कोरोना वाइरस

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Maharashtra / 1808550 Karnataka / 881086 Andhra Pradesh / 866438 Tamil Nadu / 777616 Uttar Pradesh / 537747 Kerala / 587708 Delhi / 556744 West Bengal / 473987 Odisha / 317239 Telangana / 267665 Bihar / 233840 Rajasthan / 260040 Assam / 212320 Chhattisgarh / 232835 Haryana / 228746 Gujarat / 205116 Madhya Pradesh / 201597 Punjab / 150086 Jharkhand / 108577 Jammu and Kashmir / 108871 Uttarakhand / 73527 Goa / 47491 Puducherry / 36856 Tripura / 32607 Himachal Pradesh / 38327 Manipur / 24514 Arunachal Pradesh / 16231 Chandigarh / 17157 Meghalaya / 11633 Nagaland / 11091 Ladakh / 8272 Andaman and Nicobar Islands / 4689 Sikkim / 4908 Dadra and Nagar Haveli and Daman and Diu / 3325 Mizoram / 3788 State Unassigned / 0 Lakshadweep / 0

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  • ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसोनारो ने कहा-'नहीं लगवाउंगा वैक्सीन, यह मेरा अधिकार'
    ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसोनारो ने कहा-'नहीं लगवाउंगा वैक्सीन, यह मेरा अधिकार'

    ब्रासीलिया, 27 नवम्बर | कोरोना वायरस के कहर से जूझ रही दुनिया में एक ओर वैक्सीन का इंतजार किया जा रहा है. वहीं, दूसरी ओर ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोलसोनारो ने वैक्सीन पर अविश्वास जताया है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, बोलसोनारो ने गुरुवार को कहा है कि वह वैक्सीन नहीं लेंगे. इतना ही नहीं उन्होंने संक्रमण को रोकने के लिए जारी वैक्सीन प्रोग्राम पर भी सवाल उठाए हैं. खास बात है कि कोरोना वायरस से मौतों के मामले में ब्राजील दूसरे नंबर का देश है.

    जुलाई में खुद कोविड-19 बीमारी का शिकार हो चुके ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोलसोनारो का कहना है 'मैं आपसे कह रहा हूं, मैं इसे नहीं लेने वाला हूं. यह मेरा हक है.' बोलसोनारो ने इसके अलावा कोरोना महामारी को लेकर और भी कई अजीब बातें कहीं हैं. उन्होंने मास्क की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए. जबकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और सेंटर्स फॉर डिसीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल (CDC) जैसी अंतरराष्ट्रीय हेल्थ एजेंसियां लगातार मास्क पहनने को बढ़ावा देने की बात कह रही हैं.

    ब्राजील के लोगों को नहीं है टीका लगाने की जरूरत

    एक ओर दुनिया वैक्सीन ट्रायल के सफल होने और उपलब्ध होने की तैयारियों में लगी हुई है. वहीं, बोलसोनारो ने ब्राजील में वैक्सीन की जरूरत से ही इनकार किया है. ब्राजील के राष्ट्रपति बार-बार कह रहे हैं कि बड़े स्तर पर वैक्सीन उपलब्ध होने के बाद ब्राजील के लोगों को वैक्सीन लगाने की जरूरत नहीं है. इतना ही नहीं, बीते अक्टूबर में उन्होंने ट्विटर के जरिए वैक्सीन प्रक्रिया का मजाक भी उड़ाया था. उन्होंने तब कहा था कि वैक्सीन की जरूरत केवल उनके कुत्ते के लिए है.

    जुलाई में बोलसोनारो कोरोना पॉजिटिव हो गए थे. उन्होंने तब कहा था, 'डरने की कोई बात नहीं है, यह लाइफ है, जीवन चलता रहता है. मैं अपनी जिंदगी के लिए भगवान का धन्यवाद करता हूं और उन्होंने जो मुझे काम दिया है, उससे ब्राजील जैसे महान देश का भविष्य तय होगा.' वर्ल्डोमीटर के मुताबिक ब्राजील में कोरोना वायरस के अब तक 62 लाख 04 हजार 570 मामले सामने आ चुके हैं. वहीं, 1 लाख 71 हजार 497 लोगों की जान जा चुकी है. मौतों के मामले में ब्राजील, अमेरिका के बाद दूसरा देश है.

    अमेरिकी राष्ट्रपति कोरोना वैक्सीन के लिए तैयार

    इससे उलट अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप देश के नागरिकों को वैक्सीन मुहैया कराने के लिए तैयार हैं. उन्होंने हाल ही में थैंक्सगिविंग के मौके पर कहा कि वैक्सीन की डिलीवरी अगले हफ्ते से शुरू हो जाएगी. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि वैक्सीन पहले फ्रंटलाइन वर्कर्स और वरिष्ठ नागरिकों को लगाई जाएगी.(https://hindi.news18.com/)

राष्ट्रीय

  • बीजेपी ने बिहार से सुशील कुमार मोदी को दिया राज्यसभा का टिकट
    बीजेपी ने बिहार से सुशील कुमार मोदी को दिया राज्यसभा का टिकट

    नई दिल्ली, 27 नवंबर | बिहार की नई एनडीए सरकार में इस बार उप मुख्यमंत्री बनने से चूके सुशील मोदी को भाजपा ने राज्यसभा भेजने की तैयारी की है। केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के निधन से खाली हुई राज्यसभा सीट से भाजपा ने उन्हें टिकट दिया है। संख्या बल को देखते हुए सुशील मोदी का चुना जाना तय माना जा रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने बताया कि, "पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने बिहार में होने वाले राज्यसभा उपचुनाव के लिए सुशील कुमार मोदी के नाम पर मुहर लगाई है। बिहार की इस एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए तीन दिसंबर तक नामांकन होगा। वहीं 14 दिसंबर को चुनाव होगा।"


    भाजपा ने लोक जनशक्ति पार्टी को यह सीट एक समझौते के तहत दी थी। जिसके बाद इस सीट से राम विलास पासवान राज्यसभा पहुंचे थे। राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने बिहार में इस बार एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा। जिसके कारण भाजपा ने इस बार इस सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा है।(आईएएनएस)

राजनीति

  • कांग्रेस में जी.वी. हर्षकुमार की हुई वापसी
    कांग्रेस में जी.वी. हर्षकुमार की हुई वापसी

    शैरोन थम्बाला 
    अमरावती, 27 नवंबर|
    ऐसे समय में जब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, राजमुंदरी के पूर्व सांसद हाल ही में पार्टी में फिर से शामिल हो गए।

    अमालपुरम के पूर्व सांसद 61 साल के हर्ष कुमार केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी, आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष शैलजानाथ, तेलंगाना कांग्रेस के नेता वी. हनुमंत राव की उपस्थिति में दूसरी बार कांग्रेस में शामिल हुए और गांधी परिवार के प्रति अपनी निष्ठा जताई।

    उन्होंने पार्टी में वापसी के दौरान कहा, "मैं कांग्रेस का प्रॉडिगल बेटा हूं। यह सच है और पार्टी ने मुझे ऐसे अपनाया जैसे वह प्रॉडिकल बेटे का पिता हो।"

    उन्होंने कहा कि सुलह में राव ने सक्रिय भूमिका निभाई है, इसके बाद राजू ने भी उनके प्रति बहुत प्यार दिखाया, जो राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं।

    अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के दो बार के सांसद ने कहा, "कोप्पुला राजू, मैं उनके प्यार को नहीं भूल सकता। उनके प्रोत्साहन से मैं पार्टी में वापस आ सका।"

    कुमार के अनुसार, 2014 में कांग्रेस के सत्ता गंवाने के बाद, देश में गरीब लोग मुश्किलों से गुजर रहे हैं।

    कुमार आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई.एस. रेड्डी की विरासत को कमजोर करने के लिए राव के साथ कांग्रेस के पहले व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने अपनी लंबी पदयात्रा के साथ राज्य में कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    इसके बाद, 2 सितंबर, 2009 के बाद, जब रेड्डी की एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई, तो कुमार ने दावा किया कि उन्होंने रेड्डी की फोटो के साथ नहीं बल्कि सोनिया गांधी की तस्वीर के साथ अमलापुरम संसदीय चुनाव जीता था।

    बाद में कुमार जयसमैक्यआंध्र पार्टी में शामिल हो गए।

    हालांकि, तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने 2014 के चुनावों में कुमार की तरह कई उम्मीदवारों को हराते हुए जीत हासिल की।

    2019 चुनावों से पहले, कुमार ने फिर से पार्टी बदल ली और तेदेपा में शामिल हो गए। कुमार ने नारा चंद्रबाबू नायडू के पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया।

    हालांकि वह 2019 के चुनाव में तेदेपा के टिकट के लिए आतुर थे लेकिन नायडू ने उनका साथ नहीं दिया।

    2019 के चुनाव के लगभग डेढ़ साल बाद, कुमार ने कांग्रेस में वापस आने का मन बना लिया और आखिरकार घर वापसी कर ली।(आईएएनएस)

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : Biden’s transformational challenge
    Editor's Choice : Biden’s transformational challenge

    Though the US is no longer addicted to coal, it is completely sold on the idea of cheap energy, writes Sunita Narain

    -Sunita Narain

    It’s time to exhale. Donald Trump is now a former US president. President-elect Joe Biden and his vice president-elect, Kamala Harris, have stated they will rejoin the Paris Agreement on climate change.

    So denial of this existential threat to the Planet is now past. And we can move decisively on actions. Or, so we hope.

    This is where we need a dose of realism. I am not undermining the Biden-Harris triumph, but reminding us of the troubled paths ahead. The world is hurtling down to a climate change-led catastrophe. We cannot afford coy and small answers.

    This is where introspection of the Biden-Harris victory must start. The fact is they won, but Trumpism did not lose. What is shocking to most of us, watching from the outside, is that close to half of America voted for him.

    He got more votes in 2020 than in 2016, notwithstanding his failure in managing the uncontrolled pandemic, his rejection of climate change and his exacerbation of race and gender conflicts. We need to remember this.

    The United States is a divided nation and the deep rift has its foundations on what nearly half of the American people want. You can say Biden-Harris won because they said they would control the virus; they would listen to scientific advice on the need to wear masks; and, impose lockdowns when necessary.

    But it is also a fact that people voted for Trump because they did not want any of these. They believe the economy is more important than the virus. You can argue that the virus does not discriminate, but it hits poor people more. But they are not listening.

    Let’s also be clear that, more than ever before, this US election had climate change denial or action on the ballot. It was an issue that was on the table — Trump made sure of that. He was belligerent about his opposition to this “fake” science.

    He swore by coal and, more importantly, he pushed his country to manufacture more: made in the USA was his slogan. Pushing against climate change — in spite of the terrible fires and hurricane damages — was his way of putting the economy above everything else. His people saw this.

    We need to take off our rose-tinted glasses that shows ‘all is well’. The US has always been a renegade nation as far as climate action is concerned — the abysmally insignificant targets it has set for itself under the Paris Agreement are a testimony to this.

    It is of course another matter that Biden-Harris will, at least, do something and not work against action. But this is only because Trumpism took us down to depths that we never imagined before.

    It is also a fact that Trump is right (and completely wrong) on one thing. He says his country’s energy emissions were lowest during his term; this is right. The US energy sector’s emissions declined by a massive 30 per cent in the past decade.

    The shift was primarily because market factors moved the power sector away from coal to shale and natural gas. In the last year alone, coal-fired power generation fell by 18 per cent, according to data from private research firm, Rhodium Group. This is where the good news ends.

    The fact is that cheap shale gas took off where coal left — and it left behind the renewable energy surge as the cost of gas has fallen to a record low.

    It is no wonder then that Biden has strayed off the New Green Deal agenda of his deputy to argue that he will not stop fracking of gas on private lands, where the bulk of the gas is found.


    The bigger problem is that other sectors of the US economy are now reversing gains made from the transition from polluting coal. The transportation sector has overtaken energy emissions and industrial sector emissions have grown.

    The bottom line is that even though US emissions fell by some 2 per cent in 2019 and there was a cumulative decline of 12.3 per cent on its 2005 baseline, the country is still way off the mark to meet its targets.

    By the Copenhagen Accord target it signed, the US agreed to be 17 per cent below 2005 levels by the end of 2020; and as per the Paris Agreement, 26-28 per cent below 2005 levels by 2025. In fact, net US greenhouse gas emissions in 2019 were higher than at the end of 2016 — the beginning of the Trump presidency.

    What should concern us is that further decline will be hard. This is not only because of the increase in Trump’s vote share; it is because there are no easy answers for rapid and transformational emission cuts in the country.

    Though the US is no longer addicted to coal; it is completely sold on the idea of cheap energy. It also wants to reclaim its role as the economic powerhouse — take back its position from China.

    This will mean burning more fuel for industrial growth and using more energy that will negate all the gains of cleaner fuels. This, when we need transformational answers. So, let’s not kid ourselves that all will be well now that Biden-Harris are in power. We need to push more and force them to run, and not walk, the talk. (downtoearth.org.in)

संपादकीय

  • ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किसान आंदोलन पर क्यों  है केन्द्र का यह रूख ?
    ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : किसान आंदोलन पर क्यों है केन्द्र का यह रूख ?

    दिल्ली के आसपास ही कई प्रदेशों से किसान देश की राजधानी पहुंच रहे हैं। वे केन्द्र सरकार के बनाए हुए किसान कानूनों के खिलाफ लंबा डेरा डालने की तैयारी से दिल्ली आ रहे हैं। लेकिन पिछले डेढ़-दो दिनों से उन्हें हरियाणा और यूपी में वहां की भाजपा सरकारों द्वारा जिस तरह से रोकने की खबरें आ रही हैं, वे हैरान करने वाली हैं। एक तरफ तो उत्तर भारत अभूतपूर्व ठंड की चपेट में हैं, दूसरी तरफ किसानों को रोकने के लिए पानी की तोप से धार मारकर उन्हें पीछे किया जा रहा है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी पोस्ट किया है कि इसके लिए टैंकरों में भरकर नालों का पानी लाया गया है ताकि उससे भीगे हुए किसान और न ठहर सकें। लेकिन पंजाब के किसानों के साथ महिलाएं भी आई हैं, और लंगर का लंबा इंतजाम रखा गया है। किसानों की भीड़ अब तक सरकारी जुल्म के सामने भी शांत बनी हुई है, और बहुत से ऐसे फोटो-वीडियो तैर रहे हैं जिनमें वहां तैनात पुलिसवालों को भी खाना-पानी किसान ही बांट रहे हैं। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर दशकों पहले की वे तस्वीरें पोस्ट की हैं जब किसानों के एक सबसे बड़े नेता टिकैत ने दिल्ली में किसानों की सभा की थी, उसमें पांच लाख लोग जुटे थे, और उस वक्त की केन्द्र सरकार ने उस सभा को रोकने की कोई कोशिश नहीं की थी। आज लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जय किसान को रोकने के लिए जय जवान तैनात करके मोदी सरकार क्या साबित कर रही है? यह बात इसलिए भी उठ रही है कि राज्यों की पुलिस के साथ-साथ केन्द्रीय सुरक्षाबलों के जवान भी किसानों को रोकने के लिए तैनात किए गए हैं।

    केन्द्र सरकार ने किसानों से तीन दिसंबर को बात करने की बात कही है। लेकिन बहुत से लोगों ने यह सवाल उठाया है कि किसानों को जितने खराब तरीके से, और पुलिसिया हिंसा से रोका जा रहा है, यह बातचीत करने वाली सरकार का रूख नहीं है। लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर केन्द्र सरकार को तीन दिसंबर को बात करनी ही है, तो अभी क्यों नहीं कर सकती? ऐसे बहुत से सवाल हैं जिनके आसान जवाब नहीं हैं। 

    यह भी बड़ी अजीब सी नौबत है कि पंजाब में भाजपा को छोड़ बाकी तमाम पार्टियां किसानों के आंदोलन के साथ हैं। भाजपा के एक सबसे पुराने गठबंधन-साथी अकाली दल, ने किसान कानूनों का ही विरोध करते हुए एनडीए गठबंधन से रिश्ता तोड़ा था, आज अकाली दल पूरी तरह किसानों के साथ खड़ा है, और पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी भी किसानों से बातचीत करने के लिए केन्द्र सरकार से बार-बार कह रही है। पंजाब में चुनावी जीत न पाने वाली आम आदमी पार्टी भी किसानों के साथ दिख रही है क्योंकि दिल्ली में उसकी सरकार ने पुलिस को स्टेडियम देने से मना कर दिया है जहां वह खुली जेल बनाना चाहती है। मोदी सरकार के छह बरसों में भाजपा के दो सबसे पुराने साथी-दल अलग हो गए हैं, महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा से खासी दूर चली गई है, और किसानों के मुद्दे पर अकाली दल अलग हो गया है। किसानों के बारे में केन्द्र सरकार के बनाए गए तीन कानूनों पर सत्तारूढ़ लोगों को छोडक़र किसी का भरोसा नहीं दिख रहा है, और लोगों के बीच यह आम धारणा है कि इनसे किसान बड़ी कंपनियों के हाथों का खेतिहर-मजदूर बनकर रह जाएगा, और हिन्दुस्तान की खेती कार्पोरेट सेक्टर के हाथों चली जाएगी। कुल मिलाकर केन्द्र के इन कानूनों के खिलाफ पूरे देश से इतने अधिक दल एकजुट हो गए हैं कि कई परस्पर विरोधी दल भी इस मुद्दे पर किसानों के साथ हैं।

    कहां तो एक तरफ मोदी सरकार किसानों की कमाई को दोगुना करने का दावा कर रही थी, और कहां आज देश भर में किसानों का रहा-सहा भरोसा भी मोदी सरकार से उठ गया दिखता है। आज जिस तरह महीनों के रेल रोको आंदोलन के बाद पंजाब के किसान दिल्ली पहुंच रहे हैं, बाकी देश भर में जगह-जगह किसान संगठन अपने-अपने तरीके से आंदोलन कर रहे हैं, वह किसी भी केन्द्र सरकार के लिए बड़ी फिक्र की बात होनी थी। लेकिन दो चीजें हैं जो मोदी सरकार को किसी भी फिक्र से अछूता रख रही हैं। एक तो यह कि संसद में उसके पास किसी भी कानून को बनाने के लिए अपार बाहुबल है, और तमाम गैरएनडीए पार्टियां मिलकर एक भी हो जाएं, तो भी वे केन्द्र सरकार का कोई प्रस्ताव नहीं रोक सकतीं, अब तो बिना बहस महज ध्वनिमत से ही संसद में कानून बन जा रहे हैं। दूसरी बात यह कि तमाम नकारात्मक चर्चाओं के बीच भी, सरकार की बड़ी आलोचना के बीच भी देश में जब चुनाव होते हैं, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में या तो भाजपा और उसके गठबंधन-साथी वोटरों के वोट से चुनाव जीत जाते हैं, या फिर वे दूसरी पार्टियों के विधायकों के वोट से सरकार बना लेते हैं। ऐसे सिलसिले के चलते हुए भला किसको किसानों, या किसी दूसरे तबके की फिक्र हो सकती है? लोकतंत्र में इतनी बेफिक्री किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी, गठबंधन, या नेता को तानाशाह बना सकती है, उसे लोगों को अनसुना करने की आदत हो सकती है, और किसानों के मामले में, कई दूसरे मामलों में, केन्द्र सरकार का ऐसा ही रूख दिख भी रहा है। अपने दूसरे कार्यकाल में केन्द्र सरकार का ऐसा रूख देश के अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन के भी खिलाफ है क्योंकि सरकार को जनता के मुद्दों पर गौर करना अब जरूरी नहीं रह गया है। भारत जैसे निर्वाचित लोकतंत्र में सत्तारूढ़ पार्टी की बड़ी फिक्र सत्ता पर दुबारा जीतकर आना रहती है। लेकिन यहां ऐसी कोई फिक्र चुनावों को लेकर नहीं हैं क्योंकि पिछले छह बरस में देश ने केन्द्र सरकार के बहुत से ऐसे फैसले देखे जिनकी वजह से एनडीए को आम चुनाव या प्रदेशों का चुनाव हारने का खतरा हो सकता था, लेकिन केन्द्र के फैसलों से आहत लोग भी जब मोदी के नाम पर वोट देने को टूट पड़ते हैं, तो फिर केन्द्र सरकार किसी मुद्दे की परवाह क्यों करे? इसकी ताजी मिसाल अभी बिहार में सामने आई जहां पूरे देश से तकलीफ में बिहार पैदल लौटने वाले मजदूरों ने भी कुछ इस अंदाज में दौड़-दौडक़र मोदी के नाम पर वोट दिया कि वे लॉकडाऊन की वजह से घर नहीं लौट रहे थे, वे चुनाव के पहले लौटकर मोदी को वोट देने पोलिंग बूथ पर कतार में लगने की हड़बड़ी में थे। यह एक बहुत रहस्यमय करिश्मा है, और इसके चलते हुए ही केन्द्र सरकार किसी भी मुद्दे की अनदेखी करने की हालत में है। फिलहाल किसानों का मुद्दा दिल्ली के इर्द-गिर्द के राज्यों से आगे बढक़र बाकी देश में कितना चल सकता है यह देखने की बात है। किसानों के साथ भाजपा-राज्यों की पुलिस जो बर्ताव कर रही है, वह बहुत ही खराब है, और उसे लोकतंत्र में बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

सेहत-फिटनेस

  • विश्व एंटीमाइक्रोबियल जागरूकता सप्ताह: बेहतर से बेहतर दवाएं भी नहीं आएंगी काम
    विश्व एंटीमाइक्रोबियल जागरूकता सप्ताह: बेहतर से बेहतर दवाएं भी नहीं आएंगी काम

    एफएओ के मुताबिक एंटीबायोटिक सहित एंटीमाइक्रोबियल दवाओं का लम्बे समय से इस्तेमाल किया जा रहा है और उनका गलत इस्तेमाल भी हो रहा है

    दुनिया में बेहतर से बेहतर दवाएं उपलब्ध होने के बावजूद विभिन्न संक्रमण से लोगों, पशुओं और पौधों की मौत हो रही है, क्योंकि सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक क्षमता (एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस) बढ़ती जा रही है। विश्व एंटीमाइक्रोबियल जागरूकता सप्ताह के मौके संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ओर से जारी एक बयान में यह बात कही है।

    एफएओ के मुताबिक एंटीबायोटिक सहित एंटीमाइक्रोबियल दवाओं का लम्बे समय से इस्तेमाल किया जा रहा है और उनका गलत इस्तेमाल भी हो रहा है, जिससे सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक क्षमता का तेजी से फैलाव हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार बैक्टीरिया संक्रमणों की रोकथाम और उनका उपचार करने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें एंटीमाइक्रोबियल के तहत ही शामिल किया जाता है।

    संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी का कहना है कि इंसान व जानवरों की बजाय बैक्टीरिया में सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक (एएमआर) क्षमता विकसित हुई है और वे बैक्टीरिया लोगों व जानवरों को संक्रमित कर सकते हैं। ऐसे बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण पर काबू पाना और उपचार करना अन्य बैक्टीरिया की तुलना में मुश्किल होता है।

    एफएओ का कहना है कि अगर इस समस्या से नहीं निपटा गया तो एएमआर के कारण करोड़ों लोग चरम गरीबी, भुखमरी और कुपोषण का शिकार हो सकते हैं।

    डब्ल्यूएचओ का कहना है कि एएमआर की वजह से सामान्य संक्रमण का इलाज भी मुश्किल हो जाता है और बीमारी के फैलने, उसके गंभीर रूप धारण करने या मौत होने का खतरा बढ़ जाता है।

    बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद या परजीवी में समय के साथ आने वाले बदलाव और दवाओं का उन पर असर न होने की वजह से सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह वैश्विक स्वास्थ्य और विकास के लिए एक बड़ा बनता जा रहा है। इंसान, पशुओं और खेती में दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल और स्वच्छ पानी व साफ-सफाई की कमी से दुनिया भर में एएमआर का जोखिम बढ़ा है।

    एफएओ के मुताबिक एएमआर नियामकों और निरीक्षण की कमी के कारण एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल बढ़ रहा है और डॉक्टरी नुस्खे के बिना और ऑनलाइन बिक्री के कारण खराब गुणवत्ता व फर्जी उत्पादों का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है।

    यूएन की स्वास्थ्य एजेंसी ने एएमआर को उन 10 सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों की सूची में शामिल किया है, जो मानवता के समक्ष चुनौती के रूप में मौजूद हैं। इससे वैश्विक स्वास्थ्य, विकास, सतत विकास लक्ष्यों और अर्थव्यवस्था पर खासा असर पड़ने की आशंका है।

    संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि अगर एएमआर पर काबू नहीं किया गया तो अगली महामारी बैक्टीरिया के कारण हमारे सामने आ सकती है, जो ज्यादा घातक होगी और जिसके इलाज में दवाएं काम नहीं आएंगी। ‘विश्व एंटीमाइक्रोबियल जागरूकता सप्ताह’ के जरिये आम लोगों, स्वास्थ्यकर्मियों और नीतिनिर्धारकों में एएमआर की चुनौती और उसका मुकाबला करने के लिए सर्वश्रेष्ठ उपायों के प्रति जागरूकता फैलाई जा रही है।

    क्या आप जानते हैं?
    - दवा-प्रतिरोधक बीमारियों के कारण हर वर्ष कम से कम सात लाख लोगों की मौत होती है।

    - अगले 10 सालों में बढ़ती जनसंख्या और इंसानी जरूरतों को पूरा करने के लिए पशुओं में एंटीमाइक्रोबियल का इस्तेमाल दोगुना होने के आसार हैं।

    - इन 10 वर्षों में लगभग ढाई करोड़ लोग एएमआर के कारण चरम गरीबी का शिकार हो सकते हैं। (downtoearth.org.in)

मनोरंजन

  • सुशांत के फैंस ने किया अंकिता लोखंडे को ट्रोल
    सुशांत के फैंस ने किया अंकिता लोखंडे को ट्रोल

    मुंबई, 27 नवंबर | अभिनेत्री अंकिता लोखंडे अक्सर सोशल मीडिया पर अपने दिवंगत प्रेमी सुशांत सिंह राजपूत के परिवार को सहायता देने की बात करती रहती थीं। शनिवार को दिवंगत अभिनेता के कई प्रशंसकों ने अंकिता पर आरोप लगाया है कि वह अपने जीवन में आगे बढ़ गई हैं और उनकी सुशांत के न्याय में कोई दिलचस्पी नहीं है। अंकिता ने हाल ही में इस्टाग्राम पर एक वीडियो पोस्ट की, जिसमें वह खुश दिखाई दे रही हैं।

    पोस्ट को देख दिवंगत अभिनेता के फैंस ने अंकिता को जमकर ट्रोल किया।

    एक यूजर ने लिखा, "भूल गए हो आप सुशांत सर को।"

    एक अन्य ने लिखा, "आप सुशांत सर को याद नहीं करते हो।"

    एक यूजर ने अंकिता को चिढ़ाते हुए लिखा, "तुम रोज फोटो अपलोड करो, हम रोज तुमको सुशांत की याद दिलाएंगे।"(आईएएनएस)

     

खेल

  • बेटे ने जीवन के प्रति नजरिए को बदला - हार्दिक
    बेटे ने जीवन के प्रति नजरिए को बदला - हार्दिक

    नई दिल्ली, 27 नवंबर | आस्ट्रेलिया के खिलाफ सिडनी वनडे में 76 गेंदों पर 90 रनों की पारी खेलने वाले भारत के ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या ने शुक्रवार को कहा कि पिता बनने के बाद उनके लिए जीवन के प्रति नजरिया बदल गया। पांड्या की पत्नी नताशा स्टैनकोविच ने 30 जुलाई को बेटे को जन्म दिया था। इस कपल ने बेटे का नाम अगस्त्या रखा है।


    मैच के बाद संवाददाता सम्मेलन में पांड्या ने कहा कि बेटे के जन्म के बाद ही उन्होंने जीवन को दूसरी तरह देखना शुरू किया और यह बदलाव बेहतरी के लिए है।

    पांड्या ने कहा कि वह अपने बेटे को मिस कर रहे हैं और जल्द घर लौटना चाहते हैं। बकौल पांड्या, "मैंने जब घर छोड़ था तब वह 15 दिन का था। जब मैं लौटूंगा तब वह चार महीने का हो चुका होगा। मेरे लिए चीजें बदल गई हैं लेकिन यह बदलाव अच्छे के लिए हुआ है। अगस्त्य का जन्म मेरे जीवन का सबसे अच्छा पल है।" (आईएएनएस)

     

कारोबार

  • माइक्रोसॉफ्ट सरफेस लैपटॉप 4, सरफेस प्रो 8 की तस्वीरें ऑनलाइन हुई लीक
    माइक्रोसॉफ्ट सरफेस लैपटॉप 4, सरफेस प्रो 8 की तस्वीरें ऑनलाइन हुई लीक

    सैन फ्रांसिस्को, 27 नवंबर | माइक्रोसॉफ्ट की योजना अपने सरफेस प्रो 8 और सरफेस लैपटॉप 4 को लॉन्च करने की है और अब इन्हीं डिवाइसों की तस्वीरें और इनके आने के बारे में जानकारियां इंटरनेट पर लीक हो गई हैं। इन तस्वीरों से इस बात की पुष्टि होती है कि डिवाइस में किसी भी तरह के नए डिजाइन को शामिल नहीं किया गया है बल्कि इसके बाहरी ढांचे को पिछले जेनरेशन की तरह ही रखा गया है।

    विंडोज सेंट्रल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरफेस प्रो 8 और सरफेस लैपटॉप 4 के जल्द से जल्द लॉन्च होने की संभावना मध्य जनवरी तक है। इसे 11वें जेनरेशन इंटेल प्रोसेसर और इंटेल के एक्सई ग्राफिक्स सपोर्ट के साथ पेश किया जाएगा।

    सरफेस लैपटॉप 4 के भी एएमडी प्रोसेसर ऑप्शन के साथ आने की बात चल रही है, जो कि संभवत: एएमडी के राइजेन 4000 श्रृंखला पर आधारित एक कस्टम माइक्रोसॉफ्ट चिप होगी।

    इन उत्पादों के बारे में आधिकारिक तौर पर अगले साल की शुरूआत तक घोषित किए जाने की उम्मीद है।

    --आईएएनएस

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