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अंतरराष्ट्रीय

  • पाकिस्तान: कुलभूषण जाधव के लिए वकील नियुक्त करने का मामला, पांच अक्टूबर तक के लिए केस स्थगित
    पाकिस्तान: कुलभूषण जाधव के लिए वकील नियुक्त करने का मामला, पांच अक्टूबर तक के लिए केस स्थगित

     

    इस्लामाबाद. पाकिस्तान की एक अदालत ने देश के शीर्ष विधि अधिकारी के अनुरोध पर भारतीय कैदी कुलभूषण जाधव के लिए वकील नियुक्त करने संबंधी सरकार की याचिका पर सुनवाई पांच अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दी. एक मीडिया रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई.

    भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी, 50 वर्षीय जाधव को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जासूसी एवं आतंकवाद के आरोपों में अप्रैल 2017 में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी. भारत ने जाधव को राजनयिक पहुंच न देने और मौत की सजा को चुनौती देने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालत (आईसीजे) का रुख किया था.

    द हेग स्थित आईसीजे ने जुलाई 2019 में फैसला दिया कि पाकिस्तान को जाधव को दोषी ठहराने और सजा सुनाने संबंधी फैसले की ‘प्रभावी समीक्षा एवं पुनर्विचार' करना चाहिए और बिना किसी देरी के भारत को जाधव के लिए राजनयिक पहुंच उपलब्ध कराने देने का भी अवसर दिया जाना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने अपने 2019 के फैसले में पाकिस्तान से जाधव को सुनाई गई सजा के खिलाफ अपील करने के लिए उचित मंच उपलब्ध कराने को कहा था.

    ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद उच्च न्यायालय (आईएचसी) ने पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल (एजीपी) खालिद जावेद खान के अनुरोध पर जाधव के लिए वकील नियुक्त करने की सरकार की याचिका पर सुनवाई मंगलवार को पांच अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दी. आईएचसी ने भारतीय उच्चायोग के वकील को सुनवाई की अगली तारीख पर अदालत के समक्ष पेश होने का नोटिस भी जारी किया.

    इससे पहले सात मई को हुई सुनवाई में आईएसी की वृहद पीठ ने भारत को जाधव के लिए वकील नियुक्त करने का 15 जून तक एक और मौका दिया था. न्यायमूर्ति अतहर मिनल्लाह, न्यायमूर्ति आमेर फारूक और न्यायमूर्ति मियांगुल हसन औरंगजेब इस पीठ में शामिल हैं. अटॉर्नी जनरल खान ने सुनवाई के दौरान अदालत को सूचित किया था कि भारत सरकार पाकिस्तान की अदालत के समक्ष मुकदमे पर आपत्ति जता रही है तथा उसने आईएचसी की सुनवाई के लिए वकील नियुक्त करने से भी इनकार करते हुए कहा कि यह ‘संप्रभु अधिकारों का आत्मसमर्पण करने के समान है.’

    वृहद पीठ ने बाद में तीन पन्नों का एक लिखित आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि किसी भी अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करना किसी मामले में सहायता के लिए अदालत के सामने पेश होने से ‘काफी अलग’ है. आदेश में कहा गया था, ‘इस समय, अदालत केवल आईसीजे के फैसले को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कार्यवाही कर रही है.’

    अदालत ने कहा था कि वह केवल आईसीजे के आदेश को लागू करने का एक तरीका निकालने की कोशिश कर रही है और इसे भारत के ध्यान में लाने की जरूरत है ताकि उसकी भी मौजूदगी रहे और वह कार्यप्रणाली एवं निर्णय के कार्यान्वयन की प्रक्रिया के बारे में अपनी आपत्ति व्यक्त कर सके.

    पाकिस्तान सरकार ने पिछले सप्ताह जाधव को अपील का अधिकार देने के लिए विपक्ष के हंगामे और बहिष्कार के बीच नेशनल असेंबली में एक विधेयक पारित किया था. संसद के निचले सदन ने अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत (समीक्षा एवं पुनर्विचार) विधेयक, 2020 को बृहस्पतिवार को पारित किया था. विधेयक का लक्ष्य कथित भारतीय जासूस जाधव को आईसीजे के फैसले के अनुरूप राजनयिक पहुंच उपलब्ध कराना है. (news18.com)

राष्ट्रीय

  • सोनिया, राहुल और प्रियंका बताएं, उन्होंने कब ली वैक्सीन : भाजपा
    सोनिया, राहुल और प्रियंका बताएं, उन्होंने कब ली वैक्सीन : भाजपा

    नई दिल्ली, 16 जून| भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) ने स्वदेशी कोवैक्सिन को लेकर कांग्रेस पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया है। भाजपा ने इसे महापाप बताते हुए कहा है कि कांग्रेस संदेह पैदा कर वैक्सीन को बर्बाद करना चाहती है। भाजपा ने इस बात को खारिज किया कि कोवैक्सीन के निर्माण में गाय के बछड़े का सीरम होता है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, "आज कांग्रेस ने महापाप किया है, क्योंकि जिस प्रकार का भ्रम भारत में निर्मित कोवैक्सीन को लेकर आज कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया और प्रेस कांफ्रेंस करके उनके प्रवक्ता पवन खेड़ा ने फैलाया है, वो महापाप है।

    संबित पात्रा ने कहा कि, "अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पवन खेड़ा और कांग्रेस के सोशल मीडिया के नेशनल कन्वीनर गौरव पांधी ने आक्षेप लगाया है कि कोवैक्सीन में गाय के बछड़े का सीरम होता है। सोशल मीडिया पर यहां तक कहा गया कि गाय और बछड़े को मारकर ये वैक्सीन तैयार किया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय और वैज्ञानिकों ने साफ तौर कहा है कि कोवैक्सीन में किसी भी प्रकार का गाय या बछड़े का सीरम नहीं मिला हुआ है। यह वैक्सीन पूर्णत: सेफ है और इसमें किसी भी प्रकार का अपभ्रंश नहीं है।"

    भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा, "कांग्रेस 2 बातों के लिए याद रखी जाएगी, वैक्सीन के बारे में संदेह उत्पन्न करने के लिए और वैक्सीन को बर्बाद करने के लिए। आज हम सोनिया जी, राहुल जी और प्रियंका गांधी से पूछना चाहते हैं कि आप तीनों बताएं कि आपने वैक्सीन का अपना पहला और दूसरा डोज कब लिया या लिया ही नही। गांधी परिवार को कोवैक्सीन पर विश्वास है, या नहीं। ये सवाल केवल भाजपा का नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान का है।"

    संबित पात्रा ने कहा कि आज हम सोनिया , राहुल और प्रियंका गांधी से पूछना चाहते हैं कि आप तीनों बताएं कि आपने वैक्सीन का अपना पहला और दुसरा डोज कब लिया या लिया ही नही? गांधी परिवार को कोवैक्सीन पर विश्वास है, या नहीं। ये सवाल केवल भाजपा का नहीं, बल्कि पूरे हिंदुस्तान का है। (आईएएनएस)

राजनीति

  • पंजाब विधानसभा चुनाव: भाजपा ने अभी से कसी कमर, राज्य नेताओं संग जेपी नड्डा बनाएंगे रणनीति
    पंजाब विधानसभा चुनाव: भाजपा ने अभी से कसी कमर, राज्य नेताओं संग जेपी नड्डा बनाएंगे रणनीति

     

    चंडीगढ़. पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और भारतीय जनता पार्टी ने अभी से इसके लिए अपनी तैयारियों को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है. इसी सिलसिले में भाजपा ने मंगलवार को चुनावी राज्य में संभावित गठबंधन और पार्टी द्वारा लक्ष्य निर्धारित करने को लेकर विचार-विमर्श किया. प्रदेश के आगामी चुनाव में भाजपा बिना शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के मैदान में अपनी किस्मत आजमाएगी. हाल ही में कृषि कानूनों को लेकर मतभेद के चलते शिअद ने भाजपा के साथ अपना 23 साल पुराना साथ छोड़ दिया था.

    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी शर्मा राज्य के चुनाव प्रभारी दुष्यंत गौतम के साथ मंगलवार शाम को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा से मुलाकात करेंगे. सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक के दौरान पंजाब में नए राजनीतिक गठबंधनों और समीकरणों को लेकर चर्चा हो सकती है. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) संग शिअद के गठबंधन के बाद, भाजपा 117 विधानसभा सीटों वाले राज्य में बदली जातीय और राजनीतिक समीकरणों पर ध्यान दे रही है. (news18.com)

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : The real oximeter
    Editor's Choice : The real oximeter

    -Sunita narayan 

    What we need is an evergreen revolution that secures livelihood, provides for energy security and combats climate change

    CELEBRATING WORLD Environment Day in the time of an ongoing horrific health pandemic is difficult
    to contemplate. In this time of immense human grief and loss, what does the environment even count for?
    But take a moment to reflect. The most important element that we gasped for in the past month was
    oxygen. Think of the hours and days we spent finding oxygen for our loved ones; how we saw patients collapse and
    die because hospitals did not have oxygen in the tanks; how the courts stepped in to regulate the transportation of
    oxygen from industries across the country; how we learnt about the business of oxygen concentrator—a machine
    that sucks in air and gives us oxygen on demand. Our desperation cannot be recounted without pain. We saw the
    gasp for each breath—and just how precious it is. This then is what we must remember this World Environment
    Day. The oxygen that we get from nature is about increasing green cover and ensuring that our air—our every
    breath—is not polluted. Something we talk glibly about and yet discount with our next move.
    The theme of this year’s World Environment Day, celebrated every year on June 5, is ecosystem restoration.
    Increasing the tree density and repairing the ecosystem health means the world will sequester carbon dioxide—
    that is filling up our atmosphere and leading the world to an inexorable downward spiral of climate change
    impacts—and release oxygen. It’s a win-win. But what we need to understand is that planting trees or restoring
    ecosystems will require us to first restore our relationship with nature and society.
    The fact is trees are about land—who owns it; who protects and regenerates it, and who has the rights over the
    produce. In India, the forest department has the “ownership” of vast areas of common forest land. But countries
    like India do not have “wilderness”. Instead, we have habitats where people coexist with wild animals in forests.
    These are the same forest districts classified as the most backward and poorest. It is also a fact that using all the
    legal and administrative, and sometimes, muscle power, the country’s forest
    department has kept the tree cover somewhat intact. It works hard every day to
    keep people and their animals out. It shuffles files between the bottom rung of
    guards and the top bureaucrats to minimise the cutting of trees for “development”
    projects—from mining to dams.
    But “growing” trees needs people to take ownership of its management; so
    that livestock is kept out; so that the saplings survive. More importantly, trees
    have a value—whether for their ecosystem services or for timber—which needs
    to be paid to the grower. This would then make for a tree-based renewable future—where timber can be used for
    making houses and wood for generating energy. This will be an evergreen revolution that puts money in the hands
    of the poor; secures livelihoods; and at the same time provides for energy security and combats climate change.
    Today the entire world is talking about nature-based solutions—what I have described above—but without
    putting the poor community at the centre of the solution. The reason is not difficult to understand. It is about the
    political economy of land tenure; the power of the most voiceless and marginalised; and about the cost of growing
    trees when people matter. In this scheme the value of land and labour needs to be paid for, not in terms of the
    cheapest options for mitigating carbon dioxide from the air but in terms of livelihoods that this solution will
    provide. This will make the entire idea of buying cheap carbon offsets unfeasible.
    Then, of course, there is the challenge when with every breath we inhale poison and not oxygen. We discuss
    this every year, when winter comes and the pollution gets trapped in the heavy air and moisture. We feel it then.
    We scream. But then we forget. So, just as winter ended this year, the Indian government decided to change the
    rules for coal-based thermal power plants to give them a licence to pollute. Simply, it said, you can pay for noncompliance
    and this penalty will be lower than what you would spend on pollution control equipment. The rules
    are oxygen for the power companies and death by breath for the rest of us.
    The fact is our oxygen cannot be secured in a cylinder or by an oxygen concentrator machine that I suspect
    every rich Indian household will now buy and keep. It cannot even be secured by the air purifier that we already
    have bought and installed in our houses and offices. Instead, oxygen needs us to value it as the most important
    and critical life-support system of our world. So, this World Environment Day, when the ravages of the pandemic
    have left us angry and shattered, let’s not beat around the bush any more. We know today, more than ever before,
    that talking the talk does not save lives. We need to walk the talk. The oxygen in this battle for a greener and
    more inclusive tomorrow is our common anguish—this is our fight for survival. Nothing less.  (downtoearth.org.in) DTE @sunitanar 


     

संपादकीय

  • ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कानूनों के बेजा इस्तेमाल की सरकारी हरकत अंग्रेज सरकार के वक्त से बहुत अलग नहीं है..
    ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कानूनों के बेजा इस्तेमाल की सरकारी हरकत अंग्रेज सरकार के वक्त से बहुत अलग नहीं है..

    हिंदुस्तान के अदालती फैसलों में भी कोरोना सी लहर आते रहती हैं। पिछले कुछ हफ्तों से अदालतें एक बार फिर उम्मीदें जगा रही हैं कि वे सरकार की हामी भरने वाली संस्था ना होकर जनता और संविधान की भी फिक्र करने वाली जिम्मेदार अदालतें हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने कल 3 छात्र-छात्राओं को आतंकी आरोपों के मामले में जमानत देते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि सरकार की नजर में विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच फर्क करने वाली लकीर कुछ धुंधली हो गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इन गिरफ्तार लोगों को जमानत देते हुए केंद्र सरकार के यूएपीए कानून की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें आतंकवाद और आतंक शब्द की परिभाषा कहीं पर नहीं दी गई है। 

    अदालत ने कहा कि यूएपीए में आतंकवादी काम की परिभाषा अस्पष्ट है और आतंकवादी काम का इस्तेमाल किसी भी आपराधिक काम के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर ऐसे कामों के लिए जिनकी परिभाषा पहले से अन्य कानूनों में तय है। अदालत ने सरकार को सावधानी बरतने की नसीहत देते हुए कहा कि ऐसा न करने पर इस बेहद घृणित अपराध की गंभीरता खत्म हो जाएगी। पिछले साल दिल्ली में पिंजरातोड़ नाम के एक सामाजिक आंदोलन के कार्यकर्ता और जेएनयू-जामिया के तीन छात्र-छात्राओं को दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगे की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया था और वे लंबे समय से जेल में चले आ रहे थे। अब अदालत ने इन्हें जमानत देते हुए जो बातें कही हैं, उनमें यह भी है की असहमति को दबाने के लिए सरकार के जहन में विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधि के बीच का फर्क धुंधला हो गया है, और अगर इस रवैया को बढ़ावा मिलता है तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा।

    देश के मीडिया का एक हिस्सा, और देश के बहुत से सामाजिक विचारक, कई राजनीतिक दल लगातार नौजवान छात्र-छात्राओं के ऐसे गंभीर कानून के तहत गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते और लिखते चले आ रहे थे। लेकिन केंद्र सरकार के मातहत दिल्ली पुलिस ने इस तरह की बहुत सी गिरफ्तारियां की और उनमें देश के सबसे कड़े एक कानून को लागू करके इनकी जमानत अब तक नहीं होने दी थी। जब किसी बेकसूर सामाजिक कार्यकर्ता पर आतंकवादी होने का आरोप लगाया जाता है या उस पर देशद्रोह या राजद्रोह के आरोप लगा दिए जाते हैं या फिर उन पर सांप्रदायिकता फैलाने की बात कही जाती है और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी जाती है, तो इसका असल मकसद देश में ऐसे बाकी जागरूक लोगों का हौसला पस्त करना होता है। कुछ गिने-चुने लोगों को ऐसे कड़े कानूनों के तहत गिरफ्तार करके जेल में लंबे समय तक रखकर, मुकदमों को आगे न बढ़ाकर सरकारें लोकतांत्रिक आंदोलनों को खत्म करती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के इस आदेश और उसकी इस टिप्पणी को देखते हुए देश में बाकी जगहों पर भी इस किस्म की कार्रवाई के बारे में दोबारा सोचना चाहिए।

    छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, मजदूर अधिकारों के लिए अदालतों में लडऩे वाली एक प्रमुख वकील सुधा भारद्वाज को भी महाराष्ट्र में गिरफ्तार हुए हजार दिन हो रहे हैं और वे भी अब तक बिना जमानत जेल में हैं। लोकतंत्र में सामाजिक कार्यकर्ताओं को अदालती फैसलों के भी पहले इस तरह की सजा देना सरकार के हाथ में है। ऐसे मामलों का जब अदालती निपटारा होगा, तब जाकर यह पता लगेगा कि उनके खिलाफ चलाए गए मुकदमे में कुछ दम था या नहीं। और उसके बाद भी देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंचने में फिर बरसों लग जाते हैं। लेकिन इस बीच ऐसे आंदोलनकारियों की जिंदगी तबाह करना सरकार के हाथ में रहता है और यह काम देशभर में जगह-जगह चल रहा है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। 

    देश में ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों को भी खत्म करना चाहिए जो अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों पर राज करने के लिए एक बदनीयत से बनाए थे, और जो एक गुलाम देश के लायक थे. हिंदुस्तान के आजाद होने के बाद पौन सदी गुजर रही है और अब तक हिंदुस्तानी कानून अगर अंग्रेजों का पखाना ढोकर चल रहा है तो उसमें फेरबदल की जरूरत है. लेकिन दिक्कत यह है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने कई कानूनों को और अधिक कड़ा किया है जिससे लोकतांत्रिक आंदोलनों की, असहमति की गुंजाइश और कम हो गई है। इसके अलावा ऐसे कानूनों के तहत नाजायज कार्रवाई के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और अदालतों से इनका निपटारा होने तक एक पूरी पीढ़ी के हौसले खत्म करने का सरकारी मकसद तो पूरा हो ही जाता है। अब यह समझ में नहीं आता है कि सरकार की ऐसी कार्यवाही के खिलाफ अदालतों से कैसे जल्दी इंसाफ मिल सके और कैसे ऐसी मिसाल कायम हो सके जो बाद में दूसरे मामलों में भी इस्तेमाल हो?(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

सेहत-फिटनेस

  • कोरोना काल में ऐसे बढ़ाएं अपने फेफड़ों की कैपसिटी, शरीर में ऑक्‍सीजन की सप्‍लाई रहेगी बेहतर
    कोरोना काल में ऐसे बढ़ाएं अपने फेफड़ों की कैपसिटी, शरीर में ऑक्‍सीजन की सप्‍लाई रहेगी बेहतर

     

    कोरोना महामारी के दौर में हर कोई फेफड़ों को मजबूत बनाने की सलाह ले रहा है. फेफड़ा हमारे शरीर को शुद्ध ऑक्सीजन से भरता है और इसी पर शरीर की प्रत्येक गतिविधियां निर्भर करती हैं. ऐसे में अगर व्यायाम की मदद से हम इन्‍हें मजबूत रखें तो कोरोना संक्रमण के बाद भी शरीर में ऑक्सीजन के बेहतर आपूर्ति के लिए फेफड़े पहले से तैयार रहेंगे. इसके लिए आप ब्रीदिंग एक्सरसाइज, कार्डियो एक्सरसाइज आदि कर इसकी कैपेसिटी को बढ़ा सकते हैं और लाइफस्टाइल में बदलाव लाकर अपने फेफड़ों को सपोर्ट दे सकते हैं. तो आइए जानते हैं कि हम अपने फेफड़ों की कैपेसिटी को बढ़ाने के लिए  डेली रुटीन में किन गतिविधियों को शामिल करें.

    इस तरह करें ब्रीदिंग एक्‍सरसाइज

    एक हाथ अपनी छाती पर और दूसरा पेट पर रखें. नाक से सांस लेते समय फेफड़ों में हवा खींचे और ध्यान दें कि इस समय पेट फूलता जाए.  इसके बाद, सांस को छाती में भर लें. इसे 5 से 20 सेकंड तक होल्ड करें और फिर पेट संकुचित होने तक मुंह से धीरे-धीरे सांस छोड़ते जाए. इसे पांच बार रिपीट करें. इससे आपको पता चलेगा कि एक बार में आप कितनी हवा खींच सकते हैं. इससे ज्यादा गहरी सांसे भरना सीखने में भी मदद मिलेगी. रोज सांस रोकने की समय सीमा को बढ़ाते जाएं.

    कार्डियोवास्कुलर एक्सरसाइज करें

    दिन में कम से कम 30 मिनट तक कार्डियो एक्सरसाइज करें. ऐसी कार्डियो चुनें जो आपकी हार्ट रेट बढ़ा दे और जिससे सांस तेजी से चलने लगें. कार्डियो, हार्ट को मजबूती देते हुए फेफड़ों के फंक्शन को सुधार देता है. एक स्ट्रोंग हेल्दी हार्ट रक्त को ज्यादा बेहतर तरीके से पंप कर सकता है और ऑक्सीजन को पूरे शरीर में ले जा सकता है. इसके लिए आप एरोबिक्स, साइकिलिंग, दौड़ें, डांस करें वॉटर एरोबिक्स करें और जम्पिंग जैक और लेग लिफ्ट्स करें.

    हंसें और गाएं

    हेल्‍दी फेफड़ों के लिए जोर जोर से हंसना और गाना जरूरी है. ये आपके फेफड़ों की क्षमता तो बढ़ाते ही हैं आपके शरीर में ज्यादा से ज्यादा फ्रेश एयर जाती है. गाना गाने से डायाफ्राम की मांसपेशियां काम करती है, जिससे फेफड़ों की कैपिसिटी बढ़ती है.

    फूंकने वाला इंस्ट्रूमेंट बजाएं

    विंड इंस्ट्रूमेंट्स मनोरंजन तो करता ही है आपके फेफड़ों की नियमित एक्सरसाइज भी कराता है. लकड़ी की बांसुरी या बांस के इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल करें. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.) (news18.com)

मनोरंजन

  • 'द फैमिली मैन 2' की ग्रैंड सक्सेस के बाद Raj & DK बोले- 'हमें सीजन 3 लिखने की जरूरत है'
    'द फैमिली मैन 2' की ग्रैंड सक्सेस के बाद Raj & DK बोले- 'हमें सीजन 3 लिखने की जरूरत है'

    मुंबई. 'द फैमिली मैन' का पहला सीजन जब 2019 में रिलीज किया गया तो मेकर्स ने दूसरे सीजन की शूटिंग शुरू कर दी थी. हालांकि इस बार ऐसा नहीं हो रहा है. मनोज बाजपेयी स्टारर अमेजन प्राइम वीडियो की इस ओरिजिनल वेब सीरीज के डायरेक्टर राज एंड डीके ने खुलासा किया कि वे सीरीज के तीसरे भाग की शूटिंग शुरू करने से पहले दूसरे सीजन पर रिएक्शन का वेट कर रहे हैं.

    राज निदिमोरू ने फर्स्टपोस्ट को बताया कि, 'हम इस समय पिछली बार से पीछे हैं. हमारे पास वर्ल्ड है, हमारे पास कॉन्सेप्ट है, हमारे पास एक विचार है, और कुछ हद तक स्टोरी का विस्तार करने का बेस है, लेकिन हम अभी भी कहानी विकसित कर रहे हैं. इस बार, हम 'वास्तव में फीडबैक देख रहे हैं, और यह जलप्रलय जैसा है. हमें फिर से संगठित होने, अपने दिमाग को साफ कर बैठने और इसे लिखना शुरू करने की जरूरत है जिससे हम बहुत प्रभावित न हों लेकिन अभी भी हम इस बात को जानते हैं कि क्या ग्रेट था और क्या नहीं.'

    जबकि कृष्णा डीके ने शेयर किया, 'जब कुछ फेल हो जाता है, तो आप निश्चित रूप से देखते हैं कि क्या गलत हुआ, और यह क्यों काम नहीं किया. और जब यह सफल होता है, तब भी आप फीडबैक देखते हैं. कुछ भी परफेक्ट नहीं है. हम अभी भी इन चीजों में बिजी हैं.'

    डीएनए से एक्सक्लूसिव बातचीत के दौरान जब मनोज से पूछा गया कि क्या वह इस बात से राहत महसूस कर रहे हैं कि सभी विवादों के बाद भी शो को अच्छा रिएक्शन मिला है, तो उन्होंने कहा, 'मेरा मतलब है, आप हर जगह से मिल रहे रिएक्शन को देखें. हमें पूरा यकीन था कि एक बार दर्शकों ने शो को देख लिया, तो सभी सवालों के जवाब दिए जाएंगे, सभी आशंकाओं का ध्यान रखा जाएगा. अब, जब आप जानते हैं कि यह इतना अच्छा कर रहा है, और हर कोई शो को देख रहा है, तो आप उस तरह का शोर नहीं सुनते. अब आंशिक रूप से क्योंकि सीरीज की कहानी ने ही लोगों को संतुष्ट किया है और उन सभी सवालों के जवाब दिए हैं जो प्रोमो देखने के बाद उनके पास थे.' (news18.com)

खेल

  • भारत हॉकी में ओलंपिक में पदक जीतने का प्रबल दावेदार : ओल्टमान्स
    भारत हॉकी में ओलंपिक में पदक जीतने का प्रबल दावेदार : ओल्टमान्स

    नई दिल्ली, 16 जून| नीदरलैंड हॉकी टीम के टेक्टिशियन और भारतीय पुरुष हॉकी टीम के पूर्व कोच रोएलान्ट ओल्टमान्स का कहना है कि भारत हॉकी में ओलंपिक में पदक जीतने का प्रबल दावेदार है। ओल्टमान्स ने कहा, "मेरे लिए भारतीय पुरुष हॉकी टीम उन पांच दावेदारों में से एक है जो टोक्यो में पदक जीत सकती है। टीम ने पिछले दो वर्षो में विश्व की शीर्ष टीमों के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन किया है।" 

    उन्होंने कहा, "भारत ने साबित किया है कि वह ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसी टीमों को हरा सकती है। हालांकि ओलंपिक में ऐसा करना थोड़ा अलग है। अगर आप मुकाबले में पीछे चल रहे हैं तो आपको घबराने और आगे चल रहे हैं तो उत्साहित होने की जरूरत नहीं है। आपको हर स्थिति में नियंत्रित होकर रहना है।" 

    पाकिस्तान हॉकी टीम के दो बार कोच रह चुके ओल्टमान्स ने कहा कि ओलंपिक में मौसम बड़ा फैक्टर निभाएगा क्योंकि टोक्यो में काफी नमी होती है।

    ओल्टमान्स ने कहा, "शारीरिक फिटनेस की बात करें तो विश्व की सभी शीर्ष टीमें एक ही स्तर पर हैं। लेकिन मौसम भारत के पक्ष में है क्योंकि उन्हें ऐसे मौसम की आदत है। वहां का मौसम यूरोप की टीमों के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।"  (आईएएनएस)

कारोबार

  • छत्तीसगढ़ खेल कांग्रेस द्वारा ऑनलाइन योग प्रतियोगिता
    छत्तीसगढ़ खेल कांग्रेस द्वारा ऑनलाइन योग प्रतियोगिता

    रायपुर,  15 जून।  21 जून, अंतराष्ट्रीय योग दिवस पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आह्वान एवं कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम के निर्देशन पर कोरोना से निपटने प्रदेश के नागरिकों में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने योग व आयुर्वेद को जीवनशैली में शामिल करने के उद्देश्य से प्रतीकात्मक ऑनलाइन योग प्रतियोगिता का आयोजन वीरजी आयुर्वेदिक संस्थान के सहयोग से छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी खेलकूद प्रकोष्ठ द्वारा लगातार दूसरे वर्ष कराया जा रहा है। 

    खेल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रवीण जैन ने बताया कि प्रतिभागियों को प्रज्ञा योग, अष्टांगा विन्यासा एवं सूर्य नमस्कार में से कोई भी 2 को अधिकतम 1 मिनट का वीडियो नाम व शहर के नाम के साथ 7771001701 मोबाइल नम्बर पर 15-18 जून तक व्हाट्सएप करना है। चयनित वीडियो को छत्तीसगढ़ खेल महासंघ के फेसबुक पेज सहित विभिन्न शोसल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक किया जायेगा। कार्यक्रम की संयोजिका योगज्योति साहू एवं समन्वयक अन्नपूर्णा टिकरिहा ने बताया कि परफॉर्मेन्स के 80 प्रतिशत व जनता से राय लेकर 20 प्रतिशत अंक प्रदान किए जाएंगे।  21 जून को शीर्ष 10 विजेताओं व अन्य चयनित 100 नामों की घोषणा के साथ प्रमाणपत्र व पुरस्कार वितरण राजीव भवन में होगा।

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