आजकल

05-Jul-2020 3:04 PM

हिन्दुस्तान में लॉकडाऊन के चलते शराब भी बंद कर दी गई थी, और नशे के अधिक आदी लोगों में से कुछ लोगों ने शायद इसी वजह से केरल जैसे राज्य में खुदकुशी कर ली थी, और कुछ दूसरे राज्यों में दारू की जगह कोई दूसरी चीज पीकर कुछ लोग मर गए थे। लेकिन ये तमाम बातें गरीबों के साथ हुईं, पैसे वालों के लिए तो सारे ही वक्त हर जगह ठीक उसी तरह शराब हासिल रहती है जिस तरह शराबबंदी वाले गुजरात में पूरे ही वक्त हर ब्रांड की दारू घर पहुंच मिल जाती है। कुल मिलाकर दारू अधिक बिकने वाला एक नशा रहा जिसकी बिक्री शुरू होना, बंद होना एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहता है, और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए एक नंबर और दो नंबर की सबसे बड़ी कमाई भी रहती है। यह कमाई किसी एक प्रदेश की संस्कृति तक सीमित नहीं है, यह देश के तकरीबन हर प्रदेश में एक सरीखी है। 

ऐसे में नशे की कई दूसरी किस्में हैं जिन पर सरकार का कोई काबू नहीं रहता, रह सकता भी नहीं। अभी अमरीका के एक राज्य में सरकारी अफसरों की जानकारी में कोरोना-पार्टियां चल रही हैं। इनमें किसी एक कोरोना मरीज की मौजूदगी में बहुत से लोग पार्टी में शामिल होते हैं, इसके लिए वे एक तय भुगतान करते हैं। पार्टी के बाद इनमें से जो पहले कोरोनाग्रस्त होते हैं, उन्हें जमा रकम में से एक बड़ा ईनाम मिलता है। क्योंकि बीमारी की दहशत से लोग डिप्रेशन में हैं, इसलिए वे इससे उबरने के तरह-तरह के रास्ते ढूंढ रहे हैं, और लोगों के लिए यह एक बड़ा उत्तेजक नशा है कि वे बीमारी को चुनौती दे रहे हैं, उसे न्यौता दे रहे हैं, और उत्तेजना के साथ इंतजार कर रहे हैं कि कब वे पॉजिटिव होकर ईनाम जीतते हैं। 

आज भी दुनिया के कई देशों में गांजे का नशा फिर से कानूनी बनाया गया है क्योंकि सरकारों का यह मानना है कि गांजे का नशा कम नुकसानदेह होता है, और उसमें कुछ चिकित्सकीय गुण भी होते हैं। इलाज के लिए भी, और नशे के लिए भी गांजा पीने के कैफे अमरीका जैसे कई देशों में बढ़ रहे हैं, और लोग इस सस्ते और कम नुकसानदेह नशे को मिले कानूनी दर्जे का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में गांजा गैरकानूनी है, और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य इससे गुजरते हुए गांजे की गाडिय़ों को रोज ही पकड़ रहा है। शराब के नशे में लोग रोज लापरवाही से कोरोना का खतरा झेल रहे हैं, अंधाधुंध खर्च भी कर रहे हैं, लेकिन गांजा हिन्दुस्तान में गैरकानूनी है। कम से कम हिन्दू धर्म के बहुत से गंजेड़ी साधुओं को छोडक़र बाकी के लिए तो गैरकानूनी है ही, साधुओं की चिलम का गांजा मानो कानून से ऊपर है। 

हर देश और समाज को यह बात समझनी चाहिए कि अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर नशे पर पूरी रोक मुमकिन नहीं है, तो फिर कौन सा नशा किस तरह छूट का हकदार हो। नरेन्द्र मोदी जैसे कड़े मुख्यमंत्री के रहते हुए गुजरात में शराब जितनी आसानी से हासिल थी, वह अपने आपमें एक मिसाल है कि नशे पर पूरी रोक मुमकिन नहीं है। किसी तानाशाही में शायद थोड़ी अधिक कड़ाई हो भी सकती है क्योंकि वहां नशे के कारोबारियों को चौराहे पर फांसी दी जा सकती है, या उनके हाथ काटे जा सकते हैं, उनकी आंखें फोड़ी जा सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र में सजा की एक सीमा है, और इसीलिए नशे का कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं हो रहा है। 

लेकिन अमरीका जैसे समाज में जिस तरह से कोरोना-पार्टियां चल रही है, कुछ उसी किस्म से ब्रिटेन में लोग कोरोना मौतों के बीच भी बड़े पैमाने पर पार्टियां कर रहे हैं, समंदर के किनारे उनकी भीड़ दिख रही है, और दूसरी जगह भी वे बेफिक्र नाच-गा रहे हैं। अब किसी भी देश का सरकारी अमला, या वहां की पुलिस इस हिसाब से तो बनाए नहीं गए हैं कि सारी की सारी आबादी पर कोई नियम-कानून एकदम से डालना पड़ेगा। अगर हर नागरिक से कड़े नियमों पर अमल करवाना है, तो उसके लिए कई गुना अधिक पुलिस लगेगी, जो कि मुमकिन नहीं है। इसलिए कोरोना से भिडऩे का नशा हो, या गांजे का नशा हो, या शराब हो, और लापरवाही की उत्तेजना हो, दुनिया में हर किस्म की अराजकता को रोक पाना मुमकिन नहीं है। अमरीका में तो नागरिकों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो कि गिरती लाशों के बीच भी मास्क पहनने से मना करता है, और उसका मानना है कि सांसों को ढांकना ईश्वर की व्यवस्था के खिलाफ भी है, और अमरीकी संविधान के खिलाफ भी है। वहां बड़ी संख्या में लोग बिना मास्क रह रहे हैं क्योंकि वे अपने संवैधानिक अधिकारों को लेकर अपने को अधिक जागरूक मानते हैं, और अपने ईश्वर की बनाई हुई व्यवस्था का सम्मान करना, कोरोना प्रतिबंधों से अधिक महत्वपूर्ण और जरूरी मानते हैं। यह समझने की जरूरत है कि आजादी के हक का ऐसा नशा, या ईश्वर की व्यवस्था पर डॉक्टरी राय से भी ऊपर भरोसे का नशा लोगों को कहां ले जाकर छोड़ेगा? यह भी समझने की जरूरत है कि कोरोना किस्म के संक्रामक खतरे एचआईवी-एड्स किस्म के खतरे नहीं हैं जो कि बिना सेक्स या बिना डॉक्टरी लापरवाही के किसी सामान को छूने से भी हो सकते हैं। लेकिन आज कई लोग सत्ता की ताकत के नशे में मास्क से हिकारत कर रहे हैं। भारत में ही उत्तरप्रदेश में काम करने वाली यूनिसेफ की एक अधिकारी ने उस प्रदेश के आईएएस अफसरों के बारे में लिखा है कि वे कैसे मास्क पहनने को अपनी हेठी समझते हैं। 

आज यह बात साफ है कि जो अधिक ताकतवर हैं, जो अधिक पैसे वाले हैं, वे ही लोग कहीं पार्टियां करके, तो कहीं दुस्साहस दिखाकर कोरोना का खतरा मोल ले रहे हैं, और बाकी दुनिया के लिए भी यह खतरा बढ़ा रहे हैं। भारत में हमने देखा हुआ है कि कोरोना प्लेन पर सवार विदेशों से लौटे लोगों के पासपोर्ट के साथ आया, और यहां राशन कार्ड वाले गरीबों तक पहुंच गया। आज हर किस्म की लापरवाही में वही पासपोर्ट-तबका, राशनकार्ड-तबके को खतरे में डाल रहा है। ताकत का नशा कई किस्म से दूसरों को खतरे में डालता है, और उसके कई नए नमूने लॉकडाऊन और कोरोना की वजह से सामने आए हैं।  

-सुनील कुमार


28-Jun-2020 4:50 PM

हिन्दुस्तानी फौज में ऊपर के चार सबसे बड़े अफसरों में से एक ओहदा होता है मेजर जनरल का। अभी एक रिटायर्ड मेजर जनरल ब्रजेश कुमार ने एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें अमरीका के बनाए हुए अपाचे फौजी हेलीकॉप्टर पानी की सतह के करीब उड़ रहे हैं। ब्रजेश कुमार ने लिखा कि लद्दाख में भारतीय फौज के लिए हमलावर हेलीकॉप्टर उड़ रहे हैं। उन्होंने इस वीडियो के साथ अपनी खुशी और फौज की तारीफ भी पोस्ट की। 

दिक्कत यह है कि आज सोशल मीडिया और इंटरनेट की मेहरबानी से लोग तुरंत ही किसी तस्वीर या वीडियो की अग्निपरीक्षा ले लेते हैं। कुछ ही देर में लोगों ने पोस्ट करना शुरू किया कि ये हेलीकॉप्टर अमरीका में हूवर बांध के जलाशय के ऊपर उड़ रहे हैं, भारत को अमरीका से मिले अपाचे हेलीकॉप्टरों का रंग अलग है। एक दूसरे ने मेजर जनरल को याद दिलाया कि लद्दाख की यह झील अब किसी भी सेना की पहुंच से परे रखी गई है। फिर किसी ने लिखा कि यह अमरीका के एरिजोना की हवासू झील है। एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने ध्यान दिलाया कि इस वीडियो के बारहवें सेकंड में एक विदेशी महिला की आवाज है। इतनी जानकारियां सामने आ जाने के बाद भी मेजर जनरल ब्रजेश कुमार अपनी बात पर अड़े रहे, उन्होंने जानकारी के लिए धन्यवाद तो दिया लेकिन लिखा कि यह वीडियो भारतीय फौज के लिए फीलगुडफैक्टर है। इस पर लोगों ने कहा कि नकली खबर से बना हुआ ऐसा फैक्टर किसी काम का नहीं रहता। कुछ और लोगों ने लिखा कि नकली वीडियो से सिर्फ बेवकूफ खुश हो सकते हैं। 

चीन के साथ चल रही मौजूदा तनातनी के बीच लोगों को अपनी देशभक्ति की नुमाइश के लिए कई किस्म के रास्ते निकालने पड़ रहे हैं। बहुत से लोग घर के टूटे-फूटे चीनी खिलौनों को सड़कों पर जलाकर प्लास्टिक का जहरीला धुआं पैदा करके चीन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वे तमाम लोग जिनका कभी चीनी कच्चेमाल से वास्ता नहीं पड़ा, जिनकी रोजी-मजदूरी या जिनका कारोबार चीनी पुर्जों से नहीं जुड़ा है, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से चीन के सामान बुलाकर बिक्री के लिए गोदामों में नहीं रखे हैं, वे सारे लोग आज देशभक्ति साबित करने के बड़े आसान तरीके पर चल रहे हैं, और चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा दे रहे हैं। 

लेकिन हिन्दुस्तानी फौज में मेजर जनरल होकर रिटायर हुए इंसान को इतनी गंभीरता और इतनी ईमानदारी की उम्मीद की जाती है कि वे नकली वीडियो पोस्ट करके असली गौरव पैदा करने की जालसाजी न करें। लेकिन रिटायर्ड फौजियों का हाल टीवी चैनलों पर दिखता ही है जब वे समाचार बुलेटिनों के बीच विशेषज्ञ-जानकार की तरह पेश किए जाते हैं, और पहले पाकिस्तान के खिलाफ, और अब चीन के खिलाफ आग उगलते हुए स्टूडियो के कैमरों तक थूक उड़ाते हैं। इनकी उत्तेजना देखें तो लगता है कि जो-जो जंग लडऩे का इन्हें मौका नहीं मिला, उन सबको इस बुलेटिन के चलते-चलते लड़ लेंगे। 

एक नकली वीडियो से जिस फौजी जनरल को लगता है कि फौज का मनोबल बढ़ेगा, उन्हें नकली के नुकसान की समझ बिल्कुल नहीं है। अगर कोई लड़ाई खालिस सच के दम पर लड़ी जा सकती है, और उसमें लड़ाई के चलते अगर झूठ स्वयंसेवक होकर भी आकर जुड़ जाए, तो सच उस लड़ाई को हार बैठता है। सच तभी तक सच है, और ताकतवर है जब तक वह खालिस है। झूठ मिला, और सच की सारी ताकत गई। इसलिए यह समझने, याद रखने, और अमल करने की जरूरत हमेशा रहती है कि सच अगर किसी लड़ाई में कमजोर भी पड़ रहा है, तो भी उसे झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। इस बात के साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि जब सच को आधा बताया जाता है, और आधा छुपा लिया जाता है, जिसे कि अर्धसत्य कहते हैं, तो वह सच झूठ से भी गया-गुजरा हो जाता है। अर्धसत्य न सिर्फ महत्वहीन रहता है, बल्कि जिस मुंह से निकलता है, उसकी सारी साख को चौपट कर देता है। अमरीका से भारी-भरकम काम देकर जो अपाचे हेलीकॉप्टर भारतीय फौज के लिए खरीदे गए हैं, उनकी ताकत से जो मनोबल बढऩा था, वह एक फर्जी वीडियो से टूट भी जाता है कि हिन्दुस्तानी फौज में आत्मगौरव और आत्मविश्वास के लिए फर्जी वीडियो लगने लगे हैं। 

आज सोशल मीडिया पर बहुत किस्म की वैचारिक लड़ाई लड़ी जा रही है। सैद्धांतिक बहसें चल रही हैं, और मनोवैज्ञानिक भी लड़े जा रहे हैं। अगर चर्चाओं पर भरोसा किया जाए तो भारत की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी ने लाखों लोगों को सोशल मीडिया पर जनधारणा-प्रबंधन के काम में झोंक रखा है। अब लाखों लोगों का असली हिसाब, या ऐसी अफवाह की हकीकत तो वह पार्टी ही बता सकती है, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी झूठ को, किसी हमले और किसी लांछन को फैलाने, खड़ा करने, और उससे किसी की चरित्र-हत्या करने के काम की विकरालता तो आए दिन दिखती ही है। यह साफ दिखता है कि अगर आप वैचारिक रूप से किसी से असहमत हैं, तो सोशल मीडिया पर आनन-फानन इतने अधिक लोग आप पर थूकने लगेंगे कि आपका सारा वक्त उस थूक से छुटकारा पाने में ही लग जाएगा, और वैसे गीले हाथों से आप की-बोर्ड पर आगे कुछ काम कर नहीं सकेंगे। 

लोगों को याद होगा कि बहुत बरस पहले सड़कों पर ठगने और लूटने के लिए एक लोकप्रिय तरीका यह था कि किसी के कपड़ों पर पखाना उछाल दिया जाए, और उसका पूरा ध्यान उसे साफ करने में लग जाए, और उसके साथ का सामान लूट लिया जाए। ऐसा हर कुछ दिनों में होता था, अखबारों में छपता था, फिर भी फेंके गए पखाने को देखते ही असर ऐसा होता था कि लोगों का सौ फीसदी ध्यान उसे धोने-पोंछने में लग जाता था। आज सोशल मीडिया पर ट्रोल कहे जाने वाले ऐसे भाड़े के राजनीतिक कार्यकर्ताओं या मजदूरों का काम यही रहता है कि रात-दिन असहमत लोगों पर पखाना फेंका जाए, ताकि वे अगली असहमति जाहिर करने के बजाय गालियों और धमकियों की टट्टी में ही उलझे रहें। असहमति की राजनीतिक या धार्मिक सोच रखने वाले लोगों का जीना हराम करके उन्हें सोशल मीडिया पर मुर्दा बना देने की साजिश और नीयत बहुत मामलों में साफ-साफ दिखती है। यह समझ आता है कि किसी की बीवी, बहन, बेटी, या मां के साथ बलात्कार करने की धमकी देकर उसके दिल-दिमाग का सुख-चैन को खत्म किया ही जा सकता है। 

ऐसे माहौल में सच कहना खासा खतरनाक है, और खासकर तब जबकि वह सच हिन्दुस्तान में कहा जाए, और वह अमरीका के काले लोगों के अधिकारों की हिमायत करने के बजाय हिन्दुस्तान के दलित-अल्पसंख्यकों के हक की बात करे। दूर निशाना लगाना ठीक है, महफूज है, लेकिन अपने आसपास निशाना लगाना खतरनाक है क्योंकि भाड़े के लोग आप पर टूट पड़ेंगे। यह भी है कि टूट पडऩे वाले तमाम लोग भाड़े के नहीं होंगे, कई लोग ऐसे भी होंगे जिनकी नफरत और हिंसा पर अपार आस्था होगी, और जो अमन-मोहब्बत की बातों को बर्दाश्त नहीं कर पाते होंगे। ऐसे लोग सौ फीसदी भाड़े के हत्यारे होंगे, यह कहना और समझना कुछ ज्यादती होगी, लेकिन ऐसे लोग ही हमलावर-ट्रोल आर्मी के सैनिक होंगे, भुगतान पाने वाले सैनिक होंगे, ऐसा जरूर लगता है। 
हिन्दुस्तान में तनाव के वक्त तरह-तरह की झूठी कहानियों को किसी बात को साबित करने के लिए गढ़ा जाता है। देश के सम्मान को बढ़ाने की कही जाने वाली कोशिशों के लिए सब कुछ जायज मान लिया जाता है, लेकिन देश की लड़ाई को भी महज सच पर टिकाए रखने की बात बहुत कम लोगों को सुहाती है जिन्हें लगता है कि मोहब्बत, जंग, और सोशल मीडिया पर समर्थन में सब कुछ जायज होता है। 

सब कुछ जायज तो दुनिया में किसी भी बात में नहीं होता। जो लोग मोहब्बत में सब कुछ जायज मानते हैं, उनकी मोहब्बत खतरे में जीती है, और वह किसी भी दिन खत्म हो सकती है, क्योंकि नाजायज बातें किसी को लंबे समय तक जिंदा नहीं रहने देतीं, न हिटलर को, न इमरजेंसी को, और न ही सतीप्रथा को। ऐसे में देश के आत्मगौरव को बढ़ाने के लिए, या अपनी फौज का मनोबल बढ़ाने के लिए सच को छुपाने या झूठ को सिर चढ़ाने की कोशिशें नुकसान ही करती हैं, कोई नफा नहीं करतीं। जिन लोगों को फौज से आम सवाल करना भी देश से गद्दारी लगती है, वे न सिर्फ फौज का, बल्कि देश का भी बड़ा नुकसान करते हैं। और ऐसा नुकसान करने में रिटायर्ड फौजियों की बड़ी हिस्सेदारी है, खासकर उनकी, जिनकी जिंदगी में अब सबसे बड़ी कामयाबी टीवी के कैमरों के सामने बने रहना रह गई है। 

-सुनील कुमार


21-Jun-2020 12:46 PM

- सुनील कुमार

हिन्दुस्तान में जगह-जगह आए दिन ऐसी पुलिस रिपोर्ट होती है कि किसी युवती या महिला ने किसी युवक या आदमी पर बलात्कार का जुर्म लगाया, और रिपोर्ट में यह रहता है कि उसने शादी का वायदा करके देह संबंध बनाए, और बाद में शादी से मुकर गया। मौजूदा कानून और बड़ी अदालतों के ढेर सारे फैसलों की रौशनी में ऐसे मामले तुरंत बलात्कार कानून के तहत दर्ज हो जाते हैं। पुलिस की सीमा मौजूदा कानून रहती है, और कानून बारीक नुक्ताचीनी के लिए बड़ी अदालतों के सामने खड़ा भी होता है, और बड़ी अदालतें कभी-कभार कानून की कुछ बातों को गलत भी मानती हैं, और वैसे में यह संसद के सामने रहता है कि वह अदालती फैसलों को देखते हुए कानून में कोई फेरबदल करे, या सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू हो जाने दे। 

आज इस मुद्दे पर लिखते हुए यह बात साफ है कि सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों में ऐसे साफ फैसले दिए हैं कि ऐसी शिकायतें बलात्कार गिनी जाएंगी। फैसले अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन फैसलों से परे यह समझने की जरूरत है कि असल जिंदगी में ऐसे मामलों की बुनियाद क्या है। यह लिखते हुए इस बात का पूरा अंदाज है कि इसे महिलाविरोधी कहा जा सकता है, ऐसे में इसे बलात्कारी आदमी के लिए एक हमदर्दी भी कहा जा सकता है, लेकिन असल जिंदगी की हकीकत को देखते हुए इस पर चर्चा जरूरी भी है। 

जिंदगी के प्रेमसंबंधों या स्त्री-पुरूष की दोस्ती को अगर देखें, और खासकर बालिग लोगों की दोस्ती देखें, तो उनमें से बहुत सी दोस्तियां देहसंबंधों तक पहुंच जाती हैं। उनमें से बहुत के साथ ऐसी अंतहीन उम्मीदें जुड़ी रहती होंगी कि यह सिलसिला शादी तक पहुंच जाएगा, दूसरी तरफ ऐसी भी उम्मीदें हो सकती हैं जो कि किसी वायदे के बाद पैदा हुई होंगी, और शादी का वायदा पूरा न होने पर उस वायदाखिलाफी की वजह से पहले के सहमति के देहसंबंध अब बलात्कार की परिभाषा के तहत लाए गए हों। हम कानून की बारीकियों में नहीं जा रहे, क्योंकि उन्हीं पर तो बड़ी अदालतों के बड़े फैसले रहे होंगे, लेकिन अपनी खुद की देखी हुई जिंदगियों का तजुर्बा यह है कि शादी की नीयत, और शादी के वायदे सचमुच के होने के बावजूद बहुत सी नौबतें ऐसी आ जाती हैं कि शादी नहीं हो पाती। यह वायदा लड़के की तरफ से भी टूट सकता है, और लड़की की तरफ से भी। बहुत से मामलों में समाज और परिवार का इतना दबाव हो जाता है कि चाह कर भी ईमानदार प्रेमीजोड़े शादी नहीं कर पाते। ऐसी ही नौबतें तो रहती हैं जिनके चलते प्रेमीजोड़े एक साथ खुदकुशी कर लेते हैं कि साथ जी न सके तो न सही, कम से कम साथ मर तो लें। 

अब जिनकी साथ मरने जैसी ईमानदार नीयत रहती है, उनके बीच के देहसंबंध कई वजहों से शादी में तब्दील नहीं हो पाते। ऐसे में बरसों की सहमति के देहसंबंध वायादाखिलाफी की वजह से बलात्कार करार दिए जाएं, यह बात कुछ गले नहीं उतरती। फिर एक बात यह भी है कि हिन्दुस्तान का बलात्कार कानून लैंगिक समानता पर आधारित नहीं है। यह महिला के पक्ष में, और पुरूष के खिलाफ असंतुलित तरीके से झुका हुआ है, और सामाजिक हकीकत को देखें तो ऐसा रहना भी चाहिए। एक पुरूष ही शारीरिक और मानसिक रूप से, सामाजिक और आर्थिक रूप से एक महिला का शोषण करने की हालत में अधिक रहता है। लेकिन एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जब संपन्नता की ताकत रखने वाली कोई लड़की किसी विपन्न लड़के के साथ मोहब्बत करती हो, और दोनों के बीच देहसंबंध भी हों, और बरसों के ऐसे संबंध के बाद किसी वजह से वह लड़की शादी से इंकार कर दे, तो क्या बरसों के ऐसे देहसंबंधों को एक संपन्न द्वारा एक विपन्न का देहशोषण करना करार दिया जाएगा? भारत के मौजूदा कानून के तहत ऐसा नहीं हो सकता, और यहां पर कानून थोड़ा सा बेइंसाफ भी लगता है। 

आज चारों तरफ ऐसे दसियों हजार लोग जेलों में बंद हैं जिनके खिलाफ बरसों के सहमति-संबंधों के बाद बलात्कार की शिकायत दर्ज कराई गई है। अब इनके तो फैसले मौजूदा कानून के आधार पर हो ही जाएंगे, और फैसले तक वे बहुत मुश्किल से मिली, बहुत महंगी पड़ी जमानत पर शर्मिंदगी के साथ जीते रहेंगे, लेकिन कानून से परे, क्या यह सचमुच इंसाफ है? 

अपने दिल-दिमाग और अपनी रीति-नीति से महिलाओं के कट्टर हिमायती होते हुए भी यह सिलसिला ठीक नहीं लगता है। इस कानून में फेरबदल की जरूरत है क्योंकि बिना बल प्रयोग के, आपसी सहमति से, दो वयस्क लोगों के बीच बने देहसंबंधों का दर्जा महज वादाखिलाफी से बलात्कार नहीं होना चाहिए। वायदे तो कई वजहों से पूरे नहीं हो पाते हैं। बहुत से लोगों के बीच ऐसे रिश्ते तय होते हैं, सगाई होती है, जो कि टूट जाती है, और शादी नहीं हो पाती। बहुत से ऐसे प्रेमसंबंध और देहसंबंध रहते हैं जो बरसों के लंबे वक्त से गुजरते हुए एक-दूसरे को बाकी जिंदगी के लायक नहीं पाते, और समझदारी के साथ अलग होना तय कर लेते हैं। 

वादाखिलाफी के आधार पर बलात्कार का जुर्म तय होना लोगों के बीच एक किस्म से भरोसा खत्म करने वाला है। लोगों के बीच संबंध रहें, और जिस दिन वे स्वस्थ न रहें, उन्हें महज इसलिए ढोना पड़े कि संबंध तोडऩा बलात्कार की सजा दिलवाएगा, तो यह सिलसिला नाजायज है, और बेइंसाफी है। बीच-बीच में किसी-किसी हाईकोर्ट ने ऐसे फैसले दिए भी हैं कि इन्हें बलात्कार न गिना जाए, लेकिन कुल मिलाकर आज जो व्यवस्था लागू है, वह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लेकर है, और उसके बाद किसी का बचाव नहीं है।
 
यह कानून इस बात को पूरी तरह अनदेखा करता है कि वादाखिलाफी तो जिंदगी के हर दायरे में हो सकती है, होती है, और यह भी जरूरी नहीं होता कि वह सोच-समझकर ही की जाए, कई बार तो अनचाहे भी किसी वायदे को अधूरा छोडऩे की नौबत आ जाती है। यह कानून ऐसी तमाम मानवीय, और सामाजिक नौबतों को अनदेखा करता है, और सिर्फ एक पक्ष के बयान को अनुपातहीन-असंतुलित वजन देते हुए उसके आधार पर दूसरे पक्ष को कुसूरवार मानकर चलता है। कानून का यह पूर्वाग्रह उसकी बुनियाद में ही रखा गया है, और भारत में महिलाओं को खास हक और हिफाजत देने के लिए रखा गया है, लेकिन उसका यह इस्तेमाल न्याय की भावना के तो सीधे-सीधे ही खिलाफ है, न्याय के शब्दों के भी यह खिलाफ है, फिर चाहे यह लिखित कानून की भाषा ही क्यों न हो। 

हम अपनी इस सोच के अलावा और लोगों से भी इस मुद्दे पर, कानून के इन पहलुओं पर आपस में चर्चा करने, बहस और सलाह-मशविरा करने की सलाह दे रहे हैं, ताकि समाज के भीतर इस सोच के पक्ष में, या इसके खिलाफ एक जनमत तैयार हो सके। अलग-अलग लोगों के अलग-अलग तर्क हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा कानून को, मौजूदा मामलों को देखते हुए इसी तरह छोड़ देना ठीक नहीं है। 


14-Jun-2020 1:42 PM

-सुनील कुमार

जिंदगी के एक दायरे में खूबियां रखने वाले लोग जब किसी दूसरे दायरे को लेकर अपनी राय देते हैं, तो वह कई बार बड़ी अटपटी भी हो सकती है, बड़ी खतरनाक भी हो सकती है, लेकिन कई बार वह बड़ी अनोखी भी हो सकती है। असल जिंदगी में लोग जब अपने ही दायरे में विशेषज्ञता हासिल करते हुए एक तंग नजरिए से चीजों को देखते हैं, तो एक सुरंग के भीतर देखते हुए विकसित होने वाली सोच के शिकार हो जाते हैं। ऐसा ही एक मामला हाल में सामने आया जब चीन की एक विकराल समस्या को लेकर बाहर के एक जानकार ने एक अजीब सा हल सुझाया।
 
दरअसल चीन लंबे समय से अमल की जा रही एक बच्चे की सीमा को अब भुगत रहा है। अब वहां शादीशुदा जोड़े दूसरा बच्चा पैदा करने के बारे में सोचते भी नहीं हैं, और नतीजा यह हो रहा है कि चीन में कामगारों की कमी होने लगी है क्योंकि एक जोड़े के दो लोग एक जीवन में मिलकर एक ही बच्चा पैदा करते हैं। वहां की सरकार हाल के बरसों में लगातार लोगों का हौसला बढ़ा रही है कि एक से ज्यादा बच्चे होने पर वह रियायती मकान से लेकर रियायती स्कूल फीस तक क्या-क्या फायदे देगी, लेकिन कई पीढिय़ों से एक बच्चों तक सीमित परिवार में पैदा हुईं और बढ़ीं पीढिय़ां दूसरे बच्चे की तरफ जा भी नहीं रही हैं। ऐसे में चीन के शंघाई के एक विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे एक मलेशियाई प्रोफेसर ने एक अजीब सा रास्ता सुझाया है। उसका कहना है कि चीन ने हर महिला को दो-दो पति रखने की छूट मिले, तो वहां की आबादी बढ़ सकती है। दरअसल चीन में चूंकि परिवारों पर एक ही बच्चा पैदा करने की सीमा थी, और हिन्दुस्तान की तरह वहां भी बेटों की चाह ज्यादा थी, इसलिए वहां भी मेडिकल जांच से, या किसी और तरह से लोगों ने लड़के ही लड़के अधिक पैदा किए, और लड़कियों का अनुपात आबादी में घटते चले गया। आज वहां पर इस लैंगिक असमानता की वजह से ही बच्चे कम हो रहे हैं। ऐसे में हिन्दुस्तान के कुछ हिस्सों की तरह एक से अधिक पति, या एक से अधिक भाईयों की एक पत्नी किस्म की यह सलाह इस प्रोफेसर ने एक वेबसाईट पर अपने नियमित कॉलम में दी है, और पूछा है कि क्या बहुपति प्रथा एक बेहूदी बात होगी? 

प्रोफेसर ने अपने कॉलम में लिखा है- मैं बहुपति प्रथा की वकालत नहीं कर रहा हूं, मैं सिर्फ यह सुझा रहा हूं कि लैंगिक अनुपात की गड़बड़ी से निपटने के लिए हमें इस विकल्प पर भी विचार करना चाहिए। 

पिछले 36 बरसों से चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने एक जोड़े पर एक ही बच्चा पैदा करने की छूट दी थी। इससे रियायत तभी मिलती थी जब वे ग्रामीण इलाके में रहते थे, और उनकी पहली संतान या तो एक लड़की हुई हो, या एक विकलांग लड़का हुआ हो। इस नीति के चलते चीन की आबादी तो काबू में रही लेकिन लड़कियों की भ्रूण हत्या होती रही, और आज चीन में लड़कियों के मुकाबले करीब साढ़े 3 करोड़ लड़के अधिक हैं। इसके अलावा नई सदी की पीढ़ी में युवतियां शादी बहुत देर से करने लगी हैं, और या तो बच्चे पैदा ही नहीं करतीं, या फिर सिर्फ एक बच्चा पैदा करती हैं, और इससे वहां आबादी गड्ढे में जाने के रास्ते पर हैं। चीन को लेकर यह जनसंख्या-भविष्यवाणी है कि वह 2027 में ही अपनी अधिकतम आबादी, 145 करोड़ पा लेगी, और और 2050 में आबादी का एक तिहाई हिस्सा 65 बरस से अधिक उम्र का रहेगा, यानी कामकाजी नहीं रहेगा। 

इस प्रोफेसर का दिलचस्प कहें तो दिलचस्प, और बेहूदा कहें तो बेहूदा, मशविरा यह है कि अगर दो आदमी किसी एक औरत से शादी करना चाहते हैं, और वह औरत भी दोनों से शादी करना चाहती है तो समाज को इसे क्यों रोकना चाहिए? उसने गिनाया है कि पुराने वक्त में बहुपत्नी प्रथा प्रचलित थी, और आज भी इस्लाम के कुछ संप्रदायों में बहुपत्नी प्रथा चल ही रही है। उसने लिखा है कि आज चीन में लैंगिक अनुपात जिस बुरी तरह बिगड़ा हुआ है, उसमें यह जरूरी है कि बहुपति प्रथा पर विचार किया जाए। 

इसके बाद की बात उसने ऐसी लिखी है जिसे लेकर उसका भयानक विरोध भी हो रहा है। लोग खूब गालियां दे रहे हैं, और उसकी बातों को अपमानजनक भी मान रहे हैं। उसने लिखा है कि एक महिला दो पतियों के साथ शारीरिक संबंध रखने में कोई दिक्कत भी महसूस नहीं करेगी क्योंकि एक-एक वेश्या एक-एक दिन में दस-दस ग्राहकों तक को संतुष्ट कर सकती है। इसके साथ-साथ दो पतियों के लिए खाना बनाने में भी कोई अतिरिक्त समय नहीं लगेगा। इसके जवाब में चीनी महिलाओं ने इंटरनेट पर लिखा कि इसे पढ़कर उन्हें उल्टी आ रही है, और वे हैरान हो रही हैं कि क्या यह सचमुच 2020 में लिखी जा रही बात है? एक ने लिखा कि यह प्रोफेसर सेक्स-गुलामी को कानूनी दर्जा दिलवाने के सिवाय कुछ नहीं सुझा रहा है। 

Yew-Kwang Ng,  economics professor at Fudan University in Shanghai 

लेकिन यह प्रोफेसर विवादों से परहेज करते नहीं दिख रहा है, और उसने अपने अगले कॉलम में लिखा कि चीन के लैंगिक अनुपात की गड़बड़ी से जूझने के लिए चकलाघरों को कानूनी दर्जा देना चाहिए। चूंकि वहां लड़कियां कम रह गई हैं, इसलिए हर लड़के को लड़की नहीं मिल पाती है, और उसका सेक्स-सुख का अधिकार नहीं मिल पाता है। 

अब हिन्दुस्तान की बात करें तो यहां भी कई प्रदेशों में जेंडर-अनुपात की भयानक हालत है। शायद हरियाणा में लड़के-लड़कियों के बीच संख्या का फर्क सबसे ही खराब है, और इसी के किसी इलाके में महाभारत काल में पांच पांडवों की एक पत्नी की कहानी भी पैदा हुई। इस प्रदेश में कुछ लोगों के बीच यह भी प्रचलित है कि सिर्फ बड़े भाई की शादी होती है, और उसकी पत्नी बाकी भाईयों की भी पत्नी सरीखी रहती है। 

सेक्स अनुपात में भारत 201 देशों में 189वीं जगह पर है। एशिया के देशों में भारत 51 देशों में 43वीं जगह पर है। पिछली जनगणना, 2011, के मुताबिक भारत में हजार पुरूषों पर 943 महिलाएं हैं। जबकि दिलचस्प बात यह है कि 1901 की जनगणना में भारत में सेक्स-अनुपात इससे बेहतर था, और हजार पुरूषों पर 972 महिलाएं थीं। केरल अकेला ऐसा प्रदेश है जहां पर हजार पुरूषों पर 1084 महिलाएं हैं, और सबसे बुरी हालत हरियाणा की है जहां पर हजार पुरूषों में महज 879 महिलाएं हैं। नतीजा यह होता है कि वहां एक से अधिक भाईयों की एक पत्नी की प्रथा भी है, और दूसरे प्रदेशों को दुल्हन लाने का रिवाज भी है। इस नौबत के बावजूद वहां कन्या भ्रूण हत्या भी जारी है। केरल और पुदुचेरी जैसे दक्षिण के राज्य अधिक लड़कियों के अनुपात के साथ यह बताते हैं कि अगर भ्रूण हत्या न हो, आबादी में लड़कियां लड़कों से अधिक रहना स्वाभाविक है क्योंकि कन्या शिशु का जिंदा रहने का संघर्ष लड़के के मुकाबले अधिक होता है।

अब चीन में जो बात सुझाई गई है, और जिसके लिए पुराने वक्त की मिसाल दी गई है, वह बात तो भारत के कुछ राज्यों पर आज भी लागू हो रही है, और इसका यह पारिवारिक-सामाजिक इलाज भी निकाल लिया गया है जिसे समाज विज्ञान की परिभाषा में बहुपति प्रथा कहा जाता है। चूंकि देश के कई उत्तर भारतीय राज्यों में आज भी लड़कियों को हिकारत के साथ देखा और रखा जाता है, इसलिए यहां अनुपात जल्द बदलने की कोई वजह नहीं दिख रही है, और हो सकता है कि चीन का यह प्रोफेसर आने वाले किसी हफ्ते में अपने कॉलम में हरियाणा सहित कुछ और राज्यों की मिसालें देता हुआ दिखे, तब न कहना कि यह अपमानजनक है...!