संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : लोकतंत्र में बहुमत का मतलब अल्पमत पर डंडा नहीं होता...
19-Jul-2021 5:18 PM (240)
 ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : लोकतंत्र में बहुमत का मतलब अल्पमत पर डंडा नहीं होता...

उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने राज्य के एक प्रमुख तीर्थ स्थान हरिद्वार नाम के शहर को कसाईखाना मुक्त बना दिया है, वहां कसाईखानों को जो सरकारी इजाजत मिली हुई थी वह मार्च के महीने में राज्य सरकार ने खारिज कर दी। इस तरह वहां पर मांस की बिक्री भी रोक दी गई है। कुछ लोगों ने इसके खिलाफ उत्तराखंड हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। इसकी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर एस चौहान ने राज्य सरकार से कुछ सवाल किए और यह पूछा कि क्या राज्य सरकार लोगों की पसंद तय करेगी? उनका मतलब जाहिर तौर पर लोगों की खानपान की पसंद से था। अब हरिद्वार में बसे हुए मांसाहारी लोग न तो आसानी से शहर छोडक़र कहीं जा सकते और न ही जिंदगी भर की अपनी खानपान की आदतों को रातों-रात सरकारी आदेश की वजह से खारिज कर सकते हैं। ऐसे में यह सवाल देश में थोपी जा रही एक ऐसी संस्कृति के सामने खड़ा किया गया सवाल है जो कि सत्तारूढ़ कुछ चुनिंदा लोगों की पसंद पर देश के बाकी लोगों को चलने पर मजबूर करने की राजनीति से जुड़ा हुआ है।

हरिद्वार शहर को मांसमुक्त शहर बनाने का जो सरकारी अभियान चल रहा है उसके चलते हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की कि लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुसंख्यकों का शासन ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना भी होता है, उन्होंने कहा- किसी भी सभ्यता की महानता का पैमाना यही होता है कि वह अल्पसंख्यक आबादी के साथ कैसा बर्ताव करती है, हरिद्वार में जिस तरह के प्रतिबंध की बात की गई है उसे यही सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या नागरिकों की पसंद राज्य तय करेगा।

यह मामला अकेले उत्तराखंड का नहीं है क्योंकि भाजपा के राज वाले कई राज्यों ने एक-एक करके ऐसे कई फैसले लिए जिसमें गाय या गोवंश को मारने के खिलाफ, या गाय-भैंस के मांस के इस्तेमाल के खिलाफ तरह-तरह के आदेश निकाले गए। जहां पर ऐसे आदेश थे वहां भी, और जहां पर ऐसे आदेश नहीं थे वहां भी, हमलावर हिंदू जत्थों ने जगह-जगह लोगों को शक के बिना पर पीटा, कई जगह भीड़त्या हुई, और कई जगह सांप्रदायिक तनाव भी खड़ा हुआ। लेकिन दिलचस्प बात यह भी है कि गोवा या केरल जैसे कई राज्य ऐसे भी रहे जहां पर चुनाव लडऩे की वजह से भाजपा ने लोगों से बीफ उपलब्ध कराने का वायदा किया और उत्तर-पूर्व के राज्यों में तो भाजपा के राज में गौ मांस या बीफ उपलब्ध है है ही। इसलिए खाने की जिस संस्कृति को कुछ राज्यों पर थोपा जा रहा है, वहीं कुछ दूसरे राज्यों में अपने एजेंडा को किनारे भी रखा जा रहा है, क्योंकि वहां की बहुतायत आबादी गौ मांस या बीफ खाती ही है। हिंदुस्तान में खानपान के रिवाज को लेकर, कहीं पर शराब पीने के रिवाज को लेकर, तो कहीं पर अंतरजातीय या अंतरधर्मीय शादियों को लेकर तरह-तरह से विभाजन खड़े किए जा रहे हैं। पहनावे को लेकर विभाजन, खानपान को लेकर विभाजन, और लडक़े-लड़कियों के साथ उठने-बैठने या साथ रहने को लेकर विभाजन, यह पूरा तनाव देश पर भारी भी पड़ रहा है।

लेकिन एक बात यह भी है कि जिन लोगों पर ऐसे भावनात्मक मुद्दों का बड़ा असर होता है और जो इसे अपनी एक पुरातन संस्कृति की निरंतरता मान लेते हैं, वे फिर आज की सरकारों की नाकामयाबी को पूरी तरह अनदेखा भी कर लेते हैं, और उन्हें अपने इस काल्पनिक इतिहास में दोबारा जीने के मौके के अलावा किसी और चीज की जरूरत नहीं लगती है। यह पूरा सिलसिला लोगों को आज की जमीनी हकीकत से काट रहा है, और लोगों को गैर मुद्दों में उलझा कर रख रहा है। पूरे हिंदुस्तान के अलग-अलग अनगिनत शहरों को देखें तो वहां पर शहर के पहले थाने कोतवाली के आसपास सराफे की दुकानें रहती थीं, जो कि मोटे तौर पर सवर्ण हिंदुओं या जैन समाज के लोगों की रहती थीं। आज भी सराफा बाजार कोतवाली के आसपास अधिकतर शहरों में दिखता है। लेकिन इसके साथ-साथ इन्हीं इलाकों में बंदूक और कारतूस की दुकानें भी दिखती हैं जिन्हें अधिकतर मुस्लिम चलाते हैं, और उनकी वजह से उन इलाकों में मस्जिदें भी रहती हैं। सैकड़ों बरस से हिंदुस्तान के शहरों का ऐसा ही ढांचा चलते आ रहा है कि हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद ये मिले-जुले इलाकों में रहते आए हैं। अब इलाकों के नाम बदलना, शहरों के नाम बदलना, खानपान बदलना, इन सबका जो सिलसिला चल रहा है, उसकी असली नीयत लोगों का ध्यान असली दिक्कतों की तरफ से हटाना है। यह तो अच्छा है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बहुसंख्यक तबके के राज्य में अल्पसंख्यकों की फिक्र को लेकर सवाल उठाए हैं, और इस पर बहस भी उत्तराखंड से बाहर भी देशभर में होनी चाहिए। लोकतंत्र महज बहुमत का नाम नहीं होता है।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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