संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अपने लोगों को लाईफ जैकेट के ऊपर और लाईफ जैकेट, बाकी गरीब लोग डूब जाएँ...
20-Aug-2021 5:32 PM (182)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  अपने लोगों को लाईफ जैकेट के ऊपर और लाईफ जैकेट, बाकी गरीब लोग डूब जाएँ...

एक के बाद दूसरे विकसित और संपन्न देशों ने अपने नागरिकों को कोरोना वैक्सीन के दो डोज के बाद तीसरा डोज लगाने की घोषणा की है और कुछ देशों ने यह शुरू भी कर दिया है। इजरायल जैसा छोटा देश जो कि अति संपन्न देशों में से है, उसने तीसरा डोज लोगों को लगा भी दिया है। अमेरिका और यूरोप के बहुत से देशों ने इसकी घोषणा कर दी है। इसे देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इन देशों को यह चेतावनी दी है कि जब दुनिया के गरीब देशों में लोगों को वैक्सीन की पहली खुराक भी नहीं लग पा रही है तब अगर कुछ देश अपनी संपन्नता की वजह से अपने नागरिकों को तीसरी खुराक लगा रहे हैं, तो इससे दुनिया के अमीर और गरीब देशों के बीच एक गहरी और चौड़ी खाई खुद रही है। एक अंतरराष्ट्रीय संगठन दुनिया में अपने आपको परिपच् लोकतंत्र करार देने वाले देशों को यह मामूली समझ की नसीहत दे रहा है, जो कि इन देशों को खुद ही समझ आनी चाहिए थी। वैसे भी दुनिया में विकसित और संपन्न देश अपनी कई किस्म की नीतियों को लादते हुए बाकी दुनिया को गरीब बनाए रखने की साजिश करते ही हैं। लेकिन एक महामारी जिसका असर दुनिया में कहीं से कहीं भी फैल रहा है, उसे काबू में करने के लिए भी विकसित देशों को यह बात समझ नहीं आ रही है कि उनके लोगों को तीसरी खुराक लगने के पहले गरीब देशों में स्वास्थ्य कर्मचारियों और दूसरे लोगों को पहली खुराक लग जाना अधिक जरूरी है, तभी यह दुनिया महामारी से बच सकेगी। संपन्नता लोगों को इस हद तक हिंसक बना देती है कि वे दुनिया को अलग-अलग टापुओं में बांटकर चलने लगते हैं और गरीब लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने संपन्न देशों की इस रणनीति पर तंज कसते हुए कहा है कि ये देश अपने लोगों को अतिरिक्त लाइफ जैकेट देने जा रहे हैं, जिनके पास पहले से लाइफ जैकेट हैं, जबकि बाकी लोगों को डूबने के लिए छोड़ दे रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने हमेशा से ही यह बात चली आ रही है कि विकसित संपन्न और ताकतवर देश गरीब देशों की कोई फिक्र नहीं करते और गरीब देशों को अपना कबाड़ फेंकने के लिए, अपनी जरूरत के ऐसे सामान बनवाने के लिए इस्तेमाल करते हैं जिनसे उन गरीब देशों में चाहे जितना प्रदूषण हो जाए। गरीबों को मरने के लिए छोड़ देना अमीर समाज या अमीर देश की एक आम सोच हमेशा से चली आ रही है। दिलचस्प बात यह भी है कि कोरोना वैक्सीन की तीसरी डोज के बारे में अभी तक विश्व स्वास्थ्य संगठन को ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है कि इस तीसरी डोज से लोगों पर खतरा कुछ घटेगा। फिर भी जो संपन्न देश वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से मनमाना स्टॉक खरीद सकते हैं, वे अपने नागरिकों को 3-3 डोज लगाना शुरू कर चुके हैं।

आज दुनिया में देशों के बीच में ऐसा कोई तालमेल नहीं बचा है कि पूरी दुनिया की एक सामूहिक जिम्मेदारी अधिक ताकतवर और अधिक संपन्न देशों पर कुछ अधिक आए। दुनिया के देश अपनी सरहदों को अपनी जिम्मेदारी की सरहद भी मान लेते हैं, और सरहद के दूसरी तरफ के दूसरे देशों की कोई जिम्मेदारी भी अपने ऊपर नहीं मानते। तरह-तरह के फौजी झगड़ों के मौके पर संयुक्त राष्ट्र संघ किसी काम का नहीं रह गया है, उसी तरह तरह-तरह की महामारी और दूसरी बीमारियों से जूझने के लिए डब्ल्यूएचओ जैसे संगठनों के हाथ में कोई ताकत नहीं रह गई है, और ये संगठन संपन्न देशों से मिलने वाले आर्थिक अनुदान पर चल रहे हैं, उनको कुछ कहने की हालत में नहीं हैं। फिर यह भी है कि विकसित और संपन्न लोकतंत्रों के भीतर भी ऐसी कोई सामाजिक और सामूहिक चेतना नहीं रह गई है कि वहां के लोग अपनी सरकारों के ऐसे फैसलों के खिलाफ उठकर खड़े हों और एक जनमत तैयार करें कि पहले दुनिया के गरीब देशों को वैक्सीन का पहला डोज दिया जाए उसके बाद संपन्न देश अपने लोगों को तीसरा डोज देने की सोचें। यह सिलसिला बड़े-बड़े विकसित लोकतंत्र होने का दावा भरने वाले देशों की गैरजिम्मेदारी का एक बड़ा सबूत है, और यह बड़ी तकलीफदेह सच्चाई है कि दुनिया में स्वार्थ इस कदर हावी है कि लोग अपने से परे दूसरों की जरूरत, उनकी जिंदगी पर खतरे, के बारे में कुछ सोच भी नहीं रहे हैं। किसी लोकतंत्र, किसी राजनितिक चेतना, किसी धर्म का भी कोई दवाब नहीं दिखता कि गरीबों के भी जिन्दा रहने को एक बुनियादी हक माना जाये।
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