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विशेष रिपोर्ट

दुर्लभ बीमारी से जंग जीती 9 साल के आयुष ने

सुरेन्द्र सोनी 

बलौदा, 25 मई (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। जुवेनाइल मायोसाइटिस नाम सुनने में ही अजीब है, यह किसी वस्तु का नाम नहीं यह एक बहुत ही दुर्लभ बीमारी है। यह बीमारी लाखों में किसी एक को होती है और यह बीमारी बलौदा थाना के बुचीहरदी के 9 वर्षीय आयुष यादव को हो गई थी। अब आयुष ने उपचार के बाद इस बीमारी से जंग जीत ली है।

आयुष के माता-पिता शंकर यादव एवं कुंती यादव एक साधारण परिवार से है। शंकर मोटरसाइकिल मरम्मत कर जीवनयापन करता है। उनके परिवार में पत्नी, पुत्र आयुष, दो पुत्री हैं।

आयुष के माता-पिता ने बताया कि शुरुआती दिनों में आयुष को पैर दर्द शुरू हुआ, जिसके लिये आयुष के माता-पिता ने स्थानीय डॉक्टर से साधारण दवा लिया, जिससे आराम न लगने पर और दर्द बढऩे पर जांजगीर में बच्चों के डॉक्टर को दिखाए वहां भी कुछ नहीं है बोल कर सामान्य दर्द की दवा दे दी। उसके बाद कमर के नीचे का पूरा शरीर शून्य हो गया। खाना-पीना भी नहीं कर पा रहा था। पूरे शरीर में दर्द हो रहा था। कहीं पर भी सिर्फ अंगुली रखने पर दर्द से व्याकुल हो जाता था। आयुष के माता-पिता बहुत घबरा गए कि यह क्या हो गया। फिर एक डॉक्टर ने बाहर ले जाने का सलाह दिया, तो आयुष के माता-पिता बिलासपुर जाने से पहले डॉ. दिलीप जैन (बाल्य गहन चिकित्सा विशेषज्ञ) बलौदा के पास ले गए। जहां उचित समय पर परीक्षण उपरांत आयुष की बीमारी का पता लगाकर उपचार शुरू किया गया, जिसकी बदौलत आज आयुष 6 माह के उपचार के बाद सामान्य जिंदगी जी रहा है।

डॉ. दिलीप जैन ने बताया कि इस बीमारी का नाम जुवेनाइल मायोसाइटिस है यह एक आटो इम्युन डिसऑडर है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा तंत्र ही शरीर को नुकसान पहुंचाती है। यह एक असामान्य बीमारी है। इस बीमारी के इलाज में दवाइयों के द्वारा प्रतिरक्षा तंत्र को अप्रभावी बनाया जाता है तथा दवाइयों के साईड इफेक्ट्स को ध्यान में रखकर दवाइयों की डोज निर्धारित की जाती है तथा इलाज के दौरान इसकी मानिटरिंग भी की जाती है। इलाज में कोर्टिकोस्टेराॉयड दवाएं एवं इम्युनोसप्रेसेन्ट दवाइयाँ जैसे एजाथियोप्रिइन और मेथोट्रेक्सेट दी जाती है। जैसे कि जुवेनाइल मायोसाइटिस एक असामान्य बीमारी है इसलिए उचित इलाज का पता लगाने के लिए डॉक्टर को कई अलग-अलग इलाज प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करके देखना पड़ता है। सही समय पर इस तरह की बीमारी का पता और जांच के बाद ही उपचार में सहायक होती है।

डॉ. दिलीप जैन ने बताया कि यह बीमारी काफी दुर्लभ है और इसके लक्षण भी पूरी तरह से अन्य रोगों से मिलते जुलते हैं। यह अनुवांशिकी भी हो सकती है, इसलिए इसके प्रारंभिक लक्षण के साथ इस रोग की पहचान करना भी  मुश्किल हो जाता है। हालांकि शारिरिक परीक्षण व लक्षणों की जांच के साथ कुछ टेस्ट से पता लगाया जाता है। जिसमें मांसपेशियों की बायोप्सी, इलेक्ट्रोमायोग्राफी, एमआरआई, नर्व कंडक्शन, स्टडी, ब्लड टेस्ट, मायेसाइटिस स्पेसिफिक एंटीबॉडी, पैनल टेस्ट जेनेटिक टेस्ट कराने से बीमारी पकड़ में आती है।

आयुष के माता-पिता ने डॉ. दिलीप जैन का आभार भीगे नयनों से जताया कि उनके बेटे को बचा लिया। हमारा बेटा बच कर वापस आएगा, इसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। उसकी स्थिति को देखकर नहीं लगता था कि आयुष ठीक हो जाएगा। उसे पानी पीने, खाना खाने और गोद में उठा ले जाने पर भारी दर्द से कराह उठता था। अभी आयुष डॉक्टर की देखरेख में अपने घर पर स्वास्थ्य लाभ ले रहा है।

विचार/लेख

दुआ पर आरोप लगाने वाली महिला क्या चाहती थी?

-कविता कृष्णन

जिनके लेखन, कविता, पत्रकारिता, राजनीतिक आदर्श आदि का हम आदर करते हैं, उनके खिलाफ यौन उत्पीडऩ, यौन हिंसा आदि के आरोपों पर हमारा रिस्पॉन्स कैसा होना चाहिए? मेरा मानना है कि यह संभव और उचित है कि किसी के काम का आदर करते हुए उनको हम यौन उत्पीडऩ आदि के लिए जवाबदेह रखने में सफल हो सकते हैं।

पाब्लो नेरुदा ने अपने आत्मकथा में श्री लंका में उनके कमरे से मल ढोने वाली महिला के साथ बलात्कार का खुद विवरण किया। फि़ल्मकार ङ्खशशस्र4 ्रद्यद्यद्गठ्ठ ने अपनी ही 7 वर्षीय बेटी पर यौन हिंसा किया और क्रशद्वड्डठ्ठ क्कशद्यड्डठ्ठह्यद्मद्ब ने 13 वर्षीय बच्ची का बलात्कार किया। कवि नागार्जुन पर पिछले वर्ष आरोप लगा कि उन्होंने एक छोटी बच्ची पर यौन हिंसा किया। क्या हम यौन हिंसा पर चुप मार लें या उसे झूठा बता दें महज इसलिए कि यह हमारे चहेते व्यक्ति के प्रति हमारे प्रेम और आदर के लिए असुविधाजनक है? ऐसा करके हम कह रहे हैं कि यौन हिंसा झेलने वालों का जीवन, हमारे चहेते व्यक्ति की शोहरत से कम मूल्य रखता है।

ताजा उदाहरण पत्रकार विनोद दुआ का है। हिंदी पत्रकारिता जिस समय गोदी मीडिया संकट से गुजर रहा है उसी समय दुआ ने निस्संदेह उसकी लाज रखी। पर प्तरूद्गञ्जशश के आरोपों के मामले में दुआ पत्रकारिता और पर्सनल दोनों मामलों में जो मानक हैं उन पर खरे नहीं उतरे। उनके लिए लिखे जाने वाले दर्जनों ओबिचूएरी में इस मामले पर चुप्पी, महिलाओं के अस्तित्व और इंसानियत को खारिज करता है।
दुआ पर आरोप लगाने वाली महिला क्या चाहती थी? शायद सिर्फ इतना कि वे कई वर्षों पहले के उनके किए के लिए वे माफी माँगें, स्वीकार करें कि उन्होंने किसी युवा महिला के साथ अन्याय किया।

पर ऐसा करने के बजाय दुआ ने महिला पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। एंकर होने के प्लेटफार्म का दुरुपयोग किया और द वायर द्वारा बनाए गए जाँच कमेटी के सामने पेश ही नहीं हुए। उस महिला के बयान कहीं से भी कमजोर नहीं था- वे खुद सेक्युलर है और उनके पास दुआ पर गलत आरोप लगने के लिए कोई मकसद नहीं है।
ये ‘कैन्सल कल्चर’ नहीं है। विनोद दुआ के काम को खारिज करने को नहीं कहा जा रहा है। पर उनका व्यक्तिगत असेस्मेंट करते हुए इस यौन उत्पीडऩ वाले पक्ष को और उसके साथ उस महिला और सभी महिलाओं के मूल्य को सिरे से कैन्सल (खारिज) मत करिए।