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पत्रकारिता और अभिव्यक्ति का नया मॉडल
09-Jun-2021 7:21 PM (190)
पत्रकारिता और अभिव्यक्ति का नया मॉडल

-सुसंस्कृति परिहार

आज पूरे देश में जिन प्रमुख खबरों पर लोगों की नजरें टिकी रहीं उनमें विनोद दुआ पर राजद्रोह मामले का खरिज होना। जागरण में योगी जी का जबरदस्त इंटरव्यू और रिटायर कर्मचारियों की अभिव्यक्ति को बाधित कर पेंशन पर रोक महत्वपूर्ण हैं। हर जर्नलिस्ट संरक्षण का हकदार है।

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह का मामला रद्द कर दिया है। सुको ने कहा कि वर्ष 1962 का आदेश हर जर्नलिस्ट को ऐसे आरोप से संरक्षण प्रदान करता है। गौरतलब है कि एक बीजेपी नेता की शिकायत के आधार पर विनोद दुआ पर दिल्ली दंगों पर केंद्रित उनके एक शो को लेकर हिमाचल प्रदेश में राजद्रोह का आरोप लगाया गया था। एक एफआईआर में उन पर फर्जी खबरें फैलाने, लोगों को भडक़ाने, मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित करने जैसे आरोप लगाए गए थे।

वरिष्ठ पत्रकार दुआ ने इस एफआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण ली थी। सुको ने केस को रद्द कर लिया। हालांकि कोर्ट ने दुआ के इस आग्रह को खारिज कर दिया कि 10 साल का अनुभव रखने वाले किसी भी जर्नलिस्ट पर एफआईआर तब तक दर्ज नहीं की जानी चाहिए जब तक कि हाईकोर्ट जज की अगुवाई में एक सशक्त पैनल इसे मंजूरी न दे दे। कोर्ट ने कहा कि यह विधायिका के अधिकार क्षेत्र पर अतिक्रमण की तरह होगा। किन सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण रूप से एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हर जर्नलिस्ट को ऐसे आरोपों से संरक्षण प्राप्त है। कोर्ट ने कहा, हर जर्नलिस्ट को राजद्रोह मामलों पर केदारनाथ केस के फैसले के अंतर्गत संरक्षण प्राप्ति का अधिकार होगा। 1962 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहता है कि सरकार की ओर से किए गए उपायों को लेकर कड़े शब्दों में असहमति जताना राजद्रोह नहीं है।

यह फैसला पत्रकार जगत के लिए आज के माहौल में बड़ी उपलब्धि बतौर देखने की ज़रुरत है।

आज ही दूसरी तरफ एक अखबार ने योगी के वर्चुअल इंटरव्यू को जिस अंदाज में पूरे पेज पर प्रकाशित कर जन जागरण का बिगुल बजाया उसकी जितनी भत्र्सना की जाए वह कम है। यह पत्रकारिता के नाम पर कलंक है। एक नाकाम मुख्यमंत्री की छवि स्वच्छ करने के लिए जो एकजुटता अखबार के संवाददाताओं ने दिखाई वह घृणास्पद है। इस निर्लज्ज कोशिश ने पत्रकारों का मान ना केवल घटाया है बल्कि आज सुको के विनोद दुआ के फैसले पर सोचने भी मजबूर किया है। क्या ऐसे पत्रकारों को भी संरक्षण का हकदार माना जाए? दस साल और बीस साल कोई मायने नहीं रखते। यह खौल बेबाक तौर पर सच्चाई का दामन थामे रहने वाले  पत्रकारों और समाजसेवी लोगों के दिलों में भी है। सभी को एक तराज़ू में नहीं तौला जा सकता है। लोकतंत्र का यह चतुर्थ खंभा यदि राष्ट्रहित की जगह इस तरह चापलूसी भरी  झूठी हरकत करता है तो वह संरक्षण का हकदार नहीं होना चाहिए।

इस बीच एक तीसरी खबर भी बहुत ही खतरनाक है, जिसके अनुसार सेवानिवृत्त शासकीय अधिकारी कर्मचारी शासन के खिलाफ अपनी अभिव्यक्ति नहीं दे पाएंगे। यदि देते हैं तो उनकी पेंशन बंद कर दी जाएगी। इससे दमित नौकरशाही द्वारा जो पोल पट्टी हर विभाग की खुल रही है वह उजागर नहीं हो पाएगी। ज्ञातव्य हो कि सेवानिवृत्त हुए जज से लेकर हर विभाग के अधिकारियों ने शासन की खामियों को धड़ल्ले से जनता के बीच लाकर उन्हें सावधान करने की कोशिश की है। उससे सरकार को भी सबक लेना तो दूर वह उन्हें सबक सिखाने तैयार है, ऐसे में तो सबको मिलकर अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे। नौकरी की गुलामी से निजात के बाद ताउम्र दासता का ये नया कानून भी वापस लेने की मुहिम चलानी होगी।

वस्तुत: आज के समय जिस तरह के नये नये माडल सामने आ रहे हैं, जिस तरह के नये कानून लाए जा रहे हैं उसके पीछे गलत को सही सिद्ध करने की दुर्भावना साफ झलकती है। जनता गुमराह ना हो अभिव्यक्ति बाधित ना हो इसके लिए सुको को ही पहल कदमी करने की जरूरत है।

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