संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : पसंदीदा जजों का बहुमत हो तो फिर सरकार के लिए सैयां भये कोतवाल वाला हाल
04-Sep-2021 5:06 PM (347)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  पसंदीदा जजों का बहुमत हो तो फिर सरकार के लिए सैयां भये कोतवाल वाला हाल

हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच इन दिनों कई किस्म की लिस्ट घूम रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में कितने जज बनाना है, या देश के बहुत से हाईकोर्ट में खाली पड़ी हुई कुर्सियों में निचली अदालतों के किन जजों को, या हाई कोर्ट के किन वकीलों को जज बनाना है, इस पर केंद्र सरकार के साथ सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की बनाई लिस्ट पर चर्चा चल रही है, और सरकार की पसंद-नापसंद पर सुप्रीम कोर्ट अपनी असहमति भी जता रहा है। दरअसल किसी भी लोकतंत्र में जब सरकार के पास यह अधिकार रहता है कि वह किसी को जज बना सके या किसी का जज बनना रोक सके तो फिर हिंदुस्तान की तरह का सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम रहने पर भी केंद्र सरकार कुछ लोगों के नाम तो रोक ही सकती है। और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट से जुड़े हुए बहुत से लोगों का यह मानना है कि केंद्र सरकार अपने प्रभाव और दबाव का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट के सर्वशक्तिमान कॉलेजियम से भी अपनी पसंद के लोगों के नाम आगे बढ़वा लेती है और फिर उन्हें तुरंत मंजूरी भी दे देती है। इससे दो बातें होती हैं एक तो केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की जो विचारधारा है, उस पर जब अदालतों में किसी मामले में बहस होती है, तो ऐसे मनोनीत जज उसमें सरकार के काम आते हैं। सरकार की विचारधारा के काम आते हैं और कई मामलों में तो सरकार के फैसलों को भी सही ठहराने में उनकी भूमिका बहुत से लोगों को समझ आ जाती है। सुप्रीम कोर्ट के जजों में तो कई बार ऐसा साफ दिखने लगता है कि कौन-कौन से जज सरकार समर्थक हैं, और कौन-कौन से जज जनता के हितों की बात करते हैं। तो कहने के लिए तो हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका की बिल्कुल अलग-अलग भूमिका है और न्यायपालिका का एक किस्म से कार्यपालिका पर काबू भी रहता है, लेकिन जजों को बनाने के मामले में सरकार अपनी ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी पसंद के लोगों को बिठा लेती है। ये लोग सरकार के बड़े लोगों को बड़े-बड़े जुर्म के बाद भी बचाने में काम आते हैं।

लेकिन यह बात महज हिंदुस्तान में हो ऐसा भी नहीं है। अमेरिका में तो सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायर होते नहीं हैं, और उनके मरने पर ही कोई कुर्सी खाली होती है। ऐसे में किसी राष्ट्रपति को 4 बरस के अपने कार्यकाल में कितने जजों को मनोनीत करने का मौका मिला है, इस बात को बड़ा ही महत्वपूर्ण माना जाता है। पिछले रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे कई मनोनयन का मौका मिला, और उन्होंने अपनी पार्टी की सोच के मुताबिक संकीर्णतावादी जजों को तैनात करवाया, जिससे उनके सामने किसी मामले के जाने पर वह रिपब्लिकन पार्टी की सोच, संकीर्ण सोच के मुताबिक सोचे सकें, और फैसला दें। इसका एक बड़ा सुबूत अभी 3 दिन पहले सामने आया जब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने वहां के एक राज्य टेक्सास के बनाए हुए एक नए कानून पर अमल रोकने से बहुमत से इंकार कर दिया। जितने जज इस फैसले में शामिल थे, उनमें अधिक ऐसे थे जिन्होंने तुरंत कोई दखल देने से मना कर दिया, और नतीजा यह हुआ कि आधी रात तक चले इस मामले में, तारीख बदलते ही टेक्सास में यह विवादास्पद कानून लागू हो गया।

रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत वाले इस राज्य ने एक कानून बनाया है जिसके तहत 6 हफ्ते से अधिक की गर्भवती महिला का गर्भपात नहीं किया जा सकेगा। चिकित्सा विज्ञान बताता है कि अधिकतर गर्भवती महिलाओं को 6 हफ्ते में तो यह पता भी नहीं चलता है कि वे गर्भवती हैं। ऐसी महिलाओं की जांच में भी 6 हफ्ते के बाद ही पेट के बच्चे की धडक़न का पता लगता है। इस राज्य ने जो कानून बनाया है उसके मुताबिक अब तकरीबन कोई भी महिला गर्भपात नहीं करा सकेगी क्योंकि अधिकतर गर्भपात तो इन छह हफ्तों के बाद ही होते हैं। इस राज्य की सरकार ने इस कानून को लिखते हुए इस धूर्तता के साथ इसे बनाया कि इसमें सुप्रीम कोर्ट भी कोई दखल ना दे सके। अदालत में किसी मामले को, किसी कानून को चुनौती देते हुए ऐसे लोगों को नोटिस देना होता है जिन पर उस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी रहती है। सरकार के बनाए हुए कानून के खिलाफ अदालतों में पहुंचे हुए लोग आमतौर पर सरकार के नुमाइंदों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हैं। लेकिन इस कानून को लिखते हुए टेक्सास की सरकार ने यह होशियारी दिखाई कि इसे लागू करने का जिम्मा उसने जनता पर डाल दिया। जनता में से कोई भी व्यक्ति अगर अदालत में यह साबित कर सके कि किसी महिला ने 6 हफ्तों के बाद गर्भपात करवाया है तो उस महिला सहित उसके सारे मददगार, डॉक्टर क्लीनिक, नर्स, और तो और उसे क्लीनिक तक ले जाने वाले टैक्सी ड्राइवर तक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सकता है, और अगर यह मुकदमा साबित हो गया, तो इन तमाम लोगों पर दस-दस हजार डॉलर का जुर्माना हो सकता है, और मुकदमा करने वाले व्यक्ति को दस हजार डॉलर मिलेंगे और वकील का खर्च भी मिलेगा। इस तरह टैक्सास की सरकार ने इस कानून को लागू करवाने का जिम्मा आम जनता को दे दिया है कि वही शिकायत करके इसे लागू करवा सकती है, वहीं अदालत में जाकर किसी के खिलाफ केस कर सकती है।

 अमेरिका के कानून के विश्लेषक यह मान रहे हैं कि बहुत ही धूर्तता के साथ ऐसा कानून बनाया गया है कि जिस पर अदालत का कोई बस ना चले और अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट भी अपने पुराने फैसलों के रहते हुए भी इस कानून पर रोक न लगा सके। नतीजा यह हुआ है कि अमेरिकी संविधान में और सुप्रीम कोर्ट के कई दशक पहले के फैसलों में पूरी तरह से स्थापित यह बात धरी रह गई कि गर्भपात महिला का अधिकार है, महिला का शरीर उसका अधिकार है। अब दूसरा खतरा यह आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट के संकीर्णतावादी जजों के बहुमत ने जब इस कानून में दखल देने से मना कर दिया है, किसी तरह का स्थगन देने से मना कर दिया है, तो अब रिपब्लिकन सरकारों वाले एक दर्जन दूसरे राज्य भी ठीक ऐसा ही कानून बना सकते हैं, और उससे उनका बहुत पुराना राजनीतिक मुद्दा लागू हो सकता है कि किसी भी तरह के गर्भपात पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।

यह समझने की जरूरत है कि जब सुप्रीम कोर्ट में जज अपनी विचारधारा के बना दिए जाएं, और सरकार कानून ऐसा बना दे कि उसमें कोर्ट का दखल नामुमकिन सा हो जाए तो फिर सरकार अदालत के काबू से बाहर अपनी मनमानी कर सकती है। अमेरिका में आज यही हो रहा है और असहमति दर्ज कराने वाले जज संख्या में कम पड़ रहे हैं, और वे एक राज्य सरकार की इस हरकत पर अपना आक्रोश, अपनी निराशा दर्ज भी कर रहे हैं कि एक सरकार ने एक ऐसा कानून बना दिया है कि जिसमें अदालत दखल ना दे सके, और अदालत के कुछ जज या जजों का बहुमत उस कानून को स्थगित करने का काम भी नहीं कर रहा है। जजों के बीच बहुत गहरे मतभेद इसे लेकर हुए हैं, और आज हालत यह है कि टेक्सास में किसी महिला का अपने बदन पर कोई अधिकार नहीं बच गया है। बाकी देश में भी जहां-जहां रिपब्लिकन पार्टी की सरकारें हैं, इसी की कार्बन कॉपी लागू होने का खतरा हो गया है। दुनिया के बाकी लोकतंत्रों को भी इस बात से सबक लेना चाहिए कि अगर जजों की नियुक्ति सत्तारूढ़ लोग अपनी मर्जी से कर सकते हैं तो फिर वह अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकते हैं और अदालतें मूक दर्शक बनी बैठी रह सकती हैं।
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