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फिल्मकारों को ऐसा दलित चाहिए...
15-Jun-2021 3:38 PM (178)
फिल्मकारों को ऐसा दलित चाहिए...

(तस्वीर में बालू को देखिये, और ‘लगान’ के कचरा को।)

-आशुतोष भारद्वाज
बताया जा रहा है कि ‘लगान’ को बीस बरस हो गए। यह फिल्म कई बड़े विश्वविद्यालयों के उत्तर-औपनिवेशिक पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती है। इस फिल्म का एक प्रमुख पात्र, एक अछूत किरदार, जो अपनी गेंदबाजी से मैच को पलट देता है, भारत के पहले महान क्रिकेट खिलाड़ी पर आधारित माना जाता है। अछूत बालू पालवणकर जिन्होंने उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में पुणे के मैदानों में नेट बांधने इत्यादि से जीवन शुरू किया था, और जल्द ही अंग्रेज खिलाडियों को नेट में गेंद फेंकने लगे थे।

उन दिनों बम्बई और पुणे में चल रही क्रिकेट प्रतियोगिताओं में तीन प्रमुख टीम हुआ करती थीं। हिन्दुओं, यूरोपियों और पारसियों की। बालू को हिन्दू टीम में आने के लिए विकट चुनौतियों से जूझना पड़ा। कई लोग अछूत को टीम में लिए जाने का विरोध करते थे। लेकिन बालू को देर तक कोई न रोक सका। जल्द ही बालू हिन्दू टीम के सबसे प्रमुख गेंदबाज बन गए, अर्से तक बने रहे। बालू 1911 में भारतीय टीम के साथ इंग्लैंड गए, और सौ से अधिक प्रथम श्रेणी विकेट लिए। इस उपलब्धि को ऐसे समझिये कि तबसे लेकर आज तक सिर्फ एक अन्य भारतीय गेंदबाज इंग्लैंड दौरे पर सौ से अधिक विकेट ले पाया है, वीनू मांकड़। 

बालू के बाद उनके भाई भी हिन्दू क्रिकेट टीम में आये और आखिरकार एक साल आया जब  अछूत पालवणकर भाइयों की बदौलत हिन्दू क्रिकेट टीम ने वह प्रतियोगिता जीत ली जिस पर यूरोपीय टीम का कब्जा हुआ करता था। बालू कई दशकों तक महाराष्ट्र में दलितों के आदर्श रहे। एक समय खुद अम्बेडकर बालू को बड़े आदर से देखा करते थे। 

बालू 1937 में कांग्रेस की टिकिट पर अंबेडकर के खिलाफ चुनाव भी लड़े, और मामूली अंतर से हार गए। (एक निर्दलीय ‘वोट कटुआ’ उनके सामने खड़ा था, जो बालू की हार की वजह बना।) इस तरह बालू राजनीति में आने वाले दुनिया के शायद पहले खिलाड़ी भी बने। 

इतनी लम्बी भूमिका इसलिए कि ‘लगान’ में हुए अन्याय को बतलाया जा सके। इस लम्बे, बलिष्ठ और घनघोर स्वाभिमानी गेंदबाज का रोल ‘लगान’ में एक अपाहिज और सहमे हुए अछूत को दिया गया। 

इस किरदार का नाम क्या रखा गया?  
कचरा।     

भारतीय क्रिकेट के पहले महान खिलाड़ी और अब तक के महानतम गेंदबाजों में शुमार बालू के किरदार को एक हिंदी फिल्म में बड़ी दयनीय स्थिति में तब्दील कर दिया गया। इस अछूत कचरा का उद्धार भी एक सवर्ण के हाथों कराया गया, जबकि असल जिंदगी में अछूत बालू ने पूरी सवर्ण टीम का अकेले उद्धार कर दिया था। 

बम्बई के अनेक फिल्मकारों को ऐसा दलित चाहिए जिससे उनकी ‘सामाजिक सुधार’ की भूख मिटती रहे। दलित की ‘आदर्श’ छवि लिए जीते वे एक क्रूर स्टीरियोटाइप रचते चलते हैं। दलित उनके लिए मनुष्य नहीं, अपने जाति के पूर्वाग्रहों को बढ़ाने का औजार नजर आता है। 

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