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अंतर्राष्ट्रीय

  • दक्षिण चीन सागर में अमरीकी युद्धपोतों का अभ्यास
    दक्षिण चीन सागर में अमरीकी युद्धपोतों का अभ्यास

    वॉशिंगटन, 4 जुलाई । दक्षिण चीन सागर में चीन पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका ने विवादित इलाके में अपने दो विमानवाहक युद्धपोतों को भेज दिया है। ये पोत यहां सैन्य अभ्यास में शामिल होंगे। अमेरिकी नेवा ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि यूएसएस रेगन और यूएसएस निमित्ज हिंत प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र रखने के लिए ऑपरेशन और एक्सरसाइज में जुटे हैं। 

    दो विमान वाहक चार युद्धपोतों के साथ चौबीसों घंटे फ्लाइट टेस्टिंग और हमला करने की क्षमता का परीक्षण करेंगे। पूरी दुनिया की नजर इसलिए भी टिकी हुई है क्योंकि चीन और अमेरिका के सैन्य जहाज एक ही क्षेत्र में एक समय पर अभ्यास करेंगे, यह बेहद ही दुर्लभ मौका है। 
    रोनाल्ड रीगन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के अधिकारी लेफ्टिनेंट कमांडर सीन ब्रोफी ने एएनआई से कहा कि मैं पुष्टि कर सकता हूं कि यूएसएस निमित्ज और यूएसएस रोनाल्ड रीगन हिंद प्रशांत क्षेत्र स्वतंत्र और खुला रखने के लिए कैरियर ऑपरेशन और एक्सरसाइज में जुटे हैं।

    यूएस नेवी के अधिकारी ब्रोफी ने कहा कि यह प्रयास अमेरिका की उस प्रतिबद्धता के तहत है जिसमें हम अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक सभी देशों के उडऩे, नौवहन अधिकारों के साथ खड़े हैं। अमेरिका ने इस अभ्यास की प्लानिंग काफी पहले की थी, लेकिन इसे चीन को कड़ा संदेश देते हुए अभी आयोजित किया जा रहा है, क्योंकि चीन विवादित पारासेल आइलैंड के पास अभ्यास में जुटा है, जिसका अमेरिका सहित कई देशों ने विरोध किया है। 

    अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने शुक्रवार को ट्वीट किया, अमेरिका दक्षिण पूर्व एशिया के अपने मित्रों से सहमत है। पीआरसी (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) का दक्षिण चीन सागर में विवादित स्थान पर सैन्य अभ्यास का हम विरोध करते हैं। हम चीन के गैरकानूनी दावे का विरोध करते हैं। (livehindustan)

     

राष्ट्रीय

  • बिहार में फिर आकाशीय बिजली से 15 मौतें
    बिहार में फिर आकाशीय बिजली से 15 मौतें

    पटना, 4 जुलाई । बिहार में बारिश और आकाशीय बिजली (वज्रपात) गिरने का सिलसिला जारी है। पिछले 24 घंटों के दौरान राज्य के अलग-अलग सात जिलों में आकाशीय बिजली गिरने (वज्रपात) से और 15 लोगों की मौत हो गई। आपदा प्रबंधन विभाग के एक अधिकारी ने शनिवार को बताया कि राज्य में पिछले 24 घंटे के दौरान आसमान से बिजली गिरने से 15 लोगों की मौत हो गई।

    इन जिलों में वज्रपात से हुई मौत

    मिली जानकारी के मुताबिक, आकाशीय बिजली से आज मरने वालों में वैशाली में छह, लखीसराय में दो, समस्तीपुर में 3, गया, बांका, नालंदा और जमुई जिले में एक-एक व्यक्ति शामिल है। इन सभी की मौत वज्रपात की चपेट में आने से हो गई। मौसम विभाग ने राज्य के पटना, भोजपुर, वैशाली, नालंदा सहित एक दर्जन से ज्यादा जिलों में आकाशीय बिजली को लेकर अलर्ट जारी किया है।

    सीएम ने की लोगों से ये अपील

    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी लोगों से खराब मौसम में पूरी सतर्कता बरतने और खराब मौसम होने पर वज्रपात से बचाव के लिए आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा समय-समय पर जारी किए गए सुझावों का अनुपालन करने की अपील की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि खराब मौसम में घर के अंदर ही रहें और सुरक्षित रहें।

    शुक्रवार को आकाशीय बिजली ने ले ली थी 8 लोगों की जान

    बिहार में शुक्रवार को राज्य के अलग-अलग पांच जिलों में आकाशीय बिजली (वज्रपात) गिरने से आठ लोगों की मौत हो गई। आपदा प्रबंधन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि जिलों से फोन पर मिली सूचना के मुताबिक, राज्य में शुक्रवार को आकाशीय बिजली गिरने से आठ लोगों की मौत हो गई। लखीसराय में दो, समस्तीपुर में तीन तथा गया, बांका और जमुई जिले में एक-एक व्यक्ति की मौत वज्रपात की चपेट में आने से हो गई।

    गुरुवार को 26 लोगों की हुई थी मौत

    इससे पहले, राज्य में गुरुवार को भी विभिन्न जिलों में वज्रपात की चपेट में आने से 26 लोगों की मौत हुई थी। पटना में छह, पूर्वी चंपारण में चार, समस्तीपुर में सात, कटिहार में तीन, शिवहर व मधेपुरा में दो-दो, पूर्णिया और पश्चिमी चंपारण जिले में एक-एक व्यक्ति की वज्रपात से मौत हो गई थी। इससे भी पहले, मंगलवार को बिहार के विभिन्न जिलों में वज्रपात से 11 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 26 जून को राज्य में वज्रपात की चपेट में आने से 96 लोगों की मौत हुई थी।(navbharat times)

राजनीति

  • शिवराज मंत्रिमंडल विस्तार के घंटे भर बाद विरोध-प्रदर्शन
    शिवराज मंत्रिमंडल विस्तार के घंटे भर बाद विरोध-प्रदर्शन

    3 माह इंतजार करते रहे सीएम

    भोपाल, 3 जुलाई। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बागी ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद से सरकार बनाने के तीन महीने से भी ज्यादा समय गुजरने के बाद सीएम शिवराज सिंह चौहान ने गुरुवार को दूसरी बार अपने मंत्रिपरिषद का विस्तार किया। इसमें बीजेपी ने पूर्व कांग्रेस नेता को उनके नौ मुख्य समर्थकों को मंत्रिपरिषद में शामिल कर पुरस्कृत किया है।
     
    सिंधिया गुट के 9 लोगों को गुरुवार को मंत्री बनाया गया। दो पहले ही मंत्री बन चुके थे। इनके अलावा कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को गिराने के लिए बीजेपी में जाने वाले 22 विधायकों में शामिल तीन अन्य पूर्व कांग्रेसी नेताओं को भी मंत्रिमंडल विस्तार में जगह मिली है। हालांकि, मंत्रिपरिषद विस्तार के कुछ घंटों के भीतर ही बीजेपी में विरोध के सुर उठने लगे। इंदौर के विधायक रमेश मेंदोला, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के विश्वासपात्र और मंदसौर विधायक यशपाल सिंह सिसोदिया के समर्थकों ने अपने नेता को मंत्री नहीं बनाए जाने पर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। 

    सीएम चौहान को इसका अंदाजा पहले से भी था, शायद यही वजह रही कि उन्होंने दिल्ली में कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं को मंत्रिपरिषद में शामिल करने की आवश्यकता के बारे में पार्टी हाईकमान को समझाने की कोशिश दो दिनों तक की। इसके अलावा बुधवार देर रात तक भोपाल में भी बातचीत जारी रही। जब बात नहीं बनी तो अंत में, चौहान ने मंथन से जहर पीने के आरोप के माध्यम से अपनी निराशा व्यक्त की, जबकि किसी और को अमृत मिला। 

    शिवराज सिंह चौहान ने 72 दिनों बाद मंत्रिमंडल का विस्तार किया। इसमें देरी हुई क्योंकि बीजेपी ने मंत्री पद के लिए चेहरे चुनने में सख्ती की। पार्टी ने अपने ही नेताओं पर कठोर रुख अपनाया जबकि, नए लोगों और कांग्रेस के विद्रोहियों को तवज्जो दी। इस दौरान सिंधिया ने अपने समर्थकों के लिए कड़ी मेहनत की।

    गुरुवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सीएम चौहान समेत राज्य में कुल मंत्रियों की संख्या 34 हो गई है। हालांकि, पार्टी ने अभी भी कुछ सीटें खाली रखी हैं। लेकिन अलग-अलग गुटों की मांग और सिंधिया कैम्प के दबाव के आगे पार्टी ज्यादा सीट नहीं बचा सकी है। इसलिए अब जल्द कैबिनेट विस्तार की संभावना नहीं के बराबर है। 28 नए मंत्रियों में से 18 बीजेपी के हैं, जिनके पास कुल 203 सदस्यों वाली विधानसभा में  107 विधायक हैं, जबकि 22 पूर्व कांग्रेसी नेताओं के कैम्प से 14 मंत्री बनाए गए हैं। दो पहले ही 21 अप्रैल के विस्तार में जगह पा चुके थे। (jansatta.com)

संपादक की पसंद

  • Editor's Choice : America is drunk on a warped idea of freedom, and now it’s killing people | Will Bunch
    Editor's Choice : America is drunk on a warped idea of freedom, and now it’s killing people | Will Bunch

    The videos are now showing up in your social media feed every hour or two, each one more over-the-top than the one before — viral missives from a world that seems to have gone mad and yet somehow exists right in our backyard. These “forgotten Americans” are at the lectern at your county commission meeting if they’re not yelling at you in the produce aisle — screaming that the elected officials and their so-called scientific experts demanding they wear a mask to prevent the spread of coronavirus are really part of a vast conspiracy to take away their freedoms.

    “I would also like to know where do you get the authority to reduce my oxygen,” one woman in a white “Trump Girl” shirt demanded of the Palm Beach County, Fla., commissioners as they met to issue a mandatory-mask-in-public order to fight a surge in COVID-19 cases in the Sunshine State. Her rant was not as remarkable as the fact she was just one of a stream of citizens with different variations on the same theme — that masks are a plot to subdue the masses in the name of Bill Gates or Hillary Clinton or whatever other Antichrist just popped up in their Facebook feed.
    “You see that flag, I would die for that flag,” a man who called himself “an American Patriot” told the commissioners. “The Constitution that you were supposed to uphold, I would die for that! None of you are holding that up.” Others said masks were either the devil’s work or shielding sexual predators, or else provided unintentional comic relief like the woman who insisted: “I don’t wear a mask for the same reason I don’t wear underwear. ... Things gotta breathe.”

    Similar sentiments echoed across Florida — “I will not be muzzled like a mad dog!” screamed one St. Lucie County man, sounding very much like a mad dog — and the United States, where residents of Huntington Beach, Calif., waved American flags and a large sign reading “NO MASKS” at motorists. But as the United States watched coronavirus cases spiral out of control in a manner that’s happened almost nowhere else in the world, the problem seemed deeper than the usual suspects of Trumpist QAnon believers. Even in “blue states,” young people packed bars and beaches and then brought COVID-19 home for Father’s Day. In Santa Cruz County, Calif., commissioners who’d tried to keep beaches closed simply gave up. “People,” a spokesperson said, “are not willing to be governed in that regard.”
    The most comprehensive study published in the journal Lancet found mask-wearing could reduce the risk of coronavirus transmission from 17% to 3%. No wonder the University of Washington says universal mask-wearing in the United States would reduce the coronavirus death toll between now and October by a whopping 33,000 human beings.

    Just think of all the restrictions on freedom and liberty — from the government seeing what you checked out at the library to invasive searches at the airport — to prevent another attack like 9/11 that killed 3,000 people, or less than one-tenth the toll from not wearing masks. But for millions of Americans — not a majority, mind you, but enough to cause a public-health hazard in a pandemic — the idea of masks has been launched into a different orbit where freedom talk is injected with the uniquely American viruses of free-market capitalism and media manipulation, maybe with a dollop of white supremacy.
    The 1970s’ British glam-pop rockers Sweet practically predicted all of this with their 1978 smash, “Love Is Like Oxygen”: “... You get too much and get too high, not enough and you’re gonna die.” In the mask debate, just substitute the word freedom for love. Because, yes, freedom — to speak, to publish, to worship, to assemble, and to protest the government — is absolutely essential to the American experience, so much so that it’s hard to get in a “but ...”
    But ... too much of the warped notion of freedom promoted by the aggressively not-mask-wearing President Trump and his No. 2, Mike Pence, and their prophets like Rush Limbaugh and Sean Hannity won’t just get you high — to continue with the Sweet analogy — but could also kill you by an overdose. What the radio hucksters, and the wannabe dictators they installed, won’t tell you is that freedom without any social responsibility or empathy for others is ultimately hollow.

    But let’s remember that American people — even the damaged souls that you’re laughing at on Twitter today — didn’t pervert the meaning of freedom on their own. The warped modern version of liberty was sold to them, first by right-wing public intellectuals like Ayn Rand, who killed thousands of trees to wrap unbridled selfishness in her endless tomes about freedom, and later by the salesmen of Big Capitalism.
    Protecting your freedom became the ideal branding for what these pitchmen really wanted, which was political cover to dramatically lower taxes on millionaires (who, thanks to that, would become billionaires) and to crush unions and their demands for higher pay, freeing up profits to now pay CEOs 350 times what the average worker makes. Talk about finding the cost of freedom! With the help of academics like the Nobel economist James McGill Buchanan, backed by billionaires like the Koch brothers, warped freedom capitalism got a fancy name — free-market libertarianism. But by the 1970s, their new form of snake-oil salesmanship was threatened by the avatars of a newer “knowledge economy.”

    Confronted with scientific realities like man-made climate change, the forces of conservative libertarianism turned their guns toward expertise, with the goals of thwarting environmentalism and keeping corporate profits high. The bills for global warming are starting to come due, but that has been superseded for the time being by the COVID-19 crisis; the lack of trust for medical expertise from Main Street all the way to an ignorant president whom 62 million Main Streeters installed at 1600 Pennsylvania Avenue has proved lethal.

    No other nation has botched its coronavirus response so badly because no other nation holds science in such low esteem. “Who made you perpetrators over my life?” the self-proclaimed Trump Girl demanded of the experts at the Palm Beach County meeting. In a recent Washington Post op-ed, Stanford psychiatry prof Keith Humphreys noted that the United States simply can’t impose a coronavirus testing regimen like South Korea or Singapore because we don’t trust the government on public health. “Clusters of gun-toting protesters opposing public health measures are a real — and uniquely American — problem,” he wrote, “but it’s the much more prevalent distrust in government’s role in public health that would curtail the success of any test, trace and isolate program.”
    In a functioning society, freedom can flourish when it’s part of a broader social compact, when liberty is not abused because its practitioners also see themselves as part of a community, where they care about others — even, or especially, when it comes to wearing a mask and not spreading germs to your neighbor. But has there ever been a branding campaign as successful as America repackaging selfishness, self-interest, and extreme inequality as personal freedom?

    That’s even true of the freedom that’s so central to my work life: the free press that exists under the First Amendment. I’ve seen how that only works well when publishers fuel their press freedom with common sense and an understanding of responsibility to the readers. In the internet age, the promise of an even greater media freedom has been polluted by billionaires from Fox’s Rupert Murdoch to Facebook’s Mark Zuckerberg, who made bigger profits off lies and unchecked conspiracy theories than off fact-checking in the public interest. The filth of Zuckerberg’s Facebook is what’s spewing, unmasked, from the self-styled “patriots” of Palm Beach County.

    There’s something else going here, and in the age of George Floyd it cannot be ignored. As Nancy MacLean chronicled in her award-winning Democracy in Chains about the above-mentioned James McGill Buchanan, his think-tank crusade to promote libertarianism was initially rooted in preserving Southern school segregation, or white supremacy. Over the last 50 or so years, much of what conservatives have hyped as threats to personal liberty were really proposed checks on white (or male) privilege.

    White supremacy is, at its diseased heart, a quest for a kind of cultural immortality. As the global pandemic advanced and as evidence mounted that COVID-19 is most lethal not just for the elderly but also for Black and brown Americans, it seems clear that for some white people, not wearing a mask isn’t just a freedom song but a defiant proclamation of their superiority. That’s validated every day by America’s white-supremacist-in-chief, whose refusal to wear a mask in public is in fact a different kind of mask, one of his deep insecurity. This toxic blend of narcissism and white privilege is Donald Trump’s idea of leadership — even as he leads some of his voters to an early grave.

    The flip side is that the millions who’ve marched in America’s streets after George Floyd’s murder — many, although not all, from the under-35 generation — are making the case that a better world, built around empathy and compassion for people who don’t look like ourselves, is coming. They are using their freedom of speech and assembly to forge a more perfect union, and I fervently wish that the 33,000 Americans who may be doomed by a lethal injection of phony liberty can somehow live to see it.

संपादकीय

  • ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जब सबसे बड़ी वैज्ञानिक  संस्था विज्ञान छोड़ दे तो...
    ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जब सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था विज्ञान छोड़ दे तो...

    इतिहास को मनचाहे तरीके से ढालने की ताकत जब आ जाती है, तो हसरत फिर वहीं नहीं थमती, वह आगे बढ़ते चलती है। हिन्दुस्तान में यह हसरत अब भविष्य को भी ढाल लेना चाहती है। भविष्य को गढ़ लेने तक तो बात ठीक थी, लेकिन भविष्य को ढाल लेने की हसरत खतरा खड़ा कर रही है। हिन्दुस्तान में इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर का काम पूरी तरह से वैज्ञानिक है। जैसा कि संस्था का नाम सुझाता है, यह भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की संस्था है जो कि भारत में चिकित्सा शोध को नियंत्रित करती है। अभी 2 जुलाई को इसने देश की एक दवा कंपनी भारत बायोटेक को एक चिट्ठी लिखी है जिसमें कोरोना से बचाव के टीके के मानव-परीक्षण का जिक्र है। इसमें आईसीएमआर के डायरेक्टर ने लिखा है कि कोरोना की वैक्सीन के मानव परीक्षण के पूरे हो जाने के बाद 15 अगस्त तक इसे जनता के लिए उतार देने का अनुमान है। आपको इस क्लिनिकल ट्रॉयल के लिए चुना गया है, और जनता के स्वास्थ्य को देखते हुए कृपया यह सुनिश्चित करें कि 7 जुलाई तक परीक्षण के लिए मरीजों का पंजीयन हो जाए। 

    अब सवाल यह है कि जिस वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रॉयल की अभी शुरूआत भी नहीं हुई है और 7 जुलाई तक लोगों को इसके लिए छांटना है, क्या उसके लिए कोई वैज्ञानिक संस्था 5 हफ्तों का समय तय कर सकती है कि उसे 15 अगस्त तक लोगों के लिए इस्तेमाल करना शुरू हो जाए? जिन्हें विज्ञान की जरा सी भी बुनियादी समझ होगी वे इस तरह की बात सोच भी नहीं सकते। इंसानों की जिंदगी को प्रभावित करने वाला कोई ऐसा टीका जिसे दुनिया के सभी विकसित देश बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसे हिन्दुस्तान में लोगों के बीच उतारने के लिए पांच हफ्तों की एक बंदिश दे दी जाए। दुनिया के बहुत से विकसित देशों का यह अंदाज है उनके टीके जनता के काम में लाने के पहले कई महीनों का वक्त लग सकता है। कुछ देशों में मानव-परीक्षण शुरू हुए हैं, लेकिन किसी भी देश ने ऐसा कोई अनुमान सामने नहीं रखा है। 

    यह दुनिया की सबसे अच्छी बात होगी कि हिन्दुस्तान सबसे पहले ऐसा कामयाब टीका बना सके। लेकिन देश के स्वतंत्रता दिवस पर इसे पेश करने की हड़बड़ी बहुत घातक हो सकती है, क्योंकि क्लिनिकल ट्रायल में डॉक्टर और बाकी विशेषज्ञ कर्मचारी लगते ही हैं, और अगर उनके मन में एक ऐसी राष्ट्रवादी भावना पैदा हो गई कि आजादी की सालगिरह पर देश को यह तोहफा देना ही है, और इस सोच ने अगर मेडिकल-परीक्षण को प्रभावित किया, तो देश एक बहुत बड़े खतरे में भी पड़ सकता है क्योंकि कोरोना का टीका मरीजों को नहीं लगना है, तमाम जनता को लगना है, और उतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले इस टीके के किसी प्रयोग में कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई जानी चाहिए। आईसीएमआर चिट्ठी को देखें तो यह बहुत खतरनाक अंदाज में लिखी गई है, और इसमें सामने रखा गया लक्ष्य किसी भी वैज्ञानिक परीक्षण को बर्बाद करने के लिए काफी दिखता है। हिन्दुस्तानियों को यह बात याद नहीं होगी कि अमरीका में गर्भवती महिलाओं के लिए बनाई गई एक दवा थेलिडामाइड को जब बाजार में उतारा गया, तो उसे जादुई करिश्मे जैसा माना गया था। लेकिन इस दवा को लेने वाली महिलाओं के जब बच्चे होना चालू हुए, तो वे बिना हाथ-पांव के थे। वह अमरीकी इतिहास का एक सबसे बुरा दु:स्वप्न था। लेकिन तब तक गर्भावस्था के दौरान ही सुबह होने वाली मितली रोकने के लिए लाखों महिलाएं यह दवा ले चुकी थीं। अमरीकी मेडिकल नियम भारत के मुकाबले अधिक कड़े हैं, उसके बावजूद वहां ऐसी चूक हुई थी। आज हिन्दुस्तान में पूरी आबादी को जो टीके लगने हैं, उन टीकों के मानव-परीक्षण के लिए पांच हफ्तों का वक्त तय किया जा रहा है, और चिकित्सा-वैज्ञानिकों को कह दिया जा रहा है कि 15 अगस्त को कामयाब टीका लेकर लालकिले पर पहुंच जाएं। 

    हिन्दुस्तान में प्रकाशित होने वाली इतिहास की कुछ किताबों में इतिहास बदल देना एक अलग बात है, उससे हकीकत की बुनियाद नहीं बदल रही, और आज की इमारत गिरने नहीं जा रही। लेकिन आज की मेडिकल-रिसर्च और आज उसके लिए जरूरी मानव-परीक्षण में ऐसी हड़बड़ी करना एक ऐसी उन्मादी राष्ट्रवादी सोच की उपज है जो प्रयोगशाला की कुर्सी पर तो बैठी है, लेकिन जिसने विज्ञान की बुनियादी समझ को पूरी तरह उतारकर कूड़े के ढेर पर फेंक दिया है।

    किसी देश के लिए विज्ञान से खिलवाड़ बहुत बुरा होगा, और ऐसे व्यापक उपयोग के एक टीके को आजादी की सालगिरह की तारीख दे देना हिन्दुस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी वैज्ञानिक चूक भी हो सकती है क्योंकि देश की पूरी आबादी इस टीके को लगवाने वाली रहेगी। इतनी बड़ी वैज्ञानिक संस्था की इतनी बड़ी अवैज्ञानिक चिट्ठी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज रहेगी, और बाकी दुनिया के चिकित्सा विज्ञान में इस एक चिट्ठी से भारत की साख पर बट्टा लगेगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

सेहत/फिटनेस

  • पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं
    पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं

    पांच अच्छी बातें जो भारतीय समाज को कोरोना वायरस ने सिखाई हैं

    -अंजलि मिश्रा

    अंतरर्राष्ट्रीय बही-खातों का हिसाब रखने वाली संस्था, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का कहना है कि सारी दुनिया जल्दी ही आर्थिक महामंदी का सामना करने जा रही है. कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते कई महीनों से बंद आर्थिक गतिविधियों के बाद वह ऐसा नहीं कहता तो आश्चर्य की बात होता. लेकिन जानकार यह आशंका भी जता रहे हैं कि कोरोना संकट सिर्फ पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को ही नहीं बल्कि राजनीति, देशों के आपसी संबंधों से लेकर हमारे सामाजिक-व्यक्तिगत संबंधों तक को बदलने वाला साबित हो सकता है.

    एक कड़वा सच यह भी है कि इनमें से ज्यादातर बदलाव नकारात्मक हो सकते हैं और भारत भी इनसे अछूता नहीं रहने वाला है. लेकिन इन तमाम बड़े-बड़े दावों और आशंकाओं के बीच कुछ छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव भी हैं, जिन्हें पिछले दिनों भारतीय समाज ने बहुत गंभीरता और तेजी के साथ अपनाया है. ये बदलाव इसलिए ध्यान खींचते हैं क्योंकि सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाला हमारा देश कई बार सही व्यवहार करने के मामले में बड़े ढीठ स्वभाव का दिखता रहा है. ऐसे में बीते कुछ सप्ताहों में यहां के एक बड़े हिस्से में आए ये पांच बदलाव बेहद मामूली होते हुए भी सुखद ठहराए जा सकते हैं.

    हाथों की सफाई

    मनोविज्ञान इंसानों के कभी-कभी ऑप्टिमिस्टिक बायस या अति-आशावादी रवैया दिखाने की बात कहता है. अति-आशावादी रवैया रखने वाले लोग किसी भी विपरीत परिस्थिति में यह मानकर चलते हैं कि वे बाकी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं. हर इंसान कम या ज्यादा इसका शिकार होता ही है और यही वजह है कि दुनिया के ज्यादातर लोगों को लगता है कि उन्हें तो कोरोना वायरस का संक्रमण हो ही नहीं सकता है. यह अति-आशावाद भारतीयों की भी सबसे बड़ी खूबी (या खामी) कहा जा सकता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण साफ-सफाई के लिए अब तक रहा हमारा लापरवाह रवैया है. मसलन, ऑफिस में काम करने के दौरान हम भारतीय दसियों चीजों को हाथ लगाने, लैपटॉप-फोन चलाने, नाक और सिर खुजलाने के अलावा भी जाने क्या-क्या करते रहते हैं. लेकिन जैसे ही कोई सहकर्मी खाने-पीने की कोई चीज आगे करता है, लपककर यह कहते हुए ले लेते हैं, मेरे हाथ तो साफ ही हैं! लेकिन कोरोना संकट ने हमें अपने हाथों को साफ रखना सिखा दिया है. हालांकि अभी ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है इतने थोड़े समय में यह आदत हर भारतीय के जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई है. लेकिन कोरोना संकट अभी लंबा चलने वाला है और उम्मीद की जा सकती है कि इसके खत्म होने तक हाथों से लेकर घर तक की साफ-सफाई हम में से कइयों के जीवन का एक स्थायी अंग बन चुकी होगी.

    छींकते या खांसते हुए आसपास वालों का ख्याल करना

    छींकने को हमारे यहां अनैच्छिक क्रिया कहकर, जो कि यह है भी, लोग अक्सर मनमाने तरीके से जोर-जोर से छींकते देखे जा सकते हैं. ऐसा करते हुए वे अक्सर इस बात का भी ख्याल नहीं करते हैं कि उनका ऐसा करना कुछ लोगों को कितना असहज कर सकता है. कोरोना संकट के दौरान बरती जाने वाली अतिरिक्त सावधानी का असर यह हुआ है कि अब लोग रूमाल, टिश्यू, मास्क या कुहनी के सहारे बहुत संभलकर छींकते-खांसते दिखाई देते हैं. दिलचस्प यह है कि पहले सर्दी-जुकाम का मरीज अक्सर इस बात से परेशान रहता था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है और लोग उसे कह रहे हैं कि अरे बस जुकाम ही तो हुआ है. लेकिन अब लोग जुकाम को इतनी गंभीरता से लेने लगे हैं कि किसी को दो-चार बार छींक या खांसी आ जाने पर ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे सामने वाले ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. और मरीज कुछ इस तरह के भाव देता रह जाता है कि बस जुकाम ही तो है. ऐसे में किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए लोग साधारण सर्दी-जुकाम में भी अतिरिक्त सावधानी बरतते नजर आने लगे हैं.

    अपनी बारी आने का इंतज़ार करना

    कोरोना संकट की शुरूआत से ही सबसे ज्यादा ज़ोर फिजिकल डिस्टेंसिंग पर दिया जा रहा है. अब भी किसी सार्वजनिक स्थान पर खड़े लोगों को एक-दूसरे से कम से कम तीन फीट की दूरी पर खड़े होने की सलाह दी जा रही है. इसकी वजह से पिछले कुछ समय से सब्जी और राशन की दुकानों पर भी लंबी-लंबी लेकिन अनुशासनबद्ध कतारों को देखा जा सकता है. इसमें दोहरा अनुशासन यह है कि इन कतारों में भी लोग उन जगहों पर ही खड़े हो रहे हैं जहां पर उन्हें एक-दूसरे से दूर रखने वाले गोले बने होते हैं. सबसे दिलचस्प नज़ारा पिछले दिनों उन शराब की दुकानों पर दिखाई दिया जहां पहले हर वक्त भगदड़ सी मची रहा करती थी. कोरोना वायरस के प्रकोप की वजह से इन दुकानों पर भी लोग सैकड़ों मीटर लंबी लाइनों में शांति से अपनी बारी का इंतज़ार करते दिखाई दिए. ऐसा माना जा रहा है कि कोरोना प्रकोप शांत होने के बाद जीवन में जो बदलाव होंगे उसमें फिजिकल डिस्टेंसिंग एक ज़रूरी हिस्सा बनकर हमेशा के लिए रह जाने वाला है. ऐसे में हो सकता है कि हमारा समाज भी स्थायी तौर पर अपनी बारी का इंतजार करने वाला समाज बन जाये.

    खाने-पीने या बाकी जरूरी सामान की बरबादी से बचना

    आंकड़ों की मानें तो, सामान्य परिस्थितियों में लगभग 20 करोड़ लोग भारत में रोज़ाना भूखे पेट सोते हैं. वहीं, एक लाख क्विंटल खाना हर साल हमारे देश में डस्टबिन में फेंक दिया जाता है. इस भयावह आंकड़े में होटलों या सामाजिक आयोजनों में बरबाद होने वाले खाने के साथ-साथ वह खाना भी शामिल है जो मध्यवर्गीय घरों में बासी या बचा हुआ कहकर कूड़ेदानों या नालियों के हवाले कर दिया जाता है. कोरोना संकट के चलते खाने-पीने की चीजों की कमी का डर अब इनकी बरबादी कम होने की वजह भी बन रहा है. कुछ मध्यवर्गीय गृहणियों से हुई सत्याग्रह की अनौपचारिक बातचीत में उनका कहना था कि अब वे इस बात का ख्याल रखती हैं कि घर में उतना ही खाना बने जितना कि खपत हो सके और अगर कुछ बचता है तो पहले वह खत्म हो.


    इसके अलावा, कई फिल्मी-सोशल मीडिया हस्तियों समेत आम लोगों का एक बड़ा तबका अक्सर यह कहता रहा है कि ईएमआई की सुविधा और हर समय मौजूद रहने वाले ऑनलाइन विकल्पों के चलते, वे तमाम ऐसी चीजें भी खरीद लेते थे जिनकी सही मायनों में उन्हें जरूरत ही नहीं है. लॉकडाउन ने बेज़ा खरीदारी की लत के शिकार ऐसे लोगों को भी होश में आने का मौका दे दिया है. यानी, यह कहा जा सकता है कि बहुत सारे लोग अब दाना-पानी से लेकर पैसों तक को बरबाद न करने का सबक कोरोना संकट के चलते सीख रहे हैं.

    परिजनों या करीबी लोगों के संपर्क में रहना

    लॉकडाउन के चलते करीब दो महीने से ज्यादा वक्त से अपने घरों में बंद लोग फोन और इंटरनेट के जरिए ही अपने परिवार और दोस्तों से जुड़ पा रहे हैं. लेकिन खास बात यह है कि वे ऐसा कर खूब रहे हैं. वे लोग जो कभी व्यस्त होने या फिर घरवालों को वरीयता न देने के चलते कभी-कभार ही उनसे संपर्क करते थे, अब घर की खैर-खबर नियमित तौर पर लेते दिखने लगे हैं. इतना ही नहीं, कई लोग तो अपने भूले-बिसरे दोस्तों और रिश्तेदारों को भी खोज-खोजकर उनका हालचाल जानने के बहाने खुद को व्यस्त और खुश रखने की कोशिश करते दिख रहे हैं. यह देखना दिलचस्प है कि एक ऐसे समय में जब लोग आपस में मिल तक नहीं पा रहे हैं, एक-दूसरे को अपेक्षाकृत ज्यादा समय दे रहे हैं.

    इसके अलावा भी, कुछ ऐसे लोग जिनकी उपस्थिति हमारी रोजमर्रा का हिस्सा थी, जैसे हाउस-हेल्प, सफाईकर्मी, डिलीवरी बॉय या छोटे-मोटे काम करने वाले और कई लोग, उनका भी महत्व इस कठिन समय में समझ आने लगा है. इसलिए उनसे संपर्क रखने, उनकी मदद और सम्मान करने की ज़रूरत भी एक बड़ा तबका महसूस करता दिखने लगा है. कुल मिलाकर, आधुनिकता के चलते एकल परिवारों या अकेले होने को तरजीह देने वाले, हमारे आसपास के कई लोग अब यह बात स्वीकार करते दिखने लगे हैं कि अपने लोगों के करीब रहना, एक सोशल सर्कल का होना और जिंदगी आसान बनाने वाले कई लोगों की उपस्थिति हमारे लिए कितनी ज़रूरी है. (satyagrah.scroll.in)

मनोरंजन

  • कानपुर में पुलिसकर्मियों की शहादत पर गुस्साए कपिल, दोषियों को मार दो
    कानपुर में पुलिसकर्मियों की शहादत पर गुस्साए कपिल, दोषियों को मार दो

    शुक्रवार को कानपुर में एक दिल दहला देने वाली घटना हुई। हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पकडऩे गई पुलिस पर हमला किया गया, ताबड़तोड़ फायरिंग हुई और आठ पुलिसकर्मी शहीद हो गए। इस में सीओ देवेंद्र मिश्रा का नाम भी शामिल है। इस घटना से पूरे देश में गुस्सा है और हर कोई शहीद पुलिसर्मियों को सलाम कर रहा है। अब कॉमेडियन कपिल शर्मा ने भी मामले में न्याय की मांग की है।

    कपिल शर्मा ने सोशल मीडिया पर एक ट्वीट कर कानपुर घटना पर गुस्सा जाहिर किया है। उन्होंने शहीदों को नमन किया है और दोषियों को मार देने की बात कही है। कपिल ट्वीट करते हैं- मैं रेस्ट इन पीस नहीं बोलूंगा क्योंकि मुझे पता है इन शहीदों को तब तक शांति नहीं मिलेगी जब तक आरोपियों को पकड़ मार ना दिया जाए। यूपी पुलिस को ताकत मिले कि वो दोषियों को पकड़ मार सकें।

    अब जो गुस्सा इस समय कपिल शर्मा के मन में है वहीं गुस्सा देश की रगों में भी दौड़ रहा है। हर कोई पुलिस के पराक्रम को सलाम कर रहा है और दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग। इस घटना के बाद से यूपी पुलिस एक्शन में आ गई है। विकास दुबे की तलाश तेज कर दी गई और उस पर 50 हजार का इनाम भी लगा दिया गया है। वहीं पुलिस ने इस समय 500 फोन सर्विलांस पर भी लगाए गए हैं। सिर्फ यही नहीं आस-पास के इलाकों में पुलिस इस समय बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन चला रही है और गांव से जोडऩे वाले नाकों के सीसीटीवी खंगाले जा रहे हैं। (आजतक)।

खेल

  • गुजरात में फर्जी जन्म प्रमाणपत्र  से क्रिकेट खेल रहे मुनाफ पटेल
    गुजरात में फर्जी जन्म प्रमाणपत्र से क्रिकेट खेल रहे मुनाफ पटेल

    नई दिल्ली, 4 जुलाई । गुजरात में फर्जी बर्थ सर्टिफिकेट के सहारे क्रिकेट एसोसिएशन में दाखिल लेने का मामला सामने आया है। बड़ौदा क्रिकेट एसोसिएशन अधिकारी यह जानकर हैरान रह गए कि गुजरात के बाहर के युवाओं को फर्जी दस्तावेजों के जरिए एसोसिएशन में भर्ती कराया जा रहा था।  टीम इंडिया के वल्र्ड कप जीतने वाली टीम के सदस्य रहे पूर्व तेज गेंदबाज मुनाफ पटेल का नाम भी इस घोटाले से जोड़ा गया है। 

    बीसीए पिछले कुछ सालों में खेल को एक व्यवसाय बनाने के आरोपों के साथ घिरा हुआ है। ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां एसोसिएशन से उसके गलत कामों के लिए पूछताछ की गई है जैसे कि निजी क्रिकेट एकेडमियों के पसंदीदा खिलाडिय़ों का चयन करना। इस तरह की घटनाओं ने पिछले कुछ सालों में बीसीए की छवि को धूमिल करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। 

    हाल ही में हुए घोटाले गैर-गुजरात निवासी शिवम भारद्वाज को फर्जी दस्तावेजों के जरिए बीसीए में दाखिला दिया गया था। शिवम को अंडर -16 टीम में शामिल किया गया था। बाद में पता चला कि भारद्वाज की उम्र 16 वर्ष से अधिक थी। इस मामले की और जांच की गई और उसके दस्तावेजों जैसे स्कूल छोडऩे का प्रमाण पत्र और आधार कार्ड को जांचा गया। 

    जब स्कूल प्रशासन से इस बारे में पूछा गया तो स्कूल ने जवाब दिया कि शिवम भारद्वाज नाम के किसी छात्र ने वहां पढ़ाई नहीं की है। इसके अलावा भारद्वाज का आधार कार्ड भी फर्जी निकला, जिससे बीसीए के अधिकारी सदमे में आ गए। इसके अलावा छानबीन के दौरान मुनाफ पटेल का नाम भी सामने आया। जांच ने सुझाव दिया कि मुनाफ पटेल ने भारद्वाज को बीसीए में दाखिला लेने के लिए निर्देशित किया था। 

    भारद्वाज के दस्तावेजों में मुनाफ के गृहनगर का नाम लिखा है। इससे मुनाफ इसमें फंस सकते हैं। यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि अगर बीसीए अपनी धोखाधड़ी गतिविधियों के लिए मुनाफ या भारद्वाज के खिलाफ मामला दर्ज करेगा या नहीं। बीसीए 23 जुलाई को अपनी बोर्ड बैठक आयोजित करेगा। जहां बहुत सारी चीजें सामने आएंगी। मुनाफ ने भारत के लिए 13 टेस्ट में 35 विकेट लिए थे। 70 वनडे में उनके नाम 86 विकेट दर्ज हैं। 3 टी20 में उन्होंने 4 विकेट झटके हैं। आईपीएल में मुनाफ ने 63 मैच में 74 विकेट अपने नाम किए थे।(jansatta)

     

कारोबार

  • रिलायंस जिओ  के सबसे ज्यादा डेटा वाले प्लान, 730 जीबी डेटा और अनलिमिटेड कॉल, 999  से शुरू
    रिलायंस जिओ के सबसे ज्यादा डेटा वाले प्लान, 730 जीबी डेटा और अनलिमिटेड कॉल, 999 से शुरू

    नई दिल्ली 3 जुलाई। रिलायंस जिओ ने हाल ही में ज्यादा डेटा वाले कई प्रीपेड प्लान लॉन्च किए हैं। आज हम आपको जियो के उन रिचार्ज पैक के बारे में बताएंगे जो बंपर डेटा के साथ आते हैं। अगर आपका डेटा खर्च ज्यादा है और आपको ऐसे रिचार्ज प्लान की तलाश है जिनमें भरपूर डेटा मिलता हो, तो ये पैक आपके लिए हैं। रिलायंस जियो के पास 999, 2,121 रुपये और 2,399 रुपये वाले रिचार्ज पैक हैं जो खासतौर पर उन लोगों के लिए हैं जो ज्यादा डेटा खर्च करते हैं।

    जियो का 2,399 रुपये वाला रिचार्ज पैक खासतौर पर उन यूजर्स के लिए है जो डेटा का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इस पैक की वैलिडिटी 365 दिन है। ग्राहकों को इस प्लान में हर दिन 2 जीबी डेटा मिलता है। हर दिन मिलने वाले डेटा की लिमिट खत्म होने के बाद स्पीड घटकर 64 Kbps रह जाती है। यानी इस पैक में कुल 730 GB डेटा ऑफर किया जाता है। जियो टू जियो अनलिमिटेड जबकि नॉन-जियो नेटवर्क पर कॉल करने के लिए 12 हजार मिनट्स मिलते हैं। इसके अलावा 100 एसएमएस भी हर दिन मुफ्त हैं। जियो के सभी ऐप्स का सब्सक्रिप्शन भी इस रिचार्ज पैक में फ्री ऑफर किया जाता है।

    जियो के 999 रुपये वाले पैक को भी कंपनी ने कुछ समय पहले ही लॉन्च किया है। इस पैक की वैलिडिटी 84 दिन है। इस प्लान में कुल 3 जीबी डेटा ऑफर किया जाता है। यानी कुल 252 जीबी हाई-स्पीड डेटा का मजा लिया जा सकता है। हर दिन मिलने वाले डेटा की लिमिट खत्म होने के बाद यूजर्स 64kbps स्पीड से डेटा का फायदा ले सकते हैं। जियो-टू-जियो अनलिमिटेड कॉल की सुविधा है वहीं जियो से दूसरे नेटवर्क पर कॉल करने के लिए 3000 मिनट्स मिलते हैं। ग्राहक हर दिन 100 मुफ्त एसएमएस भी भेज सकते हैं। इसके अलावा जियो ऐप्स का सब्सक्रिप्शन भी मुफ्त मिलता है।

    जियो के 2,121 रुपये वाले रिचार्ज पैक की वैलिडिटी 336 दिन है। इस रिचार्ज पैक में 1.5 जीबी डेटा हर दिन मिलता है। यानी ग्राहक कुल 504 जीबी हाई-स्पीड डेटा का फायदा ले सकते हैं। हर दिन खत्म होने वाले डेटा की लिमिट खत्म होने के बाद स्पीड घटकर 64Kbps रह जाती है। जियो नेटवर्क पर अनलिमिटेड जबकि नॉन-जियो नेटवर्क पर कॉलिंग के लिए 12 हजार मिनट मिलते हैं। ग्राहक हर दिन 100 मुफ्त एसएमएस का भी फायदा ले सकते हैं। जियो के बाकी रिचार्ज प्लान की तरह इस प्लान में भी जियो ऐप्स का सब्सक्रिप्शन भी मुफ्त मिलता है।(navbharat times)

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