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  • नीरव मोदी के प्रत्यर्पण को यूके कोर्ट ने दी मंज़ूरी, कहा उनकी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हैं
    नीरव मोदी के प्रत्यर्पण को यूके कोर्ट ने दी मंज़ूरी, कहा उनकी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हैं

    -गगन सभरवाल
    लंदन से, 25 फरवरी। यूके की एक अदालत ने भगोड़े हीरा व्यापारी नीरव मोदी के भारत प्रत्यर्पण को मंज़ूरी दे दी है.

    गुरुवार को इस मामले में कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया और कहा कि मुंबई की आर्थर रोड जेल उनके लिए ठीक रहेगी. तब तक नीरव मोदी को कस्टडी में रखा जाएगा. कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका भी खारिज कर दी है.

    कोरोना लॉकडाउन के कारण नीरव मोदी वीडियो लिंक के ज़रिए कोर्ट में उपस्थित हुए थे. नीरव मोदी काला जैकेट पहने हुए थे और उनकी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी. वो बेहद गंभीरता के साथ जज के सामने फ़ैसला सुनते दिखे.

    जस्टिस सैमुअल गूज़ी ने कहा कि नीरव मोदी पर जो आरोप हैं उसके जवाब उन्हें भारत में देने चाहिए.

    जज ने कहा, "प्रथमदृष्टया ये मामला पैसों की धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है." कोर्ट ने भारतीय पक्ष की दलील को माना और कहा कि इस मामले में गवाहों को बहकाया गया है और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई है.

    जज ने कहा, "ऐसा नहीं लगता कि नीरव मोदी आत्महत्या करेंगे. कोर्ट को यकीन है कि अगर उन्हें भारत प्रत्यर्पित किया जाता है तो भी वो अपना पक्ष रख सकेंगे. ऐसा नहीं लगता कि उन्हें भारत प्रत्यर्पित किया जाए तो उन्हें न्याय नहीं मिलेगा."

    भारत सरकार की दलील को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि जेल में उनकी सुरक्षा को लेकर कोर्ट आश्वस्त है.

    कोर्ट ने कहा, "मुंबई के आर्थर रोड जेल का कमरा 12 (बैरक नंबर 12) उनके लिए ठीक है. ये एक बड़ा कमरा है जिसमें उन्हें एक बिस्तर, एक बाथरूम मिलेगा, कमरे में रोशनी भी आती है."

    "जेलों में अधिक संख्या में कैदियों के होने की बात कही जाती है लेकिन आर्थर रोड जेल का बैरक नंबर 12 बीस फीट लंबा और 15 फीट चौड़ा है, इसमें पंखा लगा है और ट्यूबलाइटें भी हैं. यहां मच्छर न हों उसलिए सप्ताह में एक बार यहां दवा भी छिड़की जाती है."

    जज ने कहा, "अगस्त 2020 में जेल के जो वीडियो कोर्ट में पेश किए गए थे उनमें देखा जा सकता है कि वहां सफाई की और शौच की अच्छी व्यवस्था है."

    जज ने नीरव मोदी के मानसिक स्वास्थ्य की दलील को खारिज करते हुए कहा कि उनकी स्थिति में किसी भी व्यक्ति की मानसिक हालत ऐसी हो सकती है.

    हालांकि कोर्ट ने कहा है कि इस आदेश के बाद भी नीरव मोदी चाहें तो यूके की कोर्ट में फिर से अपील कर सकते हैं. कोर्ट का कहना है कि उन पर लगे आरोपों की सुनवाई भारत में होनी चाहिए.

    भारत सरकार के वकील क्राउन प्रोज़िक्यूशन सर्विस ने कहा, "नीरव मोदी के ख़िलाफ़ मामला ये बताता है कि ब्रितानी अधिकारियों और भारतीय अधिकारियों के बीच बढ़िया सहयोग है और दोनों पक्ष चाहते हैं कि दूसरे किसी देश भाग कर आरोपी न्याय से बच नहीं सकता."

    भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने आज एक प्रेस वार्ता में कहा भारत सरकार ब्रितानी अधिकारियों से चर्चा करेगी ताकि नीरव मोदी को जल्द भारत लाया जा सके.

    उन्होंने कहा, यूके की वेस्टमिनस्टर कोर्ट ने कहा है कि नीरव मोदी को भारत प्रत्यर्पित किया जाए ताकि उन पर यहां मुकदमा चलाया जा सके. उन्होंने कहा, "कोर्ट ने नीरव मोदी की मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ने की दलील को खारिज किया और ये भी माना कि वो सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं और सबूत नष्ट कर सकते हैं."

    क्या है मामला?
    नीरव मोदी के प्रत्यर्पण को लेकर लंदन की अदालत में साल 2019 से मामला चल रहा है.

    बैंक धोखाधड़ी के मामले में नीरव के चाचा मेहुल चौकसी पर भी आरोप लगाए गए हैं. पीएनबी बैंक घोटाले के सामने आने से पहले दोनों ही जनवरी में देश छोड़कर भाग गए थे. मेहुल चौकसी एंटीगुआ और बारबाडोस की नागरिकता ले चुके हैं.

    नीरव मोदी और मेहुल चौकसी खुद पर लगे आरोपों से इनकार करते हैं.

    पंजाब नेशनल बैंक से 14000 करोड़ रुपये के ग़बन के संबंध में सीबीआई और ईडी ने अलग-अलग मामले दर्ज किए हैं. सीबीआई ने नीरव मोदी के ख़िलाफ़ जो दो मामले दर्ज किए हैं उनमें नीरव मोदी की बहन पूर्वी मेहता और उनके पति मयंक मेहता को अभियुक्त नहीं बनाया गया है.

    लेकिन प्रवर्तन निदेशालय ने दोनों को अभियुक्त बनाया है क्योंकि आरोप है कि इन दोनों के ज़रिये ही नीरव मोदी ने 12000 करोड़ रुपये तक की रक़म को ठिकाने लगाने में कामयाबी हासिल की है. मामले के संबंध में प्रवर्तन निदेशालय ने जो आरोप पत्र दायर किया उसमें मयंक मेहता को भी अभियुक्त बनाया गया है.

    इससे पहले लंदन की वेंडज़वर्थ जेल में नीरव मोदी की बहन और बहनोई की ओर से सरकारी गवाह बनने की इच्छा ज़ाहिर की थी. पूर्वी मेहता, हीरा कारोबारी नीरव मोदी की छोटी बहन हैं और वो बेल्जियम की नागरिक हैं जबकि उनके पति मयंक के पास ब्रितानी नागरिकता है.

    पूर्वी और मयंक के वकील अमित देसाई के अनुसार दंपत्ति ने ख़ुद को नीरव मोदी की करतूतों से अलग कर लिया है. उनकी दलील है कि दोनों की निजी ज़िंदगी पर नीरव मोदी की करतूतों की वजह से बुरा असर पड़ा है.   (bbc.com/hindi)

राष्ट्रीय

  • क्या नरेंद्र मोदी स्टेडियम का नाम पहले सरदार पटेल स्टेडियम था?
    क्या नरेंद्र मोदी स्टेडियम का नाम पहले सरदार पटेल स्टेडियम था?

    -सरोज सिंह

    किसी स्टेडियम में क्रिकेट मैच खेला जा रहा हो और चर्चा स्कोर और जीत-हार की बजाए स्टेडियम के नाम पर हो, ऐसा कम ही होता है. पर भारत में पिछले चौबीस घंटों से यही हो रहा है.

    गुजरात के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड का टेस्ट मैच चल रहा है और चर्चा स्कोरकार्ड और खिलाड़ियों के प्रदर्शन की नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम की हो रही है.

    दरअसल गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन ने दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम का नाम बदलकर नरेंद्र मोदी स्टेडियम कर दिया है. बुधवार को इसका ऐलान किया गया.

    अब इसी को लेकर सोशल मीडिया से लेकर अख़बार और टीवी चैनल - सब जगह बहस शुरू हो गई है. बहस का मुद्दा क्रिकेटरों ने नहीं, राजनेताओं ने बनाया है. इसलिए ये खेल का मुद्दा कम और राजनीति का मुद्दा ज़्यादा बन गया है.

    कांग्रेस का आरोप है कि पहले स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम था. उसका नाम बदलकर नरेंद्र मोदी करना, सरदार वल्लभ भाई पटेल का अनादर करना है.

    कांग्रेस ने कहा, "पहले महात्मा गाँधी को खादी कैलेंडर से ग़ायब किया और अब मोटेरा स्टेडियम से सरदार पटेल को. जान लें, 'बापू' और 'सरदार' का नाम भाजपाई कभी नहीं मिटा सकते."

    कांग्रेस के इन आरोपों का जवाब केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने दिया.

    ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "पूरे कॉम्प्लेक्स का नाम सरदार पटेल स्पोर्ट्स एंक्लेव है, केवल क्रिकेट स्टेडियम का नाम पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा गया है. विडम्बना ये है कि जिस 'परिवार' ने सरदार पटेल के निधन के बाद भी उनका सम्मान नहीं किया, वो आज इस बात पर हंगामा मचा रहे हैं."

    स्टेडियम का नाम पहले क्या था?
    स्टेडियम के नाम को लेकर जारी बहस के बीच ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर वर्तमान में नरेंद्र मोदी स्टेडियम कहे जाने वाले स्टेडियम का असली नाम क्या था.

    इसके लिए थोड़ा इतिहास में चलते हैं.

    गुजरात के वरिष्ठ खेल पत्रकार तुषार त्रिवेदी से इस बारे में बीबीसी ने बात की. उनके मुताबिक, "1983 में इस स्टेडियम को बनाया गया था. तब इसका नाम 'गुजरात स्टेडियम' हुआ करता था. उस वक़्त ये स्टेडियम रिकॉर्ड 9 महीने में बन कर तैयार हुआ था. तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जै़ल सिंह ने इसका शिलान्यास किया था."

    TWITTER  / GUJARAT INFORMATION

    "इस स्टेडियम में पहला मैच भारत और वेस्ट इंडीज़ के बीच खेला गया था."

    साल 2015 में इस स्टेडियम के नवीनीकरण का काम शुरू हुआ इसलिए यहां कोई मैच नहीं खेला गया.

    पिछले साल फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब भारत आए थे, तो इसी स्टेडियम में 'नमस्ते ट्रंप' का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. उस वक़्त भी ये स्टेडियम सुर्खियों में रहा था.

    इसकी ख़ासियत है कि सीटों की क्षमता के लिहाज़ से ये दुनिया का सबसे बड़ा स्टेडियम है.

    तुषार त्रिवेदी बताते हैं, "साल 1994-95 में इस स्टेडियम के नाम के आगे सरदार वल्लभ भाई पटेल जोड़ा गया था. उस वक़्त गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष नरहरि अमीन थे."

    "स्टेडियम मोटेरा इलाक़े के पास बना है, इसलिए पटेल का नाम जोड़ने के बाद स्टेडियम का नाम 'सरदार पटेल गुजरात स्टेडियम, मोटेरा' हो गया था. अब 2021 में स्टेडियम का नाम तीसरी बार बदला गया है. अब इसका नाम हो गया है नरेंद्र मोदी स्टेडियम."

    लेकिन स्टेडियम का नाम पहले सरदार पटेल स्टेडियम था, इसके उदाहरण कई मीडिया रिपोर्ट में भी मिलते हैं. ऊपर लगी ख़बर सरकारी प्रसारक प्रसार भारती ने ट्वीट की है, जिसमें स्टेडियम के फोटो के साथ कैप्शन में स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम मोटेरा लिखा है. ऐसी ही एक रिपोर्ट अख़बार बिजनेस स्टैंडर्ड और हिंदुस्तान टाइम्स की भी है, जिसमें स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम लिखा है.

    इसके अलावा इंग्लैंड की टीम जब 19 फरवरी 2021 को स्टेडियम में पहुँची थी, तब भी इंग्लैंड क्रिकेट के ट्विटर हैंडल से स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम ही ट्वीट किया गया था.

    लेकिन गुजरात के उप मुख्यमंत्री ने इससे इनकार किया है. डीडी न्यूज़ गुजराती द्वारा जारी किए गए बयान में उन्होंने कहा, "मोटेरा स्टेडियम का नाम बदल कर नरेंद्र मोदी स्टेडियम किया गया है."

    गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन की आधिकारिक बेवसाइट पर 29 दिसंबर 2020 का एक वीडियो पोस्ट किया हुआ है, जिसमें स्टेडियम का नाम मोटेरा स्टेडियम ही लिखा है.

    इस स्टेडियम में भारतीय क्रिकेटरों ने कई रिकॉर्ड भी बनाए हैं. तुषार त्रिवेदी ऐसे रिकॉर्ड की संख्या 20 से ज़्यादा बताते हैं.

    वो कहते हैं, " सुनील गावस्कर ने इसी मैदान में 10 हजार रन बनाया था, कपिल देव ने इसी मैदान में 432 विकेट लिए थे, सचिन तेंदुलकर ने पहला डबल सेंचुरी इसी मैदान में खेलते हुए लगाया था, अनिल कुबंले ने भी अपना 100वां टेस्ट यहीं खेला था."

    लेकिन अब रिकॉर्ड जड़ने वाले इन नामों को भुला कर स्टेडियम के नाम पर राजनीति हो रही है.

    नाम को लेकर राजनीति क्यों?
    कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मामले को लेकर ट्वीट किया "सच कितनी खूबी से सामने आता है, नरेंद्र मोदी स्टेडियम, अडानी एंड - रिलायंस एंड, जय शाह की अध्यक्षता में! " इसके साथ ही उन्होंने हैशटैग भी लगाया हम दो हमारे दो.

    ग़ौर करने वाली बात ये है कि संसद में बजट पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने इसी नारे के साथ मोदी सरकार पर तंज कसते हुए कहा था, "आज देश चार लोग चलाते हैं, हम दो हमारे दो"

    उन्होंने नाम तो नहीं लिया था, लेकिन संसद में ही उनके भाषण के दौरान पीछे से दो नाम लिए गए, भारत के दो उद्योगपति अडानी और अंबानी के. इसलिए उनके बुधवार के ट्वीट को उनके पुराने बयान से जोड़ा जा रहा है.

    दरअसल इस स्टेडियम में दो एंड का नाम - अडानी एंड और रिलायंस एंड रखा गया है. स्टेडियम के नाम बदलने के साथ साथ इन पैवेलियन एंड के नाम को लेकर भी चर्चा ज़ोर पकड़ रही है.

    तो क्या ऐसे नाम पहली बार रखे गए हैं?

    इस पर तुषार त्रिवेदी कहते हैं, "स्टेडियम में अडानी एंड का नाम पहले से ही था. लेकिन रिलायंस एंड भारत और इंग्लैंड के बीच चल रहे इस मैच से शुरू हुआ है."

    लेकिन तुषार कहते हैं कि "कोई स्पॉन्सर अगर स्टेडियम बनाने में कभी कोई खर्च करता है, तो आम तौर पर एसोसिएशन उनके नाम पर किसी एंड का नाम रखते हैं. मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भी फार एंड को 'टाटा एंड' के नाम से जाना जाता है. कई सरकारें आई और गईं लेकिन उस एंड का नाम आज भी वही है. हो सकता है स्टेडियम बनने के वक़्त टाटा ग्रुप की उसमें कोई भूमिका रही हो."

    हालांकि इस स्टेडियम के नवीनीकरण में दोनों उद्योगपतियों ने पैसा ख़र्च किया है या नहीं इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं है.

    PRASHANT BHUSHAN / TWITTER

    स्टेडियम के नाम कैसे रखे जाते हैं?
    कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने प्रेस कांफ्रेंस कर ये भी आरोप लगाया है कि "इतिहास आपको तब याद रखता है, जब आप ऐतिहासिक काम करते हैं. लेकिन इस सरकार ने ऐसा कोई काम ही नहीं किया, फिर भी चाहते हैं इतिहास में वो याद किए जाए?"

    ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्टेडियम के नाम रखने के कोई नियम कायदे क़ानून हैं?

    क्या कभी किसी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में ऐसा हुआ है कि किसी स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रख दिया गया हो?

    इसके जवाब में खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने एक पत्रकार के ट्वीट को री-ट्वीट करते हुए लिखा कि इस लिस्ट में परिवारवालों के नाम पर जितने स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, स्टेडियम और खेल पुरस्कार हैं, उसका दशमलव एक फीसदी भी हमने नहीं किया है.

    उस लिस्ट में कांग्रेस नेताओं के नाम पर आज तक देश में जितने स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, स्टेडियम और खेल पुरस्कारों की घोषणा की है उसके नाम गिनाए हैं.

    स्टेडियम के नामकरण के नियमों के बारे में बात करते हुए खेल पत्रकार तुषार त्रिवेदी कहते हैं, "किसी स्टेडियम या उसमें बने किसी एंड का नाम किया रखना है ये स्थानीय क्रिकेट एसोसिएशन का विशेषाधिकार होता है."

    वो याद करते हुए कहते हैं, "वानखेडे स्टेडियम का नाम शेषराव कृष्णराव वानखेड़े के नाम पर जब रखा गया था, तब वो जीवित थे. चेन्नई का एमए चिदाबंरम स्टेडियम जब बना था, तब वो जीवित थे. उसी तरह से भारत में एनकेपी साल्वे चैलेंजर ट्रॉफी खेला जाता है. ये घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट है. एनकेपी साल्वे जीवित रहते हुए ये ट्रॉफी दस साल से ज़्यादा बार खेले थे."

    हांलाकि प्रधानमंत्री रहते ऐसा हुआ हो इस बारे में जानकारी नहीं है.

    लेकिन नेताओं के नाम पर स्टेडियम का नाम रखने और स्टेडियम में उनकी प्रतिमा लगाने को लेकर पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी ने हाल ही में विरोध जताया था.

    फ़िरोज शाह कोटला स्टेडियम का नाम बदलकर पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के नाम पर करने का विरोध बिशन सिंह बेदी और कीर्ति आज़ाद दोनों ने किया था. हालांकि दोनों की अरुण जेटली से बनती भी नहीं थी.

    फ़िरोज शाह कोटला स्टेडियम में उनकी प्रतिमा स्थापित करने को लेकर बिशन सिंह बेदी ने डीडीसीए की अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा तक दे दिया था. अपना इस्तीफ़ा लिखते हुए उन्होंने एक ख़ुला ख़त लिखा था, जिसकी बहुत चर्चा भी हुई थी.  (bbc.com/hindi)

राजनीति

  • बंगाल चुनावी संग्राम-1 : क्यों ममता के लिए सुरक्षित हो सकता है नंदीग्राम !
    बंगाल चुनावी संग्राम-1 : क्यों ममता के लिए सुरक्षित हो सकता है नंदीग्राम !

    पिछले चुनावों के आंकड़े बता रहे तृणमूल के पक्ष में रही है वहां परिस्थितियां

      तृणमूल से भाजपा में शामिल हुए कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा- 50 हजार से नहीं हराया तो राजनीति से लूंगा संन्यास  

    बिकास के शर्मा

    कोलकाता, 25 फ़रवरी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पूर्व ममता बनर्जी बनर्जी के द्वारा दक्षिण बंगाल के नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की घोषणा ने एक बार फिर आंदोलन की भूमि नंदीग्राम को राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। भूमि आंदोलन के कारण वर्ष 2009 में नंदीग्राम पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना और अब इसी सीट से विधायक रहे शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने के बाद तृणमूल सुप्रीमो सुश्री बनर्जी को यहाँ से चुनाव में 50 हजार वोटों से पराजित करने की चुनौती प्रस्तुत की है। श्री अधिकारी के चैलेंज को मुख्यमंत्री सुश्री बनर्जी ने स्वीकार भी कर लिया है, जिससे चुनावी माहौल और भी गर्म हो गया है। पूरे पश्चिम बंगाल विशेषकर दक्षिण बंगाल के जिलों पूर्व मेदनीपुर, पश्चिम मेदनीपुर, आसनसोल, पुरुलिया एवं बांकुड़ा में लोगों एवं राजनीतिक पंडितों की निगाहें नंदीग्राम सीट पर गड़ी हैं।

    पूर्व मेदिनीपुर जिले में स्थित नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र लोकसभा चुनाव में तमलुक संसदीय क्षेत्र अंतर्गत आता है और वर्ष 2019 के संसदीय चुनाव में तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी एवं शुभेंदु के भाई दिब्येंदु अधिकारी ने भाजपा के सिद्धार्थ नस्कर को दो लाख मतों के अंतर से पराजित किया था। नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र भौगोलिक रूप से तीन हिस्सों में बंटा है। दो ग्रामीण ब्लॉक इलाका तथा एक शहरी इलाका है।

    नंदीग्राम क्षेत्र की 96.65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण तथा 3.35 फीसदी शहरी है। वर्ष 2019 के संसदीय चुनाव के आंकड़ों के अनुसार कुल मतदाताओं की संख्या 2,46,434 थी और विधानसभा क्षेत्र में अनुसूचित जाति की आबादी 16.46 फीसदी तथा अनुसूचित जनजाति की आबादी मात्र 0.1 फीसदी है। नंदीग्राम प्रखंड एक में अल्पसंंख्यक 34 फीसदी, नंदीग्राम प्रखंड दो में अल्पसंख्यक 12.1 फीसदी तथा शहरी इलाकों में अल्पसंख्यक 40 फीसदी हैं। साथ ही प्रत्येक चुनाव में अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं और मतदान भी अच्छा होता है। पिछले संसदीय चुनाव में 84.18 फीसदी मतदान हुआ वहीँ वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में 86.97 फीसदी मतदान हुआ था।

    दो दशक से दक्षिण बंगाल में पत्रकारिता कर रहे डॉ प्रदीप सुमन की मानें तो अल्पसंख्यकों की भूमिका का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2006 के विधानसभा चुनाव में जब सीपीआई तथा तृणमूल कांग्रेस ने अल्पसंख्यक प्रत्याशी उतारे थे तो सीपीआई को मात्र 3.4 फीसदी मतों के अंतर से जीत मिली थी। डॉ सुमन ने आगे बताया कि वर्ष 2011 में जब तृणमूल ने अल्पसंख्यक और सीपीआई ने सामान्य प्रत्याशी मैदान में उतारा तो तृणमूल की जीत का अंतर बढ़ कर 26 फीसदी हो गया। इसी तरह वर्ष 2016 में खुद शुभेंदु तृणमूल के प्रत्याशी बनने से जीत के अंतर में उन्होंने 7 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी और की, यही कारण है कि शुभेंदु वहां से ममता जैसी नेत्री को चुनौती दे पा रहे हैं।

    संसदीय आम चुनाव 2019  में विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल ने भाजपा को 68 हजार मतों के अंतर से हराया था। भाजपा के मतों में 30 फीसदी की बढ़त हुई थी। वृद्धि तृणमूल से न होकर सीपीएम के खाते से 25.79 फीसदी तथा कांग्रेस के खाते से 1.09 फीसदी हुई थी। यानी 27 फीसदी मत वाम और कांग्रेस के खाते से शिफ्ट हुए थे।

    तृणमूल नेता सह कैबिनेट मंत्री मलय घटक ने कहा कि पिछले चुनाव की स्थिति एवं ममता बनर्जी द्वारा राज्य में किये गए विकास कार्यों के आधार पर नंदीग्राम पार्टी के लिए काफी सुरक्षित सीट है। यह पूछे जाने पर कि खुद शुभेंदु के चुनाव लड़ने से कोई फर्क तृणमूल को पड़ेगा, तो उन्होंने कहा कि पिछली विधानसभा चुनाव में 80 हजार मतों की बढ़त शुभेंदु की निजी बढ़त न होकर ममता दीदी एवं तृणमूल के नाम पर मिली थी, इसलिए चाहे शुभेंदु खड़े हों या फिर खुद अमित शाह, ममता बनर्जी जैसी जन प्रिय नेत्री को उससे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ेगा।

    गौरतलब हो कि नंदीग्राम विधानसभा सीट वर्ष 1952 में हुए पहले आम चुनाव से ही अस्तित्व में रही है। साल 1952, 1957 तथा 1962 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम नॉर्थ तथा नंदीग्राम साउथ विधानसभा क्षेत्र में पृथक रूप से चुनाव हुए, किन्तु 1967 के बाद नंदीग्राम में एक ही विधानसभा सीट बनी।
    तीन दशकों के चुनावों का अध्ययन करने से पता चलता है कि साल 1991 में सीपीआई के शक्ति प्रसाद पाल ने लगातार दूसरी जीत दर्ज की। वर्ष 1996 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी देवी शंकर पांडा ने सीपीआई के निवर्त्तमान विधायक श्री पाल को हरा कर नई इबारत लिखी। वर्ष 2001 में सीपीआई ने शेख इलियास मोहम्मद को प्रत्याशी बनाया और तृणमूल प्रत्याशी को हरा कर जीत दर्ज की। वर्ष 2006 के भी चुनाव में निवर्त्तमान विधायक शेख इलियास मोहम्मद ने अपनी जीत दुहराई। नंदीग्राम आंदोलन के दौरान रिश्वत लेने के आरोप में जनवरी 2009 में उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। वर्ष 2009 में उपचुनाव में तृणमूल की फिरोजा बीबी ने सीपीआई के परमानंद भारती को हराया। वर्ष 2011 में भी यही स्थिति बरकरार रही।  वर्ष 2016 में शुभेंदु अधिकारी तृणमूल प्रत्याशी बने तथा 81 हजार मतों से चुनाव जीते। साल 2009 के उपचुनाव में तृणमूल ने 40 हजार, वर्ष 2011 में तृणमूल ने 40 हजार तथा वर्ष 2016 में तृणमूल ने 80 हजार मतों के अंतर से इस सीट पर जीत दर्ज की।

    (मूलतः पश्चिम बंगाल के निवासी लेखक युवा पत्रकार हैं और आईसीएफजे के फेलो रहे हैं)

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : Biden’s transformational challenge
    Editor's Choice : Biden’s transformational challenge

    Though the US is no longer addicted to coal, it is completely sold on the idea of cheap energy, writes Sunita Narain

    -Sunita Narain

    It’s time to exhale. Donald Trump is now a former US president. President-elect Joe Biden and his vice president-elect, Kamala Harris, have stated they will rejoin the Paris Agreement on climate change.

    So denial of this existential threat to the Planet is now past. And we can move decisively on actions. Or, so we hope.

    This is where we need a dose of realism. I am not undermining the Biden-Harris triumph, but reminding us of the troubled paths ahead. The world is hurtling down to a climate change-led catastrophe. We cannot afford coy and small answers.

    This is where introspection of the Biden-Harris victory must start. The fact is they won, but Trumpism did not lose. What is shocking to most of us, watching from the outside, is that close to half of America voted for him.

    He got more votes in 2020 than in 2016, notwithstanding his failure in managing the uncontrolled pandemic, his rejection of climate change and his exacerbation of race and gender conflicts. We need to remember this.

    The United States is a divided nation and the deep rift has its foundations on what nearly half of the American people want. You can say Biden-Harris won because they said they would control the virus; they would listen to scientific advice on the need to wear masks; and, impose lockdowns when necessary.

    But it is also a fact that people voted for Trump because they did not want any of these. They believe the economy is more important than the virus. You can argue that the virus does not discriminate, but it hits poor people more. But they are not listening.

    Let’s also be clear that, more than ever before, this US election had climate change denial or action on the ballot. It was an issue that was on the table — Trump made sure of that. He was belligerent about his opposition to this “fake” science.

    He swore by coal and, more importantly, he pushed his country to manufacture more: made in the USA was his slogan. Pushing against climate change — in spite of the terrible fires and hurricane damages — was his way of putting the economy above everything else. His people saw this.

    We need to take off our rose-tinted glasses that shows ‘all is well’. The US has always been a renegade nation as far as climate action is concerned — the abysmally insignificant targets it has set for itself under the Paris Agreement are a testimony to this.

    It is of course another matter that Biden-Harris will, at least, do something and not work against action. But this is only because Trumpism took us down to depths that we never imagined before.

    It is also a fact that Trump is right (and completely wrong) on one thing. He says his country’s energy emissions were lowest during his term; this is right. The US energy sector’s emissions declined by a massive 30 per cent in the past decade.

    The shift was primarily because market factors moved the power sector away from coal to shale and natural gas. In the last year alone, coal-fired power generation fell by 18 per cent, according to data from private research firm, Rhodium Group. This is where the good news ends.

    The fact is that cheap shale gas took off where coal left — and it left behind the renewable energy surge as the cost of gas has fallen to a record low.

    It is no wonder then that Biden has strayed off the New Green Deal agenda of his deputy to argue that he will not stop fracking of gas on private lands, where the bulk of the gas is found.


    The bigger problem is that other sectors of the US economy are now reversing gains made from the transition from polluting coal. The transportation sector has overtaken energy emissions and industrial sector emissions have grown.

    The bottom line is that even though US emissions fell by some 2 per cent in 2019 and there was a cumulative decline of 12.3 per cent on its 2005 baseline, the country is still way off the mark to meet its targets.

    By the Copenhagen Accord target it signed, the US agreed to be 17 per cent below 2005 levels by the end of 2020; and as per the Paris Agreement, 26-28 per cent below 2005 levels by 2025. In fact, net US greenhouse gas emissions in 2019 were higher than at the end of 2016 — the beginning of the Trump presidency.

    What should concern us is that further decline will be hard. This is not only because of the increase in Trump’s vote share; it is because there are no easy answers for rapid and transformational emission cuts in the country.

    Though the US is no longer addicted to coal; it is completely sold on the idea of cheap energy. It also wants to reclaim its role as the economic powerhouse — take back its position from China.

    This will mean burning more fuel for industrial growth and using more energy that will negate all the gains of cleaner fuels. This, when we need transformational answers. So, let’s not kid ourselves that all will be well now that Biden-Harris are in power. We need to push more and force them to run, and not walk, the talk. (downtoearth.org.in)

संपादकीय

  • ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : 130 करोड़ आबादी के पीएम ने खुद को क्यों किया स्टेडियम में कैद?
    ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : 130 करोड़ आबादी के पीएम ने खुद को क्यों किया स्टेडियम में कैद?

    भारत-इंग्लैंड की खबरों में चल रही टेस्ट क्रिकेट सिरीज के बीच अहमदाबाद के क्रिकेट स्टेडियम का नाम नरेन्द्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम कर दिया गया। एक लाख दस हजार क्षमता वाला यह स्टेडियम सरदार पटेल स्पोटर््स एन्क्लेव के भीतर मौजूद है, और उस एन्क्लेव का यही सबसे बड़ा, प्रमुख, और चर्चित ढांचा है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम होने का फख्र हासिल है, और यह दुनिया में किसी भी तरह के स्टेडियमों में दूसरे नंबर पर है। इसे 1983 में उस वक्त की कांग्रेस सरकार ने बनवाया था, और 2006 में भाजपा के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में इसे पूरी तरह तोडक़र 800 करोड़ की लागत से दुबारा बनाया गया था। इस स्टेडियम को पहले गुजरात स्टेडियम कहा जाता था, फिर इसका नाम सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर रखा गया। इसके लिए 1982 में गुजरात की कांग्रेस सरकार ने सौ एकड़ जमीन दी थी, और 9 महीने में सरदार पटेल स्टेडियम को पूरा किया गया था। अभी जब भारत और इंग्लैंड का यह टेस्ट मैच इस स्टेडियम में तय हुआ तब तक इसका नाम मोटेरा स्टेडियम था, और मैच के दिन ही इसका नाम बदलकर नरेन्द्र मोदी स्टेडियम किया गया। 

    कल जब यह नया नामकरण हुआ तो देश के बहुत से लोगों ने यह याद दिलाया कि स्टेडियम का नाम तो सरदार पटेल के नाम पर था, और उनका नाम हटाकर मोदी का नाम उन्हीं के सत्ता में रहते हुए ठीक नहीं है। और सोशल मीडिया पर लोगों ने इस पर जमकर लिखा। भाजपा के बहुत से नेता इस पर हक्का-बक्का थे, उनमें से एक नेता ने अनौपचारिक आपसी चर्चा में कहा कि भाजपा के लोग तो पूरे देश को मोदी का मानते थे, अब मोदी ने अपने आपको एक स्टेडियम तक सीमित कर लिया। 

    लेकिन हिन्दुस्तान में नामकरणों का इतिहास खासा पुराना है, और विवादों से भरा हुआ भी है। कल से ही मोदी समर्थकों ने यह याद दिलाना या लिखना शुरू किया है कि नेहरू ने अपने शासनकाल में ही अपने आपको भारतरत्न की उपाधि दे दी थी। हालांकि दूसरे जानकार लोगों का यह कहना है कि उस वक्त के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सार्वजनिक और औपचारिक रूप से यह बताया था कि यह फैसला उनका था, और इसका नेहरू से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन इतिहास की तारीखें तो यही बताती हैं कि नेहरू को भारतरत्न नेहरू के कार्यकाल में ही मिला था। और भारतरत्न देने का फैसला देश के राष्ट्रपति निजी हैसियत से नहीं करते, बल्कि केन्द्र सरकार इसे तय करती है। भारत रत्न की औपचारिक प्रक्रिया भी यही थी कि प्रधानमंत्री नाम का प्रस्ताव राष्ट्रपति को भेजते हैं, और वे उसे मंजूर कर लेते हैं। जब 1955 में नेहरू को भारतरत्न दिया गया तो इसकी घोषणा एक कामयाब विदेश यात्रा से लौटे नेहरू के स्वागत में राष्ट्रपति भवन में आयोजित स्वागत-समारोह में राजेन्द्र प्रसाद ने की थी, और इस फैसले को गोपनीय रखा था। राष्ट्रपति ने कहा था कि उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था से परे जाकर, बिना किसी सिफारिश के, या प्रधानमंत्री या मंत्रिमंडल की सिफारिश के बिना खुद होकर यह तय किया था। इसकी खबर भी अगले दिन के प्रमुख अखबारों में छपी थी।  नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच के वैचारिक मतभेद जगजाहिर थे, लेकिन नेहरू की अंतरराष्ट्रीय कामयाबी का सम्मान करने के लिए राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति के सारे प्रोटोकॉल तोडक़र नेहरू के स्वागत के लिए एयरपोर्ट गए थे। लेकिन तमाम बातें अलग रहीं, इतिहास तो यही दर्ज करता है कि नेहरू या उनके मंत्रिमंडल ने उन्हें भारतरत्न देने की सिफारिश चाहे न की हो, नेहरू ने उसे नामंजूर तो नहीं किया था, जिसका कि उन्हें पूरा हक था। और ऐसी चुप्पी इतिहास में बड़ी बुरी नजीर के रूप में दर्ज होना तय था। आज जब मोदी के अपने गुजरात में मोदी की अपनी पार्टी की सरकार स्टेडियम का नाम मोदी के नाम पर कर चुकी है, तब भारतरत्न की मिसाल नेहरू विरोधियों के हाथ एक हथियार तो है ही। 

    उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने जिस तरह से अंबेडकर, कांशीराम के साथ अपनी प्रतिमाएं लगवाकर और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की चट्टानी प्रतिमाएं बनवाकर सरकार का शायद हजार करोड़ रूपए खर्च किया था वह मामला तो अदालत तक पहुंचा। लेकिन मायावती और उनकी पार्टी को उस पर कोई अफसोस नहीं हुआ। कुछ ऐसा ही काम दक्षिण भारत में जगह-जगह वहां के मुख्यमंत्रियों को लेकर होता है, और सरकारी खर्च पर उनका महिमामंडन किया जाता है। देश में ऐसी लंबी परंपराओं के चलते हुए आज नरेन्द्र मोदी को पहला पत्थर कौन मारे? कहने के लिए तो भाजपा के नेताओं के बीच भी इस बात को लेकर हैरानी है कि एक पूरे देश के नेता ने अपने आपको अपने जीते-जी एक स्टेडियम तक सीमित कर लिया। बात सही भी है कि जो लोग मोदी को पूरी 130 करोड़ आबादी का नेता मानकर चल रहे थे, उन्हें मोदी का अपने आपको एक करोड़ दस लाख आबादी के स्टेडियम तक सीमित कर लेना निराश कर रहा है। इस देश में नेताओं के गुजरने के बाद उनके सम्मान की भी लंबी परंपरा है। खुद मोदी ने इस परंपरा को अभूतपूर्व ऊंचाई तक पहुंचाया जब उन्होंने जिंदगी भर कांग्रेसी रहने वाले, और आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा को दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाकर रिकॉर्ड कायम किया। इसलिए लोगों के जाने के बाद भी उनके सम्मान की परंपरा रही है। 

    अब कुछ दूसरी मिसालों को देखें तो छत्तीसगढ़ में ही 2004-05 में भाजपा सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में उस वक्त सरकारी खर्च पर दस हजार ग्राम पंचायतों में अटल चौक बनवाए थे। उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी ताजा-ताजा भूतपूर्व प्रधानमंत्री हुए थे, और जीवित थे। छत्तीसगढ़ का इतिहास बताता है कि 2009 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से राज्य के करीब दस हजार गांवों में अटल चौक बनाने की घोषणा की गई थी, जबकि हकीकत यह थी कि अधिकतर जगहों पर अटल चौक बनाए जा चुके थे। कुल मिलाकर अटलजी के जीते-जी उनकी याद में गांव-गांव में अटल चौक सरकारी खर्च पर बनाए गए थे जो कि अब खंडहर भी हो चुके हैं। 

    नेहरू और गांधी परिवार के लोगों के नाम पर, इंदिरा और राजीव के नाम पर सडक़ों या सार्वजनिक जगहों और संस्थानों के नामकरण को लेकर इनके आलोचक हमेशा से तीखे सार्वजनिक हमले करते आए हैं। लेकिन नेहरू, इंदिरा, और राजीव के नाम पर उनके जीते-जी नामकरण एकबारगी तो याद नहीं पड़ते हैं। ऐसे में नरेन्द्र मोदी के नाम पर स्टेडियम का नामकरण, और ऐसे स्टेडियम का नामकरण जो कि एक वक्त सरदार पटेल स्टेडियम भी था, यह बात मोदी का सम्मान बढ़ाने वाली नहीं है, उन्हें लेकर एक ऐसा अप्रिय और अवांछित विवाद खड़ा करने वाली है जो दूर तक उनका पीछा करेगा। इस नामकरण से मोदी को विवाद से परे कुछ हासिल हुआ हो यह तो लगता नहीं है, और विवादों से मोदी का कोई नया नाता नहीं है। फिलहाल यह एक पहेली है कि 130 करोड़ आबादी के प्रधानमंत्री ने अपने आपको एक करोड़ दस लाख के स्टेडियम तक सीमित क्यों कर लिया? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

सेहत-फिटनेस

  • दालचीनी सेहत पर करती है ऐसा जादू, होते हैं ये 4 बड़े फायदे
    दालचीनी सेहत पर करती है ऐसा जादू, होते हैं ये 4 बड़े फायदे

    हर रसोई में पाई जाने वाली छोटी सी दालचीनी न जाने कितने गुणों से भरपूर होती है. इसका पौधा जितना छोटा है, इसके गुण उतने ही ज्यादा होते हैं. दालचीनी की सूखी पत्तियां तथा छाल मसाले  के रूप में खाने का स्वाद बढ़ाते हैं और लोगों को सेहमंद बनाएं रखते हैं. इसकी छाल थोड़ी मोटी, चिकनी तथा हल्के भूरे रंग की होती है. दालचीनी खून को साफ करता है, वजन घटाता है और साथ ही कई बीमारयों को कोसों दूर भगाता है. दिन भर की थकान से होने वाले सिर दर्द से लेकर माइग्रेन के दर्द तक सभी बीमारियों का इलाज इसके पास है. आइए जानते हैं दालचीनी के ऐसे ही कुछ फायदों के बारे में.

    पेट की समस्या करे दूर
    लोगों को अक्सर पेट से जुड़ी कई प्रकार की समस्याएं हो जाती हैं और पाचन तंत्र गड़बड़ाते ही शरीर में न जाने कितनी नई बीमारियां होने लगती हैं. इसके लिए एक चम्मच शहद के साथ थोड़ा सा दालचीनी पाउडर मिलाकर खाने से पेट दर्द और एसिडिटी में आराम मिलता है. साथ ही भोजन भी आसानी से पच जाता है.

    वजन कम करने में मददगार

    आज के समय में बढ़ता वजन लोगों की सबसे बड़ी समस्या है, लेकिन ये छोटी सी दालचीनी आपके बढ़ते वजन को कम करने में मदद कर सकती है. इसके लिए नाश्ते के आधे घंटे पहले एक गिलास पानी में एक चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर उबालें. फिर इसे कप में डालकर दो बड़े चम्मच शहद मिलाकर पिएं. इस प्रक्रिया को रात में सोने से पहले भी दोहराएं.

    दिल का रखे ख्याल
    दालचीनी आपके दिल का ख्याल रखने में भी आपकी मदद करता है. इसके लिए दालचीनी पाउडर और शहद का पेस्ट बनाकर रोटी के साथ खाएं. इससे धमनियों में कोलेस्‍ट्रॉल जमा नहीं होगा, जिससे हार्ट संबंधी बीमारियों की संभवना भी कम हो जाएगी. जिन लोगों को दिल से जुड़ी कोई बीमारी है, उनके लिए ये उपाय रामबाण है.

    त्वचा के लिए फायदेमंद
    अपनी सुगंध से सबको आकर्षित करने वाली दालचीनी त्‍वचा के लिए भी बेहद फायदेमंद है. त्वचा में न जाने कितनी तरह की समस्याएं हो जाती हैं, जैसे खाज, खुजली. इसके लिए दालचीनी पाउडर में शहद मिलाकर इसका लेप बनाकर लगाएं और सूखने पर अच्छे से धो लें. दालचीनी के पाउडर में थोड़ा सा नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाने से पिंपल्स भी दूर होते हैं.(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.) (news18.com)

मनोरंजन

  • गंगूबाई काठियावाड़ीः जिनके क़िस्से में हैं नेहरू भी, करीम लाला भी
    गंगूबाई काठियावाड़ीः जिनके क़िस्से में हैं नेहरू भी, करीम लाला भी

    अम्रुता दुर्वे

    संजय लीला भंसाली की चर्चित फ़िल्म गंगूबाई काठियावाड़ी एक बार फिर सुर्खियों में है. बुधवार 24 फ़रवरी को फ़िल्म का टीज़र जारी किया गया. बीबीसी हिन्दी ने कुछ समय पहले गंगूबाई के बारे में 18 जनवरी 2020 को एक लेख प्रकाशित किया था. एक बार फिर पढ़िए वो लेख और जानिए कौन थीं गंगूबाई जिनके किरदार में पर्दे पर नज़र आएँगी आलिया भट्ट.

    ये फ़िल्म उस गंगूबाई की ज़िंदगी से प्रेरित है, जो 1960 के दशक में मुंबई के कमाठीपुरा में 'वेश्यालय' चलाती थीं. फ़िल्म 'माफ़िया क्वीन्स ऑफ मुंबई' नाम की किताब पर आधारित है, जिसे एस. हुसैन ज़ैदी और जेन बोर्गेस ने लिखी है.

    गंगूबाई का असली नाम गंगा हरजीवनदास काठियावाड़ी था. उनका जन्म गुजरात के काठियावाड़ में हुआ था और वो वहीं पलीं-बढ़ीं.

    'माफ़िया क्वीन्स ऑफ मुंबई' के सह-लेखक एस. हुसैन ज़ैदी गंगूबाई के बारे में कई चीज़ें विस्तार से बताते हैं.

    वो कोठा चलाती थीं. उन्हें धोखा देकर इस धंधे में लाया गया था. वो काठियावाड़ के सम्पन्न परिवार से थीं. परिवार के लोग पढ़े-लिखे थे और वकालत से जुड़े थे. गंगा को रमणीकलाल नाम के एक अकाउंटेंट से प्यार हो गया. उनका परिवार इस रिश्ते के लिए राज़ी नहीं था तो वो मुंबई भाग आईं.

    लेकिन उस आदमी ने उन्हें धोखा दिया और कमाठीपुरा में बेच दिया. तब उन्हें अहसास हुआ कि अब वो अपने परिवार के पास वापस नहीं लौट सकतीं क्योंकि उनका परिवार उन्हें स्वीकार नहीं करेगा. इसलिए उन्होंने हालात को अपनाया और बतौर सेक्स वर्कर काम करने लगीं.

    वो गैंगस्टर नहीं थीं. वो अंडरवर्ल्ड का हिस्सा भी नहीं थीं लेकिन ऐसे धंधे में थीं, जिसे नीची नज़रों से देखा जाता था. जैसे-जैसे वक़्त गुज़रा, वो कमाठीपुरा रेड लाइट एरिया की प्रमुख बन गईं. इस तरह से वह पहले 'गंगा' से 'गंगू' बनीं और गंगू से 'मैडम' बन गईं.

    गंगूबाई ने कमाठीपुरा में हुए घरेलू चुनावों में हिस्सा लिया और जीत हासिल की. गंगू सेक्स वर्कर से गंगूबाई काठेवाली बन गईं. काठेवाली दरअसल कोठेवाली से जुड़ा है. कोठा का मतलब है वेश्यालय और कोठा की प्रमुख को कोठेवाली कहा जाता था. उनके नाम के साथ जुड़ा काठियावाड़ी यह भी दिखाता था कि उनका परिवार से कैसा जुड़ाव था.

    सेक्स वर्कर के लिए माँ जैसी

    1960 और 1970 के दशक में गंगूबाई का कमाठीपुरा में काफ़ी नाम रहा. वो अन्य सेक्स वर्कर्स के लिए मां की तरह थीं. उन्होंने कोठा चलाने वालीं 'मैडमों' का प्रभाव ख़त्म कर दिया.

    गंगूबाई सुनहरे किनारे वाली सफेद साड़ी, सुनहरे बटन वाला ब्लाउज़ और सुनहरा चश्मा भी पहनती थीं. वो कार से चला करती थीं.

    उन्हें सोने से बनी चीज़ें पहनने का बहुत शौक़ था. बचपन में उनका सपना अभिनेत्री बनने का था. बाद के सालों में भी फ़िल्मी दुनिया में उनकी दिलचस्पी बनी रही. उन्होंने ऐसी कई लड़कियों को घर वापस भेजने में मदद की, जिन्हें धोखा देकर वेश्यालयों में बेचा गया था.

    वो इस काम से जुड़ीं महिलाओं की सुरक्षा के लिए भी काफ़ी सजग थीं. उन्होंने उन महिलाओं के साथ हुए अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और उन लोगों के ख़िलाफ़ भी क़दम उठाए, जिन्होंने इन महिलाओं का शोषण किया.

    उनका यह नज़रिया था कि शहरों में सेक्स वर्कर्स के लिए जगह उपलब्ध कराई जानी चाहिए. मुंबई के आज़ाद मैदान में महिला सशक्तीकरण और महिला अधिकारों के लिए आयोजित रैली में उनका भाषण काफ़ी चर्चा में रहा था.

    गंगूबाई की मौत के बाद कई वेश्यालयों में उनकी तस्वीरें लगाई गईं और उनकी मूर्तियां भी बनाई गईं.

    WIKIPEDIA

    अब्दुल करीम ख़ान को अंडरवर्ल्ड में लोग करीम लाला के नाम से जानते थे.

    करीम लाला और गंगूबाई
    कमाठीपुरा में हुई एक घटना के बाद गंगूबाई का दबदबा और बढ़ गया. एक पठान ने वेश्यालय में गंगूबाई से बदसलूकी की. उसने उनके साथ ज़बर्दस्ती करने की कोशिश की, उन्हें चोट पहुंचाई और पैसे नहीं दिए. ये लगातार होता रहा.

    एक बार उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की स्थिति बन गई. तब उन्होंने उस पठान के बारे में जानकारी जुटाई. उन्हें पता चला कि पठान शौक़त ख़ान नाम के इस शख़्स का ताल्लुक करीम लाला के गैंग से था.

    अब्दुल करीम ख़ान को अंडरवर्ल्ड में लोग करीम लाला के नाम से जानते थे. गंगूबाई करीम लाला के पास गईं और उन्हें वो सब कुछ बताया जो उनके साथ हो रहा था. करीम लाला ने गंगूबाई को सुरक्षा देने का वादा किया.

    अगले दिन जब शौकत ख़ान वेश्यालय पहुंचा तो उसकी जमकर पिटाई हुई. करीम लाला ने गंगूबाई को अपनी बहन बना लिया और इसी के साथ गंगूबाई का दबदबा इस इलाक़े में काफ़ी बढ़ गया.

    नेहरू से मुलाक़ात
    1960 के दशक में कमाठीपुरा में सेंट एंथनी गर्ल्स हाई स्कूल शुरू हुआ. यह आवाज़ उठने लगी कि वेश्यालय को बंद किया जाना चाहिए क्योंकि वेश्याओं के आसपास होने का बुरा असर छोटी बच्चियों पर पड़ेगा.

    इस फ़ैसले से कमाठीपुरा में क़रीब एक सदी से काम कर रही महिलाओं पर बुरा असर पड़ने वाला था. गंगूबाई ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और इसे आगे ले जाने के लिए पूरी ताक़त लगा दी.

    अपने राजनीतिक परिचितों की मदद से उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने के लिए वक़्त मांगा. हालांकि यह मीटिंग आधिकारिक तौर पर कहीं दर्ज नहीं हुई लेकिन एस. हुसैन ज़ैदी ने अपनी किताब में इस क़िस्से का ज़िक्र किया है.

    ज़ैदी ने 'माफ़िया क्वीन्स ऑफ मुंबई' में लिखा, ''इस मुलाक़ात में गंगूबाई की सजगता और स्पष्ट विचारों से नेहरू भी हैरान रह गए. नेहरू ने उनसे सवाल किया था कि वो इस धंधे में क्यों आईं जबकि उन्हें अच्छी नौकरी या अच्छा पति मिल सकता था.''

    ऐसा कहा जाता है कि गंगूबाई ने उसी मुलाक़ात में तुरंत नेहरू के सामने प्रस्ताव रखा. उन्होंने नेहरू से कहा कि अगर वो उन्हें (गंगूबाई) को पत्नी के रूप में स्वीकार करने को तैयार हैं तो वह ये धंधा हमेशा के लिए छोड़ देंगी.

    इस बात से नेहरू दंग रह गए और उन्होंने गंगूबाई के बयान से असहमति जताई. तब गंगूबाई ने कहा, ''प्रधानमंत्री जी, नाराज़ मत होइए. मैं सिर्फ़ अपनी बात साबित करना चाहती थी. सलाह देना आसान है लेकिन उसे ख़ुद अपनाना मुश्किल है.'' नेहरू ने इसके ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा.

    मुलाक़ात ख़त्म होने पर नेहरू ने गंगूबाई से वादा किया कि वो उनकी मांगों पर ध्यान देंगे. प्रधानमंत्री ने जब ख़ुद इस पर हस्तक्षेप किया तो कमाठीपुरा से वेश्याओं को हटाने का काम कभी नहीं हो पाया.''

    गंगूबाई फ़िल्म पोस्टर
    TWITTER/ALIABHATT

    संजय लीला भंसाली अब गंगूबाई काठेवाली की ज़िंदगी पर फ़िल्म बना रहे हैं. आलिया भट्ट गंगूबाई के किरदार में नज़र आएंगी. फ़िल्म का फर्स्ट लुक लॉन्च कर दिया गया है.

    बीबीसी से बात करते हुए ए. हुसैन ज़ैदी ने कहा, ''भंसाली को कहानी बहुत अच्छी लगी. उन्हें लगा कि इस महिला की कहानी बड़े पर्दे पर दिखनी चाहिए. भंसाली के पास वो क़ाबिलियत है जो किसी किरदार को बड़े पर्दे पर तरह रख पाएं और उसे असलियत की तरह दिखा पाएं. लोगों ने गंगूबाई के बारे में मेरी किताब में पढ़ा होगा लेकिन अब वो इस महिला को बड़े पर्दे पर देख सकेंगे. हम सब आलिया भट्ट की अदाकारी से परिचित हैं. जिस तरह वो किरदार निभाती हैं, वो उसे जीती हैं. मुझे लगता है कि आलिया और भंसाली दोनों इस कहानी के साथ न्याय करेंगे.''

    संजय लीला भंसाली की यह फ़िल्म 11 सितंबर 2020 को रिलीज़ होगी. (bbc.com)
     

खेल

  • अश्विन ने टेस्ट में स्टोक्स को सबसे ज्यादा बार आउट करने का रिकॉर्ड बनाया
    अश्विन ने टेस्ट में स्टोक्स को सबसे ज्यादा बार आउट करने का रिकॉर्ड बनाया

    अहमदाबाद, 25 फरवरी | भारतीय स्टार आफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट हासिल कर लिए हैं और इस उपलब्धि तक पहुंचने के दौरान उन्होंने इंग्लैंड के आलराउंडर बेन स्टोक्स को सबसे ज्यादा बार आउट किया है। 34 वर्षीय अश्विन अपने अब तक के 77 टेस्ट मैचों के करियर में स्टोक्स को 11वीं बार टेस्ट में अपना शिकार बनाया है। इसके बाद उन्होंने आस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर को 10 बार आउट किया है।

    वहीं, भारतीय आफ स्पिनर इंग्लैंड के पूर्व कप्तान एलेस्टेयर कुक को नौ बार और आस्ट्रेलिया के एड कॉवेन और जेम्स एंडसरन को सात-सात बार अपना शिकार बना चुके हैं।

    अश्विन ने यहां मोटेरा के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में इंग्लैंड के साथ खेले जा रहे तीसरे टेस्ट मैच के दूसरे दिन गुरुवार को यह टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट लेने की उपलब्धि हासिल की। अश्विन ने इंग्लैंड के बल्लेबाज जोफरा आर्चर को पगबाधा आउट करके टेस्ट क्रिकेट में अपने 400 विकेट पूरे किए।

    अश्विन ने अपना पहला टेस्ट विकेट नवंबर 2011 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान पर वेस्टइंडीज के बल्लेबाज डैरन ब्रावो का लिया था। इसके बाद उन्होंने अपना 50 टेस्ट विकेट नवंबर 2012 में अहमदाबाद में निकॉ कॉम्पटन का, 100 विकेट नवंबर 2013 में मुंबई में डैरेन सैमी का, 150वां विकेट नवंबर 2015 में मोहाली में इमरान ताहिर का, 200वां विकेट सितंबर 2016 में कानपुर में केन विलियम्सन का, 250वां विकेट फरवरी 2017 में हैदराबाद में मुश्फिकुर रहीम का, 300वां विकेट नवंबर 2017 में नागपुर में लाहिरू गमगे का और 350वां विकेट अक्टूबर 2019 में विशाखापटटनम में थिएनुस डिब्रुइन का लिया था।

    अश्विन से पहले कपिल देव, अनिल कुंबले और हरभजन सिंह भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट ले चुके हैं। कुंबले के नाम 132 टेस्ट मैचों में 619 विकेट, कपिल देव के नाम 131 टेस्ट मैचों में 343 और हरभजन के नाम 103 टेस्ट मैचों में 417 विकेट है।

    अश्विन साथ ही विश्व क्रिकेट में दूसरा सबसे तेज 400 विकेट लेने की भी उपलब्धि हासिल कर ली है। उन्होंने 77 मैचों में 25.01 की औसत से 2.83 के इकॉनमी रेट से टेस्ट मैच में 400 विकेट लिए हैं।

    उनसे आगे श्रीलंका के पूर्व स्पिनर मुथैया मुरलीधरन ही हैं, जिनके नाम सबसे तेजी से 400 विकेट लेने का रिकॉर्ड है।

    मुरलीधरन ने गॉल 2002 में जिम्बाब्वे के खिलाफ 72 मैचों में यह कीर्तिमान स्थापित किया था।

    उनके बाद न्यूजीलैंड के रिचर्ड हैडली 80 टेस्ट मैचों में और दक्षिण अफ्रीका के डेल स्टेन ने 80 टेस्ट मैचों में 400 विकेट लिया था। (आईएएनएस)

कारोबार

  • मूडीज ने बढ़ाया भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान, अगले वित्त वर्ष में 13.7% रहेगी वृद्धि
    मूडीज ने बढ़ाया भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान, अगले वित्त वर्ष में 13.7% रहेगी वृद्धि

    नई दिल्ली: अमेरिकी रेटिंग एजेंसी मूडीज ने गुरुवार को अगले वित्त वर्ष के लिये भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान पहले के 10.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 13.7 प्रतिशत कर दिया. आर्थिक गतिविधियों के सामान्य होने और कोविड- 19 का टीका बाजार में आने के बाद बाजार में बढ़ते विश्वास को देखते हुये यह नया अनुमान लगाया गया है. अमेरिका की इस रेटिंग एजेंसी ने इसके साथ ही चालू वित्त वर्ष के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में आने वाली गिरावट के अनुमान को भी अपने पहले के 10.6 प्रतिशत में सुधार लाते हुये इसे 7 प्रतिशत कर दिया. यानी अब चालू वित्त वर्ष के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की गिरावट सात प्रतिशत रहने का अनुमान है.

    मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस के सहायक प्रबंध निदेशक (सावरेन जोखिम) जेने फेंग ने कहा, ‘‘हमारा वर्तमान अनुमान यह है कि मौजूदा मार्च 2021 को समाप्त होने वाले चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था में सात प्रतिशत की गिरावट रहेगी ... वहीं हम गतिविधियों के सामान्य होने और आधारभूत प्रभाव को देखते हुये अगले वित्त वर्ष में 13.7 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद कर रहे हैं.''

    वहीं, इक्रा की प्रधान अर्थशास्त्री आदिति नायर ने कहा कि वह चालू वित्त वर्ष की अक्टूबर से दिसंबर 2020 की तीसरी तिमाही में 0.3 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद करतीं हैं. वहीं, इक्रा का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष में सात प्रतिशत नीचे रहेगी जबकि अगले वित्त वर्ष में इसमें 10.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जाएगी. (khabar.ndtv.com)
     

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