संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : दूसरे देशों की कलाकृतियों पर अवैध कब्जा जमाए देश सभ्य लोकतंत्र कैसे हो सकते हैं?
07-Aug-2021 12:59 PM (386)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  दूसरे देशों की कलाकृतियों पर अवैध कब्जा जमाए देश सभ्य लोकतंत्र कैसे हो सकते हैं?

इराक के प्रधानमंत्री अभी अमेरिका की सरकारी यात्रा पर पहुंचे तो लौटते हुए वे युद्ध के दौरान इराक से लूटी गई 17000 कलाकृतियों को वापस लेकर आए। ये कलाकृतियां एक संग्रहालय और एक प्रमुख अमेरिकी विश्वविद्यालय की तरफ से वापिस की गईं। अभी हाल ही में एक दूसरी खबर भी आई थी जिसके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया ने भी भारत से जुड़ी हुई कुछ पुरानी कलाकृतियां लौटाने का फैसला लिया है। जो विकसित और सभ्य देश हैं वे अपने देश के कलाकृतियों के व्यापारियों और संग्रह कर्ताओं, दोनों पर कई तरह के नियम लागू करते हैं कि वे दूसरे देशों से चुराई गई या लूटी गई कलाकृतियों को न लें।

यहां पर यह भी देखने की जरूरत है कि ब्रिटेन के बड़े-बड़े संग्रहालयों में भारत की कलाकृतियां उस वक्त पहुंचीं जब भारत पर अंग्रेजों ने कब्जा कर रखा था। एक गुलाम देश की कलाकृतियों, पुरातत्व, और संस्कृति को इस तरह से ले जाना एक निहायत नाजायज बात थी, और एक सभ्य लोकतंत्र होने का दवा करने वाले ब्रिटेन को अपने गुलाम देशों से जबरिया ले जाई गईं तमाम चीजों को वापस करना चाहिए। किसी भी देश को यह हक नहीं कि वे खुद दूसरे देशों से लुटेरों की तरह कलाकृतियां ले जाएं या कि चोरों और लुटेरों से उन कलाकृतियों को खरीदें जिन पर किसी दूसरे देश का हक है। सभ्य लोकतंत्र की यह जिम्मेदारी होती है कि वह कोई अंतरराष्ट्रीय कानून लागू हुए बिना भी दुनिया के हर देश के अधिकारों का सम्मान करें। इसलिए अभी इराक की जो कलाकृतियां वहां की सरकार को लौटाई गईं वह एक अच्छी पहल है क्योंकि आज इराक ऐसी हालत में भी नहीं था कि वह अमेरिका पर कोई दबाव बना सके, और ऐसे में अमेरिकी संग्रहालय और एक विश्वविद्यालय ने अगर ऐसी पहल की है तो उससे दुनिया के बाकी लोगों को भी सबक लेना चाहिए। भारत का कलाकृतियों का और पुरातत्व का सैकड़ों बरस पुराना एक संपन्न इतिहास रहा है और अविभाजित भारत-पाकिस्तान के वक्त से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की संस्कृति बहुत ही पुरानी रही है। जाहिर है कि पुरातत्व के ऐसे शोध कार्यों से उस वक्त जो चीजें निकली होंगी उनमें से बहुत सी इधर-उधर हो गई होंगी। जिन देशों में दूसरे देशों की ऐसी कलाकृतियां है उन्हें अपने विकसित और सभ्य लोकतंत्र होने का सबूत देते हुए और अंतरराष्ट्रीय अधिकारों का सम्मान करते हुए ऐसी तमाम चीजों को उनके मूल देश को वापिस करना चाहिए।

दिक्कत यह भी है कि ब्रिटेन जैसे हमलावर और नाजायज कब्जा करने वाले देश अपने गुलाम देशों से लूटी गई चीजों को यह कह कर न्यायोचित ठहराते हैं कि वहां के भूतपूर्व राजाओं ने यह सामान उन्हें तोहफे में दिए थे। ब्रिटेन की महारानी के ताज पर जो कोहिनूर जड़ा हुआ है उस कोहिनूर को लेकर भी यही तर्क दिया जाता है कि इसे भारत के एक शासक महाराज रंजीत सिंह ने युद्ध में अंग्रेजों द्वारा की गई मदद के एवज में तोहफे में दिया था, लेकिन ब्रिटेन के कई संग्रहालयों में भारत की अनगिनत कलाकृतियां सजी हुई हैं और अंग्रेजों की सरकार को इन्हें रखने का कोई भी हक नहीं है। पूरी दुनिया में कलाकृतियों को उनके मालिकों तक वापस पहुंचाने की एक मुहिम चलाने वाले लोगों का एक बड़ा आसान सा तर्क है उनका मानना है इतिहास भूगोल के आधार पर तय होगा, यानी जिस जगह का सामान है उसी जगह उसे भेजना न्याय उचित होगा।  एक बात यह भी है कि ऐसे एक अभियान से जुड़े हुए लोगों ने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बहुत से संग्रहालयों में ऐसी कलाकृतियां ढूंढ निकाली हैं जो कि भारत के मंदिरों से 1947 के बाद चोरी की गई हैं। अभी-अभी, 2 बरस पहले जर्मनी ने भारत से चुराकर वहां ले जाई गई एक कलाकृति को भारत को वापिस भी किया है। लेकिन यह काम बहुत धीमे हो रहा है और अधिकतर देश इसमें खुलकर साथ नहीं दे रहे हैं।

एक वक्त आधी दुनिया पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों की सोच आज भी ऐसी है कि ब्रिटेन के दो बड़े संग्रहालयों का यह कहना है कि वे अलग-अलग देशों की ऐसी ऐतिहासिक कलाकृतियों या पुरातत्व कृतियों को इसलिए नहीं लौटा सकते क्योंकि ब्रिटेन का म्यूजियम एक्ट इसकी इजाजत नहीं देता, या फिर इन कलाकृतियों का ब्रिटेन में बने रहना विश्व के हित में है। यह सोच आज भी एक सामंती और साम्राज्यवादी सोच बनी हुई है जो कि दूसरे देशों का भला अपने अधिकारों में अलग देख रही है। ऐसे चोर देशों के भीतर वहां के सांसदों को भी संसद में आवाज उठानी चाहिए कि क्या अपने को लोकतंत्र की जननी कहने वाले देश को ऐसी गुंडागर्दी का हक़ है?
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