संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : नियमों को लागू करना तो अच्छा है, लेकिन महज इतने छोटे पैमाने पर?
25-Aug-2021 5:33 PM (258)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  नियमों को लागू करना तो अच्छा है, लेकिन महज इतने छोटे पैमाने पर?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अभी एक फैसले में कहा है कि पुलिस में लोगों को दाढ़ी रखने का संवैधानिक अधिकार नहीं है अदालत का कहना है कि पुलिस की छवि सेक्युलर रहनी चाहिए और ऐसी छवि से राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलती है। एक मुस्लिम सिपाही को विभाग की इजाजत के बिना दाढ़ी रखने पर निलंबित किया गया था उसने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी और वहां से फैसले में यह कहा गया है कि दाढ़ी रखने का धार्मिक स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं है, और पुलिस में अनुशासन के लिए जो आदेश जारी किया गया है उसमें सिखों को छोडक़र किसी भी अन्य पुलिसकर्मी को बिना इजाजत दाढ़ी रखने की छूट नहीं है।

हाईकोर्ट के फैसले का यह हिस्सा बड़ा दिलचस्प है जिसमें जज पुलिस के लिए कह रहे हैं कि उनकी एक धर्मनिरपेक्ष छवि बनी रहनी चाहिए जिससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है। आज लखनऊ हाई कोर्ट बेंच के ही इस प्रदेश, उत्तर प्रदेश में जिस तरह धर्मनिरपेक्षता खत्म की जा रही है, हो सकता है उसे लेकर जजों के दिमाग में फिक्र बैठी हुई हो और बाकी मामलों की चर्चा किए बिना उन्होंने इस मामले के बहाने इस जरूरत को गिनाया हो। उत्तर प्रदेश में शायद ही कोई हफ्ता ऐसा गुजर रहा है जब किसी शहर-मोहल्ले या किसी और जगह का नाम नहीं बदला जा रहा है। लगातार ऐसे फैसले हो रहे हैं, और उन पर अमल हो रहा है। और यह पूरा का पूरा सिलसिला एक किसी वक्त रखे गए मुस्लिम नामों को बदल कर उनके हिंदूकरण के बारे में है. ऐसा नहीं है कि किसी हिन्दू नाम को भी बदला गया है. उत्तर प्रदेश में सरकार जिस तरह एक धर्म राज्य कायम करने पर उतारू है, और जिस तरह वहां मुस्लिमों के खिलाफ तरह-तरह के केस दर्ज हो रहे हैं, और जिस तरह वहां के हज हाउस तक को भगवा रंग दिया गया था, तो ऐसी तमाम बातों को देखते हुए उत्तर प्रदेश हाईकोर्ट को जो सचमुच की फिक्र होनी चाहिए वह फिक्र घटते-घटते एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी तक आ गई। इस बात पर हैरानी होती है कि संविधान की व्याख्या करने तक का अधिकार जिन हाईकोर्ट को रहता है वे अपने दायरे में इस तरह के सरकारी कामकाज देखते हुए भी चुप रहते हैं, और धर्मनिरपेक्षता का तकाजा उन्हें एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी में दिख रहा है।

खैर इस बात को छोड़ दें तो हाल के बरसों में हिंदुस्तान में सरकारों पर धर्म का जैसा साया दिखा है, वह भयानक है। मध्यप्रदेश में जब उमा भारती मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय में अपनी इमेज के ऊपर एक मंदिर सा बनवा लिया, और वहां पर प्रतिमा, फूल मालाएं, वह नजारा देखने लायक था। फिर शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री निवास में मंदिर बनवा लिया। देश भर के बहुत से प्रदेशों में तकरीबन हर थाने में बजरंगबली के मंदिर रहते हैं। सरकारी गाडिय़ों को देखें तो उनके भीतर देवी-देवताओं की छोटी प्रतिमाएं लगी रहती हैं, सरकारी दफ्तरों में मंत्री और अफसर अपनी आस्था के मुताबिक देवी-देवता, किसी दूसरे ईश्वर, या किसी गुरु की तस्वीरें टांग कर रखते हैं, मेजों पर कांच के नीचे तस्वीरें सजाकर रखते हैं। और सरकार की जो धर्मनिरपेक्ष छवि होनी चाहिए उसका कहीं अता-पता नहीं रहता। लेकिन बात महज अपने धर्म और अपने किसी आध्यात्मिक गुरु के प्रति आस्था दिखाने तक रहती, तब तक भी ठीक था. आज तो संविधान की शपथ लेकर मंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले लोग, और सरकारी सेवा के तहत काम करने वाले अफसर और कर्मचारी जिस तरीके से सांप्रदायिकता को लादते हुए दिख रहे हैं, सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देते हुए दिख रहे हैं, भीड़त्या करने वाले लोगों के जेल से छूटने पर केंद्रीय मंत्री उनको माला पहनाते दिख रहे हैं, तो ऐसे में किसी एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी पता नहीं इस देश में सांप्रदायिकता कितना बढ़ा देगी और धर्मनिरपेक्षता को कितना घटा देगी?

हम तो ऐसी आदर्श स्थिति के पक्ष में हैं कि तमाम धार्मिक प्रतीकों को सरकार से बाहर कर दिया जाए, लोगों की तमाम आस्था को उनके घरों तक सीमित कर दिया जाए, और इसे सरकारी सेवा शर्तों में जोड़ दिया जाए, या मंत्री और जज जैसों के साथ इसे जोड़ दिया जाए कि वह किसी किस्म की धार्मिक आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करेंगे। लेकिन एक तरफ सत्ता पर बैठे हुए लोग सांप्रदायिक हिंसा पर उतारू हैं लगातार सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं इस देश की बड़ी बड़ी अदालतें ऐसे उकसाऊ और भडक़ाऊ सांप्रदायिक कामों को अनदेखा करते हुए बैठी हैं, और ऐसे में जब एक मुस्लिम सिपाही की दाढ़ी से देश की धर्मनिरपेक्षता पर खतरा दिखता है, तो लगता है कि क्या बड़ी-बड़ी अदालतें भी इतने तंग नजरिए से काम नहीं कर रही हैं कि उन्हें एक छोटा सा उल्लंघन तो दिख रहा है, लेकिन देश के लोकतंत्र की बुनियादी समझ, धर्मनिरपेक्ष ढाँचे धर्मनिरपेक्ष पर लगातार होते वार नहीं दिख रहे ? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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