाड़ी देशों में पलायन कर रहे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी, कोनासीमा, काकीनाडा और एलुरु जिलों के शिक्षित लोग वाइट कॉलर (कार्यालय) नौकरियों के लिए जाते हैं जबकि कम पढ़े लिखे लोग वहां ब्लू कॉलर नौकरियों के लिए जाते हैं।
पिछले दो-तीन दशकों से, निर्माण उद्योग के कुशल श्रमिक, जैसे कि राजमिस्त्री, बढ़ई, इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, और वेल्डर के साथ कुक, हाउसकीपिंग के काम करने के लिए खाड़ी देशों में जा रहे हैं। इन कामों में शारीरिक श्रम की भी ज़रूरत होती है।
हालांकि, डॉक्टर अंबेडकर कोनासीमा जि़ले के अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में खाड़ी देशों में अज्ञात एजेंटों के ज़रिए धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं और कुछ नियोक्ताओं से उत्पीडऩ के कारण, घर लौटने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है।
उन्होंने बताया कि हाल ही में, कोनासीमा जि़ले के 80 से अधिक श्रमिक जि़ला अधिकारियों की मदद से अपने गृहनगर लौट आए हैं।
कई आरोप
अन्नामय्या जि़ले के वायालापाडु की निवासी शहनाज़ ओमान गई थीं। शहनाज़ ने हाल ही में सोशल मीडिया के माध्यम से आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण से अपनी सुरक्षा के लिए अपील की थी, क्योंकि उन्हें वहां कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
पवन कल्याण ने एक्स पर पोस्ट किया कि जैसे ही यह मामला उनके संज्ञान में आया, उन्होंने विदेश मंत्रालय से उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया और उनके सहयोग से उन्हें सुरक्षित रूप से आंध्र प्रदेश लाया गया।
इससे पहले, जुलाई 2025 में असिलेटी निर्मला नामक एक यूजऱ ने नारा लोकेश (मंत्री और चंद्रबाबू नायडू के बेटे) को बताया था कि रोजग़ार के लिए मस्कट गई गुडीवाडा के पास जोन्नापाडु की निवासी जनार्दनपुरम दुर्गा को परेशानी हो रही है, उसे वापस लाया जाए।
इस पर नारा लोकेश ने ट्वीट किया कि उन्होंने अपनी टीम को दुर्गा को उनके गृहनगर लाने के लिए सभी ज़रूरी व्यवस्थाएं करने को कहा है।
धनलक्ष्मी की कहानी
वनपल्ली की कोल्लाडा धनलक्ष्मी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह खाना पकाने और अन्य काम करने के लिए कुवैत गई थीं। वह भी हाल ही में अपने गृहनगर लौटी हैं।
धनलक्ष्मी बताती हैं, ‘मैं इस उम्मीद से कुवैत गई थी कि दो-तीन साल रहूं और कुछ पैसे कमा लूं। मैं अपना घर बनाना चाहती थी। वहाँ पहुँचने के बाद मैंने काम किया लेकिन घर की बुज़ुर्ग महिला मुझे प्रताडि़त करती थी। उसे जो भी चीज़ मिलती, उससे मुझे पीटती थी। उसने मुझे जान से मारने की धमकी भी दी। यातना सहन न कर पाने के कारण मैंने अपने पति को कॉल किया। वह कलेक्टर के दफ्तर गए और मदद मांगी। वहां से दूतावास संपर्क किया गया। इस तरह मैं वहां से वापस लौटी।’
बीबीसी ने धनलक्ष्मी को कुवैत भेजने वाले काकीनाडा के राजू और रविंदर (नाम बदले हुए) से बात की।
उन्होंने कहा, ‘हम आधिकारिक एजेंट नहीं हैं। अगर कोई हमसे अनुरोध करता है तो हम अपने जान-पहचान के लोगों को भेजते हैं। हमारे भेजे गए किसी भी व्यक्ति को यह समस्या नहीं हुई। केवल धनलक्ष्मी को हुई। अगर हमें पहले से पता होता तो हम उन्हें इस तरह नहीं भेजते।’
शेषरत्नम ने बीबीसी को बताया, ‘मैं फिसल गई और मेरे पैर में चोट लग गई। लेकिन वहाँ के मालिकों को कोई परवाह नहीं थी। चोट एक बड़े घाव में बदल गई और बहुत दर्द होने लगा। दो हफ़्ते बाद, वे मुझे अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने घाव की सफ़ाई की और बताया कि मुझे डायबिटीज़ है। उन्होंने कहा कि चोट को पूरी तरह ठीक होने में समय लगेगा और तब तक मुझे कोई काम नहीं करना चाहिए। इसके बाद मालिकों ने मुझे दफ़्तर भेज दिया। वे मुझसे 1,60,000 रुपये वापस भी मांग रहे थे। हालांकि, यहां के अधिकारियों ने मुझे समझा-बुझाकर भारत वापस बुला लिया।’
बीबीसी ने पी। गन्नावरम क्षेत्र के एक अनधिकृत एजेंट संपथ (नाम बदला हुआ) से बात करने की कोशिश की, जिसने शेषरत्नम को मस्कट भेजा था, लेकिन वह उपलब्ध नहीं था।
अमलापुरम के रहने वाले श्रीनु ने बताया कि उन्हें रेस्तरां का काम सौंपने का वादा करके रेगिस्तान की तेज़ धूप में काम करने पर मजबूर किया गया। बिना भरपेट भोजन किए रेगिस्तान में काम करना वह सहन नहीं कर सके और वापस लौट आए।
बीबीसी ने श्रीनु को दुबई भेजने वाले अल्लावरम के अमर से बात की, तो उन्होंने कहा कि वे एजेंट नहीं हैं, बल्कि कभी-कभी दुबई में अपने रिश्तेदारों के ज़रिये लोगों को काम के लिए भेजते हैं।
उन्होंने कहा कि श्रीनु को वहां का माहौल पसंद नहीं आया और वह वापस लौट आए। उनके साथ गए दो अन्य लोग वहां काम कर रहे हैं।
बीबीसी ख़ुद उन आरोपों की पुष्टि नहीं करता है जो कुछ लोगों ने लगाए हैं कि खाड़ी देशों में उनके नियोक्ताओं ने उनका उत्पीडऩ किया।
बीबीसी ने वहां के एजेंटों और उन्हें रोजग़ार देने वाले परिवारों से संपर्क करने के प्रयास किए लेकिन न तो कथित पीडि़त और न ही अधिकारी मालिकों के बारे में कोई जानकारी दे पाए। इसकी वजह से बीबीसी उनसे संपर्क करने में असमर्थ रहा।
-सुसान चाको, ललित मौर्य
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक और न्यायिक सीमाओं को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 14 मई, 2026 को दिए अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सीवर लाइन बिछाने या दूसरे बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों का प्रबंधन और प्रशासन देखना अदालतों का काम नहीं है। ऐसी समस्याओं का समाधान करना संबंधित सरकारी एजेंसियों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भीड़भाड़ वाली कॉलोनियों में बुनियादी सुविधाओं की कमी से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए न तो हाई कोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट को प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका निभानी चाहिए। अदालतों का काम नीतियां बनाना या प्रशासनिक उपाय तय करना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करना है।
क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि यह मामला तब सामने आया जब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने दिल्ली हाई कोर्ट के 18 जून 2025 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी। हाई कोर्ट ने उस आदेश में ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की परेशानियों को दूर करने के लिए खुद पहल करते हुए दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और एम्स को कई निर्देश जारी किए थे।
ये निर्देश ग्रीन पार्क एक्सटेंशन से अरबिंदो तक सीवर लाइन के डिजाइन और निर्माण से जुड़े मामले में दिए गए थे। हालांकि बाद में, 27 अक्टूबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश के अमल पर रोक लगा दी। इसके बाद मामले पर विस्तार से सुनवाई हुई और केंद्र सरकार को भी इस मुद्दे पर विचार करने के लिए पक्षकार बनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दिल्ली सरकार पहले ही पक्षकार है। इसके अलावा दिल्ली जल बोर्ड, नगर निगम और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड सहित कई स्थानीय एजेंसियां भी मामले से जुड़ी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि ग्रीन पार्क, ग्रीन पार्क एक्सटेंशन और आसपास के इलाकों के लोग जल निकासी की खराब व्यवस्था के कारण भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में मौजूद ड्रेनेज व्यवस्था बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पर्याप्त नहीं रह गई है। इसी कमी के कारण इलाके में गंभीर जलभराव की समस्या भी पैदा हो रही है।
हालांकि साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि इन समस्याओं का समाधान करना और कानून के अनुसार जरूरी कदम उठाना संबंधित सरकारी एजेंसियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
किसी भी देश की मुद्रा की मज़बूती या कमज़ोरी वहाँ की अर्थव्यवस्था की सेहत की स्थिति बताती है.
आमतौर पर जिस देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही हो, उसकी मुद्रा मज़बूत होती है.
भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मौजूदा समय में भी बढ़िया है, इसके बावजूद 2018 से हर साल रुपया कमज़ोर हुआ है.
2013 में जब नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, तब उन्होंने कमज़ोर होते रुपये को लेकर तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ एक कारगर राजनीतिक अभियान चलाया था.
उस समय बड़े बॉलीवुड सितारों, लोकप्रिय धर्मगुरुओं और कई मशहूर हस्तियों को यह कहते हुए देखा गया था कि भारतीय रुपया डॉलर के मुक़ाबले 60 के स्तर तक पहुँच गया है.
अब अक्सर सोशल मीडिया पर लोग सवाल करते पाए गए हैं कि जब बीजेपी के शासनकाल में रुपया लगातार गिरते हुए 97 के क़रीब आ गया, तब उनमें से किसी के पास कोई टिप्पणी क्यों नहीं है.
अगर रुपया डॉलर के मुकाबले 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर जाता है तो सरकार की असहजता और बढ़ सकती है.
भारत में कमज़ोर रुपए का मतलब है कि आयात महंगे हो जाते हैं. इससे तेल, रसोई गैस, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी ज़रूरी वस्तुओं की क़ीमत बढ़ती हैं. इनमें से अधिकांश भारत विदेशों से ख़रीदता है.
कमज़ोर रुपया उन परिवारों के लिए फ़ायदा भी लेकर आता है जो विदेशों में काम कर रहे भारतीयों के पैसों पर निर्भर हैं क्योंकि हर डॉलर के ज़्यादा रुपये मिलते हैं.
भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा रेमिटेंस हासिल करने वाले देशों में से एक है.
मार्च 2025 तक के वर्ष में प्रवासी भारतीयों ने देश में 135 अरब डॉलर से अधिक भेजे थे.
हालांकि ईरान युद्ध के कारण पर्सियन गल्फ़ के देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय श्रमिकों से आने वाला पैसा प्रभावित हो सकता है.
चिंताजनक हालात
भारतीय मुद्रा रुपए की जैसी हालत है, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है.
एक अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपया 97 के क़रीब पहुँच चुका है. अभी 2026 में पाँच महीने भी नहीं पूरे हुए हैं और रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में 7.5% गिर चुका है.
रुपए को थामने की भारत की हर कोशिश बहुत कारगर साबित नहीं हो रही है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) पर दबाव बढ़ रहा है कि वह कुछ ठोस क़दम उठाए.
सरकार रुपए की कमज़ोरी को काबू में करने के लिए कई क़दम उठा रही है लेकिन इसका असर अभी दिख नहीं रहा है. सरकार ने सोना और चांदी पर आयात शुल्क दोगुने से ज़्यादा बढ़ा दिए हैं.
पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में बढ़ोतरी की है और खाद्य तेल आयात पर प्रतिबंध लगाने पर भी विचार कर रही है. वहीं भारतीय रिज़र्व बैंक समय-समय पर घरेलू मुद्रा बाज़ार में डॉलर बेचकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.
ईरान पर इसराइल और अमेरिका के हमले बाद तेल की क़ीमतों में आई तेज़ बढ़ोतरी भारत के व्यापार घाटे को बढ़ा रही है. रुपए कमज़ोर होने का असर भारत के शेयर बाज़ार पर भी सीधा पड़ रहा है.
विदेशी निवेशक इस साल भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.
रुपए कमज़ोर होने से विदेशी निवेशकों को डॉलर में रिटर्न कम मिलता है. ऐसे में ये उन देशों की ओर रुख़ कर रहे हैं, जिनकी मुद्राएं डॉलर के सामने डटकर खड़ी हैं.
वैश्विक निवेशकों को लग रहा है कि रुपया आगे और कमज़ोर हो सकता है.
ऐसा अनुमान भी है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया 100 के स्तर तक पहुँच सकता है. यह एक ऐसा स्तर है, जिसे कभी अकल्पनीय माना जाता था.
सिटी ग्रुप का मानना है कि भारतीय कंपनियों के विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने और निर्यातकों को अपनी विदेशी मुद्रा आय जल्दी भारत वापस लाने के लिए सख़्त नियम लागू किए जाने की संभावना है.
तेल की बढ़ती क़ीमतें
भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 90 प्रतिशत तेल आयात करता है. ऐसे में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने का मतलब है कि समान मात्रा में तेल ख़रीदने के लिए भारत को पहले से ज्यादा डॉलर ख़र्च करने पड़ रहे हैं.
इसके साथ ही पूंजी निकासी भी दबाव बढ़ा रही है. 2026 में वैश्विक निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर निकाल चुके हैं.
पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के ख़िलाफ़ टैरिफ़ की घोषणा की तो रुपए में गिरावट और तेज़ हो गई.
इसके बाद अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला कर दिया और तेल की क़ीमतें बढ़ गईं. रुपया एक बार फिर से दबाव में आया और यह बढ़ता ही जा रहा है.
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रुपये की कमज़ोरी की असली वजह बाहरी नहीं बल्कि घरेलू संरचनात्मक कमज़ोरियां भी हैं, जिन्हें तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद दूर नहीं किया जा सका.
2025 में रुपया एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा था और 2026 में भी यही स्थिति बनी रही.
2025 में रुपये की कमज़ोरी के पीछे ट्रंप के दोहरे अंकों वाले टैरिफ, भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशकों का बाहर जाना और धीमी आर्थिक वृद्धि को माना गया.
मौजूदा कमज़ोरी इस डर को दर्शाती है कि ईरान युद्ध के कारण बढ़ी ऊर्जा क़ीमतें महंगाई बढ़ाएंगी, आर्थिक वृद्धि को कमज़ोर करेंगी और भारत के चालू खाते के घाटे को और बढ़ा देंगी.
ब्लूमबर्ग इकनॉमिक्स के अनुमान के अनुसार, अगर कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल और गैस क़ीमतें युद्ध से पहले के स्तर से 50 प्रतिशत ऊपर रहती हैं तो भारत का आयात बिल हर महीने पाँच अरब डॉलर तक बढ़ सकता है.
आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव क्या कारण मानते हैं?
20 मई को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में आरबीआई के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने लिखा था, ''रुपए में कमज़ोरी हालिया संकट की कहानी नहीं है. असल में रुपया पिछले कई वर्षों से लगातार दबाव में रहा है क्योंकि भारत से बाहर पूंजी बाहरी और घरेलू दोनों कारणों से जा रही है. विदेशी निवेशक दुनिया भर में बेहतर अवसरों की तलाश में भारत से पैसा निकालकर अन्य बाज़ारों की ओर बढ़ गए.
वैश्विक स्तर पर पूंजी अब तकनीक-आधारित अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर एआई, बायोटेक और डेटा सेंटर की ओर आकर्षित हो रही है. भारत अब भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन इन अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में उसकी भूमिका सीमित दिखाई देती है. जैसे-जैसे पैसा इनोवेशन वाली इकॉनमी की ओर जा रहा है, रुपए पर दबाव बढ़ना लगभग तय है.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अब भी लगभग 700 अरब डॉलर के आसपास है, जो दुनिया के सबसे बड़े भंडारों में से एक है. लेकिन इससे अति-आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए. सामान्य समय में यह राशि बड़ी लग सकती है, लेकिन संकट के दौर में इसकी असली अहमियत उसकी विश्वसनीयता होती है.''
विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव
भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार 690 अरब डॉलर पर आ गया है. यह फ़रवरी 2026 के रिकॉर्ड 728 अरब डॉलर के स्तर से नीचे है.
भारत दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में शामिल है. लेकिन आयात बिल बढ़ने के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता जा रहा है. 31 मार्च को समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत ने ऊर्जा आयात पर 174 अरब डॉलर खर्च किए थे.
इसी अवधि में सोने का आयात 72 अरब डॉलर तक पहुँच गया था. वहीं चांदी का आयात क़रीब 150 प्रतिशत बढ़कर 12 अरब डॉलर हो गया था. उर्वरक आयात भी पिछले वित्त वर्ष में 77 प्रतिशत बढ़कर 14.6 अरब डॉलर पहुँच गया था.
इन चार वस्तुओं तेल, सोना, चांदी और उर्वरक पर भारत का आयात बिल केवल चार वर्षों में दोगुने से भी अधिक हो गया है. ज़ाहिर है कि आयात बिल बढ़ता है तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च होता है. डॉलर कम होगा तो रुपया कमज़ोर होगा. यही वजह है कि सरकार अब इस बढ़ते आयात दबाव पर ब्रेक लगाने की कोशिश कर रही है.
निर्यात से ज़्यादा आयात
भारत अब भी जितना निर्यात करता है, उससे ज़्यादा आयात करता है. डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ अब भी अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात पर दबाव बनाए हुए हैं. हालांकि भारत कई देशों से मुक्त व्यापार समझौता कर रहा है.
जब पूंजी बाहर जा रही हो और विदेशी मुद्रा का प्रवाह धीमा हो, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि सरकार ने अब पैनिक बटन दबाना क्यों शुरू कर दिया है.
विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए सोने के आयात को सीमित करना अपेक्षाकृत कम तकलीफ़देह विकल्प माना जा रहा है.
अप्रैल में भारत की थोक महंगाई दर बढ़कर 8.3 प्रतिशत पहुंच गई. क़रीब चार सालों की यह सबसे तेज वृद्धि है. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, निर्यात और आयात के बीच का अंतर जनवरी महीने में बढ़कर 34.68 अरब डॉलर हो गया था जबकि एक महीने पहले यह 25.05 अरब डॉलर था.
जनवरी में आयात सालाना आधार पर 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर हो गया जबकि निर्यात केवल 0.6 प्रतिशत बढ़कर 36.56 अरब डॉलर रहा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
इलॉन मस्क की अपील को कोर्ट ने खारिज किया है कि ओपन एआई मुनाफा कमाने के लिए अपने बुनियादी मूल्यों के खिलाफ जा रहा है. लेकिन असल जीत-हार का सवाल इससे कहीं ऊपर है.
डॉयचे वैले पर सोनम मिश्रा की रिपोर्ट –
अमेरिका की कैलिफोर्निया स्थित ऑकलैंड फेडरल कोर्ट में सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसले में जूरी ने इलॉन मस्क द्वारा दायर मुकदमे को खारिज कर दिया. मस्क ने आरोप लगाया था कि ओपन एआई ने अपने मूल उद्देश्य यानी "मानवता के हित में सुरक्षित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित करने" से भटककर मुनाफे की राह पकड़ ली है.
नौ सदस्यीय जूरी ने इस मामले में दो घंटे से भी कम समय में विचार-विमर्श कर फैसला ले लिया. जूरी ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनी ओपन एआई मानवता के हित में काम करने के अपने मूल उद्देश्य से भटकने के आरोपों के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं है. इस फैसले में जूरी ने माना कि मस्क ने यह मुकदमा बहुत देर से दायर किया है. अदालत के अनुसार, मस्क को ओपन एआई की कारोबारी योजनाओं की जानकारी कई सालों पहले ही थी इसलिए अगस्त 2024 में दायर की गई उनकी याचिका कानूनी समय सीमा से बाहर थी. यह फैसला ओपन एआई के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है क्योंकि इससे कंपनी के संभावित आईपीओ (यानी इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग) का रास्ता लगभग साफ हो गया है. विश्लेषकों के मुताबिक ओपन एआई की वैल्यूएशन एक हजार अरब डॉलर तक पहुंच सकती है, जो कि टेक इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ में से एक होगा.
फैसले के बाद भी मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि वह इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगे. मस्क का आरोप है कि सैम ऑल्टमैन और ग्रेग ब्रॉकमैन ने एक "चैरिटी” को निजी मुनाफे की मशीन में बदल दिया. उन्होंने लिखा, "ऑल्टमैन और ब्रॉकमैन ने असल में एक चैरिटी को लूटकर खुद को अमीर बनाया. अब सिर्फ सवाल यह है कि उन्होंने यह कब किया!” उन्होंने आगे लिखा, "चैरिटी संस्थाओं को लूटने की ऐसी मिसाल कायम करना अमेरिका में दान और परोपकार की भावना के लिए बेहद विनाशकारी है.” वहीं अदालत की अध्यक्षता कर रहीं जज यवोन गोंजालेज रोजर्स ने संकेत दिया कि अपील में भी मस्क की राह आसान नहीं होगी. जज ने कहा, "जूरी के फैसले का समर्थन करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, यही वजह है कि मैंने उसी समय इस मामले को खारिज कर दिया.”
मुनाफे की लड़ाई
मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाए. मस्क का कहना था कि उन्होंने 2015 में ओपन एआई को एक गैर-लाभकारी संस्था के रूप में स्थापित करने में मदद की थी ताकि एआई तकनीक मानवता के हित में विकसित हो सके. लेकिन बाद में कंपनी ने माइक्रोसॉफ्ट और अन्य निवेशकों से अरबों डॉलर जुटाकर खुद को मुनाफा कमाने वाली संस्था में बदल लिया. मस्क के वकीलों ने अदालत में दावा किया कि ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने निवेशकों और सह-संस्थापकों को गुमराह किया है. कई पूर्व कर्मचारियों और बोर्ड सदस्यों ने भी ऑल्टमैन की ईमानदारी पर सवाल उठाए हैं. मुकदमे के दौरान यह भी सामने आया कि 2023 में ऑल्टमैन को कुछ समय के लिए कंपनी बोर्ड से भी हटाया गया था क्योंकि उनके व्यवहार और पारदर्शिता को लेकर चिंताएं बढ़ रही थी.
दूसरी तरफ ओपन एआई ने मस्क के आरोपों को "प्रतिद्वंद्वी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश” करार दिया. कंपनी के वकीलों का कहना था कि मस्क खुद एआई बाजार में अपनी कंपनी एक्स एआई के जरिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और यह मुकदमा उसी कारोबारी लड़ाई का ही एक हिस्सा है. ओपन एआई के वकील विलियम सैविट ने अदालत के बाहर कहा, "जूरी के इस फैसले ने साबित कर दिया है कि यह मुकदमा एक प्रतिस्पर्धी कंपनी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश थी.” उन्होंने आगे कहा, "मस्क अपने दावे कर सकते हैं और अपनी कहानियां सुना सकते हैं, लेकिन इस जूरी के नौ सदस्यों ने पाया कि उनकी बातें सिर्फ कहानियां ही थी, कोई तथ्य नहीं.”
अमेरिकी वित्तीय सेवा और निवेश कंपनी वेडबुश के विश्लेषक डैन आइव्स ने कहा कि इस फैसले से ओपन एआई के संभावित आईपीओ पर मंडरा रहा बड़ा कानूनी खतरा खत्म हो गया है. उन्होंने कहा, "ऑल्टमैन की छवि और नेतृत्व पर लगे दाग के बावजूद यह फैसला उनके और ओपन एआई के लिए एक बड़ी जीत है.” इस मामले में माइक्रोसॉफ्ट पर भी सहयोग और समर्थन देने के आरोप लगे थे. माइक्रोसॉफ्ट के एक अधिकारी ने गवाही में बताया कि कंपनी ने ओपन एआई के साथ साझेदारी पर लगभग 100 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए हैं.
असल नुकसान किसका?
जज गोंजालेज रोजर्स ने मुकदमे की शुरुआत में ही साफ कर दिया था कि वह इस सुनवाई को एआई के खतरों पर बहस में नहीं बदलना चाहती हैं. इसके बावजूद नौकरी छिनने, मानसिक स्वास्थ्य पर असर और यहां तक कि मानव अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे जैसे एआई से जुड़े अनसुलझे सवाल पूरे मुकदमे के दौरान पृष्ठभूमि में बने रहे.
फेडरल कोर्ट के बाहर लगातार प्रदर्शनकारी जुटते रहे, जो मस्क और ऑल्टमैन दोनों के खिलाफ नारे लगा रहे थे. प्रदर्शनकारियों के पोस्टरों पर लिखा था कि इस लड़ाई में असली नुकसान आम लोगों का हो रहा है, जिनकी जिंदगी ऐसे उद्योग के कारण बदल रही है. जिसका नियंत्रण केवल कुछ अरबपतियों तक सीमित है. एक तरफ कंपनियां एआई से अरबों डॉलर कमाने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ लोग नौकरी जाने, मानसिक स्वास्थ्य पर असर, निगरानी तकनीक और फेक कंटेंट जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं.
कोलंबिया लॉ स्कूल की प्रोफेसर डोरोथी लुंद ने कहा, "यह मौजूदा दौर की एक अजीब तस्वीर पेश करता है, जहां इतनी महत्वपूर्ण तकनीक सरकारों की पहल के बजाय मस्क और ऑल्टमैन जैसे अरबपतियों की मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के हाथों बनाई जा रही है.”
विशेषज्ञों का मानना है कि एआई अब केवल टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि सामाजिक शक्ति भी बन चुका है. शिक्षा, पत्रकारिता, चिकित्सा, कानून और रोजगार जैसे क्षेत्रों में इसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, जबकि इसपर नियंत्रण का अधिकार केवल कुछ गिने-चुने कॉर्पोरेट समूहों और व्यक्तियों के हाथों में सिमटता जा रहा है.
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की टेक पॉलिसी विशेषज्ञ सारा क्रेप्स के अनुसार, यह मुकदमा केवल मस्क और ऑल्टमैन के बीच का विवाद नहीं था, बल्कि यह विवाद उस दूरी के बारे में भी है, जो एआई बनाने वाले शक्तिशाली लोगों और उससे प्रभावित होने वाली आम जनता के बीच बढ़ती जा रही है.
-दिलनवास पाशा
भारत की तेल कंपनियों ने एक सप्ताह के भीतर दो बार तेल के दाम बढ़ाए हैं।
दिल्ली में अब पेट्रोल कऱीब 98 रुपए प्रति लीटर है वहीं डीज़ल के दाम भी 90 रुपए प्रति लीटर से ऊपर हैं। कुल बढ़ोतरी करीब चार रुपए प्रति लीटर की हुई है।
अमेरिका और इसराइल के फऱवरी के अंत में ईरान पर हमले के बाद से मध्य पूर्व में चल रहे संकट की वजह से होर्मुज़ जलडमरुमध्य से तेल नहीं निकल पा रहा है। विश्लेषक मान रहे हैं कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो तेल की क़ीमतें आगे और भी बढ़ सकती हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक़ तेल की बढ़ती क़ीमतों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है और पिछले छह महीनों में ये दिखा भी।
पिछले साल नवंबर में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें जब 60-65 डॉलर प्रति बैरल पर थीं, और तब रिज़र्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए आर्थिक वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था।
लेकिन इसके बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बने हालात की वजह से कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और मई 2026 में आरबीआई का कहना है मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर 6।9 फ़ीसद के आस-पास रह सकती है। यही नहीं, खुदरा महंगाई दर जो नवंबर 2025 में 0.7 प्रतिशत थी वह अब बढक़र 3.48 प्रतिशत हो गई है। इसका सीधा मतलब ये है कि भारत में खाना, किराया, ट्रांसपोर्ट और रोज़मर्रा के अन्य ख़र्च और महंगे हो गए हैं। 3.48 प्रतिशत की महंगाई दर अभी संकट का स्तर नहीं है लेकिन यह साफ़ है कि महंगाई तेज़ी से बढ़ रही है।
वहीं थोक महंगाई दर जहां नवंबर में बहुत कम थी वहीं अब यह 8।3 प्रतिशत है। यानी कंपनियों और उद्योगों की लागत बढ़ गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि उद्योगों का उत्पादन ख़र्च बढ़ रहा है जिसमें कच्चा माल, ईंधन, धातु, ट्रांसपोर्ट आदि की बढ़ती क़ीमतें शामिल हैं।
थोक महंगाई दर का बढऩा निकट भविष्य में उत्पादों की क़ीमतें बढऩे का संकेत होता है। हाल ही में भारत में दूध के दामों में भी दो रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हुई है।
मध्य पूर्व संकट के बाद से बदलते हालात
विश्लेषक मानते हैं कि महंगाई और विकास दर के संकेत देने वाले इन सूचकांकों में बढ़ोतरी की सीधी वजह अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम बढऩा है।
नवंबर में ब्रेंट क्रूड तेल के दाम 60-65 डॉलर प्रति बैरल के बीच थे जो अब 100-110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं। यानी कच्चे तेल के दाम लगभग दोगुने हो गए हैं।
भारत सरकार ने कच्चे तेल के दामों में हो रही बढ़ोतरी के बावजूद मार्च से मध्य मई के बीच तेल के दाम नहीं बढ़ाए थे। विश्लेषक मान रहे हैं कि कई राज्यों में चुनावों की वजह से सरकार ये क़दम उठाने से बच रही थी।
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हो जाने के दो सप्ताह के भीतर ही तेल कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए हैं।
नरेंद्र तनेजा का कोट कार्ड
अर्थशास्त्री और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, ‘चुनावों की वजह से सरकार तेल के दाम बढ़ाने में हिचक रही थी, जिस तरह से कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, भारत में तेल के दाम आगे भी बढ़ेंगे।’
भारत सरकार ने कच्चे तेल की क़ीमतों के बढ़ते प्रभाव को जनता तक पहुंचने से रोकने के लिए मार्च में एक्साइज़ ड्यूटी दस रुपए तक कम की थी।
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ‘तेल के बारे में कहा जाता है कि यह 90 फीसदी राजनीति है। सरकार इसे केवल अर्थशास्त्र की नजऱ से नहीं देख सकती और उसे आम उपभोक्ता को बचाने के लिए हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा।’
तनेजा साफ़ कहते हैं, ‘यदि होर्मुज़ नहीं खुला और तेल वहां फंसा रहा तो भारत में आगे भी तेल के दाम बढऩा तय है। भारत सरकार के पास इस मामले में बहुत सीमित विकल्प हैं।’ बढ़ते तेल के दामों और गिरते आयात का असर भारत के रणनीतिक तेल भंडारों पर भी पड़ रहा है। नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ‘भारत के पास सिर्फ पचास दिन के ही स्ट्रेटेजिक रिज़र्व हैं। हम 57 लाख बैरल तेल प्रतिदिन खपत करते हैं, यदि यही चलता रहा तो इससे स्ट्रेटेजिक रिज़र्व पर दबाव बढ़ सकता है।’
वहीं, प्रोफेसर अरुण कुमार को लगता है कि भारत सरकार ऊर्जा संकट को भांपने में चूक गई और कदम उठाने में देरी कर दी।
प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि सरकार ने क़दम उठाने में लगभग 75 दिन की देरी कर दी। यदि सरकार ऊर्जा संकट का सही अंदाज़ा लगाकर रिफ़ाइंड उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा देती तो इससे हम क्रूड बचा सकते थे, अप्रैल महीने में हमने क्रूड से जो रिफ़ाइंड उत्पाद तैयार किए उसका पैंतीस प्रतिशत तक निर्यात कर दिया। यह उत्पाद घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने में काम आ सकते थे।’
विश्लेषक क्रूड के दाम और बढऩे की आशंका ज़ाहिर करते हैं। नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ‘यदि मध्य पूर्व संकट आगे छह महीने और खिंच गया तो क्रूड का 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना हैरान नहीं करेगा, ये स्थिति भारत के लिए और भी जटिल हो सकती है।’
प्रोफेसर अरुण कुमार भी ऐसी ही राय रखते हुए कहते हैं, ‘जब तक होर्मुज़ नहीं खुलेगा, ऊर्जा बाज़ार में संकट बरकऱार रहेगा और यदि यह लंबा चला तो यह भारत की अर्थव्यवस्था को सुस्ती में बदल सकता है।’
-देवदत्त पटनायक
*माझा प्रवास* 1857 के विद्रोह का एक भारतीय द्वारा लिखा गया सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी विवरण था। इसके शीर्षक का अर्थ था ‘मेरी यात्राएँ।’ यह पश्चिमी भारत के एक मराठी ब्राह्मण पुजारी विष्णुभट गोडसे द्वारा लिखा गया था। उन्होंने विद्रोह के दौरान उत्तर भारत की यात्रा की और कई घटनाओं को अपनी आँखों से देखा।
यह पुस्तक इसलिए प्रसिद्ध हुई क्योंकि इसमें रानी लक्ष्मीबाई और झाँसी के पतन का एक दुर्लभ प्रत्यक्ष विवरण मिलता है। गोडसे राजदरबारों में जाकर धन और दक्षिणा कमाने के लिए निकले थे, लेकिन रास्ते में ही ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह छिड़ गया। ब्रिटिश सैन्य रिपोर्टों या बाद की राष्ट्रवादी कहानियों के विपरीत, उनके विवरण में एक भटकते ब्राह्मण के डर, अफवाहें, जातिगत पूर्वाग्रह और छोटी-छोटी रोज़मर्रा की बातें दर्ज हैं, जो एक टूटती हुई राजनीतिक दुनिया के बीच फँसा हुआ था।
पुस्तक का एक रोचक भाग लक्ष्मीबाई के पति, राजा गंगाधर राव के बारे में था। गोडसे के अनुसार, राजा की पहली पत्नी की मृत्यु के बाद, वे दोबारा विवाह करना चाहते थे। उन्होंने कहा कि वे किसी अमीर परिवार की लडक़ी की बजाय एक गरीब परंतु प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार की लडक़ी को पसंद करेंगे। लेकिन कई परिवारों ने इस रिश्ते से इनकार कर दिया क्योंकि राजा सार्वजनिक रूप से सामान्य पुरुषोचित व्यवहार न करने के लिए जाने जाते थे। लोग उन्हें ‘षंढ’ कहते थे।
पुस्तक में उनका वर्णन है कि वे स्त्रियों के कपड़े पहनते थे, जैसे पैठणी साडिय़ाँ और सोने की चोलियाँ, स्त्रियों की तरह बाल सजाते थे, और हार, चूडिय़ाँ, कंगन तथा नथ भी पहनते थे। वे महल में स्त्रियों के साथ बहुत समय बिताते और बातचीत करते थे। गोडसे ने यह अफवाह भी दोहराई कि राजा प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ‘आठ प्रकार’ के षंढों में से एक थे, विशेष रूप से वे पुरुष जो बलवान, पुरुषोचित पुरुषों के साथ रहना पसंद करते थे।
फिर भी, गोडसे ने यह स्वीकार किया कि गंगाधर राव एक अच्छे और न्यायप्रिय शासक थे। प्रजा उन्हें पसंद करती थी और वे राज्य का संचालन कुशलता से करते थे, भले ही लेखक को उनका व्यवहार अजीब लगता हो।
उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों ‘एक जिला, एक व्यंजन’ पहल के तहत राज्य के पारंपरिक खाने की चीजों की जिला-वार सूची जारी की लेकिन इस सूची में राज्य के किसी भी जिले में किसी मांसाहारी व्यंजन को जगह नहीं मिली.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट –
यूपी के विभिन्न जिलों में कुछ खाद्य पदार्थ हैं जो लंबे समय से किसी जगह की खास पहचान रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसी पहचान को जन-जन तक पहुंचाने और दूर-दराज तक के लोगों तक पहुंचाने के लिए एक खास पहल की और हर जिले की कुछ खास व्यंजनों के रूप ब्रांडिंग करते हुए एक सूची जारी की। सरकार के मुताबिक, इस सूची को जारी करने का मकसद बेहतर ब्रांडिंग, पैकेजिंग और बाजार तक आसान पहुंच के जरिए स्थानीय व्यंजनों को बढ़ावा देना है।
‘एक जिला, एक व्यंजन’ (ओडीओसी) पहल के तहत तैयार की गई इस सूची में राज्य के सभी 75 जिलों को वहां प्रचलित कुछ खास व्यंजनों के साथ जोड़ा गया है। इस सूची में आगरा के पेठे, मैनपुरी की सोन पापड़ी, मथुरा के पेड़े, अलीगढ़ की कचौड़ी, वाराणसी की ठंडई, लस्सी और बनारसी पान, जौनपुर की इमरती, मऊ का लिट्टी-चोखा जैसे व्यंजन सूची में शामिल हैं।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि 75 जिलों के लिए 208 व्यंजनों की इस सूची में ऐसे तमाम व्यंजनों को जगह नहीं मिल पाई है जिनकी न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान है। इनमें लखनऊ के मशहूर गलावटी कबाब, अवधी बिरयानी, रामपुर का मटन कोरमा और सीक कबाब जैसे व्यंजन शामिल हैं। यानी इस सूची में किसी भी मांसाहारी व्यंजन को जगह नहीं दी गई है।
सिर्फ शाकाहारी व्यंजन ही क्यों?
राज्य के मध्यम और लघु उद्योग मंत्री राकेश सचान ने इसे योजना का प्रारंभिक चरण बताया है लेकिन तमाम खाद्य विशेषज्ञों और आम लोगों ने सरकार की इस चयनात्मक पहल पर सवाल उठाए हैं।
मीडिया से बातचीत में मंत्री राकेश सचान कहते हैं, ‘व्यंजनों की यह लिस्ट अंतिम नहीं है और लोगों की राय के आधार पर इसमें बदलाव किया जा सकता है। यह लिस्ट फ्लेक्सिबल है। स्थानीय सुझावों और लोगों की मांग के आधार पर मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद खाने की चीजें यानी कूजीन्स कभी भी बदली जा सकती हैं। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में बनी जिला-स्तरीय समितियों ने सर्वे और बातचीत के बाद ये सुझाव तैयार किए हैं। यदि भविष्य में अन्य चीजों के बारे में सुझाव दिया जाता है, तो उन्हें भी शामिल किया जा सकता है।’
यूपी सरकार ने एक जिला एक उत्पाद की तर्ज उत्तर प्रदेश दिवस के मौके पर इसी साल 24 जनवरी को एक जिला एक व्यंजन योजना की घोषणा की थी जिसे गत चार मई को कैबिनेट की मंजूरी मिली। इसके तहत राज्य के सभी 75 जिलों से संबंधित 208 व्यंजनों की सूची अब जारी की गई है। लेकिन इस सूची में एक भी मांसाहारी व्यंजन के शामिल न किए जाने पर बहस छिड़ गई है।
यूनेस्को की मान्यता
लखनऊ की संस्कृति और विरासत पर गहरी पकड़ रखने वाले मशहूर लेखक हफीज किदवई सरकार की इस सूची को जल्दबाजी में तैयार की गई बताते हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में हफीज किदवई कहते हैं, ‘सिर्फ लखनऊ के व्यंजनों की बात करें तो यूनेस्को यहां के मशहूर व्यंजनों यानी गलावटी कबाब, बिरयानी और चाट को वर्ल्ड हेरिटेज में रखा है। यही नहीं, दुनिया के पचास बेहतरीन व्यंजनों की सूची में लखनऊ के टुंडे कबाब को 15वें नंबर पर रखा गया है। तो सवाल ये है कि जब पूरी दुनिया आपके खानों (व्यंजनों) को रिकग्नाइज कर रही है तो आप खुद उसे खारिज करने में लगे हैं। लेकिन सवाल यही है कि ओडीओसी की लिस्ट देखकर कौन खाने आता है।’
हफीज किदवई कहते हैं कि इस सूची के पीछे तात्कालिक राजनीति के अलावा और कोई वजह नहीं हो सकती। वो कहते हैं, ‘सूची को ध्यान से देखिए तो साफ दिखेगा कि इसमें सिर्फ सरकार को खुश करने का मकसद दिखता है और कुछ नहीं। मसलन, आजमगढ़ के मशहूर व्यंजन में तहरी रखी गई है। अब आप ही बताइए कि तहरी खाने के लिए आजमगढ़ कौन जाएगा। सूची बनाने वालों को कम से कम ये तो देखना चाहिए था कि किसी व्यंजन का वास्तव में उस जिले से कोई वास्ता है भी या नहीं। लखनऊ का नॉन-वेज तो दो सौ साल पुराना है। आप इतने पुराने खाने को गायब तो कर नहीं सकते, क्योंकि हम लिस्ट से गायब कर देंगे, तो लोग इसे भूल जाएंगे। लखनऊ की रेवड़ी मशहूर है, चाट मशहूर है लेकिन लखनऊ में सबसे बड़ा आकर्षण जिन चीजों का है वो नॉन-वेज खानों का है, इसे आप कैसे इग्नोर कर सकते हैं।’
-इमरान कुरैशी
कर्नाटक में चार साल पहले हिजाब पहनने पर लगी पाबंदी की वजह से जिन छात्राओं की पढ़ाई में रुकावट आ गई थी, उन्होंने अब राहत की साँस ली है।
राज्य सरकार के सिर को ढँकने वाले हिजाब की अनुमति दिए जाने के बाद उन्होंने फिर से पढ़ाई करने की नई योजना बनानी शुरू कर दी है।
दिलचस्प पहलू यह है कि इससे उन लोगों को भी राहत मिली है जिनके बच्चों को कुछ शिक्षकों ने जनेऊ पहनने से रोक दिया था। दक्षिण भारत में इसे जनीवारा कहा जाता है।
मंड्या के अपने कॉलेज में हिजाब विरोधियों को 'अल्लाह-हू-अकबर' के नारे लगाकर जवाब देने की वजह से मुस्कान ख़ान 'हिजाब गर्ल' कहलाने लगी थीं। वह अब अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने की योजना बना रही हैं।
दूसरी ओर, सुवर्णा तीर्था उम्मीद कर रही हैं कि अन्य छात्रों को वह पीड़ा न झेलनी पड़े, जो उनके बेटे आनंद एस तीर्था अभी झेल रहे हैं।
उन्हें मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश परीक्षा केंद्र में जाने से पहले अपना जनेऊ उतारने के लिए कहा गया था।
सुवर्णा तीर्था ने बेंगलुरु में बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ‘स्पष्ट निर्देश थे कि जनेऊ नहीं उतारना है। लेकिन यह पिछले साल भी हुआ और इस साल भी।’
‘उसने पीयूसी बोर्ड परीक्षा में 94 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। अच्छे कॉलेज में प्रवेश के लिए पीयूसी बोर्ड परीक्षा के 50 प्रतिशत और सीईटी परीक्षा के 50 प्रतिशत अंक लिए जाते हैं।’
कर्नाटक सरकार ने इस हफ्ते की शुरुआत में 2022 में बीजेपी सरकार की ओर से लगाए गए हिजाब प्रतिबंध को रद्द करते हुए नया आदेश जारी किया।
नए आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘छात्रों को निर्धारित ड्रेस के साथ सीमित पारंपरिक और रीति-रिवाज आधारित प्रतीक पहनने की अनुमति है।’
आदेश के अनुसार, ‘स्वीकृति योग्य ऐसे धार्मिक और पारंपरिक प्रतीकों में पगड़ी, पवित्र धागे, शिव माला, रुद्राक्ष, हिजाब या अन्य समान सामुदायिक और पारंपरिक प्रतीक शामिल हो सकते हैं, जिन्हें छात्र आम तौर पर पहनते हैं। हालाँकि, यह अनुशासन, सुरक्षा और छात्र की पहचान में बाधा नहीं डालना चाहिए।’
-मनीष आजाद
दुनिया जितना ‘मार्टिन लूथर किंग’ को जानती है, उतना उन्हीं के समकालीन ब्लैक लीडर ‘मैल्कम एक्स’ को नहीं जानती। जबकि आज उनके विचार कहीं ज्यादा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हैं।
1966 में शुरू हुआ ब्लैक पैंथर आंदोलन सीधे-सीधे ‘मैल्कम एक्स’ के विचारों और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित रहा है। ब्लैक पैंथर की स्थापना के ठीक एक साल पहले 21 फरवरी 1965 को मैल्कम एक्स को उस समय 15 गोलियाँ मारी गईं, जब वे ‘हरलेम’ में एक लेक्चर देने जा रहे थे।
मैल्कम एक्स के बारे में जानना इसलिए भी जरूरी है कि मैल्कम एक्स का पूरा जीवन व उनके विचार काले लोगों के दूसरे महान नेता ‘मार्टिन लूथर किंग’ का एक तरह से ‘एंटीथीसिस’ रचता है। दोनों के विचारों व व्यक्तित्व की छाया थोड़ा बदले रूप में हमारे यहां के दलित आंदोलन में भी दिखाई पड़ती है। इसलिए मैल्कम एक्स को समझने का प्रयास कहीं न कहीं अपने देश के दलित आंदोलन को भी समझने का प्रयास है।
मैल्कम एक्स का जन्म 19 मई 1925 को अमेरिका के ‘ओमाहा’ में एक गरीब परिवार में हुआ था। इनके पिता एक राजनीतिक व्यक्ति थे और काले लोगों के आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदार थे। इसके अलावा प्रसिद्ध ब्लैक लीडर और ‘ब्लैक इज ब्यूटीफुल’ अभियान के जनक ‘मार्कस गार्वे’ [Marcus Garvey] के समर्थक थे। इसी कारण से वे गोरों के प्रतिक्रियावादी गुप्त संगठन ‘कू क्लक्स क्लान’ [Ku Klux Klan] के निशाने पर थे। अंतत: जब मैल्कम एक्स महज 6 साल के थे तो 1931 में उनके पिता की हत्या इसी संगठन के कुछ लोगों ने कर दी। इस घटना ने मैल्कम को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया और गोरों के प्रति नफरत के बीज बो दिए। इसके अलावा एक अन्य घटना ने मैल्कम को बुरी तरह हिला दिया था। एक बार उनके घर में आग लग गई। फायर ब्रिगेड को बुलाया गया। फायर ब्रिगेड वालों ने जब देखा कि आग एक काले के घर में लगी है तो बिना आग बुझाए ही वापस लौट गए। बाद में अमेरिकी लोकतंत्र के प्रति उनके जो विध्वंसक विचार बने, उनमें इन घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जब वह किशोरावस्था में थे तो उन्हें किसी छोटे अपराध के लिए 6 साल जेल की सजा काटनी पड़ी। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि मैंने अपने जीवन की अधिकांश पढ़ाई इसी दौरान की। जेल से निकलने के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू होती है। सबसे पहले उन्होंने ईसाई धर्म छोडक़र मुस्लिम धर्म ग्रहण कर लिया और काले मुस्लिम लोगों के संगठन ‘नेशन ऑफ इस्लाम’ के सदस्य हो गए। उस दौरान ईसाई धर्म को गोरों के साथ जोडक़र देखा जाता था। इसी कारण इस दौरान बहुत से काले लोगों ने सामूहिक तौर पर प्रतिक्रियास्वरूप ईसाई धर्म छोडक़र इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया। यहीं से मैल्कम एक्स के समाजवाद के प्रति झुकाव की भी शुरुआत होती है। गोरों की राष्ट्रीयता के विरुद्ध ‘नेशन ऑफ इस्लाम’, ‘ब्लैक नेशनलिज्म’ की बात करता था। इसलिए नौजवानों के बीच यह बेहद लोकप्रिय था।
नेशन ऑफ इस्लाम के लीडर ‘इलियाह मुहम्मद’ की कथनी और करनी में अंतर देखने और खुद समाजवाद की तरफ झुकने के कारण दोनों में काफी तनाव आ गया और अंतत: मैल्कम एक्स ने नेशन ऑफ इस्लाम छोडक़र ‘मुस्लिम मास्क’ की स्थापना की और अंतत: सेकुलर विचारधारा तक पहुँचते हुए अपनी मृत्यु के कुछ ही समय पहले ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ अफ्रो-अमेरिकन यूनिटी’ की स्थापना की।
इसी समय मार्टिन लूथर किंग जूनियर भी सक्रिय थे। उनका ‘सिविल राइट्स मूवमेंट’ अपने उभार पर था। कालों के मताधिकार को व्यवहार में हासिल करने के लिए प्रसिद्ध ‘सेल्मा मार्च’ 1964 में ही हुआ था। इस घटना के 50 साल होने पर ‘सेल्मा’ नाम से एक फिल्म भी रिलीज हुई थी जो काफी चर्चित हुई थी।
बहरहाल ‘मैल्कम एक्स’ और ‘मार्टिन लूथर’ दोनों ही समस्या और समाधान को दो विपरीत नजरिए से देख रहे थे।
मार्टिन लूथर किंग को अमेरिकी लोकतंत्र के मूल्यों में काफी विश्वास था और वे इन मूल्यों और अमेरिकी राजनीति के बीच एक अंतर्विरोध व तनाव देख रहे थे। सरल शब्दों में कहें तो वे इसी व्यवस्था में अमेरिकी लोकतंत्र के ‘मूल्यों’ को जमीन पर उतारते हुए काले लोगों के अधिकारों की गारंटी चाहते थे।
जबकि मैल्कम ऐसे किसी अमेरिकी मूल्य के अस्तित्व से ही इंकार करते थे। बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र को ‘मैल्कम एक्स’ एक साम्राज्य के रूप में देखते थे। और इसके विध्वंस में ही काले लोगों की मुक्ति देखते थे। बाद में समाजवाद की ओर झुकने के बाद उन्होंने काले लोगों की मुक्ति को गोरे उत्पीडि़त मजदूरों व अन्य शोषित समुदायों के साथ जोडक़र देखना शुरू किया।
मैल्कम एक्स का कहना था कि अमेरिका विदेशों में ही नहीं बल्कि देश के अंदर भी एक उपनिवेश बनाए हुए है जिसमें मुख्यत: काले लोग और यहां के मूल निवासी ‘रेड इंडियंस’ हैं। मैल्कम एक्स का यह कथन सत्य के काफी करीब है।
कोलंबस के आने के समय आज के अमेरिका में वहां के मूल निवासियों की संख्या करीब 1 करोड़ 50 लाख थी। 1890 तक आते-आते यह महज 2 लाख 50 हजार तक रह गई। यानी 98 प्रतिशत लोग यूरोपीय लोगों की क्रूरता के शिकार हो गए। इस पर एक बहुत ही प्रामाणिक डॉक्यूमेंट्री ‘द कैनरी इफेक्ट’ है।
‘हावर्ड जिन’ ने अपनी किताब A PeopleÓs History of the United States में साफ बताया है कि अमेरिकी लोकतंत्र वहां के मूल निवासियों के जनसंहार और काले लोगों की गुलामी पर खड़ा है। मैल्कम एक्स इसी अर्थ में ‘भीतरी उपनिवेश’ की बात कर रहे थे। ऐसा ही भीतरी उपनिवेश ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी है। ऑस्ट्रेलिया के इस भीतरी उपनिवेश पर ‘जॉन पिल्जर’ ने बहुत ही बेहतरीन फिल्म ‘यूटोपिया’ बनाई है।
इसी संदर्भ में मैल्कम एक्स ने अल्जीरिया के क्रांतिकारी ‘फ्रांह्ल5 फैनॉन’ की बहुचर्चित किताब The Wretched of the Earth का कई बार जिक्र किया है। इसी अर्थ में एक जगह मैल्कम एक्स ने लिखा है- ‘‘यदि गोरों की वर्तमान पीढ़ी को उनका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे खुद ‘गोरे-विरोधी’ हो जाएंगे।’’ इस कथन के बहुत ही गहन मायने हैं।
हम भी भारत के संदर्भ में कह सकते हैं कि यदि ब्राह्मणों और ऊँची जाति की वर्तमान पीढ़ी को उसका सच्चा इतिहास पढ़ाया जाए तो वे भी ‘ब्राह्मणवाद विरोधी’ हो जाएंगी।
मार्टिन लूथर किंग जहां काले लोगों के गोरों के साथ एकीकरण के हिमायती थे वहीं मैल्कम इसके खिलाफ थे। और वर्तमान व्यवस्था में इसे असंभव मानते थे। इसलिए वे हर क्षेत्र में कालों की ‘अलग पहचान’ के हिमायती थे। काले लोगों में पैदा हुए मध्य वर्ग के वे मुखर आलोचक थे। उनके अनुसार यही वर्ग गोरे लोगों के साथ एकीकरण के लिए लालायित रहता है। भले ही इसके लिए उसे अपनी आत्मा ही क्यों न बेचनी पड़े। पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की तरफ से देखें तो यह एकीकरण काले लोगों के एक हिस्से को राजनीतिक रूप से नपुंसक बनाने की साजिश है। इस संदर्भ में मैल्कम एक्स ने एक बहुत ही अच्छा रूपक दिया है। उन्होंने कहा कि जब आप मछली पकडऩे के लिए चारा डालते हैं तो मछलियों को लग सकता है कि आप उनके दोस्त हैं और उनके लिए चारा डाल रहे हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि चारे के ऊपर एक हुक भी लगा है जो उन्हें अपने समुदाय से अलग करके उनकी जान ले लेगा। मैल्कम एक्स के इस कथन को हम अपने देश में भी लागू करके इसकी सच्चाई को परख सकते हैं।
-संजय श्रमण
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट आई है, बड़े शहरों में शहरी सीवर और नालों के पानी का खेती में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है और सेहत के साथ गंभीर खिलवाड़ हो रहा है। शहरों की ज़मीन का पानी सूख रहा है और किसान बेचारे कहीं से भी पानी लेने को मजबूर हैं।
ये सब देखकर भारत के नगरीकरण और उससे जुड़ी समस्याओं पर बहस होनी चाहिए, लेकिन नहीं होगी।
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नगर, नागर, नगरीकरण और नागरिकता - ये भारतीय सभ्यता के लिए आधारभूत विशेषताएं रही हैं। हमने हड़प्पा मोहनजोदड़ो के जमाने से नगर बसाए हैं। इस देश की सभ्यता और संस्कृति के निर्माता नाग लोग रहे हैं, उन्हीं से नागरी और देवनागरी शब्द आए हैं।
लेकिन हड़प्पा के पतन के बाद बहुत सदियों तक हमारे समाज में नगरों के ख़िलाफ़ एक मनोविज्ञान निर्मित हुआ है। प्रोफ़ेसर निहार रंजन रे ने इसपर लिखा है। भारत में हड़प्पा के बाद हमारा समाज काफ़ी हद तक सामूहिक रूप से साथ रहने, साथ भोजन करने साथ नहाने और साथ काम करने में अक्षम होता गया है।
जब आप कई लोगों के साथ मिलकर कुछ अच्छा नहीं कर पाते हैं तो क्या होगा? यही होगा जो आज दिल्ली में हो रहा है। राजधानियाँ और राज-नगर उनकी स्वच्छता और व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं। लेकिन भारत में राजधानी या महानगर का अर्थ स्वच्छता और व्यवस्था के अर्थ में क्या हो सकता है आप जानते ही हैं।
भारत में शहरीकरण की प्रक्रिया को देखिए। जैसे गाँवों में कोई जजमान अपने कारिंदों या कमीनों को सिर्फ जिंदा रहने भर की जमीन दे देता था और कहता था ‘बच्चू अब काम पे लग जा.’ गांवों में जाकर देखिए बहुत बूढ़े लोगों से बात कीजिए आपको पता चलेगा भारत में गांव कैसे बसाए जाते थे। गांव पटेल या गांव का मुखिया अपने गाँव के लिए लोहा, लकड़ी, चमड़ा, कपड़ा, मिट्टी आदि-आदि के कारीगरों और सफ़ाई करने वालों को दूसरे गांवों या इलाकों से बुलवाते थे।
ये गऱीब कारीगर वहाँ आकार बसते थे, उनके अछूत या सछूत होने के अनुसार उन्हें ‘उचित दिशा’ और ‘उचित दूरी’ पर जगह दे दी जाती थी. फिर जजमानी के सिस्टम में उन्हें उनकी मेहनत का मुआवजा साल में चार छह बार दिया जाता था। वे अपना काम और रहने की जगह नहीं बदल सकते थे, ना जमीन खऱीद सकते थे, उन्हें अपने आवास, अपने पानी, अपने भोजन की व्यवस्था ख़ुद करनी होती थी। वे गाँव से या गाँव के व्यवस्थापकों से इस संबंध में कोई माँग नहीं कर सकते थे।
अब आज के शहरों को देखिए. ठीक यही मॉडल चल रहा है. इसे मैं भारत में ‘शहरीकरण का जजमानी मॉडल’ कहता हूँ।
शहरों की झुग्गी झोपडिय़ों में जाइए। वे लोग गाँव से शहर कैसे आते हैं? ठीक उसी तरह जैसे जजमानी व्यवस्था में होता था। बस अंतर इतना है कि पहले जजमान बुलाता था, आजकल कारखाना और बाजार बुलाता है। गांव आकर बसने वालों की फि़क्र ना जजमान को होती थी, ना आजकल शहरी नियंताओं और बाजार को होती है. वे कारीगर और गऱीब मज़दूर आदि कहीं भी जियें मरें, कुछ भी खायें पियें इन्हें कोई मतलब नहीं, बस अपनी औक़ात में रहते हुए अपना अपना काम करते रहिए। गांव में सोशल मोबिलिटी को रोकने में जजमानी सिस्टम बहुत ताकतवर भूमिका निभाता था। अब उसने शहर में आकर नया अवतार धर लिया है।
हड़प्पा के पतन के बाद नगरों के सामूहिक जीवन की शैली का पतन कैसे और क्यों हुआ? इसपर गहरी रिसर्च की आवश्यकता है। आपको सोलह महाजनपदों के काल में असल में महानगर दिखाई देंगे। रामायण महाभारत आदि में नगरों का वर्णन है, अशोक और उनके जैसे अन्य राजाओं के चक्रवर्तित्त्व के ऐतिहासिक अनुभव से राम, कृष्ण रावण, कौरव, पांडव आदि की कथाएँ जन्मीं। ये मगध साम्राज्य का शिखर काल था। फिर क्या हुआ? भारत में गुप्त काल में अचानक कुछ हुआ है। भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार एकदम से बहुत कमजोर हुआ है फिर इष्ट-देव, ईश्वर और ईश्वरभक्ति का जन्म हुआ। उसके बाद आज तक भारत लडख़ड़ा रहा है।
भारत के इस सभ्यतागत और नैतिक पतन पर कोई गंभीर बात करना भी कठिन है।
आज तो असंभव सा हो गया है।
दिल्ली में सीवर के पानी से ‘हरी-भरी’ मल्टीविटामिन सब्जी की खेती कोई छोटी-सी बात नहीं है. जमीन का पानी सूख रहा है और गरीब किसानों के पास कोई और उपाय नहीं है. ये कुदरत का तरीका है, आप जो विटामिन खाकर ‘छोड़ते’ हैं, वे आपकी थाली में वापस आ जाते हैं. कुदरत कह रही है तुम जो मुझे दोगे मैं वही तुम्हें दूँगी-‘तेरा तुझको अर्पण’
-मनीष आजाद
यह फिल्म ऑस्ट्रेलिया के एक ऐसे नासूर को छूती है जिस पर आमतौर पर कोई ऑस्ट्रेलियाई बात करना पसंद नही करता।
यह मुद्दा है ऑस्ट्रेलिया के ‘मूल निवासियों’ यानी काले लोगों का। अमरीका की तरह ही ऑस्ट्रेलिया में भी यूरोपियन के आने से पहले यहाँ एक भरी पूरी सभ्यता निवास करती थी, जिन्हे जीत कर और उनकी बड़ी आबादी को मारकर ही आस्ट्रेलिया पर कब्जा किया गया था। तभी से वहां के मूल निवासी एक गुमनामी का जीवन जीते हुए गोरे ऑस्ट्रेलियन लोगों के तमाम अत्याचारों को सह रहे हैं।
फिल्म देखकर यह समझ में आता है कि यह दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद से कहीं अधिक भयावह है।
मजेदार बात यह है कि जॉन पिल्जर दक्षिण अफ्रीका में लंबे समय तक प्रतिबंधित रहे हैं, और इस प्रतिबंध का कारण था उनकी एक फिल्म जो उन्होने वहां के रंगभेद के खिलाफ बनाई थी।
दरअसल ‘यूटोपिया’ फिल्म जॉन पिल्जर की ही एक पुरानी फिल्म ‘दी सीक्रेट कन्ट्री’ [ञ्जद्धद्ग ह्यद्गष्ह्म्द्गह्ल ष्शह्वठ्ठह्लह्म्4] का विस्तार है। जॉन पिल्जर ने यह फिल्म 1985 में बनाई थी।
‘यूटोपिया’ फिल्म के प्रदर्शन के बाद एक इंटरव्यू में जॉन पिल्जर ने कहा कि ‘दी सीक्रेट कन्ट्री’ बनाने के दौरान, उन्हें बिल्कुल भी अनुमान नहीं था कि 25 साल बाद भी उन्हे इसी विषय पर फिल्म बनाने के लिए फिर बाध्य होना पड़ेगा, क्योकि स्थितियां तब से अब तक तनिक भी नहीं बदली है। वास्तव में इस फिल्म में पुरानी फिल्म के व्यूजुअल [1द्बह्यह्वड्डद्यह्य] का भी प्रयोग किया गया है। जिन्होने पुरानी फिल्म देखी है वे इसे महसूस कर सकते है।
जॉन पिल्जर उन लोगों के पास भी जाते है जिनसे वे 25 साल पहले अपनी पिछली फिल्म के दौरान मिले थे। इन 25 सालों का उनका अनुभव यह बताता है कि स्थितियां और खराब ही हुई है!
इस दौरान किसी ने पुलिस के हाथों अपना बेटा खो दिया है तो सरकारी एजेंसियों द्वारा बहुतों का बच्चा चुरा लिया गया है।
मूल निवासियों के बच्चों को चुराने की बात वहां बहुत सुनियोजित तरीके से घटित हुई। वहां के सामाजिक कार्यकर्ता इसे ‘पूरी पीढ़ी को चुरा लेने’ [ह्यह्लद्गड्डद्यद्बठ्ठद्द ड्ड द्दद्गठ्ठद्गह्म्ड्डह्लद्बशठ्ठ] की संज्ञा देते हैं।
यह एक तरह से उनकी कौम को छिन्न भिन्न कर देने और खत्म कर देने की साजिश थी।
चोरी किये हुए बच्चों को या तो गोरे लोगों के घरों में नौकर रख लिया जाता था या उन्हें किसी को गोद दे दिया जाता था।
दरअसल फिल्म की शुरुआत ही एक स्तब्ध कर देने वाले वक्तव्य से होती है। मूल निवासियों की ‘समस्या’ के समाधान के तौर पर एक खनन माफिया कहता है कि ‘मूल निवासियों के पीने के पानी में ऐसा केमिकल मिला देना चाहिए कि उनकी प्रजनन क्षमता खत्म हो जाये। इस तरह कुछ समय बाद उनकी पूरी कौम ही खत्म हो जायेगी।’
फिल्म की शुरुआत में खनन माफिया का यह वक्तव्य बाद में और साफ हो जाता है, जब यह पता चलता है कि जहां जहां ये मूल निवासी बसे हुए है, कमोबेश वहीं पर यूरेनियम के भंडार भी है। ऑस्ट्रेलिया में दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार है।
फिल्म का यह हिस्सा निश्चय ही आपको भारत की याद दिलाएगा। यहां भी आदिवासियों के खिलाफ एक जंग जारी है, और वजह वही है-खनिज सम्पदा!
जॉन पिल्जर का कैमरा जब आस्ट्रेलिया के ‘वार मेमोरियल’ में आता है तो देखकर हैरानी होती है कि यहां मूल निवासियों की तस्वीरें जानवरों- मसलन हाथी, कंगारू आदि के साथ लगी हैं, जबकि गोरे ऑस्ट्रेलियाई लोगों की तस्वीरें अलग लगी हुई हैं।
यह चीज गोरे ऑस्ट्रेलियाई लोगों की मूल निवासियों के प्रति उनकी सोच को दर्शाता है।
क्या यही सोच हमारे यहां भी तमाम शहरी लोगों की अपने आदिवासी समुदाय के लोगों के प्रति नहीं है?
इस ‘वार मेमोरियल’ में आस्ट्रेलिया द्वारा किये गये तमाम युद्धों का जिक्र है, लेकिन यहां आने वाले पहले यूरोपियनों ने, जो भीषण और क्रूर युद्ध यहां के मूल निवासियों के खिलाफ छेड़ा था, उसका कहीं कोई जिक्र नहीं है।
जॉन पिल्जर की यह फिल्म यह बताती है कि मूल निवासियों के खिलाफ यह युद्ध कभी नहीं रुका और बदले रूपों में यह आज भी जारी है। इस युद्ध का एक उदाहरण फिल्म में बहुत विस्तार से बताया है।
2007-08 में वहां के प्रमुख टीवी चैनल एबीसी [्रक्चष्ट] की तरफ से एक रिपोर्ट जारी हुई कि एक खास जगह रहने वाले सभी मूल निवासियों में उनके बच्चे सुरक्षित नहीं हैं, क्योकि इस कौम के वयस्क‘पेडोफिल’ [क्कद्गस्रशश्चद्धद्बद्यद्ग] रोग से पीडि़त हैं और बड़े पैमाने पर ड्रग्स का इस्तेमाल करते है। ‘पेडोफिल’ से पीडि़त व्यक्ति सेक्स एडिक्ट हो जाता है और अपने आसपास के बच्चों को अपना शिकार बनाता है।
रिपोर्ट को विश्वसनीय बनाने के लिए एक आदमी का इंटरव्यू भी प्रसारित किया गया और दावा किया गया कि यह उसी कौम का आदमी है और सुरक्षा कारणों से इसका चेहरा और पहचान छुपाई गयी है। यह रिपोर्ट एबीसी न्यूज चैनल पर हमारे यहां की तरह ही 24 घंटे दिखाई जाने लगी। इस 24 घंटे न्यूज चैनल को जान पिल्जर ने बहुत ही सटीक नाम दिया है- व्यूजुअल च्यूइंगम [1द्बह्यह्वड्डद्य ष्द्धद्ग2द्बठ्ठद्द द्दह्वद्व]
बहरहाल इस ‘व्यूजुअल च्यूइंगम’ की आड़ लेकर सरकारी एजेंसियां सक्रिय हो गयी और उस एरिया के मूल निवासियों पर पुलिस का छापा पडऩे लगा और बच्चों को बचाने के नाम पर उनसे उनके अपने बच्चे छीने जाने लगे; और उन्हें 200-300 किलोमीटर दूर के किसी अनाथालय में पहुंचाया जाने लगा।
बाद में कुछ साहसी व खोजी पत्रकारों ने इस पूरे अभियान का पर्दाफाश किया और पता लगा कि यह पूरी कहानी मूल निवासियों को बदनाम करने और उन्हे उस खास जगह से हटाने के लिए रची गयी थी, क्योंकि उस क्षेत्र में यूरेनियम होने की संभावना बताई जा रही थी।
यह भी साफ हुआ कि इस पूरे अभियान को वहां की खनन कंपनियां प्रायोजित कर रही थी। जिस व्यक्ति को मूल निवासियों के बीच का बताकर उसका वक्तव्य लगातार प्रसारित किया जा रहा था, वह सरकार का आदमी निकला और वह इस पूरे साजिश का हिस्सा था।
बाद में सरकार ने तो औपचारिक माफी मांग ली, लेकिन एबीसी न्यूज चैनल ने अपनी बेहयायी बरकरार रखी और कोई बयान नहीं दिया। फिल्म का यह हिस्सा बहुत ही ताकतवर और स्तब्ध कर देने वाला है।
-आर.के.जैन
18 मई 1974 की सुबह यानी आज से ठीक 51 साल पहले। प्रधानमंत्री आवास में सुबह से ही चहल-पहल थी। इंदिरा गांधी लोगों से मिल जरूर रही थीं, लेकिन अंदर से बेचैन थीं। उन्होंने करीब 8.30 बजे अपने सेक्रेटरी पीएन धर को आते देखा, तो लगभग दौड़ते हुए खुद ही उनके पास पहुंच गईं। इंदिरा ने पूछा- क्या हुआ? धर बोले- बुद्ध मुस्कुराए हैं। इतना सुनते ही इंदिरा ने सुकून की एक गहरी और लंबी सांस ली।
आज इस घटना को 51 साल पूरे हो चुके हैं। जब भारत ने पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया था। आज जानते हैं उस टेस्ट की सीक्रेट कहानी...
1962 में चीन से युद्ध हारने के बाद मशहूर वैज्ञानिक होमी भाभा ने देश को परमाणु हथियार संपन्न बनाने पर काम शुरू कर दिया था, लेकिन 24 जनवरी 1966 को होमी भाभा की विमान दुर्घटना में मौत हो गई। भारत के न्यूक्लियर पावर बनने के सपनों को ये बड़ा झटका था।
भाभा के बाद विक्रम सारा भाई को एटॉमिक एनर्जी कमीशन यानी ्रश्वष्ट का अध्यक्ष बनाया गया। ये वो समय था जब भारत कर्ज में डूबा हुआ था। इस वक्त न्यूक्लियर टेस्ट की बात ठंडी पड़ गई। विक्रम साराभाई के निधन के बाद भाभा के शिष्य होमी सेठना को जिम्मेदारी मिली।
1971 मे पाकिस्तान से युद्ध में जब अमेरिका ने अपना 7वां बेड़ा भेजा और परमाणु बम की धमकी दी तो इंदिरा को लगा भारत को भी इसका जवाब तैयार करना होगा। इसके बाद इंदिरा ने परमाणु बम कार्यक्रम को तेजी से बढ़ा दिया।
1972 में इंदिरा ने परमाणु बम बनाने के लिए मौखिक आदेश दिया। तब होमी सेठना ने कहा कि मैडम हमें 18 महीने दीजिए। उस समय परमाणु बम परीक्षण के लिए 20 किलो प्लूटोनियम की जरूरत थी।
परमाणु ऊर्जा करार के तहत भारत ने कनाडा से प्लूटोनियम लिया था, जिसका उपयोग पूर्णिमा रिएक्टर के लिए किया जा रहा था। बाद में इसका उपयोग ऊर्जा की बजाय बम बनाने में किया गया। 1973 तक मटेरियल लेवल की सारी परेशानी लगभग दूर हो चुकी थी ।
भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के तत्कालीन निदेशक राजा रमन्ना अपनी बायोग्राफी ‘इयर्स ऑफ पिल्ग्रिमेज’में लिखते हैं कि परमाणु परीक्षण के लिए हमने पोकरण का चयन किया, क्योंकि यहां इतनी आबादी नहीं थी। न ही बहुत ज्यादा जमीनी संसाधन थे।
पोकरण रेंज के आसपास कई गांव हैं। ऐसा ही एक गांव खेतोलाई के स्कूल प्रिंसिपल सोहन राम विश्नोई बताते हैं कि 1960 के दशक में रक्षा विभाग ने उनके पिता और सैकड़ों किसानों को उनकी जमीन बेचने के लिए मजबूर किया था। तब ये जमीन चार रुपए बीघा पर खरीदी गई थी। लोग इसका विरोध कर रहे थे। 1974 में जब विरोध बढ़ा तो सरकार ने मुआवजा बढ़ाकर 20 रुपए बीघा कर दिया था।
आर्मी ने कुआं खोदा तो पानी निकल आया, जबकि सूखे कुएं की तलाश थी ।
नयूक्लियर वेपन आर्काइव के अनुसार, जोधपुर की 61 रेजिमेंट पुल और बंकर बनाने की एक्सपर्ट थी। उसे ही 107 मीटर गहरा एक शाफ्ट बनाने का काम सौंपा गया। जवानों को बस इतना बताया गया कि भूकंप को लेकर वैज्ञानिकों को कोई प्रयोग करना है।
लोकल कमांडर ने इसे यह कहकर टाल दिया था कि ये उनका काम नहीं है। इसके बाद सेनाध्यक्ष जनरल गोपाल गुरुनाथ बेवूर को दखल देना पड़ा। उन्होंने इसके मौखिक आदेश दिए कि ये अपना भी काम है। इसके बाद जवानों ने कुएं की खुदाई की।
बाहरी दुनिया को बताया गया कि ह्रहृत्रष्ट गैस के कुंओं के लिए खुदाई कर रही है। लोकल लोगों में बात फैलाई गई कि सेना के लिए पानी के कुएं खोदे जा रहे हैं। जनवरी 1974 में खुदाई के दौरान भूमिगत जल आ गया। खुदाई करने वाले जवान बहुत खुश हुए, लेकिन वैज्ञानिक बहुत निराश हुए। उन्हें परमाणु परीक्षण के लिए सूखा कुआं चाहिए था। वैज्ञानिकों ने उस कुएं को छोड़ दिया।
इसके बाद एक और गांव खेतोलाई में खुदाई की गई। सूखे कुएं की पहचान के लिए एक लोकल जल विशेषज्ञ को भी बुलाया गया। इस तरह से सेना ने तय समय 15 फरवरी 1974 को सूखा कुआं खोद दिया, जिसे वैज्ञानिक शाफ्ट कहते थे।
भारत की अहम हस्तियों की ओर से आईं हाल की दो टिप्पणियों ने भारत-पाकिस्तान संबंधों के भविष्य पर चर्चा को फिर से जि़ंदा कर दिया है।
दोनों ने ये संकेत दिया है कि संवाद के रास्ते खुले रखना महत्वपूर्ण है।
आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत को ‘पाकिस्तान के साथ संवाद के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिएं।’ हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के प्रति कड़े रुख़ में कोई नरमी नहीं बरतनी चाहिए।
होसबाले के बयान के बाद पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज नरवणे ने भी संपर्क बनाए रखने के विचार का समर्थन किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘सीमा के दोनों ओर आम लोग रहते हैं’ और उनकी रोज़मर्रा की चिंताएं समान हैं। उन्होंने कहा कि लोगों के बीच संपर्क बने रहने चाहिए क्योंकि इससे संबंधों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
इसके जवाब में, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन टिप्पणियों को 'सकारात्मक' बताया और कहा कि तनावपूर्ण संबंधों के बीच संवाद को एक विकल्प के रूप में स्वीकार करना स्वागत योग्य है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि भारत में समझदारी की आवाज मजबूत होगी। पिछले कई महीनों से, बल्कि वर्षों से जो युद्ध भडक़ाने वाली बयानबाज़ी और आक्रामकता देखने को मिल रही है, वह ख़त्म होगी और इस तरह की और आवाज़ों के लिए रास्ता साफ़ करेगी। बेशक, अब देखना यह है कि भारत में इन बातों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं।’
उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान बैकचैनल संपर्कों को लेकर किसी भी अटकल पर टिप्पणी नहीं करेगा।
उन्होंने कहा, ‘अनौपचारिक बातचीत या बैकचैनल के बारे में- मुझे कोई जानकारी नहीं है और मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता। अगर मुझे इस पर टिप्पणी करनी होती तो फिर कोई बैकचैनल नहीं रहेगा। बैकचैनल या अनौपचारिक बातचीत, नाम अपने आप में स्पष्ट है।’
पाकिस्तान में आरएसएस को व्यापक रूप से एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में देखा जाता है, जो भारत की सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था के साथ कऱीब से जुड़ा हुआ है।
पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रियाएं
बीबीसी से बात करते हुए, भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने इस बयान के अधिक अर्थ निकालने को लेकर सावधान रहने की सलाह दी।
उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान को इससे बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए।’
उन्होंने कहा, ‘जहाँ तक भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने का सवाल है, यह याद रखना ज़रूरी है कि भारत जम्मू-कश्मीर पर अब भी अडिग है। मैं इस विवाद को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए भारत की ओर से कोई प्रतिबद्धता नहीं देखता।’
बासित ने कहा कि इस्लामाबाद को ‘द्विपक्षीय संवाद की ऐसी एक और प्रक्रिया से बचना चाहिए, जो भारत को कश्मीर के अपने विलय को और मज़बूत करने में मदद करती है।’
उनके अनुसार, दोनों देश बैकचैनल कूटनीति के ज़रिए बातचीत कर सकते हैं, लेकिन 'कश्मीर और आतंकवाद' पर चर्चा केंद्र में बनी रहनी चाहिए।
वह यह भी तर्क देते हैं कि आरएसएस का यह बयान, ‘अपनी वैश्विक छवि को चमकाने के लिए पहले से सोचा-समझा लगता है’ और इसका उद्देश्य ऐसे समय में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को परखना भी हो सकता है, जब उनके मुताबिक भारत ‘पाकिस्तान और अमेरिका के बढ़ते आपसी तालमेल से असहज महसूस कर रहा है।’
पाकिस्तान और अमेरिका के बीच हाल में संबंधों में आई गर्मजोशी के संकेतों के साथ-साथ अमेरिका चीन संबंधों का जि़क्र करते हुए, बासित कहते हैं, ‘चीन-अमेरिका शिखर बैठक भी एक तरह से भारत की तुलना में पाकिस्तान के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है। क्वॉड भी ख़तरे में पड़ सकता है।’
ध्यान देने योग्य है कि ‘क्वॉड’- अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक समूह है- जिसे आम तौर पर चीन के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव का मुक़ाबला करने के प्रयासों के हिस्से के रूप में देखा जाता है।
भारत की इन वरिष्ठ हस्तियों के इन बयानों पर राजनेताओं, विश्लेषकों और टिप्पणीकारों की ओर से सावधानी भरी लेकिन काफ़ी हद तक सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आई हैं।
पाकिस्तान में आरएसएस की छवि को देखते हुए, कई लोगों ने अप्रत्याशित बताया। कई राजनेताओं और पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। पूर्व वित्त मंत्री असद उमर ने इन टिप्पणियों को एक महत्वपूर्ण घटना बताते हुए लिखा, ‘भारत के महत्वपूर्ण लोगों की ओर से पाकिस्तान के साथ फिर से जुडऩे की बात करते देखना अच्छा है।’
होसबाले और पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे, दोनों की टिप्पणियों का जि़क्र करते हुए उन्होंने कहा कि ‘दक्षिण एशिया में रहने वाले लगभग दो अरब लोगों’ के हित के लिए ‘पाकिस्तान और भारत के बीच मतभेदों का समाधान होना बेहद ज़रूरी है।’
पाकिस्तान के पूर्व सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने इस बयान को ‘रुख़ में स्वागत योग्य बदलाव’ बताया और कहा कि बातचीत की शुरुआत भी ‘दोनों देशों की आर्थिक संभावनाओं को बदल सकती है।’
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर संबंध सुधरते हैं तो ‘हिन्दू और मुस्लिम- दोनों तरह के अतिवादी कमज़ोर पड़ेंगे।’ पाकिस्तानी राजनेता मुशाहिद हुसैन सैयद ने इसे ‘ताजग़ी भरा सकारात्मक बयान’ बताते हुए स्वागत किया और लोगों के बीच संपर्क की अपील की सराहना की। उन्होंने इसे ‘समय की ज़रूरत’ बताया।
राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार रज़ा रूमी ने इन टिप्पणियों को ‘वास्तव में उत्साहजनक’ बताया, ख़ासकर ‘लोगों के बीच संपर्क, संवाद, वीज़ा और शांति स्थापित करने में नागरिक समाज की भूमिका’ के संदर्भ को।
उन्होंने कहा, ‘अब देखना यह है कि क्या भारतीय सरकार उस वैचारिक ताक़त की सलाह मानती है, जिसके सहारे उसकी सत्ता कायम है।’
वरिष्ठ पत्रकार कामरान यूसुफ़ ने कहा कि इन टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि ‘सीमा के उस पार कुछ समझ और सोच विकसित हो रही है कि भारत का मौजूदा रुख़ टिकाऊ नहीं है।’
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आरएसएस की प्रभावशाली भूमिका के बावजूद भारत के भीतर प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित रही है।
हालांकि, कुछ पर्यवेक्षक इस बयान से बहुत अधिक अर्थ निकालने को लेकर अब भी सतर्क बने हुए हैं। पत्रकार शहज़ाद इक़बाल ने कहा कि ‘भारतीय विदेश नीति में तत्काल बदलाव के कोई संकेत नहीं हैं’ और निकट भविष्य में दोनों देशों के संबंधों में बदलाव की संभावना कम है।
पूर्व शिक्षा मंत्री शफक़त महमूद ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी और कहा कि भारत से आने वाली ऐसी आवाज़ों का स्वागत करते समय पाकिस्तान का विदेश कार्यालय ‘स्वाभाविक रूप से सतर्क’ रहा है, क्योंकि ‘अतीत में ऐसी कई पहलें किसी नतीजे पर नहीं पहुंचीं।’
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि ‘अगर भारत में गंभीरता का इरादा दिखाई देता है’, तो उसे पाकिस्तान में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है।
कर्नाटक में सरकार ने ना केवल स्कूल-कॉलेजों में 2022 में हिजाब पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है बल्कि नए आदेश के तहत स्टूडेंट्स को हिजाब के अलावा कलावा, रुद्राक्ष और जनेऊ जैसे धार्मिक प्रतीकों को भी पहनने की अनुमति दी है।
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट –
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने 13 मई को स्कूलों और कॉलेजों में धार्मिक प्रतीकों को पहनावे के रूप में शामिल करने संबंधी एक नया आदेश जारी किया। इस नए आदेश के तहत छात्रों को स्कूल-कॉलेज की यूनिफॉर्म के साथ 'सीमित पारंपरिक और प्रथा-आधारित प्रतीक' पहनने की अनुमति दी गई है। इन पारंपरिक प्रतीकों में हिजाब, जनेऊ, पगड़ी, हाथ में पहने जाने वाले कलावा और रुद्राक्ष जैसी चीजें शामिल हैं।
फरवरी 2022 में कर्नाटक की तत्कालीन बीजेपी सरकार ने मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनकर स्कूल-कॉलेज जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। राज्य सरकार का नया आदेश सरकारी स्कूलों और कॉलेजों, सहायता प्राप्त संस्थानों और राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले निजी शैक्षणिक संस्थानों पर लागू होगा।
हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूनिफॉर्म अब भी अनिवार्य रहेगी, लेकिन इन प्रतीकों को अतिरिक्त वस्तुओं के रूप में पहना जा सकेगा। आदेश के मुताबिक, किसी भी छात्र को इन प्रतीकों को धारण करने की वजह से प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा और न ही उसे ऐसे प्रतीक पहनने या हटाने के लिए मजबूर किया जाएगा।
क्यों आया ये आदेश?
कर्नाटक सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा ने मीडिया को बताया कि ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब छात्रों को धार्मिक प्रतीकों की वजह से उनकी पढ़ाई-लिखाई में बाधा पहुंची है। उनका कहना था, "धार्मिक रीति-रिवाज छात्रों की शिक्षा और भविष्य के बीच बाधा नहीं बनने चाहिए। 24 अप्रैल की उस घटना से मुख्यमंत्री को बहुत दुख हुआ था जब बेंगलुरु में केसीईटी (कर्नाटक कॉमन एंट्रेंस टेस्ट) परीक्षा में हिजाब और जनेऊ पहनकर आए छात्रों को परीक्षा में प्रवेश देने से रोक दिया गया था। इस तरह की बातें बच्चों की शिक्षा के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। हमें यह फैसला बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था।’
‘हिजाब और पगड़ी की अनुमति, लेकिन बिंदी, सिंदूर, तिलक और कलावा पर रोक’ भारत में कंपनियों के नियम क्या कहते हैं?
कर्नाटक में कांग्रेस के नेतृत्व में मई 2023 में सरकार बनी थी और सत्ता में आने के बाद ही दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री के सिद्धारमैया ने कहा था कि उन्होंने राज्य में हिजाब पर प्रतिबंध के आदेश को वापस लेने का निर्देश दिया है। उस वक्त उन्होंने कहा था कि पोशाक और भोजन का चुनाव व्यक्तिगत है और किसी को भी इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
क्या था 2022 का हिजाब विवाद
कर्नाटक में पांच साल पहले हिजाब को लेकर विवाद उस वक्त सामने आया जब उडुपी जिले के एक सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज में हिजाब पहनकर आने वाली लड़कियों को कॉलेज में प्रवेश करने से रोक दिया गया। छात्राओं का कहना था कि हिजाब उनकी आस्था और पहचान का हिस्सा है, जबकि कॉलेज प्रशासन ने ड्रेस कोड का हवाला देते हुए उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। छात्राओं के हिजाब पहनने के जवाब में कॉलेज में हिंदू विद्यार्थी भगवा गमछा पहनकर आने लगे और धीरे-धीरे यह विवाद राज्य के अन्य हिस्सों में भी फैल गया। कई शिक्षण संस्थानों में इसकी वजह से सांप्रदायिक तनाव जैसी स्थिति आ गई।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली तत्कालीन बीजेपी सरकार ने स्कूल-कॉलेज में हिजाब पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार ने अपने आदेश में कहा था कि ‘समानता, अखंडता और सार्वजनिक कानून व्यवस्था को बिगाडऩे वाले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।'
सरकार के इस आदेश को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन तीन जजों की बेंच ने सरकार के आदेश को बरकरार रखा। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां यह अभी भी लंबित है। सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच ने इस मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया था लेकिन दोनों न्यायाधीशों की राय इस पर बंटी हुई थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता (अब सेवानिवृत्त) ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया था, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने इसकी अनुमति दी थी।
जस्टिस गुप्ता ने कहा था कि यह केवल एकरूपता को बढ़ावा देने और एक धर्मनिरपेक्ष वातावरण को प्रोत्साहित करने के लिए था लेकिन जस्टिस धूलिया ने राज्य और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर कक्षाओं में हिजाब पहनने के अधिकार को ‘पसंद का मामला' और ‘मौलिक अधिकार' बताया था।


