संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : महाशक्ति के महापमान के बाद दुनिया के बदल गए समीकरण
26-Aug-2021 5:09 PM (126)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : महाशक्ति के महापमान के बाद दुनिया के बदल गए समीकरण

अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद जिस तरह का माहौल पूरी दुनिया में बन रहा है उसे देखते हुए लगता है कि 20 बरस की फौजी कवायद के बाद जितनी बड़ी शिकस्त अमेरिका को अफगानिस्तान में मिली है उसका कोई मुकाबला नहीं है। खुद अमेरिका को ऐसी शर्मिंदगी और इतना बड़ा नुकसान शायद इसके पहले कहीं देखने नहीं मिला होगा। लेकिन तालिबान के हाथों ऐसी हार की शर्मिंदगी तो एक बात है, इसकी वजह से आज पूरी दुनिया में जो तस्वीर बन रही है, उसमें अमेरिका आज दुनिया का सबसे अधिक नुकसान झेलने वाला देश दिख रहा है। इस बात को समझने के लिए यह देखना पड़ेगा कि पश्चिमी देशों के जिस फौजी संगठन को साथ लेकर अमेरिका ने 20 वर्ष पहले अफगानिस्तान पर हमला किया था, उसके बाद कब्जा किया था, और आज जिस तरह वहां से जान बचाकर उसे निकलना पड़ रहा है, तो इससे अपने साथी देशों के बीच अमेरिका की साख एकदम चौपट हुई है। आज जब अलग-अलग देशों के लोग वहां से नहीं निकल पा रहे हैं, और इन देशों की फौजों और सरकारों के साथ काम करने वाले स्थानीय अफगान नागरिक भी मुसीबत में फंसे हुए हैं, तो साथी देश अमेरिका को इस बात की तोहमत दे रहे हैं कि उसने तालिबान से बिना किसी शर्त के केवल जान बचाकर भाग निकलने का समझौता किया है और अपने साथियों की जान की परवाह भी नहीं की। अपने साथी देशों के बीच अमेरिका की इतनी थू थू पहले कभी नहीं हुई थी। और इससे एक बात और साफ हो जाती है कि आगे अगर अमेरिका इस तरह का कोई और फौजी दुस्साहस करेगा तो शायद कोई दूसरा देश उसके साथ इस हद तक शामिल नहीं होगा। दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत अमेरिका, तालिबान से हारकर अलग-थलग पड़ गया है।

अब एक दूसरी बात को देखें तो अब अफगानिस्तान की संभावित तालिबान सरकार की शक्ल में वहां एक ऐसी सरकार बनने जा रही है जो कि बगल के लगे हुए ईरान की तरह ही अमेरिका के खिलाफ बागी तेवर वाली सरकार है। आज के तालिबान का यह बयान सामने आया है कि न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों पर विमानों से हमले में ओसामा बिन लादेन का कोई हाथ नहीं था। यह बयान अमेरिका के उस दावे को ही खारिज करता है जिस दावे के चलते अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अलकायदा और ओसामा बिन लादेन को खत्म करने के लिए 2001 में हमले शुरू किए थे। लोगों को याद होगा कि जब इराक पर अमेरिका ने हमला किया था तो सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के हथियारों का जखीरा होने का दावा किया था। और दुनिया को सद्दाम से बचाने के नाम पर इस हमले को जायज ठहराने की कोशिश की थी। लेकिन अमेरिका की फौज ने पूरे इराक को खंगाल डाला था, वहां से कोई हथियार बरामद नहीं हुए थे। पूरी तरह से यह साबित हुआ था कि अमेरिका ने फर्जी खुफिया रिपोर्टों के हवाले से उस हमले की साजिश बनाई थी और उसमें ब्रिटेन जैसे दूसरे पश्चिमी देशों को साथ में लेकर वहां हमला किया था जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। अब अमेरिका से बागी तेवर वाली अफगान सरकार के साथी वे देश हैं जो खुद भी अमेरिका से एक सीधा टकराव रखते हैं। तालिबान सरकार के साथ चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान और टर्की जैसे देश खड़े हैं, जो सारे के सारे अमेरिका के खिलाफ हैं। इस हिसाब से अगर देखें तो एशिया के इस हिस्से में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, और ईरान, चीन और टर्की यह तमाम लगे हुए, या करीबी देश जिस तरह अमेरिका के खिलाफ तेवरों वाले हैं, उससे न सिर्फ अमेरिका को फिक्र करने की जरूरत है, बल्कि अमेरिकी गिरोह के एक सबसे हमलावर और मुजरिम देश इजराइल को भी फिक्र करने की जरूरत है। अफगानिस्तान की शक्ल में एक ऐसी नौबत आकर खड़ी हो गई है जिसमें पाकिस्तान, चीन, रूस, टर्की, और ईरान, इन सबको एक साथ आने का मौका मिल रहा है और एक साथ आने की एक बड़ी वजह भी है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को कामयाब किया जाए। आज अगर देखें तो एशिया के इस पूरे हिस्से में अमेरिका के पास अपने फौजी या खुफिया ठिकाने को बनाने के लिए भी इन तमाम देशों में कहीं पांव धरने की गुंजाइश नहीं है।

यह बात भी समझने की जरूरत है कि भारत जैसा देश जिसने अमेरिका के फेर में पिछले बरसों में ईरान से भी अपने संबंध खराब किए हैं, आज अफगानिस्तान की अगली सरकार के साथ अपने संबंध बनाए रखने के लिए उसे रूस, ईरान, या चीन की सरकारों के रास्ते अपने पांव धरने की कोई गुंजाइश निकालनी पड़ेगी। इनमें से चीन की कोई हमदर्दी भारत के साथ नहीं होगी लेकिन रणनीतिक रूप से यह बात उसके लिए अच्छी होगी कि भारत अपनी विदेश नीति के किसी एक हिस्से के लिए अमेरिका के बजाय चीन का मोहताज हो रहा है। इस तरह भारत कम से कम अफगानिस्तान के एक मामले में अमेरिका पर आश्रित रहने नहीं जा रहा है। इस नाते अमेरिका को पाकिस्तान से लगा हुआ एक और देश अपने प्रभामंडल से कुछ हद तक बाहर होते दिख सकता है। इसके अलावा इस बात को भी समझने की जरूरत है कि मुस्लिम आतंकी संगठनों से परे अगर अफगानिस्तान की सरकार बनती है, तो बहुत से दूसरे मुस्लिम देश भी उस सरकार को और अफगानिस्तान को मदद देने के लिए तैयार होंगे। इस तरह अमेरिका के खिलाफ मुस्लिम देशों का एक अलग जमघट हो सकता है, और यह बात भी इजराइल के लिए खतरनाक हो सकती है जो कि इन्हीं देशों के इलाके में ईरान के निशाने पर बना हुआ देश है।

खुद अमेरिका के भीतर आज वहां के लोग अपनी सरकार को धिक्कार रहे हैं कि किस तरह अमेरिकी सरकार का साथ देने वाले अफगान नागरिकों को छोडक़र, खतरे में डालकर अमेरिकी फौज अपनी जान बचाकर वहां से वहां से भाग निकल रही है। यह बात अमेरिका जैसी दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत के लिए बड़ी शर्मिंदगी की भी है और अमेरिकी नागरिक इस बात को अच्छी तरह समझ भी रहे हैं। वे इस बात से तो खुश हैं कि उनके लोग दूर के एक देश के आंतरिक झगड़ों को निपटाने के लिए अपनी शहादत देने का सिलसिला खत्म करके घर आ रहे हैं, लेकिन अमेरिका के एक तबके का यह भी मानना है कि एक देश के रूप में अफगानिस्तान से जैसी शर्मनाक शिकस्त लेकर अमेरिकी फौज घर आ रही है, वह अमेरिका की दुनिया भर में साख चौपट करने के लिए काफी है। फिर अमेरिका में मानवाधिकार की फिक्र करने वाले और उसके लिए लडऩे वाले जागरूक लोगों का भी एक तबका है और यह लोग यह सवाल भी कर रहे हैं कि जिन अफगान महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को लेकर लडऩे की बात अमेरिकी सरकार इतने समय से करते आ रही थी, उन्हें तालिबान के भरोसे छोडक़र निकलने पर उनके अधिकारों का क्या होगा?

यह बात भी समझने की जरूरत है कि आज बहुत सारे देश तालिबान के रुख को देखने की बात तो कर रहे हैं और लगे हाथों में यह मुद्दा भी उठा रहे हैं कि महिलाओं के बारे में तालिबान की क्या सोच सामने आएगी यह देखना अभी बाकी है। लेकिन क्या सचमुच ही बाकी देशों को अफगान महिलाओं से इतनी हमदर्दी है? या फिर यह दुनिया की जन भावनाओं के सामने अपना एक नैतिक रुख दिखाने की ऐसी कोशिश है, जिसकी कूटनीति में या फौजी रणनीति में कोई जगह नहीं रहती। आज तालिबान जिस तरह की धर्मांधता, धार्मिक कट्टरता, और दकियानूसीपन पर खड़े हुए हैं, वे लोकतंत्र से जिस तरह कोसों दूर हैं, दुनिया के, सभ्य समाज के तौर तरीकों से जिस तरह कोसों दूर हैं, ऐसे में उनके साथ रिश्ते रखने की मजबूरी वाले देशों के सामने भी अपने नागरिकों और बाकी दुनिया के सामने यह दिखाने की एक मजबूरी रहती है कि वह अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की भी फिक्र करेंगे। सच तो यह है कि तालिबान के साथ दूसरे देश एशिया के इस हिस्से में भौगोलिक मजबूरियों की वजह से रिश्ता रखना चाहते हैं, अपने-अपने फौजी मोर्चों को ध्यान में रखते हुए रिश्ता रखना चाहते हैं, और कारोबार की जरूरतों के लिए भी वे अगली तालिबान सरकार से जुडऩा चाहते हैं। अमेरिका सहित दुनिया का कोई भी देश अफगान महिलाओं के लिए किसी भी किस्म की फिक्र से पूरी तरह आजाद है। अफगानिस्तान में मानवाधिकार अफगान जनता के अलावा किसी की भी प्राथमिकता नहीं है, और दुनिया का कोई भी देश अगर अफगान लोगों के मानवाधिकार की बात करता भी है, तो वह देश केवल जुबानी जमा-खर्च कर रहा है। ऐसे देश तालिबान से किसी संबंध की संभावना नहीं रखते या इस बात की कोई फिक्र नहीं करते कि उनकी कही हुई बात तालिबान पर असर कर पाएगी या नहीं।

आज अमेरिका ने दसियों लाख अफगान लोगों की जिंदगी को खतरे में डाला है और इनमें से लाखों लोग देश छोडक़र निकलने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें दुनिया में किस देश में जगह मिलेगी इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि अफगानिस्तान से तमाम काबिल लोग तमाम अधिक पढ़े लिखे लोग और तमाम हुनरमंद लोग पहले बाहर निकल जाना चाहते हैं जिससे कि उस देश का अपना ढांचा एक नुकसान झेलने जा रहा है। इसलिए 20 बरस कब्जा जमाए रखने के बाद अमेरिका अफगान लोगों और अफगानिस्तान को एक बड़े खतरे और नुकसान में छोडक़र निकला है और इतिहास में इसे अच्छी तरह दर्ज किया जाएगा। एक आखरी बात यह कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने तालिबान के पूरे कब्जे के कुछ ही हफ्ते पहले जिस तरह के बड़े-बड़े दावे करके अफगानिस्तान में तालिबान के आने की किसी भी संभावना को पूरी तरह से खारिज कर दिया था, उससे यह साफ है कि अमेरिका की सारी खुफिया ताकत, वहां के फौजी विश्लेषक, सब बुरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं, और उन्होंने अपने राष्ट्रपति को एक मसखरा साबित होने दिया। यह नौबत दुनिया के सबसे ताकतवर माने जाने वाले इंसान के लिए अपने देश के भीतर भी एक बड़ी शर्मिंदगी की है, और इससे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पता नहीं कैसे उबरेंगे।
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