विशेष रिपोर्ट

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Posted Date : 18-Nov-2017
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    बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    लौहण्डीगुड़ा के निकट बेनियापाल का मैदान दो बड़ी घटनाओं का साक्षी है। नाग राजा हरिश्चंद्र देव और अन्नमदेव के बीच युद्ध इसी मैदान में हुआ था तथा वर्ष 1961 के विभत्स्य गोलीकाण्ड का भी यह गवाह रहा है। नाग शासक सोमेश्वर देव निर्मित नारायणपाल का मंदिर, इसी क्षेत्र में एक खेत से हाल ही में प्राप्त ऋषभदेव की भव्य प्रतिमा, नारंगी और इन्द्रावती नदियों का रम्य संगम और फिर शांत इन्द्रावती एकाएक निर्झर हो जाती है जिसे आज चित्रकोट जलप्रपात के नाम से हम जानते हैं, यह सब कुछ एक आदर्श राजधानी की ओर इशारा करता है। सर्पाकार बहती हुई इन्द्रावती नदी तीन ओर से चक्रकोट दुर्ग को सुरक्षा प्रदान करती प्रतीत होती है तथा एक ओर विस्तृत मैदान समृद्ध नगर के लिये आदर्श था। 
    चित्रकोट जलप्रपात के ठीक सामने ही सड़क के दूसरी ओर लगभग दो सौ मीटर भीतर जाने पर नागकालीन प्राचीन शिवमंदिर के अवशेष प्राप्त होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इतना विशालकाय शिवलिंग मेरी नजर में सम्पूर्ण बस्तर में दूसरा नहीं है। चित्रकोट के साथ से ही लगे कच्चे रास्ते पर उतर कर कुछ ही आगे बढऩे पर राजा हरिश्चंद्रदेव के किले के अवशेष देखे जा सकते है। किले का अधिकतम भाग अब नष्ट हो गया है। पत्थरों से निर्मित किले की दीवार का केवल एक भाग अब देखा जा सकता है और वह भी इसी लिये बच गया है चूंकि विशालकाय वृक्ष ने उसे अपनी पनाह दी हुई है।
     बस्तर में भी जो जानकारी प्राप्त होती है उनके अनुसार मिट्टी और पत्थर से किले की बाहरी दीवार का निर्माण किया जाता था। लौहण्डीगुड़ा के निकट अवस्थित नाग युगीन (राजा हरिश्चन्द्र देव के किले की बाहरी दीवार) अवशेष देख कर यह बात और मजबूती से मेरे मन में घर कर गयी थी कि बस्तर में ठोस और पक्के दुर्ग संभवत: इसलिये नहीं बनाये गये चूंकि यहाँ का भूगोल ही सुरक्षा और संरक्षण के लिये पर्याप्त था। 
    नारायणपाल से आगे बढऩे पर रास्ता कुरुषपाल गाँव की ओर जाता है। इसी गाँव में प्राचीन ऋषभदेव की भव्य प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस ऐतिहासिक महत्व की प्रतिमा का संरक्षण वही ग्रामीण कर रहा है जिसके खेत से प्रतिमा प्राप्त हुई है। 
    स्थानीय जैन समाज की सहायता से यहाँ एक छोटा मंदिर भी निर्मित कर दिया गया है। अत: इतना तो कहा ही जा सकता है कि यह महत्वपूर्ण प्रतिमा बचा ली गई है। जैसा कि हर आदिवासी गाँव होता है आपको कुरुषपाल में भी वैसी ही नैसर्गिक शांति तथा सहजता प्राप्त होगी। मुख्य ध्यान मेरा यहाँ की दीवारों ने खींचा। एक घर को दूसरे से अलग करने वाली दीवारें मोटी मोटी तथा पत्थर से निर्मित हैं जिसमे कि सीमेंटिंग मटेरियल लगा है - मिट्टी। यदि किले की दीवार और इन घरों की चार-दीवारों की तुलना की जाये तो जबरदस्त साम्यता देखने को मिलती है। 
    बदलती हुई जीवनशैली के साथ आवश्यकता ही नहीं कि इतनी मोटी मोटी चारदीवारी बनायी जायें, आज यह भी आवश्यकता नहीं कि महीनों का श्रम कर समान आकार के पत्थरों को चुन-चुन कर जोड़ा जाये; सीधे बाँस की बाडिय़ों से घेर कर भी काम चलाया जा सकता है अथवा ईंटों से चारदीवारी खड़ी की जा सकती है। ये चारदीवारियाँ परम्परागत हैं। 
    ये चाददीवारियाँ वर्तमान भी हैं और इतिहास भी। जिन्हें जानना है कि सात सौ साल शासन करने के बाद नाग कहाँ गये वे यहाँ आकर अवलोकन तो करें, परत दर परत, दृश्य दर दृश्य एक बीता हुआ युग वर्तमान में ही आकार लेने लगेगा और इसके लिये किसी मुद्रा को खोजना नहीं है कोई शिला नहीं बूझनी है।

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Posted Date : 17-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    1910 के भूमकाल के बाद बस्तर में अंग्रेजों तथा राजा को एक मजबूत राजमहल की आवश्यकता महसूस होने लगी। इससे पहले के दौर में राजमहल की दीवारे लकड़ी और मिट्टी की तथा छत खपरैल से निर्मित हुआ करती थी। राजा रुद्रप्रताप देव के समय में राजमहल का निर्माण आरंभ हुआ। महल के साथ लगे लम्बे-चौड़े प्रांगण को घिरवा कर ईँटों की ऊँची दीवार से किलेबदी की गयी। दक्षिण दिशा की ओर इस किले का मुख्यद्वार बनवाया गया। दोनों ओर विशाल सिंह की आकृतियाँ निर्मित की गयी जिसके कारण मुख्यद्वार का नाम सिंहद्वार पड़ गया। सिंहद्वार से लग कर ही प्राचीन दंतेश्वरी माता का मंदिर अवस्थित है। राजमहल परिसर की चार दीवारी की सभी दिशाओं में प्रवेश द्वार बनवाये गये। मुख्यद्वार अर्थात सिंह द्वार से लग कर पूर्व की ओर रियासत की कचहरी के लिये कक्ष निर्मित थे। परम्परागत काष्ठ और पत्थरों से बने राजमहल के स्थान पर राजा ने भव्य मोतीमहल का निर्माण करवाया जो पूर्वाभिमुख था। भूतल पर दरबार हॉल निर्मित किया गया। दरबार-हॉल को अस्त्र शस्त्रों और चित्रों से सुसज्जित किया गया। 
    महल के सामने, बागीचे में अनेकों जलकुण्डों का निर्माण किया गया जिसमें एक समय सुनहरी और लाल मछलिया डाली गयीं थीं। उद्यान को आधुनिकता देने के लिये वहाँ एक सुन्दर युवती की मूर्ति स्थापित की गयी थी जिसके घड़े से निरंतर जल गिरता रहता था। महल की पूर्व दिशा में हिरण और सांभरों को रखने के लिये लोहे के बाड़े से घेर कर जगह बनायी गयी थी। स्थान-स्थान पर सीमेंट से बनाये गये जलकुण्ड थे जिनमें जानवरों के पीने के लिये पानी का निरंतर प्रवाह रखा जाता था। हाथीसाल, घुड़साल, बग्घियों को रखने के स्थल आदि का निर्माण महल परिधि में ही किया गया था। अहाते के भीतर महल प्रबंधक तथा महल सुप्रिंटेंडेट के आवास बनवाये गये। महल की दीवारों से लग कर कई आउट हाउस थे, जिसमें राजकीय कर्मचारी रहा करते थे। राजा ने अपनी प्रतिष्ठा तथा शौर्य प्रदर्शन के लिये बाघ पाला था, जिसे महल के सम्मुख पिंजरे में रखा जाता था। 
    महारानी प्रफुल्ला ने भी अपने समय में राजमहल की संरचना में कई बदलाव किये। पिता के बनवाये महल से जोड़ कर अपने रहने के लिये आधुनिक सुविधाओं से युक्त नया महल बनवाया। इस महल के भूतल में बिलियर्ड्स हॉल बनवाया गया। महल के उत्तरी दरवाज़े से लगा कक्ष डॉल हाउस था, जिसमें राजकुमार-राजकुमारियों के खिलौने रखे हुए थे। नये महल से लगा हुआ ही एक बगीचा निर्मित किया गया था, जिसकी विशेषता थी - बारहमासी आम के अनेकों पेड़। राजधानी में महारानी की कोशिशों ने एक बड़े अस्पताल को स्वरूप लेने दिया जिसे महारानी अस्पताल के नाम से आज भी जाना जाता है। इस अस्पताल के मुख्यद्वार पर महारानी फ्रफुल्ल कुमारी देवी की मूर्ति स्थापित की गयी है। आज राजमहल का केवल एक कक्ष ही दर्शनार्थियों के लिये खुला है जिसमें दीवारों पर महाराजा, भैरमदेव, रुद्रप्रताप देव, प्रवीरचन्द्र भंजदेव, दामचन्द्र भंजदेव, प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव, महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी आदि के चित्र टंगे हुए हैं। इस कक्ष के मध्य में तीन अलंकृत कुर्सियाँ रखी रहती हैं जिसमें से मध्य में रखी गयी कुर्सी पर अंग्रेज शासन का प्रतीक विक्टोरिया क्राउन अंकित है। राजमहल की संरचना दर्शनीय है। दशहरा के अवसर पर महल की पूरी साज सज्जा की जाती है। उस समय भारी मात्रा में पर्यटक भी महल को देखने आते हैं। 

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Posted Date : 16-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    जगदलपुर दंतेवाड़ा मार्ग पर कतिपय स्थानों में, विशेष रूप से गमावाड़ा में ऐतिहासिक महत्व के काष्ठ निर्मित स्मृति स्तम्भों को संरक्षित करने के उद्देश्य से घेर कर रखा गया है। आप ध्यान से प्रेक्षण करें तो धीरे-धीरे इन काष्ठ की विरासतों पर दीमक चढ़ रहे हैं और उन्हें खोखला बना रहे हैं। 'खम्बÓ प्रकार के मेनहीर, लकड़ी के खम्बे (कभी कभी पत्थर के भी) होते हैं जिनके शीर्ष पर चिडिय़ा, जानवर या आदमी की आकृति उकेरी जाती है। खम्ब अथवा काष्ठ के मेनहीरों के उपर लगायी गयी चिडिय़ा को मोर अथवा कौवा के रूप में चिन्हित किया जाता है। कौवों को इस लोक और परलोक के बीच का संदेशवाहक माना जाता है। प्राय: काष्ठ स्तंभ चौड़ाई में चौकोर आकृति के होते हैं जबकि लम्बाई दो से पाँच फुट तक होती है। कुछ पुराने काष्ठ स्तभ विशालकाय भी पाये गये हैं। इन काष्ठ स्तंभों के शीर्ष को आमतौर पर गोल आकृति में बनाया जाता है जिसके उपर यदा-कदा कोई मानव आकृति अथवा चारो दिशाओं में कोई पशु अथवा पक्षी आकृति अलग से लगा दी जाती है।
    इन स्तम्भों में गोत्र चिन्हों, मृतक के प्रिय अस्त्र शस्त्र, हल-बैल, पशु-पक्षी, कीट पतंगों को उकेरा जाता है। उस व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष उसकी स्मृति में खड़े किये जाने वाले पत्थर पर चित्रित कर दिया जाता है। वह कैसे रहता था, उसके क्या महत्वपूर्ण शिकार किये, गाँव में वह कितने महत्व का व्यक्ति था आदि इन चित्रों में उकेर दिये जाते हैं। स्मृति स्तम्भ बनाने वाले कलाकार लोक जीवन में शामिल चिन्हों और प्रतीकों को अपने चित्रों में शामिल करते हैं। पशुपक्षियों में शेर, हिरण बतख, केकड़े, सांप, उल्लू आदि प्रमुखता से मृतक स्मृति स्तंभों पर अंकित किये जा रहे हैं। अनेक बार उकेरे गये समानुवर्ती अथवा भांति-भांति के ज्यामितिक आकार ध्यान खींचते हैं। सल्फी के पेड़ का यदा-कदा चित्रण तो मिलता है किंतु पेड़ पौधों का बहुत अधिक चित्रण इन स्मृति शिलाओं में नहीं पाया जाता, इसके कारणों की विवेचना होनी चाहिये। 
    काष्ठ स्तम्भों की विशेषता यह रही है कि बहुधा समाज के धनी व्यक्तियों के लिये ही ये विशेष रूप से बनवाये जाते रहे हैं। सामान्य रूप से इनके निर्माण में सरई अथवा साजा की लकड़ी का प्रयोग होता है। कष्ठ स्तम्भ का निर्माण बहुत खर्चीला कार्य हुआ करता था यही कारण है कि आज इनकी पूरे बस्तर में संख्या केवल उंग्लियों पर गिने जाने जितनी रह  गई। इन स्तम्भों पर रंग भी चढ़ाये जाते थे।  बहुधा काष्ठ फलक को कई भागों में विभक्त कर उनमें चित्र उकेरे जाते हैं और हर हिस्सा अलग अलग अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इन चित्रों में कई ऐसे भी हैं जो अपने समय का प्रतिनिधित्व नहीं करते जैसे कि हाथी और ऊँट। 
    बहुत संभव है कि एक दशक के भीतर बची-खुची काष्ठ की भव्य समाधियाँ समाप्त-प्राय हो जायें। हम यदि सजग नहीं हुए तो बस्तर की ये भव्य पहचान फिर कभी देखने को नहीं मिलेगी। पुरातत्व विभाग की भी कोशिश होनी चाहिये कि जो प्राचीन काष्ठ स्तम्भ हैं उनकों चिन्हित कर नियमित अंतराल पर टरमाईट का  ट्रीटमेंट करते रहें साथ ही सामाजिक सजगता भी आवश्यक है जिससे काष्ठ स्तम्भों को बचाने के प्रयास सुनिश्चित किये जा सकें। 

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Posted Date : 16-Nov-2017
  • अतुल पुरोहित
    भोपाल, 16 नवंबर (छत्तीसगढ़)। प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, सरकार किसकी रहेगी इसका फैसला होना है। वहीं पिछले 14 बरसों से प्रदेश पर राज कर रही भाजपा सरकार अब संकट में है। ढेरों प्रयासों के बाद भी किसानों की नाराजगी कम होने का नाम नहीं ले रही। बल्कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का मास्टरस्ट्रोक मानी जाने वाली भावान्तर योजना भी सवालों के घेरे में है, जिसके बाद सरकार अपने ही दांव में फंस गई है। 
    भावान्तर के भंवर से अभी सरकार निकल भी नहीं पाई थी कि रेत के बवंडर ने फिर घेर लिया। नई रेत नीति पर भी भावान्तर की तरह सवाल उठने लगे हैं। सरकार को हर मुद्दे पर घेरने पूरी ताकत लगा रही कांग्रेस ने नई रेत नीति पर भी घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस सांसद कमलनाथ लगातार सरकार पर हमला बोल रहे है। एक बार फिर उन्होंने ट्वीट वार किया है और शिवराज सरकार पर निशाना साधा है। 
    कांग्रेस सांसद कमलनाथ ने चुनावी वर्ष में शिवराज सरकार की घोषणाओं को लेकर निशाना साधा है। उन्होंने लिखा है- यह तो स्पष्ट है कि शिवराज सरकार चुनावी वर्ष में बगैर समीक्षा के, हड़बड़ाहट में योजनाएँ ला रही है व निर्णय ले रही है, चाहे भावांतर योजना हो या नई रेत नीति, ना तैयारियाँ की गयी, ना समीक्षा की, और लागू कर दी, जो काम लागू से पहले करना था, वह सरकार अब कर रही है, नित नये परिवर्तन किये जा रहे है।
    दरअसल, लम्बे समय से शिवराज सरकार रेत उत्खनन के मुद्दे पर घिरी हुई है। तमाम कोशिशों के बावजूद रेत माफियाओं के हौसले सरकार नहीं तोड़ पाई है। नतीजतन प्रतिबन्ध के बावजूद बेखौफ रेत का उत्खनन किया गया। अवैध रूप से खदानों से रेत का उलीचना जारी है और सबसे अधिक नर्मदा नदी को छलनी किया जा रहा है। जबकि मुख्यमंत्री ने नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए नर्मदा सेवा यात्रा निकाली। लेकिन अवैध उत्खनन बदस्तूर जारी है। 
    नई रेत नीति लाकर सरकार इसको रोकना चाहती है लेकिन नीति में कई कमियां अभी सामने आएँगी जिनका फायदा रेत माफिया को मिलेगा, जिसके चलते सरकार को नीति में कई बदलाव भी करने पड़ सकते हैं। इसीलिए शुरुआत से ही नई रेत नीति विवादों में है और सवाल उठना शुरू हो गए हैं।

     

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Posted Date : 15-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    दक्षिण बस्तर विशेष रूप से दंतेवाड़ा जिले में पुरातात्विक महत्व के मडिय़ा मृतक स्तम्भों की बहुत अच्छी संख्या है गमावाड़ा आदि स्थानों पर उन्हें घेरकर संरक्षित करने का प्रयास भी किया गया है। इस सब के बाद भी मुझे लगता कि जो श्रेष्ठतम है अभी उस तक पहुँचा भी नहीं जा सका है। इस बात का अहसास मुझे नकुलनार के पास हुआ। 
    श्यामगिरि होते हुए नकुलनार पहुँचने पर मार्ग में ही अनेक आयताकार मृतक स्मृति स्मारकों से साक्षात्कार होता है। ये स्मृति स्मारक बहुत पुराने हैं, उपेक्षित हैं तथा पूर्णत: पेड़ों की ओट में सदियों से संरक्षित हैं और जनजातीय पुरखों के अस्तित्व की गवाह बने हुए हैं। बहुत सारे सम-आकार पत्थरों को एक आदर्श ज्यामितीय-वर्ग आकृति में एकत्रित किया गया है 
    किसके ठीक मध्य भाग में एक सीधा प्रस्तर अलग से खड़ा किया गया है। ऐसे मृतक स्मृति स्मारक  नकुलनार और आसपास बड़ी मात्रा में संरक्षित हैं लेकिन आश्चर्य कि किसी भी शोधार्थी का इसपर ध्यान नहीं गया। समूह में अवस्थित ऐसे स्मारक पेड़ों की छाँह से घिरे हुए एक अनुपम और पवित्र दर्शनीयता का निर्माण करते हैं।       
    नकुलनार के आयताकार मृतक स्मारकों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता इसलिये भी है चूंकि वे बहुतायत पाई जाने वाली प्रसिद्ध मेनहीर अथवा खम्ब समाधियों से पूर्णत: भिन्न हैं।  एक तरह का एक से डेढ़ मीटर ऊँचा सम-आकार का चबूतरा है जिसमें लगभग समान आकार के छोटे पत्थरों का प्रयोग किया गया है। चबूतरे के ठीक मध्य भाग में एक पत्थर सीधे खड़ा किया गया है। 
    नकुलनार के पास ऐसी समाधियाँ समूह में देखी जा सकती हैं तथापि एकरूपिता नहीं है। इन समाधियों के निकट अन्य प्रकार जैसे मेंनहीर, छत्र, फन, कैर्न आदि प्रकार के मृतक स्मृति स्मारक भी देखे जा सकते हैं। 
    इन आयताकार समाधियों की प्राप्ति का स्थान बहुत सीमित है अत: इन पर अधिकाधिक शोध व जानकारी एकत्रीकरण शेष है। वर्तमान समय में इस प्रकार की नवीन समाधि भी दृष्टिगोचर नहीं होती अत: इनके संरक्षण की भी नितांत आवश्यकता है। 

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Posted Date : 14-Nov-2017
  • खास मुलाकात में सरल स्वभाव के नेता प्रतिपक्ष ने दागे तल्खी के साथ कई सवाल

    प्रदीप मेश्राम

    राजनांदगांव,  14 नवंबर (छत्तीसगढ़)। प्रदेश की राजनीति में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव का वैसे तो मिजाज हमेशा से ही शांत रहा है, लेकिन छत्तीसगढ़ की मौजूदा राजनीति में चल रहे सरकारी तंत्र की असीमित दखल अंदाजी और भाजपा सरकार की खामियों को लेकर वह तल्ख हो गए हैं। सोमवार को कांग्रेस की जन अधिकार पदयात्रा में शरीक होने आए श्री सिंहदेव ने 'छत्तीसगढ़Ó से एक खास मुलाकात में सीधे तौर पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पर सवालों की बौछार कर दी।
    श्री सिंहदेव का मानना है कि राजनीतिक रूप से   मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने अपने पहले कार्यकाल में उदार  चेहरा दिखाया। 2008 और 2014 के दूसरे और तीसरे कार्यकाल में उनका व्यक्तित्व बनावटी रूप में बदल गया। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की जनता  चौथी बार डॉ. सिंह को बागडोर देने के पक्ष में नहीं है। 'छत्तीसगढ़Ó से खास मुलाकात में सिंहदेव ने सिलसिलेवार सवालों का जवाब दिया।
    0  जन अधिकार यात्रा में आप आए, कैसा माहौल दिखाई दिया?
    00 पंचायतीराज संगठन कांग्रेस की एक सेल के रूप में माना जाता है। स्वायत्तशासी संस्थाओं में जुडे हुए जनप्रतिनिधियों के माध्यम से पूरे प्रदेश में गांव-गांव पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। यह संस्था कांग्रेस का अनुषांगिक संगठन है। यह पदयात्रा मां बम्लेश्वरी के छत्रछाया में इसका शुभारंभ हुआ। इसका समापन भिलाई में होगा।
    0 नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से आप एक साल बाद होने वाले चुनाव में किस तरह का माहौल देखते हैं?
    00  रमन सिंह के पहले 5 साल उनके छवि निखारने वाले थे। एक नया व्यक्ति जो विधानसभा का चुनाव तो हारा था, लेकिन लोकसभा का चुनाव जीतकर केन्द्र में मंत्री बना और प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी मिली। उस वक्त डॉ. सिंह मुख्यमंत्री के दौड़ में भी नहीं थे। इस बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री जुदेव की मूंछों की बातें सुर्खियों में रही, लेकिन एक कथित सीडी की वजह से वह पीछे हो गए। 2003 के चुनाव में कांग्रेस महज 6-7 सीटों के अंतर से भाजपा से हार गई और डॉ. सिंह को मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला, फिर 2008 का चुनाव रमन के व्यक्तित्व पर केन्द्रित होकर लड़ा गया। 2008 और 2013 के बीच  डॉ. सिंह की वादा खिलाफियां सामने आने लगी। जिन-जिन बातों को कहा गया था, आदिवासी परिवारों को जर्सी गाय देने की बात कही गई थी। सबसे पहले आदिवासी परिवारों को छला गया यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि क्योंकि चुनाव घोषणा पत्र को मतदाता गंभीरता के साथ लेते हैं। वहीं युवाओं को भी छला गया। उसके मन में यह बात आती है कि जो बात कही है वह सच है। बेरोजगारों को रोजगार देने की बात कही, लेकिन नहीं दी गई। किसानों को बिजली देने का वायदा किया गया। किसानों को मुफ्त बिजली देने के वायदे से पलटकर उनके साथ भी छलावा किया गया।  कहने और करने के अंतर से 2008 के चुनाव के बाद  रमन सिंह की छवि में गिरावट आई। 2013 का चुनाव काफी टक्कर का था। गिनती के दौरान कांग्रेस एक समय 51 सीटों पर आगे चल रही थी। बदकिस्मती से 0.73 प्रतिशत के अंतर से कांग्रेस हार गई। 
    मेरा यह मानना है कि रमन सिंह ने जो पाया था वह खो दिया। 2013 और 2018 के बीच कई ऐसी बातें सामने आ गई। जिसमें सामान्य रूप से अच्छी छवि वाले व्यक्ति के ऊपर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया। यही समय था, जब रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ की बहनों को रक्षाबंधन पर्व पर 35 किलो चावल दिए जाने का वादा किया था, जिसे बाद में 7 किलो कर दिया गया। छत्तीसगढ़ में जितने परिवार नहीं थे उससे कई गुना लगभग 70 लाख राशन कार्ड बना दिए। छत्तीसगढ़ की आबादी से ज्यादा राशन वितरण कर दिया और यह भाजपा कार्यकर्ताओं को लाभान्वित करने के उद्देश्य से किया गया।
    2011 में प्रदेश की आबादी 2 करोड़ 55 लाख  थी, तुलना में सवा तीन करोड़ की आबादी दिखाते राशन कार्ड बना दिए। फर्जी राशन कार्ड के ऊपर कार्रवाई नहीं हुई। गर्भाशय कांड में भी सरकार की लापरवाही सामने आई। यह पहली बार सुनने को मिला कि गर्भाशय नहीं निकालने वाली महिलाओं का भी जबरिया गर्भाशय निकाला गया। इसी पांच साल के दौरान आंख फोडवा कांड हुआ। यह दुर्भाग्य है कि आंख आपरेशन में मौत होने की घटनाएं छत्तीसगढ़ में हुई। 
    एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के अनुसार फैमिली प्लानिंग के तहत सरकार द्वारा जो दवाई दी गई उससे बिलासपुर में कई बहू-बेटियों की मौत हो गई। इस पर भी कार्रवाई नहीं हुई। सरकार ने सिर्फ एक चिकित्सक को सस्पेंड कर दिया। जबकि ड्रग एंड कास्टोमेटिक एक्ट के तहत नकली दवाई बनाने वालों पर कार्रवाई नहीं हुई। 2003-08 और 13 के बीच रमन सिंह की साख प्रभावित हुई।
    0 रेणु जोगी को लेकर अभी तक सस्पेंस कायम है। उनका कहना है कि वह कार्यक्रम में नेता प्रतिपक्ष को सूचित कर गई थी और जोगी ने भी अपने साथ होने का दावा किया है इस पर क्या कहेंगे?
    00  रेणु जोगी से मेरी बात नहीं हुई। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पत्नी होने के नाते वह उनके साथ है। धर्मपत्नी अपने शौहर को छोड़ के कैसे जा सकती है, लेकिन रेणु जोगी ने विधायक दल की बैठक में कई बार कहा है कि कांग्रेस ने उनके और उनके परिवार को काफी कुछ दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव तक क्या होगा मैं नहीं जानती। हम लोग इस बात को लेकर चल रहे हैं। चुनाव में कुछ भी हो सकता है, लेकिन जब उनके पति एक अलग राजनीतिक दल का गठन कर रहे हैं, तब रेणु जोगी ने खुद कहा कि मेरे और मेरे परिवार को जिस कांग्रेस ने इतना दिया कि मैं उनके साथ हूं। मेरे से उनकी नवाखाई कार्यक्रम को लेकर बात हुई, लेकिन एक अलग राजनीतिक दल के बैनर तले जाने से मुझे आपत्ति है।
    0  गुजरात और हिमाचल में चुनावी नतीजे  को लेकर क्या कहेंगे?
    00  हिमाचल में अच्छी संभावना है, मैं अपने बहन के प्रचार में गया था और इस बात का भरोसा है कि वहां जीत होगी, लेकिन कांग्रेस के सत्तारूढ़ होने की वजह से थोड़ी कमियां है। गुजरात में हमने भाजपा का पसीना निकाल दिया है। राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करने की कोशिश कर रही है।

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Posted Date : 14-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    अरनपुर (दंतेवाड़ा) से कुछ पहले एक स्थान पर विशालकाय प्रस्तराकृतियों ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। बड़े बड़े प्रस्तरखण्ड कई तो एक सामान्य मानवाकार के दुगुने और ये निश्चित ही मृतक स्मृति स्मारक थे, महापाषाण युग के बस्तर में सांस लेते हुए साक्ष्य। इतने विशाल और भव्य कि उनपर से आँख़ें न हटें और इतने उपेक्षित कि इस स्थान पर पहुँचने के लिये झाडिय़ाँ हटा हटा कर भीतर पहुँचना पड़ा। महापाषाण सभ्यता की पहचान है कि वहाँ मृतकों को अथवा उनके अवशेषों को पत्थर की बड़ी बड़ी शिलाओं को खड़ा कर के उनके मध्य अकेले अथवा सामूहिक रूप से दफनाया जाता था। महापाषाण शब्द मेगालिथ शब्द का हिन्दी रूपांतर है; यूनानी भाषा में मेगास का अर्थ है 'विशालÓ और लिथोज का अर्थ है 'पाषाणÓ। दक्षिण बस्तर विशेष रूप से दंतेवाड़ा जिले में पुरातात्विक महत्व के मडिय़ा मृतक स्तम्भों की बहुत अच्छी संख्या है गमावाड़ा आदि स्थानों पर उन्हें घेर कर संरक्षित करने का प्रयास भी किया गया है। इससब के बाद भी मुझे लगता कि जो श्रेष्ठतम है अभी उस तक पहुँचा भी नहीं जा सका है। 
    दक्षिण बस्तर में समाधियों के आकार-प्रकार के अनेक तौर दिखाई पड़ते हैं अपितु किताबों में आम-जनमानस की समाधियों के जितने भी प्रकार उल्लेखित हैं लगभग सभी को इन क्षेत्रों में देखा-पहचाना जा सकता है। जिनमें प्रमुख हैं -कैर्न समाधियाँ जिसमें पत्थरों को गोल चक्र में बिछा कर इस घेराव के अंदर गड्ढा खोद कर उसमें शव रख मिट्टी से ढंक दिया जाता था। तत्पश्चात उपर से पत्थर भर दिये जाते थे। डोलमेन समाधियाँ आयताकार मेज आकृति की समाधियाँ होती हैं अर्थात इसमें भूमि शिला खण्ड रख कर उसपर शव तथा अन्य सामग्रियाँ रखते हैं। इसके बाद चारों तरफ सपाट शिलाओं को खड़ा कर दिया जाता है। इसके पश्चात समाधि को उपर से एकाधिक शिलाओं द्वारा ढंक दिया जाता है। छत्र शिला  अर्थात चार प्रस्तर खण्डों को खड़ा गाड़ कर उसके उपर एक गोलाकार प्रस्तर खण्ड रखा जाता है इससे यह मृतक स्मारक किसी छत्र की तरह दिखाई देता है। फन शिला के निर्माण के लिये एक खोदे हुए गड्ढे में शव और अन्य सामग्री रख कर मिट्टी से ढ़कने के उपरांत उसके उपर गोलाकार पत्थर रख दिया जाता है। यह गोलाकार पत्थर सर्प के फन के समान दिखाई पड़ता है। च्च्गुफा समाधियाँज्ज् वस्तुत: पहाड़ों की चट्टानों को आयताकार अथवा वर्गाकार काट कर निर्मित की जाती हैं। मेनहीर प्रकार में मृतक की अंतिम क्रिया के पश्चात उस स्थल पर एक खड़ा पत्थर लगा दिया जाता है। चूंकि इस क्षेत्र में मृतक स्मृति स्मारकों के विविध प्रकार हैं तथा सभी ऐतिहासिक महत्व के हैं इसलिये दक्षिण बस्तर में पर्यटन को विकसित करने के दृष्टिगत भी इनकों संरक्षित करने एवं प्रचारित करने की आवश्यकता है। 
    अरनपुर के निकट मुझे आदर्श महापाषाण समाधियाँ दृष्टिगोचर हुई है। वृहदाकार होने के कारण महापाषाण शब्द के अर्थ में भी वे समाहित होती हैं। ये सभी मेनहीर प्रकार की समाधियाँ हैं जिनका आकार डेढ़ मीटर से पाँच मीटर तक हैं। यहाँ बहुत अधिक मात्रा में त्रिभुजाकार पत्थर भी मेनहीरों के तौर पर लगाये गये हैं, क्या इनका कोई विशिष्ठ अर्थ है यह अभी शोध का विषय है। 

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Posted Date : 13-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    जब हम कुटरू में प्रविष्ट हुए उस समय उत्सव सा प्रतीत हो रहा था। मैदान में टैंट लगा हुआ था, मंच पर बैकड्रॉप था - जन समस्या निवारण शिविर, लाउडस्पीकर पर गीत चल रहा था और वातावरण में चहल-पहल थी। सशस्त्र सुरक्षा कर्मियों की भारी मात्रा में उपस्थिति मेरे सामने प्रश्नवाचक चिन्ह उपस्थित कर रही थी। अधिक तहकीकात नहीं करनी पड़ी चूंकि स्वरूप से ही यह एक प्रशासनिक कार्यक्रम लग रहा था। यहाँ जन-समस्या के निवारण की जैसी भी कोशिश हो किंतु प्रायोजन था कि कुछ नक्सली सार्वजनिक रूप से आत्मसमर्पण के लिये यहाँ आने वाले थे। इसी रास्ते एक कोने में बड़े से सफेद रंग एक स्मारक पर मेरी निगाह ठहर गयी। नक्सल स्मारकों अथवा अन्य प्रचलित मृतक स्मारकों से इसकी बनावट भिन्न थी। विशाल स्तम्भ जिसमें छ: समानाकार फलक देखे जा सकते हैं और जिनके शीर्ष को पिरामिड का आकार दिया गया है, इसे एक वृत्ताकार चबूतरे पर निर्मित किया गया है। इस स्तम्भ पर सलवा जुडुम शहीद स्मारक लिखा हुआ है तथा निर्माण तिथि 4 जून 2005 अंकित है। यह स्मारक थोड़ा अलग इस लिये है क्योंकि व्यक्ति नहीं समूह के लिये अथवा एक पूरी घटना की स्मृति में इसका निर्माण हुआ है। इस तरह का सलवा जुडुम शहीद स्मारक मेरी निरंतर यात्राओं में अब तक दूसरा मेरी निगाह से नहीं गुजरा। अन्यथा तो सलवा जुडुम की विभीषिका के हृदयविदारक अवशेष कोण्टा के निकट एर्राबोर में देखने को मिलते हैं जहाँ कतारबद्ध शहीद हुए एसपीओ के स्मृति स्मारक लगाये गये हैं। ये स्मारक वर्दी पहने और हथियार थामे सिपाही की प्रतिकृति है और सड़क के किनारे दूर तर इस तरह खड़े हैं मानों अपनी कहानी स्वयं सुनाना चाहते हैं।
    भांति भांति के स्मृति स्तम्भों से अटा पड़ा है बस्तर। कुछ तो परम्परागत हैं किंतु अब ऐसे बहुत से स्मृति स्मारक निर्मित किये जा रहे हैं जिन्हें युद्ध स्मृतियाँ कहना अधिक उचित होगा। सफेद रंग का यह सलवा जुडुम शहीद स्मारक भी इसी कडी में आता है जिसमें महत्व की बात मुझे रंग भी लगती है। जहाँ माओवादी शाहीद स्मारक लाल रंग के होते हैं उसके परोक्ष में इस स्मारक को सफेद रंग दिया गया है। यह सोच समझ कर किया गया है अथवा अनायास यह तो ज्ञात नहीं हो सका लेकिन आप चाहें तो रंगों से दिये जाने वाले संकेतों की भाषा स्पष्ट समझी जा सकती है। गहन माओवाद प्रभावित गावों के प्रवेश करते ही कतिपय स्थानों पर लाल रंग के स्मारक दिखाई पडने लगते हैं जो बहुधा कई स्तरीय होते हैं और हर स्तर पर चौकोर आकृति तथा शीर्ष गुम्बदाकार बनाया जाता है, जिसपर वाम प्रतीक चिन्ह लगा दिये जाते हैं। आने वाला समय स्वयं यहाँ घटित घटनाओं की विभिषिका को इन्हीं प्रतीकों के माध्यम से महसूस कर सकेगा। 

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Posted Date : 12-Nov-2017
  • प्रतिमाह एक करोड़ से अधिक का कारोबार
    मन्नू चन्देल

    कवर्धा, 12 नवंबर (छत्तीसगढ़)। शहर के गली-गली में कोचिंग सेंटर की बाढ़ आ गई है। संचालक बिना पंजीयन कराए बेधड़क कोचिंग व ट्यूशन क्लास का संचालन कर रहे हैं। जिले में खुलेआम शिक्षा की आड़ में बिजनेस किया जा रहा है। बच्चों से फीस के रूप में मोटी रकम लेकर सेंटर संचालक उन्हें प्रर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। संचालकों ने शिक्षा को ही बिजनेस का जरिया बना लिया है। 
    कोचिंग सेंटर खोलने के लिए पहले शिक्षा विभाग से परमिशन लेना पड़ता है, लेकिन जिले में ऐसा कुछ भी नहीं है। संचालकों ने बिना परमिशन लिए कोचिंग सेंटर का संचालन कर रहे हैं। हमेशा विवादों में रहने वाला शिक्षा विभाग में खुलकर मनमानी चल रही है।
    शिक्षक पढ़ा रहे ट्यूशन
    वर्तमान कंपीटिशन के समय में बच्चों व युवाओं के ऊपर पढ़ाई का दबाव अधिक है। बच्चों व युवाओं पर पढ़ाई व प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छे नंबर लाने, भविष्य में वह क्या बनेंगे, इस बारे में डाले जा रहे दबाव के कारण आगे बढऩे के उद्देश्य से पालक भी स्कूल के अलावा कोचिंग व ट्यूशन सेंटर का सहारा ले रहे हैं। स्कूल के ही शिक्षक ट्यूशन पढ़ रहे हैं।
    कवर्धा में 300 कोचिंग व ट्यूशन सेंटर
    जिले में गिनती के ही कोचिंग सेंटर के संचालकों ने अपना पंजीयन कराया है। जिले में सैकड़ों एजुकेशन सेंटर अवैध तरीके से संचालित हो रहे हैं। संचालकों ने अब तक शिक्षा विभाग से संचालन के लिए किसी भी प्रकार से कोई अनुमति नहीं ली है। शहर के गली-गली में बिना परिमिशन के कोचिंग सेंटर व ट्यूशन चल रहे हैं। जहां पढ़ाई के नाम पर बच्चों से मोटी रकम वूसली जा रही है।
    हर माह 1 करोड़ से अधिक खर्च कर रहे पालक 
      जिले में माने की सिर्फ 20000 बच्चों और युवाओं ट्यूशन व कोचिंग क्लास जाते हैं अगर वो सिर्फ  500 रुपये प्रतिमाह फीस देते हंै तो यही 1 करोड़ हो जाता है। जबकि वास्तविक आंकड़े इससे कही अधिक होंगे।
    नहीं के बराबर सुविधा
    शहर में चले रहे एजुकेशन सेंटरों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। विद्यार्थियों के लिए न ही पेयजल की व्यवस्था है और न ही शौच की। विद्यार्थियों से मोटी रकम लेने के बाद भी एजुकेशन सेंटर के संचालक मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं।
    ये होनी चाहिए सुविधा
    पेयजल की व्यवस्था, कक्षाओं में पर्याप्त रोशनी, लैब जैसी जरूरी सुविधाएं, सुविधायुक्त कमरे और हाल, पार्किंग की व्यवस्था, दक्ष शिक्षकों की स्टाफ आदि।
    शिक्षा विभाग है अनजान
    एजुकेशन सेंटर खोलने के पहले शिक्षा विभाग से परमिशन लेना जरुरी है। लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं है। जिले में बिना परमिशन के सैकड़ों एजुकेशन सेंटर चल रहे हैं। इन सबकी जानकारी होने के बाद भी शिक्षा विभाग कार्रवाई करने में पीछे हट रहा है। इससे साफ प्रतीत होता है कि अवैध रूप से संचालित कोचिंग व ट्यूशन सेंटरों के संचालकों के खिलाफ कार्रवाई करने में विभाग कितना सख्त है। 

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Posted Date : 12-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    आप बारसूर पहुँचते हैं तो अनेक दर्शनीय स्थलों की भीड़ में आपको जानकारी प्राप्त होती है सिंगराज तालाब में कंठ अवस्था तक जलमग्न एक विष्णु प्रतिमा की। लगभग पाँच फीट आकार वाली यह प्रतिमा भव्य है, दर्शनीय है तथा दुर्लभ है। सौभाग्य से इस बार जब मैं इस प्रतिमा के निकट पहुँचा तो भगवान विष्णु की प्रतिमा वाली ही अवधारणा मेरे मन में भी थी। तालाब के दूसरी ओर खड़े हो कर अपने कैमरे में जूम करते हुए इस प्रतिमा की तस्वीर कैद करने के पश्चात वहाँ अधिक रुकने का कोई कारण नहीं बनता था। लगभग सभी किताबों में, सरकारी बुकलेट तथा बारसूर महोत्सव की प्रचार सामग्रियाँ इस प्रतिमा को विष्णु की घोषित कर चुकी हैं अत: मेरा यह अनुमान था कि निश्चित ही यह शेष शायी विष्णु की प्रतिमा होगी। 
    एकाएक न्यूटन वाला सेव जैसे मेरे सामने ही आ गिरा और मुझे खड़ी अवस्था में देख कर इसके विष्णु प्रतिमा होने में संदेह हुआ। इस वर्ष भयानक गर्मी पड़ी थी अत: पानी एक गड्ढे में सिमट कर रह गया था। मैं प्रतिमा के सम्मुख पहुँचा और कोशिश करने लगा कि समझ सकूं यदि यह विष्णु प्रतिमा है तो क्यों है? और यदि मेरी छठी इन्द्री इस तथ्य को नकार रही है तो किस लिये?
    कई मोटे मोटे संदेह मेरे सामने थे प्रतिमा के सिर पर पंचमुखी नाग अथवा शेष नाग होने तक तो ठीक है लेकिन उसके बगल में छठा नाग शीष आखिर क्यों है? विष्णु तो नाग धारण नहीं करते? इस छठे नाग की पूँछ पीछे से हो कर प्रतिमा के दूसरे हाथ तक पहुँच रही है। प्रतिमा के दो ही हाथ नजऱ आ रहे हैं तथा शंख, चक्र, गदा, पद्म जैसे अन्य चिन्ह भी नदारद हैं जो किसी विष्णु प्रतिमा की पहचान होते हैं। बारीक विवेचना की जाये तो सर्पफणों के पीछे प्रभावली की विद्यमानता प्रथम दृष्टया इसे देव प्रतिमा के रूप में रेखांकित करती है। यदि इसकी सिरोभूशा का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह विष्णु प्रतिमा नहीं हो सकती है क्योंकि वे किरीट मुकुट धारण करते हैं जबकि इस उदाहरण में जटामुकुट का प्रदर्शन है जो कि शिव प्रतिमा का एक अनिवार्य अभिलक्षण है। 
    प्रतिमा द्विभुजी है और संभवत: (क्योंकि प्रतिमा का अधोभाग चित्र में उपलब्ध नहीं है) दोनो हाथ खण्डित हैं। दाहिने हाथ के अवशिष्ट भाग को देखकर अनुमान होता है कि इसकी हथेली अभय मुद्रा में रही होगी। वहीं बांया हाथ देह के समानान्तर लटकता हुआ दिखाई दे रहा है। नीचे का हिस्सा उपलब्ध न होने के कारण हस्तमुद्रा अथवा उसमें धारित आयुध के विषय में निश्चित रूप से कह पाना अभी संभव नहीं है। सिरोभाग के ऊपर पाँच फणयुक्त सर्प का छत्र है। शिव प्रतिमा के साथ सर्प का संयोजन सर्वविदित है किन्तु आम तौर पर शिव प्रतिमा में इस प्रकार सर्पफण के छत्र का अंकन नही मिलता है। वहीं इस प्रतिमा में पृथक से एक सर्प एकदम दाहिनी ओर अंकित किया गया है जिसका पश्चभाग अर्थात पूंछ एकदम बांयी ओर देवता के कंधे से हाथ तक समानान्तर लटकती हुई देखी जा सकती है। इस प्रकार यहाँ दो सर्प हैं।
    देवता के कर्णाभूषण, वक्षाभूषण और वस्त्र का भी शिव प्रतिमा से सामंजस्य स्थापित नहीं होता। यह भी उल्लेखनीय है कि सर्प का प्रदर्शन जल के देवता वरूण के साथ भी होता है किन्तु जटामुकुट नहीं होना चाहिए। अंतत: यही कहा जा सकता है कि यह बलराम अथवा नागदेवता की प्रतिमा हो सकती है। किंतु छठे सर्प की तार्किक व्याख्या का आधार अभी भी उपलब्ध नहीं हो सका है। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि प्रतिमा विष्णु की नहीं है।  

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • बांट की जगह पत्थर, इलेक्ट्रॉनिक तराजू भी संदेहास्पद

    मन्नू चंदेल
    कवर्धा, 11 नवंबर (छत्तीसगढ़)। शहर में नापतौल विभाग द्वारा पिछले साल भर से कोई कार्रवाई नहीं की गई है। नापतौल में उपयोग होने वाले तराजू 50 ग्राम से लेकर 25 किलो तक के भारी भरकम लोहे के बांट और द्रव पदार्थ को नापने वाले लीटर जैसे उपकरण अब विलुप्त होते दिखाई दे रहे हैं। इनका स्थान अब इलेक्ट्रॉनिक वेट मशीनों ने ले लिया है। 
    इलेक्ट्रॉनिक मशीन के डिवाइस तक नापतौल विभाग की पहुंच न होने से उपभोक्ता अब रोज आधुनिक तरीके से ठगी के शिकार हो रहे हैं। वहीं सब्जी बाजार सहित मुख्य बाजार में लोहे के बांट की जगह पत्थरों से तौल की जा रही है। दरअसल शहर में अधिकतर किराना दुकान से लेकर लगभग सभी व्यवसायों में इलेक्ट्रॉनिक वेट मशीनों का उपयोग कर रहे है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक मशीन के डिवाइस में छेड़छाड़ किए जाने की संभावना के बावजूद नापतौल विभाग की इस दिशा में कोई पकड़ नहीं है। 
    पिछले सालभर से विभाग की ओर से शहर में लोहे बांट में सील लगाने का प्रमुख काम नहीं किया गया है। कई दुकानदारों की बांट में सालों से सील नहीं लगी है। जिले के उपभोक्ताओं के साथ रोज होने वाली ठगी को रोकने के लिए विभाग की ओर से नापतौल निगरानी के लिए प्रयास नहीं किये जा रहे हैं।
    क्या है सील लगाने के नियम
    नापतौल विभाग के अधिकारियों के मुताबिक नापतौल विभाग द्वारा नापतौल के उपकरणों में सरकारी सील न लगाने वाले व्यवसायियों के खिलाफ नापतौल अधिनियम के तहत जुर्माना लगाने का अधिकार भी विभाग के पास है। नियम अनुसार दो साल में एक बार तराजू बांट में नापतौल विभाग द्वारा सील लगाई जाती है। वहीं शहरी स्तर पर शिविर लगाकर तराजू बांट और अन्य उपकरणों में सील लगाई जाती है। वहीं इलेक्ट्रॉनिक में एक साल में सील लगाने का नियम है।
    पैकेजिंग आइटम्स पर ध्यान नहीं दिया जाता....
    खाद्य सामग्री बनाने वाली कंपनी हो या फिर अन्य प्रोडक्ट का निर्माण करने वाली। सभी के उपर पैकेजिंग कमोडिटी एक्ट नियम लागू होता है, लेकिन इसका पालन अधिकतर कंपनियां नहीं कर रही हैं। इन पर शिकंजा कसने वाला नापतौल विभाग भी इसकी लगातार अनदेखी कर रहा है। वह इक्का-दुक्का दुकानदारों पर कार्रवाई कर इतिश्री कर लेता है। ऐसे कई पैक्ड प्रोडक्ट बिक रहे हैं, जिन पर न तो बैच नंबर लिखा है और न ही अन्य डिक्लेरेशन। 
     दुकानें हो जाएगी बंद....
    सभी तरह के दुकानदारों के लिये कुछ नियम कायदे हैं, जिसमें जरा भी कमी पाई गई तो जुर्माना, सजा और दुकान सील की जा सकती है। बहुत पुराना कानून है जिसमें अधिकारी शिकायत मिलने पर या जब वो चाहे तब दुकानों मे रेड मार सकते हैं। 
    अधिकारी बहुत कम चेक करने किसी दुकान पर जाते हैं पर अगर जायें तो शायद 100 मे से 50 दुकानें बंद हो जायेगी।
    उपभोक्ता जाने क्या है उनका अधिकार.....
    दुकानदार अपनी दुकान पर तौलने के लिए जो बांट इस्तेमाल करते हैं। उन पर माप, तौल निरीक्षक की मुहर लगी होना अनिवार्य होती है। शक होने पर उपभोक्ता दुकानदार से बांट लेकर मुहर देख सकता है। बांटों पर लगने वाली इस मुहर को प्रति वर्ष बांट एवं माप, तौल विभाग द्धारा सत्यापित किया जाता है। हाथ वाले तराजू का इस्तेमाल करने की छूट केवल फेरीवाले व्यापारियों के लिए ही है। यदि कोई पक्की दुकान में बैठा दुकानदार हाथ तराजू का इस्तेमाल कर रहा है, तो उपभोक्ता उसकी शिकायत विभाग में कर सकता है। पैकेट बंद वस्तुओं पर प्रिंट मूल्य पर किसी भी प्रकार का अलग से स्टिकर नहीं लगा हुआ होना चाहिए। कोई भी दुकानदार बांट की जगह लकड़ी या पत्थरों को बांट के तौर पर प्रयोग नहीं कर सकता है। यदि कोई दुकानदार ऐसा कर रहा है, तो तुरंत लिखित शिकायत बांट एवं माप तौल विभाग में करें। दुकानदारों के द्धारा लकड़ी अथवा गोल डंडी से बनी तराजू का इस्तेमाल करना दंडनीय अपराध की श्रेणीं में आता है। ऐसे मामलों में उपभोक्ता शिकायत कर सकते हैं। देखने में आता है कि मिठाई या ड्राई फ्रूट्स लेते समय पैकेट अथवा डिब्बे का वजन भी दुकानदारों के द्धारा मिठाई या ड्राई फ्रूट्स के साथ तौल दिया जाता है। जबकि नियमानुसार ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। इस मामले में उपभोक्ताओं को शिकायत करने का अधिकार है। पैकेट बंद वस्तुओं पर स्पष्ट अक्षरों में वस्तु का वजन, नाम, पता, तौल व कीमत आदि स्पष्ट रूप से लिखा हुआ होना चाहिए। संपूर्णं जानकारी प्रिंट न होने पर उपभोक्ता कंपनी की शिकायत कर सकते हैं। तरल पदार्थों को नापने वाला लीटर बांट एवं माप तौल विभाग के नियमों के अनुसार होना चाहिए। साथ ही लीटर का तल्ला नीचे की ओर लटका हुआ नहीं होना चाहिए। साथ ही लीटर कहीं से भी पिचका हुआ नहीं होना चाहिए।
    हमारे यहाँ गत महीने सील लगाने के लिए शिविर लगाया गया था। अलग अलग दिनों में सील लगवाने दुकानदार आते है। अब तक लगभग 90 प्रतिशत दुकानदारों ने अपने तौल मशीन की जांच करा ली है
    मुकेश सोनी, निरीक्षक, नाप तौल विभाग कबीरधाम

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • बस्तर अंचल में भगवान बुद्ध ने भी अपनी बात पहुँचायी है और महावीर ने भी; यहाँ अशोक की सत्ता का प्रभाव भी है और समुद्रगुप्त की साम्राज्यवादिता का भी। यहाँ मराठों का भी वर्चस्व रहा है तो निजामों ने भी दाँत गड़ाये हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी दक्षिणापथ यात्रा के दौरान प्राचीन बस्तर पर प्रकाश डालते हुए इसे अनेक विधर्मी मतों (विशेषकर शैव) के साथ यहाँ अनेक बौद्ध चैत्य होने की बात कही थी। पास कोंडागाँव के पास अवस्थित भोंगापाल एक उदाहरण है जो कि गुप्तकालीन बौद्ध चैत्य के अवशेष हैं। इसी बात को आगे बढ़ाने के लिये बौद्ध चैत्यों की बस्तर में मैं तलाश कर रहा था। राजिम में भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में काले पत्थर से बनी मूर्ति के बाद अगली सूचना मुझे कांकेर के निकट सिद्धेश्वर गाँव की प्राप्त हुई। पुराने लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यहाँ ईंटों की वैसी ही संरचना उपलब्ध है जैसी कि भोंगापाल के निकट थी तथा इसके भी गुप्तकालीन होने में संदेह नहीं होना चाहिये। 

    जब हम सिदेसर में बौद्ध चैत्य की तलाश करने लगे तो हमें यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं मिला। बतायी हुई जगह पर एक ग्रामीण का मकान अवश्य अवस्थित था तथा उससे लग कर तालाब। तालाब में मंदिर के खण्डित स्तम्भ कपड़ा धोने के काम आ रहे थे। यहाँ प्राचीन ईंटों की उपस्थिति का आभास तब हुआ जब बारीकी से मंैने भूमि का मुआयना किया। बड़े बड़े आकार की पुराने ईंटे अब नष्ट कर दी गयी हैं तथा उनसे ही वह नव-निर्मित शिवमंदिर बना प्रतीत होता है। स्थानीय लोगों ने बताया कि एक ईंटों से बना बड़ा सा द्वार उन्होंने यहाँ पहले कभी देखा था। वह ग्रामीण जिसका मकान एक शिव मंदिर से लग कर ही बना हुआ है वह हमे कुछ भी जानकारी देने के लिये तैयार नहीं था। जब मैंने शिव मंदिर को बारीकी से देखा तो मुझे द्वार का एक हिस्सा नजऱ आ गया जिसके उपर बुद्ध की मुखाकृति स्पष्ट देखी जा सकती थी। यहाँ उस शिवलिंग को छोड़ कर जिसे मंदिर के गर्भगृह में स्थान मिल गया है सभी कुछ उपेक्षित तथा नष्ट होने की कगार पर था। अगर आज से और दस साल बाद की कल्पना करें तो यह बताना असंभव ही हो जायेगा कि इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व है तथा प्राचीन भारत के उस गौरव से बस्तर को यह स्थल जोड़ता है जब बुद्ध न केवल जननायक थे अपितु उनके द्वारा प्रचारित धार्मिक आंदोलन का प्रभाव बस्तर पर भी पड़ा था। ऐसे अनेक उदाहरण होंगे जिन पर अब चर्चा असंभव हो चली है, जो कुछ मौजूद है उसे जाने-अनजाने नष्ट किया जा रहा है, हमे परवाह भी नहीं है। 

     

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Posted Date : 11-Nov-2017
  • आलोक प्रकाश पुतुल

    रायपुर, 11 नवम्बर । समारू बैगा 11 बच्चों के पिता हैं। बिलासपुर जिले के घने जंगलों के बीच बसे नेवसा गांव के समारू बैगा ने इस बार फिर से अपनी पत्नी को जंगली जड़ी बुटियां खिलाई हैं ताकि वे गर्भवती होने से बच सकें।
    47 साल के समारू और उनकी पत्नी चैती बाई के 11 बच्चे हैं और वे अभी कम से कम बारहवां बच्चा नहीं चाहते क्योंकि उनका छोटा बेटा राकेश केवल डेढ़ साल का है।
    समारू की बड़ी बेटी के भी दो बच्चे हैं और उससे छोटी के भी दो। अब समारू की चिंता में उनकी बेटियां भी शामिल हो गई हैं। समारू नहीं चाहते कि उनकी बेटी के भी ऐसे ही बच्चे होते चले जायें और फिर उन्हें भी गरीबी, अशिक्षा और कुपोषण समेत दूसरी स्वास्थ्यगत समस्याओं से जूझना पड़े।
    समारू कहते हैं कि पांचवीं संतान के बाद हम पति-पत्नी नसबंदी के लिए अस्पताल गए थे, लेकिन अस्पताल वालों ने मना कर दिया। कहा कि बैगा जाति की नसबंदी नहीं हो सकती। उसके बाद बच्चे होते चले गए।  छत्तीसगढ़ में समारू अकेले नहीं हैं जिनके सामने ये समस्या है। छत्तीसगढ़ में अविभाजित मध्यप्रदेश के जमाने का एक आदेश फांस की तरह राज्य की आदिम जनजातियों की जिंदगी में गड़ा हुआ है।
    जिस दौर में देश भर में नसबंदी की लहर थी, लगभग उसी समय 13 दिसंबर 1979 को मध्यप्रदेश के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने एक आदेश जारी करते कुछ आदिम जनजातियों की नसबंदी को प्रतिबंधित कर दिया था।
    आदेश के अनुसार कि ऐसे आदिवासी उप समूहों के बीच नसबंदी साधन पर बिल्कुल जोर नहीं दिया जाना है।
     जिनकी जनसंख्या वृद्धि नगण्य है अथवा जनसंख्या बढ़ाने की बजाय कम हो रही है। प्रदेश में ऐसी कुछ उपजातियां आदिम जाति शोध संस्थान तथा आदिम जाति एवं हरिजन कल्याण विभाग के सहयोग से चिन्हित की गई हैं। इन उपजातियों के सदस्यों की नसबंदी नहीं की जानी है।
    इस सरकारी आदेश के बाद राज्य के बैगा, बिरहोर, पहाड़ी कोरबा, अबूझमाडिय़ा और मांझी आदिवासियों की नसबंदी पर रोक लग गई। छत्तीसगढ़ राज्य अलग हो गया और मध्यप्रदेश में इस आदेश पर रोक लग गई। लेकिन छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की नसबंदी पर प्रतिबंध जारी रहा। साल 2015 में तो राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांड ने राज्य के सभी कलेक्टरों को इन निर्देशों की कड़ाई से पालन करने के लिये लिखित निर्देश जारी किए।
    छत्तीसगढ़ में लंबे समय से जनता का अस्पताल संचालित कर रहे और दूसरी स्वास्थ्य सुविधाओं पर काम कर रही जन स्वास्थ्य सहयोग के स्वास्थ्य कार्यकर्ता हरेंद्र सिंह सिजवाली बैगा आदिवासियों के बीच ही काम करते हैं। उन्होंने बैगाओं के साथ मिल कर इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की है।
    हरेंद्र का दावा है कि लंबे समय से छत्तीसगढ़ के आदिवासी पड़ोसी राज्य मध्य-प्रदेश में नसबंदी करा रहे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में उन्हें इसके लिए मना कर दिया जाता है। हरेंद्र ने प्रशासनिक अधिकारियों और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से बैगाओं की नसबंदी के लिए अनुमति और दिशा निर्देश मांगे, लेकिन पुराने आदेश का हवाला दे कर उन्हें टाल दिया गया।
    हरेंद्र कहते हैं-एक-एक आदिवासी के 10-10 बच्चे हुए लेकिन कुपोषण और गरीबी के कारण इन आदिवासियों में बच्चों की मृत्युदर बहुत अधिक है। गरीबी और अशिक्षा के कारण महिलाओं को दूसरी समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। कई बार खुद ही गर्भपात के लिए दवाओं के उपयोग से इनकी जिंदगी जोखिम में पड़ जाती है।
    छत्तीसगढ़ में सरकार सामुदायिक स्वास्थ्य के लिए राज्य भर में 60 हजार से अधिक महिलाओं को मितानीन बना कर स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध करा रही है। नेवसा गांव की मितानीन रामेश्वरी यादव का कहना है कि बैगा आदिवासी अपनी पहचान छुपा कर निजी अस्पतालों में नसबंदी करा रहे हैं।
    वे कहती हैं-बैगा आदिवासी प्राइवेट क्लिनिक में जाते हैं और नसबंदी करवाते हैं। वे भी अब समय के साथ बदल रहे हैं। हां, जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनकी नसबंदी नहीं हो पाती।
    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अधिवक्ता रजनी सोरेन पूरे मामले को समानता के अधिकार से जोड़ती हैं। रजनी का यह भी कहना है कि सरकार आदिवासियों से जुड़ी योजनाओं की असफलता को छुपा कर ऐसी मान्यता स्थापित करना चाहती है कि आदिवासियों की जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है।
    रजनी कहती हैं-गैर आदिवासियों और आदिवासियों के लिए नसबंदी के अलग-अलग नियम समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कौन कितने बच्चे पैदा करे या न करे, यह उसका व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए। सरकार यह कैसे तय कर सकती है कि किसी खास समुदाय को लगातार बच्चे पैदा करते रहना है?
    हालांकि बैगा आदिवासियों की जनहित याचिका के बाद राज्य सरकार ने एसडीएम द्वारा नसबंदी कराए जाने की अनुमति देने दावा किया है, लेकिन सरकारी आदेश और जमीनी हकीकत अलग-अलग हैं। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर मानते हैं कि उन्होंने आदिम जातियों की नसबंदी से संबंधित आदेश नहीं देखे हैं।
    चंद्राकर कहते हैं- अब वो खुद मांग करते हैं कि साहब, हमारा किया जाए। तो उन परिस्थितियों में हम उनको सहमति देंगे, उनकी नसबंदी करेंगे। वो जमाना दूसरा था, आज से लगभग चार दशक पहले की बात है। चार दशक और आज की परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर आया है। अब वो खुद मांग करने लगे हैं, तो नई परिस्थितियों में सरकार तो विचार करेगी और संरक्षण देगी।
    अदालत और सरकार के बीच फंसी आदिवासियों की नसबंदी का मामला कब सुलझेगा, यह बता पाना तो मुश्किल है, लेकिन जब तक फैसला नहीं आता, तब तक तो इन आदिवासियों की जिंदगी उलझी रहेगी।(बीबीसी)

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • महासमुन्द सखी सेंटर: अगस्त से आज तक एक बैठक भी नहीं

    उत्तरा विदानी

    महासमुन्द, 9 नवम्बर (छत्तीसगढ़)। यह जिला अस्पताल के समीप खुले महासमुन्द का वन स्टाप सखी सेंटर है जो जिले के पुलिस अधीक्षक, सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, अध्यक्ष जिला बार कौंसिल, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, महिला संरक्षक महिला एवं बाल विकास विभाग, नंद कुमार साहू सामाजिक कार्यकर्ता, निरंजना शर्मा भाजपा नेत्री और निरांजना चंद्राकर समाज सेविका के संचालन में संचालित है। खंडहर की तरह दिखने वाले इस कार्यालय में बिना कोई सुविधा जिले भर की पीडि़त महिलाओं को उनका हक और न्याय दिलाया जाता है। टूटी फूटी कुर्सियां, सीडऩ, गंदगी से अटी पड़ी दीवारें, अधटूटी दरवाजे और कबाड़ों के बीच अपने खुद के घर परिवार से सताई गई महिलाओं का दर्द सुनी जाती हंै।   कमरों में अस्पताल अथवा अन्य किसी का व्यक्तिगत कबाड़ पड़ा हुआ है। रात को रुकने वाली पीडि़त महिलाओं के लिए यहां पीने के लिए पानी तक की कोई व्यवस्था नहीं है।  
    शौचालय में, कमरों में टूटी हुई दरवाजे खिड़कियों से सांप बिच्छू घुस आते हैं और बाहरी दीवार फांदकर कोई भी अंदर आ जा सकता है। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। हालांकि इन महिलाओं को सुनने तथा उनकी समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं सेवी कुछ लोगों को मुप्त में तैनात किर दिया गया है। लेकिन सुविधाओं के लिए तरसती इस सखी सेंटर में क्या महिलओं की समस्याओं का समाधान हो सकेगा? वैसे जिले में महिला प्रताडऩा की स्थिति की जानकारी इस बात से लाई जा सकती है कि अगस्त से लेकर अब तक मतलब मात्र तीन महीने में इस केन्द्र में 45 महिलाएं अपनी समस्याएं लेकर पहुंची है और इनमें से 15 महिलाओं के मामलों का समाधान किया जा चुका है। बताया गया है कि सुलझाये गये अमूमन मामले घरेलू हिंसा से सम्बंधित ही थे। 
        इस केन्द्र के जिले में खुलने के बाद लगा था कि जिले में संचालित यह वन स्टॉप सखी सेन्टर पीडि़त महिलाओं को सुविधा और सहायता देने के लिए संचालित किया जा रहा है लेकिन इस सेन्टर को खुद सुविधा और सहायता की आवश्यकता है। महासमुन्द जिला कार्यालय में स्वास्थ्य विभाग के कैम्पस में 1 अगस्त को वन स्टॉप सखी सेन्टर प्रांरभ किया गया था। वैसे प्रदेश सरकार ने प्रदेश भर में पीडि़त महिलाओं को सहायता प्रदान करने के लिहाज से इस सेन्टर की शुरुआत मुख्यालय रायपुर में 16 जुलाई 2015 को आरंभ किया था। लेकिन वन स्टॉप सखी सेन्टर का आरंभ महासमुन्द में 1 अगस्त 2017 से शुरू हुआ। इसे परिवार से सताई गई महिलाओं के सहायता के लिए 24 घंटे की सुविधाएं देने के नाम पर खोला गया था। 
    आपको जानकर हैरत होगी कि महासमुन्द स्थित सखी सेंटर हर रोज सुबह 10 बजे शुरू होता है और शाम 6 बजे बंद। कल दोपहर 12 बजे छत्तीसगढ़ वन स्टॉप सखी सेन्टर पहुंचा तो देखा कि सेंटर में स्टॉफ के नाम पर मात्र 4 लोग थे। बाहर एक महिला रजिस्टर लेकर बैठी थी जो सेन्टर में आने जाने वालों का नाम एक रजिस्टर में लिख रही थी। अंदर के एक रूम में 3 अन्य महिलाएं थी जो पीडि़त महिलाओं का बयान लेती हैं। हमने बाहर बैठी महिला से  उनके रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराया और फिर अंदर बैठी महिलाओं से बातचीत शुरू की। वहां सेवाएं देने वाली महिलाओं ने बताया कि यहां की मुखिया अधिकारी शहर से बाहर हैं। उन्होंने बताया कि यहां सेवाएं देने वाली महिलाएं सरकारी नहीं हैं बल्कि मुफ्त में सेवाएं देती हैं। फिर उन्होंने सेंटर का हाल बताया कि यहां पीने के लिए पानी नहीं है। जिस कमरे में हम बैठे थे उनकी दीवारों की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये टूटी फूटी दीवार आपके सामने है। कई दफा इसकी शिकायत कलेक्टर सहित महिला बाल विकास अधिकारी सहित जिला अधिकारी से कर चुके है पर अभी तक इस पर कार्रवाई नहीं हुई है। 
        उन्होंने बताया कि सखी सेंटर में 5 बाथरूम हंै लेकिन मात्र एक ही ठीक-ठाक है जिसका उपयोग कर रहे हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि यहां आने वाली महिलाओं को रुकना पड़ता है लेकिन रुकने वाली महिलाओं के लिए न तो खाने पीने की व्यवस्था है और न ही रुकने की। अभी तक यहां सिक्युरिटी गार्ड की भर्ती नहीं हो सकी है। रात में आफिस के अंदर सांप, बिच्छू निकल जाते हैं। कई बार तो बाथरूम में सांप निकल गये हैं। महिला कर्मचारियों ने वन स्टॉप सखी सेन्टर के भीतर का कमरा हमें दिखाया। किचन में दरवाजे नहीं लगे हंै। स्टॉफ के लिए बनाया गया रूम कबाड़ से भरा पड़ा है। मिटिंग रूम का दरवाजा आज तक नहीं खुला है क्योंकि अभी तक उसकी सफाई नहीं हो सकी है। वाशरूम और बाथरूम की दीवारों में दरारें हंै जो कभी भी गिर सकती है। कर्मचारियों ने बताया कि शाम होने के बाद यहां बैठ रहने में भी डर लगता है। 
         वन स्टॉप सखी सेन्टर महासमुन्द के लिए टोल फ्री नम्बर 181 का साफ्टवेयर अपडेट तो हो गया है पर छत से अंदर की ओर आने वाला दरवाजा भी टूटा पड़ा है। जिससे कोई भी व्यक्ति रात में प्रवेश कर सकता है। छत पर पानी से भरा टेंक खुला पड़ा है और दिखने में बेहद गंदा भी है। अगस्त में सेंटर खुलने के बाद से अब तक यहां कोई भीअधिकारी झांकने तक नहीं आया, संचालक मंडल के लोग भी। अभी तक इस सेंटर का 181 नम्बर चालू नहीं हो सका है। वर्तमान में वन स्टॉप सखी सेन्टर में 07723-222227 नम्बर पर ही सम्पर्क किया जा सकता है। 
    इस केन्द्र के प्रभारी एडवोकेट टी दुर्गा राव का कहना है कि यह केन्द्र घरेलू हिंसा, यौन उत्पीडन, लैंगिक हिंसा, दहेज उत्पीडऩ, तेजाब, डायन, टोनही के नाम पर प्रताडि़त, अवैध मानव व्यापार, बाल विवाह, लिंग चयन, भ्रूण हत्या तथा सती प्रथा आदि से पीडि़त सभी वर्ग की महिलाओं को सलाह, सहायता, मार्गदर्शन और संरक्षण के लिए प्रारंभ किया गया है। ताकि घर के भीतर या बाहर अथवा किसी भी रूप में पीडि़त व संकटग्रस्त महिलाओं को एक ही छत के नीचे एकीकृत प्रकार की सुविधाएं मिले तथा गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली जरूरतमंद महिलाओं की चिकित्सा, विधिक सहायता, मनोवैज्ञानिक सलाह, मनोचिकित्सा परामर्श की सुविधा मिल सके। 
    जिस तरीके से टी दुर्गा राव ने सखी सेंटर के कामों को बताया उस लिहाज से यह केन्द्र वास्तव में पीडि़त महिलाओं के लिए संजीवनी बन सकती है और इसकी ऐसी ही कल्पना के साथ प्रदेश सरकार ने भी राज्य के कई जिलों में सखी सेंटर खुलवाया होगा लेकिन महामसुन्द का सखी सेंटर एकमात्र ऐसा सेंटर है जहां पीडि़त महिलाओं का दु:ख-दर्द सुनने के लिए ऐसा भयावह कार्यालय है, जो उनके जख्मों को और भी गहरा कर देता है। जानकारी मिली है कि पीडि़त महिलाओं के जख्म और भी गहरे न हों इस लिहाज से इस कार्यालय को सुविधायुक्त बनाने प्रदेश सरकार ने महामसुन्द जिले को 90 लाख रुपए भी दिये हैं। 

     इस मामले में जिले के कलेक्टर हिमशिखर गुप्ता का कहना है कि वन स्टॉप सखी सेन्टर के लिए फंड आ गया है। बहुत जल्द ही सब कुछ ठीक कर लिया जायेगा।  
    कल जब 'छत्तीसगढ़' के वहां पहुंचने जानकारी संचालक मंडल के सदस्यों को मिली तो इसके संचालक मंडल की बैठक तत्काल कलेक्टोरेट में करने का निर्णय लिया गया है।  

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • राष्ट्रीय शिक्षा दिवस 11 नवंबर पर विशेष
    चन्द्रकांत पारगीर
    बैकुंठपुर, 10 नवंबर (छत्तीसगढ़)। कोरिया जिले में  लगातार तीसरे वर्ष  अब्दुल कलाम गुणवत्ता अभियान सिर्फ दिखावे का रह गया है। वही ज्यादातर विद्यालयों में सेटअप के अनुसार शिक्षक नहीं हंै तो कहीं पर आज भी अधिक शिक्षक पदस्थ हंै। जहां दो शिक्षक हंै तो आपसी सामंजस्य से स्कूल में आना जाना करते हंै, एक दिन कोई तो दूसरे दिन कोई। हालात यह है कि पालक अपने बच्चों का नाम कटवा कर दूसरे स्कूल में लिखवाने का मजबूर है। 
    छत्तीसगढ़ ने कोरिया जिले के कई स्कूलों का दौरा कर शिक्षकों को लेकर पढ़ाई का हो रहा नुकसान की जानकारी ली।  शिक्षा के प्राथमिक, माध्यमिक और हाई स्कूल और हायर सेकेन्ड्री का बुरा हाल के लिए सबसे ज्यादा संलग्नीकरण जिम्मेदार है, वहीं जिला शिक्षा अधिकारी ने कई शिक्षकों को यहां वहां संलग्न कर रखा है। दूसरी ओर संलग्नीकरण करने वाले अधिकारी यह तक नहीं जानते की हाई स्कूल में रसायन के शिक्षक का संलग्न किया जा सकता है कि नहीं। हाल ही में जिला सीईओ तुलिका प्रजापति ने चिरमी हायर सेकेन्ड्री की व्याख्यता को हाई स्कूल कटकोना मे संलग्न कर दिया, इधर, बच्चे मंत्री से लेकर हर कहीं अपनी पढ़ाई का नुकसान की कहानी बता भटक रहे है, उनकी बात कोई सुनने को तैयार नहीं है। 
    इधर, बैकुंठपुर तहसील के लगभग प्राथमिक और मीडिल स्क्ूलों के हालात एक जैसे है, यहां पदस्थ कई शिक्षक अपने स्कूल से नदारद रहते हैं, जिसकी जानकारी जिले के अधिकारियों को भी रहती है। जिले के सबसे दूरस्थ विकासखंड भरतपुर के स्कूलों मेें कहीं शिक्षक नहीं हैं कहीं हंै तो आते नहीं है, इसी तरह का हाल जिले के सोनहत विकासखंड के वनांचल व दुरस्थ क्षेत्रों का हाल है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र के स्कूलों का सबसे बुरा हाल है। 
    भरतपुर जनपद के  ग्राम पंचायत नेरूआ के प्राथमिक शाला में दो शिक्षकों पर 150 से ज्यादा बच्चे है, मीडिल स्कूल में 70 बच्चों पर सिर्फ एक शिक्षक है। गिधेर के प्राथमिक शाला में 35 बच्चों पर एक शिक्षक है। ग्राम मसर्रा के प्राथमिक शाला 50 बच्चों पर 2 शिक्षक है, पर कभी कोई आता है कभी कोई नहीं आता है, ग्राम झांपर के प्राथमिक शाला बीते एक साल से बंद था, छत्तीसगढ़ की खबर के बाद कलेक्टर पहुंचे और स्थानीय युवक को बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया, कलेक्टर के जाते ही युवक को ग्राम पंचायत से हटा दिया, अब फिर स्कूल बंद है। ग्राम ढाब का प्राथमिक शाला महीने में 3 दिन खुलता है, दोनों स्कूल सहायिकाओं के भरोसे है। ग्राम कोरमो में कहने को दो शिक्षक पदस्थ है, पर पढ़ाने आने में दिन बदल बदल कर आते हंै। यहीं हाल खोहरा प्राथमिक शाला का है यहां  40 बच्चों पर एक शिक्षक है, ग्राम मोंगरा, खोंखनिया, बडगांवखुर्द के प्राथमिक शाला, मीडिल स्कूल कभी-कभार ही खुलते हंै। 
    कई स्कूल के पालकों ने निकाले बच्चे
    भरतपुर तहसील के ग्राम रौंक में प्राथमिक, मीडिल और हाई स्कूल है, तीन स्कूल में मात्र 2 शिक्षक पदस्थ है, यहां के पालकों ने बच्चों के नाम कटवाकर कोटाडोल में लिखवाया, शिक्षकों ने एतराज किया, मामला बीईओ तक पहुंचा, पालको ने बीईओ को बताया कि उनके बच्चों की शिक्षा का बुरा हाल है, और नाम कटवा कर कोटाडोल में लिखवाया। पालक राज्य सरकार सेे खासे नाराज है उनका कहना है कि जिले का दुर्भाग्य है, ऐसे अधिकारियों को जिले का दायित्व सौंपा गया।  
    शिक्षक स्कूल नहीं जाते
    वैसे तो जिले के कई दूरस्थ व वनांचल गांव ऐसे हंै जहां  निरीक्षण के अभाव में शिक्षक कभी कभार स्कूल पहुंचते हंै। ग्रामीण सूत्रों  के अनुसार सोनहत के बंशीपुर के अलावा ग्राम पंचायत नटवाही के आश्रित ग्राम कुर्थी में दो शिक्षकों के स्कूल नहीं जाने की शिकायत ग्रामीणों की है। इसके अलावा ग्राम दसेर, झापर, धनपुर, गोयनी, जो कि पहुंच विहीन व वनांचल ग्राम है उक्त स्थानों के ग्रामीणों की शिकायत है कि उनके स्कूल में शिक्षक नियमित नहीं आते हंै। 
    ग्राम उधैनी में तो एक शिक्षक लंबे समय से विद्यालय नहीं आने की भी शिकायत है। जिले में ऐसे कई विद्यालय पहुॅंच विहीन क्षेत्र ं में हैं, जहॉं  निरीक्षण करने वाले अधिकारी भी जाना नहीं चाहते हंै।   

     

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Posted Date : 10-Nov-2017
  • संदीप पाल
    भैयाथान, 10 नवंबर (छत्तीसगढ़)। सूरजपुर जिले के जंगली हाथियों के मामले में सबसे संवेदनशील माने जाने वाले प्रतापपुर क्षेत्र को राहत दिलाने सरकार पंद्रह साल में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी है। सौ से अधिक मौतें, सैंकड़ों मकानों को क्षतिग्रस्त और लाखों हेक्टेयर फसलों को नुकसान पहुंचा चुके हाथी आज भी स्वतंत्र रूप से विचरण कर रहे हैं। हाथियों के आतंक से राहत के लिए अब तक सिर्फ ग्रामीणों ने ही अपनी लड़ाई लड़ी है। शासन प्रशासन ने राहत दिलाने की बजाए सैंकड़ों बार सिर्फ  आश्वासन दिए हैं और ग्रामीण हाथियों के आतंक   के बीच अपनी जिंदगी जीने मजबूर हैं।
    गौरतलब है कि पंद्रह वर्षों से अधिक समय से प्रतापपुर जंगली हाथियों का पसदिंदा जगह बन गया है जिस कारण प्रतापपुर वर्तमान में हाथियों के मामले सबसे संवेदनशील माना जाता है। एक समय था कि वन परिक्षेत्र प्रतापपुर में दो सौ हाथी तक निवास करते थे और अब तक इन्होंने क्षेत्र में सौ से अधिक जानें लेने के साथ सैंकड़ों मकानों को ध्वस्त किया है तथा लाखों हेक्टेयर खेतों में लगी फसलों को नुकसान पहुंचाया है,घरों में घुस अनाजों के साथ अन्य सामानों को नुकसान पहुंचाया है। 
    ग्रामीण क्षेत्रों में लोग हाथियों के आतंक से डरे सहमें रहते हैं,इनके डर से रात भर जागरण करने के साथ सुरक्षा के लिए घरों को छोड़ सुरक्षित जगहों में रहना पड़ता है,ग्रामीणों का आर्थिक सामाजिक विकास रुक गया है,नुकसान के बदले मुआवजा नहीं के बराबर मिलता है किसान बैंकों के कर्जदार हो गए हैं। पन्द्रह सालों से हाथियों के आतंक बीच रहने वाले ग्रामीणों की जिंदगी किसी चुनौती से कम नही है, लेकिन  सरकार चौदह सालों में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी है ताकि ग्रामीणों को राहत दिलाई जा सके। सरकार और उसके प्रशासन ने कभी राहत दिलाने उचित पहल नहीं की लेकिन ग्रामीण और जनप्रतिनिधि सैंकड़ों बार हाथियों से राहत और मुआवजा बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर चुके हैं लेकिन प्रशासन ने हमेशा सिर्फ  आश्वासन दिया बजाए राहत के लिए कदम उठाने के।  प्रतापपुर क्षेत्र हाथियों के मामले में सबसे संवेदनशील है और इस मामले में शासन से सबसे ज्यादा उपेक्षित भी।   
     राहत नहीं मिलने का बड़ा कारण
    हाथियों से राहत के नाम पर छोटी छोटी योजनाएं तो बनाई जाती हैं लेकिन इनकी जो स्थिति है ऐसा प्रतीत होता है जैसे सिर्फ भ्रष्टाचार के लिए ही इन योजनाओं को लाया जाता है न कि हाथियों से राहत के लिए। सोलर फेन्सिंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है,सरगुजा संभाग में करोड़ों की लागत से कई वन परिक्षेत्रों में सोलर फेन्सिंग का कार्य कराया गया लेकिन भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ चुके इस योजना की दुर्गति किसी से छिपी नहीं है। ठेकेदार द्वारा आधा अधूरा और घटिया काम  और बाद में मरम्मत तक नहीं। इसी तरह जंगलों में पानी के साधन के लिए स्टापडेम,बांध,डबरी के लिए विभिन्न मदों से राशि तो स्वीकृत कराई जाती है लेकिन ये बनते सिर्फ कागजों में हैं धरातल पर कुछ नहीं है जिस कारण हाथी जंगलों में रहते नहीं हैं और आबादी वाले क्षेत्र में आकर तबाही मचाते हैं। 
    कहां है हाथी अभ्यारण्य 
    गाँव गाँव में घूम तबाही मचा रहे हाथियों से निजात दिलाने तमोर पिंगला क्षेत्र में हाथी  अभ्यारण्य बनाने की बातें आज से नहीं दस वर्षों से सुनने में आ रही हैं लेकिन यह आज तक अस्तित्व में नहीं आया। कई गांव का चिन्हांकन भी करने की बातें भी सुनने को आती थीं।   इसके विपरीत तमोर पिंगला रेस्क्यू कैम्प बनाया जा रहा है जहां कर्नाटक से लेकर कुंकु हाथीयों को रखा जाएगा और यहां जंगली हाथियों को पकड़ कर लाया जाएगा ताकि कुछ सिखाया जा सके और फिर वैसे ही छोड़ दिया जाएगा जैसे अभी स्वतन्त्र घूमते हैं।
    महज औपचारिकता  
    हाथियों को लेकर वन विभाग द्वारा रोज नए प्रयोग किये जा रहे हैं लेकिन कामयाबी न मिल केवल औपचारिकता ही सब् साबित हो जा रहे हैं,अभी फिर वन विभाग द्वारा एक दल बना प्रतापपुर क्षेत्र से हाथियों को तमोर पिंगला या सेमरसोत अभ्यारण्य में छोडऩे का प्रयास किया जा रहा है लेकिन यह भी महज औपचारिकता ही बनती नजर आ रही है।
     फिलहाल दल् द्वारा मोहनपुर में डटे बाईस हाथियों के दल् को वन कर्मियों,प्रशिक्षित लोगों के साथ ग्रामीणों को साथ में रख खदेडऩे का प्रयास किया जा रहा,दो दिनों में करीब दो किमी मोहनपुर से दूर खदेडऩे में वे कामयाब भी हुए लेकिन सुबह होते ही वे पुन: मोहनपुर जंगल में वापस आ गए। 
    यह काम किसी चुनौती से कम नहीं है क्योंकि हाथी बड़ी संख्या में हैं तथा अंधेरे में जंगल के बीच घुस इन्हें खदेडऩा खतरनाक भी है और जान का खतरा भी,यही कारण है कि हाथियों को खदेडऩे का काम सिर्फ औपचारिकता बनता दिख रहा है। हाथियों की विकराल समस्या के बीच सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि ग्रामीणों के साथ वन विभाग का स्थानीय अमला ही हाथियों के साथ जूझता नजर आता है न शासन, न प्रशासन और न ही वन विभाग के बड़े अधिकारी।

     

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Posted Date : 10-Nov-2017
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    बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    कांकेर दुधावा मार्ग पर अवस्थित करप और रिसेवाड़ा दो ऐसी उपेक्षित विरासते हैं जो भव्य अतीत को आज भी अपने भीतर संजोये हुए हैं। दोनों ही शिव मंदिर हैं तथा आकार प्रकार और स्वरूप में बिलकुल एक जैसे हैं। संरक्षण की दृष्टि से भी ये दोनों ही मंदिर समान रूप से पेड़ों से पीठ टिकाये खड़े और भगवान भरोसे हैं। जहाँ रिसेवाड़ा के निकट अवस्थित शिव मंदिर में भीतर शिव-पर्वती की मूर्ति अवस्थित है जिसके सामने एक कलात्मक प्रतिमा नंदी की रखी हुई है। 
    पुरातत्व विभाग की दृष्टि चूंकि इन प्राचीन स्थलों को ले कर सजग नहीं हुई है अत: गाँव वालों ने ही बेचारे नंदी का खंडित मुँह सीमेंट से जोड़ कर ठीक करने की कोशिश की है। इस प्रयास में नंदी का मुह इतना विकृत हो गया है कि पहचानना कठिन है। सुधार करने का एक प्रयास मंदिर के ठीक सामने अवस्थित भैरवी की युद्धरत प्रतिमा के साथ भी किया गया है तथा उसका पूरा मुँह ही नये सिरे से सीमेंट की मदद से बना दिया गया है। यह मंदिर अत्यधिक एकांत में निकटतम बसाहट से पर्याप्त  दूरी पर अवस्थित है। 
    मंदिर के द्वार के दोनो ओर गणेश प्रतिमायें है तथा ठीक सामने देवी काली की एक प्रतिमा है। मंदिर के ठीक सामने एक वृक्ष पर बहुत पुरानी लोहे की चेन बंधी हुई है। इस चेन को तने ने समय के साथ आधा अपने अंदर कर लिया है तथा कुछ ही कडिय़ाँ बाहर से दृष्टिगोचर होती हैं। हमारे साथ वहाँ गये एक बुजुर्ग ग्रामीण ने बताया कि मान्यता है कि यह चेन गाँव का भाग्य ले कर बंधी है यदि किसी ने इसे खोल दिया तो अनिष्ट की आशंका है। 
    यदि इस पूरे दृष्य की प्रतिकृति बना दूं तो करप का मंदिर उपस्थित हो जाता है जो कि कांकेर से लगभग 20 किलोमीटर पर करप गाँव में अवस्थित है। मंदिर के ठीक सामने तालाब तथा पीछे की ओर मुख्य सड़क है। मंदिर लगभग 6 मीटर की ऊँचाई लिये हुए है एवं मुख्य द्वार पर शीर्ष में एक गणेश प्रतिमा उकेरी गयी है। अब इसका सबसे दु:खद पहलू यह कि करप का मंदिर इसलिये सुरक्षित है चूंकि मंदिर के पीछे एक विशाल वृक्ष है जिसने इसे थाम रखा है। मंदिर के प्रस्तर खण्ड पूरी तरह उस पेड़ की ओर झुक गये हैं तथा प्रकृति चिंतित प्रतीत होती है कि अजीब लोग हैं, उन्हें चिंता ही नहीं कि यहाँ क्या नष्ट होने जा रहा है? यह मंदिर कांकेर के सोमवंशी शासक कर्णराज (1184-1206 ई.) द्वारा निर्मित है। 
    कर्णराज का समय कांकेर की राजनीति में उथलपुथल के लिये जाना जाता है। उनके पिता बोपदेव ने अपने दोनो पुत्रों कर्णराज तथा सोमराज के बीच संघर्ष को टालने के लिये शासन के दो भाग कर दिये थे। कर्णराज के हिस्से कांकेर, धमरतराई तथा सिहावा का क्षेत्र आया तथा सोमराज के हिस्से तहंकापार, चारामा और गुरूर का क्षेत्र आया। कर्णराज ने करप के मंदिर के अलावा सिहावा में पाँच शिव मंदिरों तथा कांकेर में दूध नदी के किनारे विशाल रामनाथ शिव मंदिर का निर्माण भी करवाया था। बात पुन: वहीं कि हमारे प्राचीन मंदिर अब विलुप्त हो रहे हैं। रिसेवाड़ा तथा करप के शिव मंदिरों की अवस्था यह है कि यदि वे आसपास पेड़ों से न घिरे होते तो अब तक धराशायी हो चुके होते। क्या कर रहे हैं हम? क्या केवल मौन व्रत?

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Posted Date : 09-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    यह बात मुझे तर्क की दृष्टि से अचरज में डालती है कि जो बस्तर भूमि राम का प्रमुख वनवास स्थल रही है, वहाँ शैव मत का अधिक प्रसार पाया गया। भगवान विष्णु की प्रतिमायें अथवा वैष्णव मत की प्रधानता के नारायणपाल तीर्थ जैसे कुछ प्रमुख उदाहरणों के अतिरिक्त बहुत अधिक चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं होते। 

    नल शासन काल वैष्णव मत के बस्तर में प्रसार का निश्चित रूप से प्रधान काल रहा होगा। यह केवल राजिम के विलासतुंग अभिलेख अथवा राजिवलोचन विष्णु मंदिर से ही स्पष्ट नहीं होता अपितु समकालीन अन्य वैष्णव प्रतिमायें भी इस बात की गवाही देती है। इन्ही में से एक स्थान है - जुनवानी। जुनवानी आज एक गाँव है किंतु इसकी अवस्थिति ऐतिहासिक काल से प्रामाणित होती है। कांकेर-अमोड़ा मार्ग पर महानदी के किनारे जुनवानी की अवस्थिति है। प्राचीन पुस्तकों व ऐतिहासिक दस्तावेजों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यहाँ ईंटों का एक मंदिर था जिसके भीतर लगभग एक मीटर उँची भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थित थी। अब एक नवनिर्मित मंदिर में भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा को स्थापित कर दिया गया है, पुरातनता पूरी तरह नष्ट की जा चुकी है। वहाँ प्राचीन ईंटो से बनी कोई संरचना भी दृष्टिगोचर नहीं होती; यह हो सकता है कि उन ईंटों को नये जमाने की आस्था ने सीमेंट मिला कर मंदिर में बदल दिया है। सौभाग्यवश अभी विष्णु प्रतिमा सुरक्षित है तथा उसमे किसी तरह का अपभ्रंशात्मक कार्य नहीं किया गया है। 
    यह विष्णु प्रतिमा राजिम स्थित भगवान विष्णु की प्रतिमा से अपने स्वरूप, निर्माण पद्यति तथा सौष्ठव में बहुताधिक समानता रखती है। यह एक चतुर्भुजी प्रतिमा है जिसमें दो हाथी अपने सिर मिलाये वंदना की अवस्था में खड़े हैं, जिनके मस्तक पर एक कमलपुष्प रखा हुआ है। इसी कमल के फूल पर भगवान विष्णु की खड़ी हुई मुद्रा में मूर्ति बनायी गयी है। इस चतुर्भुजी मूर्ति ने उपर के दो हाँथों में शंख तथा चक्र एवं नीचे के एक हाँथ में गदा थामी हुई है; एक हाथ की उंग्लियाँ ध्यान मुद्रा में निर्मित है। मुख्य प्रतिमा के चारों ओर दशावतार तथा अनेक अन्य आकृतियाँ भगवान विष्णु की आराधना में प्रार्थनाबद्ध निर्मित की गयी हैं। यह एक भव्य मूर्ति है जो संभवत: बेसाल्ट से बनी है एवं इसकी अनेक कलात्मक बारीकियाँ अभी भी सुरक्षित हैं। अब केवल यह प्रतिमा ही है जो अतीत से जुड़ी है चूंकि इसका परिवेश पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। भगवान विष्णु की मूर्ति के बगल में एक भगवान शिव की खण्डित मूर्ति रखी हुई है। इस मूर्ति का अगला हिस्सा जुनवानी के पास ही एक तालाब के पास रखा हुआ है।  
    वस्तुत: इतिहास को ले कर हमारी उपेक्षा ही धरोहरो का वह हश्र करती है कि वे गूंगी-बहरी हो जाती हैं। यदि हमारी धरोहरें इसी तरह अपना ऐतिहासिक परिवेश खो देंगी तो कभी भी यह तर्कपूर्वक सिद्ध नहीं किया जा सकेगा कि इन प्रतिमाओं का संबन्ध इतिहास के किस काल से है। क्या ये गुप्तकालीन हैं अथवा नलशासन निर्मित अथवा नागों ने इन्हें बनाया है या कि इनका निर्माण किसी अन्य ऐतिहासिक परिस्थिति में हुआ है जिसके विषय में अभी कहा सुना नहीं गया है। ये केवल प्रस्तर प्रतिमायें नहीं हैं अपितु इस वनान्चल का वह अतीत हैं जो तस्दीक करती हैं कि एक समय का बस्तर आज के बस्तर से किस तरह भिन्न था। 

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Posted Date : 08-Nov-2017
  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  

    कोण्डागाँव नगर से लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर अमरावती एक छोटा सा गाँव है जहाँ तक सघन वन और प्राकृतिक सुन्दरता को निहारते हुए पहुँचा जा सकता है। किसी समय यह जंगली भैंसों के शिकार के लिये उपयुक्त स्थान माना जाता था। 
    बस्तर रियासत के आखिरी राजा प्रवीरचन्द्र भंजदेव ने अपनी पुस्तक आई प्रवीर दि आदिवासी गॉड में इस क्षेत्र को वनभैंसों के शिकार के लिये अपना निजी शिकारगाह लिखा है। यह क्षेत्र पूर्व महाराजा प्रवीर और पूर्व प्रशासक नरोन्हा की आपसी खींचतानी के लिये भी जाना जाता है। नरोन्हा ने अमरावती को प्रवीर के शिकार के लिये विशेष आरक्षित क्षेत्र होने का विरोध किया था यद्यपि यह भी उल्लेखनीय है कि वे स्वयं भी उस दौर में अच्छे शिकारी माने जाते थे।
     शिकार के अनौचित्य पर कोई दूसरी राय नहीं हो सकती साथ ही अंग्रेजों, उनके मेहमानों तथा राजाओं के दौर ने जिस तरह जंगली भैसों सहित अनेक वन्यजीवों को नष्ट किया है वह भी बीते समय की क्रूर कहानी है। यह तभी आने वाली पीढ़ी को बताई समझाई जा सकती है जब समय के साक्ष्य हमारे पास बचे हों। 
    यह स्वाभाविक था कि शिकारगाह होने के कारण राजा और उसके मेहमानों के रुकने-ठहरने की व्यवस्था यहाँ होनी चाहिये थी। अमरावती गाँव के दूसरे छोर पर सड़क से थोडा नीचे उतरते ही एक पुराना बँगला दिखाई पड़ता है जो अब पूरी तरह से समय के हवाले कर दिया गया है। आसपास फैला मैदानी इलाका और भवन के पीछे से लगता हुआ जंगल इस स्थान को राजा द्वारा अपने विश्रामगृह के लिये चुने जाने के कारणों को उजागर करता है। 
    अब न जंगली भैंसे रहीं, न अंग्रेज रहे, न राजा बचे; लेकिन जो बच गया है उसे हमारी उपेक्षायें एक दिन मिट्टी में मिला देंगी। भवन का बाह्य हिस्सा बहुत हद तक सुरक्षित है और प्रथम दृष्टि में यह दुमंजिला प्रतीत होता है। प्रवेशद्वार विशाल है, खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी हैं, आयताकार किंतु अच्छे आकार के रोशनदान और हॉल नुमा बड़े बड़े कक्ष यह बताने के लिये पर्याप्त हैं कि राजा अपने लाव-लश्कर के साथ यहाँ ठहरता रहा होगा। भवन की छते तिकोनी हैं तथा लकडिय़ों पर टिकी हुई हैं। 
    पुरानी लकडिय़ाँ अभी भी शान से भवन को सुरक्षा प्रदान किये हुए हैं तथा खपरैल भी कई स्थानों पर यथावत है। सभी दरवाजे व खिड़कियों के शीर्ष का हिस्सा अर्धचन्द्राकार है। 
    भवन में नीचे की ओर मुख्य रूप से एक हॉल और तीन बड़े कमरों को सुरक्षित देखा जा सकता है जो अपने निर्माण में डायनिंग हॉल, बैठक कक्ष तथा शयन कक्ष की प्रतीति देते हैं। उपर का हिस्सा पूरी तरह टूट गया है अत: इस भवन, कमरों की संख्या और उसके उपयोग पर आधिक टिप्पणी नहीं की जा सकती। कमरों की हालत यह है कि यहाँ की दरारों में साँपों ने अपना बसेरा बना लिया है। अब इस भवन की आयु अधिक नहीं है चूंकि नई पेड़ों और उनकी जड़ों ने दीवारों को धकेलना आरंभ कर दिया है। एक पेड़ तो भवन की छत पर ही उग आया है जिसकी मोटी मोटी जड़े कमरे के भीतर दीवारों को दो फांक करती हुई आगे बढ़ रही हैं। 
    यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्य भवन से लगभग बीस मीटर की दूरी पर पीछे की ओर रसोईघर अलग से बनाया गया था जो अपनी संरचना में बहुत हद तक सुरक्षित है। मुख्य प्रवेश द्वार, आयताकार दो बड़े बड़े कक्ष, सामान रखने के ताखे, चूल्हा और धुँवे से निजात पाने के लिये एक लंबी सी चिमनी भी देखी जा सकती है। रसोईघर की एक दीवार के उपर वर्ष 1944 लिखा हुआ है।

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Posted Date : 07-Nov-2017

  • बस्तर में पले बढ़े सुपरिचित लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने बस्तर के उन पक्षों, तथ्यों और विशेषताओं को सामने रखा है जो अब तक बहुत ही कम पढऩे-सुनने को मिले हैं। उनके 250 लघु-आलेख की यह श्रृंखला- बस्तर की अनकही-अनजानी कहानियां, हम नियमित प्रकाशित कर रहे हैं।  


    एर्राबोर क्या महज एक गाँव है? क्या एर्राबोर एक प्रतीक नहीं बन गया है लाल-आतंकवाद और सलवाजुडुम के खूनी धमाकों और आपसी रक्तपिपासाओं का? एर्राबोर पहुँच कर मैं ठिठक गया हूँ, स्तब्ध रह गया हूँ। वीरानी से स्वागत और कुछ देर बाद अविश्वास भरी अनेक निगाहों से सामना। ताड़ के पेड़ों की लम्बी लम्बी कतारें क्यों खूबसूरत नहीं लग रही हैं मुझे? यह केवल टूटी फूटी सड़कों से गुजऱ कर यहाँ तक पहुँचने की थकान भर नहीं है, यह मेरे भीतर की संवेदनशीलता है शायद, जिसे इन जंगलों के भीतर हुई घटनायें इस समय दर्द भरी चिकोटियाँ काट रही हैं। एर्राबोर पहली बार तब सुर्खियों में आया जब सत्रह जुलाई वर्ष-2006 की रात, एक बड़ा नक्सली हमला यहाँ अवस्थित सलवा जुडुम कैम्प में किया गया था। सलवा जुडुम के प्रारम्भ होने के पश्चात से यह नक्सलियों द्वारा प्रतिवाद किये जाने की प्रारम्भिक लेकिन दुर्दांत घटना थी। लगभग पाँच सौ झोपडिय़ों को आग लगा दी गयी, सैंतीस आदिवासी मारे गये और कई तो जीवित ही स्वाहा हो गये थे जिसमें छ: साल की बच्ची से ले कर बुजुर्ग भी थे। एर्राबोर ने पहली बार नक्सलवाद पर स्पष्ट रूप से आतंकवाद होने का लेबल बस्तर में चस्पा किया था। यह वह आरंभिक घटना थी जिसने बताया कि वह चाहे सलवा जुडुम की हो या कि माओवादी बंदूखें वस्तुत: आदिवासी के खिलाफ ही उठेंगी। सलवा जुडुम जब तक जारी रहा तब तक विश्व मीडिया का ध्यान बस्तर के इस सुदूरतम कोने में बना हुआ था किंतु सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात से स्थितियों में आमूलचूक परिवर्तन आ गया। शक्ति-साम्य वाली स्थितियाँ हटते ही सलवाजुडुम से जुड़े कार्यकर्ता चुन चुन कर नक्सलियों द्वारा मारे जाने लगे।
    एर्राबोर का सुलगना अब बंद है। उसकी साँसें सीआरपीएफ के कैम्प ने रोक रखी हैं और पहचान बन बन गये हैं लाशों के स्मृति स्तम्भ। सड़क के दोनो ओर कतारबद्ध कोया कमांडो के स्मृति स्मारक। भले ही कोया कमाण्डो अतीत की बात हो गये लेकिन बस्तर की संस्कृति कुछ भी भूलने नहीं देती। पूरे बस्तर में पुरा पाषाण काल से आज तक के मृतक स्मृति अवशेष तलाशने पर आसानी से मिल जाते हैं जिन्हें स्थानीय मठ कह कर पुकारते हैं। कांकेर से कोण्टा तक मृतक स्मारकों के तरीकों में अनेक तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं लेकिन वे बनाये जाते हैं, और इस तरह पीढिय़ाँ अपने पूर्वजों से परिचित रहा करती हैं। लेकिन एर्राबोर में कैसी पीढिय़ाँ और कौन सी स्मृतियाँ? जिनके हाथों में नक्सली बंदूखे हैं उनकी मौत पर अगर लाल स्मृति चिन्ह बनाया जाता है तो सेना के जवान उसे तहस नहस कर आते हैं और कोया कमाण्डो या कि कथित रूप से सलवा जुडुम से जुड़े आदिवासियों के मृतक स्मारकों को नक्सली नहीं छोड़ते। हिसाब बराबर करने कराने के दौर में सड़क के किनारे कतार बद्ध बंदूख थामें खड़े रह गये कोया कमाण्डो और एसपीएफ आदि के मृतक स्मारक वस्तुत: बंदूख के साये में ही जि़न्दा हैं। सवाल यह भी है कि एर्राबोर का बचना किसके लिये जरूरी है जब यहाँ की बहुतायत आबादी का पता ठिकाना नामालूम हो चला है? 
    एर्राबोर से थोड़ी ही आगे बढऩे पर बस्तर संभाग का आखिरी छोर कोण्टा पहुचा जा सकता है। कोण्टा से लग कर ही एक छोटा सा गाँव है मोटू जहाँ तीन नक्सलप्रभावित प्रदेशों की सीमायें मिलती है तेलांगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ़। यह भूगोल भी एर्राबोर का दुर्भाग्य ही तो है। न जाने खामोशी का कितना पानी शबरी में बहता जायेगा और अनकहा ही रह जायेगा एर्राबोर? 

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