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अंतर्राष्ट्रीय

  • भारत ने बनाया नकली अयोध्या, असली नेपाल में- नेपाली पीएम
    भारत ने बनाया नकली अयोध्या, असली नेपाल में- नेपाली पीएम

    काठमांडू, 13 जुलाई। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के एक बयान से विवाद खड़ा हो गया है. उन्होंने कहा कि भगवान राम का जन्म नेपाल में हुआ था.

    अपने सरकारी आवास पर कवि भानुभक्त की जन्मदिन पर हुए समारोह में केपी ओली ने ये बयान दिया. भारत और नेपाल के बीच पहले से ही तनाव चल रहा है.

    केपी शर्मा ओली ने दावा कि असली अयोध्या नेपाल के बीरगंज के पास एक गाँव है, जहाँ भगवान राम का जन्म हुआ था.
    नेपाल में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेता कमल थापा ने प्रधानमंत्री केपी ओली के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है.

    उन्होंने कहा कि किसी भी प्रधानमंत्री के लिए इस तरह का आधारहीन और अप्रामाणित बयान देना उचित नहीं है. उन्होंने अपने ट्वीट में कहा, "ऐसा लगता है कि पीएम ओली भारत और नेपाल के रिश्ते और बिगाड़ना चाहते हैं, जबकि उन्हें तनाव कम करने के लिए काम करना चाहिए."

    भारत और नेपाल में पिछले कुछ महीने से तनाव चल रहा है. नेपाल ने 20 मई को अपना नया नक्शा जारी किया था जिसमें लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को अपना इलाक़ा दिखाया था. ये तीनों इलाक़े अभी भारत में हैं लेकिन नेपाल दावा करता है कि ये उसका इलाक़ा है.

    इसके बाद से दोनों देशों में तनाव बढ़ता गया. हालांकि इससे पहले भारत ने पिछले साल नवंबर में जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद अपना नक्शा अपडेट किया था. इस नक्शे में ये तीनों इलाक़े थे. भारत का कहना है कि उसने किसी नए इलाक़े को नक्शे में शामिल नहीं किया है बल्कि ये तीनों इलाक़े पहले से ही हैं.

    पिछले दिनों भारतीय मीडिया की भूमिका को लेकर भी नेपाल में कड़ी नाराज़गी जताई गई थी. कई भारतीय चैनलों ने प्रधानमंत्री केपी ओली और चीनी राजदूत होउ यांकी को लेकर सनसनीख़ेज़ दावे किए. कुछ चैनलों ने यह स्टोरी चलाई कि ओली को हनी ट्रैप में फंसा दिया गया है.

    नेपाल ने इन रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई और केबल ऑपरेटरों से कहा कि ऐसे भारतीय न्यूज़ चैनलों को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए प्रसारण से रोके.
    नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली ने कहा कि उन्होंने भारत में नेपाल के राजदूत नीलांबर आचार्य को भारतीय विदेश मंत्रालय के सामने कड़ी आपत्ति दर्ज कराने के लिए कहा है.

    नीलांबर ने कहा कि भारतीय मीडिया नेपाल और भारत के द्विपक्षीय संबंधों को और ख़राब कर रहा है. हालांकि चीन की राजदूत की सक्रियता को लेकर नेपाल में विरोध भी दर्ज हुआ है. नेपाल में विपक्ष से लेकर मीडिया तक में सवाल उठा कि घरेलू राजनीति में किसी राजदूत की ऐसी सक्रियता ठीक नहीं है. मुलाक़ातों का यह दौर पिछले ढाई महीने से चल रहा है. (bbc)

राष्ट्रीय

  • रेप आरोपी केरल के बिशप की जमानत रद्द, गैर जमानती वारंट जारी
    रेप आरोपी केरल के बिशप की जमानत रद्द, गैर जमानती वारंट जारी

    नई दिल्ली, 13 जुलाई । केरल में नन के साथ बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल  को पिछले साल मिली जमानत रद्द हो गई है. इससे साथ-साथ एक स्थानीय अदालत ने सोमवार को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी किया. इससे पहले बीते 7 जुलाई को केरल उच्च न्यायालय ने बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल की याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उसने एक नन द्वारा दायर यौन शोषण के मामले में बरी करने की अपील की थी.

    न्यायमूर्ति वी. शिरसी ने जालंधर क्षेत्र के बिशप को निर्देश दिया कि बलात्कार मामले में वह सुनवाई का सामना करे. केरल में उसी क्षेत्र की एक नन ने उसके खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था. अदालत ने बिशप की याचिका खारिज करते हुए अभियोजन के इस तर्क को स्वीकार किया कि बलात्कार मामले में मुलक्कल के खिलाफ प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य मौजूद हैं. इस वर्ष मार्च में निचली अदालत द्वारा बरी किए जाने की याचिका खारिज करने के बाद रोमन कैथोलिक गिरजाघर के वरिष्ठ पादरी ने समीक्षा याचिका दायर की. बिशप के खिलाफ कोट्टायम जिले में पुलिस ने बलात्कार का मामला दर्ज किया था.

    उच्च न्यायालय में दायर याचिका में पादरी ने कहा कि जब उन्होंने पीड़िता नन से वित्तीय लेन-देन को लेकर सवाल किया तो उसने उन्हें फंसा दिया. पुलिस को जून 2018 में दी गई शिकायत में नन ने आरोप लगाए थे कि 2014 से 2016 के बीच बिशप ने उसका यौन शोषण किया.(ndtv)

राजनीति

  • राजस्थान में 'सत्‍ता संकट' के बीच पायलट के पोस्‍टर फाड़े, बाद में बदला
    राजस्थान में 'सत्‍ता संकट' के बीच पायलट के पोस्‍टर फाड़े, बाद में बदला

    जयपुर, 13 जुलाई : राजस्‍थान में अशोक गहलोत के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस सरकार के खिलाफ बगावती तेवर अपनाने वाले राज्‍य के उप मुख्‍यमंत्री सचिन पायलट  की तस्वीर वाले बैनरों और पोस्‍टरों को मंगलवार दोपहर को वापस लगा दिया गया. पायलट के बगावती अंदाज के चलते इन पोस्‍टर-बैनर को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने फाड़ दिया था. हालांकि, जयपुर में राजस्थान कांग्रेस के कार्यालय में सचिन पायलट की नेम प्लेट को 'नहीं छुआ' गया है.

    राजस्थान में सत्‍ता संकट में नाटकीयता भरा मोड़ उस समय आया था जब रविवार शाम को पायलट ने 30 विधायकों के समर्थन का दावा किया. उन्‍होंने अपने लिए सीएम पद और अपने विश्‍वस्‍तों के लिए प्रमुख विभागों की मांग की थी. इसके बाद, आज सुबह अपने निवास पर मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत ने शक्ति प्रदर्शन किया. गहलोत ने दावा किया कि उनके पास 106 विधायक हैं.इन विधायकों को बीजेपी या पायलट की ओर से किसी संभावित टूट से बचाने के लिए एक रिसोर्ट में रखा गया है. पायलट और उनके कुछ विश्‍वस्‍त विधायक गहलोत की इस अहम बैठक में मौजूद नहीं थे.

    कांग्रेस सूत्रों ने पायलट के 30 विधायकों का समर्थन होने के दावे पर भी पलटवार करते हुए कहा कि उनके पास 16 से अधिक विधायक नहीं हैं. गौरतलब है कि 200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में बहुमत के लिए 101 के 'आंकड़े' की जरूरत है. सचिन पायलट के इन बगावती तेवरों को करीब तीन माह पहले मध्य प्रदेश के दिग्‍गज कांग्रेस नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी की ओर 'शिफ्ट' करने के जैसा कदम माना जा रहा था. हालांकि पायलट ने आज  कहा कि वह "बीजेपी में शामिल नहीं हो रहे हैं" लेकिन उनके सहयोगियों ने विपक्षी पार्टी के साथ बातचीत से इनकार नहीं किया है.

    राजस्थान में जारी इस सियासी संकट के बीच सचिन पायलट के गांधी परिवार से संपर्क होने की खबरों को कांग्रेस ने 'फेक न्यूज' कहते हुए खारिज कर दिया. राजस्थान में विधायकों द्वारा पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने वाले किसी भी व्यक्ति‍ को दंडित किए जाने संबंधी प्रस्ताव के पारित होने के बाद कांग्रेस सूत्रों ने यह दावा किया है कि सचिन पायलट अब बीजेपी से बात कर रहे हैं.(ndtv)

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : कोरोना महामारी के बाद कैसा होगा प्यार, सेक्स, रोमांस?
    Editor's Choice : कोरोना महामारी के बाद कैसा होगा प्यार, सेक्स, रोमांस?

    कहते हैं, प्रेम किसी भी वायरस से बड़ा होता है. वो महामारी को मात दे देगा. और ज़िंदा रहेगा. यही है मोहब्बत का मुस्तकबिल.

    दूसरी बातों के भविष्य के विपरीत प्रेम का भविष्य मेटाफिज़िक्स के घेरे में रहेगा - सूक्ष्म और गूढ़.

    "हम केवल भावनात्मक, आध्यात्मिक और आभासी स्तर पर प्रेम कर सकते हैं. अब प्रेम और सेक्स दो अलग बातें हैं."

    दिल्ली में रहने वाले प्रोफेशनल पप्स रॉय ख़ुद को लाइलाज विद्रोही बताते हैं. वे समलैंगिक हैं और कोरोना के बाद प्रेम के भविष्य पर बड़ी गहराई से बाते करते हैं.

    अभी फिलहाल पप्स रॉय अपने फ़ोन के साथ एक फ़्लैट में फंसे हुए हैं. वो कहते हैं, "प्यार है कहीं बाहर. बस हमें प्यार करने के पुराने तरीके भुला कर नए तरीके सीखने होंगे."
    लॉकडाउन से कुछ ही दिन पहले वो रेल में बैठकर एक आदमी के साथ किसी पहाड़ी शहर को निकल गए थे.

    उन्हें लगा कि उन्हें उस आदमी से प्यार है और उसके साथ दो दिन बिताना चाहते थे. लेकिन तब तक लॉकडाउन हो गया और एक महीने तक वे वहीं फंस गए.

    जब अप्रैल में वापस दिल्ली लौटे तब तक उनका भ्रम टूट चुका था. एक दूसरे के साथ होना एक दूसरे के साथ फंस जाने जैसा हो गया था.

    सोशल डिस्टेंसिंग अब एक दूसरे से दूरी में तबदील हो गई थी. अब वो दिल्ली वापस लौट आए हैं. साथ में फ़ोन है और कई प्रेमी भी. वो ज्यादातर एक दूसरे के साथ चैट करते हैं.
    कभी-कभी वीडियो के ज़रिए ही थोड़ा बहुत प्यार भी करते हैं. प्रेम का भविष्य कल्पना का मोहताज नहीं है. लोग परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं.

    इसी तरह हम भविष्य में क़दम रखते हैं. ई-हारमनी, ओके क्यूपिड और मैच जैसे डेटिंग प्लैटफ़ॉर्म पर लॉकडाउन के दौरान वीडियो डेटिंग में काफ़ी वृद्धि हुई है.

    कई दूसरी बातों के भविष्य पर बहस हो रही है. धर्म, पर्यटन, शिक्षा, वगैरह.

    लेकिन प्रेम का भविष्य? इसकी बात कुछ और है. ब्रिटेन में लॉकडाउन की शुरुआत में ही सरकार ने लोगों को सलाह दी कि वो अपने लवर के साथ ही रहें.

    एक दूसरे के घर आने-जाने से वायरस का संक्रमण फैलने का ख़तरा बढ़ सकता है. यूरोप में ऐसे कई प्रस्ताव आए.

    मई में नीदरलैंड की सरकार ने अकेले रहने वाले लोगों से कहा कि वो अपने लिए सेक्स पार्टनर खोज लें.

    साथ ही यह सलाह भी दी कि दोनों मिल कर ये भी तय कर लें कि वो और कितने लोगों से मिलेंगे. क्योंकि वो जितने ज्यादा लोगों से मिलेंगे कोरोना संक्रमण का ख़तरा भी उतना ज्यादा बढ़ेगा.

    एक सलाह यह भी थी कि 'दूसरों के साथ दूरी बना कर सेक्स करें.' कुछ सुझाव यह भी थे के औरों के साथ मिल कर हस्तमैथुन करें या फिर कामुक कहानियां पढ़ें.
    वीडियो चैट्स अब आम हो चुके हैं. और फ़ोन सेक्स भी. रेस्तरां बंद होने की वजह से वास्तविक डेटिंग संभव नहीं है.

    लिहाज़ा डेटिंग, शादियां और यहां तक की सेक्स भी वर्चुअल दुनिया में होने लगा है. ये मानो किसी भयानक भविष्य की तस्वीर हो.

    लेकिन आने वाले कल की हर तस्वीर नए आयाम लेती रहती है, नई शक्ल में बनती ढलती है.
    तारीख 20 अप्रैल थी.

    बेंगलुरु की एक सुहानी शाम. 33 साल का एक आदमी अपनी बालकनी में टेबल पर वाइन की एक ग्लास के साथ मोमबत्ती जला कर बैठा था. ये वीडियो डेट थी. डेटिंग ऐप बंबल पर.

    वो पहले भी डेटिंग ऐप का इस्तेमाल करते रहे हैं लेकिन कभी ज़्यादा समय नहीं बिताया था वहां. दरअसल, अपनी स्टार्टअप कंपनी के काम में इतना व्यस्त रहे कि समय नही मिल पाया.
    लेकिन लॉकडाउन शुरू होने के बाद वो एक साथी की तलाश में इस ऐप का ज्यादा इस्तेमाल करने लगे. और साथी उन्हें मिल भी गई.

    शुरुआत में बस एक दूसरे को पिंग करते या चैट करते रहे. धीरे-धीरे बातों का सिलसिला लंबा होता गया. और उसके बाद ये डेट तय हुई.

    वो भी अपनी बालकनी में बैठी थी और ये अपनी बालकनी में. ये मुलाक़ात चालीस मिनट तक चली. और लॉकडाउन में ढील मिलने के बाद अंतत: वो वास्तव मे मिले. लड़के के घर की छत पर. वो मास्क पहन कर आई थी. जैसे लोग गले मिलते हैं वैसे तो नही, कुछ फासले से मिले. बस उनकी कहानियां एक दूसरे से छू गईं. लड़के ने कहा, "फ़िलहाल इतना ही सही."

    वे कहते हैं, "हर किसी को किसी की तलाश है. अब लोग खुल कर बात करने लगे हैं. हम कोशिश करते हैं कि वायरस के बारे में बात ना करें. लेकिन इस दौरान जो दिमागी हालत है उस पर बात होती ही है. लोग किस हाल से गुज़र रहे हैं उस पर भी बात हुई. मैं इस माहौल में प्रेम करने के ख़तरे को अच्छी तरह समझता हूं. मैं ग़लतियां नहीं करना चाहता."

    आशीष सहगल दिल्ली में रहते हैं. वो एक 'लाइफ़ कोच' हैं. इनका काम लोगों को उनकी समस्याओें को समझने और उनसे निपटने में मदद करना है.

    वो कहते हैं कि हाल के दिनों में उन्हें ऐसे कपल्स के बहुत फ़ोन आते हैं जो वैवाहिक जीवन में समस्याओं से जूझ रहे हैं. महामारी के डर के कारण प्रेम संबंधो में कई बदलाव आएँगे."

    "प्रेम एक अवधारणा के रूप में और भी मज़बूत होगा. डर के माहौल में प्रेम और भी फलता फूलता है."

    प्रेम के संबंध में उनके और भी कई अनुमान हैं. "ज्यादा शादियां होंगी. तलाक भी बढ़ेंगे. और बच्चे भी ज़्यादा पैदा होंगे. ये सब विरोधाभासी बातें ज़रूर हैं, लेकिन हो सकता है शायद प्रेम का भविष्य ऐसा ही बेतरतीब और अराजक हो."
    आशीष सहगल कहते हैं, "बहुत सारे लोग अकेलापन महसूस कर रहे हैं."

    बहरहाल जहां तक प्रेम के भविष्य की बात है वो किसी भी सरकारी दिशा निर्देश या वायरस विशेषज्ञों के नीति निर्देश के दायरे से बाहर है. यह भविष्य फ़िलहाल एक मंथन के हवाले है.

    आशीष सहगल की दलील है, "एचआईवी/एड्स लोगों को प्यार करने से नहीं रोक पाया. आज लोगों को प्यार की ज़रूरत और तलाश पहले से भी अधिक है."

    "संक्रमण के दौर में अंतरंगता दिमाग में रहती है. हमारे देश में नैतिकता के ठेकेदार सैनिक इतने ज्यादा तत्पर हैं कि सेक्स पार्टनर जैसी अवधारणा का ज़िक्र करना तक मुश्किल है."

    एचआईवी/एड्स से बचने के लिए कॉन्डम का इस्तेमाल होने लगा लेकिन उसकी तुलना महामारी से बचने के लिए मास्क के इस्तेमाल से नहीं हो सकती.

    मुंबई के कामाठीपुरा में रहने वाली एक यौनकर्मी ने फ़ोन पर बातचीत के दौरान कहा कि उसने सुना है कि कई यौनकर्मी अब वीडियो कॉल के ज़रिए अपने ग्राहकों को अपनी सेवाएं दे रहीं हैं. लेकिन उसे यह अजीब लगता है. एचआईवी/एड्स की बात अलग थी. उससे बचने के लिए कॉन्डम काफ़ी था. लेकिन कोरोना वायरस तो छूने मात्र से संक्रमित कर सकता है.

    स्क्रीन वाला प्यार और स्पर्श
    और फ़ोन या कंप्यूटर की स्क्रीन स्पर्श का विकल्प तो नहीं हो सकती.

    नेहा (बदला हुआ नाम) कहती हैं, "वो अपने ग्राहकों को जानने समझने में या उनके साथ किसी अर्थपूर्ण संवाद में कोई रुचि नहीं रखतीं. सेक्स उनके लिए बस काम है. इसलिए यह तरीका काम करता है."

    नंदिता राजे, 28 साल की हैं. मेबेल इंडिया नाम के कपड़ों के ब्रैंड की मालकिन हैं. वो सिंगल हैं. वो कहती हैं अब उन्हें लोगो से मिलने में ख़ास दिलचस्पी नहीं है.

    वो कहती हैं, "प्रेम का भविष्य काफ़ी अंधकारमय है. और मेरे लिए शायद अब इसका कोई मायने नहीं बचा है."

    अब चूंकि किसी जगह किसी से मिलना मुश्किल है तो ऐसे में कई लोगों के लिए ऑनलाइन डेटिंग एक नया रास्ता बनता दिख रहा है. लेकिन बदलाव इसमें भी आ रहे हैं.
    ज़ैक शलेइएन ने फ़रवरी 2019 में 'फ़िल्टर ऑफ़' नाम का प्लेटफ़ार्म शुरू किया था.

    उन्होंने फ़रवरी 2020 में इसे रिलॉन्च किया. उनका मानना है कि वर्चुअल स्पीड डेटिंग ही भविष्य मे लोकप्रिय होगा.

    'फ़िल्टर ऑफ़' एक ऐसा ऐप है जहां आप पहले 90 सेकंड के एक वीडियो के ज़रिए उस व्यक्ति का जायज़ा लेना चाहते हैं कि आप उसे देख सुन कर कैसा महसूस करते हैं. अगर आप को वो व्यक्ति पसंद आता है तो आप की जोड़ी बन जाती है और उसके बाद आप ऐप के ज़रिए एक दूसरे को मैसेज और वीडियो भेज सकते हैं.

    वो आगे कहते हैं, "लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद लोग ऑफ़लाइन मुलाकात करना शुरू कर देंगे."

    नोएडा मे रहने वाले एक समलैंगिक व्यक्ति जो अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते, उन्होंने कहा, "और इस तरह हमने चेहरे पर मास्क लगा कर भविष्य की दहलीज़ पर कदम रखा. यह डरावना मंज़र है. हमें पहले ही एचआईवी/एड्स से डर था और अब ये महामारी भी आ गई."

    कपल्स के लिए मुश्किल दौर
    अगर इस महामारी को रोकने के लिए कोई टीका विकसित हो भी जाए, तब भी लोग बेफ़िक्र हो कर एक दूसरे के गले मिलें, इस में काफ़ी समय लगेगा. चाहे जो हो, एक बात निश्चित है कि प्यार, सेक्स और रोमांस का भविष्य हमेशा के लिए बदल गया है.

    कपल्स के लिए भी ये समय बहुत मुश्किल रहा है. लोग ऑफ़िस कम जा रहे हैं या ज्यादातर घर में रह कर काम कर रहे हैं.

    बहुत से लोगों को एक दूसरे की इस क़दर मौजूदगी की आदत नहीं रही है. रिपोर्टों के अनुसार तलाक़ के मामले बढ़े हैं. घरेलू हिंसा की घटनाएं भी बढ़ी हैं. लेकिन लोग किसी तरह निबाह रहे हैं.

    अंतरंग संबंधों मे हुई बढ़ोतरी के चलते कॉन्डम और गर्भ निरोधक दवाइयों की बिक्री में भी वृद्धि हुई है.

    लॉकडाउन में बंबल डेटिंग ऐप के नए सबस्क्राइबर खूब बढ़े हैं.

    बंबल की टीम का कहना है, "भारत में वीडियो और फोन कॉल की औसत अवधि कम से कम 18 मिनट तक रही है. यह एक संकेत है कि हमारे ऐप का इस्तेमाल करने वाले लोग सोशल डिस्टेंसिंग के इस दौर में एक दूसरे को समझने और गहरे और अर्थपूर्ण संबंध बनाने की कोशिश कर रहे हैं."

    हाल ही में बंबल ने एक नया अभियान शुरू किया जिसे नाम दिया 'स्टे फ़ार एंड गेट क्लोज़' यानी दूर रह कर नज़दीकी संबंध बनाएं. इसका मक़सद लोगों को घर पर रह कर ही संबंध बनाने की शुरुआत करने के लिए प्रोत्साहित करना है.

    टिंडर समेत कई डेटिंग ऐप्स के इस्तेमाल में पिछले हफ्तों मे काफ़ी तेजी आई है.

    सिर्फ़ कॉफ़ी ऐप का कहना है कि वो दुनिया भर में बसे भारतीयों को प्यार तलाश करने में मदद करता है. सिर्फ़ कॉफ़ी ऐप में ऐसे साथी ढूंढने में मदद मिलती हैं जिनकी सोच या मिजाज़ एक दूसरे से मेल खाता हो.

    इस ऐप प्लेटफ़ॉर्म की कार्यकारी उपाध्यक्ष नैना हीरानंदानी कहती हैं, "दूसरों से जुड़ना इंसान की अहम ज़रूरत है. इस महामारी के दौरान जो हालात बने हैं उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है. लेकिन इस दौरान यह ज़रूरत और भी उभर कर आई है."

    मार्च 2020 से इस ऐप के इस्तेमाल में 25 प्रतिशत बढ़त हुई है.

    नैना हीरानंदानी कहती हैं, "लेकिन भारत में अभी भी लोग साथी खोजने के लिए वर्चुअल कॉल का रास्ता चुनने को लेकर कुछ सशंकित रहते हैं. मगर धीरे-धीरे हमारे 80 प्रतिशत सदस्यों को इस बात की आदत होने लगी है. इस महामारी के बाद हमारे काम करने, जीने और प्रेम करने या उसे खोजने के तरीके बदल जाएंगे."

    लॉकडाउन शुरू होने के बाद से अब तक सिर्फ़ कॉफी ऐप की मुंबई, दुबई और लंदन स्थित टीम ने दुनिया भर मे 500 से ज्यादा मुलाक़ातें तय की हैं.

    लेकिन कई लोग अभी इस वर्चुअल प्रेम के लिए तैयार नहीं हैं. करण अमीन 39 साल के हैं और मुंबई में विज्ञापन एजेंसी में काम करते हैं.

    वो कहते हैं कि उन्होंने डेटिंग एप्स पर कई लोगों की प्रोफ़ाइल चेक की. इनमें से बहुत से लोगों का कहना था कि वो बोरियत की वजह से डेटिंग ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं.

    करण अमीन आगे कहते हैं, "टिंडर एक ऐसा ऐप था जहां आप लोगों से संबंध बनाने के लिए संपर्क करते थे. लेकिन अब आप बाहर ही नहीं जा सकते थे."

    एक लड़की जिसके साथ वो काफ़ी समय से चैट कर रहे थे उससे उन्होंने पूछा कि लॉकडाउन खुलने के बाद उसका क्या 'इरादा' है?"

    उस लड़की ने जबाव दिया कि छह महीने तक तो वह किसी को छुएगी ही नहीं.

    करण अमीन का सवाल है, "अब हम क्या करें? ऐसा सर्टिफ़िकेट लेकर चलें जो कहे हमें कोविड नहीं हुआ है. अगर वास्तव में मुलाक़ात ही नहीं हो सकती है तो डेटिंग ऐप पर मैचिंग करने का कोई फ़ायदा नही है."

    ग्रांइडर एक ऐसा ऐप है जिसका इस्तेमाल समलैंगिक पुरुष करते हैं. इस ऐप मे एक फ़ीचर यह भी है कि वो बता सकता है कि कोई समलैंगिक साथी कितने फ़ासले पर है. कल तक ये फासला एक मीटर से कम भी होता था और ऐप तब भी आपको सूचित कर सकता है. लेकिन अब यह फ़ासले चंद मीटर से बढ़ कर मीलों के हो गए हैं.

    क्वारंटीन पीढ़ी
    कुछ विशेषज्ञों का ये भी अनुमान है कि दिसंबर 2020 तक अधिक संख्या में बच्चों का जन्म देखने को मिल सकता है. और हो सकता है ये नई पीढ़ी 2033 में 'क्वारंटीन' कहलाए.

    न्यूयॉर्क में ज़ूम ऐप पर हुई शादियों को क़ानूनी वैधता मिल चुकी है. भारत में भी कुछ शादियों और शादी की सालगिरह ज़ूम ऐप पर मनाई गईं और वास्तविक शादियों के दौरान भी कम से कम मेहमान होना और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन सामान्य बात हो रही है. असल मे नया भविष्य दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ है और हम इसे अपना भी चुके हैं. हालांकि कुछ लोग 'सामान्य समय' के लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं, बाकी लोग 'वर्चुअल या आभासी प्रेम' करने में मशगूल हो रहे हैं.

    महामारी के संक्रमण काल में बहुत से लोगों के लिए प्रेम करने के ग़ैर पारंपरिक तरीके विकल्प बन रहे हैं. बशर्ते कि उनका दिल प्यार के लिए खुला हो.

संपादकीय

  • ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : तूफानी लहरों से जूझने की  जरूरत, कांग्रेस लीडरशिप  किनारे बैठ लहरें गिन रही...
    ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : तूफानी लहरों से जूझने की जरूरत, कांग्रेस लीडरशिप किनारे बैठ लहरें गिन रही...

    राजस्थान में इस वक्त मुख्यमंत्री निवास में कांग्रेस विधायकों की बैठक चल रही है, और खबर के मुताबिक कई विधायकों को साथ लिए हुए उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट उसमें गैरहाजिर है। उन्होंने कल से ही यह साफ कर दिया है कि वे इस बैठक में नहीं जाएँगे। वहां कांग्रेस पार्टी की सरकार के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष अब पूरी ऊंचाई पर है, और आज वहां आर-पार की लड़ाई दिख रही है। कांग्रेस पार्टी के भी तेवर ऐसे दिख रहे हैं कि अगर पायलट विधायक दल की बैठक में न आए तो गैरमौजूद विधायकों के साथ-साथ उन्हें भी पार्टी से अलग किया जा सकता है। किसी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए इससे अधिक नुकसान की कोई बात नहीं हो सकती कि उसके दर्जनों विधायक उससे अलग होने की कगार पर खड़े हों। अभी-अभी मध्यप्रदेश में कुछ ही महीने पहले कांग्रेस से 22 विधायक अलग हुए, पार्टी छोड़ी, और अब भाजपा सरकार के मंत्री बनकर उपचुनाव की कगार पर खड़े हैं। 

    राजस्थान को देखें तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बारे में तो बाद में सोचने की जरूरत पड़ती है, पहले तो जरूरत रहती है कांग्रेस हाईकमान के बारे में सोचने की जिसने डेढ़ साल से राजस्थान में चल रहे खुले भीतरी संघर्ष को भी सुलझाया नहीं। राजस्थान में भाजपा सरकार के बाद किसी तरह कांग्रेस की सरकार आई थी, और एक पूरी पीढ़ी के फासले वाले गहलोत और पायलट के बीच मुख्यमंत्री पद की दावेदारी खुलकर सामने रही, और जैसा कि हर जगह होता है, उपमुख्यमंत्री का पद एक समझौता होता है, और हमेशा ही चुनौती भी होता है, तो राजस्थान में वही हुआ। 

    आज कांग्रेस पार्टी के बारे में सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि गिने-चुने राज्य जब पास बचे हैं, तब मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ-दिग्विजय का टकराव काबू नहीं किया गया, राजस्थान में गहलोत और पायलट का टकराव काबू नहीं किया गया। और तो और काबू करने की कोशिश भी नहीं दिखी। जैसा कि मीडिया का एक बड़ा तबका और राजनीतिक लोग बताते हैं, कांग्रेस हाईकमान पार्टी के नेताओं की पहुंच से परे हो गया है। अब आज तो सोनिया परिवार के तीनों लोग पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। तीनों दिल्ली में रहते हैं, और अलग-अलग वक्त पर कुछ-कुछ लोग शायद उनसे मिल भी पाते हैं। जो पार्टी आज न केन्द्र में सत्ता में रह गई, न ही अधिक राज्य जिसके पास बचे, उस पार्टी में अगर लीडरशिप अपने राज्यों के सबसे बड़े नेताओं के साथ मिलने का समय नहीं निकाल पाती, या उनके विवाद नहीं सुलझा पाती, तो यह उस पार्टी पर मंडराते खतरे का सुबूत है। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी, तो उसके बाद राहुल गांधी का यह ट्वीट सामने आया था कि उनके लिए तो राहुल के घर के दरवाजे हमेशा ही खुले थे, और वे किसी भी वक्त आ-जा सकते थे। हो सकता है यह बात सच हो, लेकिन यह बात भी सच है कि राहुल तक ऐसी पहुंच के बाद भी ज्योतिरादित्य ने पार्टी छोड़ी। हो सकता है कि उन्हें कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के बीच मध्यप्रदेश में अपना भविष्य अच्छा न दिख रहा हो, और भाजपा में वे अपनी बेहतर संभावनाएं देख रहे हों, लेकिन महीनों से चली आ रही इन खबरों पर कांग्रेस लीडरशिप ने क्या किया, कम से कम यह जनता के बीच तो सामने नहीं आया। इसी तरह राजस्थान का यह घरेलू मनमुटाव आज सरकार को ले डूबने तक पहुंच गया है, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने इन डेढ़ बरसों में इसे सुलझाने के लिए कुछ किया था यह कम से कम लोगों के सामने नहीं आया।
     
    भारत जैसे तूफानी-चुनावी लोकतंत्र में देश की सबसे पुरानी पार्टी, एक वक्त की सबसे बड़ी पार्टी, और आज की भी एक बड़ी पार्टी की लीडरशिप से लोकतंत्र में कुछ उम्मीदें की जाती हैं। भारत सरीखी राजनीति किनारे बैठकर लहरों को देखते हुए वक्त गुजारने जैसी चीज नहीं है। वह तो तूफानी लहरों में उतरकर उनसे टकराने का काम है, जो कि आज कांग्रेस में कोई करते दिख नहीं रहे हैं। इससे कांग्रेस का जो नुकसान होना है, वह एक के बाद दूसरे राज्य में होते चल रहा है, लेकिन पार्टी के साथ-साथ लोकतंत्र का बड़ा नुकसान इस तरह हो रहा है कि केन्द्र का सबसे बड़ा विपक्षी गठबंधन भी इससे कमजोर हो रहा है क्योंकि उसके भीतर मुखिया-पार्टी अगर ऐसी कमजोर हो रही है, तो जाहिर है कि गठबंधन का मनोबल भी टूटता है। 

    लोकसभा चुनाव में हार के बाद अध्यक्ष पद से अलग हुए राहुल गांधी की पार्टी के भीतर आज की भूमिका एक बड़ी पहेली है। वे अध्यक्ष के किए जाने वाले तमाम काम भी कर रहे हैं, लेकिन वे उस ओहदे पर नहीं है। सोनिया गांधी उस ओहदे पर हैं, लेकिन उन तक पार्टी के नेताओं की पहुंच नहीं सरीखी ही सुनाई पड़ती है। प्रियंका गांधी उत्तरप्रदेश तक सीमित हैं जहां अपने आपमें चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं, और उनकी संभावनाओं से बहुत अधिक भी हैं। ऐसे में कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को यह समझ नहीं पड़ता है कि वे जाएं तो कहां जाएं, मिलें तो किससे मिलें। नतीजा यह है कि एक के बाद दूसरा प्रदेश तबाही झेल रहा है, लेकिन कांग्रेस हाईकमान समझा जाने वाला परिवार पार्टी की पहुंच से परे दिख रहा है।
     
    हमें कांग्रेस पार्टी के अंदरुनी मामलों को लेकर अधिक फिक्र नहीं है। लेकिन देश में एक मजबूत विपक्ष के बिना लोकतंत्र कमजोर ही रहेगा, एक मजबूत पार्टी के बिना कोई गठबंधन के मुखिया नहीं बन सकते। ऐसे में कांग्रेस का छिन्न-भिन्न होना इस पार्टी से परे लोकतंत्र की कमजोरी भी पैदा कर रहा है। लेकिन हमारे लिए यह लिखना आसान है इस पार्टी के लिए इससे उबर पाना इतना आसान नहीं है। देखें आज-कल में राजस्थान का क्या होता है, और कांग्रेस की नींद कब टूटती है।  

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सेहत/फिटनेस

  • पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं
    पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं

    पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं

    -अंजलि मिश्रा

    अंतरर्राष्ट्रीय बही-खातों का हिसाब रखने वाली संस्था, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का कहना है कि सारी दुनिया जल्दी ही आर्थिक महामंदी का सामना करने जा रही है. कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते कई महीनों से बंद आर्थिक गतिविधियों के बाद वह ऐसा नहीं कहता तो आश्चर्य की बात होता. लेकिन जानकार यह आशंका भी जता रहे हैं कि कोरोना संकट सिर्फ पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को ही नहीं बल्कि राजनीति, देशों के आपसी संबंधों से लेकर हमारे सामाजिक-व्यक्तिगत संबंधों तक को बदलने वाला साबित हो सकता है.

    एक कड़वा सच यह भी है कि इनमें से ज्यादातर बदलाव नकारात्मक हो सकते हैं और भारत भी इनसे अछूता नहीं रहने वाला है. लेकिन इन तमाम बड़े-बड़े दावों और आशंकाओं के बीच कुछ छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव भी हैं, जिन्हें पिछले दिनों भारतीय समाज ने बहुत गंभीरता और तेजी के साथ अपनाया है. ये बदलाव इसलिए ध्यान खींचते हैं क्योंकि सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाला हमारा देश कई बार सही व्यवहार करने के मामले में बड़े ढीठ स्वभाव का दिखता रहा है. ऐसे में बीते कुछ सप्ताहों में यहां के एक बड़े हिस्से में आए ये पांच बदलाव बेहद मामूली होते हुए भी सुखद ठहराए जा सकते हैं.

    हाथों की सफाई

    मनोविज्ञान इंसानों के कभी-कभी ऑप्टिमिस्टिक बायस या अति-आशावादी रवैया दिखाने की बात कहता है. अति-आशावादी रवैया रखने वाले लोग किसी भी विपरीत परिस्थिति में यह मानकर चलते हैं कि वे बाकी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं. हर इंसान कम या ज्यादा इसका शिकार होता ही है और यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर लोगों को लगता है कि उन्हें तो कोरोना वायरस का संक्रमण हो ही नहीं सकता है. यह अति-आशावाद भारतीयों की भी सबसे बड़ी खूबी (या खामी) कहा जा सकता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण साफ-सफाई के लिए अब तक रहा हमारा लापरवाह रवैया है. मसलन, ऑफिस में काम करने के दौरान हम भारतीय दसियों चीजों को हाथ लगाने, लैपटॉप-फोन चलाने, नाक और सिर खुजलाने के अलावा भी जाने क्या-क्या करते रहते हैं. लेकिन जैसे ही कोई सहकर्मी खाने-पीने की कोई चीज आगे करता है, लपककर यह कहते हुए ले लेते हैं, मेरे हाथ तो साफ ही हैं! लेकिन कोरोना संकट ने हमें अपने हाथों को साफ रखना सिखा दिया है. हालांकि अभी ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है इतने थोड़े समय में यह आदत हर भारतीय के जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई है. लेकिन कोरोना संकट अभी लंबा चलने वाला है और उम्मीद की जा सकती है कि इसके खत्म होने तक हाथों से लेकर घर तक की साफ-सफाई हम में से कइयों के जीवन का एक स्थायी अंग बन चुकी होगी.

    छींकते या खांसते हुए आसपास वालों का ख्याल करना

    छींकने को हमारे यहां अनैच्छिक क्रिया कहकर, जो कि यह है भी, लोग अक्सर मनमाने तरीके से जोर-जोर से छींकते देखे जा सकते हैं. ऐसा करते हुए वे अक्सर इस बात का भी ख्याल नहीं करते हैं कि उनका ऐसा करना कुछ लोगों को कितना असहज कर सकता है. कोरोना संकट के दौरान बरती जाने वाली अतिरिक्त सावधानी का असर यह हुआ है कि अब लोग रूमाल, टिश्यू, मास्क या कुहनी के सहारे बहुत संभलकर छींकते-खांसते दिखाई देते हैं. दिलचस्प यह है कि पहले सर्दी-जुकाम का मरीज अक्सर इस बात से परेशान रहता था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और लोग उसे कह रहे हैं कि अरे बस जुकाम ही तो हुआ है. लेकिन अब लोग जुकाम को इतनी गंभीरता से लेने लगे हैं कि किसी को दो-चार बार छींक या खांसी आ जाने पर ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे सामने वाले ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. और मरीज कुछ इस तरह के भाव देता रह जाता है कि बस जुकाम ही तो है. ऐसे में किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए लोग साधारण सर्दी-जुकाम में भी अतिरिक्त सावधानी बरतते नजर आने लगे हैं.

    अपनी बारी आने का इंतज़ार करना

    कोरोना संकट की शुरूआत से ही सबसे ज्यादा ज़ोर फिजिकल डिस्टेंसिंग पर दिया जा रहा है. अब भी किसी सार्वजनिक स्थान पर खड़े लोगों को एक-दूसरे से कम से कम तीन फीट की दूरी पर खड़े होने की सलाह दी जा रही है. इसकी वजह से पिछले कुछ समय से सब्जी और राशन की दुकानों पर भी लंबी-लंबी लेकिन अनुशासनबद्ध कतारों को देखा जा सकता है. इसमें दोहरा अनुशासन यह है कि इन कतारों में भी लोग उन जगहों पर ही खड़े हो रहे हैं जहां पर उन्हें एक-दूसरे से दूर रखने वाले गोले बने होते हैं. सबसे दिलचस्प नज़ारा पिछले दिनों उन शराब की दुकानों पर दिखाई दिया जहां पहले हर वक्त भगदड़ सी मची रहा करती थी. कोरोना वायरस के प्रकोप की वजह से इन दुकानों पर भी लोग सैकड़ों मीटर लंबी लाइनों में शांति से अपनी बारी का इंतज़ार करते दिखाई दिए. ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना प्रकोप शांत होने के बाद जीवन में जो बदलाव होंगे उसमें फिजिकल डिस्टेंसिंग एक ज़रूरी हिस्सा बनकर हमेशा के लिए रह जाने वाला है. ऐसे में हो सकता है कि हमारा समाज भी स्थायी तौर पर अपनी बारी का इंतजार करने वाला समाज बन जाये.

    खाने-पीने या बाकी जरूरी सामान की बरबादी से बचना

    आंकड़ों की मानें तो, सामान्य परिस्थितियों में लगभग 20 करोड़ लोग भारत में रोज़ाना भूखे पेट सोते हैं. वहीं, एक लाख क्विंटल खाना हर साल हमारे देश में डस्टबिन में फेंक दिया जाता है. इस भयावह आंकड़े में होटलों या सामाजिक आयोजनों में बरबाद होने वाले खाने के साथ-साथ वह खाना भी शामिल है जो मध्यवर्गीय घरों में बासी या बचा हुआ कहकर कूड़ेदानों या नालियों के हवाले कर दिया जाता है. कोरोना संकट के चलते खाने-पीने की चीजों की कमी का डर अब इनकी बरबादी कम होने की वजह भी बन रहा है. कुछ मध्यवर्गीय गृहणियों से हुई सत्याग्रह की अनौपचारिक बातचीत में उनका कहना था कि अब वे इस बात का ख्याल रखती हैं कि घर में उतना ही खाना बने जितना कि खपत हो सके और अगर कुछ बचता है तो पहले वह खत्म हो.


    इसके अलावा, कई फिल्मी-सोशल मीडिया हस्तियों समेत आम लोगों का एक बड़ा तबका अक्सर यह कहता रहा है कि ईएमआई की सुविधा और हर समय मौजूद रहने वाले ऑनलाइन विकल्पों के चलते, वे तमाम ऐसी चीजें भी खरीद लेते थे जिनकी सही मायनों में उन्हें जरूरत ही नहीं है. लॉकडाउन ने बेज़ा खरीदारी की लत के शिकार ऐसे लोगों को भी होश में आने का मौका दे दिया है. यानी, यह कहा जा सकता है कि बहुत सारे लोग अब दाना-पानी से लेकर पैसों तक को बरबाद न करने का सबक कोरोना संकट के चलते सीख रहे हैं.

    परिजनों या करीबी लोगों के संपर्क में रहना

    लॉकडाउन के चलते करीब दो महीने से ज्यादा वक्त से अपने घरों में बंद लोग फोन और इंटरनेट के जरिए ही अपने परिवार और दोस्तों से जुड़ पा रहे हैं. लेकिन खास बात यह है कि वे ऐसा कर खूब रहे हैं. वे लोग जो कभी व्यस्त होने या फिर घरवालों को वरीयता न देने के चलते कभी-कभार ही उनसे संपर्क करते थे, अब घर की खैर-खबर नियमित तौर पर लेते दिखने लगे हैं. इतना ही नहीं, कई लोग तो अपने भूले-बिसरे दोस्तों और रिश्तेदारों को भी खोज-खोजकर उनका हालचाल जानने के बहाने खुद को व्यस्त और खुश रखने की कोशिश करते दिख रहे हैं. यह देखना दिलचस्प है कि एक ऐसे समय में जब लोग आपस में मिल तक नहीं पा रहे हैं, एक-दूसरे को अपेक्षाकृत ज्यादा समय दे रहे हैं.

    इसके अलावा भी, कुछ ऐसे लोग जिनकी उपस्थिति हमारी रोजमर्रा का हिस्सा थी, जैसे हाउस-हेल्प, सफाईकर्मी, डिलीवरी बॉय या छोटे-मोटे काम करने वाले और कई लोग, उनका भी महत्व इस कठिन समय में समझ आने लगा है. इसलिए उनसे संपर्क रखने, उनकी मदद और सम्मान करने की ज़रूरत भी एक बड़ा तबका महसूस करता दिखने लगा है. कुल मिलाकर, आधुनिकता के चलते एकल परिवारों या अकेले होने को तरजीह देने वाले, हमारे आसपास के कई लोग अब यह बात स्वीकार करते दिखने लगे हैं कि अपने लोगों के करीब रहना, एक सोशल सर्कल का होना और जिंदगी आसान बनाने वाले कई लोगों की उपस्थिति हमारे लिए कितनी ज़रूरी है. (satyagrah.scroll.in)

मनोरंजन

  • सोनू सूद से अब 400 मजदूर परिवारों को आर्थिक मदद, बच्चों की पढ़ाई का खर्च
    सोनू सूद से अब 400 मजदूर परिवारों को आर्थिक मदद, बच्चों की पढ़ाई का खर्च

    बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद प्रवासी मजदूरों को बस, ट्रेन और फ्लाइट के जरिए उनके घर पहुंचाने का काम अभी तक कर रहे हैं। अभिनेता के इस कदम की सभी लोग खूब सराहना कर रहे हैं। सोनू सूद से अब भी लोग ट्विटर के जरिए मदद मांग रहे हैं। सोनू सूद प्रवासी मजदूरों और कामगारों के लिए अब पूरी तरह से मसीहा बन चुके हैं। अब इससे भी एक कदम आगे बढ़ सोनू सूद घर जाते वक्त घायल हुए और जिनकी मौतें हुईं, उनके परिवार की मदद करेंगे।

    प्राप्त जानकारी के मुताबिक, सोनू सूद और उनकी टीम ऐसे 400 प्रवासी मजदूरों और कामगारों के परिवार मदद करेगी जिनकी अपने घर लौटते वक्त मौत हो गई या फिर वह घायल हो गए। सोनू और उनकी दोस्त नीति गोयल अब इन परिवारों की आर्थिक मदद, बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाएगी। इन मजदूरों और कामकारों के परिवार के पास आय का कोई जरिया नहीं है।

    सोनू सूद और उनकी टीम उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के अधिकारियों के संपर्क में है और मृतक और घायल मजदूरों और कामगारों की जानकारी मांगी है। इस जानकारी में उनके परिवारों का पता और बैंक की जानकारी भी शामिल होंगी, जिससे की डायरेक्ट उनके अकाउंट में आर्थिक सहायता राशि को ट्रांसफर किया जा सकेगा। इसके अलावा सोनू सूद और उनकी टीम इन मजदूरों और कामगारों के बच्चों की शिक्षा और उनके घर बनवाने के लिए आर्थिक मदद करेंगे।

    हाल ही में सोनू सूद ने कहा, आप उस वक्त सफलता हासिल करते हैं जब आप कि किसी की मदद करते हैं, नहीं तो आप असफल हैं। इकॉनोमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सोनू सूद और उनकी टीम 8 जून तक 21000 प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचा चुके हैं।

खेल

  • हैमिल्टन का 85वां खिताब
    हैमिल्टन का 85वां खिताब

    स्पीलबर्ग (आस्ट्रिया), 13 जुलाई ।  लुईस हैमिल्टन ने रविवार को यहां पोल पोजीशन से शुरुआत करते हुए स्टायरियन ग्रां प्री का खिताब जीता जो उनके करियर की 85वीं जीत है और इससे वह माइकल शूमाकर के फॉर्मूला वन के रिकॉर्ड से छह जीत दूर रह गए हैं।

    शूमाकर ने अपनी अधिकतर जीत फेरारी के साथ दर्ज की थी लेकिन अभी उनकी पुरानी टीम संघर्ष कर रही है। पिछली चार रेस में दूसरी बार चार्ल्स लेकरेक और सेबेस्टियन वेटेल रेस पूरी नहीं कर पाए।

    हैमिल्टन ने रिकॉर्ड 89वीं बार पोल पोजीशन से शुरुआत की और रेस के दौरान कोई उन्हें खास चुनौती पेश नहीं कर पाया। वह मर्सीडीज के अपने साथी वलटारी बोटास से 13.7 सेकेंड के लिये आगे रहे। रेड बुल के मैक्स वर्सटाप्पन तीसरे स्थान पर रहे। बोटास ने पिछले महीने आस्ट्रियाई ग्रां प्री का खिताब जीता था। (एजेंसी)

कारोबार

  • पर्यटन मंत्रालय का ऑनलाइन प्रशिक्षण
    पर्यटन मंत्रालय का ऑनलाइन प्रशिक्षण

    रायपुर, 13 जुलाई।  देशी विदेशी पर्यटकों को भारत के पर्यटन स्थलों की विशेष जानकारी प्रदान करने, पर्यटकों में भारत के पर्यटन स्थलों के प्रति और अधिक रूचि पैदा करने तथा पर्यटन के विभिन्न आयामों को और अधिक समृद्ध करने के उद्देश्य से पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार अब इच्छुक उम्मीदवारों को राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटक-समन्वयक के रूप में ऑनलाइन प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है।

    छत्तीसगढ़ के ऐसे इच्छुक महिला एवं पुरूष उम्मीदवार जो 18 वर्ष से अधिक एवं 40 वर्ष से कम आयु के हो एवं न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 10़2 अथवा समकक्ष अर्हता रखते हो तथा पर्यटन के क्षेत्र में नई संभावनाएं तलाश कर पर्यटन को और अधिक रूचिकर बनाते हुए पर्यटन स्थलों एवं पर्यटकों के मध्य एक सेतु के रूप में कार्य कर सके, उन्हें पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पर्यटक-समन्वयक के रूप में सेवाएं प्रदान करने हेतु अधिकृत किया जावेगा।  

    एक ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम है। इसके माध्यम से प्रशिक्षित, पर्यटक-समन्वयकों को प्रमाणपत्र प्रदान कर सीधे राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटकों को सेवाएं प्रदान करने हेतु जोड़ा जायेगा। इस ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम हेतु छत्तीसगढ़ के इच्छुक उम्मीदवार (महिला/पुरूष) पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार की वेबसाइट एवं पोर्टल से विस्तृत जानकारी प्राप्त कर ऑनलाइन आवेदन कर सकते है। 

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