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प्रजातंत्र के लंगर में सेवादारी की आपाधापी
09-Sep-2021 12:00 PM (52)
प्रजातंत्र के लंगर में सेवादारी की आपाधापी

-प्रकाश दुबे

नर्मदा की परिक्रमा करने वाले तट पर बसे गांव-कस्बों में जाकर सदावर्त मांगा करते हैं। सदावर्त के पीछे भावना यह थी कि परिक्रमा के दौरान संपत्ति और साधनों का मोह टूटे। पांच द्वार खटखटाकर भिक्षा मांगने के साथ ही अहंकार तिरोहित हो जाता है। यह नियमित भिक्षावृत्ति नहीं है। राष्ट्र की तरक्की के बावजूद भिक्षा मांगने की प्रथा समाप्त नहीं हो सकी। सामाजिक, आर्थिक विषमता इसका बड़ा कारण है। भीख मांगने और पाने का चलन बहुत बढ़ गया है। प्रजातंत्र के लंगर में अपनी बारी की आस में व्यक्ति खड़े नहीं होते। समुदाय और राजनीतिक दल कतार में शामिल होने लगे हैं। बात यहीं आकर नहीं रुकी। अब तो प्रजातंत्र के लंगर के स्वामित्व की दावेदारी तक बात जा पहुंची है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में फिलहाल दलबदल, अंदरूनी खींचतान आदि के कारण सत्ता पलट की आशंका नहीं है। सत्ता या नायक की लोकप्रियता घटती-बढ़ी रहती है। सहम सहम कर किए गए सर्वेक्षणों से यही नतीजा सामने आया कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय व्यक्ति हैं। उनके मुकाबले बाकी नेताओं का लोकप्रियता प्रतिशत टक्कर देने वाला नहीं है। राज्यों के विधानसभा चुनाव के संदर्भ में सर्वेक्षण किया गया। एबीपी-सी वोटर-आइएएनएस आदि के सर्वेक्षण का दिलचस्प निष्कर्ष यह निकला कि चुनावी राज्यों में 41 प्रतिशत लोग श्री मोदी को सबसे अच्छा प्रधानमंत्री मानते हैं। आप चाहें तो इसका अर्थ यह निकाल सकते हैं कि पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री की छवि पर होंगे, राजनीतिक दलों के नेताओं के नाम पर होंगे और चाहें तो इसे राज्य नेतृत्व की अलोकप्रियता पर परदा डालने का प्रयास मान सकते हैं। जाकी रही भावना जैसी। इससे एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि प्रजातंत्र को लंगर समझने की चाह बढ़ती जा रही है। एक लेख के इस अंश पर गौर करिए-

आजकल वोटरों की भी आदतें बिगड़ गई हैं। जनता इस आधार पर फैसला करती है कि आश्वासनों के नकली नोट किस उम्मीदवार ने ज्यादा बांटे और इस होड़ में पड़े बिना चारा नहीं। जनता ने प्रजातंत्र को एक सदाव्रत या लंगर समझ रखा है, जहां मुफ्त में भोजन और ऐशो आराम की चीजें मिलती हैं। भारत में प्रजातंत्र इसलिए भी खतरे में है कि जनता इस प्रणाली को कल्पवृक्ष समझती है और लोग गैर जिम्मेदार बंदरों की तरह उसके फलों पर झपट रहे हैं, उसकी टहनियों पर झूम रहे हैं, लेकिन कल्पवृक्ष तो भारत में उगा ही नहीं है।

इस अंश को मात्र महामारी के संदर्भ में मत देखिए। पांच राज्यों की चुनाव तैयारी पर यह टिप्पणी बिल्कुल सटीक बैठती है। मतदान की तारीख बहुत दूर सही, आश्वासन के लंगर खुल चुके हैं। विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में सर्वेक्षण के नाम पर प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का हिसाब पेश करने का मतलब यही लगाया जा सकता है कि लंगर का प्रभाव स्थायी नहीं रहता। हर बार लंगर में कुछ नया बंटना चाहिए। विधानसभा की तैयारी के बीच प्रधानमंत्री की पात्रता और लोकप्रियता के दावे होने लगे। बिहार तक सीमित जनता दल-यू ने एक के बाद एक दो ऐलान किए। पहला तो यह कि उत्तर प्रदेश में पार्टी विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारेगी। उसके बाद पार्टी के अधिवेशन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री की पात्रता रखने वाला नेता साबित करने प्रस्ताव पारित किया गया। इस तरह का प्रस्ताव आते ही भाजपा-जद यू के संबंधों को लेकर अटकल का बाजार गरम हुआ। यह चुनावी लड़ाई नहीं है। जन गणना में पिछड़ों की गणना को लेकर दोनों दलों के बीच फांस है। पात्रता की दावेदारी का दूसरा छोर जाति, उपजाति गणना से जुड़ा है। राज्य सत्ता में सहभागी दल की चिंता समझ में आती है। पिछड़ों के जाति आधारित समूहों की बिहार में जद यू से निकटता बढ़ी है। कुछ नेताओं ने पार्टी का विलय कर दिया। कुछ सत्ता में शामिल हैं। ममता बनर्जी को इस तरह का प्रस्ताव कराने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्होंने कांग्रेस महिला मोर्चा छोडक़र आने वाली सुष्मिता देव से कांग्रेस पर हमला करने के लिए नहीं कहा। पिछले दिनों विधानसभा चुनाव में केन्द्रीय सत्ता और नेतृत्व को करारा जवाब देकर आम आदमी की नजऱ में वे पात्रता पा चुकी हैं। शिवसेना ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को राष्ट्रीय नेता निरूपित करना शुरु कर दिया। फिल्हाल इसका मतलब इतना ही है कि प्रदेश में उन्हें न छेड़ा जाए। यह संदेश कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और भाजपा तीनों के लिए है। शरद पवार को अन्य दलों के नेता राष्ट्रीय नेता प्रधानमंत्री पद के दावेदार या राष्ट्रपति बनने की संभावना जैसे मीठे संबोधनों से लादते रहे हैं। पवार ने हर बार सचाई का आईना दिखाया। वे कहते हैं कि हमारी पार्टी इतनी बड़ी नहीं है। दक्षिण में द्रमुक ने सत्ता संभालने के बाद तत्काल दो काम किए। पहला तो केन्द्र सरकार की नीतियों का विरोध जिनमें अण्णा द्रमुक के नेता पूर्व मुख्यमंत्री के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की पहल शामिल है। जयललिता के फार्म हाउस में सुरक्षाकर्मी की हत्या में पलनीस्वामी की भूमिका की जांच कराई जा रही है। मामला अदालत में है। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष राज्यपाल को ज्ञापन देकर संरक्षण चाहते हैं। दूसरा काम यह किया कि लोक लुभावन सुविधाएं बंद करने की घोषणा कर दी। तमिलनाडु में अम्मा केंटीन से लेकर टीवी दिलाने तक के वादे किए जाते हैं। द्रमुक और अण्णद्रमुक दोनों इस संक्रमण से ग्रस्त हैं। मुख्यमंत्री स्टालिन ने राज्य सरकार की छवि सुधारने के सीमित इरादे ऐलान नहीं किया। उनका दांव है कि केन्द्र सरकार अपना खजाना खोलने से बचे। अन्यथा थू-थू होगी। प्रजातंत्र के लंगर में सेवादार बनने का संकल्प नहीं लिया जाता। सेवादारी की आड़ में कप्तानी हथियाने की कोशिश होती है।

प्रजातंत्र कल्पवृक्ष नहीं है-यह वाक्यांश आज नहीं कहा गया। पचास बरस पहले राजेन्द्र माथुर ने अपने लेख में चेतावनी दी। आश्वासनों के नकली नोट के आधार पर उम्मीदवारी की होड़ कम नहीं हुई। आश्वासन बरसाकर और सुविधाएं लुटाकर वर्तमान सत्ता से आगे निकल सकना संभव नहीं है। जनगणना और आरक्षण के दांव भी पहले से अपनाए जा रहे हैं। नौकरी और रोजगार दिलाना संभव न सही, अपनों की सिफारिश आज भी काम आती है। इन अपनों में कुछ संगठन शामिल हैं, कुछ वैचारिक मित्र और चुनिंदा कारोबारी। प्रजातंत्र के लंगर की कतार में बेझिझक खड़ी होने वाली जनता इस सच को स्वीकारना नहीं चाहती।  
 (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

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