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आरक्षण का यह नया झुनझुना हवा भरे गुब्बारे सा खोखला!
13-Nov-2022 4:07 PM
आरक्षण का यह नया झुनझुना हवा भरे गुब्बारे सा खोखला!

आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को आरक्षण देने के केन्द्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने सही माना है, और पांच जजों की बेंच ने तीन के बहुमत से यह फैसला दिया है कि इस नए आरक्षण के लिए संसद द्वारा किया गया बदलाव और यह आरक्षण संवैधानिक रूप से सही है। दो जजों ने इसके खिलाफ राय रखी, और कहा कि यह संविधान के खिलाफ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सोचने के लिए जो मुद्दे रखे गए थे, उनमें यह था कि क्या आरक्षण पूरी तरह से आर्थिक आधार पर दिया जा सकता है? दूसरा मुद्दा यह था कि क्या रा’य निजी शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण लागू कर सकते हैं अगर वे संस्थाएं सरकार से कोई अनुदान नहीं लेती हैं? और आखिरी मुद्दा यह था कि क्या आर्थिक आधार पर दिया गया आरक्षण इस आधार पर असंवैधानिक मानना चाहिए कि इससे दलित, आदिवासी, ओबीसी, और अन्य सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों को शामिल नहीं किया गया है? 

यह मामला थोड़ी सी कानूनी जटिलता का है, लेकिन इसे सामान्य समझबूझ से सरल तरीके से भी समझा जा सकता है। करीब 70 बरस पहले जब भारत का संविधान लागू हुआ, तो उसे बनाने वाले लोगों ने सिर्फ दो तबकों के लिए आरक्षण रखा था। उनका मानना था कि दलित और आदिवासी तबके भारतीय समाज में ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित और कुचले हुए हैं, और उन्हें बाकी तबकों की बराबरी तक लाने के लिए कुछ समय तक आरक्षण का फायदा देने की जरूरत है। यह कुछ समय तय नहीं था, और इस पर आगे फैसला लेकर इसे बढ़ाया गया, क्योंकि हिन्दुस्तान की सामाजिक हकीकत यह थी कि दलित और आदिवासी तबके समाज की मूलधारा में न बर्दाश्त किए जा रहे थे, और न ही उन्हें बराबरी के अवसरों के लिए तैयार होने के साधन-सुविधा मिल रहे थे। ऐसे में इन तबकों के लिए आरक्षण आगे बढ़ाया गया, जो कि अब तक लागू है। इसके बाद 1990 के आसपास प्रधानमंत्री रहे वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के तहत आने वाली जातियों के लिए आरक्षण लागू किया, जिसे ओबीसी के नाम से जाना जाता है। इन सबको लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर एक मामले में अदालत ने 1992 में एक वकील इंदिरा साहनी की लगाई पिटीशन पर एक ऐतिहासिक फैसले में ओबीसी आरक्षण को सही ठहराया, और साथ ही यह तय किया कि जाति आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी होगी। 

जानकार इस बात पर भी सवाल उठाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी की यह सीमा किस तरह तय की? अगर यह जातियों पर आधारित है तो दलित, आदिवासी, और ओबीसी की कुल आबादी 50 फीसदी से खासी अधिक होती है। और अब तक जो जातियां रिजर्वेशन से बाहर हैं, अनारक्षित हैं, वे उनके लिए मौजूद अनारक्षित सीटों के मुकाबले बहुत कम आबादी हैं। एक मोटा अंदाज यह है कि अगड़ी कही जाने वाली जातियां आबादी का कुल 27 फीसदी हैं, और 70 फीसदी से अधिक आरक्षित आबादी के लिए कुल 50 फीसदी सीटें आरक्षित हैं। इसलिए आरक्षण आबादी के अनुपात में किसी को अधिक सीटें अगर देता है, तो वह अगड़ी जातियां हैं। 

यहां पर 2011 की जनगणना के आंकड़ों को बताना ठीक रहेगा जिसके मुताबिक देश की हिन्दू आबादी में दलित करीब 22 फीसदी हैं, आदिवासी 9 फीसदी हैं, ओबीसी 42 फीसदी से अधिक हैं, और अगड़ी जातियां 27 फीसदी हैं। बौद्ध आबादी में करीब 90 फीसदी लोग दलित हैं, 7 फीसदी आदिवासी हैं, 1 फीसदी से कम ओबीसी हैं, और ढाई फीसदी के करीब अगड़ी जातियां हैं। जैन और पारसी आबादी में कोई दलित नहीं हैं। सिक्खों में दलित हिन्दुओं से करीब डेढ़ गुना, &0 फीसदी से अधिक हैं, ओबीसी 22 फीसदी से अधिक हैं, और अगड़े 46 फीसदी हैं। 

अब इस बात पर आएं कि सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला अब तक अनारक्षित चली आ रही जिन सवर्ण जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 फीसदी सीटें पढ़ाई और नौकरी में देने को सही ठहरा रहा है, वह क्या है? इसके तहत इन जातियों में से जिन परिवारों की सालाना आय 8 लाख रूपये से अधिक होगी, उन्हें आरक्षण के फायदे से बाहर कर दिया गया है। इसी तरह जिनके घर एक हजार वर्गफीट से अधिक जमीन पर बने होंगे, या जिनके पास पांच एकड़ से अधिक जमीन होगी, उन्हें भी इस आरक्षण का फायदा नहीं मिलेगा। मतलब यह है कि आर्थिक रूप से जो सक्षम हैं उन्हें इस फायदे से बाहर रखा गया है ताकि उन जातियों के कमजोर लोगों को मौका मिल सके। यह बात सुनने में बहुत ही सुहावनी लगती है, और केन्द्र सरकार अपने इस फैसले से अब तक की अनारक्षित जातियों का दिल जीतते दिखती है। जिन लोगों को आरक्षण से शिकायत रहती थी, और जो आरक्षित तबकों को सरकारी दामाद कहते थे, अब उनका भी रिश्ता सरकार के परिवार में हो गया है, और वे भी एक किस्म से सरकारी दामाद बन गए हैं। फर्क बस इतना ही है कि ओबीसी आरक्षण के मलाईदार तबके की तरह, इस सवर्ण आरक्षण में भी मलाईदार तबके को बाहर कर दिया गया है, जो कि सुनने में एक बहुत ही इंसाफपसंद बात लगती है, लेकिन इसकी हकीकत को समझने की जरूरत है। 

देश के अलग-अलग कुछ आर्थिक सर्वेक्षणों के आंकड़ों को देखें तो इन सवर्ण जातियों की आबादी में इन तीन पैमानों पर खरे उतरने वाले लोग कुल 5 फीसदी या उससे कम हैं। मतलब यह कि 8 लाख से अधिक सालाना कमाई वाले परिवार, या हजार फीट जमीन पर मकान वाले परिवार, या पांच एकड़ जमीन वाले परिवार अनारक्षित आबादी में पांच फीसदी भी नहीं हैं। मतलब यह कि जो 10 फीसदी आरक्षण इस तबके के लिए रखा गया है, उसमें इनकी आबादी के 95 फीसदी लोग आरक्षण के हकदार हैं। इसका मतलब यह होगा कि सवर्ण आबादी के भीतर जो सचमुच ही सबसे कमजोर तबका नीचे के एक चौथाई हिस्से में होगा, वह अपने ही अधिक संपन्न तबके के मुकाबले कमजोर रहेगा, और उसके मौके बहुत सीमित रहेंगे। एक जानकार ने यह राय दी है कि जब किसी तबके के कुल 10 फीसदी लोगों को आरक्षण देना है, और उस तबके के 95 फीसदी लोग इस आरक्षण के मुकाबले के हकदार हो रहे हैं, तो इस तबके की मलाईदार तह को और मोटा बनाना था, और कमाई की सीमा को घटाना था, मकान की जमीन और खेत की सीमा को भी घटाना था, ताकि सचमुच के कमजोर लोग इस सीमित आरक्षण के मुकाबले में खड़े हो सकते। आज पौने 8 लाख रूपये सालाना कमाई वाले परिवार, 9 सौ वर्गफीट जमीन पर मकान या पौने 5 एकड़ खेत वाले परिवार भी इस मुकाबले में खड़े रहेंगे, तो फिर उनसे एक चौथाई आर्थिक क्षमता वाले लोग मुकाबले में कैसे और कहां टिकेंगे? 

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इसी जगह पर लगातार दलित और आदिवासी आरक्षण में भी ओबीसी आरक्षण की तरह की क्रीमी लेयर लागू करने की वकालत करते आए हैं। इन दोनों तबकों में जो लोग एक पीढ़ी में आरक्षण का फायदा पा चुके हैं, या फिर सांसद-विधायक जैसे राजनीतिक और संवैधानिक दर्जे में पहुंच चुके हैं, या फिर जिनकी आर्थिक क्षमता इतनी हो गई है कि उनके ब"ो सामान्य वर्ग से पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं में मुकाबला कर सकते हैं, उन्हें आरक्षण के फायदों से बाहर करना चाहिए। हमने बार-बार यह लिखा है कि जिस सामाजिक पिछड़ेपन और आर्थिक कमजोरी की वजह से इन तबकों को आरक्षण दिया गया है, वे दोनों ही पैमाने, दोनों ही तर्क बिना क्रीमी लेयर के खत्म हो जा रहे हैं, क्योंकि दलित-आदिवासी तबकों के ताकतवर हो चुके लोग ही अपने तबकों के आरक्षण पर हक के लिए मुकाबले में स्वाभाविक रूप से सबसे आगे रहते हैं। ऐसा कोई तर्क नहीं हो सकता कि ओबीसी आरक्षण के लिए मलाईदार तबका हक से हटाया जाए, लेकिन वह दलित और आदिवासियों में जारी रखा जाए। 

आज हमारे उस पुराने तर्क पर अधिक बात करने का मौका नहीं है, लेकिन अनारक्षित वर्ग के लिए इस आर्थिक आधार पर आरक्षण को हम लागू होने के पहले ही नाकामयाब पा रहे हैं क्योंकि इसमें सचमुच के जरूरतमंद लोगों के साथ-साथ इन तबकों के तकरीबन तमाम और लोगों को भी शामिल कर लिया गया है। दस फीसदी आरक्षण के लिए सबसे कमजोर तकरीबन 25 फीसदी आबादी को रखा जाना चाहिए था, लेकिन आज इन जातियों के करीब 95 फीसदी लोग इस आरक्षण के हकदार बना दिए गए हैं, और सबसे संपन्न कुल 5 फीसदी से भी कम लोगों को आरक्षण से बाहर रखा गया है। कुछ लोगों का यह मानना है कि यह अनारक्षित जातियों को दिया जा रहा 10 फीसदी आरक्षण तो है, लेकिन यह अब तक उनके चले आ रहे करीब 50 फीसदी आरक्षण के भीतर का हिस्सा है, और इन 10 फीसदी सीटों पर से इनकी आबादी के कुल 5 फीसदी को अपात्र बनाया गया है, मतलब यह कि ऐसी तकरीबन तमाम आबादी के लिए उतनी की उतनी सीटें दो अलग-अलग पैकिंग में पेश कर दी गई हैं। अब तक अनारक्षित चले आ रहे तबके को इससे ऐसा कोई फायदा नहीं मिलने वाला है, जितना बड़ा हल्ला हो रहा है। करीब एक चौथाई ऐसी आबादी के लिए सीटें उतनी की उतनी हैं, सिर्फ इन सीटों में से 10 फीसदी के लिए इनकी आबादी के सबसे संपन्न 5 फीसदी हिस्से को अपात्र बना दिया गया है, और वे लोग भी बाकी अनारक्षित सीटों पर मुकाबले के पात्र रहेंगे ही। 

आज बाजार में जिस तरह कंपनियां सामानों का दाम बढ़ाने के बजाय पहले पैकेट के बिस्किट घटाती हैं, या बोतल में शैम्पू और तेल घटाती हैं, और दाम बढऩे का दर्द महसूस नहीं होने देतीं। ठीक वैसा ही काम केन्द्र सरकार ने किया है, और सुप्रीम कोर्ट ने यह समझने का मौका खो दिया है कि इस तबके की ऊपर की करीब तीन चौथाई आबादी वाली इस क्रीमी लेयर को अपात्र बनाए बिना इस आरक्षण का कोई फायदा नीचे की एक चौथाई आबादी तक सीमित नहीं रह पाएगा। देश की जनता कुछ गिने-चुने शब्दों, जैसे, सवर्ण आरक्षण, सवर्ण-गरीब आरक्षण से अपनी धारणा बना रही है। और केन्द्र सरकार जनधारणा प्रबंधन में माहिर है, उसने किसी को कुछ नहीं दिया, और एक चौथाई से अधिक आबादी बेगानी शादी मेें दीवाने अब्दुल्ला की तरह नाच रही है।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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