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अंतरराष्ट्रीय

  • एप्पल 2024 में फोल्डेबल आईफोन का अनावरण करेगा: रिपोर्ट
    एप्पल 2024 में फोल्डेबल आईफोन का अनावरण करेगा: रिपोर्ट

     सैन फ्रांसिस्को, 21 सितम्बर | एप्पल के विश्लेषक मिंग-ची कू ने एक नवीनतम शोध नोट में दावा किया है कि क्यूपर्टिनो स्थित टेक दिग्गज अपना पहला फोल्डेबल आईफोन 2024 में लॉन्च कर सकती है, जबकि पहले यह 2023 में होने वाला था। आईमोर ने कुओ के हवाले से कहा, "हमने अंडर-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट वाले आईफोन के लॉन्च में देरी और फोल्डेबल आईफोन को क्रमश: 2एच23 और 2024 करने के लिए अपने पूवार्नुमान को संशोधित किया है। हमारा मानना है कि इससे 2022 और 2023 में आईफोन शिपमेंट को नुकसान होगा।"

    बिजनेस कोरिया ने हाल ही में बताया कि एप्पल और एलजी एक फोल्डेबल ओएलईडी पैनल विकसित कर रहे हैं जो मोटाई कम करने के लिए ऩक्काशी का उपयोग करता है और आकार में 7.5-इंच की संभावना है।

    साइट का मानना है कि एप्पल के पहले फोल्डेबल स्मार्टफोन में क्लैमशेल डिजाइन होगा।

    इससे पहले, कुओ ने कहा था कि एप्पल 2016 से फोल्डेबल डिवाइस पर शोध कर रहा है, लेकिन हाल के महीनों में फोल्डेबल आईफोन को लेकर अफवाहें काफी बढ़ गई हैं।

    गैलेक्सी जेड फ्लिप जैसी डिजाइन वाला आगामी फोल्डेबल आईफोन भी उसी बाजार में प्रतिस्पर्धी प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में अधिक किफायती होगा।

    एप्पल भी सैमसंग गैलेक्सी फोल्ड के समान फोल्डिंग डिस्प्ले वाले आईफोन की इंजीनियरिंग की प्रक्रिया में है और आईफोन निर्माता ने सैमसंग से फोल्डेबल डिस्प्ले के एक बैच का आदेश दिया है, यह सुझाव देते हुए कि यह एक फोल्डेबल आईफोन पर काम कर रहा है।

    एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कंपनी अपने फोल्डेबल आईफोन के लॉन्च के बाद आईपैड मिनी को भी बंद कर सकती है।(आईएएनएस)

राष्ट्रीय

  • मुंबई साकीनाका रेप केस पर महाराष्ट्र के राज्यपाल ने CM को लिखा पत्र, जानें उद्धव ठाकरे ने दिया क्या जवाब
    मुंबई साकीनाका रेप केस पर महाराष्ट्र के राज्यपाल ने CM को लिखा पत्र, जानें उद्धव ठाकरे ने दिया क्या जवाब

    मुंबई,  21 सितम्बर:  मुंबई के साकीनाका में महिला से बलात्कार और हत्या के मामले में महाराष्ट्र के राज्यपाल बीएस कोश्यारी और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बीच ''लेटर वॉर'' छिड़ गई है. कोश्यारी ने मामले को लेकर राज्य विधानसभा के विशेष सत्र बुलाने के लिए सीएम को पत्र लिखा था. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पलटवार करते हुए कहा कि महिलाओं की सुरक्षा और उन पर बढ़ते हमलों से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए श्री कोश्यारी को केंद्र से संसद का सत्र बुलाने का अनुरोध करना चाहिए. 

    सोमवार को राज्यपाल को लिखे गए पत्र में ठाकरे ने उत्तराखंड (कोश्यारी का गृह राज्य) सहित भाजपा शासित राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को सूचीबद्ध किया और कहा कि उनके पास “एक राजनीतिक कार्यकर्ता की आत्मा” है.

    उन्होंने कहा कि राज्यपाल द्वारा इस तरह के "निर्देश" एक नया विवाद पैदा कर सकते हैं और लोकतांत्रिक संसदीय प्रक्रियाओं के लिए हानिकारक हैं.

    कोश्यारी ने हाल ही में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राज्य विधानमंडल का एक विशेष सत्र बुलाने के लिए कहा था. अपने पत्र में, मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के बारे में कोश्यारी की चिंताओं को नोट किया है.

    ठाकरे ने कहा, "मुंबई में साकीनाका की घटना की पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने के लिए मैं आपकी भावनाओं को समझ सकता हूं. आपके पास एक राजनीतिक कार्यकर्ता की आत्मा है. हालांकि, आपके द्वारा दिए गए निर्देश एक नया विवाद पैदा कर सकते हैं."

    इस महीने की शुरुआत में मुंबई के साकीनाका इलाके में सड़क किनारे खड़े एक टेंपो में 34 वर्षीय एक महिला के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया गया था. 45 वर्षीय आरोपी ने पीड़िता को रॉड से प्रताड़ित किया. अस्पताल में इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई.

    मुख्यमंत्री ने कहा, "यह संसदीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए हानिकारक है कि राज्यपाल भी वही मांग करते हैं जो राज्य सरकार का विरोध कर रहे हैं. राज्य ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कदम उठा रहा है."

    उन्होंने दिल्ली सहित भाजपा शासित राज्यों और क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को सूचीबद्ध किया. दिल्ली में पुलिस व्यवस्था केंद्र सरकार के हाथों में है. उन्होंने बिहार और उत्तर प्रदेश का भी नाम प्रमुखता से लिया.

    ठाकरे ने कोश्यारी से पूछा, "उत्तराखंड, आपका गृह राज्य, देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं पर हमले 150 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं. क्या वहां एक विशेष सत्र बुलाया जा सकता है?"

    उन्होंने लिखा है कि पिछले दो सालों में पड़ोसी बीजेपी शासित राज्य गुजरात में 14,229 महिलाएं लापता हुई हैं. उन्होंने कहा, "गुजरात पुलिस की रिपोर्ट कहती है कि कम से कम 14 महिलाएं रोजाना बलात्कार या यौन उत्पीड़न का सामना करती हैं. इतनी अधिक संख्या के चलते गुजरात को कम से कम एक महीने के सत्र की आवश्यकता होगी."

    ठाकरे ने लिखा, “उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर कई हमलों के बावजूद, भाजपा ने विशेष सत्र की कोई मांग नहीं की है.”  (ndtv.in)

     

राजनीति

  • यूपी  में चुनाव के बाद भाजपा से हाथ मिला सकती है बसपा, माया के करीबी ने किया '200 प्रतिशत' खंडन
    यूपी में चुनाव के बाद भाजपा से हाथ मिला सकती है बसपा, माया के करीबी ने किया '200 प्रतिशत' खंडन

    लखनऊ, 14 सितंबर। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव में पूर्ण बहुमत मिलने और बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनने का दावा करते हुये पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने भारतीय जनता पार्टी के साथ चुनाव पश्चात् गठबंधन करने की संभावना का 200 प्रतिशत खंडन किया है. बसपा प्रमुख के विश्वस्त समझे जाने वाले मिश्रा ने साक्षात्कार में कहा कि बसपा किसी अन्य पार्टी के साथ भी गठबंधन नहीं करेगी.

    उनसे सवाल किया गया कि अगर किसी कारण से बसपा को विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत नही मिलता हैं तो वह क्या गठबंधन के लिये किस पार्टी से हाथ मिलायेंगे या किसी पार्टी को समर्थन देंगे, इस पर उन्होंने कहा कि ''आपका यह सवाल ही बेमानी हैं, बसपा पूर्ण बहुमत से 2022 में सरकार बना रही है, अगर ऐसी कोई नौबत आयी तो हम 200 प्रतिशत भारतीय जनता पार्टी के साथ कभी नहीं जायेंगे और अन्य किसी पार्टी से भी गठबंधन नहीं करेंगे और न ही समर्थन लेंगे. हम विपक्ष में बैठना ज्यादा पसंद करेंगे.''

    अगर बनते हैं त्रिशंकु विधानसभा के हालात तो...
    बसपा के वरिष्ठ नेता का यह दावा इस तरह की अवधारणाओं के बीच आया है कि यदि 2022 के चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा के हालात बने तो बसपा भाजपा के साथ हाथ मिला सकती है. विगत में बसपा ने अलग अलग कार्यकाल में भाजपा और समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनायी थी. बसपा ने 1993 में समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई. 1995 में बसपा सरकार से हट गयी और कुछ महीने बाद भाजपा के समर्थन से मायावती फिर मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद 1997 और 2002 में भी बसपा ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर सरकार बनायी.

    ब्राह्मणों के सहारे सफलता की तैयारी
    पार्टी ने 2007 में दलित-ब्राह्मण समुदाय के समर्थन पर अपने बूते पर पहली बार सरकार बनायी. उसे 403 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें मिलीं. पार्टी इस बार भी राज्य के विभिन्न स्थानों पर ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करवा कर अपनी पुरानी सफलता को दोहराने के प्रयास में जुटी है. राज्य में दलितों की अनुमानित 20 प्रतिशत आबादी है जबकि ब्राह्मणों की आबादी करीब 13 प्रतिशत बतायी जाती है.

    मायावती की अगुवाई में सरकार बनाने का दावा
    मिश्रा ने ब्राह्मण सम्मेलनों को लेकर भाजपा और सपा पर तंज कसते हुये कहा, ''जब बसपा ने प्रबुद्ध विचार गोष्ठी आयोजित कर समाप्त कर दी तो भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी को प्रबुद्ध समाज विशेषकर ब्राह्मणों की याद आयी और इन दोनों पार्टियों ने भी ऐसे सम्मेलन आयोजित करने की घोषणा कर दी. जल्दी ही देखियेगा कि जो बाकी बचे हुये दल हैं वह भी ऐसे सम्मेलनों की घोषणा करेंगे.'' मिश्रा ने दावा किया कि 2022 के उप्र विधानसभा के आम चुनाव में राज्य के 80 प्रतिशत ब्राह्मण, सौ प्रतिशत दलित और भारी संख्या में मुसलमान और पिछड़ा वर्ग उनकी पार्टी को वोट देंगे और मायावती के नेतृत्व में पांचवी बार प्रदेश में सरकार बनायेंगे.

    इशारों-इशारों में ओवैसी पर निशाना
    बसपा महासचिव मिश्रा ने बिना किसी पार्टी का नाम लिये कहा कि ''''यह जो दूसरे प्रदेशों के नेता यहां आकर मुस्लिम समाज को बरगलाने का काम कर रहे हैं, वह कामयाब नहीं हो पायेंगे, क्योंकि प्रदेश का मुसलमान जानता हैं कि कौन उनका अपना हैं और कौन पराया. फिर मुसलमान बहन जी के शासन को देख चुका हैं.'' मिश्रा का इशारा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के असदुदीन ओवैसी की तरफ था जो उप्र विधानसभा चुनाव में 100 सीटें लड़ने की घोषणा कर चुके हैं और उन्होंने अपने चुनावी अभियान की शुरूआत भी कर दी हैं. बसपा नेता ने राज्य में छोटे छोटे राजनीतिक दलों के बारे में कहा कि ''यह छोटे छोटे दल भाजपा द्वारा प्रायोजित हैं और चुनाव के समय एक दम से खड़े हो जाते हैं अपनी जाति बिरादरी का वोट काटने के लिये लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला.''

    निकाले गए नेताओं की घर वापसी संभव नहीं
    मिश्रा से पूछा गया कि क्या अभी हाल में निकाले गये पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की घर वापसी हो सकती हैं तो उन्होंने कहा कि ''पार्टी से धोखा और साजिश करने वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं है. दूसरी पार्टियों के नेता अगर बहुजन समाज पार्टी में आना चाहें तो उनका स्वागत है.'' बहुजन समाज पार्टी द्वारा जुलाई माह में विधानसभा में पार्टी के नेता लाल जी वर्मा और वरिष्ठ नेता राम अचल राजभर को पार्टी से निकाल दिया था. (ndtv.in)

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : This heatwave is not a weather blip
    Editor's Choice : This heatwave is not a weather blip

    -By Sunita Narain

    This heatwave is not a weather blip; illustration: Ritika Bohra

    Searing heat, touching 50 degrees Celsius in the otherwise cold regions of Canada and in the western regions of the United States, has brought home the message — once again and loudly — that climate change is here and is about to get worse.

    The heat was so unbearable and off the charts that it killed an estimated 500 people in Canada’s British Columbia province. Then there are reports of the savage damage it has done to animals and other creatures. The inferno is now adding to the challenge of wildfires, threatening lives and properties.

    Europe is seeing a similar heatwave; it is predicted that this year’s temperatures will be the highest since records have been kept. Yet another year when we have broken the previous year’s heat record! 

    The fact is this heatwave is not incidental or accidental — a mere weather blip. Scientists working with the World Weather Attribution initiative conclude that this heatwave “was virtually impossible” without human-caused climate change. They find that the temperatures were so extreme that they lie outside the range of historically observed heat records. They conclude that the frequency of this once-in-a-thousand-year event would increase with temperature rise, and when the world touches 2°C increase over pre-industrial ages, it would become a five- to 10-year event. 

    What then is clear is this: One, climate change is happening faster than expected and we are certainly unprepared. Two, climate change is a great leveller — extreme and variable rain, increased frequency of tropical cyclones and heat and cold are hitting the world’s poorest. Each event cripples them and makes them even more vulnerable and marginalised. But the rich are also not excluded from this revenge of nature. The death of people from heatwaves in Canada must keep reminding us of the tragedy that awaits everyone.

    Even as I write this, perhaps for the umpteenth time (my readers must forgive me), we have still not seen the writing on the wall. Our actions still do not match our words. The technologies to combat climate change are available — but they require application at a disruptive and transformative scale. This is what we are missing. 

    I say this because every extra day of procrastination will make the task even more difficult. Take the case of rising heat. To adapt and survive, the rich in otherwise temperate regions will now invest more in devices like air conditioners to cool their homes. This will, in turn, add to the energy demand and, given that countries are still fiddling around with fossil fuel-based electricity, it will add to greenhouse gas emissions.

    We know that heating and cooling devices take up the bulk of the power demand in our cities today. In Delhi, research by my colleagues at the Centre for Science and Environment (CSE) shows as soon as the temperature crosses 27-28°C, the cooling demand increases exponentially — electricity demand rises by 190 MW for every degree rise in mercury. With more electricity generation, there will be more emissions, increasing the temperatures even more. The vicious cycle will spiral out of control.

    This direct relationship between heat and energy has another dimension to it — thermal comfort or discomfort. This is not just about temperatures but also about how well-designed and ventilated our living spaces are. This is why even when temperatures are not so high, but there is humidity or lack of air, we feel uncomfortable and “hot”. The fan makes air conditioner more efficient as it evaporates moisture from our bodies.

    It is about cooling but also about design. Just consider how traditional buildings were designed to keep out the heat; by designing for the sun and wind, and not against nature. They used orientation and shades on window — what we now call passive architecture — to ensure that buildings are protected from the glare; they used courtyards and open windows for ventilation. Trees provided shade, as much as other environmental benefits.

    Sadly, modern architecture built on glass facades and closed spaces for air cooling has shunned and dismissed this knowledge as unnecessary and backward.

    Then there is also the fact that more heat will add to water stress — for irrigation, for drinking and for fighting forest fires. As we pump more water from the ground or use electricity for transporting water, we will need more energy — further reinforcing the vicious cycle. This is why we must go back to finding ways of optimising local water resources; harvesting the rain where and when it falls so that we can reduce dependence on pumped- and energy-dense water. 

    In the heating planet, this knowledge of living with extreme heat and cold without increasing the energy footprint of our living spaces and cities will be crucial. So, as much as we need to move away from fossil fuels, we need to make sure we can do much more with much less energy — this is the climate change challenge. The scorched world should teach us this. (downtoearth.org.in)

संपादकीय

  • ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गांवों की छुआ-छूत, महानगरों में अब आर्थिक आधार पर भी
    ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गांवों की छुआ-छूत, महानगरों में अब आर्थिक आधार पर भी

    हिंदुस्तान के सोशल मीडिया पर अभी किसी इमारत में लिफ्ट के बगल में लगाए गए एक नोटिस की तस्वीर घूम रही है जो कि जाहिर तौर पर किसी हिंदी इलाके का है। अगर वह गैर हिंदी इलाके का होता तो अंग्रेजी के साथ किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखा हुआ होता, लेकिन इसमें हिंदी में लिखा हुआ है कि खाना पहुंचाने के लिए आने वाले लोग लिफ्ट से ऊपर नहीं जा सकते उन्हें सीढिय़ों से जाना है। अब आज भारत के महानगरों में रिहायशी इमारतें भी 25-50 मंजिला होने लगी हैं। यह इमारत कितने मंजिल की है यह तो साफ नहीं है लेकिन बंधुआ मजदूर की तरह काम करने वाले, खाना पहुंचाने वाले लोग क्या खाने का बैग टांगकर हर जगह कई मंजिल पैदल चढक़र जा सकते हैं? और फिर एक सवाल यह भी है कि यह किस किस्म का सामंती मिजाज है जो उसी इमारत में लोगों के लिए खाना लेकर आने वाले लोगों को लिफ्ट की बुनियादी सहूलियत देने से मना कर रहा है? यह ठीक वैसा ही हो गया जैसे बड़ी कारों के पार्किंग के अहाते में किसी कोने में भी मोटरसाइकिल को जाने से रोक दिया जाए, या जैसा कि हिंदुस्तान के बहुत से पांच सितारा होटलों में होता है, ऑटो रिक्शा में पहुंचने वाले लोगों को सडक़ पर उतरना पड़ता है, क्योंकि होटल के दरबान ऑटो रिक्शा को होटल के भीतर पोर्च तक जाने नहीं देते।

    जिंदगी में बुनियादी सहूलियत क्या है और ऐशो-आराम की चीजें क्या हैं, इनमें फर्क करना हिंदुस्तान का संपन्न तबका कई बार नहीं कर पाता, या शायद अक्सर नहीं करता। अगर किसी इमारत में वहां बसे हुए लोगों के लिए कोई स्विमिंग पूल बना है, तब तो यह बात हो सकती है कि इमारत में काम करने वाले कर्मचारी उसका इस्तेमाल ना करें। लेकिन वे कर्मचारी लिफ्ट का इस्तेमाल ना करें, कई महानगरों में कई रिहायशी इमारतों में ऐसे नोटिस भी लगे रहते हैं कि काम करने वाले लोग लिफ्ट से ना आए-जाएं। यह सिलसिला समाज के भीतर कमाई के आधार पर एक बहुत ही घटिया किस्म के भेदभाव का है जिसमें इंसानों को इंसान नहीं माना जाता, और जिन लोगों को चर्बी हटाने की जरूरत है वे लोग सीढ़ी से आने-जाने के बजाय लिफ्ट से आते जाते हैं, और जो गरीब मजदूर काम करके वैसे भी थके हुए रहते हैं, उन्हें लिफ्ट में चढऩे को मना कर दिया जाता है। यह बात बताती है कि हिंदुस्तान में किसी छोटे तबके में अतिसंपन्नता तो आ गई है, लेकिन सभ्यता उन्हें छू भी नहीं गई है। दुनिया में जो सभ्य समाज हैं वहां पर इस किस्म का कोई भेदभाव नहीं रहता। कुछ बरस पहले जब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, तो उनकी एक तस्वीर आई थी जिसमें वे राष्ट्रपति भवन के गलियारे में चलते हुए एक सफाई कर्मचारी से हाथ टकराते हुए और उसका अभिवादन करते हुए दिखते हैं। हिंदुस्तान में राष्ट्रपति अगर निकलने को हों तो सफाई कर्मचारी उनके सामने भी शायद नहीं पड़ सकेंगे। कई जगहों पर तो कम तनख्वाह वाले कर्मचारियों को दीवार की तरफ मुंह करके खड़ा रहने के लिए कह दिया जाता है, जब उनके मालिक या कोई ताकतवर व्यक्ति गलियारे से निकलते हैं।

    हिंदुस्तान में मुगल खत्म हो गए, अंग्रेज आकर चले गए, देश में लोकतंत्र आए पौन सदी का वक्त हो गया, लेकिन लोगों का मिजाज अभी तक सामंती बना हुआ है। हर हफ्ते-पखवाड़े में देश में कहीं ना कहीं से किसी नेता की बिगड़ैल औलाद का या खुद नेता का ऐसा वीडियो सामने आता है जिसमें वे कहीं टोल टैक्स कर्मचारी को पीट रहे हैं तो कहीं पेट्रोल पंप कर्मचारी को कहीं ट्रैफिक पुलिस से मारपीट कर रहे हैं तो कहीं किसी और सरकारी कर्मचारी को धमका रहे हैं कि जानते नहीं हो कि मैं कौन हूँ? देश तो आजाद हो गया है लेकिन लोगों के दिमाग में अपनी ताकत और दूसरों की गुलामी की बात इतने गहरे बैठी हुई है कि वह निकलने को तैयार नहीं है। फिर इस देश में जो प्रचलित धर्म है उनमें से अधिकतर में लोगों की बराबरी की कोई गुंजाइश नहीं है। जाति व्यवस्था कायम रहती है, धर्म का अपना ढांचा हावी रहता है। और मजे की बात यह है कि अभी पंजाब में एक दलित सिख को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया है, उस पंजाब में दलित आबादी 30 फ़ीसदी है, इस तरफ भी लोगों का ध्यान नहीं था, उस पंजाब में यह पहला दलित मुख्यमंत्री बना है, यह बात भी लोगों को हैरान कर रही है। यह पूरा सिलसिला लोगों को पहली बार यह जानकारी दे रहा है कि सिखों के बीच भी एक जाति व्यवस्था कायम है वरना गुरुद्वारे में एक साथ बैठकर खाने की परंपरा को देखते हुए पंजाब के बाहर के गैर सिख लोग यह मान बैठे थे कि सिखों में कोई जाति व्यवस्था है ही नहीं।

    भारत में अब जाति व्यवस्था बड़े शहरों में कुछ हद तक घट रही है, तो वहां पर गरीब कामगार और अमीर मालिक के बीच की एक नई व्यवस्था कायम हो रही है जिसमें कुछ लोग खाना पहुंचाने वाले लोगों से मारपीट भी करते दिखते हैं, और जैसा कि यह नोटिस कई इमारतों में लगा हुआ है, उससे भी जाहिर है कि उनकी सेवा करने वाले लोगों को भी लोग इंसान का दर्जा देने से इनकार करते हैं। अगर सफाई कर्मचारी कूड़े का या गंदगी का कोई डिब्बा लेकर लिफ्ट में साथ में जाए, तो भी हो सकता है कि एक बार लोगों को वह खटके, लेकिन बैग में बंद खाना लेकर अगर कोई कर्मचारी लिफ्ट से जा रहा है, तो उसमें भी लोगों को आपत्ति है, जो कि जाहिर तौर पर उस व्यक्ति के गरीब होने को लेकर है कि इतना गरीब कामगार कैसे उसी लिफ्ट में सवार होकर जा सकता है, जिसमें कि महंगे फ्लैट के मालिक ऊपर-नीचे आते-जाते हैं। हमारा ख्याल है कि चाहे ये रिहायशी इमारतें निजी क्यों न हों, ऐसे नोटिस के खिलाफ उन प्रदेशों के मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी करना चाहिए, और ऐसे प्रतिबंध को गैरकानूनी करार देना चाहिए क्योंकि किसी से ऐसी मेहनत करवाना जिसकी कि कोई जरूरत नहीं है, और जो बिल्डिंग में कानूनी रूप से लगाई जाने वाली अनिवार्य सहूलियत हैं, उनके इस्तेमाल से लोगों को रोकने के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
    (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

सेहत-फिटनेस

  • 'बॉडी क्लॉक' के कारण अस्थमा के मरीज की रात में बिगड़ जाती है हालत
    'बॉडी क्लॉक' के कारण अस्थमा के मरीज की रात में बिगड़ जाती है हालत

    Body Clock: अस्थमा के मरीजों की हालत अक्सर रात में क्यों बिगड़ जाती है? माना जाता है कि सोते समय अन्य शारीरिक गतिविधियों के कारण रात में यह दिक्कत बढ़ती है. हालांकि, यह पूरा सच नहीं है. दैनिक जागरण में छपी ख़बर के अनुसार, अमेरिका के ब्रिघम और वूमन हॉस्पिटल और ओरेगॉन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दो सर्कैडियन प्रोटोकॉल का यूज करते हुए सर्कैडियन सिस्टम यानी बॉडी क्लॉक की भूमिका का पता लगाया है. रिसर्च का रिजल्ट द प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

    कैसे प्रभाव डालता है सर्कैडियन सिस्टम (बॉडी क्लॉक)?
    सर्कैडियन सिस्टम या बॉडी क्लॉक टाइम और डेली रूटीन के हिसाब से शरीर के विभिन्न हिस्सों को लूज (शिथिल) बनाता है. अस्थमा के 17 मरीजों पर किए गए टेस्ट में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन लोगों का सर्कैडियन सिस्टम रात में उनके फेंफड़ों को ज्यादा लूज कर देता है, उनमें अस्थमा के अटैक का खतरा ज्यादा रहता है. सर्कैडियन सिस्टम में किसी खामी के कारण दिन के किसी अन्य समय पर भी अस्थमा का खतरा बढ़ सकता है.

    अस्थमा से पीड़ित 75 प्रतिशत लोग रात में अस्थमा की गंभीरता का अनुभव करते हैं. एक्सरसाइज, एयर टेंप्रेचर, पोश्चर और नींद के साथ-साथ कई बिहेवियर भी अस्थमा की सीरीयस कंडीशन का कारण बन जाते हैं. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस हालिया रिसर्च के नतीजे अस्थमा के इलाज का नया रास्ता खोलने में सहायक हो सकते हैं.

    रिसर्च में क्या आया सामने
    ओरेगन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑक्यूपेशनल हेल्थ साइंसेज के प्रोफेसर और निदेशक संबंधित सह- लेखक स्टीवन ए शी (Steven A. Shea) ने कहा, “हमने देखा कि जिन लोगों को सामान्य रूप से सबसे खराब अस्थमा है, उनको रात में पल्मोनरी फंक्शन में सबसे बड़ी सर्कैडियन-प्रेरित ड्रॉप्स से परेशानी होती है. उन लोगों की स्लीप साइकिल में भी बड़े बदलाव थे. हमने यह भी पाया कि ये परिणाम मेडिकल रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जब लैब में स्टडी की गई, तब लक्षण वाले ब्रोन्कोडायलेटर इनहेलर का यूज रात के दौरान दिन की तुलना में चार गुना अधिक था.”

    घड़ी जैसा सर्कैडियन सिस्टम
    दिमाग का एक खास हिस्सा सर्कैडियन सिस्टम को कंट्रोल करता है. दिन के समय के हिसाब से शरीर की गतिविधियों को निर्धारित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. व्यक्ति की दिनचर्या के हिसाब से किसी निश्चित समय पर भूख या नींद इसी कारण लगती है. (news18.com)

मनोरंजन

  • 'इंडियाज गॉट टैलेंट' जज करेंगी शिल्पा शेट्टी
    'इंडियाज गॉट टैलेंट' जज करेंगी शिल्पा शेट्टी

    मुंबई, 21 सितम्बर | अभिनेत्री-उद्यमी शिल्पा शेट्टी प्रतिभा आधारित शो 'इंडियाज गॉट टैलेंट' में जज के रूप में नजर आएंगी। उनका कहना है कि देश प्रतिभा से भरा हुआ है। शिल्पा ने कहा कि 'इंडियाज गॉट टैलेंट' एक ऐसा शो है जिसे मैंने वर्षों से देखा है। इसलिए स्वाभाविक रूप से, मैं शो के जज पैनल में शामिल होने के लिए रोमांचित हूं।

    उन्होंने कहा कि यह पहली बार है जब मैं एक रियलिटी शो को जज कर रही हूं जो न केवल नृत्य पर आधारित है, बल्कि विविध प्रकार के कौशल पर आधारित है। भारत प्रतिभाओं से भरा देश है और मुझे सुर्खियों में आने वाले लोगों में से एक होने की खुशी है।

    शिल्पा को 'सुपर डांसर', 'नच बलिए' और 'जरा नचके दिखा' जैसे विभिन्न डांस-आधारित रियलिटी शो में जज के रूप में देखा गया है।(आईएएनएस)

खेल

  • महिला क्रिकेट : रेचल की शानदार पारी से ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 9 विकेट से हराया
    महिला क्रिकेट : रेचल की शानदार पारी से ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 9 विकेट से हराया

     मकाय, 21 सितम्बर | डार्सी ब्राउन (4/33) की शानदार गेंदबाजी के बाद रेचल हेन्स (नाबाद 93) और एलिसा हेली (77) की बेहतरीन पारी के दम पर ऑस्ट्रेलिया की महिला टीम ने यहां हारुप पार्क में खेले गए पहले वनडे मुकाबले में भारतीय महिला टीम को नौ विकेट से हराकर तीन मैचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त बनाई। ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी का फैसला किया और भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए कप्तान मिताली राज के 107 गेंदों पर तीन चौकों की मदद से 61 रन की पारी के दम पर 50 ओवर में आठ विकेट पर 225 रन बनाए। लक्ष्य का पीछा करने उतरी ऑस्ट्रेलिया की टीम ने 41 ओवर में एक विकेट पर 227 रन बनाकर मैच अपने नाम किया।

    ब्राउन को उनकी शानदार गेंदबाजी के लिए प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया।

    भारत की ओर से पूनम यादव ने एकमात्र विकेट लिया। लक्ष्य का पीछा करने उतरी ऑस्ट्रेलिया टीम को रेचल और हेली ने बेहतरीन शुरूआत दिलाई और पहले विकेट के लिए 126 रनों की बड़ी साझेदारी की। इस साझेदारी को पूनम ने हेली को आउट कर तोड़ा। हेली ने 77 गेंदों पर आठ चौकों और दो छक्कों के सहारे 77 रन बनाए।

    पहला विकेट गिरने के बाद रेचल ने कप्तान मेग लेनिंग के साथ पारी आगे बढ़ाई और दोनों बल्लेबाजों ने दूसरे विकेट के लिए 101 रनों की अविजित साझेदारी कर टीम को बड़ी जीत दिलाई। ऑस्ट्रेलिया की पारी में रेचल 100 गेंदों पर सात चौकों की मदद से नाबाद 93 और लेनिंग 69 गेंदों पर सात चौकों के सहारे 53 रन बनाकर नाबाद रहीं।

    इससे पहले, भारत की शुरूआत कुछ खास नहीं रही और उसने शैफाली वर्मा (8) और स्मृति मंधाना (16) के विकेट जल्द गंवाए। फिर यास्तिका भाटिया ने मिताली के साथ भारतीय पारी को संभाला और दोनों बल्लेबाजों ने तीसरे विकेट के लिए 77 रन जोड़े। हालांकि, यस्तिका के आउट होने के साथ ही इस साझेदारी का अंत हो गया। यास्तिका ने 51 गेंदों पर दो चौकों की मदद से 35 रन बनाए।

    नए बल्लेबाज के रूप में उतरीं दीप्ति शर्मा (9) रन बनाकर पवेलियन लौटीं जबकि अर्धशतक जड़ने के बाद मिताली ज्यादा देर अपनी पारी नहीं बढ़ा सकीं और पांचवें बल्लेबाज के रूप में आउट हुईं। मिताली के आउट होने के बाद पूजा वस्त्राकर (17) और स्नेह राणा (2) के विकेट गंवाए।

    अंत में ऋचा घोष ने झूलन गोस्वामी के साथ मिलकर आठवें विकेट के लिए 45 रनों की साझेदारी की और टीम का स्कोर 200 के पार पहुंचाया। लेकिन गोस्वामी के आउट होने के साथ ही इस साझेदारी का अंत हो गया। गोस्वामी 24 गेंदों पर एक चौके और एक छक्के की मदद से 20 रन बनाकर आउट हुईं जबकि ऋचा 29 गेंदों पर तीन चौकों और एक छक्के की मदद से 32 और मेघना सिंह एक रन बनाकर नाबाद रहीं।

    ऑस्ट्रेलिया की ओर से ब्राउन के अलावा सोफी मोलिनेउक्स और हनाह डार्लिगटन को दो-दो विकेट मिले।

    दोनों टीमों के बीच दूसरा वनडे मैच इसी मैदान पर शुक्रवार को खेला जाएगा। (आईएएनएस)

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  • पीयूष गोयल से एमेजॉन और फ्लिपकार्ट के खिलाफ फ़ास्ट ट्रैक जांच का कैट का आग्रह
    पीयूष गोयल से एमेजॉन और फ्लिपकार्ट के खिलाफ फ़ास्ट ट्रैक जांच का कैट का आग्रह

    रायपुर, 21 सितंबर। एमेजॉन और फ्लिपकार्ट के खिलाफ सीसीआई जांच को फास्ट ट्रैक मोड में करने का आग्रह करते हुए कैट ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को भेजे एक पत्र में उनसे कहा कि न्याय की दृष्टि से वो सीसीआई को अमेज़ॉन एवं फ्लिपकार्ट के खिलाफ चल रही जांच को फ़ास्ट ट्रैक मोड पर करने का निर्देश दें। 

    कैट एवं दिल्ली व्यापार महासंघ ने सीसीआई में इन दोनों कंपनियों के खिलाफ अनेक शिकायतें दजऱ् की हुई हैं, जिन पर सीसीआई ने जांच का आदेश दिया हुआ है। कैट ने कहा है कि जांच में लम्बा समय लगने से दोनों ई-टेलर्स को जंच से सम्बंधित रिकॉर्ड में हेरा फैरी करने और सबूतों के साथ छेद छाड़ करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा जिससे न्याय में देरी-न्याय से इनकार की कहावत सिद्ध हो सकती है।

     कैट ने यह भी कहा कि यह  मामला लगभग दो साल से लटका हुआ  है और जांच की कोई भी धीमी प्रक्रिया जांच के उद्देश्य को ही खत्म कर देगी। इस मामले को कैट ने सितंबर, 2019 में वाणिज्य मंत्रालय के साथ उठाया था। उधर दूसरी तरफ कैट ने श्री गोयल, जो उपभोक्ता मामलों के मंत्री भी हैं, से उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय द्वारा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तावित ई कॉमर्स नियमों को तुरंत लागू करने का आग्रह भी किया है वहीं  केंद्र सरकार द्वारा ई कॉमर्स नीति को भी जल्द से जल्द लागू करने का भी आग्रह किया है।

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