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विशेष रिपोर्ट

नक्सलवाद एक भटकी हुई सोच-रंजना चौबे

  2009 का दिन, जब ड्यूटी निभाते हुए शहीद हुए थे पति  

रंजना चौबे से तृप्ति सोनी की खास बातचीत

रायपुर, 3 अप्रैल (‘छत्तीसगढ़’)।  नक्सलियों के खात्मे को बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उन शहीदों की यादें भी ताजा हो गई हैं, जिन्होंने इस लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर किया। इन्हीं में से एक आईपीएस अफसर विनोद चौबे भी थे। शहीद विनोद चौबे की पत्नी श्रीमती रंजना चौबे का दर्द छलक उठा। उनका कहना है कि नक्सलवाद एक भटकी हुई सोच है।

जांबाज अफसर थे विनोद चौबे, जो वर्ष 2009 में नक्सली हमले में शहीद हो गए थे। घटना के 17 साल बाद उनकी पत्नी रंजना चौबे ने ‘छत्तीसगढ़’ से बातचीत में कई भावुक और महत्वपूर्ण पहलू साझा किए।

रंजना चौबे बताती हैं कि नक्सलवाद कोई नई समस्या नहीं थी, यह वर्षों से जारी थी, लेकिन पति की शहादत के बाद यह उनके जीवन से गहराई से जुड़ गई। वे कहती हैं कि जब भी नक्सलियों के मारे जाने, पकड़े जाने या आत्मसमर्पण की खबर मिलती है, तो उन्हें लगता है कि यह उनके पति सहित सभी शहीद जवानों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है। उन्हें संतोष है कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया।

शहादत वाले दिन को याद करते हुए वे बताती हैं कि सुबह उनकी अपने पति से बातचीत हुई थी। वे एक पारिवारिक कार्यक्रम में आने वाले थे, लेकिन बाद में उन्होंने बताया कि वे किसी जरूरी काम में व्यस्त हैं और नहीं आ पाएंगे। कुछ ही देर बाद टीवी पर खबर चली कि एसपी के ड्राइवर को गोली लगी है। उस समय पूरी जानकारी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे लोगों के आने से सच्चाई सामने आई।

उन्हें बताया गया कि विनोद चौबे पहले एंबुश में फंसे लोगों को बचाने पहुंचे थे। इसके बाद लौटते समय जब उन्होंने देखा कि उनके जवान खतरे में हैं, तो वे दोबारा उन्हें बचाने के लिए वापस गए और इसी दौरान नक्सलियों के हमले में शहीद हो गए।

रंजना चौबे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि शादी के बाद जब वे नारायणपुर में रहीं, तब नक्सल गतिविधियां बढ़ रही थीं। पुलिस जवान लगातार जंगलों में गश्त करते थे। कई बार भोजन तक की कमी होती थी और मुर्रा-चना खाकर काम चलाना पड़ता था। बाद में कांकेर में हालात इतने गंभीर थे कि घर के भीतर भी हथियार रखने पड़ते थे।

विचार/लेख

ऐसी थी विदुषी और विद्रोही पंडिता रमाबाई, जिसे गाली देने में तिलक भी हो गए थे ओछे

भारतीय इतिहास के पन्नों में जब ‘नवजागरण’ (Renaissance) की बात होती है, तो राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फुले या दयानंद सरस्वती के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। लेकिन इसी आकाश में एक ऐसा नक्षत्र भी था जिसकी चमक ने न केवल सवर्ण पितृसत्ता की आंखों में चकाचौंध पैदा कर दी, बल्कि ईसाई मिशनरियों के पुरुष-अहंकार को भी चुनौती दी। वह नाम था-पंडिता रमाबाई सरस्वती। आज उनकी 104वीं पुण्यतिथि (5 अप्रैल 1922–5 अप्रैल 2026) पर यह याद करना जरूरी है कि क्यों उन्हें इतिहास की मुख्यधारा से सुनियोजित तरीके से बाहर रखा गया।

1858 में जन्मीं रमाबाई का बचपन जंगलों और यात्राओं में बीता। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे एक लीक से हटकर चलने वाले ब्राह्मण थे, जिन्होंने समाज के कड़े विरोध के बावजूद अपनी पत्नी और बेटी (रमाबाई) को संस्कृत सिखाई। जब 1877 के भीषण अकाल में रमाबाई ने अपने माता-पिता को खो दिया, तो वे अपने भाई के साथ पैदल ही पूरे भारत की यात्रा पर निकल पड़ीं।

कलकत्ता पहुँचने पर उनकी अद्भुत संस्कृत विद्वत्ता ने वहां के बड़े-बड़े पंडितों को हैरान कर दिया। यह वह दौर था जब स्त्रियों के लिए ‘अक्षर-ज्ञान’ भी पाप माना जाता था। वहां के विद्वानों ने उन्हें ‘पंडिता’ और ‘सरस्वती’ की उपाधियों से नवाजा-वे आधुनिक भारत की पहली स्त्री थीं जिन्हें सार्वजनिक रूप से यह सम्मान मिला। लेकिन रमाबाई केवल श्लोक पढऩे वाली विदुषी नहीं थीं। उन्होंने शास्त्रों का गहरा अध्ययन किया और पाया कि जिसे ‘धर्म’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में स्त्रियों और अवर्णों (शूद्रों) को गुलाम बनाए रखने का एक व्यवस्थित तंत्र है।

उन्होंने जाति की सीमाओं को तोड़ते हुए एक गैर-ब्राह्मण (बिपिन बिहारी मेधवी) से विवाह किया। पति की असमय मृत्यु के बाद, एक छोटी बच्ची को गोद में लिए रमाबाई ने सवर्ण हिंदू विधवाओं की उस ‘नरक’ जैसी स्थिति को अपनी आंखों से देखा, जहाँ बाल-विधवाओं का मुंडन कर उन्हें अंधेरी कोठरियों में डाल दिया जाता था। यहीं से शुरू हुआ उनका वह संघर्ष, जिसने आगे चलकर तिलक और विवेकानंद जैसे दिग्गजों के माथे पर बल डाल दिए।

शारदा सदन और मुक्ति मिशन : जब विधवाओं को ‘इंसान’ बनाया गया

रमाबाई ने महसूस किया कि समाज सुधारक पुरुष केवल ‘विधवा विवाह’ की बात करते हैं, जैसे विवाह ही स्त्री के उद्धार का एकमात्र रास्ता हो। उन्होंने एक क्रांतिकारी विकल्प पेश किया—‘आत्मनिर्भरता।’ 1889 में उन्होंने पुणे में ‘शारदा सदन’ की स्थापना की। यह सिर्फ एक छत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी जगह थी जहाँ विधवाओं को शिक्षा, टाइपिंग, बढ़ईगिरी और बागवानी सिखाई जाती थी ताकि वे किसी पुरुष की दया पर निर्भर न रहें।

उन्होंने अपनी कालजयी पुस्तक ‘The High-Caste Hindu Woman’ (1887) के जरिए दुनिया को बताया कि हिंदू समाज की ‘कुलीनता’ वास्तव में स्त्रियों के शोषण की नींव पर खड़ी है। उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया क्योंकि उन्हें लगा कि वहां ‘समानता’ है, लेकिन जल्द ही उन्होंने वहां भी पितृसत्ता से लोहा लिया और बाइबिल का अनुवाद सीधे हिब्रू से मराठी में किया, ताकि चर्च के पुरुषों द्वारा किए गए ‘स्त्री-विरोधी’ अनुवादों को ठीक किया जा सके।

तिलक का भाषाई प्रहार: ‘पंडिता’से ‘रेवरंडा’ की गाली तक

यही वह बिंदु था जहाँ से रमाबाई के खिलाफ ‘महारथियों’ का मोर्चा खुला। बाल गंगाधर तिलक के लिए ‘स्वराज’ का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति था। तिलक का राष्ट्रवाद सवर्ण पुरुष की संप्रभुता पर टिका था। जब रमाबाई की ख्याति और उनके स्वतंत्र विचार बढऩे लगे, तो तिलक ने अपने अखबार ‘मराठा’ और ‘केसरी’ में उन पर व्यक्तिगत हमले शुरू किए।

तिलक ने उन्हें ‘पंडिता’ कहना बंद कर ‘रेवरंडा’ कहना शुरू किया। यह केवल एक पदवी नहीं थी। ‘रेवरेंडा’ शब्द का प्रयोग तिलक ने इसलिए किया ताकि उसमें ‘रंडा’ (विधवा के लिए एक अत्यंत अपमानजनक गाली) की ध्वनि साफ सुनाई दे। तिलक की नजऱ में एक विधवा का स्वतंत्र होना और धर्म बदलना समाज के पतन का संकेत था। तिलक ने ‘केसरी’ (1887) में साफ़ लिखा था:

‘स्त्रियों की शिक्षा और उनकी स्वतंत्रता हिंदू समाज की जड़ों में तेल डालने जैसा है। जो स्त्रियाँ पुरुषों के समान अधिकारों की मांग करती हैं, वे वास्तव में धर्म का नाश कर रही हैं।’

‘एज ऑफ कंसेंट’और तिलक का ‘मर्दाना’ स्वराज

1891 में जब लड़कियों के लिए शादी की उम्र 10 से बढ़ाकर 12 साल करने का कानून (Age of Consent Bill) आया, तो तिलक इसके सबसे उग्र विरोधी थे। रमाबाई इस कानून के पक्ष में थीं क्योंकि उन्होंने सवर्ण घरों में छोटी बच्चियों का यौन शोषण देखा था। तिलक ने इस सुधार को ‘हिंदू धर्म पर हमला’ बताया। उनका तर्क था:

‘हमें अपनी संतानों पर पूर्ण अधिकार है। सरकार को यह तय करने का कोई हक नहीं कि हम अपनी बच्चियों का विवाह किस उम्र में करें।’तिलक का स्वराज उस 10 साल की बच्ची के आंसुओं पर खड़ा था, जिसे धर्म के नाम पर बूढ़ों के बिस्तर पर धकेला जा रहा था।