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पेगासस भांडाफोड़ की जांच सुप्रीम कोर्ट निगरानी में हो
21-Jul-2021 3:50 PM (89)
पेगासस भांडाफोड़ की जांच सुप्रीम कोर्ट निगरानी में हो

-विजय शंकर सिंह
दुनियाभर के देशों ने पेगासस जासूसी के खुलासे पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दिया है, पर भारत इसे विपक्ष की साजि़श बता कर इस जासूसी के खिलाफ अभी कुछ नहीं कर रहा है। क्या जांच की आँच सरकार को झुलसा सकती है या सरकार फिर एक बार शुतुरमुर्गी दांव आजमा रही है।

  • फ्रांस ने न्यूज़ वेबसाइट मीडियापार्ट की शिकायत के बाद पेगासस जासूसी की जाँच शुरू कर दिया है।
  • अमेरिका में बाइडेन प्रशासन ने पेगासस जासूसी की निंदा की है।
  • व्हाट्सएप प्रमुख ने सरकारों व कंपनियों से आपराधिक कृत्य के लिए पेगासस निर्माता एनएसओ पर कार्रवाई की मांग की।
  • अमेजन ने एनएसओ से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और अकाउंट बंद किया।
  • मैक्सिको ने कहा है कि, एनएसओ से किए गए पिछली सरकार के कॉन्ट्रैक्ट रद्द होंगे।
  • भारत इसे विपक्ष की साजिश बता रहा है !

फ्रांसीसी अखबार ला मोंड ने लिखा है कि नरेंद्र मोदी जब जुलाई 2017 में इजरायल गये थे, तब वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति बेंजामिन नेतान्याहू से उनकी लंबी मुलाकात हुई थी। इसके बाद पेगासस स्पाईवेयर का भारत में इस्तेमाल शुरू हुआ, जो आतंकवाद और अपराध से लडऩे के लिए 70 लाख डॉलर में खरीदा गया था। पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह कहा है कि दुनिया के 45 से ज़्यादा देशों में इसका इस्तेमाल होता है, फिर भारत पर ही निशाना क्यों ?
जैसा खुलासा हो रहा है, सरकार ने पेगासस का इस्तेमाल सिर्फ अपने ही लोगों पर नहीं, बल्कि चीन, नेपाल, पाकिस्तान, ब्रिटेन के उच्चायोगों और अमेरिका की सीडीसी के दो कर्मचारियों की जासूसी तक में किया है। द हिन्दू अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने कई राजनयिकों और विदेश के एनजीओ के कर्मचारियों की भी जासूसी की है।

पेगासस एक व्यावसायिक कम्पनी है जो पेगासस स्पाइवेयर बना कर उसे सरकारों को बेचती है। इसकी कुछ शर्तें होती हैं और कुछ प्रतिबंध भी। जासूसी करने की यह तकनीक इतनी महंगी है कि इसे सरकारें ही खरीद सकती हैं। यह स्पाइवेयर आतंकी घटनाओं को रोकने के लिये आतंकी समूहों की निगरानी के लिए बनाया गया है। सरकार ने यदि यह स्पाइवेयर खरीदा है तो उसे इसका इस्तेमाल आतंकी संगठनों की गतिविधियों की निगरानी के लिये करना चाहिए था। पर इस खुलासे में निगरानी में रखे गए नाम, जो विपक्षी नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के जजों, पत्रकारों, और अन्य लोगों के हैं उसे सरकार को स्पष्ट करना चाहिए।

अगर सरकार ने यह स्पाइवेयर नहीं खरीदा है और न ही उसने निगरानी की है तो, फिर इन लोगों की निगरानी किसने की है और किस उद्देश्य से की है, यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर किसी विदेशी एजेंसी ने यह निगरानी की है तो यह मामला और भी संवेदनशील और चिंतित करने वाला है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि,

  • 0 उसने पेगासस स्पाइवेयर खरीदा या नहीं खरीदा।
  • यदि खरीदा है तो क्या इस स्पाइवेयर से विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, सुप्रीम कोर्ट के जजों और कर्मचारियों की निगरानी की गयी है ?
  • यदि निगरानी की गई है तो क्या सरकार के पास उनके निगरानी के पर्याप्त कारण थे ?
  • यदि सरकार ने उनकी निगरानी नहीं की है तो फिर उनकी निगरानी किसने की है ?
  • यदि यह खुलासे किसी षडयंत्र के अंतर्गत सरकार को अस्थिर करने के लिये, जैसा कि सरकार कह रही है, किये जा रहे हैं, तो सरकार जो इसका मजबूती से प्रतिवाद करना चाहिए।

पेगासस का लाइसेंस अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत मिलता है और इसका  इस्तेमाल आतंकवाद से लडऩे के लिये आतंकी संगठन की खुफिया जानकारियों पर नजऱ रख कर उनका संजाल तोडऩे के लिये किया जाता है। पर मोदी सरकार ने इन नियमों के विरुद्ध जाकर, पत्रकार, विपक्ष के नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ अपने निहित राजनीतिक उद्देश्यों के लिये किया है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की भी निगरानी की बात सामने आ रही है।

नियम और शर्तों के उल्लंघन पर पेगासस की कंपनी एनएसओ भारत सरकार से स्पाईवेयर का लाइसेंस रद्द भी कर सकती है। क्योंकि, राजनयिकों और उच्चायोगों की जासूसी अंतरराष्ट्रीय परम्पराओ का उल्लंघन है और एक अपराध भी है । अब वैश्विक बिरादरी, इस खुलासे पर सरकारों के खिलाफ क्या कार्यवाही करती है, यह तो समय आने पर ही पता चलेगा। फ्रांस की सरकार ने इस खुलासे पर अपने यहां जांच बिठा दिया है।

सरकार फोन टेप करती हैं, उन्हें सुनती हैं, सर्विलांस पर भी रखती है, फिजिकली भी जासूसी कराती हैं, यह सब सरकार के काम के अंग है। इसीलिए इंटेलिजेंस ब्यूरो, रॉ, अभिसूचना विभाग जैसे खुफिया संगठन बनाये गए हैं और इनको अच्छा खासा धन भी सीक्रेट मनी के नाम पर मिलता है। पर यह जासूसी, या अभिसूचना संकलन, किसी देशविरोधी या आपराधिक गतिविधियों की सूचना पर होती है और यह सरकार के ही बनाये नियमों के अंतर्गत होती है। राज्य हित के लिए की गई निगरानी और सत्ता हित के  लिये किये गए निगरानी में अंतर है। इस अंतर के ही परिपेक्ष्य में सरकार को अपनी बात देश के सामने स्पष्टता से रखनी होगी।

पेगासस जासूसी यदि सरकार ने अपनी जानकारी में देशविरोधी गतिविधियों और आपराधिक कृत्यों के खुलासे के उद्देश्य से किया है तो, उसे यह बात संसद में स्वीकार करनी चाहिए। यदि यह जासूसी, सत्ता बनाये रखने, ब्लैकमेलिंग और डराने के उद्देश्य से की गयी है तो यह एक अपराध है। सरकार को संयुक्त संसदीय समिति गठित कर के इस प्रकरण की जांच करा लेनी चाहिए। जांच से भागने पर कदाचार का संदेह और अधिक मजबूत होगा।  सबसे हैरानी की बात है सुप्रीम कोर्ट के जजों की निगरानी। इसका क्या उद्देश्य है, इसे राफेल और जज लोया से जुड़े मुकदमों के दौरान अदालत के फैसले से समझा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के जज और सीजेआई पर महिला उत्पीडऩ का आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की क्लर्क और उससे जुड़े कुछ लोगों की जासूसी पर सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेकर एक न्यायिक जांच अथवा सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच करानी चाहिए।

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