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  • शुरू होगी तुर्की से लेकर पाकिस्तान तक की रेल
    शुरू होगी तुर्की से लेकर पाकिस्तान तक की रेल

    पिछले महीने तुर्क, ईरानी और पाकिस्तानी अधिकारियों में इस्तांबुल-तेहरान-इस्लामाबाद रेल नेटवर्क को दोबारा चालू करने पर सहमति बन गई है. 2009 में शुरू की गई इस परियोजना का ट्रायल रन हो चुका है.

       (dw.com)

    करीब 6,500 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन का 1,950 किलोमीटर हिस्सा तुर्की से 2,600 किलोमीटर ईरान से और 1,990 किलोमीटर पाकिस्तान से गुजरेगा. अधिकारियों का कहना है कि इस्तांबुल-तेहरान-इस्लामाबाद यानी आईटीआई रेल नेटवर्क को बहुत जल्द चालू कर दिया जाएगा. हालांकि यह चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा नहीं है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आखिरकार यह उस में शामिल हो जाएगा.

    अटलांटिक काउंसिल के साउथ एशिया सेंटर में ईरानी विशेषज्ञ फातेमेह अमान का कहना है कि अगर चीन और ईरान के बीच 400 अरब डॉलर की परियोजना पर डील हो जाती है तो चीन को आईटीआई जैसी परियोजनाओं की बहुत जरूरत होगी. इसके जरिए इलाके में कनेक्टिविटी का इस्तेमाल चीन को करना चाहेगा. अमान यह भी कहती हैं, "अगर चीन एशिया में अमेरिकी की भूमिका हथियाने में सफल हो जाता है तो उसे क्षेत्रीय देशों के बीच ज्यादा सहयोग की जरूरत होगी."

    आसान सफर और बेहतर संपर्क

    जानकारों का कहना है कि आईटीआई इन तीनों देशों के बीच संपर्क बढ़ाएगा और सफर को आसान करेगा. इस्तांबुल से इस्लामाबाद तक की यात्रा में समंदर के रास्ते से 21 दिन लगते हैं जो ट्रेन से महज 11 दिन में पूरी हो जाएगी. वारसॉ के वॉर स्टडी एकेडमी में वेस्ट एशिया एनेलिस्ट लुकास प्रिबिस्चेव्सकी का कहना है, "आईटीआई लंबी दूरी की बस सेवा की तुलना में सफर को आसान और सुरक्षित बनाएगा. यह तीर्थयात्रियों के लिए सफर को सस्ता और हवाई यात्रा की तुलना में ज्यादा मजेदार बना देगा."

    अमान मानती हैं कि यह प्रोजेक्ट अगर काम करने लगा तो इसके कारण "तुर्की, ईरान और पाकिस्तान के बीच संपर्क नाटकीय रूप से बढ़ जाएगा. यह माल की ढुलाई, कंटेनरों की ढुलाई बढ़ाएगा और यात्रा का समय और खर्च घटेगा."

    सुरक्षा का जोखिम

    हालांकि इस यात्रा की सुरक्षा को लेकर कुछ सवाल उठ रहे हैं. इस्लामाबाद में विश्लेषक टॉम हुसैन इस परियोजना को लेकर सावाधान करते हैं, "बहुत सी अंतरराष्ट्रीय मालवाहक ट्रेन और गैस पाइपलाइन की परियोजनाएं राजनीतिक अस्थिरता के कारण इलाके में दशकों से धूल फांक रही हैं. इस वक्त भी आईटीआई का भविष्य दो अहम बातों पर निर्भर करेगाः ईरान से अमेरिकी प्रतिबंधों का हटना और अफगान युद्ध का ख्तम होना. इसके साथ ही रेल पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को आर्थिक रूप से मुफीद बनाने के लिए भारी निवेश की जरूरत होगी."

    साथ ही सुरक्षा को लेकर भी जोखिम हो सकता है क्योंकि आईटीआई ऐसे इलाकों से गुजरेगी जो इस्लामी चरमपंथियों के चंगुल में है. इस्लामिक स्टेट का चरमपंथी गुट खासतौर से पाकिस्तान के पश्चिमी बलूचिस्तान प्रांत और ईरान में सक्रिय है. इसके साथ ही बलूचिस्तान के अलगाववादी भी नियमित रूप से प्रांत में सुरक्षाबलों को निशाना बनाते रहते हैं. यह प्रांत चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के लिहाज से बेहद अहम है.

    प्रिबिस्चेव्सकी का कहना है, "सुरक्षा का जोखिम तो बहुत बड़ा है. आईटीआई चरमपंथियों का आसानी से निशाना बन सकता है." हालांकि इसके साथ ही उनका यह भी कहना है कि अधिकारी कुछ कदम उठा कर खतरे को कम कर सकते हैं.

    अमान कहती हैं कि ईरान और पाकिस्तान के बलूचिस्तान इलाके में सीमा पार से होने वाले हमलों की जद में भी रेल सेवा आ सकती है, "हालांकि हमने देखा है कि आपसी आर्थिक हित सुरक्षा की स्थिति को बेहतर बनाने में भूमिका निभाते हैं." उनका कहना है कि इन देशों की सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्थानीय लोग इन परियोजनाओं से जुड़ें. अमान के मुताबिक, "इसके लिए राजनीतिक सुधारों और सुरक्षा की धारणा को बदलने की जरूरत होगी."

    पैसे कहां से आएगा

    भारी आर्थिक संकट देख रहा पाकिस्तान इस खर्चीली परियोजना के लिए पैसे कहां से लाएगा? देश की स्थानीय रेलसेवा बुरे हाल में है और बलूचिस्तान में रेल लाइनों को बेहतर बनाना एक बड़ी चुनौती होगी. प्रिबिस्चेव्स्की कहते हैं, "ईरान, पाकिस्तान और तुर्की के लिए यह सबसे किफायती परियोजना नहीं है लेकिन फिर भी यह जरूरी है. आने वाले सालों में हम इसके आर्थिक फायदे देखेंगे."

    हुसैन का मानना है कि इस परियोजना को भारी पैमाने पर विदेशी और निजी निवेश की जरूरत होगी. यहीं पर चीन के बेल्ट एंड रोड एनिशिटिव को भूमिका निभानी होगी. यह आईटीआई में उसे प्रमुख भूमिका दे सकता है जैसा कि यह यूरेशियाई संपर्क में दे रहा है. हालांकि मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि चीन इस परियोजना को सिर्फ राजनीतिक समर्थन ही देना चाहता है. चीन चाहता है कि इस परियोजना का खर्च पाकिस्तान और तुर्की उठाएं.

राष्ट्रीय

  • तमाम मुद्दों पर क्या है 'देश का मूड'
    तमाम मुद्दों पर क्या है 'देश का मूड'

    साल 2021 का पहला सर्वे आ गया है. ABP न्यूज के लिए C VOTER ने देश का मूड जाना है. इस सर्वे में देश की सभी 543 लोकसभा सीटों के लोगों ने हिस्सा लिया है. सर्वे में 30 हजार से ज्यादा लोग शामिल हैं. सर्वे के सवालों का जवाब पिछले 12 हफ्तों में लिए गए हैं. इस सर्वे में लोगों से पूछा गया कि केंद्र के कामकाज से राज्य में लोग कितने खुश ? इसके जवाब में 66 फीसदी लोगों ने कहा कि वह केंद्र सरकार के कामकाज से खुश हैं. वहीं 30 फीसदी लोग नाखुश हैं. जबकि चार फीसदी लोगों ने कहा है कि वह कुछ कह नहीं सकते.

    देश के 31 मुख्यमंत्रियों में से सबसे अच्छे और सबसे खराब प्रदर्शन वाले मुख्यमंत्री कौन हैं? इस सवाल को लेकर आपके चैनल एबीपी न्यूज़ ने देश का मूड जानने की कोशिश की है. सर्वे में सबसे अच्छे 3 मुख्यमंत्रियों में बीजेपी का मुख्यमंत्री शामिल नहीं है. सर्वे के मुताबिक, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक देश के सबसे पॉपुलर मुख्यमंत्री हैं. इस कड़ी में दूसरा नाम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का है और तीसरा नाम आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी का है. वहीं, दूसरी ओर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर और पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह को अपने-अपने राज्यों में कम लोगों ने पसंद किया है. यानी इन तीनों की लोकप्रियता कम है. सर्वेक्षण में शामिल 11 राज्य के मुख्यमंत्रियों की लोकप्रियता का औसत कुल मुख्यमंत्रियों का 42.8 फीसदी है.

    एनडीए शासित राज्यों में लोग कितने खुश हैं ? इस सवाल के जवाब में अलग-अलग राज्यों में लोगों ने अलग अलग जवाब दिए. असम में 43 फीसदी लोग मुख्यमंत्री से खुश दिखी तो वहीं 54 % प्रधानमंत्री से, बिहार में 37 फीसदी CM से तो वहीं 54 फीसदी प्रधानमंत्री से, गोवा में 49 फीसदी CM से और 80 फीसदी प्रधानमंत्री से, गुजरात में 47 फीसदी सीएम से और 62 फीसदी प्रधानमंत्री से, हरियाणा में आठ तो वहीं प्रधानमंत्री 24 फीसदी लोग खुश हैं. इसके अलावा हिमाचल में 36 फीसदी सीएम से और 70 फीसदी प्रधानमंत्री से, कर्नाटक में 40 फीसदी CM से तो वहीं 46 फीसदी, एमपी में 51 फीसदी CM से तो वहीं 68 फीसदी प्रधानमंत्री से और यूपी में 35 फीसदी CM से तो वहीं 23 फीसदी प्रधानमंत्री के कामकाज से खुश हैं.

    अगर आज लोकसभा चुनाव हुए तो किसके जीतने की संभावना है. इसके जवाब में लोगों ने 58 फीसदी NDA को समर्थन दिया जबकि 28 फीसदी UPA के साथ दिखे.

    गृहमंत्री अमित शाह के काम से कितने फीसदी लोग देश में संतुष्ट हैं. इसके जवाब में 58 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह संतुष्ट हैं. वहीं 28 फीसदी लोगों ने कहा कि वह असंतुष्ट हैं. जबकि 14 फीसदी लोगों ने कहा कि वे कुछ कह नहीं सकते हैं.

    राहुल-प्रियंका में किसे कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहिए ? इस सवाल के जवाब में सर्वे में 32 फीसदी लोगों ने राहुल गांधी का नाम लिया तो वहीं 35 फीसदी ने प्रियंका गांधी का नाम लिया. जबकि 33 फीसदी लोगों ने कहा कि वे दोनों को बतौर कांग्रेस अध्यक्ष नहीं देखना चाहते हैं.

    राहुल गांधी से आप कितने संतुष्ट हैं, इसके जवाब में 39 फीसदी लोगों ने कहा कि वे खुश हैं. वहीं 44 फीसदी नाखुश रहे, जबकि कह नहीं सकते 17 फीसदी लोगों ने कहा.

    PM पद के लिए कौन बेहतर ? इस सवाल के जवाब में पीएम मोदी का नाम 60 फीसदी लोगों ने लिया जबकि राहुल गांधी को 26 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे पीएम पद के बेहतर उम्मीदवार हैं. वहीं सात फीसदी लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने कहा है कि वे दोनों को पीएम पद का बेहतर उम्मीदवार नहीं मानते हैं. सात फीसदी ने कहा कि वह कह नहीं सकते हैं.

    पीएम के काम से कितने संतुष्ट हैं ? इसके जवाब में 71 फीसदी लोग खुश दिखे, 26 फीसदी नाखुश दिखे जबकि 03 फीसदी ने कहा कि कह नहीं सकते हैं.

    PM पद की पसंद कौन है ? इसके जवाब में पीएम मोदी- 55%, राहुल- 11%, ममता- 1%, केजरीवाल- 5%, मायावती- 1%, प्रियंका- 1%, अन्य- 12%, कह नहीं सकते- 14% लोगों ने कहा.

    केंद्र सरकार के कामकाज से लॉकडाउन के दौरान कितने लोग खुश हैं ? इसके जवाब में लोगों ने कहा कि लॉकडाउन 1- 78%, लॉकडाउन 2- 82%, लॉकडाउन 3- 82% और लॉकडाउन 4- 82% लोग केंद्र के काम से खुश हैं.

    क्या कोरोना को बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया. इसके जवाब में 53 फीसदी लोगों ने कहा हां जबकि 34 फीसदी लोगों ने कहा कि नहीं ऐसा नहीं है.

    देश की सियासत पर सबसे बड़ा सर्वे में लोगों से जब पूछा गया कि वैक्सीन पर सरकार का कामकाज कैसा है? 

    क्या किसान आंदोलन से सरकार को नुकसान होगा? इस सवाल के जवाब में 52 फीसदी लोगों ने माना कि किसान आंदोलन से सरकार को नुकसान होगा. जबकि 34 फीसदी ऐसा नहीं मानते और 14 फीसदी ने कहा पता नहीं.

    देश की सियासत पर सबसे बड़े सर्वे में लोगों से पूछा गया कि किसान आंदोलन से सरकार को नुकसान होगा? (abplive.com)

राजनीति

  • पटना में 'अटल पथ' का नीतीश ने किया लोकर्पण, नाम की तरह पथ भी 'अटल' होगा
    पटना में 'अटल पथ' का नीतीश ने किया लोकर्पण, नाम की तरह पथ भी 'अटल' होगा

    पटना, 15 जनवरी | बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश ने कुमार शुक्रवार को नए साल के मौके पर पटनावासियों को आर ब्लॉक-दीघा पथ (अटल पथ ) की सौगात दी। इस पथ का निर्माण 397.57 करोड़ रुपये की लागत से किया गया है। अटल पथ परियोजना की परिकल्पना वर्ष 2009-10 में की गई थी। पटना-दीघा रेलवे लाइन की भूमि राज्य सरकार को हस्तांतरित करने के बाद सड़क का निर्माण कराया गया।

    मुख्यमंत्री ने उद्धाटन के मौके पर कहा कि इस पथ का नमााकरण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर अटल पथ रखा गया है। यह पथ भी अटल होगा।

    उन्होंने कहा कि रास्ते के आसपास के इलाके के लोगों को इधर से उधर जाने में असुविधा न हो इसके लिए रोड ओवरब्रिज का निर्माण कराया जा रहा है।

    उद्घाटन समाारोह के पश्चात पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि, "आर ब्लॉक से दीघा तक हमलोगों की पथ निर्माण की इच्छा पहले से थी। इसके लिए रेलवे से जमीन प्राप्त करने की मंजूरी ली गई, उसके बाद सड़क निर्माण का कार्य प्रारंभ किया गया। इस पथ के एक हिस्से का कार्य पूरा हो गया।"

    उन्होंने कहा, "इस पथ को गंगा पथ से और जेपी सेतु से जोड़ने का काम चल रहा है, वह भी कुछ ही महीनों के अंदर पूर्ण हो जाएगा। अटल पथ के निर्माण से लोगों को काफी सुविधा होगी। पटना से उत्तर बिहार के साथ -साथ अन्य जगहों से आने जाने में सहूलियत होगी।"(आईएएनएस)

     

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : Biden’s transformational challenge
    Editor's Choice : Biden’s transformational challenge

    Though the US is no longer addicted to coal, it is completely sold on the idea of cheap energy, writes Sunita Narain

    -Sunita Narain

    It’s time to exhale. Donald Trump is now a former US president. President-elect Joe Biden and his vice president-elect, Kamala Harris, have stated they will rejoin the Paris Agreement on climate change.

    So denial of this existential threat to the Planet is now past. And we can move decisively on actions. Or, so we hope.

    This is where we need a dose of realism. I am not undermining the Biden-Harris triumph, but reminding us of the troubled paths ahead. The world is hurtling down to a climate change-led catastrophe. We cannot afford coy and small answers.

    This is where introspection of the Biden-Harris victory must start. The fact is they won, but Trumpism did not lose. What is shocking to most of us, watching from the outside, is that close to half of America voted for him.

    He got more votes in 2020 than in 2016, notwithstanding his failure in managing the uncontrolled pandemic, his rejection of climate change and his exacerbation of race and gender conflicts. We need to remember this.

    The United States is a divided nation and the deep rift has its foundations on what nearly half of the American people want. You can say Biden-Harris won because they said they would control the virus; they would listen to scientific advice on the need to wear masks; and, impose lockdowns when necessary.

    But it is also a fact that people voted for Trump because they did not want any of these. They believe the economy is more important than the virus. You can argue that the virus does not discriminate, but it hits poor people more. But they are not listening.

    Let’s also be clear that, more than ever before, this US election had climate change denial or action on the ballot. It was an issue that was on the table — Trump made sure of that. He was belligerent about his opposition to this “fake” science.

    He swore by coal and, more importantly, he pushed his country to manufacture more: made in the USA was his slogan. Pushing against climate change — in spite of the terrible fires and hurricane damages — was his way of putting the economy above everything else. His people saw this.

    We need to take off our rose-tinted glasses that shows ‘all is well’. The US has always been a renegade nation as far as climate action is concerned — the abysmally insignificant targets it has set for itself under the Paris Agreement are a testimony to this.

    It is of course another matter that Biden-Harris will, at least, do something and not work against action. But this is only because Trumpism took us down to depths that we never imagined before.

    It is also a fact that Trump is right (and completely wrong) on one thing. He says his country’s energy emissions were lowest during his term; this is right. The US energy sector’s emissions declined by a massive 30 per cent in the past decade.

    The shift was primarily because market factors moved the power sector away from coal to shale and natural gas. In the last year alone, coal-fired power generation fell by 18 per cent, according to data from private research firm, Rhodium Group. This is where the good news ends.

    The fact is that cheap shale gas took off where coal left — and it left behind the renewable energy surge as the cost of gas has fallen to a record low.

    It is no wonder then that Biden has strayed off the New Green Deal agenda of his deputy to argue that he will not stop fracking of gas on private lands, where the bulk of the gas is found.


    The bigger problem is that other sectors of the US economy are now reversing gains made from the transition from polluting coal. The transportation sector has overtaken energy emissions and industrial sector emissions have grown.

    The bottom line is that even though US emissions fell by some 2 per cent in 2019 and there was a cumulative decline of 12.3 per cent on its 2005 baseline, the country is still way off the mark to meet its targets.

    By the Copenhagen Accord target it signed, the US agreed to be 17 per cent below 2005 levels by the end of 2020; and as per the Paris Agreement, 26-28 per cent below 2005 levels by 2025. In fact, net US greenhouse gas emissions in 2019 were higher than at the end of 2016 — the beginning of the Trump presidency.

    What should concern us is that further decline will be hard. This is not only because of the increase in Trump’s vote share; it is because there are no easy answers for rapid and transformational emission cuts in the country.

    Though the US is no longer addicted to coal; it is completely sold on the idea of cheap energy. It also wants to reclaim its role as the economic powerhouse — take back its position from China.

    This will mean burning more fuel for industrial growth and using more energy that will negate all the gains of cleaner fuels. This, when we need transformational answers. So, let’s not kid ourselves that all will be well now that Biden-Harris are in power. We need to push more and force them to run, and not walk, the talk. (downtoearth.org.in)

संपादकीय

  • दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : वैक्सीन के लिए आधार  कार्ड की अनिवार्यता न हो
    दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : वैक्सीन के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता न हो

     

    कुछ वक्त पहले की हरियाणा की खबर है कि वहां पर एक निजी अस्पताल में एक महिला मरीज को ले जाया गया, लेकिन उसका आधार कार्ड न होने से इलाज नहीं हुआ, और उसकी मौत हो गई। यह बात खबर इसलिए भी बनी कि यह महिला कारगिल युद्ध के एक शहीद की पत्नी थी, और उसके बेटे ने मीडिया के सामने यह पूरा मामला उजागर किया। अस्पताल का कहना है कि आधार कार्ड औपचारिकताओं के लिए जरूरी है, और उसके बिना वे दाखिले के कागज पूरे नहीं कर सकते थे। लोगों को याद होगा कि अभी दो-तीन महीने के भीतर ही झारखंड में एक महिला की मौत हो गई थी क्योंकि आधार कार्ड न होने से उसके परिवार को राशन मिलना बंद हो गया था। भुखमरी से मौत हिन्दुस्तान में अब आम बात नहीं रह गई है, लेकिन झारखंड के इस हादसे से केन्द्र और राज्य सरकार को जो झटका लगना था, वह नहीं लगा, और बाकी देश के लिए भी, बाकी कामों के लिए भी सरकारों ने सबक नहीं लिया। देश के मुख्य सूचना आयुक्त ने यह फैसला दिया था कि आरटीआई अर्जी देने वाले के पास आधार कार्ड न होने से उसे सूचना देने से मना करना कानून के खिलाफ है, और सूचना पाने के लिए आधार कार्ड की कोई जरूरत नहीं है।

    इस मुद्दे पर आज लिखने की जरूरत इसलिए है कि हिन्दुस्तान में जान बचाने के लिए जिस कोरोना वैक्सीन को लगाने का काम कल से शुरू हो रहा है, उसके लिए न सिर्फ आधार कार्ड जरूरी है, बल्कि मोबाइल फोन का भी आधार कार्ड से जुड़े रहना जरूरी है सभी रजिस्टर्ड लोगों को वैक्सीन लगाने की जानकारी उस नंबर पर आएगी। इस तरह आज अगर आधार कार्ड नहीं है, मोबाइल फोन नहीं है, दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं, तो अब तक की सरकारी घोषणा के मुताबिक ऐसे लोगों के लिए वैक्सीन भी नहीं है! अब सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई जारी ही है, और जब तक अदालत का फैसला नहीं आता तब तक तो यह संभावना या आशंका बनी ही रहेगी कि आधार कार्ड की अनिवार्यता खारिज भी हो सकती है, लेकिन आज कोरोना के टीके के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया है।

     

    हमारे सरीखे अनगिनत हिन्दुस्तानी आज ऐसे हैं जिन्हें दिन में कई बार टेलीफोन पर यह घोषणा सुननी पड़ती है कि 31 मार्च के पहले अपने सिमकार्ड को आधार कार्ड से जुड़वा लें। इसी तरह की घोषणा बैंक खातों को आधार से लिंक करवाने के लिए एसएमएस पर आती रहती है। अभी सुप्रीम कोर्ट में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर एक मामले की सुनवाई जारी ही है, और वहां केन्द्र सरकार आधार कार्ड को हर बात के लिए जरूरी करने पर आमादा है, दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट लोगों के ऐसे शक को भी ध्यान से सुन रहा है जो यह मानते हैं कि हर बात के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य करने से लोगों की निजी जिंदगी की गोपनीयता खत्म ही हो जाएगी। इस सिलसिले में यह याद रखने की जरूरत है कि यूपीए सरकार के वक्त जब आधार कार्ड पर काम शुरू हुआ तो भाजपा ने ही उसका सबसे अधिक विरोध किया था, और मोदी सरकार बनने के बाद आधार कार्ड योजना के मुखिया नंदन निलेकेणि से एक मुलाकात के बाद ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोच बदल गई थी, और उन्होंने आधार कार्ड को बढ़ावा देने के लिए पूरी ताकत लगा दी।

    हमारा मानना है कि आज सरकार और कारोबार, इन दोनों ही जगहों में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर जितने तरह की गलतफहमी फैली हुई है, उसे देखते हुए केन्द्र सरकार को ही यह खुलासा करना होगा कि किसी भी बुनियादी जरूरत के लिए, किसी भी इलाज के लिए, किसी भी सफर के लिए आधार कार्ड को मुद्दा नहीं बनाया जाएगा, और लोगों के इलाज के हक, जिंदा रहने के हक, खाने के हक के ऊपर आधार कार्ड बिल्कुल भी लागू नहीं होगा। अगर केन्द्र सरकार, और राज्य सरकारें ऐसा खुलासा नहीं करती हैं, तो इससे सबसे गरीब और सबसे बेबस जनता का सबसे बड़ा नुकसान होगा। आज तो कारगिल के एक शहीद की पत्नी की बेइलाज मौत की वजह से हम इस पर लिख रहे हैं, लेकिन पिछले महीनों में जगह-जगह से ऐसी खबरें सामने आई हैं कि कुष्ठ रोगियों की गली हुई उंगलियों की वजह से उनके निशान नहीं लिए जा सकते, उनके आधार कार्ड नहीं बन पा रहे हैं, और जगह-जगह उनको बिना राशन रहना पड़ रहा है। हमारा बड़ा साफ मानना है कि चाहे सौ लोग बिना आधार कार्ड कोई रियायत पा जाएं, लेकिन आधार कार्ड की कमी से किसी एक जरूरतमंद को भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए। आधार कार्ड को लेकर दो बिल्कुल अलग-अलग पहलू हैं, एक तो जिंदगी की निजता और गोपनीयता की बात है, और दूसरी बात लोगों के न्यूनतम बुनियादी हक और जरूरत की है। अगर सरकारों को आधार की अनिवार्यता की ऐसी हड़बड़ी है, तो सुप्रीम कोर्ट को एक कड़ा रूख दिखाते हुए पूरे देश में एकदम बुनियादी बातों के लिए आधार को एकदम ही गैरअनिवार्य घोषित करना चाहिए। इस काम में कोई भी देरी सबसे कमजोर तबके के लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने से कम और कुछ नहीं होगा।

    आधार कार्ड के खिलाफ जो सबसे बड़ा तर्क है वह यह कि रेलवे रिजर्वेशन से लेकर सरकारी काम तक, राशन से लेकर इलाज तक, जन्म से लेकर मौत तक सरकार जिस तरह इसे अनिवार्य कर रही है, उससे सरकार के हाथ में लोगों की निजी जिंदगी की हर जानकारी रहेगी। और आज फेसबुक और वॉट्सऐप पर निजता खत्म करने को लेकर जितने किस्म के लतीफे चल रहे हैं, उनसे कहीं अधिक हकीकत के खतरे हिन्दुस्तानी आबादी पर टंगे रहेंगे, अगर वे कोरोना से बच जाएंगे तो।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

सेहत-फिटनेस

  • मौसम विभाग शराब न पीने की चेतावनी क्यों दे रहा है?
    मौसम विभाग शराब न पीने की चेतावनी क्यों दे रहा है?

    -अनंत प्रकाश

    भारतीय मौसम विभाग ने दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई इलाक़ों में बुधवार से लेकर अगले कुछ दिनों तक शीत लहर चलने और तापमान काफ़ी कम रहने की सूचना दी है.

    इन इलाक़ों में दिल्ली एनसीआर, हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ शामिल हैं जहां बीते कुछ दिनों से तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस के आसपास दर्ज किया जा रहा है.

    मौसम विभाग ने सुबह के समय खुली जगहों पर न जाने की सलाह दी है.

    इसके साथ ही स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ऐसा करने पर हाइपोथर्मिया और फ्रॉस्टबाइट जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं.

    हाइपोथर्मिया होने पर आपका शरीर एक असामान्य रूप से कम तापमान पर पहुंचने के बाद काम करना बंद कर देता है. वहीं, फ्रॉस्टबाइट यानी ठंड से शरीर के कुछ हिस्से जैसे कि पैर की उंगलियां, हाथों की उंगलियां, चेहरा और पलकें आदि सुन्न हो सकती हैं.

    मौसम विभाग की ख़ास चेतावनी
    मौसम विभाग ने अपनी निर्देशिका में शराब नहीं पीने की सलाह भी दी है. क्योंकि मौसम विभाग के मुताबिक़, शराब पीने से शरीर का तापमान गिरता है.

    बीबीसी ने इस बारे में भारतीय मौसम विभाग के क्षेत्रीय पूर्वानुमान केंद्र के प्रमुख कुलदीप श्रीवास्तव से बात करके ऐसी चेतावनी जारी करने की वजह पूछी.

    ये भी पढ़ें: किसान आंदोलनः कड़ाके की ठंड में खुले आसमान तले फ़रियाद - ग्राउंड रिपोर्ट

    श्रीवास्तव बताते हैं, “दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में अभी शीत लहर की समस्या चल रही है. ऐसे में तापमान चार डिग्री या उससे कम दर्ज किया जा रहा है. इस स्थिति में आपको सुबह के समय घर से बाहर निकलने से बचना चाहिए. वहीं, अगर सफ़र कर रहे हैं तो सुबह के समय धुंध की वजह से विज़िबिलिटी भी कम रहती है. ऐसे में फॉग लाइट का इस्तेमाल करें और गाड़ियां धीमे चलाएं. और इस दौरान शराब न पिएं क्योंकि वो शरीर का तापमान और गिराता है.”

    शराब न पीने की चेतावनी क्यों?
    मौसम विभाग इससे पहले 25 तारीख़ को जारी अपनी निर्देशिका में भी शराब न पीने की हिदायत दे चुका है.

    ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर मौसम विभाग ऐसी चेतावनी क्यों दे रहा है.

    बीबीसी ने जब ये सवाल पूछा तो कुलदीप श्रीवास्तव ने बताया, “इस पहलू पर मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों ने शोध किया है. और उसके आधार पर ही आईएमडी ये चेतावनी जारी कर रहा है.”

    दुनिया में कई मुल्क ऐसे हैं जहां तापमान बेहद कम मतलब दस डिग्री से लेकर माइनस बीस से तीस डिग्री के बीच रहता है लेकिन वहां शराब का उपभोग कहीं ज़्यादा रहता है. इनमें रूस, बेलारूस और लिथुआनिया जैसे देश आते हैं जहां तामपान बेहद कम रहता है. ये देश दुनिया में शराब उपभोग के मामले में सबसे ऊपर हैं.

    इसके साथ ही एक आम धारणा ये है कि शराब पीने से शरीर में गर्माहट आती है.

    ऐसे में सवाल उठता है कि आईएमडी की इस चेतावनी में कितना दम है कि सर्दियों में शराब पीने से बचना चाहिए.

    बीबीसी ने इस मामले की तह में जाने के लिए मेडिकल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों से बात की ताकि ये समझा जा सके कि सर्दियों में शराब पीने पर आपके शरीर में क्या होता है.

    क्या कहता है विज्ञान?
    इंसानी शरीर का मूल तापमान 37 डिग्री सेल्सियस होता है. लेकिन जब आपके आसपास का तापमान घटने लगता है तो शरीर ऊर्जा का इस्तेमाल अपने मूल तापमान को बनाए रखने के लिए करता है.

    लेकिन जब शरीर का तापमान तय सीमा से नीचे गिरने लगता है तो आप हाइपोथर्मिया के शिकार होते हैं.

    मौसम विभाग की चेतावनी के मुताबिक़, दिल्ली एनसीआर, पंजाब, हरियाणा में इस वक़्त जो तापमान है, उसमें ज़्यादा देर तक रहने पर हाइपोथर्मिया के शिकार हो सकते हैं.

    सरल शब्दों में कहें तो जब शरीर का कोर टेंपरेचर एक सीमा से ज़्यादा गिरने लगता है तो आप हाइपोथर्मिया के शिकार होने लगते हैं.

    अब बात करते हैं कि कम तापमान वाली जगह पर शराब पीने का शरीर पर क्या असर पड़ता है.

    दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल की सीएमओ डॉ ऋतु सक्सेना शराब और सर्दी के कनेक्शन को कुछ इस तरह समझाती हैं.

    वो कहती हैं, “जब आप शराब पीते हैं तो शराब के आपके शरीर में जाने के बाद वेजो डायलेशन होता है. इसकी वजह से आपके हाथ, पैरों की रक्त वाहिकाओं का विस्तार होता है, उनमें पहले से ज़्यादा खून का प्रवाह होने लगता है. इसकी वजह से आपको गर्माहट का अहसास होता है. इसीलिए लोगों को लगता है कि पश्चिमी देशों में लोग शराब इसलिए ज़्यादा पीते हैं, क्योंकि वहां ठंड ज़्यादा पड़ती है."

    "लेकिन असल में शराब की वजह से हाथ पैरों में खून की मात्रा बढ़ती है तो ऐसा लगता है कि गर्मी लग रही है. इस अहसास के आधार पर ही लोग सर्दियों के कपड़े जैसे मफ़लर, जैकेट, हैट, स्वेटर आदि उतार देते हैं. लेकिन जब वे ऐसा कर रहे होते हैं तभी उनकी बॉडी का कोर टेंपरेचर गिर रहा होता है. और हमें उस बारे में जानकारी नहीं मिलती है जो कि हमारे शरीर के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकता है.”

    लेकिन अगर शराब से गर्मी पैदा नहीं होती है तो गर्माहट लगती क्यों है.

    मैक्स हेल्थकेयर में इंटरनल मेडिसिन विभाग में सह निदेशक, डॉ. रोमेल टिक्कू इस गुत्थी को सुलझाते हुए कहते हैं, “अक्सर आपने देखा होगा कि जो लोग ज़्यादा शराब पीते हैं, उनका चेहरा लाल-लाल सा रहता है. क्योंकि शराब की वजह से उनके बाहरी अंगों जैसे कि चेहरे, हाथ, पैर की रक्त धमनियों में ख़ून का प्रवाह बढ़ जाता है. इससे गर्मी लगती है क्योंकि ख़ून शरीर के आंतरिक हिस्सों से बाहर की ओर जाता है जिससे कोर बॉडी टेंपरेचर कम हो रहा होता है."

    "इसलिए, ठंड के मौसम में जब आप शराब पीते हैं, और ज़्यादा पीते हैं तो आपके शरीर का कोर बॉडी टेंपरेचर कम होता जाता है. खून का प्रवाह बढ़ने से आपके शरीर में पसीना आता है जिससे शरीर का तापमान और कम होता जाता है. ऐसे में ठंड के मौसम में अगर आप शराब पीते हैं तो आपको दिक्कत हो सकती है.”

    जानलेवा हो सकती है शराब?
    डॉ. ऋतु सक्सेना की मानें तो सर्दियों के मौसम में शराब पीने और ज़्यादा शराब पीने से आपकी जान भी जा सकती है.

    वो कहती हैं, “अगर सर्दियों में आपने बहुत ज़्यादा शराब पी ली तो सबसे पहली बात ये होगी कि आप ठीक से कपड़े नहीं पहनेंगे. शराब की वजह से आपके दिमाग़ पर जो असर होगा, उससे ये होगा कि आपको पता नहीं चलेगा कि आप किस हालत में हैं. और इसी स्थिति में जब आपके शरीर का कोर टेंपरेचर 37 डिग्री सेल्सियस से नीचे जाता रहेगा तो धीरे-धीरे हाइपोथर्मिया का असर दिखना शुरू हो जाएगा. हाइपोथर्मिया से व्यक्ति कोमा में जा सकता है और उसकी जान भी जा सकती है.”

    वहीं, अगर उन मुल्कों की बात की जाए जहां कम तापमान है और शराब ज़्यादा पीने का चलन है तो रूस ऐसे ही देशों में से एक है.

    और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च कहती है कि रूस में जहां वोदका का सेवन काफ़ी सामान्य है, वहां शराब के अधिक उपभोग की वजह से जीवन प्रत्याशा में कमी आई है. (bbc.com)
     

मनोरंजन

  • अक्षय कुमार की 'बेल बॉटम' की रिलीज डेट में हुआ बदलाव, अप्रैल में होने वाली थी रिलीज
    अक्षय कुमार की 'बेल बॉटम' की रिलीज डेट में हुआ बदलाव, अप्रैल में होने वाली थी रिलीज

     मुंबई ,15 जनवरी | साल 2020 में अगस्त के महीने में अक्षय कुमार पहले ऐसे ए ग्रेड एक्टर थे जिन्होंने कोरोना महामारी के बीच अपनी फिल्म 'बेल बॉटम' की शूटिंग फिर से शुरू कर दी थी. फिल्म की शूटिंग के लिए वो यूनाइटेड किंगडम गए थे जहां उन्होंने शुरु से अंत तक महज 35 दिनों में फिल्म की शूटिंग पूरी कर ली थी. मेकर्स ने तय किया था कि फिल्म को 2 अप्रैल 2021 को गुड फ्राइडे वाले वीकेंड में रिलीज करेंगे मगर अब जो खबर आ रही है उससे ये पता चला है कि फिल्म की रिलीज को टाल दिया गया है.

    बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के मुताबिक 'बेल बॉटम' की रिलीज को मेकर्स ने आगे बढ़ाने का फैसला किया है. फिल्म से जुड़े सूत्र ने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा, "फिल्म के मेकर्स ने फिल्म की रिलीज डेट 2 महीने बढ़ाकर जून कर दी है. इसका प्रमुख कारण है अक्षय की फिल्म 'सूर्यवंशी' (Sooryavanshi) की रिलीज का टाइम. सूर्यवंशी के मेकर्स ने तय किया है कि 15 मार्च से 15 अप्रैल के बीच वो फिल्म को रिलीज करेंगे. ऐसे में अक्षय कुमार की दो फिल्मों को एक महीने के अंदर सिनेमा घरों में रिलीज करना, वो भी कोरोना महामारी के दौरान, बेवकूफी होगी."

    बेलबॉटम अभी पोस्ट-प्रोडक्शन स्टेज में है और इस फिल्म का जो फाइनल एडिट है वो फरवरी तक पूरा हो जाएगा. इस बारे में जानकारी देते हुए सूत्र ने कहा, "जी हां, फिल्म फरवरी तक पूरी बन जाएगी. मेकर्स को रिलीज डेट के आगे के वक्त में फिल्म को रिलीज करने में कोई परेशानी नहीं है. धीरे-धीरे स्थिति सुधर रही है ऐसे में सिनेमा घरों में फिल्म को रिलीज करने से सिनेमा घर वालों को भी फायदा होगा."

    बेलबॉटम में अक्षय कुमार के साथ वाणी कपूर और लारा दत्ता भी नजर आएंगी. वाणी ने इस फिल्म में अक्षय की पत्नी का रोल निभाया है वहीं लारा 1980 के वक्त में भारत की प्रधानमंत्री का किरदार निभाती हुई दिखेंगी.(https://hindi.news18.com/)

खेल

  • सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी : राजस्थान की लगातार तीसरी जीत
    सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी : राजस्थान की लगातार तीसरी जीत

    इंदौर, 15 जनवरी | रवि बिश्नोई की लेग स्पिन के बाद अंकित लाम्बा के अर्धशतक के बूते राजस्थान ने शुक्रवार को सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी टी-20 टूर्नामेंट में सर्विसेस को छह विकेट से हरा दिया। एमराल्ड हाई स्कूल मैदान पर खेले गए इस मैच में सर्विसेस ने पहले बल्लेबाजी करते हुए नौ विकेट के नुकसान पर 133 रन बनाए। राजस्थान ने 17.3 ओवरों में चार विकेट खोकर 134 रन बना कर जीत हासिल की और अगले दौर में जाने की अपनी उम्मीदों को मजबूत किया।

    यह राजस्थान की तीन मैचों में तीसरी जीत है और वह अपने ग्रुप में 12 अंक लेकर पहले स्थान पर कायम है।

    सर्विसेस के लिए लखन सिंह ने अकेले लड़ाई लड़ी और 32 गेंदों पर 44 रन बनाए। उनकी पारी में पांच चौके और दो छक्के शामिल रहे। राहुल सिंह ने 23 रनों का योगदान दिया।

    बिश्नोई ने चार विकेट लिए। राहुल चहर के हिस्से दो विकेट आए। दीपक चहर और अनिकेत चौधरी ने एक-एक सफलताएं अर्जित कीं।

    राजस्थान के लिए अंकित ने बल्ले से कमाल दिखाते हुए 40 गेंदो पर चार चौके और तीन छक्कों की मदद से 51 रनों की पारी खेली। राजेश बिश्नोई ने 24 गेंदों पर 45 रन बनाए। उन्होंने तीन चौके और चार छक्के मारे। (आईएएनएस)

     

कारोबार

  • व्हाट्सएप पर सरकारी कार्रवाई नहीं तो कैट जाएगा कोर्ट, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम के तकनीकी ऑडिट हों
    व्हाट्सएप पर सरकारी कार्रवाई नहीं तो कैट जाएगा कोर्ट, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम के तकनीकी ऑडिट हों

    ‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

    रायपुर, 15 जनवरी। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के प्रदेश अध्यक्ष अमर परवानी, कार्यकारी अध्यक्ष मंगेलाल मालू, विक्रम सिंहदेव, महामंत्री जितेंद्र दोषी, कार्यकारी महामंत्री परमानंद जैन, कोषाध्यक्ष अजय अग्रवाल ने बताया की व्हाट्सप्प की नई निजता नीति के खिलाफ एक बार दोबारा हल्ला बोलते हुए कैट ने केंद्रीय आईटी मंत्री रवि शंकर प्रसाद को व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह निजता के गंभीर उल्लंघन और भारत के 40 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं के विश्वास को खंडित करने का बड़ा अपराध और इसलिए इन पर कार्रवाई तुरंत जरूरी है।

    कैट राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमर पारवानी ने बताया कि कैट की शिकायतों के जवाब में व्हाट्सअप ने मीडिया में विज्ञापन देकर इस मामले पर सफाई देने की कोशिश की है जो निहायत ही आधारहीन है और जिसमें कैट द्वारा उठाये गए तथ्यों के विषय में कुछ नहीं कहा गया है, इससे साफ जाहिर होता है की दाल में कुछ काला अवश्य है। सबसे पहले केंद्र सरकार व्हाट्सप्प को नई नीति को 8 फरवरी से लागू न करने का निर्देश दे एवं उसके बाद देश में इन तीनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की तत्काल गहन तकनीकी ऑडिट कराये। क्योंकि इन तीनों सोशल मीडिया प्लेटफार्म का स्वामित्व एक कम्पनी के पास है इस दृष्टि से यह देखा जाना जरूरी है की इन तीनों के बीच किस प्रकार डाटा अब तक साझा किया गया है और उसका क्या उपयोग हुआ है।

    कैट ने यह भी मांग की है की अब तक इन्होने जो डाटा देश के नागरिकों से लिया है वो भारत में ही सुरक्षित है या फिर किसी अन्य देश में चला गया है, यह भी जांच में देखा जाए। डाटा पूरे देश की सुरक्षा, गोपनीयता, स्वतंत्रता और अखंडता से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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