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अंतर्राष्ट्रीय

  • इस देश में लड़कियों के शॉर्ट स्कर्ट पहनने और पुरुषों के शर्टलेस होने पर लगेगा बैन
    इस देश में लड़कियों के शॉर्ट स्कर्ट पहनने और पुरुषों के शर्टलेस होने पर लगेगा बैन

    पनोम फेन, 3 अगस्त। पूर्वी एशियाई देश कंबोडिया एक अजीबोगरीब नियम बनाने जा रहा. कंबोडिया की संसद जल्द ही लड़कियों के शॉर्ट स्कर्ट पहनने और पुरुषों के शर्टलेस होने पर बैन लगाने जा रही है. इस संबंध में संसद में एक प्रस्ताव पेश किया गया है जिसमें कहा गया है कि ऐसे कपड़े पहनना समाज में यौन हिंसा को बढ़ावा दे रहा है. इस प्रस्ताव को काफी सांसदों का समर्थन हासिल है और ऐसा माना जा रहा है कि ये पास होकर जल्द कानून बन सकता है.

    अगर यह प्रस्ताव संसद में पारित हो जाता है तो ये कानून बन जाएगा और स्थानीय पुलिस को ऐसे कपड़े पहनने वालों पर कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार दे दिया जाएगा. इस प्रस्ताव को कंबोडिया के कई सरकारी मंत्रालयों और राष्ट्रीय संसद से अनुमोदन मिल जाने की पूरी संभावना है. इसके बाद अगर कोई पुरुष सार्वजनिक स्थानों पर शर्टलेस दिखाई दिया या कोई महिला/लड़की शॉर्ट स्कर्ट में दिखाई दी तो उनपर भारी जुर्माना लगाया जाएगा. कानून के बार-बार उल्लंघन पर जेल की सजा भी तय की जाएगी.

    हो रही है आलोचना

    कंबोडिया में महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली महिलाओं ने इस कानून को रूढ़िवादी बताया है. उन्होंने कहा कि इस कानून के जरिए रूढ़िवादी लोग अपना एजेंडा चलाना चाहते हैं और महिलाओं पर नियंत्रण के लिए इस कानून का दुरूपयोग किया जा सकता है. इस कानून में भले ही स्कर्ट का जिक्र किया गया है लेकिन ये इस तरह के अन्य कपड़ों पर भी लागू होगा और पुलिस तय करेगी की पहना हुआ कपड़ा संस्कृति के हिसाब से अभद्र की श्रेणी में आएगा या नहीं.

    कंबोडियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स चैरिटी के कार्यकारी निदेशक चक सोपे ने कहा कि हाल के महीनों में कंबोडियाई सरकार में शामिल कई लोगों ने महिलाओं के कपड़ों को लेकर कई विवादित बयान दिए हैं. वहीं, सरकार ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए उनके कपड़ों को जिम्मेदार ठहराया है. 2020 के शुरुआत में कंबोडिया में एक महिला को फेसबुक लाइव स्ट्रीम पर कपड़े और सौंदर्य प्रसाधन बेचने के दौरान छोटे कपड़े पहनने के आरोप में सजा सुनाई गई थी. अधिकारियों ने उसे समाज में अश्लीलता फैलाने के दोष में 6 महीनों के लिए जेल भेज दिया था. महिला की गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री हुन सेन ने अधिकारियों को उत्तेजक कपड़ों की ब्रिक्री करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था.(news18)

राष्ट्रीय

  • पंजाब: ज़हरीली शराब से मरने वालों की संख्या 112 हुई, ऑटोप्सी में देरी का आरोप
    पंजाब: ज़हरीली शराब से मरने वालों की संख्या 112 हुई, ऑटोप्सी में देरी का आरोप

    चंडीगढ़, 3 अगस्त पंजाब में जहरीली शराब त्रासदी में मरने वालों की संख्या बढ़कर 112 हो गई.

    ट्रिब्यून इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, तरन तारण में 25 और मौत होने और अमृतसर में एक और मौत होने से कुल आंकड़ा बढ़कर 112 हो गया है.

    राज्य में बुधवार रात से शुरू हुई त्रासदी के बाद अब तक तरन तारण में कुल 88 लोगों की मौत हुई हैं, जिनमें से छह का सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है जबकि दो को इलाज के लिए अमृतसर के गुरु नानक देव अस्पताल (जीएनडीएच) शिफ्ट किया गया है.

    जहरीली शराब पीने से बीमार हुए लोगों का कहना है कि जब से उन्होंने शराब पी है, तभी से उन्हें देखने में समस्या हो रही है.

    अमृतसर के मुच्छल गांव की मादेपुर कॉलोनी के एक शख्स की जहरीली शराब पीने से मौत हो गई. उसका भाई भी अस्पताल में है और उसकी आंखों की रोशनी चली गई है.

    बाटला से एक शख्स को जीएनडीएच में रेफर किया गया है, जिसकी हालत गंभीर बताई जा रही है.

    तरन तारण के उपायुक्त कुलवंत सिंह ने फोन पर बताया कि वहां क्षेत्र से मिली जानकारी के आधार पर प्रशासन मृतकों का आंकड़ा 75 बता रहा है क्योंकि बीते कुछ दिनों में मृतकों का अंतिम संस्कार उनके परिजन द्वारा कर दिया गया है.

    उन्होंने कहा कि उनमें से कुछ तो पोस्टमॉर्टम कराने के लिए भी नहीं आए. अधिकारियों ने कहा कि कुछ परिवार तो अपने संबंधी की जहरीली शराब पीने से हुई मौत की रिपोर्ट दर्ज कराने भी आगे नहीं आ रहे हैं.

    पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हम लोगों से अनुरोध कर रहे हैं कि वे अपने परिवार के सदस्य की मौत की रिपोर्ट कराएं.

    वहीं, शवों के पोस्टमार्टम में देरी की भी खबरें हैं. मुच्छल गांव के बलकार सिंह का कहना है कि उनके गांव के जोगा सिंह की शुक्रवार को मौत हुई थी लेकिन उसका रविवार को अंतिम संस्कार किया गया क्योंकि परिवार को ऑटोप्सी में देरी की वजह से शव मिलने के लिए दो दिन का इंतजार करना पड़ा .

    उन्होंने कहा, ‘बाबा बालक सिविल अस्पताल में डॉक्टर्स नहीं होने की वजह से रविवार को पोस्टमार्टम हो पाया.’

    इसी तरह कादगिल गांव के साजन सिंह अपने पिता हरजिंदर सिंह के शव के लिए तीन दिनों तक तरन तारण अस्पताल के चक्कर लगाते रहे. उनका कहना है कि रविवार को पोस्टमार्टम होने के बाद उन्हें शव सौंपा गया.

    तरन तारण अस्पताल के वरिष्ठ मेडिकल अधिकारी डॉ. रोहित मेहता का कहना है, ‘हमारी टीमें ऑटोप्सी का काम पूरा करने के लिए ओवरटाइम कर रही हैं. कल हमारी टीमों ने रात आठ बजे तक काम किया और 13 शवों का पोस्टमार्टम किया. हम आज अभी तक 10 ऑटोप्सी कर चुके हैं.’

    बता दें कि मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस मामले के सामने आने के बाद छह पुलिसकर्मियों के साथ सात आबकारी अधिकारियों को निलंबित करने का आदेश दिया.

    निलंबित अधिकारियों में दो उप पुलिस अधीक्षक और चार थाना प्रभारी शामिल हैं. इस बीच पुलिस ने राज्य में 100 से अधिक स्थानों पर छापेमारी कर अब तक 25 लोगों को गिरफ्तार किया है.
    शराब पीने से बीमार हुए 50 वर्षीय तिलक राज ने बताया, ‘मैंने जबसे यह शराब पी, तब से मेरी तबीयत खराब हो गई और मैं ठीक से देख नहीं पा रहा था. अब थोड़ा ठीक हूं लेकिन देखने में अभी भी समस्या हो रही है. मैं 60 रुपये में यह शराब खरीदी थी.’

    एक और बीमार शख्स 32 वर्षीय अजय कुमार का कहना था, ‘जबसे मैंने शराब पी मुझे कमजोरी महसूस हो रही है.’

    कई लोगों ने बताया कि उन्होंने हाथी गेट के पास से शराब खरीदी थी. आरोप है कि खुलेआम जहरीली और नकली शराब बेची गई लेकिन प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की.

    इस बीच, विपक्षी दल आम आदमी पार्टी (आप) ने पटियाला, बरनाला, पठानकोट और मोगा समेत कुछ स्थानों पर पंजाब सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया.

    प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया, जिसकी वजह से लोगों की मौत हुई, जिनमें से अधिकतर गरीब परिवारों के थे.

    photo credit-PTI

    आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने तरन तारण जाकर मृतकों के परिजन से मुलाकात की. मान ने इस मामले की मौजूदा न्यायाधीश से जांच कराने की मांग की.(thewire)

राजनीति

  • संप्रग शकुनियों की भयावह साजिशों से पार नहीं पा सका : तिवारी
    संप्रग शकुनियों की भयावह साजिशों से पार नहीं पा सका : तिवारी

    नई दिल्ली, 2 अगस्त (आईएएनएस)| राहुल गांधी के करीबी राज्यसभा सदस्यों द्वारा 10 साल के संप्रग शासन के दौरान कांग्रेस के प्रदर्शन के बारे में आत्मनिरीक्षण की बात कहने की बहस के बीच, पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने रविवार को पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बचाव किया। उन्होंने भाजपा पर हमला किया और उसे 'शकुनी' कह डाला। आनंदपुर साहिब निर्वाचन क्षेत्र के सांसद तिवारी ने ट्वीट किया, "दुर्भाग्य से संप्रग अपने खिलाफ साजिशों से पार नहीं पा सका। शकुनियों से भरी दुनिया में इसकी अगुवाई सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह जैसे सज्जन लोगों ने किया था और कर रहे हैं।"


    जब आईएएनएस ने तिवारी से उनकी 'शकुनी' टिप्पणी के बारे में संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि भाजपा ने तत्कालीन संप्रग सरकार के खिलाफ भयावह अभियान का नेतृत्व किया।

    तिवारी ने संकेत दिया कि भयावह अभियान 2जी और कोयला ब्लॉक आवंटन मुद्दा था, जिसमें भाजपा ने कैग रिपोर्ट का हवाला देते हुए भ्रष्टाचार का आरोप लगाया, जिसके कारण 2014 के चुनाव में संप्रग की हार हुई।

    तिवारी ने कहा कि संप्रग सरकार की उपलब्धि को पीएमओ अभिलेखागार में देखा जा सकता है और सरकार ने आरटीआई, आरटीई, मनरेगा, खाद्य सुरक्षा और अन्य विकासात्मक कार्यों में बहुत काम किया है।

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : टिड्डे: दुनिया भर में फ़सल चट कर रहे झुंडों की बारीक़ी से पड़ताल
    Editor's Choice : टिड्डे: दुनिया भर में फ़सल चट कर रहे झुंडों की बारीक़ी से पड़ताल

    रेगिस्तानी टिड्डों के विशाल हुजूम पूर्वी अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व में क़हर बरपा रहे हैं. टिड्डों के विशाल झुंड से फ़सलों को ख़तरा है, लोगों की रोज़ी रोटी को ख़तरा है और खाने पीने की आपूर्ति को नुक़सान पहुंचने का डर है. दुनिया के एक बड़े हिस्से पर टिड्डों का ये हमला पिछले कई दशकों में सबसे बड़ा बताया जा रहा है. लेकिन, जानकारों ने चेतावनी दी है कि अगर कुछ जगहों पर टिड्डों के क़हर को नहीं रोका गया, तो आने वाले बारिश के सीज़न के दौरान कई देशों में टिड्डों के झुंड की तादाद बीस गुना तक बढ़ सकती है. (https://www.bbc.co.uk/news/resources/idt-8f45ee5d-04ab-4089-9e3a-a5f06b84fbe5)

    टिड्डे हैं क्या और वो इतनी बड़ी तादाद में अचानक कहां से आ गए?

    ऑग्युमेंटेड रियालिटी का अनुभव पाने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होता है. और हम आपको इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि ये सभी ब्राउज़र पर अच्छे से काम करेगा.

    इंटरएक्टिव एक अकेला रेगिस्तानी टिड्डा
    एआर इस्तेमाल करने के निर्देश 

    इस टिड्डी की ही तरह रेगिस्तानी टिड्डे सूखे इलाक़ों में रहते हैं. ये पश्चिम अफ़्रीका और भारत के बीच के क़रीब तीस देशों में पाए जाते हैं. ये पूरा क्षेत्र लगभग एक करोड़ साठ लाख वर्ग किलोमीटर या 62 लाख वर्ग मील का है

    ये टिड्डों के ही रिश्तेदार हैं. शर्मीले होने के कारण ये आम तौर पर अकेले ही रहते हैं

    और वो बिना किसी की नज़र में आए ऐसे ही अकेले बरसों बरस जीते हैं

    लेकिन कभी कभार ये शर्मीली रेगिस्तानी टिड्डियां किसी अचानक से राक्षसी रूप धर लेती हैं.

    और जब किसी हरे भरे इलाक़े में अचानक बारिश बंद हो जाती है और सूखा पड़ जाता है, तो ये मामूली टिड्डे अपना एकांतवास त्याग कर छोटे छोटे राक्षसों के भयानक झुंड में तब्दील हो जाते हैं

    इंटरएक्टिव अकेले रहने वाले टिड्डों में परिवर्तन कैसे होता है?

    जब ये रेगिस्तानी टिड्डियां इकट्ठा हो जाती हैं, तो इनके दिमाग़ से एक केमिकल निकलता है, जिसका नाम है सेरोटोनिन. ये केमिकल इनके शरीर में रिसता है, जिसके कारण इन मामूली टिड्डों के शरीर और बर्ताव में क्रांतिकारी बदलाव आ जाता है.

    इन कीड़ों का न केवल रंग बदलकर चटख हो जाता है. बल्कि ये तेज़ तर्रार भी हो जाते हैं. इनकी भूख जाग जाती है और ये बड़े सामाजिक हो जाते हैं. यानी इनके बीच आपस में मेल-जोल बढ़ जाता है

    जब ये टिड्डे अपना रंग रूप और मिज़ाज बदल लेते हैं और भुक्खड़ हो जाते हैं, तो ये अपने जैसे साथी टिड्डों को तलाशते हैं. इनकी जनसंख्या में विस्फोट हो जाता है. और ये धीरे धीरे ऐसे झुंड बना लेते हैं, जो देखते ही देखते सब कुछ तहस नहस कर डालने वाले टिड्डी दल में परिवर्तित हो जाते हैं

    इंटरएक्टिव टिड्डों के ये दल उड़ कर फ़सलों को तबाह करने लगते हैं

    जब एक बार ये टिड्डे झुंड बनाने लगते हैं, तो उनके दल बेहद विशाल हो सकते हैं. टिड्डों के एक दल में दस अरब तक टिड्डे हो सकते हैं. और ये टिड्डी दल सैकड़ों किलोमीटर में फैल सकता है

    संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, टिड्डियों के एक औसत आकार का दल भी इतनी फ़सलें तबाह करने की क्षमता रखता है, जिनसे ढाई हज़ार लोगों को पूरे साल भर खाना खिलाया जा सकता है.

    टिड्डियों के ऐसे ही तबाही मचाने वाले दल पूर्वी अफ्रीका, यमन, ईरान, पाकिस्तान और भारत में बन रहे हैं. और विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन ने इन टिड्डियों वाले इलाक़ों को हाई अलर्ट पर रहने की चेतावनी जारी की है

    खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का कहना है कि टिड्डियों के इन ख़तरनाक झुंडों ने पहले ही कीनिया, इथियोपिया और सोमालिया जैसे कई देशों में ऐसी तबाही मचाई है, जैसी इन देशों ने कई दशकों में नहीं देखी. और अभी भी इनसे अभूतपूर्व ख़तरा बना हुआ है. इस बात का डर भी है कि राक्षसी टिड्डियों का ये दल पश्चिम अफ़्रीका पर भी धावा बोल सकता है

    लेकिन, तेज़ी से बढ़ते टिड्डियों के ये दल अब मध्य पूर्व और पाकिस्तान में हरियाली पर हमला बोल रहे हैं. और टिड्डियों के इन झुंडों से भारत में भी फ़सलों पर ख़तरा मंडरा रहा है

    पूर्वी अफ़्रीका, मध्य पूर्व, भारत और पाकिस्तान में सक्रिय टिड्डियों के दल को दिखाने वाला नक़्शा
    खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का कहना है कि अगर इन राक्षसी कीड़ों से बचने के लिए अतिरिक्त उपाय नहीं किए जाते हैं, तो बारिश के मौसम में टिड्डियों के इन ख़तरनाक झुंडों के आकार में बीस गुना तक इज़ाफ़ा हो सकता है

    चिंता वाली बात ये है कि टिड्डियों के दल के हमले झेल रहे ये देश, पहले से ही कई संकटों, जैसे कि बाढ़, संघर्ष और कोरोना वायरस के प्रकोप से जूझ रहे हैं

    उत्तरी कीनिया के चरवाहे और टिड्डियों के झुंड का पता लगाने वाले अलबर्ट लेमासुलानी कहते हैं कि, 'कोविड-19 के बाद अब टिड्डी दलों के हमले से हमारे ऊपर मानो दो दो महामारियों की मार पड़ रही है. टिड्डियों के ये झुंड जहां भी ज़मीन पर उतरते हैं, वो लगभग सब कुछ चट कर जाते हैं. उनका हमला बेहद डरावने ख़्वाब जैसा है.'

    टिड्डों के दलों के इस हमले का कारण 2018-19 के दौर में आए समुद्री तूफ़ान और बारिश हैं

    दो साल पहले दक्षिणी अरब प्रायद्वीप में तेज़ बारिश से पैदा हुई नमी और उचित माहौल के कारण टिड्डियों की तीन पीढ़ियां मज़े में पली बढ़ीं. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि टिड्डियों की आबादी में आए इस ज़बरदस्त उछाल पर किसी की नज़र ही नहीं पड़ी

    अल्बर्ट लेमासुलानी, उत्तरी कीनिया के चरवाहे और टिड्डी दलों पर निगाह रखने वाले
    उत्तरी कीनिया में जानवर पालने वाले अल्बर्ट लेमासुलानी टिड्डियों के दल का पता लगाने में मदद करते हैं
    कई देशों में टिड्डों पर क़ाबू पाने के अभियान चलाए जाने के बावजूद, हाल में हुई भारी बारिश ने टिड्डियों की आबादी बढ़ाने के लिए बिल्कुल सही माहौल तैयार कर दिया है

    इस समय टिड्डियों की अगली पीढ़ी के अंडे फूट रहे हैं. और ठीक इसी समय पूरे क्षेत्र में किसान फ़सलों के नए सीज़न की बुवाई कर रहे हैं. कृषि एवं खाद्य संगठन का कहना है कि टिड्डियों के हमले से पहले ही खाद्य संकट से जूझ रहे कई देशों की चुनौतियां और बढ़ जाएंगी. ख़ास तौर से पूर्वी अफ्रीका के देशों में.

    इस समय खाद्य एवं कृषि संगठन टिड्डियों के दलों को क़ाबू करने के लिए फंड जुटा रहा है. लेकिन, कई देशों के लिए कीटनाशकों का छिड़काव बहुत देर से उठाया गया क़दम साबित हुआ है

    उत्तरी कीनिया और उसके आगे के किसानों ने तो टिड्डी दलों के हमले में अपना सब कुछ पहले ही गंवा दिया है

    अल्बर्ट लेमासुलानी कहते हैं कि, 'हर रोज़ पांच, छह, सात या दस टिड्डी दल हमला करते हैं.' लेमासुलानी टिड्डी दल से निपटने के संयुक्त राष्ट्र और कीनिया सरकार के अभियान में मदद देने के लिए स्वयंसेवकों की एक टीम की अगुवाई करते हैं. अल्बर्ट कहते हैं कि, 'अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे. हमारी ज़िंदगी ख़त्म हो जाएगी.'

    क्रेडिट
    टिड्डों के मॉडल और एनिमेशन-जैस्मिन बोनशोर, डिज़ाइन-गेरी फ्लेचर, स्टोरी डेवेलपमेंट-कैट्रिओना मॉरिसन, स्टीवेन कॉनर और एडम एलेन. लेखन-लूसी रोजर्स. फील्ड रिपोर्टिंग-जो वुड . (bbc.com/hindi)

संपादकीय

  • ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बरस के रक्षाबंधन ने किस तरह की रक्षा दी, और यह किस पर बंधन?
    ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बरस के रक्षाबंधन ने किस तरह की रक्षा दी, और यह किस पर बंधन?

    हिन्दुस्तान में आज राखी का त्यौहार मनाया जा रहा है जो कि एक ऐसा अनोखा त्यौहार है जिसकी जड़ें किसी धर्म में नहीं है, महज सामाजिक रिवाजों में है। दुनिया में शायद ही दूसरे देशों में ऐसा त्यौहार हो जिसमें बहन भाई की कलाई पर राखी या रेशमी डोरी बांधकर उससे अपनी सुरक्षा का वादा ले। रक्षाबंधन अपने शब्दों के मायने, और परंपरा दोनों हिसाब से यही कहता है कि बहन अपनी हिफाजत के लिए भाई को राखी बांधती है। 

    अब सवाल यह है कि यह रिवाज जब बना होगा तब बना होगा, और शायद कुछ सौ साल पहले से तो इसका इतिहास भी है। लेकिन यह समाज की उस वक्त की सोच को बताने वाला रिवाज भी है कि एक लडक़ी या महिला को हिफाजत के लिए भाई की जरूरत पड़ती है। फिर चाहे आज के माहौल में भाई बहन की मदद को जाते हों या न जाते हों, मां-बाप की जायदाद में बंटवारे के लिए बहन पर हमला करते हों, जो भी हो राखी की यह सामाजिक परंपरा चली आ रही है। आज के मुद्दे से हटकर एक दूसरी बात का जिक्र यहां करना जरूरी लग रहा है कि हाल के 20-25 बरसों में जब से हिन्दूवादी आक्रामक संगठनों को पश्चिमी प्रेम की संस्कृति से अपने देश को बचाना जरूरी लगा है, तब से फ्रेंडशिप डे पर, और वेलेंटाइन डे पर बाग-बगीचों में और सार्वजनिक जगहों पर बैठे हुए लडक़े-लड़कियों को ट्वीट कर उनमें राखी बंधवाई जाती है। यानी जो लडक़ा लडक़ी के साथ रहता है, और जो उसे हिफाजत से लेकर बैठा है, उसको राखी बंधवाई जा रही है कि वह उस लडक़ी की हिफाजत करेगा। तो उसका सीधा मतलब तो यही निकलता है कि अगर उस लडक़े में ताकत हो तो ऐसे धर्मान्ध और हिंसक राष्ट्रवादी गिरोह के लोगों को वह अकेले पीट-पीटकर भगाए, क्योंकि जिसे उसकी बहन बनाया गया है, उसे वह गिरोह ही तो परेशान कर रहा है, वही उसकी बेइज्जती कर रहा है। 

    लेकिन आज राखी के दिन यह सोचने की जरूरत है कि रक्षाबंधन नाम का यह शब्द तो ऐसे लोगों के लिए है जो रक्षा करते हैं, शब्द के मायने तो कहीं नहीं बताते कि भाई ही बहन की रक्षा करे, बहुत से मामलों में तो बहन भाई की मदद करती है, उसकी रक्षा करती है। दूसरी बात यह भी है कि सैकड़ों बरस पुराने इस रिवाज के पीछे जो मर्दाना सोच रही होगी, क्या आज 21वीं सदी में भी उसका सम्मान करना जरूरी है? यह शब्द समाज की सोच में इतने गहरे पैठा हुआ है कि इसमें लोगों को कोई खामी भी नहीं दिख पाती। लोगों को यह एक सामाजिक रिवाज लगता है, और इसकी किसी भी किस्म की आलोचना लोगों को हिन्दुस्तानी संस्कृति या हिन्दू धर्म का विरोध लगने लगेगी, इस रिवाज का हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। 

    भारतीय समाज में ऐसे बहुत सारे भेदभाव से भरे हुए रिवाज चले आ रहे हैं। हिन्दुओं के बीच कुंवारी लडक़ी से 16 सोमवार के उपवास करवाए जाते हैं, ताकि उसे अच्छा पति मिले। हिन्दू धर्म में सैकड़ों बरस से चले आ रहे इस रिवाज को किसी ने बदलकर ऐसा बनाने की नहीं सोची कि लडक़े 16 सोमवार का उपवास करें ताकि वे बेहतर पति बन सकें। सुहागिन महिलाओं से करवाचौथ का व्रत करवाया जाता है, और पति की मंगलकामना करते हुए वे उपवास करती हैं, और रात में पति के चेहरे को देखकर चांद देखा मानकर फिर वे कुछ खाती हैं। आमतौर पर निर्जला व्रत का चलन है। पति चाहे साल में दो बार थाईलैंड जाकर आने वाला क्यों न हो, अपने ही देश और शहर में मौका मिलते ही इधर-उधर मुंह मारने वाला क्यों न हो, उसकी मंगलकामना के लिए, उसके लंबे जीवन के लिए, और खुद सुहागन मरने के लिए महिलाओं से करवाचौथ का व्रत करवाया जाता है। 

    महिलाओं को इस किस्म की सोच का कैदी बनाए रखने के रिवाज अंतहीन हैं। हिन्दू विवाह में लडक़ी के मां-बाप लडक़ी का कन्यादान करते हैं। अच्छे-भले प्रगतिशील सोच के लोग भी इस रिवाज से टकराने की नहीं सोचते कि रिवाज में फेरबदल करने से शादी करवा रहे पंडित पटरी से न उतर जाएं। जिस वक्त दूल्हे को यह समझ आता है कि उसे दुल्हन दान में मिल रही है, तो फिर वह उस दुल्हन के साथ दहेज में चारा भी चाहता है, दान में मिली उस बछिया को बांधने के लिए एक शेड भी चाहता है। ऐसी सोच के बाद ही दान से लेकर दहेज-प्रताडऩा और दहेज-हत्या तक की नौबत आती है। 

    हिन्दू और हिन्दुस्तानी समाज में महिला को नीचा दिखाने के तरीकों में कोई कमी नहीं रखी, और उसकी सोच को इस कदर कुचला कि वह बराबरी की कभी सोच भी न पाए। आबादी के एक बड़े हिस्से में बचपन से ही बच्चियों को घर का काम सीखने को कहा जाता है, और भईया, भईया तो पढऩे के लिए है, या कुर्सी पर बैठकर बहन से सामान मंगवाने के लिए है। बहुत से परिवारों में लडक़े और लड़कियों के खानपान में भी फर्क किया जाता है। छत्तीसगढ़ की एक तस्वीर को लेकर हमने कई बार इस बात को लिखा है कि गांवों की स्कूलों में लडक़े तो पालथी मारकर बैठकर दोपहर का खाना खाते हैं, लेकिन लड़कियां उकड़ू बैठकर खाती हैं। किसी ने इसके पीछे का तर्क बताया तो नहीं, लेकिन हमारा अंदाज है कि इस तरह बैठकर खाने पर लड़कियां कम खा पाती होंगी, और शायद किसी समय किसी इलाके में उनके इस तरह बैठने का रिवाज ऐसी ही सोच से शुरू हुआ होगा। क्योंकि आम हिन्दुस्तानी घरों में महिला खाने वाली आखिरी प्राणी होती है, ताकि जो बचा है उससे उसका काम चल सके बाकी तमाम लोगों को पहले पेटभर खाना मिल जाए। यह बात महिला से बढक़र परिवार की लड़कियों तक पहुंच जाती है, लेकिन पुरूष और लडक़े इससे अछूते रहते हैं। बहुत से परिवारों में लडक़े और लड़कियों के इलाज में भी फर्क किया जाता है। मुम्बई के सबसे बड़े कैंसर अस्पताल, टाटा मेमोरियल का एक सर्वे है कि वहां जिन बच्चों में कैंसर की शिनाख्त होती है, और जिन्हें आगे इलाज के लिए बुलाया जाता है, उनमें से लडक़े तो तकरीबन तमाम लाए जाते हैं, लेकिन बहुत सी लड़कियों को इलाज के लिए नहीं लाया जाता कि उनका इलाज कराने से क्या फायदा। 

    हिन्दुस्तानी समाज में महिलाओं से भेदभाव की मिसालें अंतहीन हैं, और उनमें से अधिकतर तो ऐसी हैं जो 15वीं सदी में शुरू हुई होंगी, या उसके भी हजार-पांच सौ बरस पहले, और आज 21वीं सदी तक चल ही रही हैं। एक वक्त पति को खोने के बाद महिला को सती बनाया जाता था, उसे चिता पर साथ ही जिंदा जला दिया जाता था। आज भी जब वृंदावन के विधवा आश्रमों को देखें, तो समझ पड़ता है कि विधवा महिलाओं के साथ समाज का क्या सुलूक है। जिन्हें विधवा आश्रम नहीं भेजा जाता, उनको भी घर में किस तरह पीछे के कमरों में, शुभ कार्यों से दूर, दावतों से दूर कैसे रखा जा सकता है, यह हिन्दुस्तान में देखने लायक है। एक लडक़ी अपने नाम के आगे कुमारी लिखकर कौमार्य का नोटिस लगाकर चलती है, शादी होते ही वह श्रीमती होकर अपने सुहाग की घोषणा करते चलती है। लेकिन पुरूष तो श्री का श्री ही रहता है। लडक़ी या महिला के नाम के साथ पहले पिता का नाम जुड़ा होता है, अगर शादीशुदा है तो पति का नाम जुड़ा होता है। बच्चों को नौ महीने पेट में रखकर पैदा मां करती है, लेकिन जब उनके नाम के साथ सरकारी कागजात में नाम लिखाना होता है, तो बाप का नाम पूछा जाता है, वल्दियत पूछी जाती है। हाल के बरसों में लंबी अदालती लड़ाई के बाद कुछ सरकारी और कानूनी कामकाज में कागजों पर मां का नाम लिखने का भी विकल्प दिया जाने लगा है, लेकिन हकीकत में उसके लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, और सरकारी मिजाज बाप के नाम के बिना आसानी से तसल्ली नहीं पाता।

    अब सवाल यह है, और आज रक्षाबंधन के मौके पर यह सवाल अधिक जरूरी है कि सैकड़ों बरस से हिन्दुस्तानी लडक़ी और महिलाएं लडक़ों और आदमियों को राखियां बांधते आ रही हैं, और एवज में उन्हें कौन सी सुरक्षा मिली है? उनका रक्षाबंधन क्या इतनी सदियोंं में भी असरदार नहीं हो पाया? न पिता न भाई न पति, न अड़ोस-पड़ोस के दूसरे लडक़े, और न ही छेडख़ानी या बलात्कार के वक्त आसपास खड़े दूसरे लोग क्या किसी पर भी रक्षा के किसी बंधन का कोई असर नहीं हुआ? तो अगर यह रिवाज इस कदर बेअसर है, तो यह रिवाज क्यों है? क्या हिन्दुस्तानी समाज की मर्द-मानसिकता लडक़े-लड़कियों, आदमी-औरतों के बीच संबंधों को लेकर ऐसी दहशत में जीती थी कि उसने एक वर्जित-रिश्ता बनाने के लिए ऐसा रिवाज खड़ा किया जिसे आमतौर पर तमाम लोग वर्जित मानते ही हैं। यह हिन्दुस्तानी रीति-रिवाजों के और बहुत से पाखंडों की तरह एक और पाखंड बनकर रह गया है जिसके पीछे की नीयत कुछ और रहती है, और जिसे सामने कुछ और बनाकर पेश किया जाता है? रक्षाबंधन का यह सिलसिला हिन्दुस्तानी लडक़ी और महिला को कोई रक्षा तो नहीं दे पाता, उसे बंधन के लायक साबित करने का एक मजबूत रिवाज जरूर लागू करता है। भ्रूण हत्या से बचकर निकल गई कोई लडक़ी अगर जिंदा रह भी गई, तो उसे कभी भाई से रक्षा के बिना न रहने लायक साबित करो, कभी शादी की रस्म में दान के लायक मान लो, कभी उसे पति के गुजर जाने पर सती कर दो, सती करना मुमकिन नहीं रह गया है तो उसे सफेद कपड़ों में सिर मुंडाकर विधवा बनाकर मरने तक के लिए आश्रम भेज दो। इस समाज के मर्द सैकड़ों बरस से महिलाओं से राखी भी बंधवा रहे हैं, और उन्हें इसी दर्जे की रक्षा दे रहे हैं। 

    (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

सेहत/फिटनेस

  • भविष्य में वैक्सीन के प्रभाव को कम कर सकती है बच्चों में आयरन की कमी
    भविष्य में वैक्सीन के प्रभाव को कम कर सकती है बच्चों में आयरन की कमी

    दुनियाभर में 5 वर्ष से कम उम्र के करीब 42 फीसदी बच्चे और 40 फीसदी गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी है 

    एक नए शोध से पता चला है कि यदि शैशव अवस्था में बच्चे के शरीर में आयरन की कमी हो तो वो भविष्य में टीकों के प्रभाव को कम कर सकती है। यह जानकारी ईटीएच ज्यूरिख द्वारा किये शोध में सामने आई है। यह शोध जर्नल फ्रंटियर्स इन इम्म्युनोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।

    हालांकि पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक टीकाकरण कार्यक्रम में तेजी आई है और यह पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बच्चों तक पहुंच रहा है। इसके बावजूद अब भी हर साल करीब 15 लाख बच्चे उन बीमारियों के कारण मर जाते हैं जिनके टीके उपलब्ध हैं। इनमें से ज्यादातर मौतें कम आय वाले देशों में ही होती हैं। लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया था कि आखिर क्यों टीकाकरण के बावजूद इन गरीब देशों के बच्चे इन बीमारियों का शिकार बन जाते हैं। यह एक बड़ी चिंता का विषय है कि आखिर क्यों इन देशों में टीकाकरण सफल नहीं हो पा रहा है। एक ही तरह की वैक्सीन होने के बावजूद इन देशों में टीके क्यों प्रभावी नहीं होते?

    एनीमिया से पीड़ित हैं 42 फीसदी बच्चे और 40 फीसदी गर्भवती महिलाएं
    वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे की एक बड़ी वजह शिशुओं में आयरन की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में 5 वर्ष से कम उम्र के करीब 42 फीसदी बच्चे और 40 फीसदी गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी है और वो एनीमिया से पीड़ित हैं। इसके पीछे की वजह उनके खाने में आयरन की कमी है। यदि भारत के आंकड़ों पर गौर करें तो नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 के अनुसार देश में 5 वर्ष से कम आयु के 58 फीसदी से ज्यादा बच्चे एनीमिया से ग्रस्त हैं। जबकि दूसरी और 15 से 49 वर्ष की करीब 53 फीसद महिलाओं में खून की कमी है।

    क्या कहता है अध्ययन
    हाल ही में किए दो अध्ययनों से यह बात साबित हो गई है कि बचपन में आयरन की कमी भविष्य में वैक्सीन के प्रभाव को कम कर सकती है। इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पहले शोध में केन्या के बच्चों पर अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार स्विट्ज़रलैंड में जो बच्चे जन्म लेते हैं उनके शरीर में पर्याप्त मात्रा में आयरन होता है जो आमतौर पर उनके जीवन के पहले 6 महीनों के लिए पर्याप्त होता है। वहीं दूसरी ओर केन्या, भारत, और अन्य पिछड़े देशों में जन्में शिशुओं में आयरन की कमी होती है। विशेषरूप से जिन बच्चों की माताओं में आयरन की कमी होती है, उनके बच्चे भी आयरन की कमी के साथ पैदा होते हैं। साथ ही उन बच्चों का वजन भी कम होता है। इस वजह से उनमें संक्रमण और खूनी दस्त जैसी समस्याएं होती हैं। इस कारण उनके शरीर में मौजूद आयरन भंडार दो से तीन महीनों में ख़त्म हो जाता है।

    शोध से पता चला है कि जिन बच्चों के शरीर में खून की कमी थी, उनके कई टीकाकरण के बावजूद डिप्थीरिया, न्यूमोकोकी और अन्य बीमारियों से ग्रस्त होने की सम्भावना अधिक थी, क्योंकिं उनके शरीर में इन बीमारियों के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता कम विकसित थी। इनमें गैर एनेमिक शिशुओं की तुलना में बीमारियों का जोखिम दोगुना था। इस शोध में आधे से भी अधिक बच्चे 10 सप्ताह की उम्र में एनीमिया से पीड़ित थे। वहीं 24 सप्ताह तक, 90 फीसदी से अधिक हीमोग्लोबिन और रेड सेल्स की कमी का शिकार थे।

    रोगाणुओं से निपटने में ज्यादा सक्षम था आयरन सप्लीमेंट पाने वाले बच्चों का शरीर
    दूसरे अध्ययन में शोधकर्ताओं ने रोजाना चार महीने तक छह माह के 127 शिशुओं को सूक्ष्म पोषक तत्वों वाला एक पाउडर दिया। 85 बच्चों के पाउडर में आयरन था, बाकि 42 बच्चों को आयरन सप्लीमेंट नहीं दिया गया। जब बच्चों को 9 माह की आयु में खसरे का टीका लगाया गया तो जिन बच्चों को आयरन दिया गया था, उनके शरीर में रोगाणुओं के खिलाफ ज्यादा प्रतिरक्षा विकसित हुई। 12 महीने की उम्र में इन बच्चों का शरीर ने केवल खसरे के रोगाणुओं से बेहतर तरीके से लड़ने में सक्षम था, बल्कि उनके शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली रोगाणुओं को बेहतर ढंग से समझने के भी काबिल थी।

    डब्ल्यूएचओ भी आहार में आयरन की पर्याप्त मात्रा लेने की सलाह देता है। शोधकर्ताओं के अनुसार इसको अपनाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि छोटे बच्चों के शरीर में मौजूद पर्याप्त मात्रा में आयरन से टीकाकरण कार्यक्रम में भी सफलता मिलेगी। साथ ही इसकी मदद से 15 लाख से भी ज्यादा बच्चों की जिंदगी बचाई जा सकेगी, जिनकी जान हर साल उन बीमारियों से चली जाती है जिन्हें टीकाकरण की मदद से रोका जा सकता है। (downtoearth.org.in)

मनोरंजन

  • अक्षय ने 'रक्षा बंधन' का पोस्टर किया शेयर
    अक्षय ने 'रक्षा बंधन' का पोस्टर किया शेयर

    अक्षय कुमार ने रक्षा बंधन पर जोरदार धमाल किया है। खिलाड़ी कुमार ने एकदम नए कॉन्सेप्ट के साथ एंट्री मारी है। अक्षय कुमार ने राखी के मौके पर अपनी अगली फिल्म रक्षा बंधन का पोस्टर रिलीज किया है। इस पोस्टर में अक्षय कुमार चार बहनों को गले लगाए नजर आ रहे हैं। अक्षय कुमार की फिल्म का नाम रक्षा बंधन है। रक्षा बंधन' को आनंद एल राय डायरेक्ट कर रहे हैं जबकि फिल्म की कहानी हिमांशु शर्मा ने लिखी है। रक्षा बंधन 5 नवंबर, 2021 को रिलीज होगी।

    अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म रक्षा बंधन बहन अल्का को समर्पित की है। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा है, शायद ही कभी जीवन में कोई ऐसी कहानी सामने आती है जो आपके दिल को इतनी गहराई से छूती है और वह भी इतनी रफ्तार से...मेरे करियर की सबसे तेज रफ्तार से साइन की गई फिल्म। यह फिल्म मैं अपनी प्यारी बहन अलका को समर्पित करता हूं, जिसके साथ मेरा दुनिया में सबसे खास रिश्ता है। मेरी जिंदगी की सबसे स्पेशल फिल्म में से एक देने के लिए शुक्रिया आनंद एल राय।

खेल

  • कोहली-शास्त्री के संबंध अच्छे इसलिए कामयाब-नेहरा
    कोहली-शास्त्री के संबंध अच्छे इसलिए कामयाब-नेहरा

    नई दिल्ली, 3 अगस्त । भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली और टीम के मुख्य कोच के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। कोहली और शास्त्री अकसर प्रेस कॉन्फ्रेंस स मं एक-दूसरे की तारीफ करते हुए नजर आते हैं। 

    ंपिछले साल वल्र्ड कप के बाद, जब भारतीय टीम सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के हाथों हार गई, तब ये कयास लगाए जाने लगे कि शायद बतौर कोच शास्त्री का कार्यकाल समाप्त हो सकता है। और भारतीय टीम शायद अन्य विकल्पों को तलाश करने लगे। तब कोहली ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में शास्त्री के बचाव मे आगे आए थे। उन्होंने कोच के रूप में शास्त्री की भूमिका की तारीफ करते हुए उन्हें एक और बार मौका दिए जाने की वकालत की थी। और कुछ सप्ताह बाद शास्त्री एक बार फिर भारतीय टीम के कोच थे। 

    शास्त्री और कोहली की जोड़ी ने भारतीय टीम को बीते कुछ अर्से में काफी जीत दिलाई हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया में 2018-19 में टेस्ट सीरीज जीतना सबसे ऊपर रखा जा सकता है। इन जोड़ी ने तेज गेंदबाजी को भी काफी अहमियत दी है और अब भारतीय टीम का तेज गेंदबाजी आक्रमण दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। 

    टीम इंडिया के पूर्व तेज गेंदबाज आशीष नेहरा ने बताया है कि आखिर क्यों शास्त्री और कोहली की जोड़ी इतनी कामयाब हुई है। नेहरा ने स्टार स्पोर्ट्स के कार्यक्रम क्रिकेट कनेक्टेड में कहा, शास्त्री कोहली को उनका स्पेस देते हैं। कोहली को भी पता है कि शास्त्री किस तरह के इनसान हैं और उनके साथ काम कैसे करना है। 

    नेहरा ने कहा, रवि शास्त्री बहुत अच्छे मोटिवेटर हैं। यह उनकी खूबी है। वह आपको काफी विश्वास जगा देते हैं। आप कितनी भी मुश्किल में क्यों न हों वह आपको उससे लडऩे और जीतने का हौसला देते हैं। विराट कोहली को भी नेतृत्व करना पसंद है। वह उदाहरण बनाते हैं। दोनों का व्यक्तित्व काफी मिलता-जुलता है। इस वजह से दोनों मिलकर बेहतरीन काम कर पा रहे हैं।
    रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के पूर्व गेंदबाजी कोच रहे नेहरा ने कहा कि कोहली और शास्त्री के बीच कई बातों को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन वे हमेशा एक दूसरे की सुनते हैं और मिलकर फैसला लेने की कोशिश करते हैं।  (नवभारत टाईम्स)

कारोबार

  • कैदियों के लिए राखियां पहुंचाई
    कैदियों के लिए राखियां पहुंचाई

    रायपुर, 3 अगस्त। रक्षाबंधन के पर्व के उपलक्ष्य मे कोरोना के चलते रायपुर सेंट्रल जेल में कैदियों के लिये उनकी बहनों के द्वारा राखी नहीं पहुंचने के कारण श्री सुधर्म महिला मण्डल ऐवम श्री सुधर्म नवयुवक मण्डल ने कैदियों की सुनी कलाई मे राखी पहुंचाई। निरंतर जेल के कैदियों के लिये श्री सुधर्म महिला मण्डल एवं नवयुवक मण्डल द्वारा विगत कई वर्षों से इस कार्य को करता आया है। मण्डल की अध्यक्ष भावना झजेड़ इन्दु बाफना निर्मला गोलछा रितु गोलछा सुधर्म नवयुवक मण्डल के प्रमुख सलहकार अजय जैन रतन गोलछा अध्यक्ष जितेन्द्र गोलछा संगठन मंत्री प्रकाश बाफना शैलेंद्र गोलछा की उपस्थिति में कैदियों को राखी दी गई। 

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