संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मीडिया का कार्पोरेट कारोबार और उसके सरोकार पर चर्चा
08-Aug-2021 12:56 PM (303)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  मीडिया का कार्पोरेट कारोबार और उसके सरोकार पर चर्चा

जिंदगी के बहुत से असल मुद्दों पर लगातार लिखने वाली एक महिला पत्रकार दोस्त ने एक वक्त लिखा था कि वह एक स्थानीय अखबार में पढ़ रही थी कि किस तरह हाथियों ने एक बस्ती में तोड़-फोड़ की। और साथ यह लिखा कि ऐसी खबरों के बाद उसे शाहरूख खान के डॉन-2 के बारे में पढऩे की क्या जरूरत है? यह बात रोज ही हमारे सामने आती है क्योंकि अखबार के कई पन्ने रोज तैयार करते हुए दिन की शुरुआत से लेकर रात काम खत्म होने तक दुविधा खत्म ही नहीं होती। अखबार पढऩे वालों की उम्मीदों के मुताबिक अखबार निकाला जाए, या उन्हें उनकी उम्मीदों के बारे में कुछ सलाह देता हुआ अखबार निकाला जाए? अखबार का मकसद कारोबार हो, या सरोकार हो? ऐसे बहुत से सवाल बहुत सी खबरों को लेकर और उन खबरों से छांटे गए किसी मुद्दे पर इस तरह का, इस जगह पर संपादकीय लिखते हुए सामने आकर खड़े हो जाते हैं। जब हम जिंदगी की तकलीफों और समाज में बेइंसाफी के बारे में लिखते हैं तो बहुत से लोगों को लगता है कि लिखने को कोई अच्छी बात बची ही नहीं है क्या? कुछ अखबारों ने अपनी यह नीति बना रखी है कि वे पहले पन्ने पर दुख-तकलीफ की कोई खबर नहीं छापते हैं, जब तक कि वह किसी बड़ी ताजा घटना की खबर न हो, और जिसे छोड़ देना लापरवाही लगे।

जो जुबान खबरों को छांटने के लिए इस्तेमाल होती है वह बहुत दिलचस्प है। हिंदुस्तान में हिंदी में अंग्रेजी के बहुत से शब्द घुल-मिल चुके हैं और ऐसा ही एक शब्द अखबारनवीसी में इस्तेमाल होता है-पब्लिक इंटरेस्ट। बारीकी से देखें तो हिंदी में इसके दो अलग-अलग मायने निकलते हैं, एक तो इसका मतलब जनहित होता है और दूसरा मतलब जनरुचि होता है। अखबार की खबरें तय करते हुए, विचारों के मुद्दे और विचारों को तय करते हुए, इन सबकी प्राथमिकताएं और इनका महत्व तय करते हुए, जब बात पब्लिक इंटरेस्ट की होती है तो कारोबारी अखबार (बिजनेस न्यूजपेपर नहीं, बिजनेस के लिए फिक्रमंद न्यूजपेपर) उसे जनरुचि मानकर एक ऐसा अखबार पाठकों के सामने रखता है जैसा कि दस-बीस बरस पहले एक तांत्रिक अंगूठी के इश्तहार में दावा किया जाता था-जो मांगोगे वही मिलेगा। और पब्लिक इंटरेस्ट का यह मतलब अखबार की रगों में दौडऩे वाले इश्तहार वाले फायदे की बात भी होती है। दूसरी तरफ जो लोग अखबार को कारोबार से कुछ अधिक, सरोकार से जुड़ा हुआ मानते हैं, वे पब्लिक इंटरेस्ट के जनहित वाले अर्थ को ढोकर चलते हैं, जो कि खासा भारी होता है और कमर भी तोड़ देता है। हम अभी बात मोटे तौर पर अखबारों की इसलिए कर रहे हैं कि देश का लंबा अनुभव इन्हीं के बारे में अधिक है और टीवी के समाचार चैनलों को आए अख़बारों के मुकाबले कम दिन हुए हैं और उनका सरोकारों से, जनहित से लेना-देना उसी वक्त जरा सी देर के लिए शुरू होता है जब कोई स्टिंग ऑपरेशन उनके हाथ ऐसा लग जाता है जो लोगों को टीवी के सामने कुछ देर बांध सके। भारत के समाचार चैनलों को हम आज के इस गंभीर विश्लेषण में जोडऩे की कोशिश करने पर भी नहीं जोड़ पाएंगे।

आज इस बात पर लिखने की कुछ जरूरत इसलिए भी लग रही है कि पाकिस्तान में एक कमजोर और खतरे में चल रहे लोकतंत्र के भीतर वहां के मीडिया को लेकर खुली बहस चलती है और लोग जिस तरह उसकी आलोचना भी करते हैं, वह बात हिंदुस्तान में शायद इसलिए कम है क्योंकि यहां मीडिया उस तरह के किसी फौजी, खुफिया, आतंकी और कट्टरपंथी हमलों का शिकार नहीं है। अधिक आजादी ने भारत के मीडिया को आत्ममंथन से परे कर दिया है और तरह-तरह के दबावों के तले पाकिस्तानी मीडिया चर्चा का सामान बनता है। अखबारों के पन्नों के लिए रोजाना धरती के अनगिनत पेड़ कटते हैं, ये पन्ने कम से कम ऐसे तो हों कि वे पेड़ों की कुर्बानी को सही ठहरा सकें! प्रेस काउंसिल के एक वक़्त के अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने अपनी कुछ बातों को लेकर मीडिया के बीच एक हलचल खड़ी की थी, और एक नाराजगी भी। लेकिन ‘उनकी’ बातों को लेकर उन्हें भला-बुरा कहने के साथ-साथ, उनके नाम को अलग करके च्उनज् बातों पर चर्चा की जरूरत क्या आज नहीं है? न सिर्फ उनकी कई बातें खरी हैं, बल्कि मीडिया में आज जो खोट है उसे लेकर आपस में ही कुछ खरी-खोटी करने की जरूरत है ताकि अगर किसी किस्म की बेहतरी मुमकिन है तो वह तो हासिल हो सके।

अखबारों के बाजारू मुकाबले के चलते कुछ ऐसी हरकतें हो रही हैं जो कि हमारी इस फिक्र को जायज और जरूरी ठहराती हैं। किसी का नाम लेकर उसे बुरा कहने या बदनाम करने का आज कोई मौका नहीं है इसलिए बिना नाम दो अलग-अलग मामलों की चर्चा यहां करना हमें माकूल लग रहा है। एक शहर में एक बड़े अखबार का स्थानीय संस्करण शुरू होने को था। वहां पहले से निकल रहे एक अखबार को यह फिक्र खड़ी हो गई थी कि नए अखबार के आने से लोग उसकी तरफ ध्यान न दें। उसने नए अखबार के पहले ही दिन, अपने अखबार में शहर की एक इतनी सनसनीखेज खबर छापी कि जिस पर पूरा देश हिल उठा। और तीन हफ्ते बीतते न बीतते देश के एक तीसरे, बड़े और जिम्मेदार अखबार ने यह रिपोर्ट छापी कि वह सनसनीखेज रिपोर्ट पूरी की पूरी झूठी थी, और सोच-समझकर उसे सच से दूर महज सनसनीखेज बनाया गया था। एक दूसरा प्रदेश और दो दूसरे अखबारों के बीच का मुकाबला। वहां भी पुराने जमे हुए अखबार ने नए अखबार के पांव न जमने देने के लिए एक इतनी बड़ी खबर छापी, जिसे पढक़र लोग हिल जाएं। एक बेटे ने अपने मां को मारकर, काटकर, पकाकर खा लिया। इससे बड़ी खबर किसी इलाके के लिए और क्या हो सकती है? और फिर वहां शायद चौथाई या आधी सदी से निकलते अखबार में अगर यह सबसे बड़ी सुर्खी हो, तो फिर लोग और क्या पढऩा चाहेंगे? कम से कम इसके मुकाबले किसी नए अखबार को तो पढऩा नहीं ही चाहेंगे। नतीजा यह हुआ कि नया अखबार बुरी तरह से पिटा हुआ सा लगने लगा। लेकिन उस प्रदेश के पाठकों की हैरानी की कोई सीमा न रही जब नए अखबार ने उस औरत को लाकर पुलिस और पाठकों के सामने पेश कर दिया जिसे कि मार, काट, पकाकर खा चुका गया बताया गया था।
 
लेकिन मीडिया के ऐसे झूठ पर बात आमतौर पर तभी होती है जब बाजार में मुकाबले के लिए किसी को किसी दूसरे अखबार को नीचा दिखाना हो। पर जहां कोई बाजारू टकराव न हों, और जहां अखबारी परंपरागत जुबान के मुताबिक, कुत्ता, कुत्ते को न काट रहा हो, वहां पर लोगों को झूठ की ऐसी साजिशों का क्या पता लगेगा? हम उसी बात पर लौटें, जिस बात से हमने आज लिखना शुरू किया था। जनहित और जनरुचि के फर्क को लेकर मीडिया पर अगर बात नहीं होगी तो यह तो वैसे भी संसद की एक बहस के मुताबिक कार्पोरेट हाऊसों का एक कारोबार बन ही चुका है। कार्पोरेट कारोबार की जुबान में सरोकार सिर्फ हाथीदांत की तरह का होता है। यहां पर चलते-चलते हम एक और अखबार और उसकी खबर का जिक्र करना चाहेंगे। टाईम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली के संस्करण में नोएडा इलाके के लिए निकलने वाले पन्नों पर एक बार एक खबर छपी थी जिसमें एक कार दुर्घटना में मारे गए एक युवक और एक युवती के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें थीं। इस पर अखबार ने अपनी कुछ जानकारियों का खंडन उसी बरस कर दिया था। लेकिन कुछ बरस बाद जाकर, शायद अदालत के बाहर समझौते के लिए, इस खबर को लेकर एक बड़ा सा माफीनामा अखबार ने एक रिपोर्ट की तरह छापा है कि उसकी खबर में कौन-कौन सी बातें झूठी थीं। एक मीडिया वेबसाईट ने हिसाब लगाया है कि करीब सवा दो सौ वर्ग सेंटीमीटर जगह में छपे इस माफीनामे का इस अखबार के विज्ञापन रेट से बिल बनता तो वह करीब आठ लाख रूपए का होता। हम अभी रूपयों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन हम मीडिया की गलतियों, उसके गलत कामों, और उनमें सुधार की ऐसी मिसालों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

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