विचार / लेख

युवा चित्रकार नीलामी के सपने के शिकार
14-Sep-2021 12:51 PM (51)
युवा चित्रकार नीलामी के सपने के शिकार

-अवधेश बाजपेयी

 

कला की नीलामी के बारे में बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि फलाने की पेंटिंग अरबों में बिकी। जब पता करते हैं वो कौन चित्रकार था? तो पता चलता है वो गरीबी, समाज की विवेकहीनता, समकालीन समाज में कला की विकसित समझ न होने के कारण उस चित्रकार ने आत्महत्या कर ली थी। आज उसी चित्रकार की हर पेंटिंग अरबों रुपये की है। अब भारतीय चित्रकारों की पेंटिंग भी करोड़ों में नीलामी होने लगी है। अभी यूरोपियन व अमेरिकन चित्रकारों से बहुत पीछे हैं। लेकिन ये खेल है और युवा चित्रकार नीलामी के सपने के शिकार हो जाते हैं। यह गंभीर विषय है इसपर सबको विचार करना चाहिए। ज्यादातर चित्रकारों को उनकी सफलता वृद्धावस्था में मिलती है, तब तक उनके धन का कोई मूल्य नहीं रह पाता। जब चित्रकार शारीरिक रूप से लाचार होता है तब कोई उसे बताता है आपका चित्र इतने करोड़ में बिका, वह सुन भी नहीं पाता और यह भी होता है कि उस चित्र का मालिक वो नहीं है बल्कि वह हैं जिसे उसने भुखमरी के दौर में चंद रुपयों में दे दिया था। बस उसका नाम है। उस चित्रकार के पैसे का आनंद उसके छर्रे लेते हैं। कला की इस वाहियात हरकत के कारण कलाकारों ने इंस्टॉलेशन और परफार्मिंग आर्ट शुरू किया इसके लिये दुशाम्प व जोसेफ बॉयज का काम महत्वपूर्ण है। लेकिन बाजार भी कम नहीं वो इसे भी खरीदने लगा। इसका भी बाजार है। नीलामी की बात समाज में ऐसी फैल गई कि जीना मुश्किल हो जाता है। एक बार मैं किसी धनाड्य को चित्र दिखा रहा था, मेरी हालत यह थी, मेरे पास महीनों से पैसे नहीं थे, दिहाड़ी से काम चला रहा था। वह तथाकथित कलाप्रेमी मेरे चित्रों को देखकर यह बोल रहा था कि देखो अभी इनको कोई नहीं पूँछ रहा पर देखना एकदिन इनके चित्र करोड़ों में बिकेंगे और वह मुझे धन्यवाद देते हुए यह कह रहा था कि कोई अच्छा चित्र बने तो मुझे जरूर दिखाना, मैं लोगों से कहूंगा की आपके चित्रों को समझें। और दुनिया को बताएं कि हमारे शहर में भी इतनी विश्व स्तरीय प्रतिभायें हैं। तभी मुझे कबीर की याद आई उन्होंने अपनी जीविका पार्जन के लिये चदरिया बुनते थे और अपनी कला से रोटी के लिए आश्रित नहीं थे। तभी से मैंने अपने को हर तरह के काम के लिए निपुड़ बनाया और आज मैं कला का कोई भी व्यावसायिक काम कर सकता हूँ, मैंने फिर और भी तरह के काम सीखे। जैसे झाड़ू कैसे लगाते हैं यह भी सिखाता हूँ। तो भाई, चित्रकला अलग है व्यवसाय अलग है । यह बात अलग है कि किसी को आपका चित्र पसंद आ जाये और उसके बदले में कुछ धन दे दे। लेकिन आपको अपने चित्र की कीमत मालूम होना चाहिए। भले वह वापस लौट जाए। चित्रकार का ब्रांड बनना उसकी खुद की मृत्यु है। ब्रांड बाजार की चीज है कला की नहीं। प्यार ब्रांड की चीज नहीं है ।नीलामी की खबर, सट्टे की खबर की तरह है  जो कभी या आज तक सच नहीं हुआ।
 

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