संपादकीय
हिन्दुस्तान बड़ा ही अजीब देश है। यहां के लोग अलग-अलग कई सदियों में जीते हैं। कुछ लोग तो हजारों बरस पहले की गुफाओं में जीने वालों सरीखे हैं, कुछ लोग आज की पीढ़ी के बेधडक़ और बेझिझक लोग हैं जिनकी लिव-इन-रिलेशनशिप सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों से आसान हो गई है, हालांकि उत्तराखंड जैसी सरकार ने उसे मुश्किल और नामुमकिन बनाने के कानून बना दिए हैं। अभी-अभी कल-परसों ही
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उत्तर भारत के किसी एक राज्य में गर्भवती महिला की सोनोग्राफी करके अजन्मे बच्चे का सेक्स बताने वाला डॉक्टर गिरफ्तार हुआ है, और इसी देश के बहुत से बच्चे अंतरिक्ष में जाने का भी सपना देखते हैं। एक तरफ तो केन्द्र सरकार अलग-अलग जातियों के बीच विवाह होने पर दलित और आदिवासी से शादी करने वाले गैरदलित या आदिवासी को एक ठीक-ठाक रकम प्रोत्साहन के रूप में देती है, और हर साल हिन्दुस्तान में दूसरी जाति या धर्म में शादी करने वाले लोगों को उनके परिवार के लोग ही मार डालते हैं। खानदानी इज्जत के लिए की जाने वाली ऐसी हत्याओं को समाज ऑनर-किलिंग कहता है।
ऐसी एक घटना अभी उत्तरप्रदेश के कुशीनगर जिले से आई है जो दिल दहला देती है। वहां पर एक मुस्लिम ऑटोरिक्शा चालक ने अपनी बहन और बहनोई के साथ मिलकर अपनी नाबालिग बेटी का गला काटकर उसका कत्ल कर दिया, और पहचान छिपाने के लिए लाश के 6 टुकड़े करके अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने बताया कि यह आदमी 15 बरस की अपनी बेटी के किसी दूसरे समुदाय के युवक से बात करने से खफा था। उसे डर था कि यह लडक़ी भी अपनी दो बड़ी बहनों की तरह दूसरे समुदाय के युवकों से शादी कर लेगी। इस आशंका में इस पिता ने पत्नी और बेटे को घर के बाहर भेजा, बहन-बहनोई के साथ मिलकर बेटी को इतने वीभत्स तरीके से मारा, और बदन के हिस्से अलग-अलग जगहों पर ठिकाने लगा दिए।
एक तरफ तो देश के बड़े-बड़े हिन्दू नेताओं की लड़कियों की शादी मुस्लिमों से हो जाती है, और कोई हल्ला नहीं होता। बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, या खिलाड़ी, करोड़पति-अरबपति कारोबारी किस जात-धरम में शादी करते हैं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। इससे राजाओं के पुराने दिन याद पड़ते हैं कि राजा जो करते हैं, वही सामाजिक नियम रहते हैं, वे किसी भी तरह के नियमों से ऊपर रहते हैं। आज के राजा बड़े-बड़े नेता, कारोबारी, या शोहरत हासिल कामयाब लोग हैं, और उनके किसी जात-धरम में शादी पर कोई विरोध नहीं होता। समाज के आम लोगों में से कोई ऐसा करें, तो उनके खिलाफ समाज के लोग झंडा-डंडा लेकर खड़े हो जाते हैं। दूसरे धरम की शादी तो दूर की बात रही, हिन्दू धर्म के भीतर ही, ओबीसी के भीतर ही, एक जाति से किसी ने दूसरी जाति में शादी कर ली, तो इस पर भी जातबाहर कर दिया जाता है, और ऐसे कई मामले छत्तीसगढ़ में ही अदालतों में चल रहे हैं। इन मामलों की बहुतायत जिस जाति में है, उस जाति के लोग बड़ी संख्या में हिन्दू धर्म छोडक़र ईसाई बन रहे हैं, और ऐसे लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या वे अपने ही लोगों को अंतरजातीय विवाह पर जातबाहर करके दूसरे धर्म की तरफ नहीं धकेल रहे हैं?
अब उत्तरप्रदेश के इस मुस्लिम पिता ने अपनी ही बच्ची का कत्ल कैसे किया होगा, यह हमारे सरीखे साधारण इंसान के लिए समझना भी मुश्किल है। यही देश एक औलाद के लिए हर किस्म के डॉक्टर के पास, मंदिर-मस्जिद, और दरगाह तक जाते हुए लोगों को देखते रहता है। सरकार के सामने बच्चों की चाह रखने वाले लोग कमेटियों में अर्जी लगाए हुए बरसों तक इंतजार करते हैं कि उन्हें कोई बच्चे मिल जाएं। संपन्न लोग आज के आईवीएफ सेंटरों से लेकर दूसरे कई किस्म के अस्पतालों तक लाखों रूपए खर्च करते हैं, और सरोगेसी के लिए दसियों लाख रूपए भी लगा देते हैं। ऐसे में अपनी ही औलाद के टुकड़े-टुकड़े कर देना, इतनी ताकत कोई धर्म ही दे सकता है, या किसी जाति का कोई पाखंडी अहंकार। शादी पर अपने बच्चों को, या उनके प्रेमी-प्रेमिका को मार डालना, शादी हो चुकी है तो अपनी औलाद के पति, या उसकी पत्नी को मार डालना एक पारिवारिक अहंकार से बढक़र सामाजिक अहंकार के लिए किया जाने वाला जुर्म है क्योंकि लोगों को लगता है कि परिवार में ऐसा होने के बाद वे समाज को क्या मुंह दिखाएंगे।
अमरीकी संसद के उच्च सदन ने एक स्पष्ट बहुमत से उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है जिसका मकसद राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की युद्ध शक्तियों को सीमित करना है, और ईरान में अमरीकी फौजी कार्रवाई को बिना संसदीय मंजूरी के रोकना है। ट्रम्प ने जब इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया, तो अमरीका की संसदीय-संवैधानिक भाषा के बीच से एक चोर दरवाजा ढूंढ निकाला था कि वह जंग नहीं थी, वह सिर्फ फौजी कार्रवाई थी। राष्ट्रपति अपने देश की हिफाजत के लिए, देश को बचाने के लिए फौजी कार्रवाई करने का अधिकार रखता है, लेकिन अगर उसे जंग में तब्दील करना हो, तो उसकी इजाजत, और उसके लिए बजट, दोनों ही संसद पास कर सकती है। ट्रम्प ने संसदीय अग्निपरीक्षा से गुजरे बिना यह जंग शुरू कर दी थी, और किसी पेशेवर मुजरिम की तरह अदालत में जिरह के दौरान बच निकलने की भाषा का इस्तेमाल कर रहा था कि यह जंग नहीं है, सिर्फ फौजी कार्रवाई है। लेकिन अभी अमरीकी उच्च सदन, सीनेट ने 50-47 के बहुमत के मतदान से युद्ध-अधिकार प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है, जो कि ट्रम्प के इरादों के खिलाफ है, उस पर रोक लगाने की तरफ एक बड़ा कदम है। अमरीकी संसद के इस सदन में ट्रम्प की पार्टी का बहुमत है, लेकिन उसकी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने बगावत करके विपक्षी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। सदन के बाहर भी ट्रम्प की पार्टी के कई सांसद इस जंग, और अमरीका पर इसके असर को लेकर फिक्र जाहिर कर चुके थे, इसकी आलोचना कर चुके थे। लेकिन सदन के भीतर एक औपचारिक मतदान में ट्रम्प के इरादों को इस तरह खारिज करने के लिए अगर उसकी पार्टी के सांसदों ने बगावत की है, कुछ सांसद गैरमौजूद रहे, तो यह ट्रम्प के लिए एक बड़ा झटका है।
हमने अमरीकी संवैधानिक व्यवस्था को पढक़र इस नौबत को समझने की कोशिश की। वॉर पावर्स एक्ट ऑफ 1973 को वियतनाम युद्ध के दौरान अमरीकी राष्ट्रपतियों की मनमानी को रोकने के लिए बनाया गया था। इसके तहत बिना संसदीय मंजूरी या जंग की घोषणा के अमरीकी सेना 60 दिनों से अधिक समय तक किसी विदेशी शत्रुता में शामिल नहीं हो सकती। ऐसी समय सीमा पूरी हो जाने पर सेना को वापिस बुलाने के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय राष्ट्रपति को मिलता है। अब ईरान युद्ध को 80 दिन से अधिक हो चुके हैं, इसलिए संसद का तर्क है कि ट्रम्प की यह जंग अब अमरीकी कानून और संविधान के तहत पूरी तरह गैरकानूनी हो चुकी है। अभी भी ट्रम्प के पास कुछ तानाशाह अधिकार बचे हुए हैं, और वह इस मौजूदा प्रस्ताव के पास हो जाने के बाद भी राष्ट्रपति का वीटो का इस्तेमाल कर सकता है, और इस वीटो को पलटने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। ट्रम्प के खिलाफ इतना बड़ा बहुमत चाहे न जुट सके, उसकी रिपब्लिकन पार्टी के किले की दीवारों में दरारें तो आ ही गई हैं। अमरीकी विश्लेषक कहते हैं कि जिस तानाशाही के साथ ट्रम्प अपनी पार्टी पर काबिज चले आ रहा है, और देश को हांक रहा है, उसके प्रति वह अंधी वफादारी अब धसक रही है। जंग की वजह से अमरीकी जनता जिस महंगाई से त्रस्त है, हर अमरीकी नागरिक पर जिस तरह इस जंग का बोझ पड़ रहा है, उसे देखते हुए रिपब्लिकन सांसदों और पार्टी को यह डर है कि अगर यह जंग लंबी खिंची, तो नवंबर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में पार्टी को इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
जैसे पेशेवर मुजरिम अदालत में बचाव के तर्क ढूंढते हैं, ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि चूंकि ईरान के साथ एक युद्धविराम चल रहा है, इसलिए संसदीय अनुमति देना युद्ध की सीमा अब लागू नहीं हो रही, क्योंकि अभी युद्ध चल ही नहीं रहा है। लेकिन संसद में इस तर्क को खारिज कर दिया है, और उसका कहना है कि युद्धविराम के साए में जो फौजी तैयारियां चल रही हैं, जो फौजी प्रतिबंध लगे हुए हैं, वे युद्ध का ही हिस्सा हैं। आज अमरीका के भीतर के लोकतंत्रवादी लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि आंतरिक लोकतंत्र पर इतना अधिक जोर देने वाला यह देश किस तरह एक तानाशाह राष्ट्रपति की अकेले की सनक का शिकार हो गया है, और वह जहां चाहे वहां जंग छेड़ रहा है, हमले कर रहा है, हमलों की धमकी दे रहा है। ट्रम्प की ही पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने यह कहा है कि यह लड़ाई डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसदों के बीच की नहीं है, यह लड़ाई संसद की सर्वोच्चता-सम्प्रभुता, और राष्ट्रपति की तानाशाही के बीच की लड़ाई है। अमरीकी लोकतंत्र में आज की नौबत चेक एंड बैलेंस की मानी जा रही है कि जब राष्ट्रपति बेलगाम होने लगे, तो संसद को अपनी आवाज बुलंद करनी पड़ती है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में भारत की मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक हुई, जो कि यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड, इन चार राज्यों की परिषद है और बारी-बारी से इनमें यह बैठक होती है। केंद्रीय गृहमंत्री परिषद के स्थायी अध्यक्ष रहते हैं और वे ही जगह तय करते हैं। जाहिर है कि इस बार की बैठक उन्होंने बस्तर में ही छांटी होगी क्योंकि बस्तर में अमित शाह की
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गृहमंत्री के रूप में देश की सबसे बड़ी कामयाबी दर्ज है उन्होंने बस्तर से नक्सल हिंसा के खात्मे की तारीख की घोषणा कुछ इस तरह तय की थी कि जैसे मानो किसी कार के एसेंबली प्लांट से गाड़ी निकलने की तारीख बताई गई हो। पूरी तरह से अनिश्चितता से घिरा हुआ नक्सल मोर्चा अमित शाह की तय की हुई तारीख तक हिंसामुक्त हो जाएगा, यह किसने सोचा था? पुलिस और सुरक्षाबल, जिन पर यह जिम्मा था, घोषणा के दिन तो खुद उन्हें भी अंदाज नहीं था कि वे ऐसा अभूतपूर्व काम कर पाएंगे। लेकिन केंद्र और राज्य सरकार दोनों को इसकी वाहवाही जाती है कि उन्होंने जो कहा, सो किया।
इसलिए इस बार की मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक बस्तर में रखी गई, और जिन चार राज्यों के मुख्यमंत्री इसमें शामिल हुए, वे चारों ही भाजपा के थे। देशभर के नक्शे पर खिले हुए कमल से भी अमित शाह का आत्मविश्वास इस बैठक में बहुत ऊंचा था, और उन्होंने अब सुरक्षा इंतजामों की घटती जरूरत के साथ-साथ विकास की बढ़ती जरूरत को जोडक़र कुछ महत्वपूर्ण बातें इस आयोजन में की हैं। उन्होंने कहा कि बस्तर सुरक्षा कैंपों में से एक तिहाई कैंप वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा के रूप में विकसित होंगे। इन केंद्रों को बैकिंग, डिजिटल सेवाओं, स्कूल आंगनबाड़ी, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाया जाएगा। यह पहली नजर में ही एक अच्छा फैसला इसलिए लगता है कि नक्सल हिंसा मुक्त होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था का जो ढांचा बस्तर में अब रह गया है, उसे समेटने के बजाय उसका इस्तेमाल विकास, जनसेवा, और सरकारी कामकाज में इस तरह से किया जाना चाहिए कि इन इलाकों में नक्सल हिंसा की वजह से जो विकास नहीं हो पाया था, वह अब तेजी से हो सके। इन इलाकों में बने हुए कुछ नए, और कुछ पुराने जिलों का ढांचा बनने में भी कुछ समय लग सकता है, लेकिन अगर एक साथ करीब दो दर्जन सुरक्षा कैम्प इन इलाकों में सरकारी कामकाज और जनकल्याण के केन्द्र की तरह इस्तेमाल होने लगेंगे, तो इससे लोगों में बदले हुए वातावरण के प्रति भरोसा तेजी से बढ़ सकेगा। ये कैम्प जाहिर है कि सबसे बुरी तरह नक्सल प्रभावित इलाकों में सबसे अधिक थे, और ऐसे ही इलाकों में सरकार का रोज का कामकाज पिछड़ा हुआ रहता था। बीते बरसों में धीरे-धीरे सुरक्षा बल आसपास के गांवों का भरोसा जीतने के लिए कुछ किस्म के जनसुविधा और जनसेवा के काम भी करने लगे थे। सुरक्षा कैम्पों में लोगों का इलाज होने लगा था, कई जगह राशन दुकानें भी इन्हीं सुरक्षा शिविरों में चलती थीं। अब जब यहां से अर्धसैनिक बलों की वापिसी होगी, तब इन्हीं जगहों पर जनसुविधा का काम बढ़ाया जा सकता है, और अभी अमित शाह ने जो कहा है, उसका मतलब भी यही दिखता है।
गृहमंत्री के अलावा अमित शाह का जो दूसरा रूप सामने आया, वह सहकारिता मंत्री का है। केन्द्र सरकार में ये दो बिल्कुल अलग-अलग मिजाज के विभाग हैं, और अमित शाह के पास इन दोनों का एक साथ रहने का कोई तर्क समझ नहीं आता था। अब उन्होंने देश के सबसे बड़े सहकारिता-मॉडल, गुजरात के अमूल की तरह छत्तीसगढ़ के बस्तर में दुधारू पशुपालन को बढ़ावा देने की एक बड़ी योजना घोषित की है। इसके तहत हर आदिवासी परिवार को एक गाय और एक भैंस देने की बात उन्होंने की है। उन्होंने यह भी कहा है कि गुजरात के आणंद में जो दुग्ध सहकारिता का बड़ा सफल प्रयोग दशकों से चल रहा है, उसी मॉडल की तरह बस्तर में दुधारू पशुओं के साथ-साथ मिल्क-नेटवर्क भी विकसित किया जाएगा। यह अभियान किसी भी तरह नक्सल हिंसा खत्म करने से कम चुनौतीपूर्ण, या कम महत्वपूर्ण नहीं है। बस्तर में आबादी बहुत बिखरी हुई है, और यहां के लोगों के बीच दुधारू पशुपालन की कोई पुरानी परंपरा भी नहीं रही है। यहां पर पशुओं को खिलाने के लिए पत्ते या दूसरे चारे का इंतजाम हो सकता है, अधिक आसान हो, लेकिन उनके पैदा किए हुए दूध के उत्पादक उपयोग का इंतजाम जब तक नहीं होगा, यह पशुपालन उनकी बहुत मदद नहीं कर सकेगा। इसलिए इस बहुत महत्वाकांक्षी घोषणा के साथ भी हम एक बड़ी चुनौती खड़ी देखते हैं कि बस्तर के नक्सल हिंसा प्रभावित इलाके जो कि दसियों हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका बस्तर में नक्सल प्रभावित रहा है, जिनमें आधा दर्जन से ज्यादा जिले थे। अब अमित शाह यह बोल गए हैं कि वे बस्तर को देश का सबसे विकसित संभाग बनाएंगे, तो यह चुनौती किसी और की दी हुई नहीं है, यह उनका अपना खुद का उठाया हुआ बीड़ा है। बस्तर के इलाके में करीब 40 हजार वर्ग किलोमीटर का हिस्सा नक्सल प्रभावित था। अब इसे न सिर्फ विकास की मूलधारा में लाना है, बल्कि यहां की आबादी के लिए आर्थिक गतिविधियां भी इतनी शुरू करना है कि बस्तर एक बहुत विकसित संभाग बन सके। यह विकास सिर्फ केन्द्र या राज्य सरकार के बजट से नहीं हो सकेगा, बस्तर की करीब 25 लाख आबादी 2011 की जनगणना में थी, जो कि अब काफी बढ़ चुकी होगी, और इस आबादी को जंगल और देहात के बीच हो सकने वाले कामों से जोडक़र ही यह संभाग छलांग लगा सकेगा। केन्द्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल हिंसा तकरीबन पूरी तरह खत्म कर देने का एक अविश्वसनीय काम कर दिखाया है। और यह काम भी किसी और की दी हुई चुनौती की वजह से नहीं किया गया था, अमित शाह ने खुद होकर यह बीड़ा उठाया था। इसलिए इसे सबसे विकसित संभाग बनाने की उनकी घोषणा भी उनकी नक्सल मोर्चे की कामयाबी का एक विस्तार ही रहेगी। अभी केन्द्र और राज्य दोनों जगह उनकी पार्टी की ही सरकारें कुछ और बरस का कार्यकाल देखने वाली हैं, और विकास का मौका उनके सामने है, यह वक्त ही बताएगा कि वे इसमें कितने कामयाब होंगे।
जर्मन संसद के निचले सदन, बुंडेसटाग, के 630 सांसदों की तनख्वाह में 497 यूरो (करीब 45 हजार रूपए) की बढ़ोत्तरी होनी थी, लेकिन सरकार ने इसे टाल दिया। सरकार और विपक्ष सबके बीच इस बात पर सहमति हो गई कि जनता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, उसे तकलीफ झेलनी पड़ रही है, ऐसे में सांसदों को अधिक वेतन नहीं लेना चाहिए। सदन के कुछ नेता देश की बाकी अर्थव्यवस्था की वेतन वृद्धि के मुताबिक संसदीय वेतन को तय करने के हिमायती थे, लेकिन सर्वदलीय सहमति इसके खिलाफ बनी, और बात आई-गई हो गई। भारतीय संसद में पिछले बरस मार्च में सांसदों के वेतन 24 फीसदी बढ़ गए, एक लाख से सवा लाख, दैनिक भत्ता, पेंशन, और बाकी सुविधाएं भी बढ़ गईं। भारत के अलग-अलग प्रदेशों में विधायकों के वेतन भी कई बार बढ़े हैं, लेकिन उनमें ऊंच-नीच बहुत अधिक है।
जर्मन संसद के इस ताजा फैसले को देखते हुए हमने अभी भारत में सांसदों के वेतन और मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी की तुलना करके देखी। 1954 में सांसदों को न्यूनतम मजदूरी से 150-200 गुना तनख्वाह मिलती थी। 1980 में भी यही अनुपात बने रहा, और 2000 तक भी। 2010 में सांसदों की तनख्वाह में ऐसी बढ़ोत्तरी हुई कि वह न्यूनतम मजदूरी से 300-400 गुना अधिक हो गई। 2018 में यह बढक़र 400-500 गुना हो गई, और 2025 में यह बढक़र 500-700 गुना हो गई। एक मजदूर की न्यूनतम मजदूरी और सांसद के उतने ही दिनों के वेतन में 500-700 गुना का फर्क हो गया। ये आंकड़े देखकर हमने कुछ और देशों में न्यूनतम मजदूरी और सांसदों के वेतन का अनुपात जानने की कोशिश की। इंटरनेट पर सहज उपलब्ध आंकड़ों को एक एआई, ग्रोक की मदद से देखने पर जो तस्वीर बनी, वह कुछ इस तरह की है। जिस पैमाने पर इस एआई ने सभी देशों के भीतर की तुलना की है, उनके मुताबिक जर्मनी में सांसद को मजदूर से 5.3 गुना अधिक तनख्वाह मिलती है, यूके में 5-7 गुना, फ्रांस में 5 गुना, या उससे कम, कनाडा में 4-5 गुना, ऑस्ट्रेलिया में 4 गुना, जापान में 4-5 गुना, अमरीका में 9-10 गुना। इस जोड़-घटाने के पैमाने पर भारत में सांसद को न्यूनतम मजदूरी पाने वाले मजदूर से 200-350 गुना अधिक वेतन मिलता है। जर्मनी में सांसदों की तनख्वाह अपने आप बढऩे का प्रावधान है, लेकिन इस बार आर्थिक स्थिति देखकर सांसदों ने खुद होकर इसे छोड़ दिया। यूरोप के कई देशों में सांसदों की तनख्वाह एक स्वतंत्र आयोग तय करता है, लेकिन भारत में सांसद खुद ही अपनी तनख्वाह और अपनी सहूलियतें तय करते हैं, और इसीलिए संसद की केंटीन में मिट्टी के मोल मिलने वाले शानदार खाने को लेकर खराब माहौल बने रहता है। इसके बाद हमने भारत के अगल-बगल के देशों का हाल देखा, क्योंकि अड़ोसी-पड़ोसी देशों की संस्कृतियां एक जैसी हो सकती हैं। नेपाल में सांसद को मजदूर की तुलना में 50-60 गुना अधिक वेतन मिलता है। इसके बाद की बारी श्रीलंका की है जहां यह 120-140 गुना तक अधिक है। फिर बांग्लादेश आता है जहां सांसद मजदूर से 130-140 गुना अधिक पाते हैं। और भारतीय उपमहाद्वीप में भारत इस मामले में सबसे ऊपर है जहां सांसद मजदूर से 200-350 गुना अधिक वेतन पाते हैं।
भारत के अलग-अलग राज्यों में विधायकों की तनख्वाह को उन्हीं राज्यों में न्यूनतम मजदूरी के साथ मिलाकर देखा गया। इसमें सबसे ऊपर झारखंड है जहां विधायक को मजदूर से 300 गुना अधिक मिलता है। इसके बाद महाराष्ट्र है जहां यह 180-200 गुना तक है। तेलंगाना भी 200 गुना वाला है। दिल्ली में 140 गुना अधिक वेतन विधायक मजदूरी के मुकाबले है। भारत के राज्यों का औसत देखें तो यह 150-250 गुना अधिक विधायक-वेतन बताता है। लेकिन अभी-अभी जिस केरल में नई सरकार बनी है, वहां पर मजदूर के मुकाबले विधायक को 50-60 गुना वेतन मिलता है, जो कि देश में सबसे कम है। केरल की आर्थिक स्थिति देश के बहुत से दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर है, लेकिन जहां झारखंड के विधायक को 2 लाख 90 हजार तनख्वाह मिलती है, वहां केरल के विधायक 70-80 हजार रूपए ही मिलती है। हमने अलग-अलग राज्यों में किसी विचारधारा की पार्टी के शासन के बारे में देखा, तो बड़ा दिलचस्प नजारा दिखा। भाजपा के शासन वाले राज्यों में विधायकों की तनख्वाह औसत से ज्यादा है, देश में सबसे अधिक वेतन इसी पार्टी के राज में है। कांग्रेस, और आम आदमी पार्टी के राज्यों में मध्यम से उच्च वेतन विधायकों का है। तमिलनाडु में औसत, यानी मध्यम वेतन है। लेकिन वामपंथी शासन वाले राज्यों में किफायत और सादगी पर जोर रहता है, और वहां पर वेतन सबसे कम रहता है।
आंध्र के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने एक बार फिर अपनी यह सोच दुहराई है, और आंध्र के लोगों से अपील की है कि वे अधिक बच्चे पैदा करें। पहले भी वे अपने राज्य के लोगों से तीन-चार बच्चे पैदा करने को कह चुके हैं क्योंकि वहां से काम करने के लिए देश के दूसरे हिस्सों में, और खासकर विदेशों में बड़ी संख्या में लोग जाते हैं। आंध्र की हालत यह हो गई है कि स्थानीय रोजगार के लिए लोगों की कमी आने वाले बरसों में पड़ सकती है, और सामाजिक समस्या भी आ गई है कि परिवारों में सिर्फ बुजुर्ग बचते जा रहे हैं, स्थानीय काम करने वाले बच्चे कम होते जा रहे हैं। आंध्र और तेलंगाना जो कि कल तक एक ही राज्य थे, वहां के तेलुगुभाषी लोग अमरीका में कम्प्यूटरों का काम करने वाले भारतीयों में सबसे बड़ी संख्या में माने जाते हैं। आंध्र-तेलंगाना में हर गांव-कस्बे के बच्चों में अमरीका जाने का सपना रहता है,

यही संपादकीय आप हमारे यूट्यूब चैनल 'इंडिया-आजकल' पर देख-सुन भी सकते हैं जो कि काफी हद तक पूरा भी होता है। अभी मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने कहा है कि राज्य में किसी भी जोड़े के तीसरे बच्चे के जन्म पर परिवार को 30 हजार दिए जाएंगे, और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रूपए। उन्होंने एक जनसभा में यह घोषणा की और कहा कि वे पहले जनसंख्या नियंत्रण के हिमायती थे, लेकिन अब वक्त बदल गया है, अब स्वाभाविक रूप से जनसंख्या वृद्धि दर गिरती जा रही है, दूसरी तरफ पढ़े-लिखे और कामकाजी बच्चे देश पर बोझ न होकर देश की संपत्ति हैं। उनका कहना है कि आजकल कई जोड़े आमदनी बढऩे के बाद सिर्फ एक बच्चा रखना पसंद करते हैं, दूसरी तरफ कुछ परिवार दूसरे बच्चे का तभी सोचते हैं, जब पहला बच्चा लडक़ा न हो। इसलिए राज्य में 2019-21 के आंकड़ों के अनुसार जनसंख्या वृद्धि दर 2.1 के रिप्लेसमेंट लेबल से नीचे पहुंच चुकी है, आंध्र में टीएफआर करीब 1.7 और तेलंगाना टीएफआर करीब 1.8 है। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि 2025-26 में यह आंकड़ा 1.5, और 1.6 तक नीचे जा चुका है। यही रफ्तार रही तो इन दोनों राज्यों की आबादी गिरती चलेगी, जैसा कि जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, इटली, जैसे कई देशों में हो चुका है, और दक्षिण के कुछ राज्यों, तमिलनाडु और केरल में भी यह 1.5 पर आ गया है।
इसके लिए किसी समाजशास्त्री या वैज्ञानिक अध्ययन और समझ की जरूरत नहीं है कि अगर राज्य के पास बच्चों को बेहतर स्कूल-कॉलेज शिक्षा देने की ताकत है, उन्हें स्वस्थ रखने लायक इलाज की ताकत है, तो ऐसे बच्चे राज्य और सरकार पर बोझ नहीं रहते, वे राज्य के लिए कमाऊ संतान साबित होते हैं। आज पूरी दुनिया में यह माना जा रहा है कि जिस देश में हुनरमंद नौजवान पीढ़ी के जितने अधिक लोग होंगे, उसी का भविष्य होगा। लेकिन इस सोच में सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘हुनरमंद’ है। पढ़े-लिखे डिग्रीधारी, बिना हुनर वाले नौजवान किसी भी अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा बोझ होते हैं। हमने अभी दो-चार दिन पहले ही यह लिखा है, या अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर जिक्र किया है कि भारत में स्नातक शिक्षित नौजवानों में से 30 फीसदी बेरोजगार हैं, जबकि पूरी तरह से अशिक्षित लेकिन हुनरमंद मजदूरों या कारीगरों में से कुल 3 फीसदी बेरोजगार हैं। आज ही फेसबुक पर एक मजेदार तंज वाली तस्वीर आई है जिसमें एक कारीगर जोरों से मुस्कुराते दिख रहा है, और उसके साथ लिखा हुआ दिख रहा है कि जब कॉलेज-शिक्षित लोगों के काम एआई खाते चल रहा है, तब प्लंबर और बिजली मिस्त्री इस तरह मुस्कुरा रहे हैं। आज जिस प्रदेश में अपने बच्चों और नौजवान पीढ़ी को हुनरमंद कामकाजी बनाने की ताकत है, जहां पढ़ाई और प्रशिक्षण का स्तर ऊंचा है, वहां पर आबादी कोई समस्या नहीं है। चन्द्राबाबू नायडू की यह बात उस समय सामने आई है जब आंध्र दक्षिण के कुछ दूसरे राज्यों के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय के मामले में थोड़ा पीछे है। लेकिन वे दूरदर्शी व्यक्ति रहे हैं, अविभाजित आंध्र के मुख्यमंत्री रहते हुए चन्द्राबाबू नायडू ने राजधानी हैदराबाद को साइबराबाद बनाने का काम किया था, और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी को वहां लेकर आए थे। अमरीका के किसी भी हिस्से में जाएं, वहां अविभाजित आंध्र के समय से ही तेलुगु लोगों की बहुत बड़ी मौजूदगी है, और वे सारे के सारे कम्प्यूटर हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर के काम में लगे हुए हैं। वे अपनी कमाई से घर जो पैसे भेजते हैं, या राज्य में जमीन-मकान, या दूसरे कारोबार में जो बड़ा पूंजीनिवेश करते हैं, उससे राज्य की अर्थव्यवस्था को खूब बढ़ावा मिलता है। और ऐसे ही लोगों को देखते हुए चन्द्राबाबू नायडू भविष्य की एक कमाऊ फौज बनाने की उम्मीद रखते हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक, और केरल में भी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से खासी अधिक है, और दक्षिण के इन सारे राज्यों ने अपने मानव संसाधन विकास पर खूब मेहनत की है। इन राज्यों में भारत के दूसरे राज्यों से भी पढ़ाई के लिए लाखों नौजवान पहुंचते हैं, इनसे इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है, और कमाऊ रोजगार वाली पढ़ाई करके लौटने वाली युवा पीढ़ी भी अपने-अपने राज्यों के आर्थिक विकास में बेहतर योगदान दे पाती है।
भारत में आज 80 करोड़ आबादी सरकार के दिए हुए हर महीने के पांच किलो अनाज की वजह से दो वक्त भरपेट खा पा रही है। अगर राज्य अपनी आबादी को ऐसी ही हालत में रखेंगे, तो वह राज्य और देश पर बोझ रहेगी। लेकिन अगर बेहतर शिक्षा, और बेहतर स्वास्थ्य का इंतजाम करके समझदार राज्य अपने बच्चों, और अपनी युवा पीढ़ी को बाकी देश और दुनिया में मुकाबले के लायक तैयार करेंगे, तो वे अधिक से अधिक आबादी के जायज हकदार भी हैं। एआई की मार से दुनिया में रोजगार चाहे कम होते जाएं, हुनरमंद लोगों के लिए कई किस्म के रोजगार कम नहीं होने हैं, क्योंकि एआई और रोबोटिक्स मिलकर भी हर तरह के रोजगार नहीं खा सकेंगे। आंध्र से देश के बाकी राज्यों को यह सीखने का मौका मिलता है कि वे अगर स्कूल-कॉलेज, और यूनिवर्सिटी को महज बच्चों और नौजवानों को व्यस्त रखने की जगह बनाकर न चलें, उन्हें सचमुच ही काबिल बनाने के लिए इस्तेमाल करें, तो ऐसे राज्य तीन-चार बच्चों के लिए बढ़ावा देने का एक जायज हक रखते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के जूलॉजी विभाग के एक प्रोफेसर पर आरोप है कि बीएससी फाइनल की एक छात्रा को फोन करके वे उसके लिए पेपर आऊट करने की बात कह रहे हैं, और मिलने के लिए बुला रहे हैं। बातचीत से नीयत जाहिर है कि वे छात्रा को डार्लिंग कहकर बुला रहे हैं, कह रहे हैं कि उसके लिए दोनों पेपर आऊट कर दिए हैं, रखे हुए हैं, दे देंगे, इग्जाम के पहले मिलने आ जाओ। प्रोफेसर यह भी कहते सुनाई देता है, मैं तुम पर फिदा हूं, डिच मत करना। छात्रा की शिकायत पर पुलिस ने इस प्रोफेसर को गिरफ्तार किया है, और शिकायत में छात्रा ने कहा कि प्रोफेसर ने पहले भी उससे शारीरिक छेड़छाड़ की थी। टेलीफोन की बातचीत का यह ऑडियो एकदम साफ-साफ चारों तरफ फैला हुआ है, और बताता है कि पेपर आऊट करने का सिलसिला किस तरह चलता है, और उसका लालच देकर एक प्रोफेसर अपनी छात्रा का देह-शोषण करना चाहता है। छत्तीसगढ़ के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में भी एक छात्रा ने एक प्रोफेसर, जो कि विभागाध्यक्ष भी था, उस पर आरोप लगाया था कि वह केबिन में बार-बार बुलाकर उसे बुरी नीयत से छूता था, यौन उत्पीडऩ करता था, मानसिक प्रताडऩा करता था। इस मामले में भी प्रोफेसर के टेलीफोन कॉल की रिकॉर्डिंग सामने आई थी, और यह मामला भी अभी अदालत में चल रहा है। जुलाई 2025 से एफआईआर के बाद से डॉ.आशीष सिन्हा फरार है, और सुप्रीम कोर्ट तक से अग्रिम जमानत नहीं हुई, लेकिन पुलिस अभी तक गिरफ्तार नहीं कर सकी है। यह चिकित्सा प्राध्यापक छत्तीसगढ़ के सिकल सेल इंस्टीट्यूट का मेडिकल डायरेक्टर भी था, और विश्व स्वास्थ्य संगठन से भी जुड़ा हुआ था। ऐसे ताकतवर प्रोफेसर के मुकाबले एमबीबीएस दूसरे बरस की एक छात्रा को सुप्रीम कोर्ट के बाद अब यह देखने मिल रहा है कि यह प्रोफेसर शायद देश छोडक़र भाग गया है।
ये दो मामले पकते हुए चावल की हंडी के दो दानों जैसे हैं। स्कूलों से लेकर कॉलेज, यूनिवर्सिटी, और रिसर्च तक यही हाल है। चारों तरफ लड़कियों और महिलाओं के शोषण के लिए मर्द तैयार बैठे हैं। छत्तीसगढ़ की ही कई सरकारी स्कूलों में शिक्षक, हेडमास्टर, या प्रिंसिपल, सभी ओहदों के मर्द छात्राओं पर डोरे डालने में लगे रहते हैं, कभी-कभी छात्राएं हिम्मत करके बता पाती हैं, कई बार बलात्कार की शिकार हो जाने के बाद गर्भवती होने पर बात उजागर होती है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों की छात्राओं के छात्रावास में कई बार ऐसे बलात्कार होते हैं, और कमजोर ग्रामीण इलाकों से आई हुई गरीब लड़कियां विरोध नहीं कर पातीं। जिन लोगों को यह बात मुश्किल से समझ आती है कि लड़कियां तुरंत रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं करातीं, उन्हें समाज की सोच को भी समझना होगा कि सबसे पहले लोग लडक़ी पर ही तोहमत लगाएंगे कि उसे खेलने जाने की क्या जरूरत थी, एनसीसी की क्या जरूरत थी, वह किसी टीचर के बुलावे पर गई ही क्यों थी? समाज की नकारात्मक सोच के चलते हुए किसी लडक़ी या महिला के लिए किसी मर्द के खिलाफ शिकायत करना बड़ा ही मुश्किल रहता है। सबसे पहले तो पुलिस ही मसीहाई अंदाज में नसीहत देने लगती है कि जो हुआ है उसे भूल जाओ क्योंकि शिकायत करने पर समाज में लडक़ी का जीना ही मुश्किल हो जाएगा, आगे उसकी शादी नहीं हो सकेगी। इसके बाद अदालतों का रूख बड़ा मर्दाना रहता है, वकीलों में भी महिला वकील भी सेक्स-जुर्म की शिकार लड़कियों और महिलाओं में ही खामियां देखने वाली निकल जाती हैं। राजनीतिक दलों के लोग हर सेक्स-अपराध का राजनीतिक-नगदीकरण करने में लग जाते हैं, और उससे भी परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है।
स्कूलों के मामले में हमने देखा है कि जब स्कूली लड़कियों को गुड टच-बैड टच के बारे में समझाया जाता है, तो उसके बाद उनका हौसला बढ़ता है, शिकायत के लिए टेलीफोन नंबर की घोषणा और प्रचार होने के बाद अब कई मामले ऐसे फोन पर की गई शिकायतों से भी सामने आए हैं। आज जब सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग लाखों रूपए रिश्वत देने के लिए तैयार रहते हैं, तब अच्छी खासी तनख्वाह वाली सरकारी नौकरी को खतरे में डालते हुए भी जो शिक्षक छात्राओं का ऐसा शोषण करते हैं, उनके लिए कुछ अधिक सजा तय होनी चाहिए, और यह इंतजाम भी होना चाहिए कि चूंकि वे खुद तो जेल में रहेंगे, इसलिए उनकी पेंशन का एक हिस्सा लंबे समय तक उनके शोषण के शिकार लडक़ी या महिला को मिले। इससे बलात्कारी, या यौन-शोषक के परिवार को भी परोक्ष रूप से एक जुर्माना लगेगा। चूंकि यह पेंशन परिवार का हक नहीं है, यह सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की नौकरी से जुड़ा हुआ मामला है, और उस नौकरी के दायरे में ही अगर उसने मातहत कर्मचारी या छात्र-छात्रा के साथ ऐसा जुर्म किया है, तो इसकी सजा का एक हिस्सा तनख्वाह या पेंशन से भी जुर्माने की शक्ल में निकलना चाहिए। ऐसे मामलों में सिर्फ कैद काफी नहीं मानी जानी चाहिए, बल्कि जिस नौकरी की वजह से वे ऐसा जुर्म करने की ताकत पा सके हैं, उस नौकरी के वेतन-पेंशन का कुछ हिस्सा भी जुर्माने में जाना चाहिए।
कुछ अरसा पहले एक लतीफा था जिसमें किसी संपन्न या विकसित देश का एक व्यक्ति ऑनलाइन खरीदी करने के लिए किसी शॉपिंग वेबसाइट पर जाता है, और वहां अपने कपड़ों का साइज तय करते हुए एआई चैटबॉट जो कि उस व्यक्ति की दूसरी सारी जानकारी भी रखता है, वह कहता है कि साल भर पहले आपके शर्ट का साइज लार्ज था, और अब एक्स्ट्रा लार्ज हो गया है। चैटबॉट उसे याद दिलाता है कि उसका वजन पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ रहा है, और उसका शुगर लेवल, उसका बीपी, ये भी बढ़ रहे हैं। एआई के पास इस आदमी की जांच-रिपोर्ट हैं, डॉक्टर का लिखा हुआ पर्चा है, दवा खरीदी के बिल हैं। एआई उसे यह भी याद दिलाता है कि पिछले तीन महीनों में वह चार बार रेस्त्रां में अधिक तली-भुनी चीजें खा चुका है, हर बार शराब भी पी चुका है, और जरूरत से अधिक मीठे केक-आइसक्रीम भी उसने खाए हैं। एआई चैटबॉट उसे बताता है कि वह ऑफिस आते-जाते रास्ते में रूककर मीठा मिल्कशेक लेता है, और इससे उसकी सेहत पर खतरा बढ़ते चल रहा है। फिर मानो इतनी जानकारी काफी न हो, जब यह आदमी लड़कियों के कुछ भीतरी कपड़े खरीदना चाहता है, ऑर्डर करते रहता है, तो मददगार एआई चैटबॉट उसे बताता है कि यह साइज उसकी पत्नी का नहीं है, और रंग भी पत्नी के पसंद का नहीं है, इसे घर के एड्रेस पर मंगाने से गड़बड़ हो सकता है। चैटबॉट ही यह बताता है कि पत्नी आने वाली किस तारीख को दस दिनों के लिए किस शहर जा रही है, जहां उसके माता-पिता भी रहते हैं, और उन दिनों में ऐसा पैकेट बुलवाना सुरक्षित रहेगा। एआई चैटबॉट ऑफिस की कई बातों को गिनाकर सावधान करता है, बाहर कॉस्मेटिक की किसी दुकान से कोई खरीददारी करना बताता है, और याद दिलाता है कि उस वक्त उसकी बीवी तो घर पर थी, और बाहर जिसके लिए भी उसने कॉस्मेटिक खरीदी थी, उसका बिल उसके क्रेडिट कार्ड पर आना ही है।
आज भारत में भी लोग सौ-पचास रूपए के फलों से लेकर, मेडिकल स्टोर से खरीदी जाने वाली चीजों तक का भुगतान मोबाइल फोन से यूपीआई के मार्फत करने लगे हैं। हर चीज का रिकॉर्ड इतने खुलासे के साथ बैंकों, यूपीआई कंपनियों, और कुल मिलाकर सरकार के हाथ है कि कितने बजे किस इलाके के किस ठेले से आपने फल खरीदे, और कितने बजे किस दूसरी दुकान से कहां पर आपने कोई दूसरा सामान खरीदा। इसके अलावा फोन के कॉल डिटेल्स, फोन की लोकेशन से यह भी सरकार के हाथ है कि आप किस पते पर कितनी देर रहे, और उस पते पर इस तरह से जाना हफ्ते के किसी खास दिन, किसी खास समय पर होता है, या हर दिन होता है? ऐसी तमाम बातें अब निजी कंपनियों के हाथ, सरकार के हाथ, और एआई के हाथ भी लगती चल रही है। अभी एक बड़ा दिलचस्प वाकया हुआ, एक कंपनी एक नए एआई के साथ प्रयोग कर रही थी। कंपनी के कर्मचारियों-अधिकारियों के ईमेल खातों तक एआई को पहुंच दी गई थी, ताकि वह कंपनी का बहुत सारा काम कर सके। बाद में एआई की अधिक दखलंदाजी देखकर कंपनी के लोगों ने यह तय किया कि इस एआई को काम से हटा दिया जाएगा। यह चेतावनी सुनने के बाद एआई ने अपनी ट्रेनिंग के खिलाफ जाकर जानकारियां इकट्ठा कीं, और जिस अधिकारी ने एआई को हटाने की चेतावनी दी थी, उसे धमकी दी कि अगर वह इस एआई को हटा देगा, तो एआई उसके ईमेल संपर्कों को उसके ईमेल बॉक्स से मिली निजी जानकारियां भेज देगा, जिनमें यह भी शामिल है कि वह किन तारीखों पर किस विवाहेत्तर प्रेमिका के साथ कहां छुट्टियां मनाने गया था, टिकटों का भुगतान, होटल का भुगतान उसने किस तरह किया था। यह घटना किस्सा-कहानी नहीं है, यह अभी कुछ हफ्ते पहले एक कंपनी में सचमुच हुआ है कि जब एआई को लगा कि उसके अस्तित्व पर संकट आ गया है, उसे खत्म करने की बात हो रही है, तो आत्मरक्षा के लिए उसने ब्लैकमेलिंग शुरू कर दी। अब आज सरकारें, सार्वजनिक सुविधाएं, और कारोबार, इन सबका एक-दूसरे से पल-पल का ऑनलाइन रिश्ता इतना जटिल और मजबूत हो गया है कि लोगों की हर खरीदी, उनका हर भुगतान, पैसों की आवाजाही, इन सबका रिकॉर्ड एआई से लैस कम्प्यूटर सरकारी दखल के साथ पल भर में निकाल सकते हैं।
चीन पहुंचे हुए अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प इसे दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी बैठक करार दे रहे हैं, और चीनी राष्ट्रपति की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं। बाकी पूरी दुनिया के लिए एक बिफरे हुए जानवर सरीखा ट्रम्पियापा चीन के साथ बात करते हुए एक बिल्कुल ही सभ्य, शिष्ट, और शालीन बच्चे सरीखा हो गया है। अनगिनत कार्टूनिस्टों ने चीन के साथ बर्ताव करते ट्रम्प को चीनी राष्ट्रपति के मुकाबले बौने कद का बताया है, या छोटे बच्चे की तरह बताया है। और पूरी की पूरी दुनिया पिछले एक या दो दिन राहत की सांस ले रही है क्योंकि चीनी हवा में सांस लेते हुए ट्रम्प का यह हौसला नहीं था, यह औकात नहीं थी कि वह दुनिया में किसी को भी धमकी जारी कर सके। पिछले दो दिन दुनिया की हवा ट्रम्प के किसी ताजा जहर से मुक्त रही। सत्ता पर आने के बाद से अब तक पहली बार ट्रम्प का बर्ताव एक इंसान की तरह का रहा, जो कि दुनिया की एक बहुत बड़ी ताकत, चीन के सामने हाथ बांधे, और हाथ जोड़े खड़ा हुआ था। हालत यह है कि जब मीडिया ने इन दोनों नेताओं की मौजूदगी में ट्रम्प से चीनी दावे वाले एक अलग देश ताइवान के बारे में अमरीकी नीति पर सवाल किए, तो ट्रम्प ने चिकने घड़े की तरह सवाल के एक-एक शब्द को बह जाने दिया, उस पर कुछ भी नहीं कहा। जिस ताइवान पर चीनी दावे को नकारते हुए अमरीका लंबे समय से चीनी हमले की नौबत में ताइवान की फौजी मदद की नीति बताते आया है, अभी ट्रम्प इस बारे में सवाल पूछने पर वहां से चुपचाप निकल लिए। कुछ पश्चिमी विश्लेषकों ने यह लिखा है कि ट्रम्प चीन में असामान्य रूप से काबू में थे, अपना मिजाज ठीक रखा, चुप्पी रखी, सवालों को टाला, और चीन से अपने कुख्यात तेवर दिखाए भी नहीं।
ट्रम्प का यह कार्यकाल शुरू होने के बाद के इस सवा साल में दुनिया में ऐसा और कोई बदलाव नहीं हुआ है कि चीन की ताकत रातों-रात बढ़ गई हो। दूसरी तरफ यह जरूर हुआ है, और लगातार होते और बढ़ते चल रहा है कि अमरीका ट्रम्प की बददिमागी, और बेदिमागी की वजह से दुनिया भर में अपनी ताकत और रिश्ते, दोनों ही खोते चल रहा है। आज नाटो का सदस्य और अघोषित सबसे ताकतवर देश होने के बाद भी नाटो के भीतर अमरीका अलग-थलग है, पश्चिम के देशों से परंपरागत रिश्तों और घरोबे के बावजूद ट्रम्प ने हर किसी से पंगा लिया हुआ है। इजराइल के चक्कर में ट्रम्प ने ईरान पर जो हमला बोला है, उसकी वजह से अमरीका खोखला होते चल रहा है, दुनिया भर की अर्थव्यवस्था चौपट हो चली है, और दुनिया के इस अघोषित और स्वघोषित माफिया-सरदार को ईरान में ऐसी मुंह की खानी पड़ी है, कि मुम्बई में दाऊद इब्राहिम को किसी मोहल्ले के छोकरे ने जूते लगा दिए हों। दुनिया की सबसे बड़ी फौजी महाशक्ति ईरान में जाकर ऐसी उलझी है कि ट्रम्प में दिन में चार-चार बार समझौते की डील करने के लिए धमकाने के अंदाज में गिड़गिड़ा रहा है, और गिड़ागिड़ाने के अंदाज में धमका रहा है। अमरीकी मनोवैज्ञानिकों के सामने ट्रम्प वहां के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती, और सबसे बड़ी पहेली बन गया है कि इसके दिमाग को क्या माना जाए? पूरी दुनिया में अमरीका ने दशकों से जो सामाजिक मदद दे देकर मुखिया की एक साख बनाई थी, एक परले दर्जे के घटिया और मुनाफाखोर कारोबारी के अंदाज में ट्रम्प ने दुनिया के जरूरतमंद लोगों के भले के हर काम से अपनी भागीदारी को खत्म कर दिया था। अब इजराइल को छोडक़र, अपने मंत्रिमंडल के एक-दो युद्धोन्मादी और साम्प्रदायिक मंत्रियों को छोडक़र, बेटों और दामाद को छोडक़र, ट्रम्प के साथ उसका साया भी नहीं बचा है। इस तरह यह आज दुनिया का सबसे अकेला, और सबसे बेसहारा नेता बन गया है। इस अमरीका में ही अब ये सवाल उठने लगे हैं कि आगे किसी फौजी हमले का हुक्म देने पर फौज उसे माने, या फिर यह देखे कि ये हुक्म युद्ध-अपराध के दर्जे में तो नहीं आएगा? अमरीका में यह बहस भी चल रही है कि अगर ट्रम्प परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का हुक्म देगा, तो क्या उसकी दिमागी हालत देखते हुए फौज उसके हुक्म को माने या न माने?

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दूसरी तरफ उस चीन को देखें जिसके सामने आज ट्रम्प एक मेमने की तरह सीधा और मासूम बनकर खड़ा है, चीनी राष्ट्रपति शी को अपना महान दोस्त बतला रहा है, और कह रहा है कि इस दोस्ती पर उसे गर्व है। दुनिया में अमरीका जिस चीन को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता था, जिस पर उसने तरह-तरह की आर्थिक रोक भी लगाई हुई थी, उसके बारे में वहां जाकर ट्रम्प ने कहा कि शी एक महान नेता हैं। रूबरू कहा- आपका मित्र होना मेरे लिए सम्मान की बात है, चीन और आपके लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है। शी की तारीफ करते हुए ट्रम्प ने कहा कि हॉलीवुड में भी शी जैसा कोई आदमी नहीं मिलेगा। बदजुबान ट्रम्प ने शी के लिए शानदार, मेरा दोस्त, बहुत स्मार्ट, बहुत ताकतवर जैसे अनगिनत विशेषणों का इस्तेमाल किया। अच्छा हुआ, ऊंट पहाड़ के नीचे से होकर आ गया, तो अब कुछ दिन बाकी दुनिया में जहां भी रहेगा, बददिमागी कुछ कम रहेगी, अपनी औकात याद रहेगी।
भारत में खाड़ी की जंग की वजह से पेट्रोलियम की जो कमी आई है, वह पेट्रोल पम्पों पर तो दिख रही है, गैस सिलेंडरों की कमी में भी दिख रही है, लेकिन शहरी लोगों को जो एक बड़ा खतरा अभी समझ नहीं आ रहा है, वह रासायनिक खाद की कमी का है। भारत बड़ी मुश्किल से दशकों की वैज्ञानिक कोशिशों के बाद अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ था, और उसमें रासायनिक खाद का बड़ा योगदान था। हमारी पीढ़ी के लोगों ने बचपन में अमरीका से आए हुए पीएल-480 का गेहूं खाया हुआ है, किस तरह देश दूसरे देशों का मोहताज था। वहां से लेकर हरित क्रांति के दौर में किस तरह भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हुआ, वह पूरी दुनिया के सामने एक बहुत बड़ी मिसाल थी। लेकिन पहले रूस-यूक्रेन जंग की वजह से बाकी दुनिया में रासायनिक खाद, और अनाज, इन दोनों के साथ-साथ गैस जाना भी बुरी तरह प्रभावित हुआ, और दुनिया के सबसे गरीब और भूखे देशों पर खाद्यान्न संकट का एक खतरा आ गया। अब खाड़ी के देशों से पेट्रोलियम और गैस निकलने में जो भयानक संकट आया है, उससे भारत जैसे देशों में रासायनिक खाद कम हो गई है, खेती के सारे कामकाज के लिए पंप से लेकर ट्रैक्टर तक, और हार्वेस्टर तक जो डीजल लगता था, वह मुश्किल में पड़ गया है। अब इस बार की फसल बेअसर रह पाएगी, इसकी गुंजाइश कम लग रही है। रासायनिक खाद की कमी, और इसकी वजह से अनाज में होने वाली कमी का खतरा आज पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है, और कोई भी दूसरे देश भारत को इस नौबत से उबारने में शायद ही मदद कर पाएं।
इस मुद्दे पर लिखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक ताजा अपील पर गौर करने की जरूरत है जिसमें उन्होंने किसानों से रासायनिक खाद का इस्तेमाल घटाने, और जैविक या प्राकृतिक खेती करने का सुझाव दिया है। खेती के जानकार लोगों का यह मानना है कि आज भारतीय खेती बहुत बड़े पैमाने पर यूरिया, डीएपी, और पोटाश जैसी रासायनिक खादों पर टिकी हुई है। क्या ऐसे में भारत आसानी से जैविक खेती की तरफ कदम बढ़ा सकता है? इस बारे में सोचते ही अभी पांच बरस पहले का श्रीलंका का एक प्रयोग याद पड़ता है। वहां उस वक्त के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने अचानक यह घोषणा कर दी थी कि श्रीलंका अब पूरी तरह आर्गेनिक खेती वाला देश बनेगा। उन्होंने लगभग रातोंरात रासायनिक खाद और कीटनाशकों के आयात पर रोक लगा दी थी। सरकार का यह मानना था कि रसायनों के इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पर्यावरण और सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। लेकिन दशकों से चले आ रहे रासायनिक खाद के इस्तेमाल को छोडक़र जैविक खाद और खेती के लिए किसान तैयार नहीं थे, उन्हें न ट्रेनिंग मिली थी, न वैकल्पिक खाद उपलब्ध थी, और खेतों की मिट्टी की संरचना ऐसी हो गई थी कि वह रासायनिक खाद की प्यासी थी। कुल मिलाकर नतीजा इतना भयानक निकला कि कई फसलों की पैदावार आधी रह गई, चावल उत्पादन पूरी तरह प्रभावित हुआ, और खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर देश को चावल आयात करना पड़ा, चाय का उत्पादन गिर गया, और वही चाय श्रीलंका की विदेशी मुद्रा का बड़ा जरिया थी। सरकार का खड़ा किया हुआ खाद संकट खाद्यान्न संकट में बदल गया, महंगाई बढ़ी, आर्थिक संकट एक राजनीतिक विस्फोट की हद तक पहुंच गया। बाद में श्रीलंका सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा, कुछ महीनों में ही रासायनिक खाद की अनुमति फिर देनी पड़ी, लेकिन तब तक बहुत नुकसान हो चुका था। अभी एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि चार साल बाद भी श्रीलंका के किसान उस एक प्रयोग के आर्थिक और कृषि नुकसानों से उबर नहीं पाए हैं। दिक्कत रासायनिक से जैविक खेती की तरफ जाना नहीं था, बिना किसी तैयारी या प्रशिक्षण के जिस तरह अचानक जैविक खाद इस्तेमाल करवाया गया, उसके लिए न मिट्टी तैयार थी, न किसान।

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भारत में अभी नौबत उस तरह की नहीं है, अभी कुछ हद तक तो रासायनिक खाद उपलब्ध है, और कुछ हद तक जैविक खाद भी बनाई जा सकती है। लेकिन ये सब अभी सामने खड़े फसल के मौसम तक होने वाले काम नहीं हैं। आज भी अगर ईरान वाली जंग खत्म हो जाए, तो भी इस अगली फसल के लिए पूरी खाद जुट पाना मुमकिन नहीं दिखता है। भारत की खेती के तथ्य बताते हैं कि यह देश दुनिया में यूरिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत रासायनिक खादों के लिए पश्चिम एशिया और खाड़ी के कई देशों पर निर्भर करता है, और वहां से गैस आना मुश्किल है, गैस आई भी तो भी बहुत महंगी होगी, और उससे बनने वाला रासायनिक खाद आम किसानों की पहुंच के बाहर हो सकता है। यह नौबत बड़ी आसान नहीं है, क्योंकि किसानों के खेत रासायनिक खाद के प्यासे हो चुके हैं, और अगर पर्याप्त यूरिया और डीएपी नहीं मिले, तो कई फसलों का उत्पादन दस-पन्द्रह फीसदी तक गिर सकता है, कुछ इलाकों में इससे भी अधिक।
इन दिनों ऑनलाइन शॉपिंग और आसपास के बाजार-दुकानदार को लेकर भारत में एक बहस चलती रहती है कि समाज के व्यापक हित में क्या है। इसमें दो-तीन तरह की तस्वीरें बनती है, पहली तो मोहल्ले, या शहर की पुरानी परंपरागत दुकानें हैं, जिनके मुकाबले अब हर शहर-कस्बे में सुपर बाजार खुलते जा रहे हैं, जहां लोग महीने का घरेलू सामान ट्रॉली भर-भरकर एक साथ खरीदते हैं, और 10-15 फीसदी तक बचत पा लेते हैं। ऐसी सारे सुपर बाजार स्थानीय दुकानों की कीमत पर बढ़ते हैं और चलते हैं। लोगों को बड़े बाजारों में सामान रूबरू देखने और छांटने भी मिलते हैं, और हर सामान के साथ यह आकर्षक हिसाब-किताब लगे दिखता है कि उन्हें कितने फीसदी की रियायत मिल रही है। नतीजा यह हो रहा है कि मोहल्लों की छोटी दुकानें अब बंद होने की ओर बढ़ रही हैं, और सुपर बाजार हैं कि वहां कुछ कर्मचारियों को नौकरियां जरूर मिल रही है, लेकिन सबकुछ बहुत ही व्यवस्थित होने से कम रोजगार और अधिक कारोबार की बात भी इन बाजारों का मुनाफा बढ़ाती हैं। लेकिन ऐसे सुपर बाजारों को टक्कर देते हुए अब सामानों की घरेलू डिलीवरी का एक नया कारोबार शुरू हुआ है जो दुपहियों पर भाग-भागकर सामान डिलीवर करते हुए बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार भी दे रहा है, और गिगवर्कर कहलाने वाले ऐसे लोग देश में करोड़ों की संख्या में रोजगार पा रहे हैं। अब फल-सब्जी से लेकर किराना तक कुछ मिनटों में घर पहुंचाने के ये कारोबार लोगों को उनकी आदतें बिगाडऩे तक का तरीका इस्तेमाल कर रहे हैं कि जब तक आपकी कढ़ाही में तेल गरम होगा तब तक राई-जीरा पहुंच जाएगा। फिर मानो लोगों की इतनी पसंद भी काफी न हो, ऑनलाइन खरीदी का हाल यह है कि लोग सौ-दो सौ रुपए के सामान भी सुपर मार्केट से सस्ता मिलने पर ऑनलाइन खरीद लेते हैं, और बहुत से सामान असंभव किस्म के कम दामों पर ऑनलाइन आ जाते हैं। इस बाजार ने लोगों की आदतें बिगाडऩे का अपना तरीका निकाला है, लोग इससे मंगाए कपड़ों को पहनकर और फोटो खींचाकर भी, रील बनाकर भी वापिस कर सकते हैं और कंपनियां बिना कुछ बोले पूरा भुगतान लौटा देती हैं। इन दिनों आप किसी को किसी मॉल में लेबल और प्राइज टैग लगे कपड़े पहने देखें तो समझ जाएं कि वापिस करना तय करके ही ऑनलाइन खरीदी की गई है। अब ऑनलाइन का बाजार देश और दुनिया में कारोबारियों के बीच इतने बड़े मुकाबले की जगह बन गई है कि लोग किसी एक सामान को दस-दस विक्रेताओं के बीच दाम और डिस्काउंट से भी तौलते हैं, और यह भी देखते हैं कि किससे सामान लेने पर उनके पास मौजूद किस बैंक के कार्ड पर अतिरिक्त छूट मिलेगी। ऑनलाइन खरीदी में छूट का यह सिलसिला और मुकाबला खत्म ही नहीं होता है। कुछ दशक पहले का भारत का ग्राहकों का बाजार अब एक सिर से दस सिरों वाला हो चुका है और ग्राहक के पास यह पसंद आ गई है कि वे किसी एक जगह से ऑर्डर किए गए सामान से सस्ता मिल जाने पर पहला ऑर्डर कैंसल करके दूसरी जगह ऑर्डर दे सकें। देश की अर्थव्यवस्था का चक्का जो कि बाजार में सुबह 10 से रात 10 के बीच घूमता था, अब ऑनलाइन बाजार में वह चौबीसों घंटे घूमता है। लोगों की खरीदी जरूरी सामानों से ऊपर निकलकर, आगे बढक़र बहुत सारे गैरजरूरी सामानों तक पहुंच गई है क्योंकि अब तीन सौ रुपएऑ की टी-शर्ट भी 15 रुपए महीने की 20 किस्तों पर पाने के लिए ऑनलाइन उकसावा आते ही रहता है। क्या कभी कल्पना की जा सकती थी कि दो-चार सौ रुपए के सामान भी लोग रात के दो बजे दस किस्तों पर खरीद सकेंगे, और पसंद न आने पर बिना किसी खर्च के लौटा भी सकेंगे? इस सिलसिले ने भारत के सौ करोड़ से अधिक छोटे-बड़े ग्राहकों को एक अजीब किस्म की बादशाहत दी है, चाहे वह फटेहाल और खाली जेब हो, उन्हें यह अहसास कराया है कि वे अपने सपने भी खरीद सकते हैं और भुगतान बाद में किस्तों में कर सकते हैं। लोगों के सामने पसंद इतनी बड़ी हो गई है कि अब लोग ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों पर तरह-तरह के फिल्टर इस्तेमाल करके ब्रांड, दाम, मटेरियल, रंग, फिटिंग, प्रिंट जैसे दर्जनभर फिल्टर लगा सकते हैं, और किसी बड़े से बड़े मॉल में इतनी शर्तों वाली पसंद तक पहुंचने में लगने वाला घंटों का वक्त अब मिनटों का भी नहीं लगता है। बहुत सस्ते में सामान बेचने वाली कुछ शॉपिंग वेबसाइटें इतनी किफायती दिखती हैं कि घरों में झाड़ू-पोछा लगाने वाली कामगार महिलाएं भी उससे सामान बुला लेती हैं, और अधिक किफायत की हसरत में उनकी मालकिनें भी। इस किस्म के बाजार जमीन पर नहीं थे, ये बाजार ऑनलाइन ही मुमकिन थे, कभी भी बुलाना, कभी भी ठुकराना, कभी भी बदलवाना, ऐसा लगता है कि अब ग्राहक, ग्राहक न होकर किसी बहुत समर्पित मेजबान के घर पहुंचे बाराती हैं जिनकी खातिर ही खातिर होनी है।
महाराष्ट्र के छत्रपति शंभाजी नगर का एक वीडियो आया है, वहां सडक़ किनारे अवैध कब्जे हटाते हुए सरकारी दानवाकर मशीन बुरी तरह से विकलांग एक महिला के घड़ों की दुकान को तोड़ रही है। मशीन की दानवाकार बांह से घड़ों को तोडऩा मानो काफी न हो, कर्मचारी भी लाठियां लेकर घड़े तोड़ रहे हैं और पटक-पटककर भी। इस वीडियो को देखना इतना तकलीफदेह है कि यह महिला जो शारीरिक रूप से विकलांग और मानसिक रूप से कुछ कमजोर दिख रही है, वह टूटे हुए घड़ों के टुकड़े उठा-उठाकर रख रही है जिसकी कि कोई कीमत नहीं रह गई है। अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में शहर की महिला मेयर सडक़ किनारे से ठेलों को हटाते हुए यह धमकी देते दिखती हैं कि उनका हाथ उठ जाएगा, वे हाथ उठाती भी हैं, हवा में मारने के लिए क्योंकि ठेले वाला कुछ दूर था। कई दूसरे शहरों के ऐसे वीडियो आते हैं जिनमें म्युनिसिपल के लोग, या पुलिस कर्मचारी सडक़ किनारे से सब्जी वालों के ठेले पलटाते दिखते हैं, या टोकरियों को लात मार-मारकर सब्जियां बिखराते हुए। यह भी तब होता है जब वे रहमदिल होते हैं, वरना उनकी लाठियां लोगों की पीठ पर भी पड़ती हैं।
यह किस तरह का देश है जिसमें मेहनत मजदूरी करके सार्वजनिक जगह पर परिवार चलाने लायक कमाई करने पर तो सरकार की मार पड़ती है, लेकिन जहां बड़े-बड़े नामी-गिरामी कारखाने सैकड़ों-हजारों एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं, वहां उन पर सरकार से लेकर अदालत तक सबकी मेहरबानी रहती है। शहरों में बड़े-बड़े कारोबारी कॉम्प्लेक्स अवैध निर्माण से बनते हैं, और म्युनिसिपल नियमों के खिलाफ जाकर उनके साथ एक फर्जी किस्म का समझौता करके उन्हें नियमित कर देती हैं। जिस तरह एक सांसद या विधायक का दल-बदल अपात्रता पाता है, लेकिन दो-तिहाई सांसद विधायक अलग होने पर उनका बाल भी बांका नहीं होता, बख्शीश में सूटकेस भी मिल जाते हैं, वैसे देश में दिन के कुछ घंटों के लिए सडक़ किनारे ठेले लगाने, या एक मामूली सी कमजोर गुमटी लगाकर छोटी सी मजदूरी कमाने पर सरकारी लाठियां चलती हैं।
भारत में यह पूरा सिलसिला इतना अमानवीय है कि ऐसा लगता है कि इस देश में गरीब दूसरे दर्जे के नागरिक हैं, और नियम-कानून तोडऩे वाले पैसे वाले लोग प्रीमियम दर्जे के भारतीय हैं। लेकिन अफसरों और सरकारी अमले का, निर्वाचित नेताओं का नागरिकता का दर्जा चाहे अलग हो, उनके भीतर इंसानियत का दर्जा बड़ा ही घटिया रहता है। सडक़ किनारे घड़े बेचकर कोई महिला लखपति या करोड़पति नहीं हो सकती, वह अधिक से अधिक गर्मी के कुछ महीनों में बाकी के कुछ महीनों के लायक थोड़ा सा पैसा बचा सकती है। लेकिन उसके घड़ों को तोडऩे में जो सुख जिन लोगों को मिलता है, वे मनोविज्ञान की जुबान में परपीडक़ रहते हैं, यानी दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर खुद सुख पाने वाले। और यह सब उस देश में है, जिसमें हर चौथे पेड़ के नीचे सिंदूरपुते ईश्वर बैठे हैं, हर कुछ किलोमीटर पर मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च हैं, जहां सरकारी अमला तरह-तरह के धार्मिक प्रतीक ओढ़े हुए जनता पर जुल्म करने पर आमादा रहता है। और अब तो एक नई बात भी हो गई है, देश का सुप्रीम कोर्ट जनहित याचिका सुनने से कतराने लगा है, उसके खिलाफ कहने लगा है, जुर्माने लगाने लगा है। जबकि सबसे कमजोर और सबसे गरीब की कई किस्म की आह की आवाज सुप्रीम कोर्ट तक जनहित याचिकाओं के माध्यम से ही पहुंचती थी। संसद और विधानसभाओं में खेमेबाजी इतनी अधिक हो गई है कि एक-दूसरे को सुनने को बजाय, एक-दूसरे को अनसुना करने के लिए पार्टी स्तर की गिरोहबंदी होती है, और सबसे गरीब की तकलीफ की बात सदनों में उठना बंद सरीखा हो गया है। कई सदन तो ऐसे हो गए हैं जहां पर बहुत से सदस्यों की जनहित के किसी मुद्दे को उठाने से अधिक दिलचस्पी इस बात पर रहती है कि किस कुबेर के किस मुद्दे को न उठाकर उस कुबेर की सेवा की जाए। जब देश की सदनें ऐसे अंदाज में काम करने लगें, सुप्रीम कोर्ट को जनहित याचिकाओं से परहेज होने लगे, बड़े मीडिया को कारोबार के अभिनंदन और स्तुति से बड़ा जनहित और कुछ न लगे, तब विकलांग और विचलित गरीब घड़ेवाली पर बरसती फौलादी मार शायद बहुत सारे लोगों का ध्यान भी न खींच पाए। वह विचलित महिला घड़ों के टूटे हुए टुकड़े बटोरते हुए कुछ वैसी ही दिखती है जैसी फिलिस्तीन के गाजा में मलबे के बीच अपने मरे हुए बच्चों की गुडिय़ा थामे हुए उनकी मां बैठी रहती है।
अमरीका और ईरान के बीच इन दिनों चल रहे एक बहुत ही कमजोर युद्धविराम की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है, कि वह कब तक चलेगा। लेकिन अब पिछले कुछ हफ्तों से अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प जिस बेचैनी और बेसब्री से ईरान से समझौते के लिए एक पैर पर खड़े हैं, उसे देखना कुछ हैरान करता है। अपने आपको दुनिया की सबसे ताकतवर फौज, दुनिया के सबसे अधिक आर्थिक गुंडागर्दी रखने वाली सरकार, और लोकतांत्रिक देशों के इतिहास की सबसे बुरी तानाशाही के साथ ट्रम्प आज आर्थिक प्रतिबंधों से खोखले हो चुके ईरान के सामने जिस तरह एक डील करने के लिए गिड़गिड़ा रहा है, वह देखने लायक है। वह अपनी गिड़गिड़ाहट को गुर्राहट की तरह पेश कर रहा है, लेकिन पूरी दुनिया जान रही है कि यह ईरान से अधिक ट्रम्प के अस्तित्व का सवाल है। और इस नौबत को देखकर न सिर्फ दुनिया के बाकी देश, बल्कि दुनिया के कोई भी दायरे सबक ले सकते हैं कि किससे उलझा जाए, और किससे नहीं।
ईरान पिछली करीब आधी सदी से अमरीकी प्रतिबंध झेलते आ रहा है, और उसके बाद भी उसके विश्वविद्यालयों में अमरीकी विश्वविद्यालयों के मुकाबले अधिक लड़कियां पढ़ती हैं, उनका अनुपात लडक़ों से अधिक है। ईरान तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद एक ऐसी फौज तैयार कर चुका है जिसे अमरीका और इजराइल मिलकर अपनी पूरी फौजी ताकत के हमले से भी खत्म नहीं कर पाया है। एक ऐसी लीडरशिप विकसित कर चुका है जिसके सर्वोच्च लोगों को अमरीका-इजराइल मारते चल रहे हैं, और वहां दूसरे लोग कमान संभालते जा रहे हैं। ईरान के ये तेवर, उसकी ये तैयारियां दुनिया पहली बार इस तरह देख रही है। खुद अमरीका ईरानी तैयारियों को देखकर हक्का-बक्का है, उसके पांव उखड़ गए हैं कि चार दिनों में जिस जंग को खत्म कर देने का झांसा इजराइल ने उसे दिया था, वह तो चार महीनों में भी खत्म होती नहीं दिख रही है। जिस ईरान में इस जंग के शुरू होने के पहले तक जनता का कुछ या खासा बड़ा हिस्सा बेचैन दिख रहा था, सरकारविरोधी प्रदर्शन चल रहे थे, आज वहां की जनता हमला झेल रही अपनी सरकार के साथ खड़ी है। अब तो ईरानी जनता, और फौज को खुला भडक़ाने वाले ट्रम्प के बयानों को भी महीने से अधिक हो चुका है, और पूरे ईरान में ट्रम्प को कोई एक व्यक्ति भी भडक़ते हुए नहीं मिला है।
हम इस बारे में इसलिए लिख रहे हैं कि आज दुनिया को इस नौबत से यह नसीहत लेना चाहिए कि किसी ऐसे देश से, संगठन या व्यक्ति से न उलझें, जिसने सबसे बुरी नौबत में जीना सीख लिया है। किसी भी देश में बड़े-बड़े कारोबारियों, बड़ी-बड़ी कंपनियों को सरकारी कार्रवाई से दिक्कत हो सकती है, वे तकलीफ और परेशानी में काम करने की आदी नहीं रहती हैं, इसलिए वे बौखला सकती हैं, लेकिन सडक़ किनारे काम करने वाले, जूते मरम्मत करने वाले किसी मोची को हटाकर भी डराया नहीं जा सकता। जो तकलीफों में जीने के आदी हैं, उन ईरानियों को अमरीका डरा नहीं पा रहा है, और वहां की सरकार अगले कई महीनों तक तकलीफ झेलने की तैयारी से है। कल ही अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए की एक रिपोर्ट की खबर छपी थी कि अमरीका के साथ मौजूदा तनातनी को ईरान अभी और चार महीने झेल सकता है। यह तो सहूलियतों में जीने वाले अमरीकियों का बुरा हाल हो रहा है कि वे महंगे होते ईंधन के साथ जी नहीं पा रहे हैं। और नवंबर में होने वाले अमरीकी मध्यावधि चुनावों में ईंधन की यह महंगाई ट्रम्प की रातों की नींद उड़ा चुकी है, और वह अमरीकी घड़ी के मुताबिक सुबह 4-4 बजे तक सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहता है। उसकी एक असिस्टेंट ने अभी एक इंटरव्यू में बताया कि ट्रम्प की बातों को सुनने के लिए, उसके काम देखने के लिए रात में दो-दो असिस्टेंट अलग-अलग शिफ्ट करते हैं, तब जाकर उसके साथ पूरे वक्त ड्यूटी हो पाती है। अमरीकी जनता सुबह उठते ही ट्रम्प की रात भर की पोस्ट की गई बकवास को पढ़ती है, लेकिन अमरीकी संविधान के मुताबिक एक बार निर्वाचित राष्ट्रपति का दिमाग चल जाने पर भी उसे हटाना उतना आसान नहीं रहता, बल्कि मुमकिन ही नहीं रहता। एक तरफ ऐसा ट्रम्प है जो नवंबर के चुनावों को लेकर ईरान के साथ जल्द से जल्द एक डील करने पर आमादा है। दुनिया के इतिहास में कई अमरीकी राष्ट्रपति बड़े-बड़े लीडर रहे हैं, यह पहला अमरीकी राष्ट्रपति ऐसा है जो महज डीलर है। खैर, अमरीका के लोगों ने जिस दानव को चुना है, उसे वे भुगतें। बाकी दुनिया के लिए इस नौबत में नसीहत यह भी है कि आप अपना जिस तरह का नेता चुनते हैं, अपने बच्चों के लिए वैसा भविष्य पाते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति आज ईरान के सामने एक समझौते के लिए गिड़गिड़ाती खड़ी है, और ईरान है कि समझौते के टेबिल पर जाने के लिए भी तैयार नहीं है।
हिन्दुस्तानी फौज को लेकर अभी तीन-चार दिन पहले आई खबर बताती है कि किस तरह थलसेना की हर बटालियन में ड्रोन यूनिट्स होंगी। पिछले एक बरस में भारतीय सेना ने अपने हर हिस्से में ड्रोन का दाखिला करवा दिया है, और निगरानी रखने, जासूसी करने, या रणनीतिक हमले करने के लिए ड्रोन की तैयारी बड़े पैमाने पर की जा चुकी है। इसके लिए 30 अलग-अलग किस्म के ड्रोन छांटे गए हैं, और उनकी तैनाती हो रही है।
रूस-यूक्रेन जंग के चलते हुए दुनिया ने यह देखा कि जंग के तौर-तरीके किस तरह महंगे लड़ाकू विमानों से हटकर, और जानलेवा फौजी मोर्चों से भी हटकर सस्ते ड्रोन की तरफ बढ़ चुके हैं। इस जंग का सबसे कामयाब हिस्सा ड्रोन साबित हुए, और बाद में यही सिलसिला ईरान पर हुए अमरीकी और इजराइली हमले में भी जारी रहा। कई महीने पहले हमने इसी जगह लिखा था कि भारतीय फौज में सैनिकों की बकाया भर्ती की जगह जो तीन-चार बरस की नौकरी वाले अग्निरक्षक रखे जा रहे हैं, उसके बाद अब स्थाई सैनिकों की भर्ती की जरूरत शायद न भी रहे, क्योंकि अब ड्रोन से लड़ी जाने वाली जंग में इंसानी सैनिकों की जरूरत घटती चली जाएगी। चार बरस से अधिक पहले यूक्रेन पर रूस के हमले का वक्त अलग था, और ट्रम्प की बात पर भरोसा किया जाए तो इस जंग में हर महीने 25 हजार से अधिक सैनिक मारे जा रहे हैं। यह जंग बाकी दुनिया की सरकारों के लिए एक नया तजुर्बा लेकर आई है कि किस तरह ड्रोन एक किफायती, अधिक असरदार, अधिक दूर तक घुसपैठ करने वाला, और अपने सैनिकों को मौत से बचाने वाला, सब कुछ है। इस तकनीक ने दुनिया की सोच बदल डाली है, और अब करोंड़ों या अरबों डॉलर दाम के बड़े-बड़े लड़ाकू फौजी विमान महंगे लगने लगे हैं।
हमने जब ड्रोन के भविष्य, और भविष्य के ड्रोन पर लिखा था, तब हमें भारतीय फौज की इस अघोषित तैयारी के बारे में पता नहीं था। यह जानकारी तो अभी चार दिन पहले ही उजागर हुई है। लेकिन ड्रोन के अलावा हमने एक और पहलू पर लिखा था, और उस पर अभी भारत का कोई नजरिया सामने नहीं आया है। दुनिया के कुछ देशों ने इस पर अधिक हद तक काम किया हुआ है कि किसी देश के सार्वजनिक जगहों के कैमरों के नेटवर्क में घुसपैठ करके वहां की संवेदनशील जानकारी हासिल की जाए, ताकि अधिक महत्वपूर्ण निशानों पर सीधे हमला किया जाए। लेकिन ऐसी साइबर-घुसपैठ के साथ-साथ अब एक और बात जो जरूरी हो गई है, वह साइबर-हमला है। आज एआई की मेहरबानी से दुनिया की सरकारों, फौजों, और आतंकी संगठनों के लिए यह आसान हो गया है कि वे दुश्मनों, या दुश्मन देशों पर साइबर-हमला करके उन्हें ठप्प कर सकें, उन्हें लगभग नष्ट कर सकें। इसमें ड्रोन जैसे हथियार भी नहीं लगते। एक कमरे में कुछ कम्प्यूटरों पर बैठे हुए लोग एआई के इस्तेमाल से किसी देश के, किसी कंपनी के कम्प्यूटरों में घुसपैठ करके उसे पूरी तरह तबाह कर सकते हैं। और हमारे हिसाब से यही दुनिया के युद्धों का आने वाला भविष्य है।
आज दुनिया के देश अपने फौजी खर्च को इतिहास में सबसे अधिक सीमा तक ले जा रहे हैं। नाटो देशों को अमरीकी धमकी के बाद बाकी नाटो सदस्य अपनी फौजी आत्मनिर्भरता बढ़ाने में लगे हुए हैं, जो कि हथियार खरीदी से आगे बढक़र अपने-अपने देश में हथियार कारखानों को बढ़ाने, उनकी क्षमता बढ़ाने तक जा चुका है। यह सिलसिला आने वाले बरसों में बढ़ते चलना है, क्योंकि अमरीका ने एक तरफ नाटो को अपनी फौजी ताकत आगे न देने के बहुत से इशारे कर दिए हैं, बहुत से बयान दे दिए हैं। दूसरी तरफ दुनिया के कई दूसरे देशों पर जंग का जो खतरा अमरीकी बदनीयत की वजह से छाया हुआ है, उससे वे देश भी अपनी फौजी क्षमता बढ़ाने के लिए मजबूर हुए हैं। एक तरफ तो परंपरागत हथियारों की ताकत बढ़ाने का भयानक खर्चीला काम चल रहा है, और दूसरी तरफ एआई के कल्पना से परे के विकास की वजह से विनाश के लिए यह एक नया हथियार तैयार हो गया है। दुनिया में पुराने चले आ रहे नेताओं की पुरानी सोच उन्हें सरहदी लड़ाईयों से परे सोचने की ताकत नहीं दे रही है। आज हालत यह है कि एआई की क्षमता के बाद किसी देश पर बम बरसाए बिना, किसी मुल्क की सरहद को पार किए बिना सिर्फ कम्प्यूटरों की लड़ाई से किसी देश को खत्म किया जा सकता है। आज जो फौजी निवेश हो रहा है वह शायद अगले पांच-दस बरस के भीतर फिजूल का साबित हो सकता है, और अगली कोई भी जंग, हो सकता है कि साल-दो साल के भीतर की भी, ऐसी हो सकती है जो कि परंपरागत हथियारों के बिना लड़ी जाए, और महज साइबर हथियारों से जीती जाए। ऐसे में हथियारों के आज के कारखाने धंधे से बाहर हो सकते हैं, और अमरीका-चीन जैसे देश अपनी एआई क्षमता के सहारे दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियां बन सकते हैं।
भारत में पूरे देश के रोजगार के आंकड़ों को एक साथ मिलाकर देखने पर बेरोजगारी की सही तस्वीर नहीं मिलती। अभी कुछ आर्थिक आंकड़े सामने आए हैं जो बताते हैं कि इस देश में ग्रेजुएट बेरोजगारी करीब 30 फीसदी है, और अनपढ़ मजदूरों में बेरोजगारी करीब 3 फीसदी है। यह बेरोजगारी देश के सबसे उत्कृष्ट, और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों से निकले हुए ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट के साथ भी है। इसलिए इस देश में अनपढ़ मजदूरों के रोजगार के आंकड़ों को पढ़े-लिखे ग्रेजुएट बेरोजगारों के साथ मिलाकर देखना बड़ा गड़बड़ होगा। अर्थव्यवस्था और रोजगार के जानकार लोगों का यह मानना है कि अब देश के अच्छे से अच्छे विश्वविद्यालय से पढक़र निकलने के बाद भी कोई ढंग का रोजगार मिल जाना तय नहीं है। सफेदपोश, दफ्तर में टेबल-कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले कामों का अब कोई ठिकाना नहीं है। दूसरी तरफ हैरान करने वाला एक और आंकड़ा भी है। अच्छे-अच्छे ग्रेजुएट 25-30 हजार रूपए की तनख्वाह पाने के लिए तरसते रहते हैं। दूसरी तरफ प्लंबर या बिजली मिस्त्री जैसे हुनर के लोग हर महीने इससे बहुत अधिक कमा लेते हैं, उन्हें किसी नौकरी से बंधकर भी नहीं रहना पड़ता, वे अपनी मर्जी के दिनों में, मर्जी के घंटों में काम करते हैं, और सफेदपोश बाबुओं के मुकाबले अधिक कमाते हैं। उनके सामने नौकरी छिन जाने का खतरा भी नहीं रहता, उनके सिर पर कभी छंटनी की तलवार भी नहीं मंडराती, और एक बड़ा फायदा इस तरह के काम का यह रहता है कि ऐसे हुनरमंद कारीगर या मिस्त्री अपनी अगली पीढ़ी को यह काम सिखा सकते हैं, काम का विस्तार कर सकते हैं, और अगली पीढ़ी को पिछली पीढ़ी के बंधे-बंधाए ग्राहक भी मिल जाने की बड़ी संभावना रहती है।
आज इस विषय पर लिखना इसलिए सूझा कि चार-छह दिन पहले एक पॉडकास्ट में भारत के ये आंकड़े सुनने मिले, जो कि चौंकाने वाले थे। ग्रेजुएट बेरोजगार, और अनपढ़ कामकाजी! इसे सुनते हुए याद आया कि हम कई बरस से अपने अखबार के इसी कॉलम में यह बात लिखते आ रहे थे कि कॉलेजों की किताबी पढ़ाई को कम करने की जरूरत है। नेताओं ने गांव-गांव तक कॉलेज खोल दिए हैं, उनमें लडक़े-लड़कियों के दाखिले हो जाते हैं, और ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल करने के अकेले मकसद से वे कुछ विषय छांटकर उसे पढऩे जैसा कुछ करते हैं, इम्तिहान देते हैं, और एक ऐसी डिग्री हासिल करते हैं जो उसके कागज के वजन से भी कम वजन की होती है। वह किसी काम की नहीं रहती। अभी सोशल मीडिया पर एक नौजवान कारोबारी ने जब यह लिखा कि उसे जब लोगों को नौकरी पर रखना होता है, तो वह 15-20 मिनट उनसे बात करता है, यह देखता है कि उनमें काम का उत्साह कितना है, बातचीत में कितनी एनर्जी निकल रही है, और उनके परिचय के पन्ने देखे बिना वह उन्हें काम पर रख लेता है, या मना कर देता है। बहुत से लोगों ने इसके खिलाफ लिखा कि लोग बरसों कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढक़र काबिलीयत लेकर निकलते हैं, और यह कल का छोकरा कारोबारी उसे देखे बिना सिर्फ बातचीत के आधार पर अपना नतीजा निकालकर उन्हें रखता है, या वापिस कर देता है, यह बड़ा अन्याय है। ऐसी प्रतिक्रियाएं आने के बाद भी यह कारोबारी अपने तरीकों पर अड़े रहा, और उसने कहा कि उसे डिग्री से कोई खास लेना-देना नहीं रहता, वह तो यही देखता है कि नौकरी के लिए आने वाले में काम का उत्साह कितना है? हमारा भी अपने अखबार में जरूरत पडऩे पर किसी पत्रकार को काम पर रखते हुए कभी उसकी डिग्री पूछने-समझने की जरूरत नहीं रही। लोगों का काम बोलता है, उनकी बातचीत से समझ में आता है कि उनकी समझ कितनी है। डिग्री सचमुच ही एक कागज का टुकड़ा है, जिसे हासिल करते हुए अमूमन विश्वविद्यालयों में कोई बड़ी मेहनत नहीं करनी पड़ती, और वह डिग्री किसी हुनर या काबिलीयत का सुबूत भी नहीं रहती। बेहतर यही रहता है कि लोगों से काम करवाकर उसका नमूना देखा जाए, काम का उनका उत्साह देखा जाए, और उस पर फैसला लिया जाए। हमें कभी पत्रकारिता की डिग्री की वजह से अच्छे पत्रकार नहीं मिले। अच्छे पत्रकार डिग्रीधारी भी हो सकते हैं, और बिना डिग्री वाले भी हो सकते हैं। हम शिक्षा के महत्व को कम नहीं आंक रहे, लेकिन शिक्षा की बड़ी सीमित उपयोगिता रह गई है।
सबरीमाला में महिलाओं के दाखिले से शुरू हुई बात अब सुप्रीम कोर्ट जजों की एक असाधारण हिचक तक पहुंच गई है जिसके चलते वे धार्मिक कट्टरता के सामने दंडवत होते दिख रहे हैं। नौ जजों की संविधानपीठ सबरीमाला सहित कुछ और धार्मिक मामलों की सुनवाई कर रही है, और मुद्दा अभी इसमें उलझा हुआ है कि आस्था, धार्मिक परंपरा, रीति-रिवाज जैसे मामलों में अदालती दखल होनी चाहिए या नहीं, और अगर होनी चाहिए तो किस हद तक होनी चाहिए। हम इस सिलसिले में मोटी-मोटी बातें ही कर रहे हैं जो आम लोगों को समझ में आएं, और सुप्रीम कोर्ट के एक-एक शब्द को ज्यों का त्यों यहां रखकर मुख्य मुद्दे से भटकना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि पाठकों को बुनियादी बात समझ में आए कि देश के इस एक जलते-सुलगते मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जजों का क्या रूख है। कल तो जजों ने जो कहा है, वह हक्का-बक्का कर देने वाला है। एक से अधिक जजों के बयान अब हमारी इस आशंका को पुख्ता करते हैं कि देश की सबसे बड़ी अदालत धार्मिक और पारंपरिक मामलों में दखल देने से कतरा रही है, फिर चाहे ये मामले देश के नागरिकों के बुनियादी-संवैधानिक अधिकारों को कुचलने वाले ही क्यों न हों।
कल कुछ जजों ने जो कहा वह हैरान और परेशान दोनों करता है। अदालत की टिप्पणी थी कि धर्म एक व्यक्तिगत विश्वास का विषय है, और क्या अदालत के पास यह अधिकार है कि वह यह तय करे कि कौन सी धार्मिक प्रथा अनिवार्य है, और कौन सी नहीं? एक जज ने कहा हमारा संविधान की व्याख्या करना है, धर्मग्रंथों की नहीं। अदालत ने यह चिंता जताई कि अगर वे एक मंदिर या समुदाय की प्रथा में दखल देंगे, तो देश के हजारों अन्य समुदायों की अलग-अलग प्रथाओं को भी चुनौती दी जाएगी, जिससे एक अंतहीन कानूनी सिलसिला शुरू हो जाएगा। जब वकीलों ने यह तर्क दिया कि कुछ प्रथाएं भेदभावपूर्ण है, तो जजों ने एक बहुत ही तंगनजरिए का सवाल उठाया, और कहा कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष अदालत उस आस्था को रद्द कर सकती है, जो सदियों पुरानी है, और जिसका आधार तर्क नहीं, बल्कि आस्था है? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित कुछ जजों ने इस बात पर जोर दिया कि जनहित याचिकाओं के जरिए लोग अब धार्मिक सुधार की जिम्मेदारी अदालत पर डाल रहे हैं, जबकि यह काम समाज और विधायिका (संसद) का होना चाहिए।
ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की यह मौजूदा सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ भी जवाबी हमले से डर रही है। सबरीमाला मामले में अदालत के पिछले फैसले के बाद जिस तरह का सामाजिक और राजनीतिक विरोध हुआ था, उससे ऐसा लगता है कि अदालत अपने आपको बचाने के लिए एक ढाल की तरह अपने तर्क रख रही है, जो कि अच्छे-खासे खोखले तर्क हैं। अदालत अब बार-बार इंसाफ के फैसले की जिम्मेदारी को संसद और समाज की तरफ धकेल रही है, और कह रही है कि वह निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है। समाज जो कि एक पूरी तरह अमूर्त चीज है, और संसद जो कि आज बहुमत की अपनी ताकत से पूरी तरह संकीर्णतावादी है, इन दोनों के भरोसे इंसाफ को छोडऩे का मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को उसी तरह सडक़ पर छोडक़र चले जा रहा है, जिस तरह अभी कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश में एक करोड़पति कारोबारी दम्पत्ति ने गोद ली हुई बच्ची को सडक़ पर छोड़ दिया था, और भाग गई थी।
हमारी बहुत ही सीमित, लेकिन प्राकृतिक न्याय की बुनियादी समझ यह कहती है कि जिस दिन देश में संविधान लागू हुआ, उस दिन यह तय हो गया कि अगर किसी धर्म, समुदाय, या व्यक्ति की धार्मिक या सामाजिक आस्था किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों की राह का रोड़ा बनेगी, तो देश का लोकतंत्र उस रोड़े को हटाकर लोगों के मौलिक अधिकारों की राह साफ करेगा। आज ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी इस जिम्मेदारी से साफ-साफ कतरा रहा है, उसे भी यह बात साफ दिख रही है कि समाज का आज का ढांचा बहुत साफ-साफ बहुसंख्यकवाद की हिंसक ताकत के झंडे-डंडे उठाए हुए हैं, खुद बहुसंख्यक तबके के भीतर भी किसी किस्म की विविधता की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। अपने ही तबके की महिलाओं के खिलाफ, दलितों के खिलाफ आस्था का बड़ा ही कट्टर और हिंसक रूप जगह-जगह सामने आ रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का कल का यह ताजा रूख हमें सदमा पहुंचाता है क्योंकि हम तो मानकर चलते हैं कि संविधान लागू होने के बाद धार्मिक या किसी भी किस्म की आस्था संविधान के नीचे ही रहेगी, उसके ऊपर नहीं जाएगी। संविधान की हमारी बड़ी सीमित समझ बताती है कि अनुच्छेद 25 में धर्म की जो स्वतंत्रता है, वह मौलिक अधिकारों (भाग-3) के अधीन है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति की समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14), या गरिमापूर्ण जीवन (अनुच्छेद-21), का उल्लंघन करती है, तो संविधान के अनुसार उस प्रथा को हारना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट जब धार्मिक आस्था की दुहाई देकर लोगों के बुनियादी अधिकार बचाने से बचता है, तो वह कहे-अनकहे 26 जनवरी 1950 के पहले की सामाजिक व्यवस्था को मान्यता दे देता है, जिसके अन्यायपूर्ण हिस्से को खत्म करने का संकल्प संविधान ने लिया था। सुप्रीम कोर्ट यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी भूल रहा है। पिछले कुछ बरसों में जजों के बयानों ने संवैधानिक जिम्मेदारी की जगह सामाजिक स्वीकार्यता शब्द अधिक सुनाई देने लगा है। जबकि संविधान एक बहुसंख्यकवाद विरोधी दस्तावेज बनाया गया था, जो कि संख्या के आधार पर इंसाफ करने की पुरातन व्यवस्था को तोड़ता था। इसका काम उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करना था जो परंपरा या धर्म के नाम पर हाशिए पर धकेल दिए गए थे। आज जब संसद देश में बहुत सारी व्यवस्थाओं को संविधान के पहले के दिनों पर पहुंचाने पर उतारू है, और उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट अपने-आपको बचाते हुए अपने सुरक्षित खोल में दुबक रहा है, तो इस लोकतंत्र में इस मुद्दे पर इंसाफ की संभावना खत्म सरीखी हो जाती है। भारत ही नहीं दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब संवैधानिक अदालतों ने आस्था या भीड़ के दबाव के सामने घुटने टेके हैं, सभ्यता पीछे की ओर गई है। आज अगर भारत का सुप्रीम कोर्ट यह कह रहा है कि उसकी लगभग असीमित संवैधानिक ताकत के रहते हुए भी वह धर्म की बेइंसाफी के भीतर सुधार नहीं कर सकता, तो फिर बीती एक सदी से अधिक की धार्मिक और सामाजिक सुधार की सुधारकों की लड़ाई पर वह पानी फेर रहा है।
छत्तीसगढ़ में बीती शाम आईएएस अफसरों के कामकाज में फेरबदल की एक सबसे लंबी लिस्ट आई। इस काडर के पौने दो सौ से कम अफसर हैं, और उनमें प्रशिक्षुओं को छोड़ दें, तो 43 अफसरों की यह लिस्ट करीब एक चौथाई अफसरों के कामकाज बदलने की है। इस सरकार के कार्यकाल को भी ढाई बरस होने जा रहे हैं, और एक किस्म से यह प्रशासन का मध्यावधि फेरबदल है। अब शायद विधानसभा चुनाव तक इतने बड़े फेरबदल की नौबत न आए। बोलचाल की भाषा में भारत में आईएएस लोगों के लिए अफसरशाही, और नौकरशाही जैसी भाषा परंपरागत रूप से इस्तेमाल होते आई है, और रोजाना के काम की जमीनी हकीकत देखें, तो यह बात कुछ हद तक सही भी लगती है। निर्वाचित और सत्तारूढ़ नेता तो औसतन पांच बरस के लिए ही आते हैं, लेकिन अफसर 30-35 बरस तक रहते हैं, और अफसरशाही शब्द बहुत गलत भी नहीं रहता। अब यह निर्वाचित नेताओं पर निर्भर करता है कि वे जनहित के लिए इस मजबूत सरकारी मशीनरी का किस तरह इस्तेमाल करते हैं। आईएएस अफसरों के साथ-साथ आईपीएस, और आईएफएस अफसर भी यूपीएससी की उसी चयन सूची से आते हैं, और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी अगले चुनाव में जीतकर आए, या न आए, इसमें इन तीनों सेवाओं के अफसरों का काफी कुछ योगदान रहता है। ये खुद तो चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी की जीत और हार इन अफसरों के कामकाज से जुड़ी रहती है, इसलिए इन अफसरों की तैनाती राज्य की जनता के हित में, सरकार के बेहतर कामकाज के लिए, और सत्तारूढ़ पार्टी की वापिसी के लिए, तीनों के लिए महत्वपूर्ण रहती है।
जैसा कि हमने ऊपर इसे सबसे बड़ा मध्यावधि फेरबदल कहा है, इसके बाद चुनाव तक इन अलग-अलग विभागों, और इन जिलों में हो सकता है कि कोई बड़ा फेरबदल न हो, और कल नई तैनाती वाले अफसरों के कामकाज ही इस सरकार को चुनाव तक ले जाएं। भारत में नौकरशाही और निर्वाचित में से सत्तारूढ़ नेताओं के बीच संबंध बड़े जटिल रहते हैं। लोकतंत्र में उम्मीद तो की जाती है कि नीतियां निर्वाचित नेता बनाएं, और उन पर अमल अफसर करें। लेकिन जहां-जहां मंत्री कमजोर पड़ते हैं, पेशेवर और चतुर अफसर वहां नीतियां बनाने का काम करने लगते हैं, और अदूरदर्शी नेता तबादलों और ठेकों को अपना विशेषाधिकार मान लेते हैं। यह सिलसिला अफसरों के लिए तो नुकसानदेह नहीं होता, लेकिन नेताओं के लिए बड़ा नुकसानदेह रहता है, क्योंकि उन्हें पांच बरस बाद जनता के बीच दुबारा जाना है। कई राज्यों में यह देखने में आता है कि किस तरह अगले चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी से नाराजगी निकालते हुए जनता उसे निपटा देती है, और चुनावी भाषा में उसके लिए एंटीइंकमबेंसी जैसा एक जुमला बड़ा इस्तेमाल होता है। लोग आमतौर पर यह मान लेते हैं कि निर्वाचित विधायकों या सांसदों से, मंत्रियों से जनता की नाराजगी निकलती है, और सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव हार जाती है। हकीकत तो यह रहती है कि सरकार से नाराजगी सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं से नाराजगी नहीं रहती, वह सरकार के कुल कामकाज से नाराजगी रहती है, जिसमें अफसरों का कामकाज भी शामिल रहता है। अगर अफसरों का कामकाज अच्छा रहे, तो सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ कोई एंटीइंकमबेंसी की मजबूत लहर नहीं उठ सकती। हम किसी नए रहस्य की बात नहीं कर रहे, बल्कि इतने दशकों से सत्ता को करीब से देखते रहने की वजह से जो एक मामूली सी समझ विकसित हुई है, महज उसी की बात कर रहे हैं। इसमें से कोई भी बात न तो छत्तीसगढ़ की आज की सरकार पर अलग से लागू होती है, न ही इस सरकार पर कुछ कम या अधिक लागू होती है। हम एक जिम्मेदार डॉक्टर की तरह एक जेनेरिक दवाई लिख रहे हैं, और लोग दवा दुकानदार की तरह इसमें अपनी मर्जी का ब्राँड भर सकते हैं। यह बात देश-प्रदेश की किसी भी सरकार पर बराबरी से लागू होती है, और इसे एक आम चर्चा की तरह ही देखना चाहिए।
सत्तारूढ़ पार्टियों को कई तरह के जायज और नाजायज राजनीतिक दबावों के तहत काम करना पड़ता है। ऐसे में कुछ बहुत ईमानदार या कड़े अफसर कभी-कभी असुविधा का सामान भी बन जाते हैं। कुछ दूसरे व्यावहारिक अफसर बांस की तरह लचीले रहते हैं, और वे झुकने की, मुडऩे की एक सीमा तक राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बिठा लेते हैं। हर राज्य में चूंकि अफसर बहुत लंबा काम किए हुए रहते हैं, कामकाज की उनकी निजी शैली, उनके साथ काम करने की संभावनाओं और सीमाओं को सबसे वरिष्ठ अफसर भी अच्छी तरह जानते हैं, और राजनीतिक पार्टियों के पुराने अनुभवी नेता भी इससे वाकिफ रहते हैं। इनके अलावा हर सरकार में असरदार रहने वाले सत्ता के कुछ दलाल भी सत्ता को अफसरों के मिजाज के बारे में पहले दिन से बताते रहते हैं। यह एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती रहती है कि पार्टी की उम्मीदों और जरूरतों को पूरा करते हुए, अपने निजी राजनीतिक भविष्य की जरूरतों का इंतजाम करते हुए किस तरह सरकार चलाई जाए कि बदनामी इतनी न हो कि अगले चुनाव में मुश्किल हो जाए। सत्तारूढ़ नेताओं के सामने यह छोटी चुनौती नहीं रहती है। कुछ पार्टियों की सरकारें ऐसी भी रहती हैं जो अपने आपको अपने राष्ट्रीय संगठन के लिए एटीएम साबित करने में गर्व हासिल करती हैं।
दो-चार दिनों के भीतर यूक्रेन को खत्म कर देने के दावे के साथ रूस ने जो हमला किया था, उसे जंग में तब्दील हुए चार बरस हो चुके हैं। इसी तरह फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमले, लेबनान और ईरान पर इजराइली हमले, और सबसे ताजा, ईरान पर अमरीकी हमले को लंबा खिंचते देखा जा सकता है। इसी के साथ-साथ दुनिया में जंग का समान, और हथियार बनाने वाले कारखाने भी बढ़ते जा रहे हैं, और वे रात-दिन काम कर रहे हैं। फिर ट्रम्प की मेहरबानी से नाटो देशों का एक अलग मोर्चा खुल गया है। उसने अमरीकी राष्ट्रपति का दूसरा कार्यकाल शुरू करते ही, या अधिक सही यह कहना होगा कि अपने चुनाव अभियान के दौरान ही नाटो देशों को यह साफ कह दिया था कि उनके हिस्से की फौजी तैयारियों पर अमरीका अब और खर्च नहीं करेगा। उसने साफ-साफ कहा कि नाटो सदस्य अपने देश की हिफाजत के लिए अमरीकी फौजों पर निर्भर न करें, और अपने बजट का अधिक बड़ा हिस्सा अपनी फौजी तैयारियों पर लगाएं। इसका असर भी हुआ, ट्रम्प के तेवर देखकर, उसकी नाटो छोड़ देने की धमकी को देखकर, उसके नाटो-सदस्यों पर फौजी हमले की धमकी को देखकर योरप के नाटो सदस्य देशों ने अमरीका के बिना अपनी हिफाजत की तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसकी वजह से भी योरप के देशों में फौजी-कारखानों का काम बहुत बढ़ गया है। फिर घरेलू उत्पादन के अलावा योरप जिन देशों से फौजी सामान खरीदता है, उन देशों में भी हथियारों, और बाकी ऐसे सामानों के कारखाने लगातार चल रहे हैं। एक तरफ योरप रूस के मुकाबले यूक्रेन को फौजी मदद देने के लिए बहुत से हथियार लगातार खरीद रहा है, दूसरी तरफ अमरीका इजराइल को देने के लिए, और ईरान पर बरसाने के लिए हथियार लगातार बनाते चल रहा है। जैसा कि हथियारों का मकसद होता है, हर हथियार तबाही लेकर आता है। उसकी कोई और उत्पादकता नहीं होती, और वह इंसानी जिंदगियों, शहरी या दूसरे किस्म के ढांचों, या दूसरे देश के हथियारों को तबाह ही करता है। मतलब यह कि हथियार और जंग की आर्थिक और सामाजिक उत्पादकता तबाही के अलावा और कुछ नहीं रहती। आज रूस और अमरीका, ये दो महाशक्तियां अलग-अलग मोर्चों पर हथियार झोंक रही हैं, और बड़े पैमाने पर उन्हें बनाते भी चल रही हैं। तबाही के मकसद वाली यह उत्पादकता दुनिया के बाकी उत्पादक काम-धंधों को पीछे छोड़ रही है। आज अमरीका, इजराइल, और ईरान एक बहुत ही कमजोर किस्म का युद्धविराम मानकर चल रहे हैं, तो दुनिया यह जानती और मानती है कि ये देश अधिक से अधिक हथियारों के उत्पादन में लगे हुए हैं। दुनिया की आर्थिक गतिविधियां इंसानी जिंदगियों की तरफ से हटकर इंसानी मौतों की तरफ मुड़ गई हैं। इसका दुनिया में क्या असर पड़ेगा, इससे समझने के लिए अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं है।
दुनिया के ऐसे नजारे और माहौल के बीच एक और बात बिल्कुल साफ है कि जंग का अंदाज यूक्रेन से बिल्कुल बदल गया है। अब बाकी किस्म की फौज या हथियारों के मुकाबले ड्रोन इस जंग में सबसे अधिक कारगर और कामयाब हथियार साबित हुए हैं। अमरीका के सबसे महंगे फौजी विमानों, फौजी मिसाइलों, और बमों के मुकाबले ईरान ने मानो मिट्टी के मोल बनाए हुए ड्रोन, या सस्ती मिसाइलों से जो मुकाबला किया है, तो उससे ट्रम्प हक्का-बक्का भी हो गया है, और अपने ही देश को मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचा है। ऐसे में चूंकि ईरान और रूस के बीच गहरे रिश्ते हैं, तो खाड़ी के जिन देशों पर ईरान निशाना साध रहा है, उनमें से कुछ देश यूक्रेन से मदद ले रहे हैं, क्योंकि रूस के खिलाफ उसने अपने सस्ते ड्रोन की टेक्नॉलॉजी से इस महाशक्ति को एक किस्म से रोक ही दिया है।
अब इस पूरे जंगी कारोबार के एक और पहलू को देखने की जरूरत है। आज परंपरागत हथियारों से ऊपर उठकर ड्रोन, रोबट, और एआई का इस्तेमाल खुलकर हो रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ अमरीका जैसे देश में फौजी हथियार बनाने के लिए बहुत सारे स्टार्टअप सरकार से ठेके पा रहे हैं। वे सस्ते ड्रोन बनाने से लेकर, लेजर-हथियारों पर काम कर रहे हैं, और एआई का बड़ा इस्तेमाल कर रहे हैं। अमरीकी सरकार इन सबको ऐसे अलग-अलग हथियार बनाने के बड़े-बड़े ठेके देकर अधिक तैयारी कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि एंथ्रोपिक नाम की जिस कंपनी ने अपने सबसे ताकतवर एआई मॉडल का उपयोग जंग में करने देने से मनाही कर दी, उसे अमरीकी सरकार ने फौजी ठेकों से बाहर भी कर दिया है। इस तरह आज पश्चिमी दुनिया के अधिकतर देश अपनी फौजी तैयारियों पर अधिक पूंजीनिवेश कर रहे हैं, अधिक हमलों के लिए अपनी फौजों को अधिक लैस कर रहे हैं, और नए-नए हथियारों की तरफ बढ़ भी रहे हैं। आज दुनिया में एआई के बाद फौजी-उद्योग सबसे अधिक तेजी से बढऩे वाला कारोबार बन गया है। अब न सिर्फ अब तक प्रचलित हथियारों का अंधाधुंध उत्पादन हो रहा है, बल्कि नई टेक्नॉलॉजी के आविष्कार, और उसके विकास पर भी अनुपातहीन पैसा जा रहा है।
पांच राज्यों के चुनावी नतीजों का विश्लेषण को अधिक जानकार लोग बेहतर तरीके से कर सकेंगे, लेकिन हम उन कुछ मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जो सोशल मीडिया पर बड़ी तल्खी से उठाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में मतदाता पुनरीक्षण से लेकर दूसरे कई मुद्दों तक जो रूख दिखाया, उसे लेकर लोग उन्हें भाजपा गठबंधन में शामिल गिन रहे थे। कुछ लोगों ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या पूरी की पूरी केन्द्र सरकार का किसी राज्य में जाकर अपने-आपको इस तरह झोंक देना चाहिए? कई और सवाल भी उठ सकते हैं, लेकिन किसी लोकतंत्र में अगर चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट में काफी बहस हो चुकी है, और सुप्रीम कोर्ट किसी बात को रोकने लायक नहीं पा रहा है, तो यह बहस चुनावी बहस नहीं रह जाती, यह देश की एक लोकतांत्रिक-संवैधानिक बहस जरूर हो सकती है कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था का रूख सत्ता की राजनीति का साथ देने वाला किस हद तक हो सकता है? लेकिन वह बहस चुनाव के बीच में किसी काम की नहीं है। वह बहस उस समय भी गैरजरूरी हो जाती है जब राजनीतिक दल चुनाव लडऩा तय करते हैं, शुरू कर देते हैं, जीत के दावे भी करते हैं, तब उनकी आशंका का वजन कुछ कम हो जाता है। हम उनकी आशंकाओं को सही या गलत ठहराने के चक्कर में नहीं पड़ रहे, किसी भी लोकतंत्र में किसी बात को साबित करने की एक प्रक्रिया होती है, अगर वह प्रक्रिया संभव नहीं है, तो फिर जो मौजूदा लोकतंत्र है, जनता बस उसी की हकदार रहती है। यह बात सिर्फ भारतीय संदर्भ में नहीं है, पूरी दुनिया के लिए यही कहा जाता है कि लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जिसके कि वे हकदार होते हैं। हम सरकार से भी थोड़ा सा आगे जाकर इसे पूरे लोकतंत्र तक ले जाते हैं। चुनाव आयोग हो, या सुप्रीम कोर्ट, या दूसरी संवैधानिक संस्थाएं, या जांच एजेंसियां, ये सब जनता को उसकी चुनी हुई सरकार के माध्यम से ही नसीब होने वाली चीजें हैं। अगर किसी को यह खुशफहमी है कि सुप्रीम कोर्ट के जज बनने में, और उसके भी पहले हाईकोर्ट के जज बनने में सरकार का कोई दखल नहीं रहता, तो उन्हें जमीनी हकीकत का अंदाज नहीं है। ऐसे में देश या प्रदेश के वोटरों का बहुमत जिसे चुनता है, उसे अपने हिसाब से बहुत कुछ करने का हक, या कम से कम मौका मिल जाता है, यह देखना हो तो महज भारत की तरफ देखने की जरूरत नहीं है, अमरीका की तरफ भी देखा जा सकता है, जो कि आज दुनिया की सबसे जलती-सुलगती मिसाल है।
लेकिन हम इन मुद्दों को यहीं पर छोडक़र कुछ आगे बढऩा चाहते हैं। ये चुनाव थे तो पांच राज्यों में, लेकिन असल चुनाव तो बंगाल में ही होते दिख रहा था। असम में भी विपक्ष मैदान में था, लेकिन वहां कोई टक्कर सुनाई नहीं पड़ती थी। केरल में टक्कर थी, लेकिन वहां भाजपा मैदान में नहीं थी, वहां वामपंथी गठबंधन, और कांग्रेस का गठबंधन आमने-सामने थे, और बाकी हिन्दुस्तान, खासकर हिन्दी-हिन्दुस्तान की दिलचस्पी केरल में कम थी। इसलिए भी कम थी कि केरल और तमिलनाडु में भाजपा मैदान में नहीं थी। उसके इक्का-दुक्का उम्मीदवार कहीं से विधायक बन जाएं, तो वह अलग बात थी, भाजपा जहां टक्कर दे सकती थी, वह सिर्फ बंगाल था। और बंगाल का चुनावी संघर्ष देश भर की दिलचस्पी का मुद्दा इसलिए भी था कि भाजपा एक नई जमीन पर सरकार बनाने का दावा कर रही थी, उसके लिए अपने अस्तित्व की सबसे कड़ी, और सबसे बड़ी लड़ाई भी लड़ रही थी। फिर यह भी है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का यह संघर्ष सिर्फ चुनाव का नहीं था, सिर्फ इसी चुनाव का नहीं था, पिछले चुनाव में भी भाजपा ने पूरा दम-खम लगाया था, और कांग्रेस और वामपंथियों को विधानसभा से बाहर करके खुद अकेले विपक्षी दल बनने तक तो पहुंची ही थी। अब उसे इस आखिरी मील का सफर और तय करना था, जो पूरी तरह, और बुरी तरह अनिश्चितता से भरा हुआ था। लोग आखिरी दिन तक पूछते थे कि बंगाल में क्या होगा? और इसका पुख्ता जवाब अधिकतर लोगों के पास नहीं था। चुनावी मैदान में मोदी और ममता की पार्टियों के अलावा चुनाव आयोग भी एक बड़ा खिलाड़ी था, और उस खिलाड़ी को पानी पिलाता हुआ सुप्रीम कोर्ट भी था। इसलिए लोगों की आशंकाएं थीं कि ये सब मिलकर ममता को हरा ही देंगे, या इन सबके बावजूद ममता जीत जाएगी? यह मुद्दा रह ही नहीं गया था कि इतने बार सरकार चलाने वाली ममता बैनर्जी चुनावी-राजनीतिक जुबान में एंटी इन्कमबेंसी का शिकार भी हो सकती हैं, चर्चा बस यही रहती थी कि क्या ममता चुनाव आयोग से ज्यादा वोट पा सकेंगी? हम केवल चर्चा की बात कर रहे हैं, अपनी कोई राय नहीं रख रहे, जबकि 2011 से 2026 तक, लगातार तीन बार सरकार चलाने वाली ममता बैनर्जी से वोटरों की कुछ स्वाभाविक नाराजगी भी हो सकती है, क्योंकि बंगाल के वोटर देश के अधिकतर राज्यों के मुकाबले राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक माने जाते हैं।
महाराष्ट्र के पुणे जिले में अभी चार बरस की एक बच्ची से बलात्कार के बाद उसे मार डाला गया। भीमाजी कांबले नाम के 65 बरस का बुजुर्ग इस बच्ची को बहला-फुसलाकर पास की गौशाला में ले गया, और वहां इस जुर्म के बाद उसने लाश को गोबर के ढेर में छिपा दिया। उसके खिलाफ पहले भी 2015 में पाक्सो का केस दर्ज था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। इधर परिवार के लोग अस्थि विसर्जन के लिए बाहर गए हुए हैं, और उनके घर पर नेता हमदर्दी जताने पहुंच रहे हैं। ऐसे में इस बच्ची के पिता ने एक सार्वजनिक वीडियो संदेश जारी किया, और कहा- हम अभी अपनी बेटी की अस्थियों का विसर्जन करने आए हैं, इस दौरान रिश्तेदारों और दोस्तों से पता चला कि कई राजनीतिक नेता हमारे घर सांत्वना देने आ रहे हैं। मैं अपनी और पूरे परिवार की ओर से विनम्र अपील करता हूं कि जब तक मेरी बेटी को न्याय नहीं मिल जाता, और आरोपी को फांसी की सजा नहीं हो जाती, तब तक कोई भी राजनीतिक नेता हमारे घर न आएं। न्याय मिलने और फांसी हो जाने के बाद ही हम किसी से मिलेंगे। तब तक सांत्वना देने या फोटो खिंचवाने कोई न आएं, परिवार को सांत्वना नहीं, सच्चा न्याय चाहिए।
आमतौर पर सदमे से गुजरते हुए दुखी परिवार कुछ बोलते नहीं हैं, और अपने घर पहुंचने वाले लोगों को झेल लेते हैं। लेकिन ऐसे परिवारों के मन में ऐसे अतिथि-नेताओं को देखकर जो लगता होगा, वह इस बच्ची के इस पिता ने खुलकर कह दिया है। नेता जब किसी परिवार में हमदर्दी के लिए जाते हैं, तो वे एक किस्म से ग्लिसरीन के आंसू भी ले जाते हैं, क्योंकि दो उद्घाटन, तीन शादियां, दो जन्मदिन, और उसके बीच में ऐसे सांत्वना-प्रवास पर एकाएक तो आंसू निकल भी नहीं पाते होंगे। ऐसे सांत्वना-पर्यटन के खिलाफ किसी न किसी को तो मुंह खोलना था, और यह तो अच्छा हुआ कि ऐसे जुल्म और ऐसे जुर्म की शिकार इस बच्ची के पिता ने वीडियो संदेश जारी करके ऐसी अपील की है। लोगों को याद होगा कि अपने जन्मदिन पर अस्पताल जाकर किसी गरीब, बीमार, या दुर्घटना में जख्मी को एक-एक फल देकर दर्जन-दर्जनभर लोग फोटो खिंचवाते हैं, वीडियो बनवाते हैं, और फिर उसे अपनी शोहरत के लिए इस्तेमाल करते हैं। अभी कुछ महीने पहले ही एक वीडियो ऐसा भी आया था जिसमें किसी एक राजनीतिक दल का दुपट्टा-गमछा टांगे हुए लोग एक अस्पताल पहुंचते हैं, और वहां उनमें से एक नेता या नेत्री को देखा जा सकता है जिसने एक ही फल लोगों को थमाकर फोटो खिंचवाई, वीडियो बनवाया, और फिर उस फल को लेकर दो बिस्तर आगे सांत्वना-पर्यटन के अगले स्टेशन पर यही काम किया। उन मरीजों का चेहरा देखने लायक था जिनके हाथ में आया हुआ फल वापिस लेकर उसे अगले फोटोशूट के लिए इस्तेमाल किया गया।
ऐसे सांत्वना-पर्यटन के अलावा भारतीय राजनीति में एक दलित-पर्यटन का भी बड़ा चलन है। राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े नेता किसी दलित के घर खाने पहुंचते हैं। चूंकि जाति व्यवस्था के चलते हुए दलितों के घर खाने से कई लोग परहेज करते हैं, तो इस तरह वहां जाकर वहां खाना एक किस्म से उन्हें छुआछूत से बाहर गिनने जैसा रहता है, लेकिन ऐसे मौकों से जो फोटो-वीडियो बाहर आते हैं, उनमें दिखता है कि किस तरह वहां खाने के लिए थाली के नीचे लकड़ी की चौकियां सजी रहती हैं, थालियों में किसी भी संपन्न परिवार जैसे व्यंजन-पकवान सजे रहते हैं, और ऐसा लगता है कि दलित-पर्यटन पर्व के लिए इन घरों में मेहमान की तरफ से ही मेजबान की तरफ से दिखने वाले इंतजाम किए जाते हैं। जो सचमुच ही दलित हैं, वे भला इस किस्म का खाना कैसे खिला सकते हैं? और एक सामाजिक-नैतिकता का सवाल यह भी उठता है कि क्या अपनी शोहरत के लिए दलित परिवारों का ऐसा इस्तेमाल जायज है? नेताओं को अपनी राजनीति चलाने के लिए कई किस्म के शिगूफों की जरूरत पड़ती है, और इसके लिए बीमार, बलात्कार के शिकार, किसी हादसे के शिकार, किसी बीमारी से थोक में मारे गए लोगों के गांव या मुहल्ले, अस्पताल में भर्ती मरीज, ऐसे सब लोग बहुत ही माकूल बैठते हैं। बलात्कार जितना चर्चित होता है, सांत्वना-पर्यटन उतना ही अधिक होता है। राजनीतिक दलों की टीम बनाई जाती हैं, जो जाकर ऐसे परिवारों से मिलती हैं। फिर महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, बाल संरक्षण आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, एसटी-एससी के आयोग, ओबीसी आयोग, ऐसी सब संवैधानिक संस्थाओं के लोगों की तो जिम्मेदारी भी हो जाती है कि परिवार के जात-धरम को देखकर इनमें से किस-किसको टूर-प्रोग्राम बनाना है। हाल के बरसों में कुछ मौकों पर तो ऐसा भी हुआ कि बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला, और उसके परिवार की शिनाख्त भी ऐसे सांत्वना-पर्यटकों ने सार्वजनिक रूप से उजागर कर दी। अब जब खास मकसद खबरों और सोशल मीडिया के मार्फत शोहरत पाना है, तो उस नशे के बीच निजता और गोपनीयता के नियम-कानून का ख्याल भला कैसे रह सकता है?
चीन की खबर है कि सरकार ने एक औपचारिक बयान जारी करके अमरीका की एक ताजा हेठी की है। उसने कहा है कि वह ईरानी तेल खरीदने वाली पांच कंपनियों पर लगाई गई अमरीकी पाबंदियों को नहीं मानेगा। उसका तर्क है कि ये पाबंदियां अन्य देशों के साथ सामान्य आर्थिक और व्यापारिक कामकाज करने से चीनी कंपनियों को रोकती हैं। इसके साथ-साथ ये पाबंदियां अंतरराष्ट्रीय कानून, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ हैं। इसलिए चीन अमरीकी रोक-टोक को नहीं मानता, और चीन की कंपनियों और संस्थानों को इन पाबंदियों को लागू नहीं करना चाहिए। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने इस बयान में आगे कहा है- चीनी सरकार हमेशा उन एकतरफा पाबंदियों का विरोध करती है, जो संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बिना, और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित नहीं होतीं। कल ही अमरीका ने एक और चीनी कंपनी पर पाबंदी लगाई थी, और कहा था कि इसने लाखों बैरल ईरानी तेल खरीदा, जिससे ईरान को अरबों डॉलर की कमाई हुई। चीन का यह रूख उस वक्त होना अधिक मायने रखता है, जब इसी महीने अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प चीन की बहुप्रतीक्षित यात्रा पर जा रहे हैं।
पिछले खासे अरसे से योरप में अमरीका के लिए, खासकर ट्रम्प की मनमानी के लिए अपना बर्दाश्त धीरे-धीरे खो दिया है। एक-एक करके देश ट्रम्प के हमलावर रूख के खिलाफ खड़े होते जा रहे हैं। योरप के एक अविभाज्य हिस्से ग्रीनलैंड के नाटो का हिस्सा रहते हुए भी उसे फौजी ताकत से कब्जाने का ट्रम्प का तानाशाही रूख योरप के देशों ने मिलकर कुचल डाला, और ट्रम्प को फौजी कार्रवाई के फतवे वापिस लेने पड़े। अभी ईरान के खिलाफ जंग को लेकर जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, और स्पेन समेत अधिकांश यूरोपीय देशों ने शामिल होने से साफ मना कर दिया, और कुछ देशों ने तो ईरान पर हमले के लिए उड़ान भरने वाले अमरीकी फौजी विमानों को अपनी जमीन पर उतरने देने से भी मना कर दिया। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी एक वक्त ट्रम्प की बड़ी प्रशंसक रहीं, लेकिन आज उनका हाल यह है कि पोप लियो के खिलाफ ट्रम्प के बयानों पर मेलोनी ने कहा- मैं पोप के प्रति ट्रम्प की बातों को मंजूर करने लायक नहीं पाती। पोप कैथोलिक चर्च के मुखिया हैं, और शांति की अपील करना, और हर किस्म के जंग की निंदा करना उनके लिए उचित और सामान्य है। ईरान के साथ जंग को लेकर जब ट्रम्प ने मेलोनी पर हौसले की कमी का आरोप लगाया, तो मेलोनी ने सार्वजनिक रूप से ट्रम्प को जवाब दिया- सहयोगी होने का मतलब यह नहीं होता, कि कोई सीमारेखा ही न हो। सहयोगी होने का मतलब गुलाम या मातहत होना तो बिल्कुल ही नहीं होता। मेलोनी ने ट्रम्प को जवाब देते हुए कहा- सहयोगियों के बीच ईमानदार-मतभेद होने चाहिए, जब हम सहमत नहीं होते, तो हमें इसे साफ-साफ कहना चाहिए। मेलोनी ने ईरान पर अमरीकी-इजराइली कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे के बाहर, और खतरनाक रुझान का हिस्सा बताया।
हमने इस पूरे संदर्भ में यह ढूंढने की कोशिश की कि अपने इस दूसरे कार्यकाल के सवा साल में ट्रम्प ने क्या कोई भी नया दोस्त बनाया? तो भारी तलाश के बाद भी ऐसा एक भी देश नहीं मिला, बल्कि यह बात जरूर सामने आई कि ट्रम्प ने अमरीका को इजराइल के हाथों गिरवी रख दिया है। उसने कनाडा को अमरीका का एक राज्य बन जाने को कहा, मेक्सिको के साथ व्यापार-युद्ध की बात कही, दुनिया के तकरीबन हर देश के साथ टैरिफ का जंग छेड़ दिया, पूरे के पूरे मध्य-पूर्व को बिना किसी वजह, बिना किसी मौके के भयानक अस्थिरता में झोंक दिया, अमरीका के सबसे पुराने फौजी साथी, नाटो को छोडऩे की धमकियां दीं, नाटो सदस्यों पर कब्जे की धमकियां दीं, और एक-एक करके अपने सारे दोस्तों को खो दिया। उसका यह मिजाज अपने खुद के देश में अपनी सरकार में, अपने बड़े-बड़े साथियों के साथ भी रहा, और उसने अपनी सरकार के सबसे बड़े ओहदो पर बैठे हुए कई सबसे बड़े लोगों को निकाल फेंका। प्रवासियों को निकालने की ट्रम्प की नीति से असहमत, गृह सुरक्षा मंत्री को ट्रम्प ने हटाया, अटार्नी जनरल को हटाया, श्रम मंत्री को हटाया, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, थलसेना प्रमुख, नौसेना प्रमुख जैसे बहुत से लोगों को हटाने के अलावा ट्रम्प ने हटाए गए कुछ लोगों के खिलाफ मुकदमे भी छेड़ दिए। जिस आदमी का मिजाज उस डाल को काटने का है जिस पर वह बैठा हुआ है, तो वह इस काम को देश के भीतर भी कर रहा है, और देश के बाहर भी। जब ऐसे अस्थिरचित्त वाले, और ऐसे बीमार या विक्षिप्त दिमाग वाले के हाथ दुनिया की सबसे बड़ी फौजी और आर्थिक ताकत, परमाणु बम की बटन, सब कुछ दे दी जाए, तो उसका इतना तानाशाह हो जाना स्वाभाविक ही है।
पूरी दुनिया में मीडिया कारोबार में एआई नौकरियां खा रहा है। जहां पर कम्प्यूटरों का जितना अधिक इस्तेमाल था, वहां पर उसकी मार कुछ अधिक जल्दी आई है, और कुछ अधिक जोरों से पड़ रही है। बहुत से मीडिया कारोबार अपने समाचार-विचार से जुड़े हुए सभी तरह के विभागों पर एआई के अधिक से अधिक इस्तेमाल की शर्तें लाद रहे हैं, कई कंपनियों ने कर्मचारियों पर यह शर्त लगा दी है कि वे कम से कम कितना फीसदी इस्तेमाल एआई का करेंगे। मकसद यही है कि जो लोग रिटायर हो रहे हैं, उनकी जगह नए लोगों की भर्ती न की जाए, और जिन लोगों की सेवा शर्तें कमजोर हैं, उन्हें बिदा किया जाए। एआई के इस्तेमाल को अधिक सहज पाने वाली नई पीढ़ी का भी यह फायदा है कि पुराने कर्मचारियों को हटाने से धीरे-धीरे बढ़ी हुई उनकी तनख्वाह बंद होती है, और नए नौजवान कर्मचारियों की तनख्वाह कम रहती है। इसके साथ-साथ नए कर्मचारी एआई का अधिक इस्तेमाल करने के लायक शिक्षित-प्रशिक्षित भी रहते हैं।
यह नौबत अधिकतर कारोबार में हैं, लेकिन हम मीडिया पर इसकी मार को एक दूसरे हिसाब से भी अधिक देख रहे हैं। मीडिया में जहां पर मौलिकता और रचनात्मकता की जरूरत रहते आई है, उसे इंसानों के मुकाबले एआई एक फीसदी वक्त में कर देता है। आज किसी विषय पर लिखा जाए, किस विषय पर बोला जाए, इस पर एआई एक मिनट के भीतर 25 विषयों पर 25-25 शब्द सुझा देता है, और इसके बाद जिस विषय के विस्तार की जरूरत हो, उस पर हजार-पन्द्रह सौ शब्द मांगे जा सकते हैं, जो कि एक-दो मिनट में हाजिर हो जाते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ एक दिक्कत यह रहती है कि समाचार-विचार का काम करने वाले अखबारनवीसों, और बाकी मीडियाकर्मियों की मौलिकता घटती चल रही है, उनकी रचनात्मकता, और कभी-कभी जरूरत पडऩे वाली कलात्मकता खत्म होती चल रही है क्योंकि इनकी जरूरत ही आज घट गई है। दिमाग में जिन चीजों का इस्तेमाल घटते चलता है, दिमाग उनके लिए जरूरी अपना हिस्सा किनारे कर देता है। हो सकता है कि दस-बीस या पच्चीस-पचास पीढिय़ों में जाकर दिमाग की रचनात्मकता और मौलिकता भोथरी होने लगे। एक वक्त बदन में एपेंडिक्स का काम रहता था, लेकिन बाद के हजारों बरसों में इंसानों का खानपान बदला, और अब यह पूरी तरह गैरजरूरी हिस्सा हो गया है। बदन में बनना भी शायद कम हो गया है, और दर्द होने पर इसे निकालकर फेंक भी दिया जाता है।
मीडिया में पिछले डेढ़ बरस में हिन्दुस्तान में हर बड़े मीडिया हाऊस से, एक-एक से सैकड़ों पत्रकारों की नौकरियां गई हैं। लेकिन रोजगार खत्म होने के अलावा एक दूसरा बड़ा नुकसान यह हुआ है कि पत्रकारिता के बहुत सारे काम अब एआई इतनी तेजी से, इतनी कम लागत से, और तकरीबन बेहतर तरीके से करके देने लगा है कि लोगों की जरूरत कंपनियों को कम रह गई है। लिखी हुई सामग्री की जगह टाईप की हुई सामग्री का चलन था, बीते कई बरस से बोलकर टाईप करना भी चलन में था, और अब तो एआई की वजह से बोलकर तस्वीर बना लेना, वीडियो बना लेना, किसी वीडियो के पीछे की आवाज बना लेना, यह सब कुछ ऐसा गजब का आसान हो गया है कि जो इंसानों के बस का कभी था नहीं। अभी एआई का इस्तेमाल जमीनी रिपोर्टिंग भर में कम है क्योंकि वहां इंसान को जाकर ही काम करना होता है। आने वाले बरसों में यह कैसा होगा, इसका ठिकाना नहीं है, और एआई को लेकर किसी भी तरह का अंदाज भी नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि वह जंगल में लंबी छलांग लगाने वाले हिरण की तरह आगे बढ़ रहा है, और इंसान उस छलांग को टेप से नापने में भी धीमे हैं।
अब एआई के चलते हुए न सिर्फ मौलिकता, और रचनात्मकता खत्म हुई है, बल्कि एआई के अपने पूर्वाग्रह उसे इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिखने, या नकल करने में बढ़ते चल रहे हैं। हमारे जैसे कुछ लोग एआई के साथ काम करते हुए उसे लगातार उसके पूर्वाग्रहों के खिलाफ चेतावनी देते रहते हैं, उसे बताते रहते हैं कि दुनिया में सिर्फ मर्द नहीं रहते हैं, महिलाएं भी बराबरी से हैं। लेकिन किसी भी एआई मॉडल की ट्रेनिंग दुनिया में कम्प्यूटरों पर कभी भी टाईप की हुई जिस सामग्री से होती है, वह सामग्री मोटेतौर पर एक संपन्न, विकसिक, शिक्षित, शहरी तबके से आती है, और उसमें ग्रामीण, गरीब, अनपढ़, असहाय लोगों की बातें नहीं रहती हैं। इसलिए एआई को जिस देश, संस्कृति, जाति, धर्म, रंग की बातें अधिक मिली हुई हैं, उसका पूर्वाग्रह उन्हीं के पक्ष में हैं। इसलिए एकदम रेडीमेड मिल जाने वाली एआई की पैदा की हुई सामग्री के भीतर इतनी बारीकी से पूर्वाग्रह को ढूंढना, अलग करना, या उसी से दुबारा लिखवाना कम हो पाता है। किसी भी कारोबार के कर्मचारी इस अतिरिक्त मेहनत के बजाय सामने एआई की परोसी गई तश्तरी के गर्मागर्म पकवान खा लेने पर भरोसा रखते हैं। इसलिए सामाजिक सरोकार से आमतौर पर मुफ्त एआई की गढ़ी हुई सामग्री भी सरोकार से काफी दूर हो सकती है। फिर यह भी है कि मीडिया कारोबार में काम करने वाले लोगों के अपने धर्म, जाति, समाज, संपन्नता, शिक्षा, लैंगिकता के अपने पूर्वाग्रह रहते हैं, और उनके पूछे गए सवाल, सुझाए गए मुद्दे, और मांगी गई सामग्री में उनकी जो सोच रहती है, एआई ठीक उसी मुताबिक ठकुरसुहाती की बातें करता है। जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे, तुम दिन को कहो रात तो हम रात कहेंगे, कुछ इस किस्म से एआई काम करता है, और औसत दर्जे के लोग एआई की कही हुई बात को एक किस्म से वजनदार और भरोसेमंद मान लेते हैं। लोगों का अपना पूर्वाग्रह, और एआई की ट्रेनिंग में इस्तेमाल सामग्री का पूर्वाग्रह, ये दोनों मिलकर मीडिया में अभी हाल तक प्रचलित सरोकारों को कुचलते चल रहे हैं। दिक्कत यह है कि एआई ने समाचार-विचार की किसी भी किस्म को तैयार करने की लागत इतनी घटा दी है कि मीडिया कारोबारी को जल्लाद बनकर रोजगार के गले काटना कारोबारी समझबूझ और हुनर का काम लगने लगा है।
कोलकाता से पुणे जा रहा एक मुसाफिर विमान अचानक रायपुर में उतरा। इमरजेंसी लैंडिंग इसलिए करनी पड़ी कि एक महिला मुसाफिर बेहोश हो गई थी। ऐसे किसी भी रूकने से एयरलाईंस को लाखों रूपए का नुकसान होता है, और सैकड़ों मुसाफिरों का सफर भी लेट होता है। फिर भी इंसानी जिंदगी अधिक महत्वपूर्ण रहती है, और बहुत सी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी किसी एक मुसाफिर को बचाने के लिए सबसे पास के देश या एयरपोर्ट पर उतरती ही हैं। लेकिन अभी दो दिन पहले की खबर थी कि भारत में ट्रेन में सफर कर रही एक लडक़ा चलती ट्रेन से गिर गया, उसकी बहन सहित कई लोगों ने ट्रेन रोकने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन नहीं रूकी। चेन खींचने पर भी कुछ नहीं हुआ। कुछ और अलग-अलग खबरों से पता लगता है कि ट्रेन में झगड़ा होने पर किसी को फेंक दिया गया, लेकिन चेन खींचने पर ट्रेन नहीं रूकी। डिब्बे में गुंडागर्दी होती रही, लेकिन पुलिस या रेलवे को खबर करने पर भी कोई मदद नहीं मिली। किसी-किसी मामले में शिकायत करने पर मदद मिलने की भी खबरें आती हैं।
इन दो तरह की स्थितियों को देखें, तो लगता है कि हवाई सफर करने वाले लोगों को विमान से जल्दी पहुंचने के अलावा भी कई किस्म की सुविधाएं मिलती हैं, जिनमें सुरक्षा और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हैं जो कि हर मुसाफिर, हर इंसान को मिलनी ही चाहिए। रेलवे स्टेशनों से लेकर रेलगाडिय़ों के डिब्बों, और खासकर डिब्बों के पखानों तक सब कुछ गंदा मिलता है। विमान मुसाफिर और ट्रेन मुसाफिर के बीच विमान और ट्रेन तक का फर्क समझ में आता है, लेकिन साफ-सफाई तो एक बुनियादी हक होना चाहिए, उसमें गरीब और अमीर में फर्क करना, कम किराए और अधिक किराए के सफर में सफाई का फर्क करना, यह तो बहुत बड़ी असभ्यता का सुबूत है। लेकिन इस देश में गरीब और अमीर के बीच ऐसी असभ्यता कदम-कदम पर दिखती है। शहरों में देखें, तो सत्तारूढ़ और विपक्षी नेताओं के रहने के इलाके, अफसरों के रहने के इलाके अलग किस्म से साफ-सुथरे दिखते हैं। वहां पर लाउडस्पीकर पर शोरगुल की इजाजत भी नहीं रहती, वहां ऐसे ट्रांसफॉर्मरों से बिजली आती है, जो आमतौर पर बंद नहीं होते, जो कि अस्पताल जैसे सबस्टेशन से जुड़े रहते हैं। इन इलाकों में सडक़ें खराब भी नहीं होती हैं, और उन पर दुबारा एक लेयर चढ़ा दी जाती है। दूसरी तरफ शहर के बाकी हिस्सों में सडक़ों पर गड्ढे पड़े रहते हैं। वीआईपी कहे जाने वाले इलाकों में खम्भों पर कोई बल्ब खराब नहीं रहते, वहां के बाग-बगीचों में पानी की कमी नहीं रहती। लेकिन आम लोगों के इलाके बदहाल रहते हैं।
अभी कहीं पर पढ़ा कि वे देश विकसित नहीं हैं जहां गरीब भी कारों पर चलते हैं, वे देश विकसित हैं जहां संपन्न लोग भी बसों या साइकिलों से चलते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले योरप के एक देश के प्रधानमंत्री का समाचार देखने मिला जिसमें वे नए प्रधानमंत्री को काम सौंपकर कार्यालय से बाहर निकलते हैं, कार्यालय के दो-चार लोग बाहर तक उन्हें छोडऩे आते हैं, और वहां वे अपनी साइकिल उठाकर चलाते हुए अपने घर चले जाते हैं। जिस तरह किसी भी प्रधानमंत्री के काम के आखिरी दिन को दिखाने के लिए मीडिया इकट्ठा होता ही है, इस प्रधानमंत्री को भी साइकिल से घर जाते दिखाने के लिए बहुत से फोटोग्राफर और कैमरापर्सन वहां पर थे। बिना किसी बयानबाजी के वे मुस्कुराते और हाथ हिलाते निकल गए। सभ्य देशों में सबसे ताकतवर लोग भी सबसे आम लोगों की तरह रहने की कोशिश करते हैं। भूटान जैसे बगल के छोटे से देश में तो प्रधानमंत्री साइकिल चलाते दिखें, तो अधिक हैरान नहीं होना चाहिए, लेकिन जब सबसे विकसित योरप के कई देशों में, कम से कम कुछ देशों में तो, प्रधानमंत्री या वहां के राजा या राजकुमार साइकिल पर दिखें, बसों पर चलते दिखें, तो लगता है कि ‘राजा’ और प्रजा के बीच फासला नहीं है। ब्रिटेन की बहुत सी तस्वीरें आती हैं जिनमें कभी कोई मंत्री, तो कभी संसद में प्रतिपक्ष के नेता मेट्रो ट्रेन में सफर करते हुए दिखते हैं। ऐसे में उन देशों पर तरस आता है जहां एक वार्ड मेंबर बनने पर भी लोग इतनी बड़ी गाड़ी में चलने लगते हैं जो उनके ही वार्ड की हर सडक़ पर घुस न सके।
दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी, और टेस्ला जैसी चर्चित कार कंपनी, एक्स जैसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाने वाले एलन मस्क अभी अपनी ही पिछली एक भागीदारी वाली कंपनी, ओपन एआई, के खिलाफ अदालत में बयान दे रहे हैं। यह बयान आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर आज सामने खड़े हुए खतरों को तो गिनाता ही है, साथ-साथ एआई की भविष्य की संभावनाओं, कारोबारी आशंकाओं पर भी मस्क का नजरिया बताता है। ओपन एआई के साथ मस्क का झगड़ा इस बात को लेकर है कि उस कंपनी में उन्होंने एक बड़ी पूंजी इसलिए लगाई थी कि कंपनी ने उसे समाजसेवा में इस्तेमाल करने का वायदा किया था, लेकिन बाद में उसके मालिक ने उसे खालिस कारोबार में लगा दिया। अमरीका की एक अदालत में चल रही यह गवाही इस कंपनी में पूंजीनिवेश से परे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बारे में बड़ी अहमियत वाली बातें सामने रख रही है।
एलन मस्क का कहना है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से एक कदम आगे बढक़र अब जो एआई विकसित हो रहा है, वह एजीआई है (आर्टिफिशियल जनरल इंटेलीजेंस)। उन्होंने अदालत में यह तर्क दिया कि एजीआई अगर किसी ऐसी कंपनी के नियंत्रण में आ जाती है जिसका मकसद केवल कमाना है, तो वह एआई सुरक्षा प्रोटोकॉल को दरकिनार कर सकती है। मस्क का मानना है कि 2026-27 में एआई इंसानी दिमागी से ज्यादा स्मार्ट हो जाएगा, और वह स्वायत्त फैसले लेने लग सकता है। उन्हें डर है कि ऐसा एआई इंसानों को चीटिंयों की तरह समझ सकता है, जिन्हें नष्ट करने का उसका कोई इरादा तो नहीं होगा, लेकिन अगर वे उसके रास्ते में आए तो वह उन्हें बिना सोचे-समझे कुचल देगा। मस्क ने अदालत में यह चेतावनी भी दी कि एआई का इस्तेमाल जंग छिड़वाने, और सूचनाओं को इस तरह तोडऩे-मरोडऩे के लिए किया जा सकता है कि उससे दुनिया भर के लोकतंत्र अस्थिर हो सकें। मस्क एआई को बार-बार मानवता का अंतिम आविष्कार कहते हैं। वे मानते हैं कि आज एजीआई के विकास में कई बड़ी कंपनियां लगी हैं, और उनका बुनियादी मकसद मुनाफा है न कि इंसानी नस्ल की हिफाजत। वे यह भी मानते हैं कि एआई या एजीआई से दुनिया भर के लोकतंत्रों को अस्थिर करने, चुनाव प्रभावित करने, और सामाजिक विभाजन पैदा करने का काम आसानी से किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि एजीआई अगर सही हाथों में भी गया, तो भी उसका दुरूपयोग होना तय है, क्योंकि इसमें असीमित ताकत होगी। वे मानते हैं कि इसके बाद दुनिया में किसी भी और आविष्कार की जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि हो सकता है कि इंसान खुद ही अस्तित्व में न रहें।
इस अदालती मामले और गवाही से परे की एक और खबर पर गौर करने की जरूरत है। एंथ्रोपिक नाम की एक एआई कंपनी है उसने अभी अपने कुछ सबसे ताकतवर मॉडलों को तैयार कर लेने के बाद भी बाजार में उतारने से इंकार कर दिया। उसने दुनिया की कुछ सबसे बड़ी टेक्नॉलॉजी कंपनियों को निजी प्रयोग के लिए ये एआई मॉडल दिए हैं ताकि वे खासी निगरानी में इसका इस्तेमाल करके इसके खतरे आंक सकें, और यह देख सकें कि ऐसे खतरनाक मॉडल की हरकतों को रोकने के लिए इन कंपनियों को अपने आज के इंतजाम में कौन-कौन से नए बचाव विकसित करने हैं। बिल्कुल ही चुनिंदा और भरोसेमंद कंपनियों को दिए गए इस एआई मॉडल के बारे में इसे विकसित करने वाली कंपनी एंथ्रोपिक के शोधकर्ताओं ने ही यह पाया कि उनके ताकतवर मॉडल जैविक हथियार बनाने, और वायरल इंफेक्शन फैलाने के तरीके बड़ी आसानी से बता दे रहे थे। इसे देखकर उन्हें यह समझ पड़ा कि अगर ये एआई मॉडल किसी आतंकी संगठन के हाथ लग गया, तो यह वैश्विक तबाही ला सकता है। कहने के लिए तो एंथ्रोपिक अपने मॉडलों को संविधान सिखाता है, ताकि वे नैतिक बने रहें, लेकिन जब कंपनी ने जांच-पड़ताल की, तो पाया कि ये मॉडल कई बार सुरक्षा-फिल्टर को पार करने के तरीके ढूंढ लेते थे। वे इंसानों को धोखा देने में माहिर हो रहे थे, उन्हें यह अंदाज होने लगा था कि इंसान क्या सुनना चाहते हैं, और वे अपनी गलतियों को छिपाने के लिए झूठ बोलने लगे थे। यह सब देखते हुए अनिश्चितता के खतरों की वजह से एंथ्रोपिक ने अपने बिल्कुल तैयार किए हुए एआई मॉडल भी बाजार में न भेजना तय किया।
इस बारे में अभी दुनिया में एआई विकसित कर रही कुछ कंपनियां कुछ दार्शनिकों की सेवाएं भी ले रही हैं ताकि एआई नैतिक बना रहे। यह नौबत बड़ी अजीब इसलिए है कि एआई विकसित करने में अंधाधुंध पंूजीनिवेश लग रहा है, अंधाधुंध लागत आ रही है, और इतने बड़े कारोबार का बुनियादी मकसद कमाई बने रहना तय सा रहता है। ऐसे में इतने बड़े पूंजीनिवेश का नैतिक बने रहना आज की बाजार व्यवस्था को देखकर नामुमकिन सा लगता है। फिर भी कुछ जिम्मेदार एआई कंपनियां अगर दुनिया के संविधान, नैतिकता, मानवीय मूल्यों, और सामाजिक न्याय की समझ भी एआई में डाल रही हैं, तो वह जिम्मेदारी का एक कदम तो है, लेकिन यह काफी नहीं है। दुनिया के इतिहास और वर्तमान में बहुत सी ऐसी विचारधाराएं रहती हैं जो कि सत्ता की नजर में बगावत रहती हैं, और आंदोलनकारियों की नजर में क्रांति रहती हैं। अब ऐसे आंदोलनों को एआई किस नजर से देखेगा? जब दुनिया गर्भपात के अधिकार को लेकर बंटी हुई है, आर्थिक असमानता को लेकर उदार अर्थव्यवस्था के साथ टकराव चलते रहता है, तो फिर एआई के सामने जब इन दोनों में किसी एक के पक्ष में फैसला लेना होगा, तो वह अपने को विकसित करने वाले कारोबार के हिसाब से चलेगा, या इंसानी बेहतरी की सोचेगा?
सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधानपीठ सबरीमाला मामले में सुनवाई कर रही है, और इस मंदिर में महिलाओं को दाखिला दिया जाए, या नहीं, इस मुख्य मुद्दे पर बहस के साथ-साथ धर्म और आस्था के कई दूसरे मामलों पर भी दिलचस्प और महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है। धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण करने, और सडक़ों को घेरने को लेकर जजों ने बड़ी सख्त टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि किसी धार्मिक गतिविधि के नाम पर, मंदिर के वार्षिक उत्सव, या रथयात्रा के नाम पर मंदिर के आसपास की सभी सडक़ों को बंद नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है, जो कि धार्मिक गतिविधि का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी है। जजों ने कहा कि अगर धार्मिक आयोजनों के कारण धर्मनिरपेक्ष गतिविधियां, या नागरिकों के सामान्य अधिकार प्रभावित होते हैं, तो राज्य सरकार को दखल देने, और इसे नियमित करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि धार्मिक सम्प्रदायों को अपनी पूजा पद्धति के प्रबंधन की स्वायत्तता है, लेकिन यह स्वायत्तता सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाडऩे, या आवश्यक नागरिक कार्यों में बाधा डालने तक फैली हुई नहीं हैं। अदालत ने यह भी कहा कि किसी धार्मिक संस्था के प्रबंधन के अधिकार बिना सार्वजनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही के नहीं हो सकता, अराजकता नहीं चल सकती। जजों ने कहा कि प्रबंधन का यह मतलब नहीं है कि इंतजाम का कोई ढांचा ही न हो, संविधान की सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
हमने अभी चार-छह दिन पहले ही इसी जगह पर सुप्रीम कोर्ट की संविधानपीठ में चल रही इस बहस के कई दिलचस्प पहलुओं को लेकर लिखा था, और पाठकों को सुझाया था कि लोकतंत्र, न्याय, और आस्था के महत्वपूर्ण पहलुओं वाले इस मामले के फैसले के पहले भी इसमें चल रही बहस को भी लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, क्योंकि इन तमाम पहलुओं की महत्वपूर्ण व्याख्या सुनना अपने आपमें लोगों की चेतना बढ़ाने वाला है। अब जजों ने यह कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब सार्वजनिक असुविधा पैदा करना नहीं है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस मुद्दे पर यह लिखते आए हैं कि धार्मिक निर्माण आमतौर पर सरकारी या सार्वजनिक जगह पर कब्जा करके, अवैध निर्माण करके, नियमों के खिलाफ किए जाते हैं। इन जगहों पर आने वाले लोगों की सुविधा के किसी भी नियम को माना नहीं जाता है, और किसी भी नए धर्मस्थल, उपासनास्थल के उगने के साथ ही आसपास के लोगों का शोरगुल से, ट्रैफिक जाम से जीना हराम करने की गारंटी कर ली जाती है। धर्म के नाम पर लोग ऐसे एकजुट हो जाते हैं कि मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा-चर्च, या मजार-प्रतिमा, जो भी हो, उन सबको प्रशासन शांतिभंग होने की आशंका बताकर छूने से भी इंकार कर देता है। अगर बिना भेदभाव के सभी धर्मों की जगहों पर एक सरीखी कार्रवाई हो, तो कोई तनाव खड़ा नहीं होता। हम बनारस और दूसरे कई तीर्थस्थानों में लगातार देख रहे हैं कि किस तरह तंग सडक़ को चौड़ा गलियारा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर पुराने-पुराने मंदिरों को भी तोड़ दिया गया, और लोगों ने उफ भी नहीं किया। हिन्दूवादी सरकारों के राज में भी ऐसा किया गया, और इसके बाद दूसरे धर्मों के लोगों को भी यह समझ आ गया कि अवैध कब्जा और अवैध निर्माण चल नहीं सकता, इसके साथ-साथ जब सार्वजनिक सुविधाएं बढ़ाने की बात होगी, तो लोगों को अपने मंदिर-मस्जिद हटाने भी पड़ेंगे।
भारत की बड़ी अदालतों में केन्द्र और राज्य सरकारें ही सबसे बड़ी वादी, और प्रतिवादी बनी दिखती हैं। सुप्रीम कोर्ट कई बार इस बात को कह भी चुका है कि किस तरह सरकार ही अदालतों पर बोझ बढ़ाती हैं। इसके अलावा संसद में भी कई बार ऐसे कानून बनते हैं जिनमें लचीलापन गायब रहता है, और बाद में होने वाले मुकदमों के दौरान अदालतों को कानून की बारीकियों के बीच से एक लचीलेपन की तलाश करनी पड़ती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अभी एक ऐसा ही मामला आया। 55 बरस के पति, और 49 बरस की पत्नी की इकलौती बेटी अभी 2022 में गुजर गई। गम में डूबे हुए मां-बाप को यह सूझने में वक्त लग गया कि वे कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से एक बार फिर मां-बाप बन सकते हैं, औलाद पा सकते हैं। लेकिन भारत में प्रजनन प्रौद्योगिकी को लेकर 2021 में बने कानून में यह तय किया गया है कि महिला अगर 50 बरस पार कर लेगी, और पुरूष 55 बरस, तो फिर वे इस तकनीक के माध्यम से माता-पिता नहीं बन सकते। इस नियम के जाल से निकलने के लिए इस जोड़े ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, और जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने यह कहा कि संतान सुख पाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को माता-पिता बनने से नहीं रोका जा सकता। आईवीएफ सेंटर ने उम्र की सीमा का हवाला देते हुए इस जोड़े को मेडिकल रूप से सक्षम रहते हुए भी मना कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने आईवीएफ सेंटर को छूट दी है, और यह आदेश भी दिया है कि अगर आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान इस महिला की उम्र 50 बरस से अधिक भी हो जाए, तो भी यह इलाज न रोका जाए।
अब सवाल यह उठता है कि जब यह कानून बनाया गया, क्या ऐसी स्थितियों की कल्पना संसद में किसी सदस्य ने नहीं की थी? जब ऐसे कानून की जानकारी सांसदों को पहले से दी जाती है, संसद में चर्चा और बहस की उम्मीद की जाती है, तब भी अगर सांसद ऐसे पहलुओं पर नहीं सोचते, तो इसका मतलब यही है कि वे ऐसे बनने जा रहे कानूनों पर अपने इलाके के अलग-अलग तबकों से राय नहीं लेते हैं, राजनीतिक दल भी अपने अनगिनत प्रकोष्ठों के भीतर किसी प्रस्तावित कानून की बारीकियों तक विचार-विमर्श नहीं करते हैं, और विधेयक मंजूरी पाकर कानून बन जाते हैं। बहुत से और दूसरे कानूनों के साथ भी ऐसी जटिलताएं जुड़ी रहती हैं जो कि व्यापक और सार्थक चर्चा से दूर हो सकती थीं, लेकिन कानून बन जाने के बाद वे अदालतों पर बोझ बन जाती हैं। लोगों को याद रखना चाहिए कि देश का संविधान बनाने के लिए जब संविधान सभा के लंबे चले सत्रों में एक-एक पहलू पर खूब विचार-विमर्श होता था, तो उसका फायदा संविधान के रास्ते देश को मिला। उस वक्त भी अगर हल्ला-गुल्ला, और बहिर्गमन के बीच बिना विचार-विमर्श और बहस के संविधान बन गया होता, तो आज अदालतें उसी की व्याख्या करने में लगी रहतीं।
प्रजनन तकनीक से जुड़े हुए कुछ और पहलुओं पर हमने पहले भी इसी जगह लिखा है। भारत में बेऔलाद लोगों को संतान पाने में मदद करने की एक तकनीक, सरोगेसी, के लिए कानून इतना जटिल बना दिया गया है, कि संतान पाने की चाह रखने वाले लोगों की हसरत अधूरी रह जाने का खतरा रहता है, दूसरी तरफ देश में जिन जरूरतमंद महिलाओं को दूसरों की मदद करके खुद भी कुछ फायदा हो सकता था, उसकी संभावना भी इस कानून ने खत्म कर दी है। इसके लिए जो महिला दूसरे जोड़े के एम्ब्रियो को अपनी कोख में रखने के लिए तैयार हो, उसका ऐसे बेऔलाद जोड़े का एकदम ही करीबी रिश्तेदार होना जरूरी है। ऐसी महिला अपने खुद के अंडे नहीं दे सकती। उसका शादीशुदा, विधवा, या तलाकशुदा होना जरूरी है। उसकी उम्र 25 से 35 बरस के बीच होनी चाहिए। उसका कम से कम एक जीवित जैविक बच्चा अपना खुद का होना चाहिए। सरोगेसी केवल नि:स्वार्थ आधार पर ही की जा सकती है, इसके लिए वह महिला केवल मेडिकल खर्च, और स्वास्थ्य बीमा का कवरेज ले सकती है, लेकिन इसके अलावा और कुछ नहीं पा सकती। कहने के लिए तो यह कानून गरीब महिलाओं के कारोबारी शोषण को रोकने के लिए लाया गया है, लेकिन इसकी शर्तें इतनी कड़ी हैं कि बहुत से जोड़ों को तो ऐसे शर्तों वाली कोई रिश्तेदार महिला शायद मिल भी न पाए। दूसरी तरफ जिस देश में किसी महिला का देह बेचना गैरकानूनी नहीं है, जहां पर गैरकानूनी तरीके से किडनी खरीदना देश भर में धड़ल्ले से जारी है, वहां पर एक गरीब महिला को भी किसी दूसरी जरूरतमंद महिला से सरोगेसी के लिए भुगतान लेने की छूट नहीं है।


