सामान्य ज्ञान

लूनी नदी
09-Jun-2021 12:13 PM (163)
लूनी नदी

लूनी नदी, राजस्थान राज्य, पश्चिमोत्तर भारत में बहने वाली एक नदी है। अजमेर के निकट के अरावली श्रेणी की पश्चिमी ढलानों में उदगम, जहां इसे सागरमती के नाम से जाना जाता है, वहां से यह नदी आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम की ओर पहाडिय़ों से होती हुई इस प्रदेश के मैदानों के पार बहती है।
 उसके बाद यह रेगिस्तान के एक भाग से होकर अंतत: गुजरात राज्य के कच्छ के रण के पश्चिमोत्तर भाग की बंजर भूमि में विलुप्त हो जाती है। यह एक मरुस्थलीय नदी है जो  लवण नदी  के नाम से प्रसिद्ध है। बाड़ी, मिठड़ी आदि इसकी सहायक नदियां हैं।   ग्रीष्म ऋतु में इस नदी में पानी बहुत कम रहता है। लूनी एक मौसमी नदी है और इसका अपवाह मुख्यत: अरावली श्रेणी की दक्षिण-पश्चिमी ढलानों से होता है, जोवाई, सुकरी और जोजारी इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं।
 लूनी का नाम संस्कृत शब्द लवणवारि(नमकीन नदी) से लिया गया है और अत्यधिक लवणता के कारण इसका यह नाम पड़ा है।  329 किलोमीटर लंबी धारा वाली लूनी इस क्षेत्र की एकमात्र प्रमुख नदी है और यह सिंचाई का एक अनिवार्य स्रोत है। 

आर्यावर्त किसे कहते हैं?
आर्यावर्त का शाब्दिक अर्थ है आर्यो आवर्तन्तेत्र अर्थात आर्य जहा सम्यक प्रकार से बसते हंै। इसका दूसरा अर्थ है  पुण्यभूमि ।
मनुस्मृति में आर्यावर्त की परिभाषा इस प्रकार दी हुई है-
आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात।
तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधा॥ 
प्राचीन संस्कृत साहित्य में आर्यावर्त नाम से उत्तर भारत के उस भाग को अभिहित किया जाता था जो पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र तक और हिमालय से विंध्याचल तक विस्तृत है।  इसका शाब्दिक अर्थ है- जहां आर्य निवास करते हैं। प्राचीन वांड्मय में इस स्थान के बारे में विभिन्न मत हैं। ऋग्वेद इसे  सप्तसिंधु प्रदेश  बताता है।
उपनिषद काल में यह काशी और विदेह जनपदों तक फैल गया था।  मनुस्मृति में इसकी परिभाषा देते हुए कहा गया है कि पूर्व में समुद्र तट, पश्चिम में समुद्र तट, उत्तर में हिमालय से दक्षिण में विंध्याचल तक के प्रदेश को विद्वान आर्यावर्त कहते हैं।  पतंजलि के मत से गंगा और यमुना के मध्य का भू-भाग आर्यावर्त है। इन कथनों से विदित होता है कि उस समय उत्तर भारत के सभी जनपद इसमें सम्मिलित थे और आर्य संस्कृति का विस्तार इतना ही था। पुराणों का समय आते-आते यह देशव्यापी हो गई और भारतवर्ष और आर्यावर्त पर्यायवाची माने जाने लगे। 
भारत के मध्यकालीन इतिहास में उत्तर भारत के लिए  आर्यावर्त शब्द का प्रयोग मिलता है। मनुस्मृति में आर्यावर्त की सीमाओं का निर्देश करते हुए उत्तर भारत में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत तथा पूर्व और पश्चिम में समुद्रतटों तक उसका विस्तार बताया गया है।
आर्यावर्त के लिए अन्य पांच भौगोलिक नामों का भी उल्लेख मिलता है-  उदीची (उत्तर), प्रतीची (पश्चिम), प्राची (पूर्व),  दक्षिण और  मध्य। आर्यावर्त का मध्य भाग ही हिन्दी भाषा और साहित्य का उद्गम एवं विकास स्थल मध्यदेश कहलाता है। 12 वीं शती तक के साहित्य में इस नाम का निरन्तर प्रयोग हुआ है। उसके बाद इसका प्रयोग कम होता गया। विभिन्न युगों में आर्य संस्कृति के विस्तार एवं विकास के साथ आर्यावर्त की भी सीमाएं बदलती रही हैं। 
आजकल यह समझा जाता है कि इसके उत्तर में हिमालय श्रृंखला, दक्षिण में विंध्यमेखला, पूर्व में पूर्वसागर (वंग आखात) और पश्चिम में पश्चिम पयोधि (अरब सागर) है। उत्तर भारत के प्राय: सभी जनपद इसमें सम्मिलित हैं। परन्तु कुछ विद्वानों के विचार में हिमालय का अर्थ है पूरी हिमालय श्रृखंला, जो प्रशान्त महासागर से भूमध्य महासागर तक फैली हुई है और जिसके दक्षिण में सम्पूर्ण पश्चिमी एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के प्रदेश सम्मिलित थे। 
 

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