विशेष रिपोर्ट

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  • अफसरों और किसान-नेताओं का कहना अलग-अलग
    तिलक देवांगन
    रायपुर, 20 सितंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। प्रदेश के मैदानी इलाकों में पिछले दो दिन से हो रही बारिश से फसलों में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। बारिश से सिंचित इलाकों में ही फसल को फ ायदा पहुंचेगा। असिंचित क्षेत्रों में नुकसान की भरपाई मुश्किल हैं। किसानों ने फसल नुकसान को देखते हुए सभी प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की मांग की है। जबकि राजस्व विभाग का कहना है कि बारिश से फसल में सुधार आएगा और मुआवजा में भी फर्क पड़ेगा। 
    प्रदेश के करीब 48 लाख हेक्टेयर में खरीफ की फसल ली जा रही है।  इसमें से साढ़े 36 लाख हेक्टेयर में धान की बुवाई की गई है। जुलाई-अगस्त में पर्याप्त बारिश नहीं होने से खेती प्रभावित रही और सरकार ने 96 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। पिछले दो दिनों से रायपुर समेत प्रदेश के अधिकांश इलाकों में रूक-रूककर बारिश हो रही है, लेकिन खराब हो चुकी फसल की स्थिति में सुधार की संभावना नहीं है। यह जरूर माना जा रहा कि बारिश से सिंचित क्षेत्र की फसल को फायदा होगा। 
    किसान नेता संकेत ठाकुर, द्वारिका साहू का कहना है कि असिंचित क्षेत्र की फसल पूरी तरह से खराब हो चुकी है और किसान उसे जानवरों के हवाले कर चुके हैं। सिंचित क्षेत्र की फसल को बारिश से फायदा होगा। उसे बांधों से आगे भी पानी मिलता रहेगा। उनका कहना है कि सरकार ने नजरी सर्वे कराने के बाद सूखाग्रस्त तहसीलों की सूची जारी की है। वहां के सभी किसानों को मुआवजा मिलना चाहिए। फसल नष्ट होने के  बाद वहां बारिश का अब कोई मतलब नहीं है। बची धान फसल में अब बालियां निकल रही हैं। वहां बारिश से भू-जल स्तर में सुधार अवश्य आएगा। 
    संयुक्त संचालक कृषि पीसी बघेल का कहना है कि प्रदेश में बारिश से खराब हो चुकी फसल को कोई फायदा नहीं होगा। खेतों में नमी बनी रहने से किसान रबी या अन्य फसल की तैयारी कर सकते हैं। अल्प वर्षा के बाद बची   धान फसल में अब बालियां आने लगी हैं। फिलहाल हो रही बारिश से रबी फसल के लिए पानी देने पर विचार किया जा रहा है। इस संबंध में दिल्ली स्तर पर भी चर्चा हो रही है। सरकार ने जितनी तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है, उसमें कोई घट-बढ़ नहीं होगा और सभी प्रभावित किसानों को मुआवजा दिया जाएगा। 
    संयुक्त सचिव राजस्व एचपी निहलानी का कहना है कि बारिश से फसल  की स्थिति में सुधार आएगा। धान की बालियां लंबी होने के साथ ही उसका उत्पादन बढ़ेगा। अभी तक फसल का नजरी सर्वे हुआ है। फसल पूरी तरह तैयार होने पर उसका एक बार फिर से सर्वे कराया जाएगा और उसी के आधार पर मुआवजा तय किया जाएगा। बारिश से किसानों को दिए जाने वाले मुआवजे में फर्क आएगा। 
    15 जिलों में सामान्य से कम बारिश 
    प्रदेश के 15 जिलों में अभी भी सामान्य से कम बारिश हुई है। मौसम विभाग के मुताबिक बलौदाबाजार में 39 फीसदी, कोरिया-37, राजनांदगांव-36, दुर्ग-31 व रायपुर में 30 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। इसके अलावा नारायणपुर में 27 फीसदी, मुंगेली-26, जांजगीर व बिलासपुर-24, रायगढ़-22, कोरबा-21, बलरामपुर-20 व बीजापुर-नारायणपुर में 19-19 फीसदी कम बारिश हुई है। मौसम विभाग का कहना है कि प्रदेश में दो दिनों से रूक-रूककर हो रही बारिश से रायपुर व आसपास के जिलों की स्थिति में थोड़ा सुधार आया है। 

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  • भिलाई के प्रभजीत ने ब्रास पर उकेरा छत्तीसगढ़ी आर्ट
    संतोष मिश्रा 
    भिलाई नगर, 18 सितंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। सुपर बाइक्स के दौर में आज भी बुलेट के लिए दिवानगी यंगस्टर्स में बरकरार है। ओल्ड बुलेट के मॉडिफिकेशन पर बाइक के दीवाने लाखों रूपये खर्च कर अपनी शॉन की सवारी को डिफरेंट लुक देने पूरी शिद्दत से कस्टमाइजेशन टेक्निक्स पर आँखें गड़ाये दिखाई पड़ते हैं। 
    बुलेट कस्टमाइजेशन की डिमाण्ड पर कबाड़ को जोड़ तोड़ कर एक पुरानी जीप को शानदार ज्ज् राजमाताज्ज् बनाने वाले भिलाई के प्रभजीत सिंह ने साढ़े बारह किलो ब्रॉस का प्रयोग कर छत्तीसगढ़ की पांच सौ वर्ष पुराने आर्ट को बुलेट पर उतारा है। कस्टमाइजेशन के बाद बुलेट का शाही लुक देखने और परखने दूर-दूर से शौकीन सिंह कस्टम्स पहुँच रहे हैं। 
    इसके पूर्व प्रभजीत की एक्सयूवी 500 के टायर वाली 9 फीट की बुलेट छत्तीसगढ़ के आलावा समीपस्थ राज्यों में बुलेट शौकीनों की सवारी बन चुकी है। प्रभजीत ने 350 सीसी की बुलेट में मेकविल टायर का इस्तेमाल किया और इतने बड़े साइज के टायर को बिल्कुल कार की तरह मैनेज कर बुलेट को सुपर लुक दिया था। प्रभजीत की कस्टमाइज बुलेट जयपुर घराने के कलेक्शन में भी शुमार है। अब छत्तीसगढ़ के ब्रॉस आर्ट का लबादा ओढ़े राजशाही लुक में सजी बुलेट की जानकारी मिलते ही इसकी डिमांड दूर-दूर से आने लगी है।
    राजा-महाराजाओं के मुकुट पर जो नक्काशी दिखाई पड़ती थी वही कलाकारी बुलेट के बैटरी बॉक्स पर बनी हुई है। ब्रॉस क्लच पर गजराज को इतने सलीके से उकेरा गया है कि यह लुक राज सिंहासनों पर प्राचीन समय में ही देखा गया होगा। कम्फर्ट लेदर सीट के आलावा बुलेट की कानफाड़ू आवाज को 8वे एग्जास्ट से यूँ सुरीला बनाया गया है मानों इंजन स्टार्ट होते ही बुलेट का दिल धड़कने लगा हो। पेट्रोल टैंक पर स्पीडोमीटर व साइड नम्बर प्लेट बुलेट के लुक पर चार चांद लगा रही है। प्रभजीत ने इंजिन में अत्याधुनिक स्पार्क प्लग का प्रयोग किया है जिससे टार्क काफी बढ़ गया है। रॉयल एनफिल्ड की 350सीसी बुलेट पर ब्रॉस आर्ट और कस्टमाइजेशन में महीने भर की मेहनत व नक्काशी के बाद यह बुलेट लगभग डेढ़ लाख की लागत में शान से सड़क पर उतरी है। 
    वैशाली नगर निवासी बीई मेकेनिकल प्रभजीत सिंह ने छत्तीसगढ़ से चर्चा में बताया कि हालीवुड की मूवी गोस्ट राइडर के बाद यंगस्टर्स में लाँग बुलेट का जब क्रेज बढ़ा तो बुलेट कस्टमाइजिंग डिमाण्ड में अचानक बूम आया और रॉयल एनफिल्ड के 1 लाख से ज्यादा कीमत की थंडरवर्ड मॉडल में 2 लाख रूपये से भी ज्यादा के मॉडिफिकेशन किए गए। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गोवा जैसे राज्यों से 60 से 70 हजार रूपये की पुरानी बुलेट्स को अपने अंदाज में री-डिजाइन करने के लिए यंगस्टर्स 2 से 4 लाख रूपये भी लगाने तैयार दिखते हैं। 350 सीसी की बुलेट में एक्सयूवी 500 के मेकविल टायर का इस्तेमाल कर मॉडिफाई बुलेट 4 लाख रूपये में हाथों हाथ बिक गई। वे अब तक मिनी बुलेट्स से लेकर 6 फीट लंबी बुलेट्स मॉडिफाई कर चुके हैं। एक्सयूवी 500 टायर की बुलेट 9 फीट लम्बी थी। प्रभजीत ने बताया कि रॉयल एनफिल्ड कुछ ही रंगों में मिलती है, यंगस्टर्स में कलर काम्बीनेशन के साथ सुपर बाईक लुक की काफी डिमाण्ड है। पुरानी बुलेट मॉडिफाइड होने के बाद आसानी से 4 से 6 लाख की कीमत डिमाण्ड अनुसार हासिल कर लेती है। 
    अब तक अनेक चार पहिया स्क्रैप वाहनों को लग्जीरियस लुक दे लगभग 4 लाख में फिर से सड़कों पर दौड़ाने का जज्बा रखने वाले प्रभजीत की चाहत है कि वो ऐसी इलेक्ट्रानिक कार बनायें जो ड्यूल चार्ज सिस्टम से सड़कों पर दौड़ सके। प्रभजीत बताते हैं कि यदि राज्य सरकार कस्टमाइजेशन के बाद वाहनों पर लगने वाले सर्विस व एन्टरटेनमेंट टैक्स में रियायत दे तो और भी कम लागत में कार छत्तीसगढ़ में ग्राहकों को दी जा सकती है फिलहाल प्रभजीत की ब्रॉस आर्ट के न्यू लुक के साथ तैयार बुलेट यंगस्टर्स को खासी लुभा रही है। पहले दो कस्टमाइज बुलेट को देखने के बाद इस राजशाही लुक को काफी पसंद किया जा रहा है। 
    गौरतलब हो कि इंजन और चेसिस को छोड़ कर नियमानुसार बाइक के बाकी किसी भी हिस्से को मॉडिफाइड कर सकते हैं। कस्टमाइजेशन से पहले बाइक की आरसी, फोटो व आईडी ली जाती है ताकि तस्दीक हो सके कि बाइक चोरी की तो नहीं है। इंजन, चेसिस और एग्जॉस्ट को छोड़ कर किसी भी हिस्से को मॉडिफाइड करा सकते हैं। इससे वारंटी पर कोई असर नहीं पड़ता। मॉडिफिकेशन से पहले इंश्योरेंस कम्पनी से बात करना जरूरी है क्योंकि इंश्योरेंस कम्पनी मॉडिफाइड बाइक का इंश्योरेंस कवर खत्म कर देती है। 

     

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  • सुकमा जग्गावरम  के 240 बच्चे शिक्षा से अछूते
    अमन सिंह भदौरिया 
    दोरनापाल, 17 सितंबर (छत्तीसगढ़ संवाददाता)। सुकमा जिले के जग्गावरम गांव में 4 से लेकर 8 वर्ष तक के लगभग 240 बच्चे ऐसे हैं जिन तक न तो शिक्षा पहुंच पाई है और न ही वहां के बच्चे दूरस्थ पोटाकेबिन या आश्रमों तक पहुंच पाए क्योंकि बीते 10 साल से इस गांव में स्कूल नहीं लगी और कागजों में स्कूल गांव में ही संचालित होना बताया गया है। आज जग्गावरम नक्सलप्रभावित उन गांवों में आता है जिसे प्रशासन पहुंचविहीन बताती है। जिला शिक्षा विभाग से मिले दस्तावेजों पर जग्गावरम गांव को पोलमपल्ली संकुल के अंतर्गत संचालित स्कूलों की सूची में देख छत्तीसगढ़ पगडंडियों और नदी नालों को पार कर जग्गावरम गांव पहुंचा और वहां की पड़ताल की लेकिन धरातल पर स्कूल नजर नहीं आया। 
    गौरतलब है कि एक ओर सरकार आदिवासी क्षेत्र के एक-एक बच्चों को शिक्षा से जोडऩे करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाती है वहीं दूसरी ओर जमीनी हालात कागजी दस्तावेजों को झुठलाते नजर आते हैं। ज्ञात हो कि सुकमा शिक्षामंत्री का ही प्रभारी जिला है । जब छत्तीसगढ़  ने पड़ताल शुरू कि तो पाया कि 2007 से गांव में स्कूल बंद पड़ा है। तब से आज तक ग्रामीणों ने न तो गांव में स्कूल देखा न शिक्षक । जग्गावरम के सोमा ने बताया कि रोज बच्चे ,खेत जाने हैं ,मछली मारने जाते हैं ,नदी जाते हैं ,लकड़ी लेने जाते हैं शिकार पर भी जाते हैं पर स्कूल नही जा सकते। हम भी गांव में स्कूल चाहते हैं भवन नहीं तो क्या हुआ हम झोपड़ी बनाकर देंगे। शिक्षक के रहने का बंदोबस्त भी कर देंगे पर स्कूल तो खुले।
    2006 से बंद पड़ा है स्कूल-भीमा
    गांव के मुखिया सोढ़ी भीमा बताते हैं कि वर्ष 2006 से आज तक जग्गावरम गांव में स्कूल नही खुली । गांव में 4 से लेकर 8 वर्ष तक लगभग 240 बच्चे हैं मगर एक भी बच्चा स्कूल नही जा पाता क्यों कि न तो 10 सालों से स्कूल गांव में खुला और नही ही बच्चे किसी आश्रम पोटाकेबिन मे शिक्षा से जुड़े । कोई अधिकारी गांव में झांकने नही आता न सरकार आती है। हम गांव में स्कूल चाहते हैं ताकि बच्चों का भविष्य बेहतर हो सके।
    सालों से गांव नहीं पहुंचे शिक्षक
    गौरतलब है कि एक ओर बीते दस वर्षों से जग्गावरम में स्कूल को संचालित होना बताया गया वहीं दूसरी ओर मूलपद के दोनों शिक्षकों को विभाग ने दूसरे स्कूलों में पदस्थ कर रखा है और इसकी जानकारी संकुल समन्वयक से लेकर अन्य अधिकारियों को भी है। विभाग ने अंदरूनी इलाकों में स्कूल शिक्षा व्यवस्था सुधारने की बजाए नक्सल प्रभावित गांव और बच्चे न होना बताकर उन स्कूलों में ताले जड़ दिए और शिक्षकों को शहरी इलाकों में पदस्थ कर दिया। इन्ही में से जग्गावरम के शिक्षकों की पड़ताल जब कि गई तो पाया कि मूल पद के शिक्षक सोढ़ी हिड़मा व नेताम को दूसरे स्कूलों में अटैच किया गया था। कलेक्टर जे.पी. मौर्य ने महीने भर पहले ही लिस्ट जारी कर इन शिक्षकों को मूल पद में लौटने के निर्देश भी मिले थे।
    बच्चे शिकार पर जाते हैं 
    इन पहुंच विहीन गांवों में सन 2007 से शिक्षा प्रभावित है। प्रशासन और सरकार इसके लिए माओवाद को जिम्मेदार बताती है कि माओवादी स्कूल तोड़ते हैं इस वजह से बच्चे शिक्षा से नहीं जुड़ पाए।  माओवादी संगठन के अनुसार उन स्कूलों को भविष्य में पुलिस के बेसकैंप बनाये जाने के खतरे को टालने के लिए तोड़े गए थे। साथ ही यह भी कहना है कि जो स्कूल आज झोपड़ी में लग रहे हैं उन्हें माओवादी संगठन बंद नहीं करवाती है और संगठन शिक्षा के खिलाफ नहीं है। 
    (प्रस्तुत रिपोर्ट एम.सी.सी.आर.फेलोशिप के तहत प्रस्तुत है)

    मुझे इस संबंध में फिलहाल कोई जानकारी नहीं थी।  'छत्तीसगढ़' के माध्यम से सूचना मिल रही है । अंदर गांवों के बच्चे ज्यादातर आश्रमों में हैं हो सकता है जग्गावरम के बच्चे आश्रमों में हों। सम्बंधित अधीनस्थ अधिकारियों बात करूंगा मैं पता लगता हूँ क्या मामला है ।
    राजेन्द्र राठौर
     जिला शिक्षा अधिकारी 

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  • मंदिर इसलिए नहीं  क्योंकि वह कैद होकर नहीं रहना चाहता था
    सेराज अहमद खान
    सूरजपुर, 14 सितंबर (छत्तीसगढ़)।  सूरजपुर के खोपा गांव में   देवी-देवताओं की नहीं बल्कि दानव की आराधना होती है।  लोगों की आस्था ऐसी है कि इस दरबार से कोई खाली हाथ वापस नहीं लौटता है।  मन्नतें पूरी होने पर यहां बकरे तथा मुर्गे की बलि के साथ शराब का प्रसाद भी चढ़ाये जाने की परम्परा चली आ रही है।
    सूरजपुर  से 10 किमी. की दूरी पर स्थित इस क्षेत्र का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल खोपा धाम और खोपा नाम से ही इस गांव की भी पहचान होती है।  ये गांव यहां के दानव देवता के नाम से प्रसिद्ध है। इस दरबार में लोगों का तांता लगा रहता है।  
     क्षेत्र का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल खोपा दानव धाम पहुँचकर यहां पर लगी श्रद्धालुओं की भीड,़ मन्नत के लिए बांधी गई चुनरी, धागे, नारियल तथा पूजा पाठ की सामग्री एवं पूजा पाठ का माहौल, धार्मिक वातावरण को देखकर कोई भी सहज ही समझ सकता है कि दूर दराज से लोग पहुँते हैं। 
    इस दानव का नाम बंकासूर है जिसे क्षेत्र के लोग दानव देवता के नाम से मानते व पुकारते हैं। यहां के बैगा का कहना था कि इस स्थल की स्थापना लगभग सौ साल पूर्व हुई थी।  इस दरबार में कई प्रदेशों से श्रद्धालु पहुँचते हैं और मनचाही मुरादें यहां पुरी कर के वापस लौटते हैं।
    इस धाम से जुड़ी आस्था रीति- रिवाजों की जो बातें बताते हैं वे भी बड़ी दिलचस्प हंै। बताया जाता है कि इस गांव से गुजरने वाली रेणुका नदी में बंकासूर नाम के दानव का वास था किन्तु गांव के एक बैगा समाज के युवक से प्रसन्न होकर वह गांव के बाहर एक स्थल पर अपना जमाव तय किया।  भक्ति का दायित्व  सिर्फ बैगा समाज को ही स्वीकृति प्रदान किया।  जिससे यहां पूजा-पाठ कोई ब्राह्मण पंडित नहीं बल्कि बैगा ही करते हैं।
    लगभग सौ वर्ष प्राचीन इस धाम में आज भी मंदिर का निर्माण नहीं कराया गया है। इसकी भी  एक कहानी है। जानकारों के मुताबिक खोपा देव ने अपने स्थापना से पूर्व ही अपने भक्तों को सूचित किया था की मेरे वास स्थल पर कभी भी मंदिर का निर्माण न कराया जाए ताकि मंै चार दिवारी में कैद होने से बजाए स्वतंत्र रह सकूं।  वहीं यहां की परंपरा भी है कि यहां का प्रसाद महिलाएँ नहीं खा सकती हैं। और  प्रसाद घर लेकर जाने की भी मनाही है।
     विदित हो की पूर्व समय में इस स्थल में महिलाओं का  प्रवेश वर्जित था किन्तु अब महिलाएँ भी बड़ी संख्या में आती हैं।   एक महिला ने बताया कि यहीं के मन्नत से शादी के 9 वर्षों बाद संतान सुख की प्राप्ति के पश्चात बकरा चढ़ाने पूरे परिवार सहित आई है।
    बहरहाल खोपा धाम सदियों से आस्था का केन्द्र बना हुआ है यहां के पूजा पाठ की रीति- रिवाज भी कुछ अलग हंै पहले यहां नारियल,  तेल और सुपाड़ी के साथ पुजा करते हैं फिर अपनी मन्नते माँगते हैं तथा मन्नत पुरी होने पर श्रद्धालु बकरा, मुर्गा और शराब चढ़ाने आते हैं।

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  • दूसरे जिले के भरोसे, इलाज के लिए दस किमी. पैदल जाते हंै ग्रामीण
    सतीश चाण्डक

    सुकमा, 14 सितंबर (छत्तीसगढ़)। केन्द्र व राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर तमाम प्रकार की सुविधाऐं देने की बात कह रही हो। जहां हर दिन नए-नए योजनाओं की शुरूआत हो रही है लेकिन अभी भी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जिला बहुत पीछे है। आलम यह है कि पिछले दस सालों से स्वास्थ्य केन्द्र बनकर तैयार हो गया है लेकिन अभी तक डाक्टर नहीं आए। इलाज के लिए ग्रामीण दंतेवाड़ा जिले में पैदल जाकर कराते हंै। 
    इस संबंध में सीएमएचओ सुकमा  वीरेन्द्र ठाकुर ने कहा-आपके माध्यम से पता चला है कि वहां डाक्टर नहीं है। साथ ही चिंगवारम में भी कोई स्टाफ नहीं है। पता लगवाता हूं और जल्द ही वहा पर स्टाफ व डॉक्टर भेजने का प्रयास करूंगा। 
    जिला मुख्यालय से करीब 33 किमी. दूर स्थित मिचवार गांव जहां स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल है। पंचायत के रेंगमपारा, पाईकपारा, मिचवार, कोटवालपारा, गरिपाल, ऐन्देपारा, गडग़ड़पारा, कपेगोंदी इन पारो में करीब पन्द्रह सौ की संख्या में ग्रामीण निवासरत है। वही आस-पास के गंावों में भी काफी लोग रहते है। 
    ग्रामीणों ने बताया कि 2008 में गांव में स्वास्थ्य केन्द्र भवन का निर्माण हुआ था। चार कमरों का बना यह भवन सभी सुविधायुक्त है। गांव में सबसे पहले यही भवन बना। लेकिन जब से भवन का निर्माण हुआ है जब से ना तो डाक्टर आए हंै और ना ही कोई नर्स। ग्रामीणों की माने तो अभी तक भवन का उद्घाटन भी नहीं हुआ है। और देखरेख के अभाव में भवन की हालत जर्जर हो चुकी है। 
    ग्रामीणों ने बताया कि इलाज के लिए बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहा डाक्टर या नर्स भी नहीं आते। इसलिए ग्रामीणों को दंतेवाड़ा जिले के भूसारास जाना पड़ता है। आवागमन के साधन नहीं होने के कारण ग्रामीण खाट पर मरीज को लेकर जाते है। उन्होंने बताया कि पहले तो नक्सली समस्या थी लेकिन अब तो कैम्प भी लग गया है उसके बावजूद डाक्टर, नर्स का नहीं आना परेशानी का सबक बन गया है। इलाज के अभाव में कई ग्रामीणों की मौतें हो चुकी हंै।  मिचवार निवासी  हिड़माराम बताते हैं- हम लोगों को पैदल भूसारास जाना पड़ता है। कई बार प्रशासन को लिख कर शिकायत की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
    जिले के अंदरूनी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति काफी खराब है। डाक्टर तो दूर की बात है उन्हें मितानिन भी नहीं मिलती है। इलाज के अभाव में ग्रामीण मजबूरी में झाड़-फूंक करवाते हंै। और फिर मरीज की स्थिति और गंभीर हो जाती है। उसके बाद उसे अस्पताल में लाया जाता है। लेकिन स्थित गंभीर होने के कारण उसका बच पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे कई मामले अस्पतालों में पहले भी आ चुके है और आज भी आ रहे हंै। 

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  • चंद्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर ,12 सितंबर (छत्तीसगढ़)। कोरिया में डीएमएफ (जिला खनिज न्यास) की राशि का  एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें एक ही कार्य के लिए डीएमएफ से दो विभागों जल संसाधन और ग्रामीण यांत्रिकी  को अलग-अलग राशि स्वीकृत की गई। दोनों विभागों की स्वीकृत राशि में काफी अंतर है। जब ये विभाग खुद काम कर रहे थे, तब राशि ज्यादा थी। इसी बीच कांग्रेस नेता गुलाब कमरो इस मामले को लेकर कोर्ट पहुंचे। तब दोनों विभागों ने  टेंडर निकाला और राशि कम कर दी। फिर 40 प्रतिशत कम में ठेकेदार ने काम ले लिया, तो दोनों विभागों ने टेंडर निरस्त कर दिया।  
    इस संबंध में आरईएस के इंजीनियर आर के जैन जिन्होंने इस्टीमेट बनाया का कहना है कि दोनों विभागों को स्वीकृति मिली थी। हमारे काम में बीम वाल ज्यादा था।  जल संसाधन विभाग के एसडीओ एसके दुबे का कहना है कि उस वक्त जीएसटी को लेकर ठेकेदारों ने विरोध कर दिया था, जिसके बाद सारे टेंडर निरस्त कर दिए गए थे और कोई मामला नहीं है।
    मिली जानकारी के अनुसार डीएमएफ के तहत ग्राम पंचायत कमदनारा में सत्तीपारा से तमजीरा पहुंच मार्ग पर पुलिया सह स्टापडेम के निर्माण की स्वीकृति प्रदान की गई। पहले इसे जलसंसाधन विभाग ने 19 लाख के बनाने का प्रस्ताव दिया, उसे डीएमएफ से 9.50 लाख रूपये दे भी दिए गए। वहीं बाद में आरईएस विभाग को भी इसी कार्य की स्वीकृति मिल गई परन्तु आरईएस विभाग को 26 लाख की स्वीकृति मिली। 
    जलसंसाधन विभाग ने  काम की शुरूआत ही की होगी कि इसी बीच कांग्रेस नेता गुलाब कमरो ने डीएमएफ को लेकर कोर्ट पहुंचे। कोर्ट से फटकार और जांच के आदेश के बाद टेंडर निकाला गया।  जिसमें बाद जल संसाधन विभाग ने अपने 19 लाख की स्वीकृति को टेंडर में आने के बाद 17.64 लाख कर दिया। वहीं आरईएस ने टेंडर के लिए पहले एसी कार्यालय अम्बिकापुर भेजा जहां 4 लाख रू कम कर दिया गया, और 20 लाख लागत बताकर टेंडर जारी कर दिया गया। 
    दोनों विभाग के एक कार्य के लिए निकले टेंडर में ठेकेदारों ने  हिस्सा लिया।  टेंडर 40 प्रतिशत कम पर गया था। फिर इस कार्य को दोनों विभाग ने निरस्त कर दिया।  वहीं ठेकेदारों का कहना है कि जब विभागीय कार्य कर रहे थे तो कार्य की जरूरत थी और राशि भी काफी ज्यादा थी। 
    आखिर कम रेट में गुणवत्तायुक्त कैसे
    जानकारों का कहना है कि जिले में ओवर इस्टीमेट का खेल में शासकीय राशि में जमकर भ्रष्टाचार जारी है, ऐसा दोनों विभाग के एक ही कार्य में बनाए गए इस्टीमेट से साफ हो गया है। वहीं सरकारी रेट से 40 प्रतिशत कम पर कार्य में गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े हो गए हंै। जानकार बताते हैं कोई भी कार्य 40 प्रतिशत कम पर होने से यह तय है कि कुछ ना कुछ गड़बड़ी है। इस महंगाई के दौर में कम कीमत पर काम ठेकेदार तो वो सिर्फ दिखावे के लिए करेगा। सबसे बड़ा गड़बड़झाला ओवर इस्टीमेट का है, जिसकी जांच बेहद जरूरी है। 
    डीएमएफ में कोई देखने वाला नहीं
    जिला खनिज न्यास में स्वीकृत कार्यों की निगरानी के लिए कभी कोई अधिकारी दिलचस्पी नहीं दिखाते, क्योंकि ज्यादातर कार्य कोई ना कोई नेता या उससे जुड़ा कार्यकर्ता कर रहा है। ऐसे कार्यों की स्वीकृति से लेकर फायनल पेमेंट में सब कुछ सेट है, खनन प्रभावित क्षेत्र की ओर स्वीकृति में प्रशासन का ध्यान नहीं है, ऐसे में एक ही कार्य से दो-दो विभाग को एक ही कार्य स्वीकृत होते जा रहे हंै। 

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  • रजिंंदर खनूजा
    पिथौरा, 7 सितंबर (छत्तीसगढ़)। विज्ञान के इस जमाने में जहां सुरक्षा बल नक्सलियों से निपटने के लिए ड्रोन सहित अत्याधुनिक संसाधनों हथियारों का उपयोग कर रहे हैं। वहीं चौकी की सुरक्षा के लिए देशी जुगाड़ भी काम आ रहा है। यह तस्वीर है महासमुंद जिले की कोमाखान थानान्तर्गत टुहलु चौकी की। यहां सीआरपीएफ के जवानों ने नक्सलियों के अलावा जंगली जानवरों की आमद की सूचना पाने देशी जुगाड़ का इंतजाम किया है। चौकी के घेरे वाली तार में शराब की बोतलें इस तरह बांध दी हैं कि जब भी कोई इस सुरक्षा घेरे को छूता है, ये बोतलें आपस में टकरा कर बजने लगती हंै और उन्हें आमद की सूचना मिल जाती है।
    नक्सल क्षेत्रों में जवानों की सुरक्षा हेतु शासन द्वारा व्यापक प्रबन्ध करते हुए अत्याधुनिक तकनीक के उपकरण दिए जाते है जिससे जवानों को नक्सल गतिविधियों का पता चल सके परन्तु इस चौकी में अब भी जुगाड़ से ही जवान अपनी सुरक्षा करते दिखते हंै। टुहलु पुलिस चौकी तथा सीआरपीएफ  कैम्प  के चारों ओर सुरक्षा के लिए  लगे फैंसिंग तारों में  दारू की बोतलें बांध दी गई हंै।  रात के समय अगर कोई अवांछित तत्व या जंगली जीव जंतु सुरक्षा घेरे को फांदकर अंदर आने की कोशिश करेगा। ऐसी स्थिति में दारू की बोतल बज उठती है तथा जवानों को इसकी आवाज से तत्काल सूचना मिल जाती है जिससे वे सतर्क हो जाते हंै।
     बहरहाल नक्सल गतिविधि पर नजर रखने के लिए शासन ने कोमाखान टुहलु में सीआरपीएफ चौकी की स्थापना तो कर दी  है परंतु  यहां पदस्थ जवान नक्सलियों से ज्यादा अपनी दिनचर्या की जरूरी सामानों के लिए संघर्ष करते दिखते हैं।
    मिली जानकारी के अनुसार  सन 2015 में कोमाखान के आगे टुहलु तक नक्सली धमक के चलते इसे रोकने 24 जुलाई को पुलिस चौकी तथा सीआरपीएफ कैम्प खोला गया। वर्तमान में यहां के पुलिस चौकी में चौकी प्रभारी सहित कुल 14 स्टाफ तथा सीआरपीएफ के 65वीं बटालियन की जी कंपनी के लगभग 120 अधिकारी-जवान तैनात हंै। इन्ही जवानों के कंधों पर पुलिस चौकी क्षेेत्र के घोर नक्सल प्रभावित 29 गांव की  सुरक्षा की जिम्मेदारी है। 
    सुविधाओं के लिहाज से  सीआरपीएफ के जवानों को  सारी सुविधाएं उपलब्ध की जानी है परन्तु जरूरी सुविधाओं के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। पुलिस चौकी में इतने बड़े क्षेत्र की निगरानी के लिए अति आवश्यक  वाहन भी शासन द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया है। जवानों को  हर दिन पैदल ही  निगरानी करनी पड़ती है।  
    टुहलु पुलिस चौकी में सरकारी मेस  नहीं है जिससे निगरानी कर थके हारे  लौटे पुलिस जवानों को भोजन के नाम पर कभी कभी भूखे पेट भी सोना पड़ता है। या फिर खुद को खाना बनाना पड़ता है। खाने पीने से लेकर दैनिक उपयोग के सामानों के लिए 17 किमी दूर कोमाखान जाना पड़ता है।  
    आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए यहां  स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था नही है इसके लिए उन्हें कोमाखान  या 30 किमी दूर स्थित बागबाहरा स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ता है। घोर नक्सल क्षेत्र होने की वजह से इस चौकी में कोई स्थायी स्वास्थ्य कर्मी होना आवश्यक है। वहीं इस क्षेत्र में पेयजल का संकट सामने आया है। पेयजल हेतु कैम्प में 3 बोर कराए गए है जिसमें 2 बोर का पानी पीने लायक नही  है और 1 बोर चालू है जिसमें भी फ्लोराइड युक्त पानी  के कारण पीने योग्य नहीं है जिसके चले जवान कैम्प से बाहर पंचायत द्वारा कराए गए बोर से पानी लेकर अपनी प्यास बुझा रहे है।
    वहीं अपनी स्थापना से लेकर अभी तक पुलिस चौकी  टुहलु को बिजली के लिए आंशिक रूप से जनरेटर पर निर्भर रहना पड़ता है। कैम्प में विद्युत विभाग के खम्भे एवम तार नजर तो आते हंै लेकिन ट्रांसफॉर्मर न लगने के कारण आज भी पूरा कैम्प सिर्फ जनरेटर के भरोसे संचालित है।  

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  • तिहाड़ के बाद रायपुर साक्षरता में दूसरे नम्बर पर
    गंगा प्रसाद सिंह
    रायपुर, 5 सितंबर (छत्तीसगढ़)। केंद्रीय जेल रायपुर के बंदी वेदप्रकाश, बोधन यादव और कंचन घोष ने यहां आजीवन कारावास की सजा काटते हुए अर्थशास्त्र, गणित और इंग्लिश में पीजी कोर्स किया। ये बंदी अब जेल में  साथी बंदियों को पढ़ा रहे हैं। यहां स्कूल शिक्षा, कॉलेज और विभिन्न पाठ्यक्रमों में 803 बंदी अध्ययनरत हैं। तिहाड़ जेल दिल्ली के बाद रायपुर जेल में सबसे ज्यादा साक्षर बंदी हैं। साक्षरता में इस जेल का स्थान देशभर में दूसरे नम्बर पर है।
    जिन बंदियों के हाथ कभी खून से रंगे थे उन हाथों में अब कलम,  कापी और पुस्तक है। पिथौरा निवासी वेदप्रकाश ने यहां सजा काटने के दौरान अर्थशास्त्र में एमए किया। राजिम निवासी बोधन यादव ने गणित में एमएससी की है और बिलासपुर निवासी कंचन घोष इंग्लिश में एमए कर चुके हैं। ये तीनों बंदी हत्या के जुर्म आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। केंद्रीय जेल में अध्यापन प्रभारी एनआर नागतोड़े के साथ दूसरे बंदी भी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। 
    जेल के स्कूल में सुबह साढ़े 7 बजे राष्ट्रगान होता है। उसके बाद सस्तीवाचन, जिसमें संस्कृत के श्लोक पढ़े जाते हैं। 11 बजे तक बंदी अध्यापन कार्य करते हैं। इसके बाद भोजन अवकाश होता है। करीब एक घंटे बाद 12 बजे से फिर से पढ़ाई शुरू होती है, जो डेढ़ बजे तक चलती है। पढ़ाई करने के बाद बंदी जेल में दूसरे कार्यों में भी हाथ बटाते हैं। 
    बताया गया कि जेल में कॉलेज स्तर की पढ़ाई के लिए छत्तीसगढ़ कॉलेज के प्रो. यहां पढ़ाने आते हैं। वरिष्ठ आईएएस गणेश शंकर मिश्रा की पत्नी डॉ. प्रीति मिश्रा भी यहां बंदियों को पढ़ाने आती हैं। श्रीमती मिश्रा कॉलेज में समाजशास्त्र विभाग की प्रमुख है। जेल में पढ़ाई को लेकर बंदियों के बीच प्रतिस्पर्धा होने से अच्छे परिणाम आ रहे हैं।
    रायपुर जेल में प्रदेश की इकलौती संस्कृत पाठशाला है। वर्ष 2010 में  इसका शुभारंभ किया गया था। जहां संस्कृत के व्यावसायिक पाठ्यक्रम अंतर्गत योग, आयुर्वेद एवं वैदिक कर्मकाण्ड की शिक्षा बंदियों को दी जा रही है, ताकि जेल से रिहा होने के पश्चात बंदी समाज की मुख्य धारा से जुड़ सके। संस्कृत विद्या मंडलों के द्वारा अध्ययनरत बंदियों को प्रोत्साहित करने के लिए एक हजार और डेढ़ हजार की राशि दी जाती है। 
    केंद्रीय जेल रायपुर में सांकेतिक साक्षरता सेना का गठन किया गया है। इसके अंतर्गत प्रत्येक बैरक में दो प्रशिक्षित बंदी तैनात किए गए हैं। ये बंदी दूसरे बंदियों को पढ़ाई और ज्ञान अर्जन के लिए प्रेरित करते हैं। इन बंदियों को निरक्षर बंदियों की पहचान करने की जवाबदारी दी गई है। 
    केंद्रीय जेल अधीक्षक एवं उप महानिरीक्षक डॉ. के के गुप्ता ने बताया कि दिल्ली तिहाड़ जेल के बाद सबसे अधिक साक्षर बंदी रायपुर जेल में हैं। यहां के कई बंदी सजा काटते हुए पीजी कोर्स कर चुके हैं। अब यही बंदी साथी बंदियों को पढ़ा रहे हैं। इस समय जेल के ग्रंथालय में 6146 पुस्तकें हैं। दान ग्रंथालय में 1585, सामान्य ग्रंथालय में 2546 और उच्च शिक्षा ग्रंथालय में 2015 पुस्तकें हैं। 
    श्री गुप्ता ने बताया कि केंद्रीय जेल रायपुर में अध्ययनरत बंदियों की शिक्षा-उपलब्धियों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई दिल्ली में आयोजित कामन वेल्थ प्रोग्राम 2011 में शोध पत्र प्रस्तुत किया गया था। जेल के 62 बंदियों को अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित नेशनल पेंसिल ड्राइंग प्रतियोगिता 2010 में  पुरस्कृत किया गया। 

     

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  • बसना जनपद में अटल आवास योजना का हाल
    बृजलाल दास
    बसना, 4 सितंबर (छत्तीसगढ़)। बसना ब्लॉक में अटल आवास योजना का क्रियान्वयन किस तरह से हो रहा है। इसका नमूना ये दो तस्वीरें हैं। आवासहीन गरीबों के लिए बने इस योजना का लाभ वे भी उठा रहे हैं जिनके पास मकान है। खपरैल को हटाकर छत की ढलाई की गई है तो वहीं छत पर फिर से मकान बन रहा है। नियमानुसार न तो इन घरों का नक्शा बना और न ही अन्य प्रक्रियाओं का पालन किया  जा रहा है। इस संबंध में जनपद सीईओ आर के वर्मा का कहना है कि तीन में यदि एक दीवार खराब है तो इस तरह का निर्माण किया जा सकता है।  वहीं जिला पंचायत सीईओ पुष्पेन्द्र मीणा का कहना था कि यदि नियम विरुद्ध निर्माण किया गया है तो इसकी रिकवरी की जाएगी।
    पहली तस्वीर बसना जनपद के ग्राम जगत की है। हितग्राही हिंगलाबाई साव पति स्व. माधव साव ने अपने खपरैल वाले मकान की छानी निकाल दो तीन कतार र्इंट जोड़कर छत ढलवा लिया है। इस संबंध में जब सरपंच और सचिव से बात की गई तो उन्होंने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।
    दूसरी तस्वीर ग्राम छांदनपुर की है। हितग्राही गोविंद पिता रघुनाथ की खुद का किराना दुकान है। मकान सीमेंट की छतवाला है। मकान को देखकर ही पता चलता है कि वह गरीब नहीं है। सरपंच धरम सिंह और उपसरपंच महेन्द्र साव से जब इस संबंध में जानकारी चाही तो उनका कहना था कि वे इसकी शिकायत जनपद सीईओ से कर चुके हैं। उनका कहना था कि बनने दो, मकान बन तो रहा है न। जब  सीईओ आर के वर्मा  से इस संबंध में जानकारी चाही तो पहले कहा, घर आ जाओ बैठकर बात करते हैं।   उन्होंने इस संबंध कुछ भी जानकारी नहीं दी। जब जिला पंचायत सीईओ से इस निर्माण पर पूछा गया तो उनका कहना था कि ऐसे लोगों को इस तरह का लाभ नहीं मिलना चाहिए। 
    अटल आवास योजना को लेकर जब विधायक रुपकुमारी चौधरी से संपर्क किया गया तो वे उपलब्ध नहीं हो सकी। फोन पर उनके पति भाजपा नेता ओमप्रकाश चौधरी का कहना था कि इस तरह के निर्माण कार्यों की जांच होनी चाहिए। यदि नियमानुसार नहीं बना या फिर अपात्र हितग्राही को लाभ दिया गया तो कानूनी कार्रवाही होनी चाहिए। हितग्राही से रकम की वसूली होनी चाहिए।
    ज्ञात हो कि इस योजना के तहत गरीब ग्रामीणों को पक्का मकान बनाने के लिए 1 लाख 20 हजार की सहायता राशि दी जाती है। यह राशि उनके खाते में तीन किश्तों में दी जाती है। बसना जनपद के  कई पंचायतों में अपात्र हितग्राहियों को इसका लाभ दिए जाने की शिकायतें मिल रही हैं।

     

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  • अब खडग़वां के दर्जनों गांव प्रभावित, अब तक 3 मौतें
    चन्द्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर, 30 अगस्त (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले मे मलेरिया का प्रकोप लगातार बढ़ता जा  रहा है। बीते रविवार को एक तरफ प्रशासन प्रभारी मंत्री के स्वागत में जुटा रहा, ठीक उसी समय मलेरिया से 3 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में मिडिल स्कूल में अध्ययनरत एक छात्रा सहित दो अन्य ग्रामीण शामिल हैं। जिसमें एक 70 वर्ष का वृद्ध भी शामिल है। वहीं प्रभावित गांव के हर घर में दो से तीन लोग मलेरिया से पीडि़त हंैं। ग्रामीणों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी दवा के नाम पर  उगाही कर रहे हंै।  गरीब ग्रामीण किराना दुकान से खरीदकर हरी पन्नी की दवा खा रहे हंै। 
    क्षेत्र में बीमारियां फैलने की जानकारी मिलने के साथ  'छत्तीसगढ़Ó जब जिला मुख्यालय से लगभग 60 किमी दूर खडगवां जनपद पंचायत क्षेत्र के ग्राम मेंड्रा व आस पास के क्षेत्रों का जायजा लेने के लिए पहुंचा तो मेंड्रा सहित आसपास  के जुड़े गॉवों में  भारी संख्या में लोग मलेरिया बुखार, पीलिया, उल्टीृदस्त से पीडि़त मिले।
    कोरिया जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों सबसे ज्यादा मौसमी बीमारियों में मलेरिया का कहर टूट पड़ा है। प्रशासन की जानकारी के बाद उन इलाकों की देखरेख में भारी लापरवाही बरती जा रही है। सोनहत के बाद खडग़वां क्षेत्र के दर्जनों ग्राम इससे प्रभावित है। छत्तीसगढ़ जिले के अंतिम छोर से लगे ग्राम मेंड्रा पहुंचा, जहां के स्कूलपारा, घोबरापारा, पूर्वपारा, पटेलपारा, शिकटापारा, रोहिनापारा, जूनहापारा के हर घर में कोई न कोई ठंड देकर आ रहे मलेरिया बुखार से पीडि़त हैं, इससे जुड़े धवलपुर पेनारी, कोडा, नेवरी बेलबेहरा में भी मलेरिया, उल्टी दस्त के कई मरीज हंै। 
    यहां के सरपंच पति नारायण सिंह ने बताया कि बीते 27 अगस्त रविवार को शंकरलाल (50), मोहनसाय (70) के साथ एक 8वीं कक्षा की छात्रा की मंजू की मौत हो गई। मृतक मंजू को पहले मलेरिया हुआ, फिर टाइफाईड, पीलिया और फिर उसके सिर में मलेरिया के आ जाने से उसकी मौत हो गई, वहीं अन्य दोनों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, वहीं मृतक मंजू के चार भाई उसकी मां सोनकुंवर गंभीर है जिन्हें मनेन्द्रगढ़ ले जाया गया है। घर के कुछ सदस्य पड़ोसी के घर रह रहे हैं। इसके अलावा यहां के सूरज को मलेरिया के बाद पीलिया हो गया है।
    घोघराटोला के लालसाय, लक्ष्मण, सुखमन, देवनारायण, लीलावती, फूलकुंवर, एतवार सिंह के परिवार में रामलखन, स्कूलपारा के शिवकुमार, शांति, सोनकुंवर, संजय की पत्नी कौशल्या लडकी मंजू लडका दीपक भी मलेरिया से पीडित है। मेंड्रा में उपस्वास्थ्य केन्द्र है, जहां के बहुद्देशीय कार्यकर्ता इतवार सिंह को कहना है कि 27 अगस्त से बीमारी फैली है, वो हर दिन सर्वे कर रहे है। रविवार को मेंड्रा और धवलपुर में 24 लोग बुखार से पीडि़त पाए गए, 28 को 25 और 29 को 5 लोग बीमार पाए गए है, जबकि 'छत्तीसगढ़Ó  के साथ सरपंच पति नारायण सिंह ने ग्राम पंचायत का दौरा किया। जहां ग्रामीण हरी पन्नी की दवा के भरोसे है।  ग्रामीणों का कहना है कि दवा के लिए उन्हें 200 रू .देना पड़ता है, गरीब हर दिन 200 रू कहां से लाएगा। वहीं गांव के कई लोग झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करवा रहे हंै। 
    निजी अस्पताल में मिली राहत
    मेड्रा के रामनरेश के 13 वर्षीय पुत्र राजेश की मलेरिया से तबियत बिगड़ गई, उसका भाई कालिका बताता है कि रविवार को राजेश को पहले सलका प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया, हालत और बिगडऩे लगी तो सामुदायिक केन्द्र खडग़वां फोन किया, कई बार फोन पर आश्वासन देने के बाद मना कर दिया गया,  बताया गया कि गाडियों प्रभारी मंत्री के कार्यक्रम में है। उसके बाद जैसे तैसे खडग़वां लाए, वहां से जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया, फिर उसे जिला अस्पताल लाया गया। जहां सोमवार और मंगलवार को हालत सुधरने का नाम ही नहीं ले रही थी, बताया गया कि मलेरिया उसके सिर में चढ़ गया है। कोई देखने वाला नहीं थी, थक हार कर मंगलवार की शाम उसे निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां देर रात उसका बुखार भी उतर गया।
    ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास पर्याप्त दवाई नहीं
    ग्रामीण क्षेत्रों मेंं तैनात ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर उनसे सरकारी दवा के बारे में जानकारी ली गई तो हैरान करने वाली बातें सामने आई। ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने हमें बताया कि उनके पास कुछ ही सीमित मात्रा में दवाईयां बची हुई है। जो केवल दो चार मरीजों के लिए ही है साथ ही कई आवश्यक दवाई का भी अभाव बना हुआ है। जानकारी के अनुसार मलेरिया जांच की कीट भी कुछ मात्रा में 29 अगस्त को मिली।  

     उल्लेखनीय है कि जिले का खडग़वां जनपद पंचायत क्षेत्र मलेरिया के लिए खतरनाक जोन में शामिल है।  इसके बावजूद इस विकासखंड में दवाओं की उपलब्धता ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास हो यह सुनिश्चित नहीं की गई आखिर मैदानी स्वास्थ्य कार्यकर्ता बिना दवा व आवश्यक सामग्री के कैसे उपचार करेंगे निश्चित ही ग्रामीणों के मौत के लिए जिम्मेदार स्वास्थ्य विभाग ही है। 

     

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  • प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल
    वसुंधरा मोरयानी
    रायपुर, 28 अगस्त (छत्तीसगढ़)। ऑक्सीजन की कमी के चलते बच्चों की मौत के बाद भी प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अंबेडकर अस्पताल की व्यवस्था में सुधार नहीं हो रहा है। बदइंतजामी का हाल यह है कि   प्रसूति वार्ड में एक बिस्तर पर दो प्रसूताओं का इलाज किया जा रहा है। यही नहीं, उनके साथ नवजात शिशुओं को भी रखा गया है। चिकित्सकों का कहना है कि मरीजों की तुलना में बिस्तर की संख्या कम है, इसलिए ऐसी स्थिति अक्सर पैदा हो जाती है। 
    अंबेडकर अस्पताल में न सिर्फ रायपुर बल्कि आसपास के जिलों के मरीज भी उपचार के लिए आते हैं। यहां विशेषकर प्रसूति वार्ड में गरीब परिवार के लोग प्रसव के लिए आते हैं, लेकिन इन वार्डों की बदइंतजामी दूर होने का नाम नहीं ले रहीं है। पिछले दिनों ऑक्सीजन की कमी के चलते 4 बच्चों की मौत का मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है। अस्पताल की व्यवस्था को सुधारने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी बैठक ले चुके हैं, लेकिन यहां इसका कोई ठोस नतीजा निकलते नहीं दिख रहा है।
    बताया गया कि 11 सौ से ज्यादा बिस्तर वाले इस अस्पताल के  चार वार्ड डिलीवरी के लिए आरक्षित किए गए हैं। यहां वार्ड क्रमांक 3, 4, 5 और वार्ड 6 में सामान्य व ऑपरेशन से प्रसव करने वाली प्रसूताओं को भर्ती किया जाता है। इन वार्डों में मरीजों के हिसाब से बिस्तरों की संख्या काफी कम है। इसके चलते एक बिस्तर पर दो प्रसूताओं का इलाज हो रहा है। डिलीवरी के बाद नवजात शिशुओं को भी उन्हें अपने साथ रखना पड़ रहा है।
    चंगोरा भाटा की उषा देवांगन ने रविवार तड़के एक शिशु को जन्म दिया। प्रसव के बाद से उसे बुखार आ गया है। एक ही बिस्तर में दो प्रसूताएं होने के कारण उसे ठीक तरीके से आराम नहीं मिल पा रहा है। भनपुरी की ताकेश्वरी ने बताया कि 4 दिन पहले उसने एक पुत्र को जन्म दिया है। बिस्तर एक होने के कारण दोनों को ही आराम नहीं मिल पा रहा है और बच्चे भी रो रहे हैं। 
    वार्ड में भर्ती बालोद की रहने वाली अंजू यादव ने बताया कि 24 अगस्त को उसे एक बेटा की प्राप्ति हुई है। प्रसव के बाद उसे भी एक अन्य प्रसूता के साथ बिस्तर दिया गया है। बालाघाट की पुष्पा साहू, बीरगांव व प्रेमनगर से पहुंची प्रसूताओं का कहना है कि बिस्तर में जगह कम पडऩे के कारण नवजात शिशुओं को परिजनों के साथ जमीन पर भी सुलाना पड़ रहा है। इस संबंध में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण आयुक्त आर प्रसन्ना व अस्पताल अधीक्षक डॉ. विवेक चौधरी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया।

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  • देखते रहे लोग, 4 घंटे बाद पहुंची एंबुलेंस 

    सतीश चाण्डक 
    सुकमा, 23 अगस्त (छत्तीसगढ़)। सामाजिक बहिष्कार की यह एक ऐसी घटना है जिसमें प्रसव से तड़पती महिला को किसी ने मदद तक नहीं की। यहां तक कि उसे जन्म देने वाली मां ने भी। गांव के किनारे घने जंगल में चार घंटे तक गर्भवती दर्द से कहराती रही। उसे देखने के लिए गांव के लोग इकट्ठा हो गए, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। क्योंकि उसने गैरबिरादरी से प्रेम विवाह किया था। घटना की जानकारी मिलने पर वहां पहुंची आशा दीदी की मदद से उसने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। सूचना के 4 घंटे बाद एंबुलेंस पहुंची, उसके बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां पर मां बच्चों समेत स्वस्थ्य है। घटना सुकमा से सटे ओडिशा के मलकानगिरी जिले की है।
    सुकमा जिले से लगे सीमावर्ती ओडिशा के मलकानगिरी जिले के मथली ब्लॉक के केनडूगूड़ा गांव निवासी गर्भवती गोरी पुजारी सोमवार को किसी काम से गांव के समीप जंगल गई थी। उसी दौरान उसका पति तिरिलोचन पुजारी घर पर नहीं था। किसी काम से बाहर गया था। 
    जंगल में दोपहर करीब 12 बजे दर्द उठा। वो  बैठ गई और जोर-जोर से चिल्लाने लगी। उसकी आवाज सुनकर गांव के लोग जुटना  शुरू हो गए। वह पानी के लिए चिल्लाती रही लेकिन किसी ने मदद नहीं की। यहां तक कि वहां पहुंची उसे जन्म देने वाली मां ने भी।
    खबर मिलते ही गांव की आशा दीदी वहां पहुंची। उसने तत्काल अस्पताल फोन कर 102 एंबुलेंस को सूचना दी। महिला करीब चार घंटे तक यंू ही जंगल में दर्द  झेलती रही। पर उसने हिम्मत नहीं हारी और आशा दीदी की मदद से दो स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया। चार घंटे बाद एंबुलेंस  पहुंची और शाम करीब 5 बजे महिला को मथली अस्पताल में भर्ती कराया गया।  
    दूसरी बिरादरी से शादी इसलिए बहिष्कार 
    जानकारी के मुताबिक दो साल पहले महिला गोरी पुजारी जो कुमार (ओबीसी) जाति की है। और उसका पति तिरिलोचन पुजारी भूमिया (आदिवासी) है। इन दोनों ने प्रेम विवाह किया जिसके कारण गांववालों ने इनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। शादी के बाद दोनों उसी गांव में रहने लगे। लेकिन इनके घर गांव का कोई आता-जाता नहीं थी। सामाजिक मजबूरी के चलते पीडि़ता की मां मदद के लिए आगे नहीं बढ़ सकी।

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  • मन्नू चंदेल
    कवर्धा, 20 अगस्त। स्वच्छ भारत मिशन के तहत जहां लोग बकरी,गाय, जेवर,मोटरसायकल बेचकर, कर्ज लेकर शौचालय बनवाने के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं वही जिले के पेड्री पंचायत के आश्रित ग्राम बाघामुडा में शौचालय को सील करने का अनोखा मामला सामने आया है। एक ओर जहां देश भर में च्च्जहां सोच वहां शौचालयज्ज् की धारणा से काम किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कवर्धा जिले के बाघामुडा गांव में शौचालय को सील करना बड़ी लापरवाही मानी जा रही है। सबसे खास बात यह है कि कवर्धा ब्लाक ओडीएफ घोषित किया गया है । वहीं अब मामला उच्चाधिकारियों तक पहुंचने के बाद विवाद सुलझने तक सील तोड़कर शौचालय का उपयोग करने का आदेश दिया गया है। 
    प्रदेश को खुले में शौचमुक्त करने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर कवर्धा जिले के बाघामुडा गांव में जमीन विवाद के कारण ओडीएफ घोषित ब्लाक के अंतर्गत आने वाले गांव में शौचालय को ही सील लगा दिया गया है। दरअसल पूरा मामला यह है कि पेड्री पंचायत के आश्रित गांव बाघामुडा में जेठू श्रीवास विगत 25 साल से भी ज्यादा समय से अपने रिश्तेदार के साथ रहते है। उसकी कोई सन्तान नहीं है। पति-पत्नी ही रहते है।
    जेठू की माने तो 25 साल पहले ही जिस स्थान पर निवासरत है, ठीक सामने की जमीन को गांव के ही किसी व्यक्ति से 11 हजार में लिया था, लेकिन रजिस्ट्री नहीं कराई थी। इस बीच शौचालय अनिवार्य होने की दशा में कुछ माह पहले ही सरपंच द्वारा घर में शौचालय की अनिवार्यता बताई जिसके बाद घर के सामने वाले खाली हिस्से में शौचालय भी निर्माण करा दिया गया।
     इस बीच ग्रामीणों ने इस बात का विरोध किया कि जिस स्थान पर शौचालय निर्माण किया गया है वह शासकीय है जिसे दैहान के रूप में ग्रामीण उपयोग करते आ रहे है। शिकायत के आधार पर सप्ताह भर पहले ही जिला प्रशासन की टीम ने शौचालय  सील कर दिया। जिसके बाद से जेठूराम की दिक्कतें शुरू हो गई।
     बुजूर्ग होने के कारण जेठूराम भागदौड़ नहीं कर पाये न ही इस बात की शिकायत किसी प्रशासनिक अधिकारी से की। अब जेठू के परिवार वाले खुले में ही शौच जाते हंै। 
    आला अधिकारी भी है हैरान.......
    मामला सामने आने के बाद अब जिला पंचायत के आला अधिकारी भी हैरान है,तहसीलदार द्वारा टायलेट में सील लगाने की बात तो मान रहे है साथ ही ओडीएफ घोषित ब्लाक में इस प्रकार की कार्यवाई पर हैरानी जताते हुए, गांव के विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने की समझाइश ग्रामीणों को देने की बात कही जा रही है। साथ ही विवाद सुलझने तक शौचालय उपयोग करने के लिए खोलने का आदेश दिया गया है। 

    पेंड्रीकला पंचायत के ग्राम बाघामुडा में एक हितग्राही काफी समय से बेजा कब्जा किये थे, बेजा कब्जा में शौचालय बनाये थे, जिसे गांव वालों ने विरोध किये जिसे तहसीलदार द्वारा शौचालय सील किये जाने की बात सामने आई है। ग्राम पंचायत को कहा गया है प्राथमिक रूप से पंचायत को बात का हल करना चाहिए, हमारा जिला शौचमुक्त है ऐसे में तुरंत शौचालय तोड़कर शौचालय निर्माण करने कहा गया है। बेसकली गांव की समस्या को पंचायत में ही हल करने कहा गया है।
    एस एन भूरे, सीईओ जिला पंचायत कवर्धा

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  • बैकुंठपुर जनपद का कसरा पंचायत

    चन्द्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर, 20 अगस्त (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले में स्वच्छ भारत अभियान के तहत ओडीएफ घोषित करने की होड में शौचालय निर्माण में काफी लापरवाही बरती गई है। बैकुंठपुर जनपद मेें हालात यह है कि बिना उपयोग किए कुछ माह पूर्व बने शौचालय बारिश में अपने आप गिर रहे है, वहीं अधूरे निर्माण को लेकर ग्रामीणों में जबरजस्त नाराजगी है।  
    इस संबंध में जनपद पंचायत बैकुंठपुर के सीईओ अपूर्व टोप्पो का कहना है कि कुछ पंचायतों में सचिव की कार्यप्रणाली को लेकर कई शिकायतें मिली है, जिला पंचायत के सीईओ ने ऐसे सचिवों पर कार्यवाही के लिए कहा है, जल्द ही निर्माण में लापरवाही बरतने वालों पर कार्यवाही की जाएगी।
    जानकारी के अनुसार कोरिया जिलामुख्यालय बैकुंठपुर जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत कसरा के कई मोहल्लों में अभी भी पूरे लोगों के घरों में शौचालय का निर्माण कार्य नहीं कराया जा सका है जहांॅ कराया भी गया है तो वह या तो घटिया निर्माण कार्य हुआ है या फिर आधे अधूरे ही कार्य कराये गये हैं, कसरा पंचायत के शुरूआत में नागडोली मोहल्ले में करीब 20 से 25 घर ही है। यहां के ग्रामीणों ने बताया कि 1982 में यहां इंदिरा कालोनी बनाई गई थी, लोग इंदिरा आवास में रहते हैं। यहां कई परिवारों के यहां शौचालय का निर्माण कार्य अब तक नहीं कराया जा सका है। जिनका हुआ है उसकी छत नहीं बनाई गई है, जिसके कारण शौचालय कबाड़ बने हुए है। 
    शौचालय का सामान आकर बिखर चुका है। जिस कारण लोगों को खुले में ही शौच करने जाना पड़ता है। इसके अलावा कसरा पंचायत में हरिजनपारा में कई लोगों के  शौचालय  अधूरे हंै, यहां कई शौचालय जमीन में धंस रहे है तो कई गिर चुके हंै। कहीं पर शौचालय के उपरी हिस्से में सीट लगायी गयी है और नहीं कई शौचालयों में दरवाजे ही लगाये गये है ऐसी स्थिति में शौचालय का उपयोग नहीं हो रहा है। इस ग्राम पंचायत में शौचालय निर्माण कार्य मे जमकर अनियमितता बरती गई है। 
    शौचालय के ढक्कन बिखरे पड़े है
    ग्रामीणों की माने तो  ग्राम पंचायत कसरा में शौचालय निर्माण में मापदंडों का पालन नही किया गया। शौचालय निर्माण में नींव में गिट्टी की ढलाई नहीं की गयी, छत अधूरे पडे है। सोख्ता का निर्माण नहीं कराया गया है। गढ्ढे खोद दिये गये है और इसे ढकने के लिए दर्जनों की संख्या में सीमेंट की ढक्कन तैयार किये गये है जो निर्माण स्थल पर दर्जनों की संख्या में बिखरे पडे हुए है। इसी से इस गांव के शौचालयों की स्थिति का पता चल सकता है। शौचालय निर्माण में यहां की गयी अनियमितता की जॉच की जाये तो बड़ा घपला सामने उजागर हो सकता है। 
    हितग्राही स्वयं कार्य किये नहीं दी पारिश्रमिक
    ग्राम पंचायत कसरा के ग्रामीणों ने बताया कि जिन परिवारों के यहॉ शौचालय निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया उन परिवारों के सदस्यों को गढ्ढा खोदने को कहा गया। उन्होंने बताया कि शौचालय निर्माण में शौचालय के नीव व सोखता का गढ्ढा हितग्राही परिवार के द्वारा खोदा गया मिस़्त्री सिर्फ दीवार उठाने का कार्य किये उनके इस कार्य में हितग्राही परिवार पूरा सहयोग दिया लेकिन पारिश्रमिक हितग्राही परिवार को नहीं दिया गया जबकि मजदूरी की राशि निकाल ली गयी। इस तरह की शिकायत अनेक गांॅवों  की है।
    पत्नी सरपंच पति सचिव
    ग्राम पंचायत कसरा में पत्नी सरपंच है और सरपंच पति ही सचिव का कार्य देख रहे है। जिनके द्वारा पंचायत की विभिन्न योजनाओं में जमकर अनियमिता की जा रही है। जिसे लेकर ग्रामीणों में रोष व्याप्त है ।   शिकायत भी की जाती है लेकिन  किसी तरह की कार्यवाही नहीं होती।  ग्रामीणों के अनुसार इससे   सरपंच सचिव के हौसले बढ़े हुए हंै और जमकर मनमानी की जा रही है। 
    यहां नहीं होती है ग्राम सभा 
    ग्रामीणों की माने तो जनपद पंचायत बैकुंठपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत कसरा एक ऐसा पंचायत है जहां सालों से ग्राम सभा आयोजित नहीं हुई है। जबकि प्रत्येक पंचायत में माह में एक बार ग्राम सभा आयोजित करना अनिवार्य होता है लेकिन कसरा ग्राम पंचायत इसकी कोई परवाह नहीं करता। इस ग्राम पंचायत के कई लोगों ने बताया कि विभिन्न पेंशन योजनाओं के पा़त्र हितग्राहियों को लंबे समय से विभिन्न पेंशन योजनाओं के तहत राशि भी नहीं दी जा रही है।

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  • हुक्का-पानी बंद, कार्रवाई के बजाय राजीनामे का दबाव बना रही पुलिस 

    राजेश अग्रवाल
    बिलासपुर, 10 अगस्त (छत्तीसगढ़) । एक मजदूर महिला का पति तीन साल से लापता है। पुलिस उसे खोज निकालने में नाकाम रही है। समाज के लोगों ने पांच दिन पहले बैठक लेकर उससे चूड़ी उतारने और सिंदूर पोछने का फरमान दिया। महिला ने थाने में अगले ही दिन इसकी शिकायत की मगर अब तक आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की है, बल्कि कुछ रुपये लेकर उस पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। 

    मामला पचपेड़ी थाने ग्राम बिनौरी का है। पांच बच्चों के पिता चंद्रभान कुर्रे (40 साल) मानसिक तनाव के चलते तीन साल पहले गांव छोड़कर कहीं चला गया। आज तक उसका पता नहीं चला है। चंद्रभान की पत्नी गुलाबाबाई ने पुलिस में इसकी शिकायत की और अब तक वह अपने स्तर पर पति की खोजबीन कर रही है। बीते चार अगस्त को गांव के सतनामी समाज की बैठक हुई। इसमें महिला को बुलाकर कहा गया कि तुम्हारा पति इतने दिनों से नहीं लौटा है। यह निश्चित है कि उसकी मौत हो चुकी है। इसलिए अब वह गांव में विधवा की तरह रहे। महिला से उन्होंने अपना सिंदूर पोंछने और चूड़ी उतारने का फरमान दिया। जब महिला ने इसका विरोध किया तो शिकायत के अनुसार बैठक में पहुंचे संतोष सतनामी, भुवन, मालिकराम आदि ने उसके साथ गाली-गलौच भी किया। बैठक में महिला का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। महिला गुलाबाबाई अगले ही दिन पचपेड़ी थाना पहुंची और लिखित शिकायत दर्ज कराई। महिला ने बताया कि उसके घर के सामने मूत्र त्याग करने का उसने विरोध किया था, जिसके कारण आरोपियों ने उसके साथ झगड़ा किया था और सामाजिक बहिष्कार करने की धमकी देकर गए थे। रोजी-मजदूरी कर बच्चों का पेट पाल रही गुलाबा की आर्थिक स्थिति पहले से खराब है, अब गांव में मजदूरी नहीं मिलने के कारण उसे व उसके बच्चों के भूखों मरने की नौबत आ गई है। 
    शिकायत लेकर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टे महिला पर वह समझौते के लिए दबाव डाल रही है। महिला ने पुलिस की बात नहीं मानी है। उसने कहा कि समाज की बैठक में भला-बुरा कहा गया, उसके साथ भी गाली गलौच की गई। उसके सम्मान को ठेस पहुंची है, वह समझौता नहीं आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई चाहती है। 
    मामले ने कल जब तूल पकड़ा तब भी पुलिस का रवैया ढीला ही रहा। उसने गांव पहुंचकर मामले की जांच करने के बजाय पीडि़त महिला को ही थाने में बुलाया है। महिला ने बताया कि सफर के खर्च की व्यवस्था कर वह आज दोपहर बाद थाने जाएगी। 
    इधर थानेदार के डी प्रभाकर इस तरह की कोई शिकायत मिलने से ही इनकार कर रहे हैं। एसडीएम कीर्तिमान राठौर ने माना कि शिकायत की जानकारी मिली है। दोनों पक्षों को बुलाकर समझाइश देने के लिए थानेदार से कहा गया है। एडिशनल एस पी अर्चना झा के मुताबिक शिकायत पर जांच शुरू की गई है। गवाहों के बयान लिए जा रहे हैं। जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ अपराध दर्ज किया जाएगा। 

     

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  • कोंटावासी चिंतित, सर्वदलीय संघर्ष समिति के बैनर तले सभा
    सतीश चाण्डक 
    सुकमा, 9 अगस्त (छत्तीसगढ़)। पोलावरम बांध जिसका नाम सुनते ही कोंटावासियों के चेहरों पर चिंता की लकीरें खींच जाती हैं। विगत कई वर्षों से आन्ध्र प्रदेश में बन रहे पोलावरम बांध निर्माण कार्य को लेकर इलाके के जनप्रतिनिधि लड़ाई लड़ रहे हंै। छत्तीसगढ़ सरकार से भी कई बार यहां के लोगों ने मांग रखी लेकिन सरकार ने अपनी स्थिति अब तक स्पष्ट नहीं कर पाई। बताया जाता है कि राज्य सरकार ने बांध को लेकर कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। वहीं शासन की सर्वे टीम कोंटा पहुंची जिसे देखकर कोंटावासी चिंतित हंै। एक बार फिर आज कोंटा में सर्वदलीय संघर्ष समिति द्वारा जनसभा का आयोजन किया जा रहा है। 
    आन्ध्र प्रदेश में बन रहा पोलावरम बांध का निर्माण पिछले कई सालों से चल रहा है। बांध निर्माण से प्रदेश का अंतिम छोर पर बसा कोंटा पुरी तरह प्रभावित होगा। पूरे ब्लाक में दोरला जनजाति के कई गांव है जिस पर बांध का संकट गहराया हुआ है। इस बांध की उचाई कम करने के लिए कोंटा इलाके व सुकमा जिले के कई नेताओं ने सभाओं का आयोजन भी किया। और सरकार के समक्ष कई बार मांगे भी रखी। वहीं  ओडिशा  का भी कई हिस्सा डूबान में आ रहा है। 
    डूबान में आने के कारण करोड़ों का नुकसान होगा। क्योंकि कोंटा में सरकार द्वारा करोड़ों के विकास कार्य करवाए जा रहे है। इसके अलावा वहां रहने वालों के घर समेत खेत भी है जिससे उन लोगों का काफी नुकसान होगा। यहां तक कि हाल ही में करोड़ों की लागत से बनने वाली नेशनल हाईवे भी बाढ़ की चपेट में आएगा। 
    वहीं एक और जहा बांध निर्माण को लेकर जिले के जनप्रतिनिधि परेशान है ठीक दूसरी ओर सरकार अभी तक अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर पा रही है। जानकारी के मुताबिक प्रदेश सरकार ने बांध को लेकर कोर्ट में याचिका तब दायर की थी जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन जब एनडीए की सरकार आई तो राज्य सरकार चुप्पी साधे बैठी है। प्रदेश सरकार की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है कि सर्वे कराने में ही कई साल लग गए लेकिन सर्वे टीम अभी पहुंची। 
    भाजपा जिला अध्यक्ष मनोज देव ने चर्चा करते हुए बताया कि इस योजना में वनवासी हित सर्वप्रथम रखा जाऐंगा। चूंकि यह योजना कई दशको पुरानी है। उसके बावजूद केन्द्र व राज्य की सरकार इस योजना और कोंटावासियों को लेकर गंभीर है। ना कि प्रदेश सरकार बल्कि ओडिशा, आन्ध्र व तेलगांना की सरकारी अलग-अलग माध्यमों से सर्वे करा रही है। प्रदेश सरकार भी सर्वे करा रही है। जो जिले और कोंटावासियों के हित में होगा वही कार्य करेगी। वही प्रदेश सरकार भी कोंटावासी की चिंता कर रही है। 
    जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश कवासी ने चर्चा करते हुए कहा कि जब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी उसके बावजूद स्थानीय विधायक कवासी लखमा ने अपना विरोध दर्ज करवाया। क्योंकि क्षेत्र के जनता का हित सर्वोपरि है। पहले ऐस लग रहा था कि प्रदेश सरकार बांध के विरोध में है। लेकिन अब ऐसा नहीं लग रहा है। कांग्रेस पार्टी हमेशा से विरोध दर्ज कराते आई है। बांध की ऊंचाई को लेकर  मांगें प्रदेश सरकार व केन्द्र सरकार के समक्ष कई बार रखी गईं। वही उन्होंने बताया कि इसे  आजआदिवासी विश्व दिवस पर समाज के समक्ष रखा जाएगा। और कोंटा को डूबान से बचाने के लिए हर स्तर पर प्रयास किया जाएगा। सीपीआई नेता मनीष कुंजाम ने चर्चा करते हुए कहा कि अगर बांध बना तो कोंटा ब्लाक के साथ वहा की दोरला जनजाति, जल, जंगल व आदिवासी समुदाय को बहुत बड़ा नुकसान होगा। इस मामले को लेकर पहले राज्य सरकार ने याचिका दायर की थी। तब एक विश्वास था कि सरकार कुछ करेगी। लेकिन केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्रदेश सरकार का रवैया बदला है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में प्रदेश सरकार लगाई हुई याचिका वापस ले लेगी। लेकिन अब जिलेे के लोगों को एक साथ मिलकर यह लड़ाई लडऩी पड़ेगी। जरूरत पड़ी तो हर स्तर पर जाकर इस बांध का विरोध दर्ज कराया जाएगा।

     फैक्ट फाईल (एक रिर्पोट के मुताबिक)
    - पोलावरम अन्तर्राज्यीय परियोजना के लिए समझौते पर दस्तखत 7 अगस्त 1978 को अविभाजित मध्यप्रदेश की जनता पार्टी की सरकार ने किया था। उस समय मुख्यमंत्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा थे। इसके बाद रिवाईज समझौता 2 अप्रैल 1980 को किया गया। 
    - पोलावरम बांध के लिए हुए अन्तर्राज्जीय समझौते में अविभाजित मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) अविभाजित आन्ध्रप्रदेश (अब तेलगाना सीमांध्र) व ओडिशा राज्य शामिल है।
    - परियोजना का उदेश्य सिंचाई, विद्युत उत्पादन, कृष्णा कछार में जल व्यपवर्तन है। 
    -परियोजना सुकमा जिले की सीमा के नजदीक तेलांगना में गोदावरी बैराज से 42 किमी. उपर गोदावरी नदी पर निर्माणाधीन है। 
    - बांध का सम्पूर्ण जलग्रहण क्षेत्र 306643 वर्ग किलोमीटर और लम्बाई 2160 मीटर पक्का बांध सहित होगा।
    - एफआरएल 45.72 मीटर, कुल जलभराव 5511 मिलियन घन मीटर, डूबान क्षेत्र 63691 हेक्टेयर बांध से 297000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होगी। 
    - बांध से 970 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। 
    - छत्तीसगढ़ को 1.5 टीएमसी पानी मिलेगा पर बिजली में एक यूनिट की भी हिस्सेदारी नहीं मिलेगी। 
    - परियोजना की लागत 8 हजार करोड़ रूपए से अधिक हो चुकी है। 
    - डूबान में सुकमा जिले के कोंटा सहित 18 गांव और करीब आठ हजार हेक्टेयर भूमि के डूबान में जाने की आशंका है। नेशनल हाईवे 30 का करीब 13 किमी. हिस्सा डूबने का दावा किया जा रहा है। 
    - कोंटा तहसीलदार की रिर्पोट के अनुसार दोरला आदिवासी प्रभावित होंगे और इससे इनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा। 


    ग्राउंड लेबल की जीटीएस बेंच मार्ग निकलवा रही सरकार 
    पोलावरम बांध को लेकर प्रदेश सरकार शबरी के किनारे वाले इलाके का सर्वे करा रही है। कोंटा ब्लाक के आसपास करीब दस किमी. तक पहले वाटर लेबलिंग जीटीएस बेंच मार्ग फिक्स कर निकलवाई जा रही है। जो शबरी की ऊंचाई एवं निर्माणधीन बांध की ऊंचाई के आधार पर निकाली जा रही है। उसके बाद पानी की मात्रा वहां की उंचाई पर होगी ये बताया जा सकता है। यह सर्वे लगभग एक साल तक चलेगा। तीन माह तक पहला सर्वे चलेगा। उसके बाद आन्ध्र प्रदेश में निर्माणाधीन बांध के दायरे में आने वाले डूबान क्षेत्रों की सर्वेक्षण दल के साथ मिलकर रिपोर्ट तैयार होगी। उसके बाद ही पता चल पाएगा कि जिले का कितना क्षेत्र डूबान में आ रहा है।

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  • उत्तरा विदानी
    महासमुन्द, 8 अगस्त (छत्तीसगढ़)। छत्तीसगढ़ के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल द्वारा जमीन खरीदी बिक्री मामले में रोज नए-नए खुलासे होने लगे हैं।  कौंआझर निवासी गणेशिया बाई  के कलेक्टर को दिए बयान के बाद यहां के ग्रामीण मंत्री पर आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग करने लगे हैं। उनका कहना है कि जमीन खरीदने वाले तो प्रदेश के मंत्री हैं और सरकारी जमीन को महज 16 हजार रुपये में खरीदना आपराधिक मामला है और इस पर कार्रवाई होनी चाहिए। 
    ज्ञात हो कि कलेक्टर को दिए बयान में  गणेशिया बाई ने कहा है कि तबीयत खराब थी तो उसे अपनी जमीन को औने-पौने दाम में बेचनी पड़ी। उसके पिता को मिली लगभग डेढ़ एकड़ सरकारी जमीन को मंत्रीजी ने 16 हजार रुपये में खरीदा। 
    गांव वाले अब इस मामले में एकजुट हो रहे हैं और कहते हैं कि सरकारी जमीन को बेचने और खरीदने का हक किसी को नहीं है। इसे बेचने और खरीदाने वाले दोनों ही वाकिफ हैं और इसीलिए इस जमीन को खरीदते वक्त किसी ने भी कलेक्टर से अनुमति की जरूरत नहीं समझी। जलकी निवासी गेंद राम ध्रुव, गजानंद पटेल का कहना है कि महासमुन्द जिला शुरू से जमीन घोटाले को लेकर चर्चित रहा है। यदि इन मामलों की तह तक जाकर जांच हो तो कई नेता और मंत्री घेरे में आएंगे। 
    इस मामले में गणेशिया बाई के अलावा उनके बयान लेने वाले तमाम आला अफसर कुछ भी बोलने से परहेज कर रहे हैं लेकिन अब यह मामला केवल जमीन बेचने वाले और खरीदने वाले के बीच नहीं रह गया है जबकि उस क्षेत्र के ग्रामीणों के अलावा जिले भर के लोगों के लिए अहम मुद्दा बन गया है।
    गणेशिया बाई ने जो शपथ पत्र कलेक्टर को दी है, वह सोशल मीडिया में  घूम रहा है। इधर कलेक्टर सहित एसडीएम, तहसीलदार, ऐरीगेशन, वन विभाग ने चुप्पी नहीं तोड़ी है। वहीं  चौक-चौराहों पर इस वक्त यही मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।  
    गणेशिया बाई पिता धनसिंग सतनामी  के साथ ही  नाम न छापने की शर्त पर कौआझर के कुछ ग्रामीणों ने बताया कि गणेशिया के पिता को 0.57 हेक्टेयर मतलब लगभग डेढ़ एकड़ जमीन कृषि कार्य के लिए शासकीय पट्टे पर मिला था। गणेशियाबाई के पिता धनसिंग सतनामी ने कौंआझर निवासी हेमलाल दलाल के मार्फत कलेक्टर की बिना अनुमति के इस जमीन को बृजमोहन अग्रवाल को बेच दी थी।  इस मामले के लिए गणेशिया बाई को 22 मई 2017 को तहसील कार्यालय से नोटिस भी जारी की गई थी, जिसके जवाब में गणेशिया बाई ने कलेक्टर न्यायालय में 3 जुलाई 2017 को कलेक्टर न्यायालय में बयान दर्ज कराया था। वह अक्षरश: इस प्रकार है- ग्राम जलकी प.ह.नं. 05 रानिम पटेवा तहसील महासमुन्द में स्थित भूमि खं. नं. 809 रकबा 0.57 हेक्टेयर कृषि प्रयोजन के लिए शासकीय पट्टे पर प्रदत्त  की गई थी, जो कलेक्टर के बिना अनुमति के अंतरण के आयोग्य थी। आपके द्वारा छत्तीसगढ़ भू- राजस्व संहिता 1959 की धारा 165 (7-ख) का उल्लंघन कर बिना कलेक्टर की अनुमति प्राप्त किये आदित्य श्रीजन प्रा.लिमि के डायरेक्टर बृजमोहन अग्रवाल निवासी रामसागर पारा रायपुर के पास विक्रय किया था जो प्रथम दृष्टया विक्रय संहिता की धारा 165 (7-ख) का उल्लंघन है। मामले में 3 जुलाई 2017 को पेशी में उपस्थित होने कहा गया था। 
     तहसीलदार की नोटिस मिलने के बाद गणेशिया बाई  ने कलेक्टर न्यायालय में शपथ पत्र में कहा है कि उसके पिता धनसिंग को शासन से करीब 2 एकड़ जमीन मिली थी। जिसकी नोटिस मुझे प्राप्त हुई है। उक्त जमीन भर्री एवं दर्रा किस्म की है। मेरी तबीयत खराब होने के कारण मैंने इलाज के लिए उक्त जमीन को 16 हजार रुपये में कलेक्टर की बिना अनुमति बेच दी है जिसकी राशि मुझे रजिस्ट्री घर में मिली। मैंने स्वेच्छा से जमीन बेचा है। यदि शासन द्वारा इस जमीन का नामांतरण किया जाता है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। 
    गणेशिया कौंआझर में अपने बेटे, बहू और पोतों के साथ रहती है। बेटा मजदूरी करता है।  गणेशिया बाई का मायका जलकी में है। गांव वालों के मुताबिक उसके  पिता धनसिंग को कमाने खाने के लिए शासकीय पट्टे पर उक्त जमीन दशकों पहले मिली थी। पिता के गुजर जाने के बाद वह जमीन गणेशिया के कब्जे में रही। गणेशिया  बताती है कि आज से 6-7 सात पूर्व मेरी तबीयत खराब हुई तो जलकी निवासी हेमलाल मेरे पास आया और उक्त जमीन का सौदा मेरे साथ 16 हजार रुपये में हुआ था। 
    छत्तीसगढ़ ने हेमलाल का पक्ष लेने संपर्क की कोशिश की लेकिन नहीं हो सका। 

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  • 2014 से बंडल ज्यों के त्यों पड़े, अब शिक्षक-पालक ढूंढ रहे अपनी फाइलें 
    उत्तरा विदानी
    महासमुन्द, 3 अगस्त (छत्तीसगढ़)। राज्य शासन के निर्देश पर स्कूली बच्चों के जाति प्रमाण पत्र बनाने के काम को किस तरह किया जा रहा है, इसका ताजा उदाहरण महासमुन्द के तहसील कार्यालय में देखने को मिला। यहां 192 स्कूलों के लगभग एक लाख बच्चों का आवेदन कबाड़ की तरह पड़े हुए हैं। स्कूलों से मंगाई गई फाइलों का टैग भी खोला नहीं गया है। वर्ष 2014 से अब तक फाइलें धूल खाती हुई, गंदगी, चूहों और दीमकों के बीच पड़ी हुई हैं। इसका पता तब चला जब पालकों की शिकायत पर 'छत्तीसगढ़Ó वहां पहुंचा जहां बच्चों के जाति प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया चल रही थी।  
    जाति-प्रमाणपत्र बनाने का दायित्व जिस अधिकारी पर है उसका कहना था- मेरे सहयोगी नहीं है। अकेले यह काम नहीं संभलता, अपने अधिकारी को वाकिफ कराया था और स्टाफ की मांग की थी। 
    इधर कलेक्टर हिमशिखर गुप्ता  कहते हैं कि  इस विभाग से जानकारी दी गई है कि 28 हजार बच्चों को जाति प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं। बच्चों का जाति प्रमाणपत्र यदि रोका गया है तो शीघ्र ही जांच के बाद निर्देश कर जारी किया जाएगा। 
    महासमुन्द तहसील में शहर सहित विकास खंड के तमाम  192 स्कूलों के बच्चों का जाति प्रमाणपत्र बनने आवेदन पहुंचा है। वर्ष 2014 से अब तक तीन साल गुजर चुके हैं लेकिन प्रमाणपत्र बन ही नहीं  रहा है। वैसे  महासमुन्द कलेक्टर के हिसाब से पिछले साल 28 हजार बच्चों का जाति प्रमाणपत्र जारी हो चुका है लेकिन अब भी हजारों पालकों सहित शिक्षक भी इससे परेशान हैं। थक हारकर कई पालक अफसरों से गुहार लगाकर खाली हाथ जा चुके हैं लेकिन यहां पदस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों को फाइलें ही नहीं मिली। 
    तहसीलदार एसडीएम जैसे जिम्मेदार अधिकारी जवाब  देते हैं कि स्कूलों के तमाम बच्चों का जाति प्रमाणपत्र जारी हो चुका है। पालकों की शिकायत पर पालकों के साथ 'छत्तीसगढ़' सबसे पहले उन स्कूलों में पहुंचा जहां से बच्चों का आवेदन गया था। स्कूलों में किन-किन कक्षाओं के बच्चों ने कब-कब आवेदन किया है तथा उन आवेेदनों को कब तहसील में जमा किया है इसकी सूची मौजूद है। 
    उसी आधार पर तहसील स्थित लोक सेवा केन्द्र पहुंचने पर पता चला कि यह काम एसडीएम आफिस की एक मैडम करती हैं। पहले दिन दोपहर डेढ़ बजे थे तो मैडम लंच पर थी। पता चला वे शाम 4 बजे तक लौंटेंगी तो सारे पालक वापस घरों को लौट आये। दूसरे दिन भी मैडम एसडीएम के पास उनकी कुर्सी के पास खड़ी दफ्तर का काम निपटा रही थी। सो लंबे समय इंतजार के बाद भी उनसे मुलाकात नहीं हुई। 
    तीसरे दिन 5 स्कूलों ने अपने-अपने शिक्षकों को तैनात किया तो वे भी पालकों के साथ एसडीएम दफ्तर पहुंचे। मैडम ने बताया कि यह काम तहसीदार कक्ष के ऊपरी माले में हाल में चल रहा है। वहां पहुंचते डेढ़ बज चुका था और एक पुट्ठे पर लंच टाईम लिखकर दरवाजे पर टांग दिया गया था। लिहाजा सभी लौट आये। 
    चौथे दिन बेमुद्दत इंतजार के बाद उस कक्ष में एक अफसर दाखिल हुए। उन्होंने कहा कि कल आप लोग आ जाइये आपका काम हो जाएगा। पांचवें दिन सभी वापस वहीं पहुंचे तो साहब रजिस्टर खोलकर कुछ लिखने में व्यस्त थे। देखते ही बोले-वो फाइलें देख रहे हैं न, उसी में होगी आपके स्कूल की फाइलें, खुद देख लें। कुछ देर वे खुद भी साथ में तलाशते रहे। वहां फाइलों का अंबार पड़ा था। कई बंडलें तो खोली नहीं गई थी। सैकड़ों ऐसे प्रमाणपत्र थे जिसे बन जाने के बाद भी स्कूलों को जारी नहीं किया गया था। 
     पालकों तथा शिक्षकों को स्कूलों के नाम पते ढूंढते-ढूंढते शाम हो चली लेकिन उन्हें फाइलें नहीं मिली। छठवें दिन सारे पालकों और शिक्षकों को फाइलें ढूंढने के कार्य में लगाकर साहब अंदर बाहर होते रहे और दिन भर फाइलें ढूंढने के बाद महज एक-दो स्कूलों की फाइलें मिली तो साहब का फरमान हुआ कि अपने स्कूल के बच्चों के लिए जो फार्मेट में दे रहा हूं उसे  भरें फिर हफ्ते 10 दिन बाद जाति प्रमाण पत्र जारी होगा। बहरहाल दो चार स्कूलों के शिक्षक और पालक खुद जमीन पर बैठकर कबाड़ से अपने बच्चों के जाति आय प्रमाण पत्र के आवेदन निकाल रहे हैं। 
    जिले के तत्कालीन कलेक्टर ने एक मुहिम चलाकर जिले के तमाम स्कूली बच्चों के जाति प्रमाणपत्र बनवाने के निर्देश अपने मातहत अधिकारियों को दिये थे। कलेक्टर के आदेश पाते ही तमाम स्कूलों ने अपने विद्यार्थियों से आवेदन भरकर मंगाये थे। हो सकता है उनमें खामियां भी रही हों लेकिन विभाग ने न तो स्कूल को इसकी जानकारी दी और न ही पालकों को। अत: पालक रोज स्कूल का चक्कर लगाने लगे तो पांच छ: स्कूल ने खुद ही इसमें रुचि ली और तब जाकर पता चला कि उनके स्कूल से पहुंची फाइलें किस तरह पड़ी हुई हैं। 
    महासमुन्द तहसील से वर्ष 2015-16 में 94 हजार 6 सौ आवेदनों के विरूध्द 28 हजार बच्चों का जाति प्रमाणपत्र जारी किया गया।  एसडीएम, तहसीलदार कह रहे हंै कि जिन स्कूलों से आवेदन आये हैं, सभी को प्रमाणपत्र जारी हो चुका है। उन स्कूलों के जिन बच्चों को प्रमाणपत्र जारी नहीं किया है पर कहते हैं कि बाकियों का तभी बनेगा जब शिक्षक और पालक यहां आकर फाइलें ढूंढे और प्रमाणपत्र पर खाली पड़े स्थान को भरें। 

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  • रोज नई जानकारियां भाजपा के नेता हक्काबक्का, हैरान

    छत्तीसगढ़ संवाददाता
    रायपुर, 31 जुलाई। सरकार के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल अपनी पत्नी और पुत्र के फार्महाऊस की जमीन मामले में घिरते जा रहे हैं। यह प्रकरण राजनीति से परे राजस्व, वन और जल संसाधन विभाग की जमीन रिकॉर्ड से जुड़ा है, जिसका खंडन नहीं हो सकता है। श्री अग्रवाल के परिजनों की जमीन खरीद में एक के बाद एक अनियमितता के खुलासे के बाद के भाजपा के भीतर गहरी निराशा है और पार्टी नेता इस मामले में खुलकर कुछ कहने से बच रहे हैं। 
    महासमुंद जिले के पर्यटन स्थल सिरपुर के समीप ग्राम जलकी में कृषि मंत्री श्री अग्रवाल की पत्नी श्रीमती सरिता अग्रवाल और पुत्र अभिषेक अग्रवाल के फार्महाऊस और रिसॉर्ट की जमीन को लेकर विवाद गहरा रहा है। रिसॉर्ट की करीब 10 एकड़ की जमीन जल संसाधन विभाग की मिल्कियत रही है, जिसे बाद में विभाग ने वृक्षा रोपण के लिए वन विभाग को दे दिया था। इस जमीन को स्थानीय किसान विष्णु साहू ने पहले दान दिया और राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण नहीं होने का फायदा उठाकर उसने कृषि मंत्री की पत्नी व पुत्र को बेच दिया। मामले के खुलासे के बाद जमीन वापसी के लिए जद्दोजहद चल रही है। 
    महासमुंद कलेक्टर हिमशिखर गुप्ता ने इसको लेकर वन-राजस्व और जल संसाधन के विभाग के अधिकारियों की टीम बनाई थी। टीम ने अपनी रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया कि जमीन वापस लेने के लिए नामांतरण आदि की कार्रवाई करनी होगी। समिति के सदस्य और डीएफओ आलोक तिवारी ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में कहा कि जल संसाधन विभाग को ही नामांतरण आदि के लिए कार्रवाई करनी होगी। इसके बाद ही वन विभाग का विषय आएगा।
    जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता पीके आनंद ने इस सिलसिले में राज्य शासन से मार्गदर्शन मांगा है। विभाग से जुड़े एक अफसर के मुताबिक जमीन वापसी के लिए विधिक परामर्श लिया जा रहा है। इसके बाद ही सिविल न्यायालय में वाद दायर करने की कार्रवाई की जाएगी। चूंकि विभाग के मुखिया खुद बृजमोहन अग्रवाल हैं, इसलिए कार्रवाई को लेकर विभागीय अफसर असमंजस में हैं। रिसॉर्ट की जमीन से परे फार्महाऊस की जमीन को लेकर भी एक नया विवाद सामने आया है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक फार्म हाऊस की करीब 13.9 हेक्टेयर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया गया है। इस जमीन पर कब्जा आदित्य सृजन प्रायवेट लिमिटेड की है। इस कंपनी के डायरेक्टर कृषि मंत्री की पत्नी श्रीमती सरिता अग्रवाल और अभिषेक अग्रवाल हैं।
    यह भी बताया गया कि राजस्व विभाग ने जमीन वापसी के लिए प्रयासरत है। सरकारी जमीन के 15 टुकड़े हैं और कब्जा हटाने के लिए कंपनी के डायरेक्टरों को नोटिस जारी की गई थी। कंपनी की तरफ से दो कर्मचारी तहसीलदार की अदालत में पेश भी हुए। उन्होंने जमीन की अदला-बदली का प्रस्ताव दिया है। लेकिन जमीन की अदला-बदली नहीं हो सकती है। वजह यह है कि सरकारी जमीन के 9 टुकड़े में छोटे और बड़े झाड़ के जंगल हैं, जिसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। 
    सरकारी जमीन से परे आदिवासियों के पट्टे की जमीन की खरीद का विवाद भी चल रहा है। यह मामला कलेक्टर के अदालत में हैं। तत्कालीन कलेक्टर उमेश अग्रवाल ने अपनी रिपोर्ट में यह उल्लेखित किया है कि उक्त जमीन की आदिवासियों की जमीन खरीदने से पहले कलेक्टर की अनुमति नहीं ली गई। यह एक और मामला गंभीर हो चला है। 
    कुल मिलाकर राजस्व, वन विभाग और जल संसाधन विभाग से जुड़े जमीनों के अलग-अलग मामले के चलते कृषि मंत्री श्री अग्रवाल की मुश्किल कम नहीं हो रही है और मंगलवार से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में यह मामला गर्माने के आसार हैं। 
    कल से विधानसभा, भाजपा बैकफुट में आई
    कुछ दिन पहले तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के परिजनों की जमीन गड़बड़ी पर मामले पर भाजपा ने चौतरफा हमला बोला था और आने वाले दिनों में इसे जोर-शोर से उठाने की तैयारी की थी। लेकिन कृषि मंत्री के परिजनों की जमीन खरीदी में अनियमितता का मामला सामने आने पर भाजपा नेताओं में बेचैनी है। पार्टी नेता सीधे तौर पर इस मामले में कुछ भी कहने से बच रहे हैं। 
    प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में कहा कि कृषि मंत्री ने जमीन खरीदी में किसी तरह की गड़बड़ी से इंकार किया है और उन्होंने प्रेस को दस्तावेज भी दिखाएं हैं। जमीन से जुड़े और किसी तरह के विवाद की जानकारी उन्हें नहीं है। उनकी कृषि मंत्री से चर्चा भी हुई थी। वे अभी प्रदेश से बाहर हैं और नए विवाद की उन्हें कोई जानकारी नहीं है। इस मामले में श्री अग्रवाल ही स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।   

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  • पखवाड़े भर में 3 आदिवासी मौतें, कई बीमार
    चंद्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर, 28 जुलाई (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के रामगढ़ क्षेत्र के  वनांचल  में मलेरिया और उल्टी-दस्त का जबरदस्त प्रकोप है।  हर घर में कोई ना कोई पीडि़त है। बीते 15 दिनों में मलेरिया, उल्टी-दस्त से तीन आदिवासियों की मौत हो गई इनमेें दो बच्चे और एक बुजुर्ग शामिल हैं। इन सभी को समय पर उचित स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाई। इन गांवों तक भले ही सरकारी चिकित्सक व स्वास्थ्य कर्मी नहीं जा पाते हों, लेकिन झोलाछाप चिकित्सक घर पहुंच सेवा दे रहे हैं। उधारी सहित मुर्गा, बकरा लेकर भी इलाज कर रहे हंै। यहां के ग्रामीणों ने स्वास्थ्य शिविर लगाने की मांग की है। 
    इधर रामगढ़  प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बस रिफर सेेंटर बना हुआ है। केन्द्र में पदस्थ आरएमए गौतम वर्मा का कहना है वे लगातार कैम्प लगा रहे हंै। बीते दो दिन से पानी गिरने के कारण कैंप नहीं कर पाए हंै। क्षेत्र में बुखार, उल्टी-दस्त फैला है। यहां पर्याप्त दवा है।  एम्बुलेंस के टायर खराब हंै, मांग भेजी गई है। सरकारी काम है, समय तो लगता है। सुबह भर्ती एक गंभीर मरीज के सावल पर कहा कि  वो मेरी दवा से ठीक नहीं हो रही थी इसलिए सोनहत रेफर कर दिया। 
    सामान्य दिनों में मुश्किल से पहुंचे जाने वाले सोनहत जनपद क्षेत्र के ग्राम कुर्थी में नदी-नालों को पार करते 'छत्तीसगढ़' ने पहुंचकर हालात का जायजा लिया। इस गांव में लगभग प्रत्येक घर में मलेरिया, उल्टी-दस्त के मरीज होने की जानकारी मिली। यहां के लोगों को इलाज के लिए रामगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाना पड़ता है। बरसात में एम्बुलेंस की सुविधा नहीं मिल पाती है। मरीजों के परिजनों को अपने साधनों से मरीजों को लंबी दूरी ढोकर ले जाना पड़ता है। 
    इस क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य सेवा इन दिनों पूरी तरह से बंद है सिर्फ झोलाछाप चिकित्सक की आवाजाही है। जो क्षेत्र  उपचार के नाम पर जान से  खिलवाड़ कर रहे हंै। क्षेत्र का प्रमुख प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वाहन सिर्फ स्टाफ के लिए ठीक है  मरीजों के लिए बिगड़ा हुआ है। प्राय: हर मरीज को जांचकर तत्काल रेफर कर दिया जाता है। 
    रामगढ़ में पदस्थ आरएमए के कैंप लगाने के दावों को ग्रामीण खारिज करते हैं, ग्रामीण बताते हंै कि कैम्प नहीं लग रहे हंै। रामगढ़ में आरएमए सिर्फ रेफर कर देते हैं, ऐसे में जिले के डॉक्टरों को यहां आकर इलाज करना चाहिए। 
    27 जुलाई की दोपहर जब 'छत्तीसगढ़Ó रामगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचा तो वहां आए 22 मरीजों की जांच में 20 मलेरिया से पीडि़त पाए गए। पदस्थ आरएमए की मानें तो बीते 15 दिनों में 43 मरीज मलेरिया पीएफ और 11 मरीज पीवी के पाए गए हंै। यहां से अधिकतर को रेफर ही कर दिया जाता है। गुरुवार को एक भी मरीज  भर्ती नहीं मिला। ज्ञात हो कि रामगढ़ से लगे आसपास के 20 गांवों में उल्टी-दस्त के साथ बुखार की शिकायत है। 
    दो बच्चों सहित एक ग्रामीण की मौत 
    कुर्थी में ग्रामीणों ने बताया कि गांव के मुखिया सोमारू की मलेरिया से 15 दिन पहले मौत हो गई। परिजनों ने बताया कि झोलाछाप चिकित्सक द्वारा उपचार किया जा रहा था और बुखार ज्यादा बढ़ गया था इस कारण दोनों हाथ व पैर में ड्रिप लगाया गया था। इसी दौरान उसकी मौत हो गई। डॉक्टर  बोतल निकाले बिना तीन हजार रुपये भी ले गए।  
    इसी गांव में हिंगलाल नामक ग्रामीण का बेटा चरण साय जो कि मलेरिया से पीडि़त था उसकी 22 जुलाई को मौत हो गई। इसके तीन और बच्चे बुखार से पीडि़त हैं। जिन्हें लेकर रविवार को जिला अस्पताल बैकुंठपुर आया था।  ठीक नहीं होता देखकर मंगलवार को चला गया। नटवाही में अपने बच्चे को कंधे में ढोकर गया वहां झाडफ़ूंक करवाकर गुरूवार को गांव लौट रहा था। 
    हिंगलाल की पत्नी भगमनियां भी पीडि़त है। गांव के हीरालाल, विजय लाल, कृष्ण कुमार, शांति बाई को भी मलेरिया बुखार है। 
    ग्राम कुर्थी के आश्रित मोहल्ला बाकीशेर में तुलसी नामक व्यक्ति विगत 15 दिनों से मलेरिया बुखार से जूझ रहा है। इस तरह कुर्थी के लगभग प्रत्येक घर में बुखार, उल्टी-दस्त के मरीज मिले। 
    इसके अलावा धनपुर ग्राम में भी दर्जनों लोग पीडि़त हंै। उल्टी-दस्त से लखपति नामक ग्रामीण की दो वर्षीया बच्ची की मौत 25 जुलाई को हो गई। यहां के ग्रामीण शत्रुघन का कहना है कि धनपुर के हर घर में लोग उल्टी दस्त और बुखार से पीडि़त है, बड़े कैम्प की सख्त जरूरत है। 
    मितानिन बांट रही किट, पर दवाएं नहीं
    रामगढ़ वनांचल के दुर्गम गांवों में  पदस्थ मितानिनों के पास मलेरिया किट है जो घर-घर बांट रही है, सभी में मलेरिया निकल रहा है, परन्तु वे मितानिन द्वारा दी गई पैरोसिटामाल दवा ही खा रहे हंै। एक ग्रामीण ने किट दिखाकर बताया कि उसके बच्चे को मलेरिया है। उसके पास इस दवा का ही सहारा है। ज्ञात हो कि रामगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक जाने में उन्हें 20 किमी पैदल दो नदियां पार करके पहुंचना होगा।  वहीं लगातार बारिश से उफनती नदियों को पार करना मुश्किल है। 
    गांव नहीं पहुंच रहा अमला
    उल्लेखनीय है कि बीते तीन माह से कलेक्टर द्वारा हर मैदानी अमले की बैठक जिला मुख्यालय बैकुंठपुर में ली जा रही है। बैठक में निर्देश के बाद भी अमला मुख्यालय में नहीं रहता है। जिला प्रशासन के अधिकारी कार्यालय में ना रहकर गांव-गांव निरीक्षण का दावा कर रहे हंै  जबकि दूरस्थ क्षेत्रों में अधिकारी कर्मचारी पहुंच नहीं रहे हंै। 
    कलेक्टर पहुंचे रामगढ़
    जि़ला कलेक्टर नरेंद्र दुग्गा आज दोपहर12 बजे रामगढ़ पहुंचे, वे रामगढ़ के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गए और वहाँ के स्टाफ से मिले और उन्हें कोई भी परेशानी होने पर उन्हें बताने को कहा। उन्होंने हर संभव मदद का आश्वासन दिया। बमुश्किल 10 मिनट उनका काफिला वहां रुका और वापस बैकुंठपुर की ओर चला गया।

     

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