संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : राजधानी में थाने के भीतर सांप्रदायिक हमले से अधिक गंभीर और क्या हो सकता है?
06-Sep-2021 1:31 PM (283)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : राजधानी में थाने के भीतर सांप्रदायिक हमले से अधिक गंभीर और क्या हो सकता है?

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय यादव को कल देर रात जिस तरह तबादला करके पुलिस मुख्यालय भेजा गया है, उससे भी कल दिन में एक सांप्रदायिक तनाव की घटना की गंभीरता साबित होती है। रायपुर के एक इलाके में कल इतवार को एक ईसाई परिवार में प्रार्थना सभा चल रही थी, और आसपास के कुछ हिंदू संगठनों के लोगों ने इस पर आपत्ति की। तनाव बढ़ा और दोनों पक्षों को पुलिस ने थाने बुला लिया। वहां पर थानेदार के कमरे में ईसाई प्रार्थना सभा वाले पास्टर पर हिंदू संगठनों के लोगों ने जिस तरह से हमला किया और उसे जिस तरह जूतों से पीटा, उसके वीडियो हक्का-बक्का करते हैं। पुलिस थाने में मौजूद थी, और उसकी मौजूदगी में एक अल्पसंख्यक तबके के गिनती के मौजूद लोगों पर वहां बहुसंख्यक समुदाय के हमलावर लोगों ने जिस तरह का हमला किया है, उसकी कोई मिसाल छत्तीसगढ़ में याद नहीं पड़ती है। इसके पहले भी कभी किसी चर्च पर छोटा-मोटा हमला हुआ या कहीं किसी पादरी को पीटा गया, ऐसा तो हुआ था लेकिन थाने में पुलिस की मौजूदगी में ऐसा हो, और वह भी इसलिए साबित हो पा रहा है कि उसके वीडियो मौजूद हैं, तो यह बहुत ही गंभीर बात थी, और मुख्यमंत्री ने भारी नाराजगी के साथ जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को तुरंत हटाया है।

प्रदेश में भाजपा ने पिछले कुछ महीनों से धर्मांतरण में बढ़ोतरी का आरोप लगाते हुए इसके खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू किया है। भाजपा के बाकी मंत्रियों और नेताओं के मुकाबले इस बार भूतपूर्व मंत्री और राजधानी के एक भाजपा विधायक बृजमोहन अग्रवाल इस मोर्चे पर आगे हैं, वे लगातार बयान दे रहे हैं, और अभी एक प्रदर्शन में भी राजधानी में उन्हें सबसे आगे देखा गया था। भाजपा के भीतर बहुत से लोगों की दिक्कत यह है कि उन्हें अभी पार्टी के भीतर राज्य की अगुवाई के लिए अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩी पड़ रही है। ऐसे में जाहिर है कि कुछ मुद्दे अधिक प्रमुखता पा रहे हैं क्योंकि उन मुद्दों को उठाकर कुछ लोग अधिक प्रमुखता पा सकते हैं। लेकिन यह बड़ी हैरानी की बात है कि राजधानी में इतनी पुलिस मौजूदगी के बावजूद, पूरे शासन-प्रशासन की यहीं पर मौजूदगी के बावजूद, घंटों तक एक इलाके में यह सांप्रदायिक हमला चलते रहा और थानेदार के कमरे में उसकी मौजूदगी में पास्टर को जूतों से पीटा गया। यह बात बिल्कुल भी बर्दाश्त करने लायक नहीं है कि पुलिस का इंतजाम और प्रशासन इस तरह चौपट हो जाएं। सांप्रदायिक घटनाएं गहरे जख्म दे जाती हैं, जो कि लंबे समय तक रहते हैं। फिर यह भी है कि एक जगह सांप्रदायिक लोग जब ऐसी वारदात करते हैं तो वह दूसरी जगहों पर सक्रिय सांप्रदायिक लोगों के लिए एक चुनौती भी रहती है, कि वे भी कुछ कर दिखाएँ। फिर यह भी है कि आज जो लोग अल्पसंख्यक हैं, वे कल अगर आक्रामक होकर कोई जवाब देने लगे तो हिंदुस्तान में कई प्रदेशों में वैसे टकराव भी देखने मिलते हैं। यह सिलसिला बिल्कुल भी आगे नहीं बढऩे देना चाहिए।

कल ही एक दूसरी और महत्वपूर्ण घटना हुई है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल के खिलाफ पुलिस ने एक जुर्म दर्ज किया है। नंद कुमार बघेल लगातार ब्राह्मणों के खिलाफ अपनी सामाजिक नाराजगी निकालते रहते हैं और वे दलित आदिवासी और ओबीसी तबकों के और अधिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करते हैं। नंद कुमार बघेल ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया है, और वह हिंदू धर्म के ब्राह्मणवाद के खिलाफ उस वक्त से सामाजिक आंदोलन करते आए हैं, जब भूपेश बघेल राजनीति में कुछ भी नहीं थे। पिता की बहुत सी बातें और उनके बहुत से मुद्दे भूपेश बघेल के लिए राजनीति असुविधा की बात पहले भी रहे हैं, और जब जोगी सरकार में भूपेश बघेल मंत्री थे उस वक्त भी नंद कुमार बघेल को उनकी एक विवादास्पद किताब के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। अभी फिर उनके खिलाफ जुर्म दर्ज हुआ है, उसे लेकर भूपेश बघेल ने एक सार्वजनिक बयान भी दिया और कहा कि वे उनके पिता जरूर हैं लेकिन अगर उनके बयानों से सामाजिक समरसता खराब होती है, तो कानून अपना काम करेगा और मुख्यमंत्री के बयान के साथ ही उनके पिता के खिलाफ जुर्म कायम हुआ है।

छत्तीसगढ़ देश के दूसरे बहुत से राज्यों के मुकाबले सांप्रदायिक शांति और सद्भाव का केंद्र रहा हुआ है। यहां पर हालात बिगडऩे नहीं देना चाहिए। चाहे जाति को लेकर आक्रामक बातें हों या फिर धर्म को लेकर सांप्रदायिक हमले हों, इन दोनों को कड़ाई से रोकने की जरूरत है। कल एक दिन में ही भूपेश बघेल ने इन दोनों मामलों में कड़ा रुख दिखाया है। कल सुबह जब उन्होंने अपने पिता के खिलाफ एक बयान जारी किया और पुलिस ने शायद उनके निर्देश पर ही यह जुर्म दर्ज किया, तब राजधानी के एक मोहल्ले में ईसाई प्रार्थना सभा पर हमले की बात सामने भी नहीं आई थी। बाद में यह बात सामने आई और इस पर पुलिस को कड़ी कार्यवाही इसलिए करना चाहिए कि अगर सांप्रदायिक हिंसा का यह संक्रमण छत्तीसगढ़ में दूसरी जगहों पर फैला तो ईसाई तो बहुत गिनी-चुनी संख्या में प्रदेश के हजारों गांवों में हैं। इसलिए अगर कुछ उत्साही सांप्रदायिक संगठन रायपुर की घटना को एक इशारा मानकर दूसरी जगहों पर जुट जाएंगे तो राज्य की पुलिस इस नौबत पर काबू पाने में कम साबित होगी।
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