विचार / लेख

छत्तीसगढ़ एक खोज : बीसवीं कड़ी : ठाकुर जगमोहन सिंह
06-Jun-2021 7:08 PM (191)
छत्तीसगढ़ एक खोज : बीसवीं कड़ी : ठाकुर जगमोहन सिंह

-रमेश अनुपम

सन् 1885 में ठाकुर जगमोहन सिंह का स्थानांतरण शिवरीनारायण से रायपुर हो गया।उन्हें अब एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर पदोन्नत कर दिया गया था। उस जमाने में यह बहुत बड़ा पद माना जाता था।रायपुर में जिलाधीश कार्यालय से लगी हुई एक कॉलोनी को बहुत दिनों तक  ई ए सी कॉलोनी कहा जाता था। संभवत: वहां एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर के निवास होने के कारण ही ऐसा नामकरण पड़ गया होगा।

रायपुर आने के बाद उन्होंने अपने कालजयी उपन्यास ‘श्यामा स्वप्न’ की भूमिका लिखी। यह  उपन्यास सर्वप्रथम सन 1888 में एजूकेशन सोसायटी प्रेस बायकुला, बॉम्बे से प्रकाशित हुआ।

‘श्यामा स्वप्न’ की भूमिका बहुत ऐतिहासिक है और चकित करने वाली भी। इस भूमिका के अंत में तारीख है, 25 दिसंबर 1885 और स्थान की जगह लिखा हुआ है रायपुर, छत्तीसगढ़।

सन् 1885 तक मध्यप्रदेश का ही कोई अस्तित्व नहीं था, सो ठाकुर जगमोहन सिंह द्वारा ‘श्यामा स्वप्न’ की भूमिका में छत्तीसगढ़ लिखना, क्या अपने आप में कम विस्मयजनक नहीं है ? क्या यह अपने आप में हमारे छत्तीसगढ़ के लिए एक महान गर्व की बात नहीं है ?

आज से एक सौ पैंतीस वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ की परिकल्पना करना  और  भूमिका में उसका  उल्लेख करना , अपने आप में ही  विलक्षण घटना है। संभवत:  वे जानबूझकर अपने इस उपन्यास के माध्यम से संपूर्ण भारतवर्ष को छत्तीसगढ़ जैसी एक अज्ञात और सुंदर भूमि से परिचित करवाना चाहते थे?

अपने इस उपन्यास के द्वारा वे जैसे सारे देश को छत्तीसगढ़ की अपूर्व सुंदरता और यहां की रंग बिरंगी संस्कृति का दर्शन करवाना   चाहते थे।

इस नैसर्गिक भूखंड के अनुपम सौंदर्य को, इसके रूप माधुर्य को अपने इस उपन्यास के माध्यम से जैसे पूरी दुनिया को दिखाना चाहते थे।

वे जबलपुर और कटनी के निकट स्थित विजयराघवगढ़ रियासत के राजकुमार थे, पर शायद जितना प्रेम, जितना अनुराग छत्तीसगढ़ की भूमि से वे किया करते थे, वैसा शायद अपने भूखंड बघेलखंड से भी वे नहीं करते रहे होंगे।

छत्तीसगढ़ की भूमि का जितना सुंदर और नयनाभिराम  चित्रण ठाकुर जगमोहन सिंह ने अपने इस उपन्यास  ‘श्यामा स्वप्न’ में  किया है, वैसा अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता है।

उनके इस वर्णन में छत्तीसगढ़ के प्रति उनके अटूट प्रेम और गहरे अनुराग को भी भली-भांति देखा तथा समझा जा सकता है।

किसी कवि ने भी छत्तीसगढ के इस सुंदर रूप का इतना सुंदर चित्रण या वर्णन नहीं किया होगा जितना ठाकुर जगमोहन सिंह ने अपने इस दुर्लभ उपन्यास में किया है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’  में ठाकुर जगमोहन सिंह की इन्हीं विशेषताओं  को रेखांकित करते हुए लिखा है-

‘प्राचीन संस्कृत साहित्य से अभ्यास और विंध्याटवी के रमणीय प्रदेश में निवास के कारण विविध भावमयी प्रकृति के रूप-माधुर्य की जैसी सच्ची अनुभूति ठाकुर जगमोहन सिंह में थी, वैसी उस काल के किसी हिंदी कवि या लेखक में नहीं पाई जाती। ’

अब जरा ‘श्यामा स्वप्न’ के  ‘प्रथम याम के स्वप्न’  में ठाकुर जगमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ का जो सुंदर चित्रण किया है, उसे  देखिए और छत्तीसगढ़ के रूप-सौंदर्य की नयनाभिराम छवि को निरखिए-

‘मैं कहां तक इस सुंदर देश का वर्णन करूं कहीं कहीं कोमल कोमल श्याम- कहीं भयंकर और रूखे सूखे वन-कहीं झरनों का झंकार, कहीं तीर्थ के आकार-मनोहर दिखाते हैं। कहीं कोई बनैला जंतु प्रचंड स्वर से बोलता है-कहीं कोई मौन ही होकर डोलता है-कहीं विहंगमो का रोर कहीं निष्कुजित निकुंजों के छोर-कहीं नाचते हुए मोर..कहीं विचित्र तमचोर।’

सन् 1885 में ऐसी काव्यात्मक भाषा भारतेंदु युग के किसी कवि या लेखक में नहीं पाई जाती है। जैसी ठाकुर जगमोहन सिंह के यहां दिखाई देती है।

सन् 1886 में स्वास्थ्य ने ठाकुर जगमोहन सिंह का साथ नहीं दिया इसलिए उन्होंने शासकीय सेवा से इस्तीफा दे देना मुनासिब समझा। 4 मार्च 1899 में मात्र बयालीस वर्ष की आयु में  इस महान लेखक ने सुहागपुर में अंतिम सांसें ली।

उन्नीसवीं शताब्दी के नवें दशक में जब खड़ी बोली ठीक से अपने पावों पर खड़ी भी नहीं हो पाई थी। आधुनिक हिंदी साहित्य अभी ठीक से अपनी आंखें भी नहीं खोल पाया  था और हिंदी उपन्यास का जन्म भी  जब संभव नहीं हो पाया था। तब ठाकुर जगमोहन सिंह छत्तीसगढ़ की भूमि पर ‘श्यामा स्वप्न’ जैसे उपन्यास की रचना संभव कर रहे थे।

यह अलग बात है कि कुछ विद्वान सन 1882 में लाला श्रीनिवासदास द्वारा लिखित ‘परीक्षा गुरु’ को प्रथम हिंदी उपन्यास होने का गौरव प्रदान करते हैं। जबकि हिंदी का प्रथम उपन्यास का दर्जा तो ‘श्यामा स्वप्न’ को ही मिलना चाहिए था।

यह अपने आप में बेहद आश्चर्य की बात है कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में  देश के साहित्यिक केंद्र इलाहाबाद, बनारस  से कोसों दूर  छत्तीसगढ़ में धूनी रमाए ठाकुर जगमोहन सिंह खड़ी बोली का एक नया इतिहास रच रहे थे।

भारतेंदु हरिश्चंद्र की तरह वे बनारस में होते तो आज हिंदी साहित्य जगत में उनकी भी दुदुंभी बज रही होती। हिंदी साहित्य जगत आज उन्हें भी अपने सिर माथे पर उठाए घूम रहा होता।

यह हम सबका दुर्भाग्य है कि छत्तीसगढ़ को अपने हृदय में बसाए रखने वाले और छत्तीसगढ़ को पूरे देश में प्रतिष्ठा दिलाने वाले  ठाकुर जगमोहन सिंह को हम सबने तथा छत्तीसगढ़ राज्य ने आज पूरी तरह से भूला दिया है ।

अगले रविवार हिन्दी पत्रकारिता का दीप स्तंभ माधव राव सप्रे..

अन्य पोस्ट

Comments