विचार / लेख

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Posted Date : 18-Nov-2017
  • एचएस पनाग, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल
    जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को राजधानी हरारे में उनके घर में नजरबंद कर लिया गया है। दावा किया जा रहा है कि सेना ने वहां तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले तुर्की और वेनेजुएला में तख्तापलट की असफल कोशिशें हो चुकी हैं। पाकिस्तान में देश की आजादी के कुछ ही दिनों बाद से तख्तापलट का जो सिलसिला चला वो हाल तक जारी रहा।
    लेकिन अफ्रीका और लातिन अमरीका या फिर मध्यपूर्व के कुछ देशों की तरह भारत में तख्तापलट जैसी कोई घटना नहीं घटी। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि भारत में सेना के लिए तख्तापलट करना बिल्कुल भी असंभव है। इसके बहुत स्वाभाविक कारण हैं। भारत की सेना की स्थापना अंग्रेजों ने की थी और उसका ढांचा पश्चिमी देशों की तर्ज पर बनाया था। इस बात पर गौर किया जा सकता है कि पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में तख्तापलट की घटनाएं नहीं हुईं।
    हालांकि 1857 की जो बगावत के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने सेना का पुनर्गठन किया। उन्होंने पूरे भारत से सैनिकों की भर्ती की। हालांकि उन्होंने जाति आधारित रेजिमेंट भी बनाईं लेकिन जो दस्तूर और अनुशासन उन्होंने बनाए वो बिल्कुल एंग्लो सेक्शन कल्चर की तर्ज पर थे।
    यही कारण रहा है कि भारतीय फौज बहुत अनुशासनात्मक रही है। साल 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध तक भारती फौज की अच्छी खासी तादाद थी और ऐसा नहीं होता तो फौज को विद्रोह करने से कोई बात नहीं रोक सकती थी, लेकिन उस समय अलग-अलग रजवाड़ों और रियासतों की वजह से उतनी एकता नहीं थी और सेना में भी क्षेत्र और जातीय आधार पर रेजिमेंटें बनीं थीं। यही कारण रहा कि भारतीय फौज बरकरार रही।
    इसके बाद द्वितीय विश्वयुद्ध का समय आया। उस दौरान आजाद हिंद फौज के गठन की कोशिश हुई तब भी केवल 12 से 20 हजार सैनिक ही आईएनए का हिस्सा बने। जबकि 40 से 50 हजार भारतीय सैनिक विरोधियों के कब्जे में थे। पर सेना का अनुशासन नहीं टूटा।
    साल 1946 में बांबे में नेवी विद्रोह हुआ। लेकिन उस समय तक भारतीय सेना की तादाद 25 लाख के आस पास पहुंच चुकी थी। उस लिहाज से देखें तो नेवी विद्रोह भी एक अपवाद ही था क्योंकि उसमें केवल 10 हजार के करीब सैनिकों ने हिस्सा लिया वो भी नेवी के।
    एक बात ध्यान देने की बात है कि उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध का समय था, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भी अपने चरम पर था और इससे सैनिक भी अछूते नहीं थे। नेवी विद्रोह का असर कई जगह रहा लेकिन कुल मिलाकर भारतीय फौज एकजुट ही रही। इसी तरह का अपवाद 1984 में सामने आया जब स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई के विरोध में कुछ सिख यूनिटों ने विद्रोह कर दिया था। लेकिन बाकी फौज एकजुट रही इसलिए इन विद्रोहों को दबा दिया गया। साठ के दशक में जनरल सैम मानेकशॉ और मौजूदा सरकार के बीच अनबन की खबरें आईं, लेकिन उसका भी स्वरूप कोई व्यापक नहीं था।
    असल में जब पहली बार अंतरिम सरकार बनी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय सेना को लोकतांत्रिक सरकार के नियंत्रण में रहने का सिद्धांत रखा। इसके लिए सबसे पहले उन्होंने कमांडर इन चीफ का पद खत्म कर दिया। इस पद पर अंग्रेजी हुकूमत में अंग्रेज अफसर तैनात होते थे और बाद में इस पद पर जनरल करियप्पा को नियुक्त किया गया था।
    नेहरू ने कहा कि जब फौज का आधुनिकीकरण हो रहा है तो थल सेना, नौसेना और वायुसेना की अहमियत बराबर होगी और उसी समय तीनों के अलग अलग चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बना दिए गए। इन तीनों के ऊपर रक्षामंत्री को रखा गया जो चुनी हुई सरकार के कैबिनेट के तहत काम करता है। जनरल करियप्पा को पहला थल सेना अध्यक्ष बनाया गया। उस समय कमांडर इन चीफ का आवास तीन मूर्ति होता था। बाद में नेहरू ने उसे अपना घर बनाया।
    ये एक बहुत ही सांकेतिक काम था और संदेश साफ था कि देश में लोकतांत्रिक सरकार ही सुप्रीम सत्ता रहेगी। एक बार जनरल करियप्पा ने सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की तो नेहरू उन्हें पत्र लिखकर और बुलाकर नागरिक सरकार के कामों में दखल न देने की हिदायत दी थी।
    दरअसल भारत में लोकतंत्र की जो नींव रखी गई, सेना भी उसका हिस्सा बन गई। बाद में चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं खड़ी हो गईं, इसने लोकतंत्र की नींव को काफी मजबूत किया। इसके बाद पाकिस्तान की तरह के तख्तापलट के खतरे लगभग समाप्त से हो गए। पाकिस्तान में तो 1958 में ही तख्तापलट हो गया। उसी दौरान अफ्रीकी और दक्षिणी अमरीकी देशों में तख्तापलट हुए।
    भारतीय लोकतंत्र जब अपने पैर जमा रहा था, उस नाजुक दौर का खतरा खत्म हो गया। इसमें भारतीय फौज का अराजनीतिक प्रकृति और जनरल करियप्पा की बड़ी भूमिका रही। बाद के समय में जनरल सैम मानेक शॉ के साथ एक विवाद जुड़ा। दिल्ली में उस दौरान कोई प्रदर्शन चल रहा था और सैम मानेक शॉ ने सेना की एक ब्रिगेड की दिल्ली में तैनात की थी, ताकि किसी अप्रिय घटना से निपटा जा सके। हालांकि उन्होंने आलोचना करने वालों को जवाब देते हुए कहा था कि घबराने की कोई बात नहीं ये कोई तख्तापलट की कोशिश नहीं है।
    देश में सेना की सात कमान है और ये संभव नहीं है कि एक जनरल एक साथ सातों कमान को आदेश दे। तब जबकि इनके कमांडर सेनाध्यक्ष से महज एक या दो साल पीछे होते हैं। किसी आदेश को इतनी आसानी से वे नहीं मान सकते जो अनुशासन से संबंधित हो। बाद के समय में हम देखते हैं कि तत्कालीन जनरल वीके सिंह जोकि सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में आकर मौजूदा सरकार में मंत्री बन गए हैं, उन्होंने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को चुनौती दी थी, लेकिन वो भी कोर्ट में।
    हालांकि इंडियन एक्सप्रेस ने कुछ आर्मी टुकडिय़ों के दिल्ली की ओर मार्च की खबर प्रकाशित की थी, लेकिन उसमें भी किसी तख्तापलट जैसा कुछ नहीं था। भले ही ये दावा किया गया हो कि सरकार में उस समय हड़कंप मच गया था और टुकडिय़ों को तुरंत वापस जाने के आदेश दिए गए थे। असल में सेना को तख्तापलट का तब मौका मिलता है जब देश में बहुत अस्थिरता हो, राजनीतिक विभाजन चरम पर हो और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हों या भेदभाव या अराजकता की स्थिति हो।
    भारत में ऐसी स्थिति कभी पैदा ही नहीं हुई। यहां तक कि इमरजेंसी के दौरान भी सेना राजनीति से अलग रही और कुछ लोग इस बात के लिए उसकी आलोचना भी करते हैं कि तीनों सेनाध्यक्षों को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर इमरजेंसी के बारे में बात करनी चाहिए थी।
    फिर भी सेना राजनीति से दूर रही। क्योंकि की नींव में अनुशासन का ऐसा सिद्धांत मौजूद है जो उसे एकजुट रखता है और साथ ही नागरिक प्रशासन में हस्तक्षेप से दूर रखता है।
    (बीबीसी संवाददाता संदीप राय से बातचीत के आधार पर।)

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Posted Date : 18-Nov-2017
  • आलोक कु. गुप्ता,  एसोसिएट प्रोफेसर,  दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि
    भारतीय विदेश नीति पिछले कई दशक से 'लुक वेस्ट पॉलिसी' में सफलता के लिए हर संभव तरीके से प्रयासरत थी। कारण था, पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों की अस्थिरता। लेकिन, पश्चिम की तरफ रास्ते न खुलने के कारण पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के समय 'लुक इस्ट पॉलिसी' का आगाज हुआ, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'एक्ट इस्ट पॉलिसी' में तब्दील करने की वकालत की और पूरब की तरफ हमें कई प्रकार की सफलताएं हासिल हुईं। पूरब के देशों के साथ हमारे व्यापार और राजनीतिक संबंध पश्चिम की अपेक्षा कई गुना सफल और अग्रसर हैं। बीते 29 अक्तूबर को पहली बार भारत के कांडला बंदरगाह से अफगानिस्तान के लिए प्रथम शिपमेंट चाबहार बंदरगाह भेजा गया। यह भारतीय विदेश नीति की सफलता है, क्योंकि इसके साथ ही भारत और ईरान के बीच कनेक्टिविटी के लिए चाबहार बंदरगाह ऑपरेशनल हो गया, जिसका इंतजार कई वर्षों से था। भारतीय विदेश नीति एवं राष्ट्रीय हित के लिए इसके कई दूरगामी परिणाम मिलेंगे।
    पहला, यह सफलता स्वयं में पाकिस्तान को और उसके साथ चीन को मुहतोड़ जवाब है। क्योंकि, पाकिस्तान को शायद ऐसा लग रहा था कि भारत को पश्चिम की तरफ अपनी पहुंच बनाने हेतु पाकिस्तान की सरजमी से ही गुजरना होगा। ज्ञात हो कि भारतीय नौसेना के अधिकारी कुलभूषण जाधव, जिसे उसने जासूसी आरोप लगाकर अपने यहां जेल में बंद कर रखा है, से उनकी पत्नी को मानवीय आधार पर मिलने की इजाजत दी है। ऐसा कहा जा सकता है कि पश्चिम की ओर भारत की इस सफलता के मद्देनजर पाकिस्तान दबाव में आकर भारत के साथ वार्ता आरंभ करने को इच्छुक हो।
    दूसरा, यह मार्ग चीन के लिए भी सामरिक चिंता का विषय बनेगा। क्योंकि चीन द्वारा पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को विकसित किया गया है। ग्वादर के रास्ते चीन सीपीइसी को विकसित कर रहा है, जो उसके अब तक के प्रशांत महासागर के मार्ग से हो रहे व्यापार के रास्ते को कई गुना कम कर देगा। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत चीन भारत को भी उसमें शामिल करने का प्रयास कर रहा है, जो चीन की एक सामरिक चाल है।  गौरतलब है कि सीपीइसी 'पाक-अधिकृत कश्मीरÓ की विवादित भूमि से गुजर रहा है। अत: भारत के इसमें शामिल होते ही इस भूमि पर पाकिस्तान की वैधता कायम हो जाती।  
    तीसरा, इससे भारत-ईरान के बीच कनेक्टिविटी बढ़ेगी, जिससे भारत को फायदा मिलेगा। ईरान सरकार द्वारा चाबहार को मुक्त व्यापार और औद्योगिक क्षेत्र के रूप में नामित किया गया है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इसकी मुख्य भूमिका को इंगित करता है।  
    चाबहार से अफगानिस्तान तक रेल और सड़क मार्ग विकसित करने पर बात चल रही है। इसके तहत भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच चाबहार बंदरगाह का उपयोग करते हुए परिवहन एवं मालवहन गलियारा बनाने की कोशिश है। भारत 'लुक वेस्ट पॉलिसी' के तहत बेसब्री से पश्चिम की ओर कनेक्टिविटी बढ़ाने को लालायित है, जो भारत को सामरिक दृष्टि से भी अरब सागर में मजबूत करेगा।
    चौथा, इससे मध्य एशिया और यूरोप तक भारत द्वारा शिपमेंट भेजने का खर्च और समय लगभग आधा हो जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्ता है, जो भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया का द्वार खोलता है। मध्य एशिया के रास्ते ही भविष्य में यूरोप होते हुए रूस के बाजार में पहुंचने के मार्ग सुगम हो जाएंगे। चाबहार बंदरगाह सामरिक और ऊर्जा के लिहाज से काफी समृद्ध है।  इस बंदरगाह तक भारत के पश्चिम तट से फारस की खाड़ी के रास्ते सीधा पहुंचा जा सकता है। यह मार्ग इस क्षेत्र पर चीन के एकाधिकार को समाप्त कर अच्छी प्रतिस्पर्धा देगा। चाबहार से ग्वादर बंदरगाह मात्र 72 किमी की दूरी पर है। इस कारण चाबहार को विकसित करने हेतु भारत और ईरान के बीच 2003 से ही बात आरंभ हो चुकी थी, परंतु ईरान पर लगे प्रतिबंध के कारण यह कार्य धीमी गति से चल रहा था।  
    पांचवां, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नजरिये से यह भी महत्वपूर्ण है कि अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने बीते 24-25 अक्तूबर के भारत दौरे पर यह स्पष्ट कर दिया कि ईरान के साथ वैध कारोबार पर अमेरिका को कोई नाराजगी नहीं है। वर्तमान में भारत के लिए अमरीका का आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक महत्व बहुत ज्यादा है, जिसे वह खोने की स्थिति में नहीं है। अत: अमेरिका का सॉफ्ट रुख भारतीय कुटनीति के परिपक्व होने का परिचायक है। चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जवाब में भारत जिस विकल्प की तलाश में था, वह कार्यक्रम तो चल पड़ा, परंतु इस सफलता का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि भारत इसके लिए फंड की व्यवस्था कहां से और कैसे करेगा। क्योंकि, इस प्रोजेक्ट का मुख्य किरदार रूस अभी आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं दीखता। 
    इसमें ईरान और मध्य एशिया के देश कितना रुचि लेते हैं, वही भारत के इस अल्टरनेटिव 'ट्रेड रूट' का भविष्य तय करेगा। अब भारत की विदेश नीति एवं कूटनीति को सक्रिय एवं गतिशील होने की आवश्यकता है, क्योंकि हमारे दोनों पड़ोसी देश- पाकिस्तान और चीन, दोनों इस अल्टरनेटिव को विफल करने का भरपूर प्रयास करेंगे। http://www.prabhatkhabar.com/

     

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Posted Date : 18-Nov-2017
  • कुलदीप कुमार
    यूं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हर समय खतरा मंडराता रहता है लेकिन पिछले वर्षों में स्थिति कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गई है। हर प्रकार के कट्टरपंथी साहित्य, चित्रकला, सिनेमा और वैचारिक विमर्श पर अंकुश लगाना चाहते हैं और इसके लिए वे धमकी, हिंसा और अन्य किसी भी किस्म के गैरकानूनी तरीके अपनाने में भी गुरेज नहीं करते। वे सरकारें भी अक्सर इनके दबाव के आगे झुक जाती हैं जो इनसे सहमत नहीं होतीं। और, जो सहमत होती हैं, वे तो इनकी बात मानती ही हैं।
    दो ताजातरीन उदाहरणों से स्थिति की नजाकत समझ में आ सकती है। गोवा में 20 नवंबर से अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव शुरू होने वाला है लेकिन उसके शुरू होने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय निर्णायक मंडल के तीन सदस्य इस्तीफा दे चुके हैं क्योंकि निर्णायक मंडल द्वारा चुनी गई तीन फिल्मों के प्रदर्शन पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने रोक लगा दी है क्योंकि हिंदुत्ववादी तत्व उन्हें अश्लील बता कर उनका विरोध कर रहे थे। उधर जाने-माने फिल्म निदेशक संजय लीला भंसाली की 1 दिसंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म 'पद्मावतीÓ को लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है।
    फिल्म की नायिका दीपिका पादुकोण की सुरक्षा बढ़ाई जा रही है क्योंकि उनकी नाक काटने से लेकर उनके खिलाफ अन्य किस्म की हिंसा करने की खुलेआम धमकियां दी जा रही हैं। अनेक राजपूत संगठन और हिन्दू जागरण मंच के साथ-साथ स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ फिल्म के खिलाफ प्रचार में लगे हैं क्योंकि उनका आरोप है कि सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के स्वप्न में उसके और पद्मावती के बीच प्रेमदृश्य दिखा कर भंसाली ने राजपूती आन-बान का अपमान किया है। यह बात दीगर है कि फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्यों के अलावा अभी तक यह फिल्म किसी ने भी नहीं देखी है और बोर्ड ने इसे प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र दे दिया है।
    ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का एक दूसरे मामले की सुनवाई के दौरान यह फैसला आना कि कलात्मक अभिव्यक्ति को संरक्षण देना उसका कर्तव्य है और इस क्षेत्र में साधारणत: अदालतों को दखल नहीं देना चाहिए, बेहद राहत देने वाला है। 
    सुप्रीम कोर्ट का काम संविधान का संरक्षण और उसकी व्याख्या है और आम नागरिक अपने अधिकारों की हिफाजत के लिए उसी की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि किसी फिल्म को सेंसर बोर्ड ने प्रदर्शन के लिए प्रमाणपत्र दे दिया है तो फिर अदालतों को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी गरिमा की रक्षा करने की दिशा में यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    पिछले कई दशकों के दौरान इतिहास, साहित्य और कलाओं पर लगातार इस आधार पर हमले होते रहे हैं कि उनसे इस या उस जाति अथवा धार्मिक समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं। जिस तरह आज राजपूत संगठन संजय लीला भंसाली की फिल्म के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं, जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि पद्मिनी/पद्मावती सोलहवीं सदी के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित पूर्णत: काल्पनिक पात्र है। उसी तरह कुछ वर्ष पहले प्रसिद्ध इतिहासकार सतीश चन्द्र की मध्यकालीन इतिहास पर पुस्तक के खिलाफ जाट समुदाय के लोग आंदोलन करने लगे थे। पिछले दिनों राजस्थान की सरकार ने पाठ्यपुस्तकों में बदलाव करके हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर के बजाय राणा प्रताप को विजयी दिखाये जाने का आदेश जारी किया। कुछ वर्षों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी के पाठ्यक्रम से एके रामानुजन का रामायण की विविधतापूर्ण परंपरा पर लिखा प्रसिद्ध निबंध निकाल दिया गया था क्योंकि हिंदुत्ववादी तत्व उसे हिन्दू भावनाओं को आहत करने वाला बता रहे थे।
    सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह रुझान समाप्त हो जाएगा, ऐसी आशा किसी को भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय और शक्तिशाली तत्व एकाएक निष्क्रिय नहीं हो सकते। लेकिन इस आदेश से उनके उत्साह और उन्माद पर कुछ अंकुश अवश्य लगेगा और वे जरा-जरा सी बात पर अदालत का दरवाजा खटखटाने और अपने विरोधियों को परेशान करने से पहले कुछ क्षण रुक कर जरूर सोचेंगे।   (डॉयचे वैले)

     

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Posted Date : 17-Nov-2017
  •  प्रमोद जोशी
    श्रीश्री रविशंकर की पहल के कारण मंदिर-मस्जिद मसला एक बार फिर से उभर कर सामने आया है। देखना होगा कि इस पहल के समांतर क्या हो रहा है और यह भी कि इस पहल को संघ और सरकार के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन है या नहीं। आमतौर पर ऐसी कोशिशों के वक्त चुनाव की कोई तारीख करीब होती है या फिर 6 दिसम्बर जिसे कुछ लोग शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं और कुछ यौमे गम। संयोग से इस वक्त एक तीसरी गतिविधि और चलने वाली है।
    पिछले डेढ़ सौ साल से ज्यादा समय में कम से कम नौ बड़ी कोशिशें मंदिर-मस्जिद मसले के समाधान के लिए हुईं और परिणाम कुछ नहीं निकला। पर इन विफलताओं से कुछ अनुभव भी हासिल हुए हैं। हल की तलाश में श्री श्री अयोध्या का दौरा कर रहे हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से मुलाकात भी की है।
    पृष्ठभूमि में इस मसले से जुड़े अलग-अलग पक्षों से उनकी मुलाकात हुई है। कहना मुश्किल है कि उनके पीछे कोई राजनीतिक प्रेरणा है या नहीं। गुजरात में कांग्रेस पार्टी ने दलितों, ओबीसी और पाटीदारों यानी हिन्दू जातियों के अंतर्विरोध को हथियार बनाया है जिसका सहज जवाब है हिन्दू अस्मिता को जगाना।
    गुजरात में बीजेपी दबाव में आएगी तो वह ध्रुवीकरण के हथियार को जरूर चलाएगी। पर अयोध्या की गतिविधियाँ केवल चुनावी पहल नहीं लगती। गुजरात के चुनाव के मुकाबले ज्यादा बड़ी वजह है सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर 5 दिसम्बर से शुरू होने वाली सुनवाई। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सन् 2010 के फैसले के सिलसिले में 13 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। अब इन पर सुनवाई होगी।
    कुछ पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि पार्टी 2019 के पहले मंदिर बनाना चाहती है। कुछ महीने पहले सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्वीट किया था, राम मंदिर का हल नहीं निकला तो अगले साल, यानी 2018 में अयोध्या में वैसे ही राम मंदिर बना दिया जाएगा। स्वामी के अनुसार तब तक संसद के दानों सदनों में भाजपा के पास बहुमत होगा। उस वक्त कानून बनाकर राम मंदिर बना दिया जाएगा। इस ट्वीट को हवाई उड़ान मान भी लें, पर यह असम्भव नहीं है।
    बीजेपी के सांसद साक्षी महाराज ने भी पिछले दिनों कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी मंदिर निर्माण शुरू करने के बाद ही उतरेगी। लगता है कि पार्टी के भीतर किसी स्तर पर मंदिर को लेकर विमर्श चल रहा है।
    अदालती मध्यस्थता से समझौता सम्भव है। हाल में संघ के एक अनुषंगी संगठन के रूप में श्रीराम मंदिर निर्माण सहयोग मंच भी उभर कर आया है। इस संगठन की मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यह संगठन इन दिनों सक्रिय है।
    सुब्रमण्यम स्वामी के ट्वीट के एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को आपसी सुलह के जरिए हल करने की सलाह दी थी। कोर्ट ने कहा था कि दोनों पक्ष बैठकर इस मामले पर अपनी सहमति बना लें। यदि उसके बाद भी सुलह नहीं होती है तो कोर्ट दखल देने को तैयार है।
    भाजपा के सूत्र संकेत दे रहे हैं कि अदालती फैसला आखिरी होगा और उस पर सभी को सहमत होना चाहिए। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी मानते हैं कि बातचीत या मध्यस्थता से यह मसला हल नहीं हो सकता। पर वे मानते हैं कि मामले का हल कोर्ट से निकल सकता है।
    बाहरी समझौते में बहुत पचड़े हैं। बीजेपी के भीतर मंदिर आंदोलन के नेताओं का एक अलग समूह है। इन नेताओं के स्वतंत्र स्वर हैं। मसलन विनय कटियार किसी चैनल पर इस पहल को लेकर अपने अंदेशे को व्यक्त कर रहे थे।
    संतों-महंतों में कई गुट हैं जिनमें आपसी टकराव है। राम जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्य रामविलास वेदांती ने कहा है, हम मंदिर आंदोलन में 25 बार जेल गए और 35 बार नजरबंद हुए। हमारी उपेक्षा नहीं की जा सकती। अयोध्या के साधु-संतों को विश्वास में लेना होगा। मुसलमानों के बीच भी मतभेद हैं। शिया-सुन्नी संगठनों के बीच मतभेद हैं। शियाओं और सुन्नियों के बीच भी आंतरिक मतभेद हैं।
    सबसे बड़ा सवाल है कि संघ क्या चाहता है? मंदिर मुद्दा बीजेपी के लिए रामबाण का काम करता है, पर इसे ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता। एक लम्बे अरसे तक पार्टी को इस मुद्दे से किनाराकशी करनी पड़ी।
    सन 1992 के बाद पार्टी राजनीतिक स्तर पर अछूत होती चली गई। मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की पहली सरकार को इसका स्वाद चखना पड़ा। उसके बाद उसने सहयोगी दलों को साधा और 1998 और 1999 में एनडीए की सरकारें बनीं। साल 1989 से 2009 तक पार्टी अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने का वादा करती रही। पर सन् 2014 के 42 पेजों के चुनाव घोषणापत्र में 41वें पेज पर महज दो-तीन लाइनों में यह वादा किया गया। वह भी संभावनाएं तलाशने का वादा। और यह भी कि यह तलाश सांविधानिक दायरे में होगी।
    बीजेपी को 2019 के फॉर्मूले की तलाश है। पार्टी ने सन् 2009 की पराजय के बाद माना था कि दिल्ली की कुर्सी पर बैठना है तो जनता के सवालों को उठाना होगा। सन 2009 में पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी ने दिसम्बर में अपने पहले संवाददाता सम्मेलन में विकास की बात की, मंदिर की नहीं। उन्होंने इंदौर में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में कहा था कि अगर मुस्लिम विवादित भूमि पर दावा छोड़ देते हैं तो मंदिर के पास ही मस्जिद भी बनवाई जाएगी।
    यह मस्जिद कहाँ बनेगी? एक तबका कहता है कि सरयू पार बने और दूसरा कहता है कि कहीं पास में ही बने। (बीबीसी)

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Posted Date : 17-Nov-2017
  • प्रकाश दुबे
     दीया तले, नकदी चले
     ढोल नोटबंदी के नुकसान बता रहा था। दूसरी तरफ सत्ता का नगाड़ा पिट-पिट कर शुभ-लाभ गिना रहा था। दो पाटन के बीच में जनता की तूती की आवाज दब गई। सब्जी और किराने की दुकान पर नकदी के बजाए मशीन से भुगतान करने का जमकर प्रचार हुआ था। कहावत तो पक्की-पुरानी है कि दूर के ढोल सुहावने। दीया तले अंधेरा तय है। इसलिए नहीं, कि दीया अब किसी पार्टी का चुनाव-चिन्ह नहीं रहा। इसलिए, कि हवाई अड्डïा बस्ती से कई किलोमीटर दूर रहता है। दिल्ली विमानतल पर पुलिस की टैक्सी सेवा की स्वाइप मशीन बंद है। नकद भुगतान करना पड़ता है। इसकी जानकारी दिल्ली पुलिस, मंत्री अशोक गजपति राजू तक नहीं पहुंची। प्रधानमंत्री टैक्सी से जाते नहीं।   
      आव जो
    राहुल बाबा से लेकर मौनी बाबा मनमोहन सिंह तक गुजरात में प्रचार कर चुके हैं। कांग्रेस को सौराष्टï्र के आम फलों से लदे नजऱ आ रहे हैं। डर है, कोई अमितयां न लूट ले जाए। ज्योतिरादित्य सिंधिया का गुजरात-कनेक्शन है। फिर-फिर जाएंगे। सैम पित्रोदा अमेरिकावासी हैं। कन्फूजिया मत जाना। वे क्रिस्तान नहीं है जैसा कि बरसों पहले बाल ठाकरे अनजाने में  बोल गए थे। सैम भाई को गुजरात के अखाड़े में ताल ठोंकने का न्यौता मिला। हर हाथ को काम मिले या न मिले। सैम पित्रोदा के सहयोग से राजीव गांधी हर हाथ में मोबाइल अवश्य थमा गये। कई कांग्रेसी अनजान हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि अभा कांग्रेस कमेटी के सागरपार विभाग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा हैं।    
    एक हृदय हो भारत जननी
    प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमिल दैनिक दिनथंति के समारोह में चाय बनाना तो नहीं सिखाया। लफ्फाज पत्रकारों को सीख अवश्य दी कि राजनीतिक जागरूकता फैलाने के लिए सरल भाषा का प्रयोग करें। पुरानी तकनीक छोड़कर नए ढांचे में ढलें। मोदी को किसी ने बताया कि थंति का हिन्दी में अर्थ तार होता है। तारघर अतीत में विलीन हो चुके हैं। लेकिन थंति प्रतिदिन निकल रहा है। बातों के तार जोडऩे में प्रधानमंत्री का सानी नहीं। तार सेवा के जिक्र के बाद कहा-अब तो सबके हाथ में मोबाइल हैं। हर मोबाइलधारी समाचार के आदान-प्रदान का स्रोत है। तार ऐसा जुड़ा, कि तमिलनाडु के राजभवन में शिक्षक तमिल सिखाने जाता है। शिक्षार्थी हैं-बनवारी लाल पुरोहित। वणक्कम-धन्यवाद।       
     सर्वोत्तम सीट फिसड्डïी को 
    तय करने वाले करें कि सूझबूझ सुरेश प्रभू की थी या मनोज सिन्हा की?  नाम तो पीयूष गोयल और अश्वनी लोहानी का लिया जाएगा। दोनों महानुभावों के प्रभार संभालने के बाद सर्वोत्तम फिसड्डïी की तलाश आरम्भ हुई। दिल्ली से जबलपुर तक और मुंबई से इलाहाबाद तक रेलवे ने दो सर्वोत्तम फिसड्डïी तलाश कर लिए। दोनों से कहा गया कि फटाफट अफसर बन जाओ। हुआ यूं, कि रेलवे के वाणिज्य विभाग में अफसरों की भर्ती हुई। परीक्षा में असफल व्यक्तियों से दो सर्वोत्तम फिसड्डïी यानी बेस्ट अमंग फेलुअर केंडीडेट्स तलाश किए गए। आरक्षण न दे पाने के लिए बदनाम रेलवे में इस तरह का आरक्षण तो संविधान लिखने वालों ने सपने में नहीं सोचा होगा।    
    (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

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Posted Date : 17-Nov-2017
  •  डॉ. लखन चौधरी
     पिछले दो-एक दशक से भारत सहित दुनियाभर में महिला जागरण, महिला जागरूकता एवं महिला चेतना अभियान एवं आन्दोलनों में भारी तेजी, प्रगति एवं गतिशीलता देखी जा रही है। अपने अधिकारों के प्रति बड़ी ही सजगता एवं आक्रामकता के साथ संघर्ष करती हुई महिलाएं अब अपनी बेहतरी, बदलाव एवं विकास के लिए प्रत्येक क्षेत्र में ना सिर्फ अपनी गंभीर, जरूरी एवं अनिवार्य उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, बल्कि अपनी सकारात्मक, संवेदनशील एवं सजग मुखरता से समाज में एक नई क्रांति का आग़ाज भी जोरशोर से कर रही हैं। 
    यह बहुत अच्छा है क्योंकि महिलाएं सदियों से अत्याचार, शोषण एवं दोयम दर्जे का शिकार रही हैं। इसके लिए एक सशक्त, मुखर एवं प्रखर आवाज उठानी ही चाहिए और उठानी ही होगी, तथा ऐसा लगने भी लगा है कि अब महिलाएं रूकने वाली नहीं हैं।
    वैसे तो आदिकाल से लेकर भारतीय महिलाएं श्रद्धा, सम्मान और शक्ति स्वरुपा के रुप में घर, परिवार, समाज एवं देशभर में पूजनीय रहीं हैं। जीवन मूल्यों एवं जीवन सूत्रों को सहेजने से लेकर आर्थिक प्रबंधन तक व्यक्ति, परिवार एवं समाज की सामाजिक आर्थिक बदलाव, परिवर्तन एवं विकास की प्रत्येक कड़ी में पुरूषों के लिए एक सशक्त, समर्थ एवं सबल प्रेरणा स्रोत रहीं हैं। कला-साहित्य, धर्म-संस्कृति, ज्ञान-चरित्र की आधार, सूत्रधार और अंतिम रक्षक भी रहीं हैं। लेकिन इसके बावजूद महिलाओं पर अत्याचार कम नहीं हुआ और नहीं हो रहा है।
     आज भी देश की तीन-चौथाई से अधिक महिलाओं की स्थिति, उनकी दशा एवं विकास की दिशा के संबंध में अनेकों प्रकार की विसंगतियां, विकृतियां, विषमताएं एवं विरोधाभास देखने को मिलती हैं। ऐसी स्थिति में महिलाओं की स्थिति-दशा एवं महिलाओं के नाम पर चलाये जा रहे आन्दोलनों की भूमिका पर गंभीरतापूर्वक विचार एवं चिंतन करना भी जरुरी, समसामयिक एवं प्रासंगिक लगता है। 
    निश्चित रुप से आज देश-दुनिया का कोई भी क्षेत्र महिलाओं के योगदान से अछूता नहीं रह गया है। वह चाहे कृषि एवं कृषि सहायक क्षेत्र हो अथवा औद्योगिक क्षेत्र अथवा कोई भी सेवा क्षेत्र हो महिलाओं की भागीदारी न सिर्फ बराबरी की है, अपितु कई क्षेत्रों में तो महिलाएं पुरूषों से आगे निकल चुकी हैं। 
    घर, परिवार, समाज और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की सकल आर्थिक एवं गैर आर्थिक भागीदारी एवं सेवा को जोड़ें तो उनका योगदान दो तिहाई से उपर बैठता है। इसके बावजूद तीन-चौथाई से अधिक महिलाओं की स्थिति, प्रस्थिति, परिस्थिति एवं सामाजिक स्थिति में कोई सकारात्मक बदलाव दिखलाई नहीं दे रहा है। नवीन स्थानीय शासन व्यवस्था के तहत अब पंचायतों एवं नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए सीधा 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान भी हो चुका है, मगर ग्रामीण परिवेश में भी इसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है।  समकालीन भारत में आज महिलाओं के समक्ष सबसे बड़ी समस्या उनकी दोहरी जिम्मेदारी एवं भूमिका को लेकर है। इसके कारण महिलाओं के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। कस्बों, शहरों एवं नगरों-महानगरों में महिलाओं के समक्ष अलग तरह की समस्याएं हैं। तमाम प्रकार सुरक्षा, चेतावनी के बावजूद दुष्कर्म जैसी घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। आर्थिक स्वावलंबन और मजबूती के नाम पर महिलाओं में अविवाहित रहने, घर-परिवार से अलग रहने, ससुराल में तालमेल न बिठा पाने, तलाक की स्थिति आदि और इनके कारण उपजे एकाकीपन, तनाव-कुण्ठा आदि समस्याएं बड़ी तेजी के साथ बड़ रही हैं। 
    आज की आधुनिक महिलाएं आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ में विज्ञापनवाद, बाजारवाद, उपभोक्तावाद की बड़ी तेजी के साथ शिकार होती जा रहीं हैं। शिक्षा के विकास प्रचार-प्रसार और बड़े पैमाने पर महिलाओं द्वारा नौकरी करने के कारण हांलाकि अब दहेज जैसी समस्याओं का दंश एवं अभिशाप थोड़ा जरुर कम होने लगा है।  इधर महिलाओं की समस्याओं पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि महिलाओं से जुड़ी समस्याओं का एक दुखद पहलू यह है कि आज भी महिलाओं का विकास, कल्याण और संरक्षण पुरुषों पर निर्भर है। 
    महिला उत्थान, महिला जागरूकता, महिला जागरण, महिला मुक्ति, महिला समानता और महिला स्वतंत्रता से जुड़े सारे कार्यक्रमों, संगठनों, योजनाओं और अभियानों के सूत्रधार एवं दिशा निर्देशक कहीं न कहीं पुरुष ही होते हैं, जिनका उद्धेश्य महिलाओं का किसी ना किसी प्रकार से शोषण करना होता है। महिलाओं के शोषण जैसी घटनाओं के लिए अधिकांश मामलों में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कोई ना कोई महिला ही जिम्मेदार पाई जाती है। 
    सोशल मीडिया व इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ बढ़ती संचार क्रांति ने महिलाओं की अस्मिता, नैतिकता और उनकी सीमाओं-मर्यादाओं को लेकर कुछ गंभीर सवाल और प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिए हैं, जो आने वाले समय में घर, परिवार और समाज के लिए शायद! संकट खड़ा कर सकते हैं। 
    आने वाले समय में महिलाओं के समक्ष कुछ और समस्याएं आ सकती हैं जैसे बराबर के कानूनी अधिकार से क्या बराबर का सम्मान मिल पायेगा? बिगड़ते लिंगानुपात का महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा? पंजाब, हरियाणा, राजस्थान आदि राज्यों का उदाहरण अच्छा नहीं माना जा सकता है। आने वाले समय में महिलाएं क्या अपने से कम योग्य और कम पढ़े-लिखे पुरुषों या जीवनसाथी के साथ स्वाभीमान और सम्मान के साथ रह पायेंगी? आर्थिक स्वतंत्रता-स्वावलंबन और मजबूती तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता की लहर क्या महिलाओं को अलगाव और तलाक जैसी विकृतियों से बचा पायेगी? इस तरह के अनेक सवाल हैं जिन पर आज समाज को भी चिंतन करने की आवश्यकता है। आज महिलाओं को यह सोचने की जरूरत है कि महिलाओं के लिए चलाये जा रहे आन्दोलनों का प्रभाव महिलाओं की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन एवं बदलाव के लिए कितना हो रहा है? कहीं ऐसा ना हो कि आन्दोलनों के भंवर में फंसकर महिला अपनी वास्तविक दिशा एवं दशा ही भूल जायें?
    दोहरी जिम्मेदारी, दोहरी कार्यव्यवस्था, दोहरी अर्थव्यवस्था और दोहरी सोच तथा दोहरी मानसिकता के बीच पिसती 21वीं सदी की आधुनिक पढ़ी-लिखी महिलाओं को उनसे जुड़ी समस्याओं, उनके समक्ष आने वाली भावी चुनौतियों तथा इसके उचित और सार्थक समाधान के बारे में भी उन्हे स्वयं सोचना होगा। उन्हे अब स्वयं यह निर्णय लेना होगा कि उनके लिए सही क्या है? और गलत क्या है? बदलाव, विकास और परिवर्तनों को आत्मसात करने का उनका पैमाना क्या होगा एवं क्या होना चाहिए? अब समय आ गया है कि महिलाएं अपनी स्थिति, दशा एवं दिशा के बारे में स्वयं सोचें और गंभीरतापूर्वक विचारविमर्श करें। महिलाओं की स्थिति, प्रस्थिति एवं आर्थिक-सामाजिक स्थिति को सम्मान एवं स्वाभीमान के स्तर तक सुधारने का यही एक सही, सार्थक एवं सकारात्मक कदम हो सकता है।
    (वरिष्ठ सहा. प्रोफेसर अर्थशास्त्र, कल्याण स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय भिलाईनगर-दुर्ग)

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Posted Date : 16-Nov-2017
  • शशांक, पूर्व विदेश सचिव 
    अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ताजा गतिविधियां गौर करने लायक हैं। एशियाई देशों की उनकी 12 दिनों की यात्रा मंगलवार को खत्म हो गई। अंतिम पड़ाव में उन्होंने आसियान बैठक में शिरकत की, जहां हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनकी मुलाकात हुई। राष्ट्रपति ट्रंप ने अब तक इतना लंबा दौरा किसी भी क्षेत्र का नहीं किया है। यहां तक कि किसी अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष ने करीब दो दशक के बाद एशियाई महाद्वीप का इतना लंबा दौरा किया है। यह स्थिति तब है, जब खुद ट्रंप द्वारा 'अमरीका फस्र्टÓ का नारा बुलंद किया गया है। ट्रंप की इस यात्रा से तीन तरह की तस्वीरें उभरती हैं, खासकर ट्रंप प्रशासन द्वारा अफगान व एशिया नीति घोषित करने के बाद से। पहली तस्वीर यह है कि अब पाकिस्तान पर अमेरिका का भरोसा कम हुआ है। 
    अब तक अफगानिस्तान के मसले पर अमरीका  की निर्भरता पाकिस्तान पर बनी हुई थी। फिर चाहे इसके पीछे अफगानिस्तान में राजनीतिक स्थिरता कायम करने की मंशा हो अथवा वहां मौजूद अमेरिकी सैनिकों को रसद व अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना। इसके लिए पिछले दस वर्षों में अमरीका ने करीब 30 अरब अमेरिकी डॉलर की इमदाद पाकिस्तान को दी है। मगर अब उसकी इस रणनीति में बदलाव दिख रहा है। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि जिस ओसामा बिन लादेन को ढूंढऩे के लिए अमरीका जहां-तहां हाथ-पांव मार रहा था, वह उसे पाकिस्तान में ही मिला।
    दूसरी तस्वीर, समुद्री रणनीति में भारत की अहमियत को समझना है। अमेरिका ने हाल ही में अपनी 'मैरीटाइम पॉलिसीÓ का एलान किया है। इसमें उसने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया है। इसमें हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में एक रिश्ता बताते हुए कहा गया है कि अमेरिका व भारत एक-दूसरे के सहयोगी हैं। बताया यह भी गया है कि यह समुद्री कारोबार नियम आधारित होगा।
    ऐसा नहीं होगा कि कोई भी देश इसमें जोर-आजमाइश करे, जैसा कि 'दक्षिण चीन महासागरÓ में चीन करता रहता है। साफ है, पहले के मुकाबले अब अमेरिकी नीतियों में भारत को कहीं ज्यादा अहमियत मिल रही है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों को पूरी तरह से परिभाषित कर दिया गया है, पर जिस तरह की रूपरेखा बनती दिख रही है, उससे साफ है कि भारत को साथ लेकर चलने की मंशा अमेरिका की है। 
    तीसरा परिदृश्य उत्तर कोरिया के संकट के बहाने एशियाई देशों को साथ लेकर चलने का दिख रहा है। ऐसा लगता कि अमेरिका सभी देशों को साथ लेकर उत्तर कोरिया पर दबाव बनाना चाहता है। संभवत: इसीलिए आसियान देशों से बात की जा रही है और उत्तर कोरिया के पड़ोसी देश जापान व दक्षिण कोरिया से भी। यानी अमेरिका एक तरफ इस मसले पर अपनी संवेदनशीलता दिखा रहा है और दूसरी तरफ तमाम देशों से मशविरा करके संकट का समाधान ढूंढऩे की कोशिश भी कर रहा है। यह उसके रुख में आई नई तब्दीली है।
    इन तीनों तस्वीरों के बरक्स अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात को देखें, तो साफ जाहिर होता है कि उस मुलाकात में द्विपक्षीय संबंधों पर भी बात हुई है और क्षेत्रीय रिश्तों पर भी। बैठक के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से मुखातिब होकर जो कुछ कहा, उसका सार यही है कि द्विपक्षीय रिश्तों और क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की भूमिका को लेकर अमरीका गंभीर तो है ही, अन्य अंतरराष्ट्रीय मसलों व मानवता के लिहाज से भी वह नई दिल्ली के योगदान को समझ रहा है। पुराने दौर में हमने देखा है कि भले ही अमेरिका यह दावा करता रहा हो कि भारत के साथ उसके अच्छे रिश्ते हैं, पर बराक ओबामा जैसे राष्ट्रपति ने 'जी-2Ó की संकल्पना की थी। 
    इस समूह का दूसरा देश चीन था। बिल क्लिंटन ने भी कभी चीन से मदद मांगी थी, क्योंकि उन्हें भारत और पाकिस्तान का परमाणु परीक्षण करना काफी नागवार गुजरा था। एशिया प्रशांत पॉलिसी से भारत को बाहर रखने की भी कभी वकालत की गई थी। मगर अब सब कुछ बदल गया है। अब ऐसा लगता है कि जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत जैसी तमाम क्षेत्रीय ताकतों के साथ मिलकर अमेरिका एक मजबूत रिश्ता विकसित करना चाहता है। पहले भले ही 'अमेरिकन पिवटÓ की बातें होती रही हैं, पर अब सभी की भागीदारी और सबके हितों की पूर्ति के बारे में सोचा जा रहा है।
    यह भारत और अमरीकी रिश्तों की एक नई शुरुआत है, जिसमें कारोबारी संबंध की भी बात हो रही है, सुरक्षा संबंधों की भी, क्षेत्रीय देशों की उम्मीदों की भी और समुद्री सहयोग की भी। हालांकि भारत की अपनी चिंताएं भी हैं। चीन को नाराज करने का जोखिम फिलहाल हम नहीं उठा सकते। 
    यह सही है कि हाल ही में डोका ला को लेकर दोनों देश आमने-सामने आ गए थे। चीन की मंशा भूटान और भारत पर दबाने बनाने की थी। मगर इस मसले का समाधान हमारे हित में निकला है। ऐसे में, नई दिल्ली को उम्मीद है कि पाकिस्तान पर दबाव बनाने की कोशिश भी रंग लाएगी। इसकी वजह यह भी है कि चीन अब खुद आतंकवाद का दंश झेलने लगा है और पाकिस्तान को बहुत महत्व देने से अफगानिस्तान में उसके हित भी प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए बेहतर यही होगा कि भारत और चीन का रिश्ता सौहार्दपूर्ण तरीके से आगे बढ़े।
    अच्छी बात यह है कि आसियान जैसे मंचों से भी हमें पर्याप्त सहयोग मिल रहा है। भले ही आसियान देशों के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर कनेक्टिविटी के मामले में हम चीन से पीछे हों, लेकिन उनके साथ हमारे रिश्ते तेजी से विकसित हो रहे हैं। आगामी गणतंत्र दिवस के मौके पर आसियान देशों के तमाम शासनाध्यक्षों को नई दिल्ली का आमंत्रण इसी की अगली कड़ी है। उम्मीद है कि केंद्र सरकार ऐसे फ्रेमवर्क की ओर बढ़ेगी, जिसमें भारत के सभी पुराने मसलों का निपटारा तेज गति से होगा और तमाम देश एक मजबूत बंधन में बंधकर तरक्की करेंगे।  http://www.livehindustan.com/blog/

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Posted Date : 16-Nov-2017
  • अफरोदिति पिना, वरिष्ठ प्राध्यापिका, केंट विवि, इंग्लैण्ड
    पूरी दुनिया में कामकाजी महिलाएं यौन उत्पीडऩ की शिकार हो रही हैं। हाल ही में हॉलीवुड में फिल्म निर्माता हार्वी वाइनस्टीन को लेकर बहुत से कलाकारों ने आवाज उठाई। इसके बाद भारत में भी बहुत सी अभिनेत्रियों ने यौन उत्पीडऩ की बात कही। हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया।
    इस मामले के सामने आने के बाद पूरी दुनिया में महिलाओं ने मी टू हैशटैग के जरिए आपबीती सुनाई और यौन उत्पीडऩ के खिलाफ आवाज उठाई। दफ्तरों और कामकाजी जगहों पर यौन उत्पीडऩ कोई नई बात नहीं। नई बात ये है कि अब इसके खिलाफ जोर-शोर से आवाज उठाई जा रही है। लोग खुलकर इस मसले पर बात कर रहे हैं।
    पहले जहां महिलाएं इसे नियति मानकर सिर झुकाकर मंजूर कर लेती थीं। वहीं, अब वो इसका विरोध कर रही हैं। दफ्तरों में यौन उत्पीडऩ सेक्स क्राइम यानी यौन अपराध के दर्जे में आता है। कुछ कही बातें, कुछ अनकहे इशारे, गलत नीयत से किसी को छूना यौन उत्पीडऩ माना जाता है। ये बलात्कार जैसा ही है।
    आमतौर पर कामकाजी महिलाओं को सेक्स के बदले में फायदा पहुंचाने का वादा किया जाता है। ऑफिस में बड़े अफसर अपनी मातहत महिलाओं को फायदा पहुंचाने का वादा कर के उनका यौन शोषण करते हैं।
    हार्वी वाइनस्टीन के मामले में ऐसा ही हुआ था। हालांकि ऐसे मामले कुल यौन शोषण का महज 3 से 16 फीसदी हिस्सा होते हैं। दफ्तर में बलात्कार के मामले तो और भी कम होते हैं। कुल यौन शोषण के मामलों का महज एक से 6 फीसदी।
    यौन उत्पीडऩ का मतलब है, बेहूदा जुमलेबाजी, बार-बार मिलने की गुजारिश, किसी लड़की के शरीर की बनावट के बारे में टिप्पणी, घूरना, सीटी बजाना और बेहूदा इशारेबाजी।
    कुल यौन उत्पीडऩ के मामलों का 55 प्रतिशत यही बर्ताव होता है। यौन उत्पीडऩ पर आधिकारिक रिपोर्ट पूरी सच्चाई नहीं बताती हैं। दफ्तर में छोटे कर्मचारी अक्सर इसके शिकार होते हैं। वो पीडि़त होने के बावजूद खामोशी अख्तियार करना बेहतर समझते हैं। कई बार तो उनकी शिकायतें भी अनसुनी कर दी जाती हैं। यौन उत्पीडऩ से लड़ाई की पहली शर्त है कि शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए।
    बार-बार बुरा बर्ताव भी दफ्तर का माहौल खराब करता है। पीडि़त युवती के काम पर असर डालता है। उसकी सेहत पर भी यौन उत्पीडऩ का बुरा असर पड़ता है। यौन उत्पीडऩ की शिकार महिलाएं अक्सर डिप्रेशन और सदमे की शिकार हो जाती हैं। इसका असर उनके करियर, उनकी तरक्की पर भी पड़ता है। उनकी बुरी हालत से साथी कर्मचारी भी प्रभावित होते हैं।
    महिलाएं यौन उत्पीडऩ से निपटने के कई तरीके अपनाती हैं। ये सामने वाले के बर्ताव और मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है। पहले तो वो उत्पीडऩ करने का विरोध करती हैं। उससे दूरी बनाती हैं। अपने दोस्तों, सहयोगियों और रिश्तेदारों से इस बारे में बात करती हैं। वो सीधे-सीधे आरोपी को चुनौती देती हैं। या फिर तंग आकर उसकी शिकायत करती हैं।
    सबसे ज्यादा महिलाएं दूरी बनाने का तरीका अपनाती हैं। हालांकि ये ज्यादा कारगर नहीं होता। क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में आरोपी और हमलावर हो जाता है। बेहतर तरीका है कि यौन उत्पीडऩ करने वाले का सामना किया जाए। उसकी शिकायत की जाए। असल में महिला कर्मचारी यौन उत्पीडऩ से कैसे निपटेंगी, ये बात बहुत कुछ दफ्तर के माहौल पर निर्भर करती है।
    अगर महिला को ये लगेगा कि आरोपी की शिकायत से उसके करियर पर असर पड़ेगा, तो वो खामोश रहना और दूरी बनाना बेहतर समझती हैं। अगर मामला बहुत गंभीर हो जाता है, तो ही वो शिकायत करती हैं। इससे भी पहले वो देखती हैं कि पहले की शिकायतों में दफ्तर की तरफ से क्या कदम उठाए गए।हार्वी वाइनस्टीन के मामले में ये बात सामने आई कि उसका बर्ताव सब को मालूम था। अक्सर उसके दफ्तर के लोग यौन उत्पीडऩ की घटनाओं से आंखें मूंदे रहते थे। यानी वो भी कहीं न कहीं हार्वी के जुर्म में साझीदार थे। उनकी खामोशी ने हार्वी के बर्ताव को हवा दी। उसका हौसला बढ़ाया। दफ्तरों में ऐसा माहौल होने पर महिलाएं खामोशी से सब बर्दाश्त करती हैं।
    वैसे भी अलग-अलग महिलाओं के लिए यौन उत्पीडऩ का दर्जा अलग होता है। कोई छोटी सी बात पर भी बिफर सकता है। किसी के बर्दाश्त करने की हद ज्यादा होती है। या उसे ये समझने में वक्त लगता है कि उसका उत्पीडऩ हो रहा है।
    सबसे जरूरी बात ये है कि इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को डर न लगे। वो खुलकर अपनी बात कह सकें। वो ये बता सकें कि किसी का भद्दा मजाक उन्हें जरा भी पसंद नहीं आया। किसी का भद्दा कमेंट बुरा लगा। दफ्तर के दूसरे लोगों को भी इस बात की आवाज उठाने वालों का समर्थन करना चाहिए।
    ये हमारी जिम्मेदारी है कि हम दफ्तर का माहौल काम करने लायक बनाएं। जिसमें लोग सम्मान के साथ काम कर सकें। उनके मानवाधिकारों का हनन न हो। कर्मचारियों को इसके लिए वक्त-वक्त पर ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।
    आज कल आप सोशल मीडिया के जरिए भी दफ्तर में यौन उत्पीडऩ के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। उन लोगों से अपनी तकलीफ साझा कर सकते हैं, जो उसके शिकार हुए। जैसे कि मी टू अभियान में बहुत से लोगों ने अपनी आवाज बुलंद की और तजुर्बा साझा किया।
    सोशल मीडिया पर ऐसे अभियान दूसरों को सुनने के लिए भी होते हैं और अपना बुरा तजुर्बा बताने के लिए भी। ये हमें सबक भी देते हैं। आप पीडि़तों के साथ हमदर्दी महसूस करते हैं। खुद को उनके करीब पाते हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 15-Nov-2017
  •  ऐना एमएम वेट्टीकाड
    हाल की दो घटनाएं उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक मतभेद के कारगर उदाहरण हैं। रविवार को बेंगलुरु में तमिल, तेलुगू और कन्नड़ अभिनेता प्रकाश राज ने सत्ताधारी बीजेपी पर सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हर विरोध को चुप कराने का आरोप लगाया। उनकी प्रतिक्रिया हिंदी फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली के उस वीडियो के कुछ देर बाद आई जिसमें भंसाली अपनी फिल्म पद्मावती का विरोध कर रहे असंतुष्ट हिंदुत्व समूह खासकर राजपूत संगठनों को शांत करने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
    पिछली सर्दियों के दौरान महाराष्ट्र में उनकी फिल्म के विरोध के जवाब में करण जौहर द्वारा जारी वीडियो की तुलना में भंसाली के स्वर सच में दयनीय नहीं थे।
    नवनिर्माण सेना ने तब पाकिस्तानी कलाकारों के होने के कारण ऐ दिल है मुश्किल का विरोध किया था। हालांकि, हिंसा और तथ्यात्मक रूप से निराधार आपत्तियों के मद्देनजर भंसाली और उनकी टीम अब तक उस फिल्म के लिए समझौताकारी सुर अपनाए हैं जो अभी रिलीज नहीं हुई है।
    इसके विपरीत दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योगों की ओर से करीब एक महीने से बीजेपी को निशाना बना कर लगातार कड़े प्रहार किए जा रहे हैं। तमिल फिल्म दिग्गज कमल हासन ने हाल ही में एक पत्रिका के कॉलम में हिंसक हिंदू कट्टरता के उत्थान की निंदा की है।
    हासन उन सितारों में से थे जिन्होंने तब सुपरस्टार विजय का समर्थन किया जब तमिलनाडु में बीजेपी ने उनकी फिल्म मेरसल में जीएसटी का मजाक उड़ाने पर आपत्ति जताई और उसे हटाने की मांग की। विजय पर मेरसल के दक्षिणपंथी विरोधियों ने उनके ईसाई मूल का होने को लेकर भी हमला किया था जिसका उन्होंने अपने पूरे नाम सी जोसेफ विजय के साथ एक धन्यवाद पत्र जारी कर सामना किया।
    भारतीय कलाकारों को दशकों से उनके काम और बयानों के लिए राजनीतिक संगठनों और धार्मिक समुदायों द्वारा परेशान किया जाता रहा है।
    यहां और विदेश में भी कई उदारवादी समीक्षकों का मानना है कि 2014 में बीजेपी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद से पिछले तीन वर्षों के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कमी आई है।
    ऐसे समय में जब अधिकांश हिंदी फिल्म स्टार बीजेपी के सामने अपने बयान और चुप्पी से नतमस्तक हैं, और बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ आवाज उठाने वाले शाहरुख खान और आमिर खान जैसे कुछ एक बड़े योद्धा भी केंद्र सरकार के निशाने पर आ चुके हैं, बीजेपी और दक्षिण के फिल्मी सितारों के बीच टकराव को उत्तर भारत में आश्चर्य से देखा जा रहा है। कई लोगों द्वारा ये धारणा बनाई जा रही है कि दक्षिण के मुखर अभिनेता राजनीति में अपना करियर तलाश रहे हैं। इन अटकलों को तब और हवा मिली जब कमल हासन ने सक्रिय राजनीति में उतरने की पुष्टि की।
    आखिरकार दक्षिण में ये परंपरा भी रही है कि अभिनेता अपनी स्टार अपील को भंजाते हुए हाई प्रोफाइल राजनीति में कदम रखते हैं, इनमें आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री एनटी रामाराव, तमिलनाडु के दिवंगत मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता कुछ खास नाम हैं।
    अब तक राजनीति में आने वाला कोई भी हिंदी फिल्म कलाकार सरकार में इस कदर ऊंचाई तक नहीं पहुंचा। हालांकि, दक्षिण भारतीय सितारों के हालिया विरोधी रवैये के पीछे एक वैकल्पिक करियर बनाने की उम्मीद से कहीं अधिक कुछ और ही है। इसमें सबसे पहले फिल्म स्टार्स के नजरिये में उत्तर-दक्षिण के फर्क का होना है।
    उत्तर भारत में आम लोग गंभीर कलाकारों के सामाजिक-राजनीतिक बयानों को तो स्वीकार करते हैं लेकिन वो पॉप कल्चर, खास कर व्यावसायिक सिनेमा से जुड़े स्टार को हल्के व्यक्तित्व के रूप में देखते हैं और उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं।
    फिल्मों से राज्यसभा पहुंची जया बच्चन द्वारा 2012 में असम से जुड़े एक बहस के दौरान उनकी टिप्पणी पर कांग्रेस के तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की प्रतिक्रिया में यह देखने को मिलती है। तब शिंदे ने उनसे कहा था कि यह एक गंभीर मसला है, न कि एक फिल्मी मुद्दा।
    यह नहीं कहा जा सकता कि दक्षिण भारत के फिल्म कलाकार कभी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुके, लेकिन उनसे ऑन स्क्रीन या ऑफ स्क्रीन हमेशा चुप्पी बनाए रखने की उम्मीद नहीं की जाती है।
    हालांकि पूरे दक्षिण भारत को एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि कन्नड़, तमिल, तेलुगू और मलयालम सिनेमा में मुख्यधारा की बॉलीवुड सिनेमा की तुलना में जाति समीकरण ज्यादा फिल्मों में दिखती हैं। बॉलीवुड में बिरले ही पिछड़ी जाति को लेकर फिल्में बनती हैं।
    यही कारण है कि इस सच के बावजूद कि केरल का फिल्म उद्योग बॉलीवुड की तरह ही पितृसत्तात्मक है, इस उच्च साक्षरता वाले राज्य की महिला फिल्म कलाकारों ने अपने अधिकारों को लेकर इस साल वूमन इन सिनेमा कलेक्टिव बनाने का एक अभूतपूर्व कदम उठाया था।
    दक्षिण भारत के अभिनेताओं की नाराजगी को इस वृहत संदर्भ और केंद्र में बीजेपी के सत्ता में आने से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। आजादी के आंदोलन के जमाने से ही दक्षिण भारत में और खासकर तमिलनाडु में उत्तर भारतीय संस्कृति को वहां के लोगों पर थोपने के किसी भी प्रयास का कट्टर विरोध करने की परंपरा रही है।
    अन्य चीजों के अलावा, केंद्र की सत्ता में आने के बाद से बीजेपी द्वारा अन्य भाषाओं की कीमत पर हिंदी को दक्षिण भारत में मजबूती से बढ़ावा देने की कोशिशों ने एक बार फिर दक्षिण भारत में उत्तर भारत के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के भय को पुनर्जीवित कर दिया है।
    इसके साथ ही, मुख्यत: उत्तर भारत में केंद्रित बीजेपी ने 2014 से ही दक्षिण भारत को लेकर काफी अज्ञानता दिखाई है। उदाहरण के लिए, उत्तर की तुलना में दक्षिण में फिल्मों के फैन हमेशा से ज्यादा संगठित रहे हैं। उसकी सबसे बड़ी वजह है कि वहां दशकों से फैन्स एसोसिएशन ने खुद को काफी संगठित किया है।
    इसीलिए उत्तर की तुलना में दक्षिण में प्रशंसकों की कहीं तेज और संगठित प्रतिक्रिया देखने को मिलती है, जैसा कि बीजेपी को च्मेरसलज् के दौरान देखने को मिला। हालांकि दक्षिण भारत भी धार्मिक तनावों से पूरी तरह मुक्त नहीं है, लेकिन इसके बावजूद तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन और केरल में कम्यूनिस्ट आंदोलन ने साम्प्रदायिकता का जोरदार विरोध किया है।
    एक फिल्म के किरदार के रूप में जीएसटी की आलोचना के जवाब में बीजेपी का ईसाई होने के कारण विजय पर हमला बोलने को तो कम से कम बीजीपी का दुस्साहस ही कहा जाएगा। ईसाई होने के कारण उन पर हमला करने वालों को शायद पता ही नहीं होगा कि दक्षिण भारत में सभी लोगों को पता है कि विजय ईसाई धर्म के मानने वाले हैं लेकिन दक्षिण भारत में फिल्म कलाकारों के धर्म को लेकर कभी कोई मुद्दा बना ही नहीं है।
    यह परिस्थिति में कमल हासन, प्रकाश राज और विजय का प्रतिरोध सामने आया है। वो कोई अनूठे नहीं हैं, हालांकि ऐसा उनलोगों को जरूर लग सकता है जो बॉलीवुड के सत्ता के सामने नतमस्तक होने के आदि हैं। (बीबीसी)

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Posted Date : 15-Nov-2017
  • अध्यक्ष महोदय,
    एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूँगा हो गया, एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।
    मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे, हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है - उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता आज खिन्नमना है - उसका पुजारी सो गया। शांति आज अशांत है - उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तध्र्यान हो गया।
    महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लडऩे के हिमायती थे।
    वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लडऩे के हिमायती थे। वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।
    मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रूद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लडऩा पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे।
    महोदय, जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह जि़ंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
    इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
    -अटल बिहारी वाजपेयी, 29 मई 1964, लोकसभा

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Posted Date : 14-Nov-2017
  • राजू पाण्डेय
    पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस पर आयोजित होने वाला बालदिवस पुराने महापुरुषों की पुनव्र्याख्या और नकार के इस दौर में शायद उपेक्षित ही निकल जाए। हो सकता है कि बच्चों की समस्याओं पर चर्चा तब तक टल जाए जब तक कि कोई नया अवसर न तलाश लिया जाए जो शायद किसी नए महापुरुष की रूपाकार लेती छवि से संबंधित हो। जब बाल दिवस समारोहपूर्वक मनाया भी जाता था तब भी इसका स्वरुप औपचारिकताओं की पूर्ति से अधिक कुछ न था। स्वतंत्रता के 70 वर्षों के बाद भी हम अपने बालक बालिकाओं के लिए ऐसा कुछ उल्लेखनीय कर पाने में विफल रहे हैं जिस पर गर्व किया जा सके। इंडियन लेबर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट बताती है कि देश में 1 करोड़ 30 लाख बाल श्रमिक हैं। इनमें से सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ हैं। 
    यह आंकड़े शर्मनाक और चौंकाने वाले हैं और यह भी दर्शाते हैं कि नारी को शोषण के लिए आसान शिकार मानने की हमारी मनोवृत्ति उसकी बाल्यावस्था पर भी रहम नहीं करती। बच्चे-बच्चियाँ हर उस जगह दिख जाएँगे जहाँ उन्हें अभी तो बिलकुल नहीं दिखना चाहिए-कॉटन सीड प्रोडक्शन में, माइनिंग की धुंध में, जरी और कढ़ाई की पेचीदगियों में या फिर जहरीली बारूदी गंध के बीच जख्मी उँगलियों से दियासलाई और पटाखे बनाते हुए। दमघोंटू कृत्रिम खुशबू में मुरझाते जिन्दा फूलों की तरह अपनी घायल उँगलियों से हमारी पूजा के लिए अगरबत्तियां बनाते भी अक्सर वे हमें दिख जाते हैं। कभी हम देश के इन बेशकीमती जीवित रत्नों को बेजान पत्थरों को तराशने में लगा पाते हैं। हम इन दृश्यों के आदी हो गए हैं। हम अब चौंकते तक नहीं, लज्जित होना तो दूर की बात है। 
    ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स के आंकड़े बताते हैं कि भारत में एक करोड़ तिरासी लाख लोग गुलामों जैसा जीवन जीने को विवश हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या बाल श्रमिकों की है। पीढिय़ों से चले आ रहे ऋण को चुकाने में असमर्थ कृषि मजदूरों की संतानें शैशव काल से ही बंधुआ मजदूरी के लिए अभिशप्त होती हैं। यूनिसेफ के अनुसार गरीबी और अशिक्षा बाल श्रम के लिए उत्तरदायी हैं। किन्तु इन भयानक समस्याओं के प्रति हमारी संवेदना धीरे धीरे कम होती जा रही है और इनकी चर्चा हमारे लिए अकादमिक आनंद की सृष्टि करने लगी है।  
    अशिक्षा और गरीबी का गुरुत्व बल इतना अधिक होता है कि इनसे बाहर निकलना असम्भव होता है। अशिक्षित व्यक्ति बच्चों के मजदूरी करने को अपनी गरीबी समाप्त करने का एक उपाय मानता है और इस पर अमल करना उसके लिए अशिक्षा और गरीबी की अंतहीन अँधेरी सुरंग में प्रवेश करने जैसा सिद्ध होता है। अशिक्षा और अभाव की विरासत के बोझ तले दबे हुए वंचित समाज के बच्चों का बचपन छीनने के लिए बालश्रम की कुप्रथा आतुरता से प्रतीक्षा करती रहती है। बाल श्रम के नाना रूप हैं। 
    महानगरों के किनारों पर विशालकाय स्लम एरिया की उपस्थिति आज महानगरों की पहचान की एक अनिवार्य विशेषता बन गई है। स्लम एरिया, विकास प्रक्रिया में गौण और उपेक्षणीय बना कर हाशिए पर धकेल दिए मनुष्य की शरणस्थली है। इसी के आसपास दानवाकार कचरे के पर्वतों में अपनी आजीविका की संजीवनी तलाशते नन्हें बच्चे हैं। इन्हें हम इस प्रकार देखते हैं जैसे ये कचरे की संतानें हैं। कभी कभी इन पर इस तरह क्रोधित हो जाते हैं जैसे ये कचरे की वंश वृद्धि के साक्ष्य हों। हो सकता है ये नशे के गुलाम हों, चोर हों, अपराधी हों लेकिन हैं तो बच्चे ही - हमारे देश की संतानें। पता नहीं इनके हाथ में भाग्य रेखा होती भी होगी या नहीं और इनमें से पता नहीं कितने युवावस्था तक बच पाते होंगे! स्वच्छता अभियान के इन अचर्चित बाल दूतों की भूमिका की सराहना करते हुए इन्हें स्वच्छता अभियान से औपचारिक रूप से जोड़कर समाज की मुख्य धारा में लाने के प्रयास तब होते जब इन्हें एक मनुष्य समझा जाता। बाल भिक्षा वृत्ति भी बालश्रम का एक घृणित स्वरुप है। अपने परिवारों से अपहृत कर लाए गए और जबरन विकलांग बना दिए गए बच्चे संगठित गिरोहों द्वारा भिक्षावृत्ति के लिए मजबूर किए जाते हैं। इन्हें देखकर हमारा सामंत जाग उठता है जो कभी भीख दे देता है तो कभी दुत्कार देता है। हर समस्या के समाधान के लिए कानून बनाने में हम बड़े प्रवीण हैं। 
    चाइल्ड लेबर रेगुलेशन एंड प्रोहिबिशन एक्ट(1986),नेशनल पॉलिसी ऑन चाइल्ड लेबर(1987), जुवेनाइल जस्टिस(केअर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन) एक्ट 2000 और 2006 का इसका संशोधन,राइट टू एजुकेशन एक्ट(2009),अमेंडेड चाइल्ड लेबर एक्ट(मई 2015 तथा 2016) आदि वे विधिक प्रावधान हैं जो बालश्रम उन्मूलन हेतु निर्मित किए गए हैं। 
    इनमें से 2015 का संशोधन विवादित रहा क्योंकि इसने पारिवारिक मालकियत वाले अहानिकर प्रतिष्ठानों में बालश्रमिकों के कार्य करने को वैधानिकता दे दी। 2016 का संशोधन भी 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कुछ विशेष प्रकार के कार्य करने की अनुमति प्रदान करता था। जितने प्रवीण हम नए कानूनों के निर्माण में हैं उतने ही दक्ष हम इन कानूनों को भंग करने की युक्तियां ढूंढऩे में हैं। अपने अधिकारों से अनभिज्ञ,16 से 18 घंटे बहुत कम मजदूरी पर कार्य करने वाले, डांट फटकार और मार से सहम जाने वाले बाल श्रमिकों की सेवाएं हमें बड़ी प्रिय हैं इसीलिए हम इन वैधानिक प्रावधानों का खुल कर उल्लंघन करते हैं।
    यौन उत्पीडऩ बच्चों की एक प्रमुख समस्या है। हमारे समाज में जब तक सेक्स को वर्जना का विषय बनाकर उसकी रहस्यमयता और महत्व को बढ़ाया जाता रहेगा तब तक ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता। वयस्कों के यौन हमलों से बचने की तरकीबों का बच्चों को दिया जाने वाला प्रशिक्षण किसी मृग छौने को शेर से बचने के गुर बताने जैसा ही है। हमारा समाज यौन विकृतियों से सड़ रहा है। कौमार्य और रति सुख संबंधी हमारी पुरानी और कलुषित सोच बाल वेश्यावृत्ति के लिए उत्तरदायी रही है। 
    ऐसा नहीं है कि वे मध्यम और उच्च वर्गीय बच्चे जो अच्छी शिक्षा और पोषक आहार प्राप्त कर रहे हैं उनका जीवन सुखमय है। जिस अंतहीन आपाधापी और भागमभाग युक्त जीवन शैली को इन बच्चों के माता पिता ने अपनाया है उसी जीवन शैली में उनकी संतानों को ढालने के केंद्र आज के विद्यालय बन गए हैं। माता-पिता अपनी नौकरी और व्यवसाय में मसरूफ हैं और बच्चे स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग के टाइट शेड्यूल की गिरफ्त में हैं। कुछ चुनिंदा नौकरियों और व्यवसायों को प्राप्त करना सब की जिंदगी का मकसद बना दिया गया है। 
    इस कारण गलाकाट प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनी है। बच्चे को विनर और लूजर की भाषा में सोचने को बाध्य किया जा रहा है। किन्तु इस भाषा में खिलाड़ी भावना नहीं है। यहाँ विनर के लिए जन्नत है और लूजर के लिए मौत। पारस्परिक संवाद का सेतु भंग हो रहा है। बच्चों की रचनात्मक गतिविधियों और हॉबीज़ के लिए भी पेशेवर संस्थान उपलब्ध हैं जो इन्हें म्यूजिक, डांस, राइटिंग, ड्राइंग आदि की जानकारी दे रहे हैं। 
    इन संस्थानों की कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की है कि ये बच्चों की उड़ान को नई ऊँचाइयाँ और विस्तार देने के बजाए इसे सीमित,संक्षिप्त और वस्तुनिष्ठ बनाने का कार्य कर रहे हैं। ये एक तरह से हॉबीज़ का, कल्पना का,रचनात्मकता का यंत्रीकरण करने के केंद्र हैं। मनुष्य को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कला ही मैनेजमेंट है जिसे चन्द मनोवैज्ञनिक फॉर्मूलों का प्रयोग करते हुए सिखाने की चेष्टा आधुनिक मैनेजमेंट गुरु कर रहे हैं। जिन अर्थ आधारित उपभोगवादी मूल्यों को हमने अपनाया है उनमें बच्चों के बचपने के लिए कोई स्थान नहीं है और यह समय की बर्बादी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 
    बच्चे को सिखाया जा रहा है कि वह कुशल मैनेजर कैसे बने। उसे अपने फायदे के लिए सबको मैनेज करना है -समय को, ज्ञान को, संबंधों को, रिश्तों को,भावनाओं को। यह आधुनिक युग की गीता का ज्ञान है। इस प्रकार की प्रोग्रामिंग से जो बच्चा गढ़ा जा रहा है वह स्मार्ट, सिंसियर और प्रैक्टिकल दिखाई तो देता है लेकिन समस्या दो प्रकार से उत्पन्न होती है- प्रोग्रामिंग में गड़बड़ी के कारण और ऐसी परिस्थितियों के कारण जो प्रोग्रामिंग का हिस्सा नहीं है। जब बच्चा असफल होता है। उसे पता चलता है कि वह लूजर है तो वह अपने लिए खुद सजा ए मौत मुकर्रर कर लेता है। उसकी प्रोग्रामिंग उसे यह नहीं बताती कि असफलता अंत नहीं अवसर है। कई बार ऐसा भी होता है कि विनर बनने की जल्दीबाजी में वह छल,कपट,हिंसा और हत्या की ओर अग्रसर हो जाता है। अनेक बार जब सच्ची दोस्ती या सच्चे प्यार से उसका सामना होता है, जिसका मुकाबला करने के लिए उसे प्रोग्राम नहीं किया गया है तो उसकी अपरिपक्वता उजागर हो जाती है। 
    यदि वह बच्चा माता-पिता, भाई-बहनों और अन्य परिवारजनों के साथ सघन भावनात्मक रिश्तों का अनुभव प्राप्त कर चुका होता तो ऐसी भावनात्मक समस्याओं का बेहतर समाधान सोच सकता था किंतु हमने उसे प्रोग्रामिंग पर ही इस कदर निर्भर बना दिया है कि उसका भावनात्मक विकास संतुलित रूप से हो नहीं पाता है। हमने बच्चों के जीवन को युद्धों से भर दिया है। पढ़ाई तो उनके लिए युद्ध बन ही गई थी, खेल भी अब युद्ध का रूप ले रहे हैं जिनमें सफलता और सर्वोच्चता को हमने अनिवार्य बना दिया है। 
    इस कारण से खेलों से हार कर भी जीतने वाली खिलाड़ी भावना समाप्त हो रही है। बच्चों के लिए खेल अब मनोरंजन और मानसिक विश्राम के साधन नहीं रहे। हमने बालक को वास्तविक जगत से मिलने वाली भावनात्मक परितुष्टि और मनोरंजन से वंचित कर दिया है। यही कारण है कि वह बहिर्मुख होने के अवसर उपलब्ध होते हुए भी अंतर्मुख होता जा रहा है और सहज प्राप्य आभासी जगत में प्रवेश करता जा रहा है। वह आभासी जगत के खेलों में रूचि लेने लगता है। इन खेलों में रोमांच है तो हिंसा भी है। आभासी दुनिया के खेलों में हिंसा पुरस्कृत और रोमांचित करती है। लेकिन जब ब्लू व्हेल जैसे गेम इस हिंसा को यथार्थ जगत में क्रियान्वित कराते हैं तो यह आत्मघाती सिद्ध होती है। आभासी दुनिया के अन्य युद्ध आधारित खेल भी अवचेतन पर प्रभाव डालकर हिंसा की वृत्ति को प्रोत्साहित करते हैं। गूगल ने ज्ञान पर व्यक्ति संस्था और सत्ता के आधिपत्य को तोड़ा है। हर तरह की जानकारी बच्चों के पास उपलब्ध है किंतु इस जानकारी का उपयोग किस तरह करना है यह विवेक उनके पास नहीं है। इस कारण यह अनसेंसरड ज्ञान उनके लिए लाभ से ज्यादा हानिप्रद हो सकता है।
    यदि उपभोग और उपयोगिता की भाषा में बात करें तो आज के बच्चे किसी आधुनिक पाक कला गुरु की फटाफट रेसेपी की तरह होते जा रहे हैं जिसके स्वाद का मुकाबला स्नेह,लगन, अपनापे और तसल्ली से बने माँ के हाथ के खाने से नहीं किया जा सकता। किन्तु उपभोग और उपयोगिता की यह भाषा लुभावनी के साथ साथ अमानवीय और खतरनाक भी है। बच्चे अपने भोलेपन और मासूमियत के कारण ईश्वर का रूप कहलाते हैं और उनके इन गुणों की रक्षा में ही बाल कल्याण की सारी योजनाओं की सफलता का रहस्य छिपा है। हमें चाहिए कि कम से कम बच्चों के साथ वह व्यवहार न करें जो हम ईश्वर के साथ कर रहे हैं।

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Posted Date : 14-Nov-2017
  • भारत में लगभग 60 प्रतिशत लोगों की रोजी रोटी का जरिया जमीन ही है, लेकिन एक किसान परिवार के लिए खेती बाड़ी से होने वाली आमदनी 1980 के दशक के मुकाबले घट कर एक तिहाई रह गई है। विकास अर्थशास्त्री माइकल लिप्टन कहते हैं, पार्ट टाइम खेती करने की बहुत गुंजाइश है। इसका मतलब है कि अगर कहीं और अवसर दिखाई दें तो खेती करने वालों को वहां चले जाना चाहिए। और जब खेती के लिए अच्छी संभावनाएं हो तो उन्हें वापस आ जाना चाहिए।
    पिछले दस साल में भारत में हजारों किसानों ने आत्महत्या की है जिसका मुख्य कारण कर्ज ना चुका पाना था। भारत के किसान आम तौर पर मॉनसून पर निर्भर होते हैं। अगर अच्छी बारिश ना हो तो अच्छी फसल की उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। इसके अलावा कई बार फसल का अच्छा दाम न मिल पाने के कारण भी उन्हें घाटा उठाना पड़ता है।
    मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और तलिमनाडु में इस साल किसानों ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किए  जिसके बाद उन्हें कर्ज माफी का आश्वासन मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले पांच सालों में किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात करते हैं।
    शोध संस्थान मैककिंसे ग्लोबल इंस्टीट्यूट का कहना है कि 2011 से 2015 के बीच कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर 2.6 करोड़ कम हुए हैं। 
    भारत में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर दस में सात लोगों के पास या तो जमीन नहीं है और अगर है तो वह ढाई एकड़ से कम है।
    बिना जमीन वाले किसान न तो सरकार से लोन हासिल कर सकते हैं और न ही उन्हें फसल बीमा जैसी सुविधा मिलती है। लेकिन एचएसबीसी इंडिया की एक रिपोर्ट कहती है कि भूमिविहीन किसान जमीन वाले किसानों से ज्यादा कमा लते हैं क्योंकि वे बीच में जाकर दूसरी नौकरियां भी करते हैं। ऐसे लोग ग्रामीण इलाकों में चलने वाली परियोजनाओं में काम कर लेते हैं जिनमें सड़क या फिर दूसरे निर्माण कार्य शामिल हैं।
    एचएसबीसी इंडिया के मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी कहते हैं, अच्छे मानसून के बाद मजदूरों की मांग बढ़ जाती है। इसी के कारण मेहनताना भी बढ़ जाता है और इससे भूमिविहीन किसानों को फायदा होता है। वहीं जमीन वाले किसान आमदनी के लिए सिर्फ खेती पर निर्भर होते हैं और जब फसल का अच्छा दाम नहीं मिलता तो उनके लिए मुश्किलें बढ़ जाती हैं। (डॉयचे वैले)

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Posted Date : 13-Nov-2017
  • - अशोक वाजपेयी
    आज याने 13 नवम्बर 2017 को गजानन माधव मुक्तिबोध अगर जीवित होते तो अपनी आयु के 101वें वर्ष में प्रवेश कर रहे होते। यह, सब कुछ के बावजूद, हिंदी की आलोचना-बुद्धि की शक्ति और तेजस्विता को पहचानने की उसकी सामथ्र्य का ज्वलंत प्रमाण है-अपने जीवनकाल में अपना पहला कविता संग्रह तक प्रकाशित न देख पाने वाले मुक्तिबोध, अपनी मृत्यु के आधी सदी बाद भी आज प्रासंगिकता और सार्थकता के शिखर पर हैं।
    यह भी उल्लेखनीय है कि उनकी उत्कृष्टता पर जो मतैक्य विकसित हुआ है और उन्हें लेकर जो लिखा गया है उसका श्रेय सिर्फ विचारधारात्मक प्रयत्नों को ही नहीं दिया जा सकता। वाम से असहमत रहने वाले अनेक लेखकों ने उन पर गइराई और समझ के साथ लिखा है। इस मतैक्य में उनकी भी भागीदारी है जो उन्हें, पिछले लगभग 75 वर्षों के दौरान, हिंदी का एक श्रेष्ठ लेखक मानते रहे हैं।
    मुक्तिबोध के लेखन में एक बुनियादी अंतर्विरोध लगभग शुरू से रहा है। अपनी कविता में वे बराबर अंत तक आत्मसंशयग्रस्त रहे लेकिन अपनी आलोचना में उनका आत्मविश्वास अनेक रूपों में प्रगट और विन्यस्त होता है। यह बात पहले भी कई बार कही जा चुकी है कि अपने जीवनकाल में मुक्तिबोध को कभी इसकी आश्वस्ति नहीं थी कि वे एक बड़े लेखक हैं: यह कोई ओढ़ा हुआ विनय नहीं था - यह एक आत्मचेतस् लेखक का ईमानदार खरा संशय था। यह भी दिलचस्प है कि उनके निकट जो लेखक-मित्र थे - नेमिचन्द्र जैन, शमशेर बहादुर सिंह, हरिशंकर परसाई, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा आदि - उनमें से कोई भी उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाया जबकि उनमें से हरेक बहुत शिद्दत से उनके महत्व को महसूस करता था।
    साहित्य के इतिहास में दोनों तरह के उदाहरण मिलते हैं: ऐसे बड़े लेखक जो मुक्तिबोध की तरह संशयग्रस्त रहे और ऐसे भी जो आत्मविश्वास से भरे-पूरे थे। यह तर्क किया जा सकता है कि कम से कम हमारे समय में जब सब कुछ प्राय: संशय-ग्रस्त हो गया है, संशय ही बड़े सृजन का आधार बन सकता है, उसका अभाव नहीं। पर संशय प्रतिभा का हनन भी कर सकता है। लेकिन वह बड़ी प्रतिभा का ऐसा हनन नहीं कर पाता।
    याद करें कि महान कथाकार फ्रैंज काफ्का को अपने साहित्य की अकिंचनता पर इतना भरोसा था कि उन्होंने अकालमृत्यु से पहले अपने घनिष्ठ मित्र से सारी पांडुलिपियां नष्ट करने का मित्राग्रह किया था जो, सौभाग्य से, उसने नहीं माना। बाद में वे सभी कृतियां प्रकाशित हुई और काफ्का की अक्षय कीर्ति का आधार बनीं।
    अपनी उपलब्धि और कीर्ति के इस व्यापक एहतराम पर मुक्तिबोध को कभी यकीन न आता। उनकी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान इतने प्रखर और प्रश्नवाची थे कि वे कुछ भी आसानी से स्वीकार नहीं कर सकते थे। आज जब बहुत सारे महत्वाकांक्षी युवा मान्यता के लिए तरह-तरह के जतन और समझौते करते हैं तो उन्हें उस उजले मुक्तिबोध की याद दिलाना चाहिये।
    मुक्तिबोध को भाषा-शिल्पी नहीं माना जाता है। उनकी भाषा के अटपटेपन और उनकी कविता के अराजक शिल्प को काफी देखा-समझा गया है। पर यह भी याद करने की जरूरत है कि उनके गढ़े अनेक पद हिंदी आलोचना में बहुमान्य रहे हैं- 'सभ्यता-समीक्षाÓ, 'ज्ञानात्मक संवेदनÓ, 'संवेदनात्मनक ज्ञानÓ, 'सत्-चित्-वेदनाÓ आदि।
    इधर उनकी प्रसिद्ध कहानी 'पक्षी और दीमकÓ फिर पढ़ते हुए उसके अंतिम अंश की ओर ध्यान गया, विशेषत: इस पंक्ति की ओर: 'बारीक बेइमानियों का सूफियाना अन्दाज उसमें कहांÓ! आगे का अंश आख्यानपरक नहीं एक तरह का आत्मस्वीकार या आत्माभियोग है जो, वैसे भी मुक्तिबोध की विशेषता है, भले हिंदी कहानी में वह उनसे पहले या बाद में कम ही नजर आते हैं।
    अंश है: 'और अब मुझे सज्जायुक्त भद्रता के मनोहर वातावरण वाला अपना कमरा याद आता है...अपना अकेला धुंधला-धुंधला कमरा। उसके एकांत में प्रत्यावर्तित और पुन: प्रत्यावर्तित प्रकाश के कोमल वातावरण में मूल-रश्मियों और उनके उद्गम स्रोतों पर सोचते रहना, खयालों की लहरों में बहते रहना कितना सरल, सुंदर और भद्रतापूर्ण है। उससे न कभी गर्मी लगती है, न पसीना आता है, न कभी कपड़े मैले होते हैं। किन्तु प्रकाश के उद्गम के सामने रहना, उसका सामना करना, उसकी चिलचिलाती दोपहर में रास्ता नापते रहना और धूल फांकते रहना कितना त्रासदायक है! पसीने से तरबतर कपड़े इस तरह चिपचिपाते हैं ओर इस कदर गंदे मालूम होते हैं कि लगता है... कि अगर कोई इस हालत में हमें देख ले तो वह बेशक हमें निचले दर्जे का आदमी समझेगा। सजे हुए टेबल पर रखे कीमती फाउंटेनपेन (जैसे नीरव) शब्दांकनवादी हमारे व्यक्तित्व, जो बड़े खुशनुमा मालूम होते हैं- किन्हीं महत्वपूर्ण परिवर्तनों के कारण - जब वे आंगन में और घर-बाहर चलती झाडू- जैसे काम करने वाले दिखायी दें तो इस हालत में वे यदि सड़क-छाप समझे जायें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। लेकिन, मैं अब ऐसे कामों की शर्म नहीं करूँगा, क्योंकि जहां मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्य है।
    यह कहानी 1959 के बाद कभी लिखी गयी ओर 1962 में 'कल्पनाÓ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उस समय किसी कहानी का समापन ऐसा नहीं होता था। कथा में मनोजगत आदि का प्रवेश हो चुका था लेकिन शायद ही कोई किसी कहानी का समापन ऐसे वाक्य से कर सकता था- ...क्योंकि जहां मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्य है।Ó एक दुर्दम्य बौद्धिक साहित्यकार बुद्धि और ज्ञान पर नहीं संवेदना पर जोर दे रहा है और उसे भाग्यविधायक बता रहा है। यह अनूठा है - मुक्तिबोध के यहां ज्ञान, बुद्धि और संवेदना के बीच की दूरियां उनकी आत्मा के ताप में पिघलकर एकमेक हो जाती थीं। आज के 'तुमुल कोलाहलÓ में क्या हममें यह ताब बची है कि हम 'हृदय की बातÓ सुन सकें जिसे मुक्तिबोध ने दारुण संत्रणा के बावजूद कहा और सुना था? क्या हमारे समय में हम लगभग रोज बारीक बेइमानियों को सूफियाना अंदाज में जाहिर होते नहीं देख रहे हैं?
    1956-57 की बात है। श्रीकांत वर्मा ने बिलासपुर से एक पत्रिका निकाली थी 'नयी दिशाÓ। उस समय वे संभवत: किसी मिडिल स्कूल में अध्यापक थे। उसमें एक विज्ञापन छपा था जिसमें यह सूचना थी कि गजानन माधव मुक्तिबोध के संपादन में मध्यप्रदेश के युवा कवियों का एक संकलन प्रकाशित होने जा रहा है जिसका नाम होगा 'नर्मदा की सुबहÓ। उनके बड़े बेटे रमेश मुक्तिबोध को अपने दिवंगत पिता के कागजात में इस संकलन के लिए एकत्र की गयी कविताओं की पांडुलिपि मिल गयी है। रायपुर के राजेन्द्र मिश्र ने इस पांडुलिपि को देखकर उसे विन्यस्त किया है। मुक्तिबोध शती के दौरान उसे प्रकाशित करने की योजना है।
    जिस समय मुक्तिबोध यह उपक्रम कर रहे थे उस समय बल्कि उसके आठ साल बाद तक, उनकी मृत्यु होने तक उनका अपना कोई कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था। फिर भी उनकी कोशिश, इस संचयन के माध्यम से, मध्यप्रदेश की युवा प्रतिभा को सामने लाने की थी। यह संकलन प्रकाशित नहीं हो पाया और अब लगभग 60 वर्ष बाद प्रकाशित होने जा रहा है।
    संकलन में कुल आठ कवि शामिल किये जा रहे थे: श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा, श्रीकृष्ण अग्रवाल 'शैलÓ, जीवनलाल वर्मा 'विद्रोहीÓ, विपिन जोशी, हरि ठाकुर, रामकृष्ण श्रीवास्तव, अनिल कुमार और रामकृष्ण श्रीवास्तव। इन कवियों में से श्रीकांत और प्रमोद वर्मा ही आगे चलकर कुछ यश और उपलब्धि अर्जित कर पाये। यह कहना कठिन है कि इस संकलन के पीछे एक चुनौती के रूप में उस समय तक प्रकाशित और अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तकÓ और 'दूसरा सप्तकÓ की क्या भूमिका थी। 'तार सप्तकÓ में तो स्वयं मुक्तिबोध भी शामिल थे।
    अपनी समवर्ती रचनाशीलता में किसी लेखक की दिलचस्पी और उसमें हस्तक्षेप करने के कई रूप हो सकते हैं। बहुत सारे लेखक पत्रिकाएं निकालते हैं। कई अपनी समवयसियों पर आलोचना लिखते और पुस्तकों की समीक्षा करते हैं। आजकल फेसबुक इत्यादि पर आत्मसंवद्र्धन का जो बड़ा मंच मिल गया है उसमें परस्पर टिप्पिणयों की बाढ़ भी ऐसी ही कोशिश का हिस्सा है। बहुत कम अज्ञेय और मुक्तिबोध की तरह इस तरह के संकलन कर ऐसी अधिक एकाग्र और सुनियोजित कोशिश करते हैं।
    अब यह देखा जा सकता है कि उस समय मध्य प्रदेश में जो कवि थे उनमें से मुक्तिबोध का किया चयन विवादास्पद ही हो सकता था। यह भी स्पष्ट है कि उनमें से बहुत कम आगे चलकर प्रसिद्धि या उपलब्धि पा सके। पर, यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज फिर भी है। अगर तभी प्रकाशित हो जाता तो निश्चय ही यह तबके मध्यप्रदेशीय परिदृश्य में एक विचारोत्तेजक हस्तक्षेप होता। यह भी उल्लेखनीय है कि इस चयन में मुक्तिबोध ने अपनी वैचारिक दृष्टि को थोपने का यत्न नहीं किया और उनकी संपादकीय दृष्टि समावेशी है। अज्ञेय और मुक्तिबोध दोनों ने ऐसे संपादन में ऐसी समावेशी दृष्टि और रुचि का परिचय दिया था: ऐसा समावेश आज कितना दुर्लभ है! (सत्याग्रह)

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Posted Date : 12-Nov-2017
  •  अरुण तिवारी
    छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने रबी की फसलों के लिये भूजल के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ में धान की खेती पर प्रतिबन्ध का भी आदेश जारी कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ किसान सभा इसका कड़ा विरोध कर रही है। भूजल सुरक्षा की दृष्टि से देखेें, तो पहली नजर में उक्त दोनों कदम उचित लगते हैं। 
    छत्तीसगढ़ राज्य गंगा, ब्राह्मणी, महानदी, नर्मदा और गोदावरी नदियों के बेसिन में पड़ता है। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा यानी 56.15 प्रतिशत भूभाग अकेले महानदी बेसिन का हिस्सा है। छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के जलसंसाधन विभाग की वेबसाइट के मुताबिक 1,35,097 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले छत्तीसगढ़ राज्य से प्रवाहित होने वाले सतही जल की मात्रा जहां 4,82,960 लाख क्यूबिक मीटर है। 
    अन्तरराज्यीय समझौतों के हिसाब से छत्तीसगढ़ में उपयोगी सतही जल की उपलब्धता 4,17,200 लाख क्यूबिक मीटर है; वहीं भूजल उपलब्धता का आंकड़ा 1,45,480 लाख क्यूबिक मीटर का है। छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के जलसंसाधन विभाग की वेबसाइट पर ब्लॉकवार उपलब्धता के हिसाब से देखें तो छत्तीसगढ़ में 1,36,848 लाख क्यूबिक मीटर भूजल ही उपलब्ध है।
    हालांकि, भूजल आंकड़े की यह भिन्नता सन्देह पैदा करती है, किन्तु उक्त आंकड़ों का सीधा सन्देश यही है कि छत्तीसगढ़ के पास फिलहाल उसके भूजल की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक सतही जल है। छत्तीसगढ़ अभी 1,82,249 लाख क्यूबिक यानी अपने उपलब्धता के आधे से भी कम सतही जल का उपयोग कर रहा है। लिहाजा, छत्तीसगढ़ को भूजल की तुलना में अपने सतही जल का उपयोग ज्यादा करना चाहिए। किन्तु इसका यह सन्देश कतई नहीं है कि छत्तीसगढ़ में रबी की फसल के दौरान भूजल की सिंचाई पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। क्यों?
    सवाल उठाते आंकड़े
    भूजल उपलब्धता को लेकर खुद राज्य सरकार के आँकड़े कहते हैं कि छत्तीसगढ़ के 146 ब्लॉकों में से 138 ब्लॉक अभी भी सुरक्षित श्रेणी में है। गुरुर, बालोद, साजा धामधा, पाटन, धमतरी और बिहा ब्लॉक यानी कुछ छह ब्लॉक ही सेमी क्रिटिकल श्रेणी में हैं। छत्तीसगढ़ का कोई ब्लॉक क्रिटिकल (नाजुक) तथा ओवर ड्राफ्ट (अधिक जलनिकासी) वाली श्रेणी में दर्ज नहीं है। छत्तीसगढ़ अभी अपने उपलब्ध भूजल के 20 फीसदी से मामूली अधिक का ही इस्तेमाल कर रहा है। निस्सन्देह, इस 20 फीसदी में से अन्य क्षेत्रों द्वारा उपभोग की तुलना में करीब 65 फीसदी का उपयोग अकेले सिंचाई हेतु ही हो रहा है। किन्तु जब राज्य सरकार अपनी वेबसाइट पर यह आंकड़ा पेश करती है छत्तीसगढ़ के पास भावी कृषि विकास के लिये वर्तमान खपत के साढ़े चार गुना से अधिक यानी 1,06,692 लाख क्यूबिक मीटर भूजल उपलब्ध है, तो इसका एक संदेश यह भी है कि छत्तीसगढ़ के कृषि क्षेत्र में कोई 'वाटर इमरजेंसीÓ नहीं है; न सतही जल सिंचाई की और न ही भूजल सिंचाई की।
    ऐसे में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक है कि आखिर अन्य ऐसी क्या आपात स्थिति पैदा हो गई कि छत्तीसगढ़ शासन ने रबी फसल के लिए भूजल के उपयोग पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया? यदि यह प्रतिबन्ध सेमिक्रिटिकल ब्लॉक तथा भूगर्भ की एक निश्चित गहराई से नीचे न जाने की रोक तक सीमित होता, तो भी मान लिया जाता कि राज्य सरकार इन ब्लॉकों को भूजल के भावी संकट से बचाने के लिये कठोर, किन्तु दूरदर्शी कदम उठा रही है।
    कितना व्यावहारिक प्रतिबंध?
    इस प्रतिबन्ध की व्यावहारिकता से जुड़ा प्रश्न यह है कि क्या छत्तीसगढ़ शासन ने प्रदेश के हर खेत की नाली तक सतही जल पहुँचाने की अनुशासित सिंचाई प्रणाली को इतना विकसित कर लिया है कि भूजल पर प्रतिबन्ध की स्थिति में भी हर खेत में खेती सम्भव व लाभकर होगी? यदि नहीं, तो भविष्य में इसे भी नोटबंदी की तरह बिना तैयारी उठाया गया एक तुगलकी कदम करार दिया जाएगा। 
    कारपोरेट सांठगांठ का आरोप
    इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि या तो छत्तीसगढ़ सरकार की वेबसाइट पर पेश भूजल उपलब्धता और उपयोग के आँकड़े झूठे हैं अथवा जमीनी हकीकत वास्तव में भूजल संकट की है। यदि उक्त दोनों ही स्थितियाँ नहीं है, तो आकलनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे ही कि प्रतिबन्ध लगाने के पीछे छत्तीसगढ़ राज्य सरकार की नीयत कुछ और है। नीयत से जुड़ा एक तथ्य यह है कृषि की तुलना में उद्योग ज्यादा तेजी और गहराई से भूजल का दोहन करते हैं। यदि भूजल से रबी की सिंचाई प्रतिबन्धित की है, तो फिर अगले मानसून के आने से पहले तक औद्योगिक तथा व्यावसायिक मकसद हेतु भूजल उपयोग भी प्रतिबन्धित किया जाना चाहिए था। राज्य सरकार ने ऐसा नहीं किया। क्यों?
    छत्तीसगढ़ किसान सभा के महासचिव ऋ षि गुप्ता का आरोप है यह प्रतिबन्ध कारपोरेट हितों से प्रेरित है, जो चाहते हैं कि किसान खेती छोड़कर शहरों में सस्ते मजदूर के रूप में उपलब्ध हों। किसान सभा का मानना है कि इस प्रतिबंध से किसानों की हालत और गिरेगी; किसान, आत्महत्या को मजबूर होंगे। किसान सभा के नेता इस प्रतिबन्ध की एवज में 21 हजार रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
    मुआवजा नहीं समाधान
    मुआवजा, कभी भी किसी संकट का दीर्घकालिक समाधान नहीं होता। इसे हमेशा तात्कालिक राहत के रूप में ही लिया जाना चाहिए। किन्तु दुखद है कि मामला चाहे भूमि अधिग्रहण का हो अथवा बाढ़-सुखाड़ का, भारत के किसान संगठन, किसानों को मुआवजा दिलाकर ही सदैव सन्तुष्ट होते दिखे हैं। उन्हें समस्या की तह में जाना चाहिए और उसके समाधान के लिये पूरी मुस्तैदी व एकता के साथ सक्रिय होना चाहिए।
    किसान और भूजल: दोनों 
    की सुरक्षा जरूरी

    उन्हें गौर करना चाहिए कि बहुत सम्भव है कि छत्तीसगढ़ शासन का यह फरमान, किसानों को सतही सिंचाई प्रणाली में पूरी तरह बाँधकर, भविष्य में सिंचाई के पानी के बदले मोटा शुल्क वसूलने के षडयंत्र की तैयारी का हिस्सा हो। नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजी हुकूमत ने भी कभी इसी मकसद से भारत में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई और नहरी सिंचाई प्रणाली को विकसित किया था।
    भारत में पानी का बाजार लगातार बढ़ रहा है। जलापूर्ति करने वाली कम्पनियां आज दुनिया की सबसे अमीर कम्पनियों में शुमार हैं। घोटाले बताते हैं कि पानी का अपना धन्धा बढ़ाने के लिये वे नौकरशाही व राजनेताओं को घूस देने से भी नहीं चूकते। भूलना नहीं चाहिए कि कभी इसी छत्तीसगढ़ में शिवनाथ नदी की मालिकी रेडियस नामक एक कम्पनी को सौंप दी गई थी। छत्तीसगढ़, भारत में ऐसा करने वाला प्रथम राज्य के रूप में दर्ज है। 
    यूँ भी छत्तीसगढ़ के आसन्न विधानसभा चुनाव में चन्दे की दरकार को देखते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भूजल के इस प्रतिबन्ध के पीछे, प्रदेश की सिंचाई व्यवस्था को पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत मलाईदार साझेदारों को सौंपकर किसी की कुछ हासिल करने की बेताबी हो।
    पहले पड़ताल, तब निर्णय
    कहना न होगा कि भूजल उपयोग पर प्रतिबन्ध सम्बन्धी इस फरमान के पीछे छिपे असल एजेंडे की पड़ताल जरूरी है। यदि यह सचमुच कोई षडयंत्र अथवा षडयंत्र की तैयारी है, तो संगठनों को चाहिए कि वे जल व जलोपयोग सम्बन्धी जमीनी तथ्यों को सामने रखकर षडयंत्र का पर्दाफाश करें। यदि यह फरमान सचमुच सही समय पर अच्छी नीयत से जारी किया गया दूरदर्शी कदम हो, तो क्या किसान, क्या उद्योगपति, क्या व्यवसायी और क्या पानी के घरेलू उपभोक्ता... सभी को चाहिए कि वह भावी भूजल संकट से निपटने के लिये अपने-अपने हिस्से की तैयारी अभी से शुरू कर दें। यदि यह फरमान खेती के लिये अनुकूल सतही जल प्रणाली विकसित किये बिना जल्दबाजी में लिया गया एक अच्छा फरमान है, तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह किसानों को इसके लिये तैयार होने का पूरा वक्त दे।
    रही बात धान पर प्रतिबन्ध की, तो इस बात से भला कौन इनकार कर सकता है कि धान जैसी ज्यादा पानी पीने वाली फसलों को जलभराव से त्रस्त इलाकों में ले जाएँ तथा बाजरा, मक्का, मूँग उड़द और तिल जैसी कम पानी की फसलों को जलाभाव क्षेत्रों में ले आएँ। यह जलवायु परिवर्तन की भी माँग है और कृषि सुरक्षा की भी।  http://hindi.indiawaterportal.org/

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Posted Date : 12-Nov-2017
  • राम पुनियानी

    केरल में इन दिनों समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की कोशिशें हो रही हैं और इसके लिए पहचान से जुड़े अनेक मुद्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें से एक है लव जिहाद। अगर कोई हिन्दू लड़की, किसी मुस्लिम या ईसाई पुरूष से विवाह कर लेती है तो कानूनी और अन्य तरीकों से भरसक यह प्रयास किया जाता है कि उसे या तो उसके मां-बाप के पास भेज दिया जाए या ‘‘धर्मांतरण विरोधी क्लिनिकों’ में। हादिया के मामले में भी लव जिहाद का हौआ खड़ा किया गया और कहानी को मसालेदार बनाने के लिए सीरिया में जिहाद की बात भी उसमें जोड़ दी गई। यह मामला तो बहुचर्चित है परंतु ऐसे अनेक अन्य मामले हैं जो मीडिया में उतनी प्रमुखता से स्थान प्राप्त नहीं कर सके हैं। श्वेता नाम की एक हिन्दू महिला को एक योग केन्द्र में बंधक बना लिया गया है और उस पर यह दबाव डाला जा रहा है कि वह एक ईसाई पुरूष से अपने विवाह को भुला दे। श्वेता के अनुसार, योग केन्द्र, दरअसल ‘धर्मांतरण-विरोधी क्लिनिक’ है, जो उन महिलाओं का ‘इलाज’ करता है जिन्होंने गैर-हिन्दू पुरूषों से विवाह कर लिया है और ईसाई धर्म या इस्लाम अपना लिया है। मीडिया में अकीला नामक एक लड़की की तथाकथित अपरिपक्वता की चर्चा भी हो रही है। उसने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के एक मुस्लिम कार्यकर्ता से विवाह कर इस्लाम कुबूल कर लिया है।

    इस विवाह को पीएफआई से जोड़ा जा रहा है और साथ में सीरिया में आतंकी कार्यवाहियों में भाग लेने की बात कही जा रही है। इस बहाने से एनआईए ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है। ऐसा बताया जा रहा है कि अकीला का धर्मपरिवर्तन एक ऐसी खतरनाक योजना का भाग है, जिसके अंतर्गत हिन्दू लड़कियों को मुसलमान बनाकर उन्हें आतंकी गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। जाहिर है कि जो लोग सत्ता और प्रशासन में काबिज़ हैं, उनकी कल्पना शक्ति अत्यंत उर्वर है। हादिया के मामले में अदालत ने यह तक कह दिया कि 24 साल की महिला, भोलीभाली और नासमझ होती है। संबंधित जज को शायद यह याद नहीं था कि भारत में 18 वर्ष की आयु से बड़ा कोई भी व्यक्ति वोट दे सकता है और अपने निर्णयों और कार्यों के लिए स्वयं ज़िम्मेदार होता है। हादिया ने अदालत में यह कहा कि उसने धर्मपरिवर्तन कर एक मुस्लिम युवक से अपनी मर्ज़ी से शादी की है। बाद में अदालत ने उसे अपना बयान दर्ज करवाने के लिए बुलाया ही नहीं। अदालत ने यह कहा कि वह उसकी व्यक्तिगत सुनवाई एक माह बाद करेगी। यह घटनाक्रम अत्यंत चकित कर देने वाला है। एक वयस्क महिला, जो होमियोपैथी की पढ़ाई कर रही है, क्या अपने जीवन के संबंध में निर्णय नहीं ले सकती? परंतु उसे अपने पति से दूर, अपने मां-बाप के साथ मजबूरी में रहना पड़ रहा है। यह नैतिक और सामाजिक दृष्टि से पूरी तरह गलत है और यही अदालतों की कानून की विवेचना का आधार होना चाहिए था।

    श्वेता के मामले में बताया जाता है कि एरनाकुलम का वह योग केन्द्र, जहां उसे रखा गया है, एक ऐसा स्थान है जहां धमकी देकर और भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर लड़कियों को अपने नए धर्म का परित्याग करने के लिए मजबूर किया जाता है। उनसे यह कहा जाता है कि या तो वे स्वयं अपने नए धर्म को छोड़ दें या अपने पति को हिन्दू बना लें। एक अन्य हिन्दू महिला श्रुति मेलदत्त का भी यही अनुभव था। उससे यह कहा गया कि वह अनीस एहमद नामक मुस्लिम व्यक्ति, जिससे वह विवाह करना चाहती थी, को छोड़ दे। एरनाकुलम के योग विद्याकेन्द्रम जैसे कई केन्द्र केरल में काम कर रहे हैं।

    लव जिहाद का नारा, प्रेम करने वाली युवतियों के रास्ते में इतनी बड़ी बाधा बन जाएगा, इसकी एक दशक पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अत्यंत कुटिलतापूर्वक तैयार किया गया यह अभियान, पितृसत्तात्मक सोच पर आधारित है और पितृसत्तात्मक सोच, सांप्रदायिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सांप्रदायिक सोच महिलाओं को ‘हमारी’ और ‘उनकी’ में विभाजित करती है। महिला को पुरूष की सम्पत्ति माना जाता है और समुदाय के सम्मान का प्रतीक भी। ‘हमारी महिलाएं खतरे में हैं’ के नारे का इस्तेमाल, सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए किया जाना आम है। मुजफ्फरनगर की हिंसा इसका एक उदाहरण है। दूसरी ओर, अन्य समुदायों की महिलाओं से ज्यादती करना गर्व की बात समझी जाती है। लव जिहाद का मुद्दा सबसे पहले कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में उभरा, जहां ऐसे अंतर्धार्मिक विवाहों को निशाना बनाया गया, जिनमें पुरूष या तो मुसलमान था या ईसाई। किसी भी खुले समाज में सभी धर्मों के व्यक्ति एक दूसरे से मिलते-जुलते हैं। ऐसे में उनके बीच प्रेम हो जाना अस्वाभाविक नहीं है। अंतर्धार्मिक विवाहों से समाज में सौहार्द और प्रेम बढ़ता है।

    स्वाधीनता संग्राम के दौरान, गांधी और अंबेडकर जैसे नेताओं ने विभिन्न जातियों के बीच विवाह को प्रोत्साहित करने पर ज़ोर दिया था। उनका कहना था कि इससे जाति प्रथा के उन्मूलन में मदद मिलेगी। उसी तरह, अंतर्धार्मिक विवाहों से सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता की नींव मजबूत होगी। किसी भी प्रजातांत्रिक समाज को इस तरह के विवाहों को प्रोत्साहन देना चाहिए। परंतु हमारे देश में इसका ठीक उलट हो रहा है। सांप्रदायिक सोच समाज पर हावी है और पितृसत्तात्मकता के चलते, पुरूष, महिलाओं के जीवन को नियंत्रित करना चाहते हैं। हमारे देश में हिन्दू संप्रदायवादियों ने ऐसी अनेक संस्थाएं बनाई हैं जो अंतर्धार्मिक विवाहों और प्रेम संबंधों को हतोत्साहित कर तोड़ना चाहती हैं।

    कुख्यात बाबू बजरंगी का तो मुख्य काम ही ऐसे युगलों को निशाना बनाना था। पश्चिम बंगाल में प्रियंका तोड़ी और रिज़वान कौसर का प्रकरण इस दुखद तथ्य की ओर इंगित करता है कि इस रोग ने हमारे समाज में गहरे तक जड़ें जमा ली हैं। इसके पीछे पितृसत्तात्मक सोच तो है ही, सांप्रदायिक और कट्टरवादी विचारधाराओं का भी इसमें कम योगदान नहीं है। हिन्दू पुरूषों और महिलाओं के मुस्लिम महिलाओं और पुरूषों से सफल विवाह के अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। परंतु हादिया और श्रुति जैसे मामलों में जो कुछ हो रहा है, उससे ऐसा लगता है कि इसका उद्देश्य अन्य व्यक्तियों को इस तरह के संबंध बनाने से खबरदार करना है। यह दुखद है कि योग केन्द्र के नाम पर ऐसी संस्थाएं चलाई जा रही हैं जो महिलाओं के उनके जीवनसाथी चुनने के अधिकार को सीमित करना चाहती हैं। प्रेम, जाति, वर्ग, धर्म और राष्ट्र की सीमाएं नहीं पहचानता। हम बिना किसी संदेह के यह कह सकते हैं कि किसी समाज में होने वाले अंतर्धार्मिक विवाह, उस समाज में सांप्रदायिक सौहार्द और प्रेम की स्थिति को बयान करते है और यह भी बताते हैं कि वह समाज लैंगिक समानता का पक्षधर है।

    श्रुति और हादिया के प्रकरणों से यह साफ है कि केरल में सांप्रदायिक शक्तियां, आरएसएस कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों के अतिरिक्त, लव जिहाद को भी एक बड़ा मुद्दा बनाने के फेर में हैं। http://www.humsamvet.in/

     

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • रामचंद्र गुहा, प्रसिद्ध इतिहासकार
    बीते साल नवंबर में जब अचानक नोटबंदी की घोषणा हुई, तो अर्थशास्त्रियों में प्रतिक्रिया देने की होड़ सी लग गई। आश्चर्य तब हुआ, जब भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने इसे ‘भारतीय राजनीतिक इतिहास का सबसे महान कदम’ बता डाला। कोहली इस कदम से खासे अभिभूत दिखे थे।
    क्रिकेटरों और राजनेताओं की गलबहियां कोई नई बात नहीं। कांग्रेस व भाजपा के नेता लंबे समय से क्रिकेट संघों की राजनीति करते रहे हैं। पर इसके बावजूद विराट कोहली का बयान अभूतपूर्व था। इससे पहले कभी किसी क्रिकेटर ने किसी प्रधानमंत्री के कदम पर इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई थी। आखिर हमारे क्रिकेटर राजनीति, इतिहास और अर्थशास्त्र के बारे में जानते ही कितना हैं कि उन्हें ‘नोटबंदी’ जैसे कदम पर ऐसी टिप्पणी का अधिकार मिल जाए? 
    क्रिकेटरों, फिल्मी सितारों की जन-लोकप्रियता आम है। क्रिकेटर तो गाहे-बगाहे कुछ प्रभावशाली नेताओं से ही जुड़ते दिखेंगे, पर फिल्मी दुनिया में नेता-प्रेम आम है। अमिताभ बच्चन को ही लें। शक नहीं कि वह भारतीय सिने इतिहास के सबसे लोकप्रिय अभिनेता हैं। अस्सी के दशक में वह लंबे समय से सत्तारूढ़ कांग्रेस के खासे करीब थे। राजीव गांधी के कहने पर इलाहाबाद से कांगे्रस के टिकट पर चुनाव तक जीते। लेकिन 1990 के दशक में संबंधों में दरार दिखने लगी। यह भारतीय राजनीति में कांग्रेस की चमक के धूमिल होने का समय था। 1996 में दिल्ली की सत्ता के लिए संयुक्त मोर्चा आकार ले रहा था। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी भी इन्हीं में थी। नेहरू-गांधी परिवार से दूर हुआ बच्चन परिवार मुलायम घराने के करीब आता दिखा, जिसकी परिणति सपा के टिकट पर जया बच्चन के राज्यसभा प्रवेश के रूप में हुई। 
    लेकिन हाल के वर्षों में अभिताभ बच्चन नरेंद्र मोदी और भाजपा के खासे करीब आए हैं। जनवरी 2010 में वह अपनी फिल्म के प्रोमोशन में गुजरात गए, तो उनकी निकटता राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई और इसी निकटता ने उन्हें गुजरात का ब्रांड अंबेसडर बना दिया। मई 2016 में वह प्रधानमंत्री मोदी के दो साल पूरे होने पर आयोजित सरकारी कार्यक्रम का संचालन करते दिखे। उसके बाद से तो वह सरकार की नीतियों का लगातार प्रचार करते दिखते हैं।अभिनेता भी नागरिक हैं, इसलिए उन्हें उनकी राजनीतिक अभिव्यक्ति के लिए आरोपित नहीं किया जा सकता। पर बच्चन परिवार के एक के बाद एक बदलते राजनीतिक रिश्तों को इतनी सहजता से भी नहीं लिया जा सकता। हॉलीवुड के बडे़ अभिनेताओं को देखें। राजनीतिक प्रतिबद्धता वहां भी है, लेकिन वह एक दल तक सीमित है। जॉर्ज क्लूनी अगर प्रतिबद्ध डेमोक्रेट हैं, तो फिर हैं। इस हद तक कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी खुशामद करते, तो क्लूनी उनके शपथ ग्रहण में नहीं जाते। क्लिंट ईस्टवुड ने भी एक बार रिपब्लिकन पार्टी के नेशनल कन्वेंशन को संबोधित किया, लेकिन डेमोक्रेट के आसपास भी वह कभी नहीं दिखे।
    पश्चिम में अभिनेता सामाजिक तौर पर भी सक्रिय हैं। वेनेसा रेडग्रेव या एंजेलिना जोली जैसे तमाम नाम हैं, जिन्होंने वंचितों व जरूरतमंदों के लिए बहुत कुछ किया। लेकिन वहां अपनी सामाजिक या राजनीतिक प्रतिबद्धता के प्रति अलग तरह का समर्पण और स्थायित्व दिखता है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं दिखता। तमाम अभिनेताओं में भी नेताओं के इर्द-गिर्द दिखने की चाहत दिखती है। हां, भाषाई सिनेमा में एमजी रामचंद्रन या एनटी रामाराव जैसे उदाहरण जरूर हैं, जिन्होंने अपनी दलीय राजनीति की। या आज की तारीख में प्रकाश राज और कमल हासन हैं,जो बहुसंख्यकवाद के खिलाफ मुखर हैं। अभिनेता का राजनेता बनना जरूरी नहीं। सम्मान उसका भी है, जो अपने फन का माहिर है, प्रतिबद्ध है, पर राजनीति से दूर है। मगर सत्तारूढ़ राजनीति में ही संभावना देखने वालों के बारे में तो सोचना होगा। 2006 में जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब शाहरुख खान अपनी फिल्म के निमंत्रण के साथ सोनिया और राहुल गांधी से उनके घर पर मिले। बाद में मीडिया से मुखातिब शाहरुख ने सोनिया गांधी को  ‘ऐसी मजबूत नेता’ बताया, ‘जिनकी तारीफ किसी को करनी चाहिए’। उम्मीद है कि शाहरुख नई फिल्म आने पर सोनिया के बारे में वही बात दोहराएंगे, जो अब विपक्ष में हैं।
    मई 2016 में अभिनेता ऋषि कपूर ने ‘नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर ही तमाम योजनाओं-संरचनाओं का नामकरण’ वाले अपने ट्वीट से हंगामा मचा दिया था। उन्होंने गलत नहीं कहा था, पर यदि यही बात वह कांग्रेस के सत्ता में रहते वक्त कहते, तो ज्यादा विश्वसनीय होता। भारतीय अभिनय बिरादरी की यह एक खासियत है कि वह समय और सत्ता देखकर बातें करता है। आमिर खान भी असहिष्णुता के मुद्दे पर पहले मुखर हुए, बाद में संघ प्रमुख के हाथों पुरस्कार लेकर सत्ता साधने की कोशिश में भी दिखे। लेख की शुरुआत मैंने विराट कोहली के उत्साही स्वर से की थी। बाद में, जब नोटबंदी नकारात्मक असर दिखाने लगी, तब उद्योगपति राजीव बजाज ने नैसकॉम सम्मेलन में इसकी आलोचना करते हुए कहा कि ‘अगर समाधान या विचार सही है, तो यह मक्खन में गरम चाकू लगाने जैसा है। यदि विचार काम नहीं कर रहा, जैसे कि नोटबंदी- तो क्रियान्वयन पर दोष नहीं मढ़ा जाना चाहिए।’ 
    व्यापारिक घरानों से सरकारी नीतियों की ऐसी मुखर आलोचना दुर्लभ है। अपने यहां जॉर्ज सोरोस जैसा उदाहरण तो मिलेगा नहीं, जो सरकारों के अनैतिक-तानाशाही रवैये का विरोध करते हुए अपनी संपत्ति और प्रतिष्ठा दांव पर लगा दे। आपातकाल में भी किसी उद्योगपति ने ऐसा कोई साहस नहीं दिखाया था। इसके उलट राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब चंद मुस्लिम देशों के नागरिकों के अमेरिका प्रवेश पर रोक लगाई, तो माइक्रोसॉफ्ट, गूगल से लेकर एपल, फेसबुक जैसी कंपनियां खुलकर विरोध में आ गईं। उनमें और हममें यही मूलभूत अंतर है।
    आखिर फिल्मी हस्तियों की तरह पूंजीपति भी सत्ता प्रतिष्ठानों के कृपापात्र क्यों बने रहना चाहते हैं? हमारे सार्वजनिक प्रतिष्ठानों की यह ‘नाजुकमिजाजी’ और हमारे राजनेताओं में उनका ‘दुरुपयोग करने की अद्भुत क्षमता’ शायद इसकी एक वजह हो। जॉर्ज सोरोस या मेरिल स्ट्रीप अगर ट्रंप के खिलाफ जाते हैं, तो उन्हें पता है कि कल उनके खिलाफ मामले नहीं खुलेंगे। भारत में ऐसा नहीं है। यहां सत्ता किसी की हो, आलोचकों-विरोधियों के खिलाफ सरकारी तंत्र का खुला दुरुपयोग होता है। यह निजी साहस में कमी का मामला भी है, जो हमारे धनकुबेरों या सेलेब्रेटी को भी खुलने से रोकती है। एक बार प्रसिद्धि या धन, या फिर दोनों कमा लेने के वालों को यह सब गंवाने का डर सताने लगता है। यह बड़ी त्रासदी है। 

    http://www.livehindustan.com/blog/l

     

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • वीरेन्द्र जैन
    भोपाल की राजधानी के मध्य में सबसे प्रमुख स्थान के निकट एक 19 वर्षीय छात्रा के साथ गेंग रेप हुआ। उल्लेखनीय यह भी है कि छात्रा जिस पद के लिए कोचिंग कर रही थी उसमें सफल होने पर वह राज्य प्रशासनिक सेवा और भविष्य में आईएएस तक भी पहुंच सकती थी। उल्लेखनीय यह भी है कि पीडि़ता के मां-बाप दोनों ही पुलिस की नौकरी में हैं और फिर भी उन्हें रिपोर्ट तक लिखाने में लम्बा समय लग गया व उन्हें उस आधार पर झुलाया जाता रहा जिसके बारे में अनेक बार स्पष्ट किया जा चुका है कि थाने के क्षेत्र के चक्कर में न पड़ कर रिपोर्ट को तुरंत लिखा जाना चाहिए।
    अब यह घटना कोई अनोखी घटना नहीं है क्योंकि यह आये दिन की बात हो गई है। यह ठीक है कि मध्य प्रदेश इस तरह के अपराधों के मामले में बहुत आगे है किंतु दूसरे राज्य भी बहुत पीछे नहीं है, और यह बात किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं होना चाहिए। हर घटना के बाद कुछ राजनीतिक आलोचनाएं और प्रदर्शन हो जाते हैं तथा कुछ समय के लिए कुछ प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों का निलम्बन हो जाता है जिन्हें जनता की याद्दाश्त की सीमा समाप्त होने के बाद रद्द कर दिया जाता है। यही सब कुछ इस मामले में भी हो रहा है। खेद है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए न तो समस्या की जड़ों तक पहुंचने का कोई प्रयास होता है और न ही किसी स्थायी समाधान की ओर ही बढ़ा जा रहा है। वोटों की राजनीति ने जो तुष्टीकरण की कूटनीति अपनाई है उसमें आम जनता के हिस्से में कोरे वादे आए हैं जबकि हर तरह के कानून भंजकों को सरकारी संरक्षण और मदद मिलने लगी है।
     देशभक्ति का ढंढोरा पीटने वाली पार्टी चंदे के लिए व भीड़ जुटाने के लिए देशद्रोहियों को अच्छे-अच्छे पद दे देती है और वे सरकार के मंत्रियों के साथ मंचों पर गलबहियां डाल कर फोटो खिंचवाते हैं जिससे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी दबाव में आ जाते हैं। अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की है जिनकी लापरवाहियों के कारण अपराधी पार्टी में आते हैं और संरक्षण पाते रहे हैं। दो एक वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर किसी भी प्रमुख पार्टी में प्रवेश के लिए कोई छलनी नहीं है और जो ज्यादा से ज्यादा संसाधन उपलब्ध करा सकता है वह स्वयं या अपने किसी व्यक्ति के माध्यम से पार्टी, सरकार, और देश के संसाधनों पर अधिकार करने में लग जाता है। इस तरह एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जिससे राष्ट्रीय संसाधन व्यक्तियों और पार्टियों के संसाधनों में बदलते जाते हैं। 
    क्या कारण है कि किसी भी पार्टी में आदर्श आचार संहिता के आधार पर सदस्यों की समीक्षा नहीं होती और इस आधार पर पार्टी से निकाले जाने की घटनाएं नहीं सुनी जातीं। पार्टी से तब निकाला जाता है जब कोई सदस्य दूसरी पार्टी में जा चुका होता है। पार्टी का टिकिट देने में जब किसी सदस्य की पार्टी में वरिष्ठता पर ध्यान नहीं दिया जाता व दो दिन पहले दल बदल कर आये हुए व्यक्ति को टिकिट दे दिया जाता है तो उस दल की आदर्श आचार संहिता पर निगाह डालने का तो सवाल ही नहीं उठता। न्याय का दायित्व होना चाहिए कि या तो वह अपराधी को सजा दे या अपराधी को सजा न दिला पाने वाली व्यवस्था के कारिन्दों को सजा दे क्योंकि आमजन व्यवस्था कायम रखने के लिए भरपूर भुगतान कर रहा है।
    खेद की बात है कि बहुत सारे मामले न केवल लम्बे समय तक अनिर्णीत पड़े रहते हैं अपितु बिना किसी को सजा दिये हुए समाप्त भी कर दिये जाते हैं। यह दशा कानून का भय समाप्त करती है और अपराधियों को निर्भय होकर मनमानी करने की प्रेरणा देती है। जो लोग पहले से ही सामंती सोच के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं वे दूसरों को कमतर इंसान मान कर व्यवहार करते हैं। सत्ता की ताकत या संरक्षण उन्हें और अधिक निर्मम बना देता है। बलात्कार और हिंसा इसी का परिणाम है।
    यौन अपराधों के अधिकतर मामले बदनामी के डर से सामने नहीं आने पाते क्योंकि समाज पीडि़ता को न केवल कमजोर व जिम्मेवार मानकर व्यवहार करती है अपितु हेय दृष्टि से देखती है। इसके लिए बड़े सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है जिसमें पूरा समाज एक साथ उठ खड़े हो कर अपने साथ हुए अपराध की स्वीकरोक्ति करते हुए पीडि़तों के साथ हो व आपस में हमदर्दी प्रकट करे। गाँधीजी के बाद ऐसे प्रयोग बन्द हो चुके हैं।  अपराधियों के खिलाफ खड़े होने के लिए अकेले व्यक्ति की कमजोरी को स्वीकारना जरूरी होता है और पीडि़तों की एकता बनाने का आवाहन होना चाहिए। पीडि़ता को दोषी मानना अपने आप में अपराध घोषित होना चाहिए।
    अपराधों की रिपोर्ट दर्ज न करके अपना रिकार्ड ठीक करना भी समाज के खिलाफ पुलिस का अपराध है जिसे करने के लिए देश के बड़े बड़े पुलिस अधिकारी अपने थानेदारों को प्रेरित करते हैं। किसी क्षेत्र में अपराधों की संख्या का अधिक होना पुलिस अधिकारियों की जिम्मेवारी नहीं होना चाहिए अपितु अपराधियों को पकडऩा और सजा दिलाने के आधार पर उनका कार्य मूल्यांकन होना चाहिए, जिसके अभाव में रिपोर्ट न लिख व सच को छुपा कर बड़ा अपराध किया जा रहा है।
    कानून के शासन का अभाव जंगली न्याय की ओर अग्रसर करता है जिसकी ओर बढते जाने के संकेत उक्त घटनाओं में हो रही वृद्धि से मिलने लगे हैं।  देखना होगा कि निर्भया कांड की तरह घटनाएं व्यवस्था को किस बदलाव की प्रेरणा दे पाती हैं।  http://www.humsamvet.in/

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • कुलदीप कुमार
    सभी जानते हैं कि भारत की अदालतों में भ्रष्टाचार व्याप्त है लेकिन आम धारणा यह है कि निचली अदालतों में वह बहुत अधिक है और जैसे-जैसे ऊपर की अदालतों में जाते हैं, वह कम होता जाता है। आमतौर पर माना जाता है कि देश की सबसे ऊंची अदालत सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार से मुक्त है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है?
    प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सरकार में कानून मंत्री रह चुके और देश के अग्रणी वकीलों में गिने जाने वाले शांतिभूषण ने सात साल पहले सुप्रीम कोर्ट में ही खुली अदालत के सामने आरोप लगाया था कि देश के कम-से-कम आठ प्रधान न्यायाधीश भ्रष्ट थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संवेदनशीलता दिखाते हुए उन पर अदालत की अवमानना का अभियोग नहीं लगाया। सुप्रीम कोर्ट भ्रष्टाचार के मामले में आज भी बेहद संवेदनशील है।  
    वर्ष 2005 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल और सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज ने मिलकर एक सर्वेक्षण कराया था।इसकी रिपोर्ट में कहा गया था कि जिन लोगों से सवाल पूछे गए उनमें से 59 प्रतिशत ने वकीलों को, पांच प्रतिशत ने जजों को और 30 प्रतिशत ने अदालत के कर्मचारियों को रिश्वत दी थी। जब जम्मू-कश्मीर से संबंधित अंश को वहां के अंग्रेजी अखबार ग्रेटर कश्मीर ने छाप दिया तो उस पर अदालत की अवमानना का मुकदमा दायर कर दिया गया। इस वर्ष फरवरी में इसकी सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों में भ्रष्टाचार के बारे में लोगों की राय को अखबार में छापना अदालत की अवमानना नहीं है। इसी दिशा में आगे कदम बढ़ाते हुए बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक असाधारण फैसला लिया और उस मुकदमे की सुनवाई के लिए एक पांच-सदस्यीय संविधान पीठ का गठन करने का निर्देश दिया जिसमें हाईकोर्ट के एक अवकाशप्राप्त जज के ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप है। जज पर यह आरोप भी है कि उसने लखनऊ के एक प्रतिबंधित मेडिकल कॉलेज के प्रबंधकों को यह आश्वासन दिया कि वह अपने संपर्कों के जरिये सुप्रीम कोर्ट से उसके अनुकूल फैसला करवा लेगा।इस बात को मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की दो-सदस्यीय खंडपीठ ने बहुत गंभीरता से लिया और एक पांच-सदस्यीय संविधान पीठ के गठन का निर्णय लिया।न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
    जैसा कि ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने भी कहा है, भारतीय अदालतों में भ्रष्टाचार के तीन कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि यहां न्यायप्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल है, पुराने और नए बन रहे कानूनों की संख्या बहुत अधिक है और जजों की संख्या बहुत कम है। नतीजतन मुकदमें  दशकों तक चलते रहते हैं।बरसों तक तारीखें ही लगती रहती हैं और सुनवाई तक शुरू नहीं होती।ऐसे में लोग दलालों और बिचौलियों की मदद लेते हैं ताकि मुकदमे की सुनवाई में तेजी आए और जल्दी फैसला हो। जो भी व्यक्ति कभी भी निचली अदालतों में गया है, उसने देखा है कि वहां खुलेआम कदम-कदम पर रिश्वत ली जाती है और हर काम का रेट तय है।मसलन जिस मुकदमे की बारी आ गई है, उसकी आवाज लगाने वाले को पैसा देना पड़ता है वरना वह बिना आवाज लगाए ही अंदर जाकर कह देगा कि वादी या प्रतिवादी आए ही नहीं हैं और मुकदमा खारिज हो जाएगा या जज बिना एक पक्ष को सुने एक्स-पार्टे यानि एकतरफा फैसला दे देगा।
    यदि सुप्रीम कोर्ट अदालतों में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रयास जारी रखेगा तो लोगों का अदालतों में विश्वास बढ़ेगा। क्योंकि भारत में न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका से अलग रखने की अच्छी व्यवस्था की गई है, इसलिए यहां न्यायपालिका ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी है और अनेक बार वह सरकारों द्वारा बनाए गए क़ानूनों को असंवैधानिक घोषित कर चुकी है।भ्रष्टाचार में कमी आने से यह स्वतंत्रता और भी अधिक बढ़ सकेगी। (डॉयचे वैले)

     

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • प्रो योगेंद्र यादव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, स्वराज इंडिया
    कोई भी व्यक्ति बगैर झूठा बने एक श्रद्धांजलि का लेखन कैसे कर सकता है? बीते सात नवंबर को रूसी क्रांति की शताब्दी मनाते हुए इस प्रश्न ने मुझे परेशान-सा कर दिया। कठिनाई यह नहीं है कि इस क्रांति का पुत्र यानी सोवियत संघ 70 वर्षों का होकर मृत हो गया। कोई भी अमर नहीं होता। समस्या यह भी नहीं कि समाजवादी प्रयोग अंतत: विफल रहा। सफलता से सभी चीजों की माप नहीं होती। वास्तविक समस्या तो क्रांति और क्रांति के पश्चात स्थापित राज्य के उस जीवन-काल का वह विद्रूप सत्य है, जब उन्हें सफल माना जा रहा था। 
    हम उस क्रांति का जश्न कैसे मनाएं, जिसने एक भस्मासुर पैदा कर दिया? क्रांति के दौरान 1917 से लेकर 1921 तक की उसकी घटनाएं जानने के बाद भी हम उसके नायकों, यहां तक कि लेनिन, को कैसे आदर्श मान लें? सोवियत राज्य के अंतर्गत कामगारों को हाशिये पर डालने और किसानों के कत्लेआम का बोध होने के बाद भी हम कैसे इसे कामगारों और किसानों की जीत मान लें? 
    सोल्जेनित्सिन को पढऩे के पश्चात किस तरह हम क्रांति के इस दावे को गंभीरता से ग्रहण करें कि उसने एक वैकल्पिक लोकतंत्र का मॉडल पेश किया? सोवियत संघ के पूर्वी यूरोपीय उपनिवेशों के भ्रमण के बाद भी कैसे हम उसके उपनिवेशवाद-विरोध के जयकारे लगाएं? उसकी नकारा नौकरशाही तथा विकास के पाश्चात्य मॉडल की भोंडी नकल के दीदार के बाद भी हम उसके आर्थिक मॉडल से प्रेरित होना कैसे कबूल करें?
    इसलिए, मैं तो सोवियत साम्यवादी व्यवस्था का जश्न नहीं मना सकता। इसी तरह, मैं 1917 की रूसी क्रांति की घटना को एक बेशर्त श्रद्धांजलि देना भी कठिन पाता हूं। फिर भी, उसमें एक ऐसी चीज है, जिसका जश्न तो मनाया ही जाना चाहिए, और वह स्वयं क्रांति का विचार है। 
    उसके घटनाक्रम चाहे जैसे भी रहे हों, रूसी क्रांति ने एक विचार की विजय दर्ज की- यह विचार कि मानव एक अघटित रीति से अपनी तकदीर खुद ही तराश सकता है। रूसी क्रांति का शताब्दी समारोह एक ऐसा सुअवसर तो होना ही चाहिए कि इस भावना का जश्न मनाया जाये और 20वीं सदी के इतिहास के आलोक में क्रांति के विचार को फिर से एक नया कलेवर दिया जाए। 
    पहली बार 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के दौरान प्रयुक्त होने के बाद क्रांति की अवधारणा ने स्वयं ही चार विभिन्न विचार समेट रखे थे। वे यह कि मौजूदा सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था हमेशा बनी रहनेवाली नहीं होती। इसे मौलिक ढंग से परिवर्तित किया जा सकता है, और वैसा किया ही जाना चाहिए। यह परिवर्तन एक झटके में हो सकता है और उसके वैसे ही घटित होने की संभावना भी होती है। मगर ऐसा नाटकीय परिवर्तन स्वयमेव नहीं होगा। इसके लिए जनता को एकजुट कर उसकी सामूहिक कार्रवाई- जो प्राय: हिंसक होगी- द्वारा राजसत्ता पर अधिकार आवश्यक था। और अंतिम विचार यह कि किसी क्रांति के लिए एक हरावल दस्ते, सर्वहारा वर्ग, की जरूरत होगी, जिसकी नुमाइंदगी कोई क्रांतिकारी राजनीतिक पार्टी करती हो।
    यूरोप की 18वीं सदी से प्रेरित तथा 19वीं सदी से विकसित हुई क्रांति की यह समझ रूसी क्रांति में साकार हुई। 20वीं सदी के दौरान रूस, क्यूबा, वियतनाम तथा कंबोडिया में संपन्न विभिन्न क्रांतियों के वास्तविक अनुभवों ने हमें फ्रांसीसी क्रांति के विचार के संबंध में कुछ सबक सिखाये। 
    पहला, क्रांतिकारी रूपांतरण का गंतव्य एकआयामी परिवर्तन नहीं हो सकता। माक्र्सवादी सिद्धांत ने क्रांतिकारी रूपांतरण के लक्ष्य को मुख्यत: आर्थिक आयाम में ही सोच रखा था। 20वीं सदी ने इस आदर्श को व्यापक कर इसमें राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तन भी शामिल कर दिए। 
     जयप्रकाश नारायण ने मानवीय जीवन के सभी आयामों में 'संपूर्ण क्रांतिÓ की अवधारणा रखी। दूसरा, क्रांति के विचार को एक झटके की नाटकीय अवधारणा से विलग किये जाने की जरूरत भी है।  मौलिक परिवर्तनों का एक झटके में संपन्न होना न तो जरूरी है, न ही वांछनीय। कोई भी टिकाऊ परिवर्तन क्रमिक ही हुआ करता है। तीसरा, क्रांति के हिंसक होने की आवश्यकता भी नहीं है। निहित स्वार्थों द्वारा प्रतिरोध की वजह से क्रांति सहज ही संपन्न नहीं होती। पर, यदि यह हिंसक हो गई, तो इसके उन्हीं के विरुद्ध हो जाने की संभावना होती है, जिनके नाम पर वह शुरू हुई थी। चौथा, किसी क्रांतिकारी 'हरावल दस्तेÓ का विचार भी त्याज्य है। कोई भी एक वर्ग इतिहास का चुनिंदा अभिकर्ता नहीं होता। और जब एक पार्टी क्रांति की संरक्षक बन जाती है, तब तो यह एक विनाशकारी संयोग बन जाता है।
    अंतत:, 20वीं सदी के उत्तरार्ध ने यह मान्यता उलट दी कि यूरोप ही मुख्य क्रांतिकारी रंगमंच हो सकता है। विश्वयुद्ध के बाद के यूरोप ने किसी क्रांतिकारी मंच के रूप में अपनी संभावना लगभग समाप्त कर डाली। अब एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका जैसे पृथ्वी के बाकी हिस्सों पर गौर करने की बारी थी। 
    मगर इन संशोधनों के बावजूद, क्रांति का केंद्रीय विचार अब भी कायम है, जो यह है कि एक दूसरी दुनिया का सृजन संभव है और हम इसे कर सकते हैं। यह केंद्रीय विचार ही 21वीं सदी को रूसी क्रांति की विरासत है। मैं समझता हूं कि वर्तमान सदी इस विचार को तीन दिशाओं में  ले जा सकती है। पहली, हमें क्रांति के किसी पूर्वनिर्धारित गंतव्य का विचार छोडऩा होगा। क्रांति को एक प्रक्रिया के रूप में ही लिया जाना चाहिए, जो आगे बढ़ती हुई अपने गंतव्य की खोज और उसका विकास स्वयं ही किया करती है। 
    दूसरी, अब तक क्रांति का विचार राजनीति पर अत्यधिक निर्भर रहा है। इसने एक राजनीतिक दल तथा आधुनिक राज्य को क्रांतिकारी परिवर्तन का वाहक बना दिया। जरूरत इस बात की है कि हम परिवर्तनों के अन्य वाहकों की पहचान करते हुए खुद राजनीति की समझ भी व्यापक करें। और अंतिम,क्रांति की यूरोपीय अवधारणा निरपेक्ष बाह्य परिवर्तन पर केंद्रित रही है। हमें मनुष्य तथा उसके अभ्यंतर को भी क्रांति स्थल के रूप में बराबरी की मान्यता प्रदान करनी होगी।
    ये समस्त प्रस्ताव अत्यंत मूलभूत प्रकृति के प्रतीत हो सकते हैं, पर क्रांति भी तो कुछ ऐसी ही होती है। क्रांति की अवधारणा में एक क्रांति ही रूसी क्रांति के प्रति हमारी सर्वोत्तम श्रद्धांजलि होगी। (अनुवाद-  विजय नंदन)
    http://www.prabhatkhabar. com

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • शिवप्रसाद जोशी
     कुछ दिनों पहले पीएम की मिमिक्री करने वाले एक हास्य कलाकार की प्रस्तुति ही रोक दी गई थी। अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर अब नई टकराहटें सामने आ रही हैं। कांचा इलैया जैसे दलित लेखक हों या कमल हासन जैसे कलाकार, बोलने पर खतरा बढ़ता ही जा रहा है।
    भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान संविधान सभा में हुई बहसों में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नागरिक स्वतंत्रताओं की आधार रेखा कहा गया है। संविधान की धारा 19(1) जिन छह मौलिक अधिकारों का प्रावधान करती है उनमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहला स्थान है।
    अन्य मौलिक अधिकारों की ही तरह विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी आत्यांतिक और अनियंत्रित नहीं है। विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त सीमाएं इन बातों के आधार पर लगायी जा सकती हैं- 1)मानहानि, 2)न्यायालय की अवमानना, 3)शिष्टाचार या सदाचार, 4)राज्य की सुरक्षा, 5)दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, 6)अपराध के लिए उकसावा, 7)सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और 8) भारत की संप्रभुता और अखंडता।
    सुप्रीम कोर्ट ने विचार और अभिव्यक्ति के इस मूल अधिकार को लोकतंत्र के राजीनामे का मेहराब कहा है क्योंकि लोकतंत्र की नींव ही असहमति के साहस और सहमति के विवेक पर निर्भर है। लेकिन आजादी के इन सत्तर वर्षों में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, युक्तियुक्त निर्बन्धनों और राजद्रोह और मानहानि आदि को लेकर विवाद होते रहे और नागरिकों, विधायिका और कार्यपालिका के साथ लेकर निरंतर एक टकराव की स्थिति बनी रहती है। 
    2012 में, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी से लेकर 2016 में जेएनयू में कथित रूप से भारत विरोधी नारे लगाने के आरोप में छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी तक अभिव्यक्ति की आजादी के दमन की कई घटनाएं हो चुकी हैं। राजद्रोह के अलावा मानहानि के मामलों को लेकर भी विवाद रहा है। बिल्कुल हाल के दिनों में वेब पत्रिका द वायर की कुछ खबरों पर राजनीति और उद्योग जगत के लोगों की ओर से न सिर्फ एतराज उठाए गए बल्कि मानहानि के भारी-भरकम मुकदमे तक ठोक दिए गए।
    भारत की एक चर्चित समाचार वेबसाइट और मीडिया वॉचडॉग द हूट ने अपनी 2017 की सालाना रिपोर्ट में पाया है कि 2016 से लेकर 2017 की पहली तिमाही तक 50 से ज्यादा पत्रकारों पर हमले की घटनाओं का उल्लेख किया है। द हूट के मुताबिक 2016 में 31 बार इंटरनेट बंद किया गया और 2017 के पहले छह महीनों में 14 बार। 2016 में अदालतें अभिव्यक्ति की आजादी के सवालों पर माथापच्ची को लेकर लगातार व्यस्त रहीं। राजद्रोह, मानहानि और फिल्म और अन्य कलाओं की सेंसरशिप के मामलों में पिछले साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी गई। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स नाम की संस्था द्वारा प्रकाशित द वल्र्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत पूरी दुनिया में 136वें स्थान पर है।
    ये सूचकांक तो प्रेस पर बढ़ते हमलों को लेकर है, अगर इसमें अन्य रचनात्मक गतिविधियों जैसे कार्टून, चित्र, कला, साहित्य, नृत्य आदि को भी जोड़ दिया जाए तो भारत में अभिव्यक्ति के दमन का ग्राफ चिंताजनक ही नजर आता है। और ये सिलसिला बढ़ता ही जाता है। चाहे वो कोई खबर हो या कोई कार्टून या कोई चित्र या कोई टिप्पणी। प्रख्यात अभिनेता कमल हासन की हिंदू आतंकवाद को लेकर की गई टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई तो छोड़ ही दीजिए उन्हें तो सीधे सीधे मार डालने का फतवा देने वाले स्वर भी पुरजोर हो चले हैं। ये एक भयावह स्थिति है।
    अगर वैचारिक असहिष्णुता पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इसका अंजाम सेल्फ सेंसरशिप होगा जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ऐसे अतिक्रमण के दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं। 
    इस बुनियादी फर्क पर ध्यान देना जरूरी है कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत की आजादी के बाद बना संवैधानिक प्रावधान है और उसे संविधान का संरक्षण प्राप्त है। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत सरकार के लिये इस संबंध में कुछ सुझाव और सिफारिशें दी हैं। ऐसे भारतीय कानून जिनका उपयोग करके शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को भी अपराध ठहराया जाता है वे सरकार के अंतरराष्ट्रीय कानूनी उत्तरदायित्वों के विरुद्ध हैं। और चूंकि अभिव्यक्ति की आजादी दूसरे अधिकारों की बुनियाद है इसलिए  ये मानवाधिकारों की रक्षा में भी बाधक हैं। सरकार को चाहिए कि वो इन कानूनों को रद्द करने या उनमें अपेक्षित संशोधन करने के लिए प्रयास करे और अगर संशोधन किया जाता है तो इसके लिए नागरिक संगठनों के साथ पारदर्शी और सार्वजनिक विचार-विमर्श किया जाए। उन सभी मुकदमों को वापस लिया जाए और सभी जांचों पर रोक लगा दी जाए जो शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति या शांतिपूर्ण संगठन से जुड़े हैं।
    पुलिस को इस बात के लिये जरूरी प्रशिक्षण दिया जाए कि अदालतों में अनुचित मामले दर्ज नहीं किये जाएं। जजों को खासतौर पर निचली अदालतों के जजों को शांतिपूर्ण अभिव्यक्तियों और उनके कथित हनन को लेकर लगी धाराओं से संबद्ध फर्क बताया जाए और प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे ऐसे मामले खारिज कर दें जो विचार और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के विरुद्ध हों। राजनीतिक दलो और उनके आनुषंगिक संगठनों को संवेदनशीलता और सहिष्णुता बरतने की हिदायत दी जाए। राजनीतिक दल अपने भीतर इस तरह के प्रोग्राम विकसित करें और अपने कैडर को अनुशासित बनाएं। विकास के लिए समाज में बहस का माहौल बनाया जाना हर हाल में जरूरी है लेकिन ये अतिरंजना का शिकार न हो। (डॉयचे वैले)

     

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