ताजा खबर

पहले की खबरों के लिए क्लिक करें

विशेष रिपोर्ट

सितंबर 2027 तक आ सकते हैं नई जनगणना के आंकड़े

  देश की ‘सेल्फी’ में शामिल होने का वक्त-कार्तिकेया गोयल  

‘छत्तीसगढ़’ से खास चर्चा : डिजिटल जनगणना 2026

रायपुर (‘छत्तीसगढ़’)। देश में लंबे अंतराल के बाद होने जा रही जनगणना 2026 इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक और अलग होगी। क्योंकि इस बार जाति जनगणना भी होने जा रही है। कोरोना काल के कारण टली जनगणना अब 16 साल बाद हो रही है और पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल तरीके से संपन्न किया जाएगा। ‘छत्तीसगढ़’ से खास चर्चा में जनगणना एवं नागरिक पंजीयन निदेशक कार्तिकेय गोयल ने इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हुए नागरिकों से सक्रिय भागीदारी की अपील की।

उन्होंने बताया कि जनगणना दो चरणों में पूरी होगी। पहला चरण मकान सूचीकरण का होगा, जो 1 मई से 30 मई 2026 के बीच चलेगा। इसमें हर घर की पहचान और बुनियादी जानकारी दर्ज की जाएगी। इसके बाद फरवरी 2027 में दूसरा चरण होगा, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की विस्तृत जानकारी एकत्र की जाएगी। खास बात यह है कि पहली बार नागरिकों को स्वगणना यानी खुद ऑनलाइन फॉर्म भरने का विकल्प दिया गया है। हालांकि यह पूरी तरह ऐच्छिक है। जनगणना कर्मचारी घर-घर जाकर जानकारी जुटाएंगे। डिजिटल प्रणाली इस जनगणना की सबसे बड़ी खासियत है। अब कागज का उपयोग लगभग खत्म हो गया है और प्रगणक मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे। इंटरनेट न होने की स्थिति में भी ऐप डेटा सुरक्षित रखेगा और नेटवर्क मिलने पर स्वत: सर्वर पर अपलोड हो जाएगा। इस बदलाव से न केवल प्रक्रिया तेज होगी, बल्कि आंकड़ों के विश्लेषण में लगने वाला समय भी काफी कम हो जाएगा। उम्मीद है कि 2027 में जनगणना पूरी होने के छह महीने के भीतर ही प्रमुख आंकड़े सार्वजनिक कर दिए जाएंगे।

जनगणना को लेकर लोगों में फैल रही भ्रांतियों पर भी गोयल ने साफ संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नि:शुल्क है और इसके नाम पर किसी भी प्रकार का शुल्क लेना या देना गलत है। यदि कोई व्यक्ति पैसे की मांग करता है तो उसकी शिकायत तुरंत की जानी चाहिए। साथ ही, साइबर फ्रॉड से बचने के लिए किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करने, कोई फाइल डाउनलोड न करने और किसी को भी भुगतान न करने की सलाह दी गई है।

विचार/लेख

पानी रुकेगा तो समृद्धि भी ठहरेगी, ब्लू वाटर से ग्रीन वाटर की ओर

-तारन प्रकाश सिन्हा

जल संरक्षण की चर्चा अक्सर बांधों, नहरों और तालाबों से शुरू होती है, लेकिन किसी भी जल क्रांति की असली नींव न तो कंक्रीट की संरचनाएं होती हैं और न ही मशीनें। उसकी सबसे बड़ी शक्ति वह समाज होता है, जो पानी को अपना साझा उत्तरदायित्व मानता है।

आज जब दुनिया “ग्रीन वाटर” अर्थात मिट्टी में संचित नमी और वर्षा जल के संरक्षण की बात कर रही है, तब यह समझना भी आवश्यक है कि पानी केवल तकनीक से नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए लोगों का जुड़ना, समुदाय का जागना और साझी जिम्मेदारी की भावना विकसित होना उतना ही जरूरी है। जब पानी गांव में रुकता है, तब समृद्धि भी गांव में ठहरती है।

कुछ दशक पहले तक भारत की सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा थी। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नदियों को जोड़ा गया, बांध बनाए गए, नहरों का विस्तार हुआ और भूजल का व्यापक उपयोग किया गया। उस दौर की अपनी आवश्यकताएं थीं और अपनी उपलब्धियां भी। देश ने भूख के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीती।

लेकिन समय के साथ एक नया संकट सामने आया। जिस पानी ने हमें समृद्ध बनाया, हम उसी पानी को अपनी पहुंच से दूर करते चले गए। हर वर्ष पर्याप्त वर्षा होती रही, नदियां बहती रहीं, लेकिन खेतों में नमी घटती गई। बोरवेल गहरे होते गए और भूजल स्तर लगातार नीचे जाता गया। हम पानी निकालने की तकनीकों में आगे बढ़े, लेकिन पानी रोकने की संस्कृति पीछे छूटती गई।

यहीं से एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता महसूस होती है। क्या पानी केवल नदियों, बांधों और भूजल तक सीमित है, या वह नमी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जो वर्षा के बाद मिट्टी में ठहरती है, फसलों को जीवन देती है और धरती को हरा-भरा बनाए रखती है?

दुनिया आज इसी प्रश्न का उत्तर खोज रही है। जल प्रबंधन का केंद्र अब केवल “ब्लू वाटर” तक सीमित नहीं है, बल्कि “ग्रीन वाटर” की ओर भी बढ़ रहा है। ग्रीन वाटर वह जल है जो मिट्टी में संचित रहता है, फसलों का पोषण करता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविक नींव बनता है।

लेकिन ग्रीन वाटर का विचार केवल पानी का विचार नहीं है; यह समाज और सहभागिता का विचार भी है।

आखिर कोई गांव अपनी हर बूंद बारिश को कैसे सहेजेगा? कोई खेत अपनी नमी कैसे बनाए रखेगा? कोई तालाब वर्षों तक जीवित कैसे रहेगा?

इसका उत्तर किसी मशीन, ऐप या सरकारी आदेश में नहीं छिपा है। इसका उत्तर लोगों में छिपा है।