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  • विश्व में कोरोना संक्रमित 54 लाख से अधिक, 3.45 लाख मौतें
    विश्व में कोरोना संक्रमित 54 लाख से अधिक, 3.45 लाख मौतें

    बीजिंग/जिनेवा/नयी दिल्ली, 25 मई। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड 19) का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है और विश्व भर में इससे संक्रमितों की संख्या 54 लाख से अधिक हो गयी है तथा अब तक 3.45 लाख से ज्यादा लोग काल का ग्रास बन चुके हैं।        
    अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के विज्ञान एवं इंजीनियङ्क्षरग केन्द्र (सीएसएसई) की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में कुल संक्रमितों की संख्या 54,06,537 हो गयी जबकि 3,45,036 लोगों की इस बीमारी से मौत हो चुकी है। 
    दुनिया भर में सर्वाधिक प्रभावित देशों में सबसे ऊंचे पायदान पर खड़े अमेरिका के बाद अब ब्राजील दूसरे नंबर पर है जबकि रूस तीसरे स्थान पर है।
    भारत में भी कोरोना वायरस की विकरालता बढ़ती जा रही है और यहां पिछले 24 घंटों में संक्रमितों की संख्या में करीब सात हजार की वृद्धि हुई है। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसके संक्रमण से अब तक 1,38,845 लोग प्रभावित हुए हैं तथा 4021 लोगों की मौत हुई है जबकि 57,721 लोग इस बीमारी से निजात पा चुके हैं।
    अमेरिका में कोरोना वायरस से संक्रमितों का आंकड़ा 16 लाख से अधिक हो चुका है जबकि इसके संक्रमण से मरने वालों की संख्या 97 हजार के आंकड़े को पार कर चुकी है। विश्व की महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका में कुल संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ते हुए 16,43,098 हो गयी जबकि 97,711 लोगों की मौत हो चुकी है।
    इस बीच ब्राजील में भी कोरोना ने विकराल रूप धारण कर लिया है और अब यह संक्रमण के सर्वाधिक मामलों में दुनिया का दूसरा देश है। ब्राजील में कोरोना संक्रमितों की संख्या 3,63,211 हो गयी है तथा पिछले 24 घंटों के दौरान इस बीमारी से 653 लोगों की मौत के बाद देश में मृतकों की संख्या बढ़कर 22,666 हो गयी है।
    रूस में भी कोविड-19 का प्रकोप जारी है और यह इसके संक्रमण से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों की सूची में तीसरे स्थान पर है। यहां अब तक 3,44,481 लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं और 3541 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।
    इसके अलावा ब्रिटेन में भी हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। यहां अब तक इस महामारी से 2,60,916 लोग प्रभावित हुए हैं और अब तक 36,875 लोगों की इसके कारण मौत हो चुकी है।
    यूरोप में गंभीर रूप से प्रभावित देश इटली में इस महामारी के कारण अब तक 32,785 लोगों की मौत हुई है और 2,29,858 लोग इससे संक्रमित हुए हैं। स्पेन में कुल 2,35,772 लोग संक्रमित हुए है जबकि 28,752 लोगों की मौत हो चुकी है।
    इस वैश्विक महामारी के केंद्र चीन में अब तक 84,095 लोग संक्रमित हुए हैं और 4638 लोगों की मृत्यु हुई है। इस वायरस को लेकर तैयार की गयी एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन में हुई मौत के 80 प्रतिशत मामले 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के थे।
    यूरोपीय देश फ्रांस और जर्मनी में भी स्थिति काफी खराब है। फ्रांस में अब तक 1,82,709 लोग संक्रमित हुए हैं और 28,370 लोगों की मौत हो चुकी है। जर्मनी में कोरोना वायरस से 1,80,328 लोग संक्रमित हुए हैं और 8,283 लोगों की मौत हुई है।

    क्लिक करें और आगे पढ़ें : इंदौर में 3064 संक्रमित, 116 मौतें, 1476 स्वस्थ्य हुए

    तुर्की में कोरोना से अब तक 1,56,827 लोग संक्रमित हुए हैं तथा इससे 4,340 लोगों की मौत हो चुकी है।
    कोरोना वायरस से गंभीर रूप से प्रभावित खाड़ी देश ईरान में 1,35,701 लोग संक्रमित हुए हैं जबकि 7417 लोगों की इसके कारण मौत हुई है।
    बेल्जियम में 9280, मेक्सिको में 7394, कनाडा में 6533, नीदरलैंड में 5841,  स्वीडन में 3998, पेरू में 3456, इक्वाडोर में 3108, स्विट््जरलैंड में 1906, आयरलैंड में 1,608 और पुर्तगाल में 1316 लोगों की मौत हो गयी है।
    इसके अलावा पड़ोसी देश पाकिस्तान में पिछले 24 घंटे में कोरोना संक्रमण के 2164 नये मामले सामने आने के बाद यहां कुल संक्रमितों का आंकड़ा 54 हजार को पार हो गया जबकि इसी अवधि में और 32 लोगों की मौत हो गयी।  यहां अब तक कुल संक्रमितों की संख्या 54,601 हो गयी है जबकि 1133 लोगों की मौत हुई है। (वार्ता) (www.nationalwartanews.com)
     

राष्ट्रीय

  • महाराष्ट्र से बंगाल जा रही बस झारखंड में पलटी, तीन दर्जन घायल
    महाराष्ट्र से बंगाल जा रही बस झारखंड में पलटी, तीन दर्जन घायल

    महाराष्ट्र से बंगाल जा रही बस झारखंड में पलटी, तीन दर्जन घायल

    रांची/दुलमी, 25 मई। प्रवासी मजदूरों को मुंबई से कोलकाता ले जा रही एक बस (जीजे11टी-1817) रजरप्पा थाना क्षेत्र के केझिया घाटी में पलट कर दुर्घटनाग्रस्त हो गयी. बस में सवार लगभग 38 मजदूर घायल हो गये. इनमें से कई मजदूर गंभीर बताये जा रहे हैं. घटना की सूचना मिलते ही सिकिदिरी व रजरप्पा पुलिस घटना स्थल पहुंची और ग्रामीणों के सहयोग से घायलों को इलाज के लिए रिम्स भिजवाया.

    बताया जाता है 50 मजदूर तीन लाख रुपये में एक बस बुक करके मुंबई से कोलकाता जा रहे थे. इस बीच रास्ते में कहीं पर प्रशासन द्वारा बस को रोककर 27 मजदूरों को बस के छत पर बैठा दिया गया. इस तरह बस में कुल 77 मजदूर सवार थे. बस रांची होते हुए कोलकाता जा रही थी. जैसे ही बस केझिया घाटी पहुंची, चालक ने नियंत्रण खो दिया. जिससे बस अनियंत्रित होकर पलट गयी. घटना में 38 मजदूरों को सिर, पैर व शरीर में चोटें आयी हैं.

    घायल मजदूर अजीम, बिट्टू, आबेदीन एवं सनी, मुस्तकीम, नईम सहित कई ने बताया कि इस घाटी में तीखी मोड़ थी. चालक यह भांप नहीं पाया. जिस कारण यह घटना घटी. मजदूरों ने बताया कि ये लोग मुंबई में मजदूरी का काम करते थे और लॉकडाउन के कारण वहां फंस गये थे. प्रति मजदूर छह-छह रुपया मिला कर बस बुक किये और कोलकाता के लिए निकले.

    घायलों में कई की हालत गंभीर बतायी जाती है. घटना की सूचना मिलते ही सिकिदिरी व रजरप्पा पुलिस घटनास्थल पहुंची. ग्रामीणों के सहयोग से घायलों को इलाज के लिए रिम्स भिजवाया. बताया जाता है 50 मजदूर तीन लाख रुपये में एक बस बुक करके मुंबई से कोलकाता जा रहे थे.

    रास्ते में कहीं पर प्रशासन ने बस को रोका और उस पर और 27 मजदूरों को छत पर बैठा दिया. इस तरह बस में कुल 77 मजदूर सवार थे. बस रांची होते हुए कोलकाता जा रही थी. जैसे ही बस केझिया घाटी पहुंची, चालक ने नियंत्रण खो दिया. बस अनियंत्रित होकर पलट गयी.
    दुर्घटना में घायल हुए 38 मजदूरों को सिर, पैर व शरीर में चोटें आयी हैं. घायल मजदूरों ने बताया कि घाटी में कई तीखा मोड़ था. चालक यह भांप नहीं पाया, जिसकी वजह से दुर्घटना हुई.

    मजदूरों ने बताया कि ये लोग मुंबई में मजदूरी करते थे. लॉकडाउन में फंस गये थे और कमाई बंद हो जाने की वजह से अपने घर जा रहे थे. प्रति मजदूर छह-छह रुपये देकर बस बुक करके कोलकाता के लिए निकले थे.

    केझिया घाटी में जैसे ही बस पलटी, मजदूरों में अफरा-तफरी मच गयी. घायल मजदूर बचाओ-बचाओ चिल्लाने लगे. इस बीच, कई मजदूर बस में फंस गये. चीत्कार से पूरी घाटी गूंजने लगी. पुलिस ने ग्रामीणों के सहयोग से घायलों को निकालकर अस्पताल भिजवाया.

    घटना की सूचना मिलते ही रामगढ़ विधायक ममता देवी, दुलमी बीडीओ विजयनाथ मिश्रा, सीओ किरण सोरेंगे सहित कई अधिकारी पहुंचे और घटना की जानकारी ली. विधायक ने स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता को फोन पर घटना की सूचना दी और रिम्स में इनके बेहतर इलाज की व्यवस्था करने का आग्रह किया. मजदूरों को पानी का बोतल व बिस्किट दिया गया.
    (www.prabhatkhabar.com)

राजनीति

  • कांग्रेस के बाद अब माया का भी किराए का ऑफर
    कांग्रेस के बाद अब माया का भी किराए का ऑफर

    कांग्रेस के बाद अब माया का भी किराए का ऑफर 

    नई दिल्ली, 5 मई। श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से गांव जा रहे मजदूरों के किराए को लेकर राजनीति तेज हो गई है। कांग्रेस के बाद अब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने भी किराए का ऑफर दिया है, जबकि रेलवे ने सोमवार को ही साफ कर दिया था कि रेलवे की ओर से 85 फीसदी सब्सिडी दी जा रही है और 15 फीसदी किराए का भुगतान राज्य सरकारों को करना है।

    बसपा अध्यक्ष मायावती ने लॉकडाउन के कारण दूसरे राज्यों में फंसे श्रमिकों से उन्हें वापस लाने के लिए किराया वसूले जाने की निंदा करते हुए कहा कि अगर सरकारें मजदूरों का किराया देने में आनाकानी करती हैं तो बसपा इन मजदूरों को भेजने में योगदान करेगी। 

    मायावती ने मंगलवार को किए गए ट्वीट में कहा, "यह अति दुर्भाग्यपूर्ण है कि केंद्र और राज्य सरकारें प्रवासी मजदूरों को ट्रेनों और बसों आदि से भेजने के लिए उनसे किराया भी वसूल रही हैं। सभी सरकारें यह स्पष्ट करें कि वे उन्हें भेजने के लिए किराया नहीं दे पाएगी। यह बसपा की मांग है।''

    मायावती ने आगे कहा, "ऐसी स्थिति में बसपा का यह भी कहना है अगर सरकारें प्रवासी मजदूरों का किराया देने में आनाकानी करती हैं तो फिर वह अपने सामर्थ्यवान लोगों से मदद लेकर उनको भेजने की व्यवस्था करने में अपना थोड़ा योगदान जरूर करेगी।"

    कांग्रेस ने योगी को लिखा
    कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने मुख्यमंत्री योगी को पत्र लिखकर प्रवासी मजदूरों का विवरण मांगा है। उन्होंने कहा कि मजदूरों का किराया प्रदेश कांग्रेस कमेटी वहन करेगी। उन्होंने मजदूरों से आग्रह किया कि वह निश्चिंत होकर घर लौटे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निदेर्ष पर प्रदेश कांग्रेस उनके रेल टिकट का खर्च वहन करेगी।

    अखिलेश ने साधा निशाना
    उधर, सपा मुखिया अखिलेश यादव ने अपने बयान में कहा कि प्रदेश के हजारों लोग फंसे हैं। अन्य प्रांतों में फंसे यहां के श्रमिकों का सही आंकड़ा भी नहीं है। अब दूसरे राज्यों की सरकारों द्वारा यूपी वालों की उपेक्षा किए जाने की शिकायतें मिल रही हैं। अपने उत्तर प्रदेश में भी अब प्रशासन उदासीन हो चला है।
    उन्होंने कहा कि भाजपा राज में भ्रष्टाचार भी कहां थम रहा है। रेलवे ने यात्रियों से कमाया पैसा प्रधानमंत्री के कोष में दान किया। फिर वही पैसा वसूलने के लिए भूखे प्यासे और जैसे-तैसे अपने घर लौट रहे गरीब श्रमिकों से 50 रूपया सरचार्ज लगा किराया लिया जा रहा है। आपदाकाल में भी गरीब का शोषण भाजपा मॉडल है। कामगारों और श्रमिकों के साथ सरकार जो दुर्व्यवहार कर रही है उससे देश के आत्मसम्मान को धक्का लग रहा है।(एजेंसियां)

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : THE LOCK DOWN DIARIES (VIII)--FEEL A LITTLE SHAME FOR THE LOST SOUL OF A NATION.
    Editor's Choice : THE LOCK DOWN DIARIES (VIII)--FEEL A LITTLE SHAME FOR THE LOST SOUL OF A NATION.

    THE LOCK DOWN DIARIES (VIII)--FEEL A LITTLE SHAME FOR THE LOST SOUL OF A NATION.

    This is not about the sorry exodus of millions of our more unfortunate brothers and sisters playing out on prime TV these days. It is not a piece about the government, or about politics or economics. It is neither critical nor sacerdotal. It is not about Mr. Modi or the Biblical scale suffering he has inflicted, yet again, on those who had put their trust in him. That is a matter between him and his Maker, and I hope the potter who moulded him can forgive him, for history will not. This is not about a callous Finance Minister with the rictus of arrogance stretched across her face. It is not about a judiciary which has thrown away its moral compass in the arid deserts of ambition and preference. It is not about a media which has struck a Faustian bargain with the devil and is content to feed on the offal flung its way. It is not about Rahul Gandhi or Mayawati or Nitish Kumar for they have already become irrelevant to the pathetic course of events unfolding.
      This piece is about me and the burden I carry, a burden of shame, that has been sitting on my back for the last few weeks and cannot be dislodged, no matter how hard I try. It' s a burden which just got heavier this morning when I read a post by an army officer describing his moving encounter in Gurgaon with families of "migrants" walking their way to Bihar, no footwear on the weary soles treading on melting roads, hungry and uncomprehending four year olds, of how they wept and tried to touch his feet when he gave them a few five hundred rupee notes.
      I hang my head in shame in the India of 2020. At belonging to a country and a society which exiles tens of millions from their cities, fearful of catching an infection from them, from a virus brought here, not by them, but by my brethren flying in from abroad. Of treating the hapless victim as the perpetrator. Ashamed of being a gullible cretin who swallows all the lies and half-truths churned out by a dissembling official apparatus. Of beating pots and pans as a servile hosanna to an uncaring presiding deity to drown out the sounds of tired feet marching to their distant villages.
      I can no longer recognise the religion I was born into, it no longer has the wisdom of its ancient sages and rishis, or the compassion of an Ashoka, or the humility of a Gandhi. It is too full of anger, of hatred, of violence. It has replaced its once lofty ideals with even loftier statues, caring deeds with dead rituals. It once fed the mendicant and the poor but now drives them away as carriers of some dreadful disease, without any proof. It even finds an opportunity in this pandemic to stigmatize other religions.
      I am ashamed of my middle class status, of many of my friends, colleagues and the larger family even. Cocooned safely in our gated societies and sectors, we have locked out our maids, drivers, newspaper man, delivery boy and a dozen others who have built for us the comfortable lives we now desperately try to cordon off from the less fortunate. We have deprived them of their livelihoods. We encourage another extension of the lockdown because our salaries and pensions are not affected. Our primary concerns revolve around resumption of deliveries from Amazon and Swiggy: the lot of the migrating millions is dismissed as just their fate- the final subterfuge of a society that no longer cares.

       I am ashamed of the thought processes of my class, of Whatsapp forwards that oppose any more "doles" to the hungry millions, that denounce MNREGA- the only lifeline the returning labour have left- as a waste of public money and food camps as a misuse of their taxes. I am ashamed that people like me can encourage the police to beat up the returning hordes for violating the lockdown, which, in the ultimate analysis was meant to protect "us" from "them". For the life of me I am unable to comprehend how we, sitting in our four BHK flats, have the heartlessness to blame sixteen tired labourers for their own deaths: why were they sleeping on railway tracks? How can one not be ashamed when I hear my peers decrying the expense of trains/ buses for the returning migrants, the costs of putting them up in quarantine, when they approve of their likes being flown back by Air India ? This is not double standards, this is bankrupt standards.
      I am ashamed of my social milieu which lauds the leader for dismissing the cataclysmic sufferings of almost five percent of our population as "tapasya", as if they had a choice. I am mortified to see the layers of education and affluence, the facade of civilisation being peeled back by a virus to disclose a heart of darkness in our collective inner core, the sub cutaneous mucous of hatred and intolerance for a minority community, contempt for the destitute. All age old prejudices, bigotry, racism and narrow mindedness have reemerged, fanned by a party which has fertilised their dormant spores.
      I am ashamed of the dozens of four star Generals and beribboned Admirals and Air Chiefs who  were quick to shower flowers and light up ships at a dog whistle from a politician but did not move a finger to provide any help to the marching millions. Did it even occur to them that they owe a duty to this country beyond strutting around at India Gate? That they could have used their vast resources and vaunted training to set up field kitchens for the hungry marchers, putting up tents where the old and infirm could catch a few breaths, arrange transport for ferrying at least the women and children?Their valour has been tested at the borders, but their conscience has certainly been found wanting.
      I am ashamed of our judges who have now become prisoners in their carefully crafted ivory towers, who had repeated opportunities to order the executive to provide meaningful relief and succour to the exiled wretches, to enforce what little rights they still have left, but spurned them at the altar of convenience.
      I am ashamed of our governments who have forsaken the very people who elected them, and are using their vast powers, not to provide the much needed humanitarian aid these disorganised workers desperately need, but to take away even the few rights they had won over the last fifty years. I am ashamed of a bureaucracy that uses a catastrophe to further enslave those who have already lost everything, which insists that illiterate labourers fill in online forms to register for evacuation, pay hundreds of rupees ( which they do not have) for rail tickets, produce ration cards and Aadhar before they can get five kgs of rice, all the while beating them to pulp. Of a Joint Secretary to government who can apportion blame for the infections by religion. This is not Orwellian or Kafkaesqe, this is a government gone berserk. How can one not be ashamed of such a soul-less administration, and of the people who commend its mistakes?

       They will reach their homes ultimately, those marching millions, minus a few thousand who will die on the way. They will not even be mentioned in the statistics: there will be no Schindler's list for them. And we will pat ourselves on our collective, genuflecting backs that one problem has been taken care of, the danger to our neo-liberal civilisation has been beaten back, the carriers have been sent away, the curve will now flatten. But the mirror has cracked and can never be made whole again. As the Bard said, the fault is not in our stars but within us. Or, as  delectably put by another great bard, one of our own who now belongs to the "others":

                 " Umar bhar Ghalib yahi bhool karta raha,
                   Dhool chehre par thi, aur aina saaf karta raha."

      Actually, this piece is not just about me- it's also about you, dear reader. Look into that cracked mirror. Do you feel any shame, just a little , for what we have become, for the lost soul of a once great nation?  

संपादकीय

  • 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : खेती की रियायत और मदद से बड़े किसान बाहर हों...
    'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : खेती की रियायत और मदद से बड़े किसान बाहर हों...

    खेती की रियायत और मदद
    से बड़े किसान बाहर हों...

    छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग चल रही है कि किस-किस नेता को धान की फसल पर सरकार द्वारा पहले घोषित दाम का बकाया अब कितना-कितना मिल रहा है। भाजपा के कई बड़े नेताओं के नाम खबरों में हैं कि उन्हें कितने-कितने लाख रूपए मिले हैं। कांग्रेस नेताओं ने अनौपचारिक रूप से ये नाम जारी किए हैं। और अब यह बात उठ रही है कि सिर्फ भाजपा नेताओं के नाम क्यों सामने आए, कांग्रेस के बड़े नेताओं के नाम सरकारी बहीखाते से निकलकर जनता में क्यों नहीं पहुंचे। राज्य सरकार ने सरकार बनते ही किसानों को धान का समर्थन मूल्य 25 सौ रूपए देने की घोषणा की थी, लेकिन केन्द्र सरकार की आपत्ति के बाद वह भुगतान नहीं किया जा सका, और आज उसी बकाया को राज्य सरकार ने किस्तों में देना शुरू किया है। 

    छत्तीसगढ़ में किसानों को मदद एक बड़ा मुद्दा है। चाहे धान का बोनस हो, चाहे रियायती बिजली हो, चाहे कुछ और हो। और इस राज्य में धान अपनी जरूरत से अधिक उगने लगा है, केन्द्र सरकार भी एफसीआई में उतने धान का चावल लेती नहीं है। राज्य ने केन्द्र से इजाजत मांगी है कि उसे अपने अतिरिक्त धान से एथेनाल बनाने की मंजूरी दी जाए। कुल मिलाकर मतलब यह कि यह राज्य धान-सरप्लस प्रदेश है, जरूरत से अधिक धान, सरकार की खरीदने की ताकत से अधिक धान, और देश की राष्ट्रीय जरूरत के नजरिए से भी छत्तीसगढ़ का धान अतिरिक्त है। अब ऐसी अतिरिक्त फसल को कोई बढ़ावा या प्रोत्साहन देने का तो कोई तर्क नहीं हो सकता, जरूरतमंद किसानों की मदद का एक तर्क है जो कि किसी भी जनकल्याणकारी राज्य में की जाती है, और वह जरूरत के हिसाब से ही की जाती है। छत्तीसगढ़ में छोटे किसानों, कम ऊपज वाले किसानों, अधिया किसानों या खेतिहर मजदूरों को मदद तो समझ आती है, लेकिन रईस और बड़े किसानों को कोई मदद न्यायसंगत कैसे हो सकती है? जिस प्रदेश में तकरीबन आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और एक रूपए किलो चावल की वजह से जिसका पेट भरता है, उस प्रदेश का पैसा उन बड़े किसानों को कैसे दिया जा सकता है जो कि मदद के जरूरतमंद नहीं हैं? ये किसान जरूर हैं, लेकिन ये इतने बड़े हैं कि इनकी खेती अपने आपमें फायदेमंद होती है। राज्य सरकार इनकी ऊपज को केन्द्र के समर्थन मूल्य पर ले ले वहां तक तो ठीक है, लेकिन उसके बाद का जो बकाया भुगतान अभी किया जा रहा है, वह कुछ अटपटा लगता है। 

    धान इतना ज्यादा हो रहा है कि यह छत्तीसगढ़ के पर्यावरण को भी प्रभावित कर रहा है, और यहां के भूजल को भी। ऐसे में इस राज्य को अधिक फसल की जरूरत बिल्कुल भी नहीं है, बल्कि छोटे किसानों की खेती पर निर्भरता आर्थिक रूप से सक्षम हो, बस उतनी ही जरूरत है। आज होना यह चाहिए कि बड़े किसानों को एक क्रीमीलेयर की तरह इस अतिरिक्त फायदे से बाहर करना चाहिए। आज सरकार ने एक एकड़ के किसान के इस बकाया-भुगतान की अधिकतम सीमा दस हजार रूपए तय कर दी है। लेकिन जो बड़े किसान हैं उनकी खेती की जमीन को लेकर कोई सीमा नहीं है। जब जनता के खजाने का पैसा किसी रियायत या मदद के रूप में दिया जाता है, तो वह दो वजहों से ही दिया जाना चाहिए, उस काम की जरूरत हो, और उस ऊपज या उत्पादन की भी जरूरत हो। छत्तीसगढ़ में धान के बड़े किसानों को सरकारी रियायत या मदद से एक सीमा के बाद बाहर कर देना चाहिए। हमारा ख्याल है कि दस एकड़ से अधिक के किसान ऐसी रियायत के पात्र नहीं माने जाने चाहिए। 

    कांग्रेस और भाजपा के बीच की बयानबाजी के चलते इस पहलू की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हो सकता है कि हमारी इस सोच में कोई व्यवहारिक कमी भी हो, अगर है तो उस पर भी बात होनी चाहिए। लेकिन खेती के और कृषि अर्थव्यवस्था के जानकार लोगों से बात करने पर पता लगता है कि सरकार की आज की रियायत सिर्फ तीन फसलों तक सीमित है जिसमें धान-गन्ना-मक्का है। हालांकि मुख्यमंत्री ने दलहन और तिलहन, कोदो-कुटकी को भी शामिल करने की बात कही है, लेकिन जो सबसे कमजोर, आदिवासी किसान हैं उनके उगाए हुए कोदो-कुटकी की तो कोई सरकारी खरीदी भी नहीं होती है, इसलिए उनको आगे सरकार की इस न्याय योजना में कैसे लाया जाएगा यह भी देखना बाकी है। जानकार लोगों का मानना है कि राज्य में अधिया जैसी व्यवस्था के तहत काम करने वाले लाखों किसान हैं, जिन्हें इससे कोई फायदा नहीं होना है, बल्कि वे अगर धान बेचते समय सोसायटी में रजिस्ट्रेशन नहीं कराते हैं, तो भूस्वामी को भी कोई फायदा नहीं होना है। इसके अलावा आज बड़ा नुकसान झेल रहे सब्जी उत्पादकों, फल उत्पादकों की भी अभी तक सरकार की इस न्याय योजना में जगह नहीं दिख रही है। 

    यह बात सही है कि किसी भी योजना में सारे लोग नहीं लाए जा सकते, और न ही पहले दिन से ही सारे लोग किसी योजना में आ सकते हैं। आज की भूपेश बघेल सरकार का रूख अब तक की सरकारों के मुकाबले अधिक ग्रामीण और अधिक कृषक है। इसलिए जब सरकार हजारों करोड़ का कर्ज लेकर भी किसानों से अपना वायदा पूरा कर रही है, तो इस योजना पर खर्च पूरी तरह न्यायसंगत होना चाहिए। हम आखिर में एक बार फिर इस बात पर जोर डालेंगे कि खेती को मिलने वाली रियायतों और मदद से क्रीमीलेयर को बाहर करना चाहिए, और ऐसे तमाम फायदों को आमतौर पर 10 एकड़ तक के किसानों तक सीमित रखना चाहिए। अगर सरकार के पास खेती को बढ़ावा देने के लिए आर्थिक क्षमता और हौसला है, तो वह लघु और मध्यम किसानों तक ही सीमित रखना चाहिए।  लेकिन मुद्दे की बात यह है कि दोनों ही पार्टियों के बड़े किसान और बड़े नेता इस पर तो चर्चा नहीं कर रहे, क्योंकि बड़े नेता या तो शुरू से बड़े किसान रहते हैं, या फिर राजनीति में आने के बाद बड़े किसान बन जाते हैं, और इन दोनों बड़ी पार्टियों के लोग किसानों के भीतर किसी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने के खिलाफ होंगे। लेकिन गरीब प्रदेश में इसे एक मुद्दा बनाना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

स्थायी स्तंभ

  • छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : दांव उलटा पड़ गया
    छत्तीसगढ़ की धड़कन और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : दांव उलटा पड़ गया

    दांव उलटा पड़ गया

    छत्तीसगढ़ सरकार ने विमान से आने वाले यात्रियों के लिए भी 14 दिन का क्वॉरंटीन अनिवार्य रखा है। हालांकि वे अपनी च्वॉइस से पब्लिक या पेड क्वॉरंटीन में रह सकते हैं, लेकिन कई मुसाफिरों की समस्या है कि वे एक राज्य से दूसरे राज्य परिवार के किसी सदस्य के फंसे होने के कारण उन्हें लाने के लिए आ जा रहे हैं। कुल मिलाकर इसमें एक दिन से ज्यादा का वक्त नहीं लगेगा, लेकिन नियमानुसार उन्हें दो बार 14-14 दिन का क्वॉरंटीन पीरियड बीतना पड़ेगा।  ऐसे ही एक मुसाफिर ने अपनी परेशानी छत्तीसगढ़ के एक सांसद महोदय को बताई। यात्री ने इस नियम से छूट दिलाने का आग्रह करते हुए कहा कि केवल अपनी पत्नी को लेकर अपने राज्य लौट जाएंगे। एयरपोर्ट में तमाम जांच-पड़ताल तो हो ही रही है और स्क्रीनिंग के बाद ही यात्रा करने की अनुमति दी जा रही है। सांसद महोदय को बात जच गई तो उन्होंने मीडिया के जरिए राज्य सरकार से छूट देने की मांग कर डाली। इसके बाद सत्ताधारी दल के नेताओं ने सांसद महोदय की जमकर खिंचाई की। क्योंकि नियम तो केन्द्र सरकार ने तय किए हैं और राज्य सरकार केवल उसका पालन कर रही है। कांग्रेस ने तो यह आरोप लगाया कि उन्हें केवल हवाई यात्री की चिंता हो रही है। रेल, बस और पैदल आने वाले लोगों के बारे में तो उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। बाद में सांसद महोदय को भी समझ आ गया कि उनका दांव उलटा पड़ गया, इसलिए चुप रहना ही बेहतर है।

    वन अफसरों के प्रभार बदलेंगे

    वन विभाग में जल्द ही सीनियर आईएफएस अफसरों के प्रमोशन के लिए डीपीसी होगी। मौजूदा हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स मुदित कुमार सिंह सीजी कॉस्ट का डीजी बनाने के बाद वन विभाग से बाहर हो गए हैं। उनकी जगह पीसीसीएफ (प्रशासन) राकेश चतुर्वेदी को हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनाया जा सकता है। केन्द्र सरकार ने हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की डीपीसी की इजाजत दे दी है। साथ ही साथ पीसीसीएफ के एक और पद को भी मंजूरी दी गई है।

    वन अनुसंधान संस्थान के डायरेक्टर पद को पीसीसीएफ स्तर का पद घोषित किया गया है। पीसीसीएफ के इस अतिरिक्त पद के लिए सीनियर एपीसीसीएफ पीसी पाण्डेय को पदोन्नत करने का रास्ता साफ हो गया है। इसके अलावा चार एपीसीसीएफ की भी पदोन्नति होने की संभावना है। इसमें सीसीएफ स्तर के अफसर सुनील मिश्रा, प्रेमकुमार, विश्वास और ओपी यादव को एपीसीसीएफ के पद पर पदोन्नति दी जा सकती है।

    अगले कुछ महीनों में सीनियर अफसर रिटायर हो रहे हैं। जुलाई में एपीसीसीएफ अनूप श्रीवास्तव रिटायर होंगे और अगस्त में वन विकास निगम के एमडी राजेश गोवर्धन का रिटायरमेंट है। गोवर्धन के रिटायर होने के बाद पीसीसीएफ के पद पर देवाशीष दास को पदोन्नत किया जा सकता है।

    मंत्री की रिकॉर्डिंग-एक

    वक्त ऐसा आ गया है कि जिससे बात करें वह रिकॉर्डिंग कर रहे हैं मानकर चलना चाहिए। कल शाम से एक ऐसा टेलीफोन कॉल हवा में तैर रहा है कि चेन्नई से एक मजदूर छत्तीसगढ़ के एक मंत्री से बात कर रहा है। वह बता रहा है कि 40-45 मजदूर वहां फंस गए हैं। यह सुनकर मंत्रीजी मोटी-मोटी गालियां देते सुनाई देते हैं कि वहां गए ही क्यों गए थे काम करने के लिए? क्या छत्तीसगढ़ में काम नहीं मिलता? इस पर वह मजदूर पूरे दमखम के तर्क से, लेकिन गिड़गिड़ाते हुए बताता है कि छत्तीसगढ़ में तो साल भर काम मिलता नहीं, बाहर तो जाना ही पड़ता है। और चेन्नई में साढ़े 3 सौ रुपये रोजी मिलती है।

    अब एक मजदूर से बातचीत की इस कॉल को मंत्री तो रिकॉर्ड करेगा नहीं, जिसमें वह खुद गालियां दे रहा है, रिकॉर्ड तो मजदूर की तरफ से ही हुआ होगा। लोकतंत्र परिपक्व होते दिख रहा है कि एक मजदूर का इतना हौसला बढ़ गया है। अब सवाल यह है कि बातचीत में जिन लोगों को गालियां देने की आदत है, वे लोग अपनी आदत सुधार लें, वरना ऐसी कई रिकॉर्डिंग सामने आती रहेगी।

    मंत्री की रिकॉर्डिंग-दो

    एक दूसरे मंत्री की कई किस्म की रिकॉर्डिंग राजधानी तक पहुंची हैं जिनमें वे एक बड़े नेता के खिलाफ हिकारत भरी आवाज में अपमानजनक बातें कर रहे हैं। ऐसी बातें बोलना तो आसान होता है, लेकिन ऐसी बातों का जो नतीजा होता है, उन्हेें झेलना मुश्किल होता है। आज मंत्री के आसपास के बहुत से लोग सरकार से बचकर भागे-भागे फिर रहे हैं, और उनकी मुसीबतें बढ़ती चली जा रही हैं।

सेहत/फिटनेस

  • पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं
    पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं

    पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं

    -अंजलि मिश्रा

    अंतरर्राष्ट्रीय बही-खातों का हिसाब रखने वाली संस्था, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का कहना है कि सारी दुनिया जल्दी ही आर्थिक महामंदी का सामना करने जा रही है. कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते कई महीनों से बंद आर्थिक गतिविधियों के बाद वह ऐसा नहीं कहता तो आश्चर्य की बात होता. लेकिन जानकार यह आशंका भी जता रहे हैं कि कोरोना संकट सिर्फ पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को ही नहीं बल्कि राजनीति, देशों के आपसी संबंधों से लेकर हमारे सामाजिक-व्यक्तिगत संबंधों तक को बदलने वाला साबित हो सकता है.

    एक कड़वा सच यह भी है कि इनमें से ज्यादातर बदलाव नकारात्मक हो सकते हैं और भारत भी इनसे अछूता नहीं रहने वाला है. लेकिन इन तमाम बड़े-बड़े दावों और आशंकाओं के बीच कुछ छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव भी हैं, जिन्हें पिछले दिनों भारतीय समाज ने बहुत गंभीरता और तेजी के साथ अपनाया है. ये बदलाव इसलिए ध्यान खींचते हैं क्योंकि सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाला हमारा देश कई बार सही व्यवहार करने के मामले में बड़े ढीठ स्वभाव का दिखता रहा है. ऐसे में बीते कुछ सप्ताहों में यहां के एक बड़े हिस्से में आए ये पांच बदलाव बेहद मामूली होते हुए भी सुखद ठहराए जा सकते हैं.

    हाथों की सफाई

    मनोविज्ञान इंसानों के कभी-कभी ऑप्टिमिस्टिक बायस या अति-आशावादी रवैया दिखाने की बात कहता है. अति-आशावादी रवैया रखने वाले लोग किसी भी विपरीत परिस्थिति में यह मानकर चलते हैं कि वे बाकी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं. हर इंसान कम या ज्यादा इसका शिकार होता ही है और यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर लोगों को लगता है कि उन्हें तो कोरोना वायरस का संक्रमण हो ही नहीं सकता है. यह अति-आशावाद भारतीयों की भी सबसे बड़ी खूबी (या खामी) कहा जा सकता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण साफ-सफाई के लिए अब तक रहा हमारा लापरवाह रवैया है. मसलन, ऑफिस में काम करने के दौरान हम भारतीय दसियों चीजों को हाथ लगाने, लैपटॉप-फोन चलाने, नाक और सिर खुजलाने के अलावा भी जाने क्या-क्या करते रहते हैं. लेकिन जैसे ही कोई सहकर्मी खाने-पीने की कोई चीज आगे करता है, लपककर यह कहते हुए ले लेते हैं, मेरे हाथ तो साफ ही हैं! लेकिन कोरोना संकट ने हमें अपने हाथों को साफ रखना सिखा दिया है. हालांकि अभी ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है इतने थोड़े समय में यह आदत हर भारतीय के जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई है. लेकिन कोरोना संकट अभी लंबा चलने वाला है और उम्मीद की जा सकती है कि इसके खत्म होने तक हाथों से लेकर घर तक की साफ-सफाई हम में से कइयों के जीवन का एक स्थायी अंग बन चुकी होगी.

    छींकते या खांसते हुए आसपास वालों का ख्याल करना

    छींकने को हमारे यहां अनैच्छिक क्रिया कहकर, जो कि यह है भी, लोग अक्सर मनमाने तरीके से जोर-जोर से छींकते देखे जा सकते हैं. ऐसा करते हुए वे अक्सर इस बात का भी ख्याल नहीं करते हैं कि उनका ऐसा करना कुछ लोगों को कितना असहज कर सकता है. कोरोना संकट के दौरान बरती जाने वाली अतिरिक्त सावधानी का असर यह हुआ है कि अब लोग रूमाल, टिश्यू, मास्क या कुहनी के सहारे बहुत संभलकर छींकते-खांसते दिखाई देते हैं. दिलचस्प यह है कि पहले सर्दी-जुकाम का मरीज अक्सर इस बात से परेशान रहता था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और लोग उसे कह रहे हैं कि अरे बस जुकाम ही तो हुआ है. लेकिन अब लोग जुकाम को इतनी गंभीरता से लेने लगे हैं कि किसी को दो-चार बार छींक या खांसी आ जाने पर ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे सामने वाले ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. और मरीज कुछ इस तरह के भाव देता रह जाता है कि बस जुकाम ही तो है. ऐसे में किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए लोग साधारण सर्दी-जुकाम में भी अतिरिक्त सावधानी बरतते नजर आने लगे हैं.

    अपनी बारी आने का इंतज़ार करना

    कोरोना संकट की शुरूआत से ही सबसे ज्यादा ज़ोर फिजिकल डिस्टेंसिंग पर दिया जा रहा है. अब भी किसी सार्वजनिक स्थान पर खड़े लोगों को एक-दूसरे से कम से कम तीन फीट की दूरी पर खड़े होने की सलाह दी जा रही है. इसकी वजह से पिछले कुछ समय से सब्जी और राशन की दुकानों पर भी लंबी-लंबी लेकिन अनुशासनबद्ध कतारों को देखा जा सकता है. इसमें दोहरा अनुशासन यह है कि इन कतारों में भी लोग उन जगहों पर ही खड़े हो रहे हैं जहां पर उन्हें एक-दूसरे से दूर रखने वाले गोले बने होते हैं. सबसे दिलचस्प नज़ारा पिछले दिनों उन शराब की दुकानों पर दिखाई दिया जहां पहले हर वक्त भगदड़ सी मची रहा करती थी. कोरोना वायरस के प्रकोप की वजह से इन दुकानों पर भी लोग सैकड़ों मीटर लंबी लाइनों में शांति से अपनी बारी का इंतज़ार करते दिखाई दिए. ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना प्रकोप शांत होने के बाद जीवन में जो बदलाव होंगे उसमें फिजिकल डिस्टेंसिंग एक ज़रूरी हिस्सा बनकर हमेशा के लिए रह जाने वाला है. ऐसे में हो सकता है कि हमारा समाज भी स्थायी तौर पर अपनी बारी का इंतजार करने वाला समाज बन जाये.

    खाने-पीने या बाकी जरूरी सामान की बरबादी से बचना

    आंकड़ों की मानें तो, सामान्य परिस्थितियों में लगभग 20 करोड़ लोग भारत में रोज़ाना भूखे पेट सोते हैं. वहीं, एक लाख क्विंटल खाना हर साल हमारे देश में डस्टबिन में फेंक दिया जाता है. इस भयावह आंकड़े में होटलों या सामाजिक आयोजनों में बरबाद होने वाले खाने के साथ-साथ वह खाना भी शामिल है जो मध्यवर्गीय घरों में बासी या बचा हुआ कहकर कूड़ेदानों या नालियों के हवाले कर दिया जाता है. कोरोना संकट के चलते खाने-पीने की चीजों की कमी का डर अब इनकी बरबादी कम होने की वजह भी बन रहा है. कुछ मध्यवर्गीय गृहणियों से हुई सत्याग्रह की अनौपचारिक बातचीत में उनका कहना था कि अब वे इस बात का ख्याल रखती हैं कि घर में उतना ही खाना बने जितना कि खपत हो सके और अगर कुछ बचता है तो पहले वह खत्म हो.


    इसके अलावा, कई फिल्मी-सोशल मीडिया हस्तियों समेत आम लोगों का एक बड़ा तबका अक्सर यह कहता रहा है कि ईएमआई की सुविधा और हर समय मौजूद रहने वाले ऑनलाइन विकल्पों के चलते, वे तमाम ऐसी चीजें भी खरीद लेते थे जिनकी सही मायनों में उन्हें जरूरत ही नहीं है. लॉकडाउन ने बेज़ा खरीदारी की लत के शिकार ऐसे लोगों को भी होश में आने का मौका दे दिया है. यानी, यह कहा जा सकता है कि बहुत सारे लोग अब दाना-पानी से लेकर पैसों तक को बरबाद न करने का सबक कोरोना संकट के चलते सीख रहे हैं.

    परिजनों या करीबी लोगों के संपर्क में रहना

    लॉकडाउन के चलते करीब दो महीने से ज्यादा वक्त से अपने घरों में बंद लोग फोन और इंटरनेट के जरिए ही अपने परिवार और दोस्तों से जुड़ पा रहे हैं. लेकिन खास बात यह है कि वे ऐसा कर खूब रहे हैं. वे लोग जो कभी व्यस्त होने या फिर घरवालों को वरीयता न देने के चलते कभी-कभार ही उनसे संपर्क करते थे, अब घर की खैर-खबर नियमित तौर पर लेते दिखने लगे हैं. इतना ही नहीं, कई लोग तो अपने भूले-बिसरे दोस्तों और रिश्तेदारों को भी खोज-खोजकर उनका हालचाल जानने के बहाने खुद को व्यस्त और खुश रखने की कोशिश करते दिख रहे हैं. यह देखना दिलचस्प है कि एक ऐसे समय में जब लोग आपस में मिल तक नहीं पा रहे हैं, एक-दूसरे को अपेक्षाकृत ज्यादा समय दे रहे हैं.

    इसके अलावा भी, कुछ ऐसे लोग जिनकी उपस्थिति हमारी रोजमर्रा का हिस्सा थी, जैसे हाउस-हेल्प, सफाईकर्मी, डिलीवरी बॉय या छोटे-मोटे काम करने वाले और कई लोग, उनका भी महत्व इस कठिन समय में समझ आने लगा है. इसलिए उनसे संपर्क रखने, उनकी मदद और सम्मान करने की ज़रूरत भी एक बड़ा तबका महसूस करता दिखने लगा है. कुल मिलाकर, आधुनिकता के चलते एकल परिवारों या अकेले होने को तरजीह देने वाले, हमारे आसपास के कई लोग अब यह बात स्वीकार करते दिखने लगे हैं कि अपने लोगों के करीब रहना, एक सोशल सर्कल का होना और जिंदगी आसान बनाने वाले कई लोगों की उपस्थिति हमारे लिए कितनी ज़रूरी है. (satyagrah.scroll.in)

मनोरंजन

  • 14 साल  में करण ने किया था एक्टिंग डेब्यू
    14 साल में करण ने किया था एक्टिंग डेब्यू

    फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर डायरेक्टर-प्रोड्यूसर करण जौहर 25 मई को अपना 48वां जन्मदिन मना रहे हैं। यूं तो करण की जिंदगी पर किताब छप चुकी है, लेकिन फिर भी कई ऐसी बातें हैं जिनके बारे में कम ही लोगों को पता है। ये बात तो सभी जानते हैं कि करण ने फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में असिस्टेंट डायरेक्टर के अलावा एक्टिंग भी किया था।  लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि यह उनका एक्टिंग डेब्यू नहीं था।

    करण ने दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से पहले एक टीवी शो इंद्रधनुष में काम किया था।  यह शो दूरदर्शन पर प्रसारित किया जाता था।  एक शो के दौरान करण ने खुद बताया कि उस वक्त वे 14-15 साल के थे, जब इंद्रधनुष में उन्होंने काम किया था।  लेकिन इस शो को ऑन एयर होने में काफी समय लग गया। शो जब रिलीज हुई उस वक्त करण कॉलेज के सेकेंड ईयर में थे. तब वे 18 साल के हो चुके थे। अब जब वो इस शो को देखते हैं तो उन्हें बहुत शर्म आती है।

    साल 1989 में आई इंद्रधनुष उनका पहला सीरियल था. इसके बाद उन्होंने 1995 में आदित्य चोपड़ा की फिल्म दिलवाले दुल्हन?िया ले जाएंगे में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम किया। इसमें उन्होंने रॉकी नाम का छोटा सा रोल भी प्ले किया था।  इसके तीन साल बाद 1998 में करण ने अपनी पहली फिल्म कुछ कुछ होता है का निर्देशन किया। यह फिल्म बेहद सुपरहिट रही। इसके बाद कभी खुशी कभी गम, कभी अलविदा ना कहना, माई नेम इज खान, स्टूडेंट ऑफ द ईयर जैसी फिल्मों का निर्देशन किया।

    टीवी शो से शुरू हुआ उनका सफर आज कामयाबी के कई आयाम गढ़ चुका है. उन्होंने एक्टिंग तो नहीं लेकिन निर्देशन और प्रोडक्शन लाइन में अपने करियर को बुलंदियों तक पहुंचाया है। हालांकि उन्होंने फिल्म बॉम्बे वेलवेट से एक्टिंग में हाथ आजमाने की कोशिश जरूर की लेकिन वे इसमें जम नहीं पाए. वे आज भी कई फिल्मों में गेस्ट अपीयसरेंस देते रहते हैं।  (आजतक)

     

खेल

  • सिलेक्टर्स को लगता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूं
    सिलेक्टर्स को लगता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूं

    नई दिल्ली, 25 मई। दिग्गज भारतीय गेंदबाज हरभजन सिंह ने चौंकाने वाला बयान दिया है। हरभजन सिंह ने कहा है कि वो भारत के लिए टी20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों में खेलने के लिए तैयार हैं। हरभजन सिंह जुलाई में 40 साल के होने वाले हैं, ऐसे में उनका ये बयान काफी चौंकाने वाला है।

    हरभजन सिंह आईपीएल में संयुक्त रूप से तीसरे सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं। उन्होंने अभी तक आईपीएल में कुल 150 विकेट चटकाए हैं। भारत के लिए उन्होंने अपना आखिरी टी20 अंतर्राष्ट्रीय मैच 2016 में एशिया कप में खेला था जो कि टी20 फॉर्मेट में खेला गया था।

    ईएसपीएन क्रिकइन्फो के साथ बातचीत में हरभजन सिंह ने कहा कि मैं तैयार हूं। हरभजन सिंह ने कहा कि आईपीएल में मैदान छोटे होते हैं और दुनिया के दिग्गज बल्लेबाज उसमें खेलते हैं। अगर मैं आईपीएल में बेहतरीन गेंदबाजी करता हूं तो भारतीय टीम की तरफ से खेलने के लिए भी तैयार हूं।

    हरभजन सिंह ने कहा कि आईपीएल में जिस तरह के बल्लेबाज खेलते हैं, उसे देखते हुए उनको गेंदबाजी करना काफी मुश्किल होता है। अगर आप आईपीएल में उनके सामने बेहतरीन गेंदबाजी कर सकते हैं तो फिर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में भी आप अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। हरभजन ने आगे कहा कि मैंने आईपीएल में लगातार पावरप्ले और मिडिल ओवर में गेंदबाजी की और विकेट भी चटकाए।

    हरभजन ने आगे कहा कि आईपीएल में बेहतरीन प्रदर्शन के बाद भी चयनकर्ता उनकी तरफ ध्यान नहीं देते हैं, उन्हें लगता है कि मैं बुड्ढा हो गया हूं। उन्होंने कहा कि मैं घरेलू क्रिकेट नहीं खेलता हूं, लेकिन पिछले 4-5 साल में आईपीएल में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद उन्होंने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया।

    हरभजन ने आगे कहा कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में कई ऐसी टीमें होती हैं जो आईपीएल की टीमों की तरफ अच्छी नहीं होती हैं। आईपीएल में हर टीम के पास टॉप 6 में ऐसे खिलाड़ी होते हैं जो अपने-अपने देशों के लिए बेस्ट होते हैं। अगर मैं आईपीएल में जॉनी बेयरेस्टो और डेविड वॉर्नर को आउट कर सकता हूं तो क्या अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में नहीं कर सकता। लेकिन ये मेरे हाथ में नहीं है, क्योंकि भारतीय क्रिकेट के वर्तमान सेटअप में कोई भी आपसे आकर बात नहीं करता है। (स्पोट्सर्, क्रीड़ा)

कारोबार

  • सिपेट एवं पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा में प्रवेश आवेदन 2 जुलाई तक
    सिपेट एवं पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा में प्रवेश आवेदन 2 जुलाई तक

    रायपुर, 25 मई। सेन्ट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ  प्लास्टिक्स इंजीनियरिंग एडं टेक्नालॉजी’ सन् 1968 से अध्ययन, शोध, विकास एवं औद्योगिंक तकनीक उन्नयन के क्षेत्र में एक अद्वितीय संस्थान हैं। रसायन व उर्वरक मंत्रालय एवं रसायन व पेट्रो रसायन विभाग, भारत सरकार के अंतर्गत यह सचंालित हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में भी दो सिपेट, संस्थान स्थापित हैं, जिसमें राजधानी रायपुर और उर्जा राजधानी कोरबा सम्मिलित हैं।

    सिपेट रायपुर एवं कोरबा दो डिप्लोमा पाठ्यक्रम ; डिप्लोमा इन प्लास्टिक टेक्नोलॉजी एवं डिप्लोमा इन प्लास्टिक मोल्ड टेक्नोलॉजी एवं सिपेट रायपुर में एक पोस्ट ग्रेंजुएट डिप्लोमा इन प्लास्टिक्स प्रोसेसिंग एवं टेस्टिंग की पाठ्यक्रम   सफलता पूर्वक संचालित हो रहे हैं। उपरोक्त डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु अधिसूचना दिनांक 12 जनवरी को जारी हो चुकी है, इनमें प्रवेश हेतु श्ऑल इंडिया सिपेट जेईई-2020, 12 जुलाई 2020 को समूचे भारत में एक साथ आयोजित होगी। प्रवेशार्थी ऑनलाईन फार्म   वेबसाइट के माध्यम से आसानी से जमा किया जा सकता हैं। सिपेट, कोरबा एवं रायपुर मे इस कार्य हेतु नि:शुल्क परामर्श केन्द्र व आवेदन जमा करने की सुविधा है, जहां प्रवेशार्थी स्वंय आकर विशेषज्ञों द्वारा यह प्रक्रिया पूर्ण करवा सकता हैं। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 02 जुलाई 2020 तक बढ़ा दी गई है। परीक्षा केन्द्र पूरे भारत के सभी बड़ें शहरों में है जिसमें रायपुर एवं कोरबा भी सम्मिलित है। इसमें वे सभी नियमित विद्यार्थी जो 10वी परीक्षा में सम्मिलित हो रहे हैं या उत्तीर्ण कर चुके हैं, पात्र हैं। यह पाठ्यक्रम 100: रोजगारोन्मूलक है जिसमें शासकीय, अध्र्दशासकीय, निजी क्षेत्र में रोजगार, स्वरोजगार व स्वंय के उद्योग की स्थापना भी सम्मिलित है । भविष्य में प्लास्टिक्स इंजीनियरिंग व टेक्नालॉजी के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं, अत: उपरोक्त पाठ्यक्रमों को इस आधार पर भी मूर्तरूप दिया गया है।

    ’ऑल इंडिया सिपेट जेईई 2020‘ परीक्षा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के आधार पर होंगी। इस प्रवेश परीक्षा का पाठ्यक्रम 10वीं स्तर तक के विषयों विज्ञान, अंग्रेजी एवं गणित पर आधारित है। कम्प्यूटर बेस्ड टेस्ट ;ब्ठज्द्ध प्रणाली पर आधारित यह परीक्षा, देश के सभी 27 केन्द्रों में एक साथ होगी।

    इसके साथ ही साथ 12वी उत्तीर्ण एवं आई टी आई उत्तीर्ण विद्यार्थी भी लेटरल एंट्री के माध्यम से 3 वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम ( क्च्ज्ध्क्च्डज् ) के द्वितीय वर्ष में सीधे प्रवेश ले सकते है। इसके लिए आवश्यक दस्तावेज के साथ विद्यार्थी रायपुर एवं कोरबा सिपेट केन्द्र पर बिना प्रवेश परीक्षा के प्रवेश ले सकते है।

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