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नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन : मेकिंग इंडिया बनाम सेलिंग इंडिया
09-Sep-2021 12:44 PM (260)
नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन : मेकिंग इंडिया बनाम सेलिंग इंडिया

-डॉ. लखन चौधरी

नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन योजना के अंतर्गत सरकार आने वाले चार साल में रेल्वे, एयरपोर्ट और हाईवे जैसी प्रॉपर्टीज के इस्तेमाल के अधिकार बेचकर 6 लाख करोड़ रुपए (81 बिलियन डॉलर) जुटाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए सरकार ने रोडमैप जारी कर दिया है। केंद्र सरकार संपत्तियों के नियत अवधि तक इस्तेमाल का अधिकार बेचकर और इनविट जैसे निवेश के अन्य तरीकों से अपना खजाना भरने और वित्तीय घाटे को काबू में रखने की योजना को अमलीजामा पहना रही है। सरकार का तर्क है कि इससे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को लॉन्ग टर्म में सपोर्ट मिलेगा। पुराने और चालू हालत वाले एसेट्स में निजी निवेश आकर्षित करने की इस योजना को सरकार ने नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन का नाम दिया है। देखना है कि यह योजना कितनी सफल होगी और देश के निजी कार्पोरेट घरानों, उद्योगपतियों एवं पूंजीपतियों को कितनी आकर्षित करेगी ?

इस योजना के तहत सडक़, रेलवे संपत्तियों, एयरपोर्ट, पावर ट्रांसमिशन लाइनों और गैस पाइपलाइनों को बेचे बिना उनमें निजी क्षेत्र का निवेश लाया जाएगा। मॉनेटाइजेशन का पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने में लगाया जाएगा। सरकार के अनुसार नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन योजना अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए प्रमुख भूमिका निभाएगी। सरकार पब्लिक प्रॉपर्टी में निजी निवेश लाने के लिए उनको मॉनेटाइज करेगी। इससे जो भी रकम आएगी उसका इस्तेमाल देश के इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने एवं मजबूत करने में किया जाएगा। जिन संपत्तियों का पूरा वित्तीय इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, उनको बेहतर बनाने के लिए निजी क्षेत्र को साथ लाया जाएगा। पब्लिक प्रॉपर्टी को नहीं बेचा जाएगा और उनका मालिकाना हक सरकार के पास रहेगा। इस योजना के तहत सिर्फ केंद्र सरकार की संपत्तियों का मॉनेटाइजेशन किया जाएगा।

राज्यों को अपने एसेट मॉनेटाइज करने को बढ़ावा देने के लिए केंद्र उनको इनसेंटिव देगा। उनको 50 साल का बिना ब्याज का लोन दिया जाएगा, जिसके लिए इस वित्त वर्ष के बजट में 5,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। अगर राज्य मॉनेटाइज करते हैं, तो केंद्र 33 फीसदी की वित्तीय सहायता देगा। राज्य अपनी किसी कंपनी को बेचते हैं, तो केंद्र उससे मिलने वाली रकम के बराबर वित्तीय सहायता देगा। अगर वे उसको शेयर बाजार में लिस्ट कराते हैं, तो उससे मिलने वाली रकम का आधा हिस्सा और अगर उसको मॉनेटाइज करते हैं, तो केंद्र 33 फीसदी हिस्सा सहायता के तौर पर देगा। योजना के तहत 20 से ज्यादा एसेट क्लास मॉनेटाइज किए जाएंगे। नीति आयोग के अनुसार नेशनल मॉनेटाइजेशन पाइपलाइन के तहत 20 से ज्यादा एसेट क्लास को मॉनेटाइज किया जाएगा। इसके तहत पहले साल यानी मौजूदा वित्त वर्ष में 88,000 करोड़ रुपए जुटाने की योजना बनाई गई है।

एनएमपी के टॉप 3 सेक्टर में रोड, रेलवे और पावर सेक्टर शामिल होंगे। इसका मकसद पब्लिक प्रॉपर्टी में सरकारी निवेश की पूरी कीमत वसूल करना है। अगले चार साल में 15 रेलवे स्टेडियम, 25 एयरपोर्ट और 160 कोयले की खानों को मॉनेटाइज किया जाएगा। निजी क्षेत्र के निवेशक एसेट का इस्तेमाल करेंगे और तय समय के बाद सरकार को लौटा देंगे। जिन उपक्रमों के गोदाम पुराने हो गए हैं उनकी जगह नए और बेहतर सुविधाओं वाले गोदाम बनाने के लिए निजी क्षेत्र को आगे लाया जाएगा। निजी क्षेत्र के निवेशक गोदाम बनाने के बाद उनको निश्चित अवधि तक इस्तेमाल करेंगे और फिर उनको वापस सरकार को लौटा देंगे।

निजीकरण पर कांग्रेस ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा है कि देश में 70 साल में जो भी पूंजी बनी, मोदी सरकार ने उसे बेच रही है। देश के प्रधानमंत्री सब कुछ बेच रहे हैं। सरकार 1.50 लाख करोड़ में रेलवे बेच रही। रेलवे के 400 स्टेशन, 150 ट्रेनें और रेलवे ट्रैक बेच रही है। वेयरहाउसिंग बेचने की तैयारी में सरकार 1.6 लाख करोड़ रुपए का 26,700 किलोमीटर नेशनल हाई-वे, 42,300 पावर ट्रांसमिशन, 8 हजार किलोमीटर की गेल की पाइपलाइन, 4 हजार किलोमीटर की पेट्रोलियम पाइपलाइन, 2.86 लाख करोड़ की केबल कनेक्टिविटी और 29 हजार करोड़ रुपए की वेयरहाउसिंग को बेच रही है। केंद्र सरकार माइनिंग, 25 एयरपोर्ट, 9 पोर्ट और 31 प्रोजेक्ट्स भी बेच रही है। नेशनल स्टेडियम भी बेचने की तैयारी की जा रही है। कांग्रेस का तर्क है कि वह निजीकरण के खिलाफ नहीं है, लेकिन कांग्रेस सरकार मोनोपॉली को खत्म करने के लिए रणनीतिक क्षेत्रों में निजीकरण से परहेज करती है। जिन क्षेत्रों में नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन प्रोग्राम लागू किया जा रहा है, वे सभी स्ट्रेटेजिक सेक्टर हैं, जहां अब मोनोपॉली आएगी। प्रधानमंत्री मोदी इस देश के क्राउन ज्वेल्स को बेच रहे हैं। नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन की वजह से देश में बेरोजगारी बढ़ेगी। यह देश के युवाओं पर हमला है।

1991 के आर्थिक सुधारों के बाद यह वह समय है जब अर्थव्यवस्था को लेकर इस कदर घमासान चल रहा है। सरकार लगातार सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेशीकरण या निजीकरण करती जा रही है। दशकों से बनी-बनाई या जमी-जमाई अरबों-खरबों की संपत्तियों एवं सरकारी संस्थानों को कौडिय़ों के दाम पर निजी कार्पोरेट घरानों को सौंपे जा रहे हैं। बैंकिंग सेक्टर, भारतीय जीवन बीमा, रेल्वे, एयरपोर्ट, रेल्वे स्टेशन, सडक़ों को प्रायवेट सेक्टर को देकर सरकार अर्थव्यवस्था को चमकाना चाहती है। सरकार के इन निर्णयों से अर्थव्यवस्था की स्थिति कितनी चमकेगी या कितनी सुधरेगी यह तो भविष्य में पता चलेगा लेकिन इतना तय है कि इससे सार्वजनिक उपक्रमें चरमराकर धीरे-धीरे खत्म होने लगेंगी।

दरअसल में सरकार अपनी आर्थिक नीतिगत नाकामी, अक्षमता को छिपाने के लिए लगातार इस तरह के निर्णय लेकर जनमानस को भ्रमित करते रहना चाहती है। इससे अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद व्यर्थ है, क्योंकि विशालतम आबादी वाले देश में निजीकरण से विकास के सपने पूरे हो नहीं सकते हैं। दरअसल में नोटबंदी और जीएसटी के झटकों से उबरने के पहले कोरोना की मार ने अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। अब सरकार वृहद एवं व्यापक पैमाने पर चौतरफा निजीकरण करना चाहती है। सरकार का यह निर्णय बेहद चिंताजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो सार्वजनिक उपक्रम फायदे में चल रहे हैं, उसमें निजीकरण का क्या औचित्य है ? ऐसे में चिंता स्वाभाविक है। सरकार अमेरिका, यूरोप के नक्शेकदम पर चलकर देश को निजी कार्पोरेट कंपनियों के हाथों सौंपना चाहती है। सरकार मिश्रित अर्थव्यवस्था वाली भारत को पूंजीवादी बनाना चाहती है? याद रहे भारत महज एक देश नहीं है, भारत एक ऐसा उपमहाद्वीप है, जिसकी जनसंख्या अमेरिका से चार गुनी और पूरे यूरोप से दोगुनी से भी अधिक है।

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