विचार / लेख

महिला विधायक यानी, ज्यादा विकास

Posted Date : 12-Jun-2018



सौतिक बिस्वास
 महिला नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वो ऊंचे टैक्स के पक्ष में रहती हैं। इसके साथ ही जन-कल्याण के साथ-साथ शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में ज्यादा निवेश पर जोर देती हैं।
ऐसे में कम समय में ही इन फैसलों का सीधा असर विकास दर पर दिखाई देने लगता है। तो क्या ये मानना ठीक है कि महिला नेता देश की आर्थिक तरक्की में ज्यादा अहम भूमिका अदा करती हैं?
हाल ही में हुए एक अध्ययन में पाया गया है कि निर्वाचित महिलाएं विकास को लेकर ज्यादा समर्पित होती हैं। इसके लिए साल 1990 से 2012 के बीच शोधकर्ताओं की एक टीम ने भारत की 4,265 विधानसभा सीटों के चुनावी आंकड़ों का उपयोग किया।
ये 1990 से 2012 का दौर था। इस दौरान भारत में तेज रफ्तार से आर्थिक प्रगति की बात कही जाती है। इसी दौर में ज्यादा महिलाओं को राज्यों की विधानसभाओं में चुनकर भेजा गया। भारत में लोकसभा और विधानसभा की करीब पाँच हजार सीटों पर लगभग 400 से ज्यादा महिलाएं हैं।
एक औसत निकालें तो भारत में लगभग 9 प्रतिशत ही सांसद या विधायक महिलाएं हैं। दुनिया की अगर बात करें तो निर्वाचित महिला नेताओं की संख्या 19 प्रतिशत है, 100 से ज्यादा देशों ने संसद में या राजनीतिक पार्टी की उम्मीदवारी में महिलाओं को कोटा देने की व्यवस्था बनाई है।
भारत के नगर निकायों और पंचायतों में 1993 से महिलाओं के लिए कोटा तय किया गया है। इससे सामाजिक निर्णय लेने में उनकी भूमिका पहले से काफी बढ़ी है। हालांकि भारत की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने की पेशकश करने वाला बिल साल 2010 से अटका हुआ है।
ऐसे में महिला राजनेताओं की इतनी मामूली-सी संख्या भारत के विकास को कैसे बढ़ावा दे सकती है? अगर गौर करें तो इतनी मामूली संख्या होने के बावजूद भी उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है।
भारत में विधायकों के पास नई नीतियाँ बनाने, संघीय निधि से आने वाले फंड को प्रभावित करने और ग्राम परिषदों पर खर्च करने की जिम्मेदारी और क्षमता होती है। इन जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रबंधन की भी है।
शोधकर्ताओं ने पाया है कि भारत की महिला नेताओं (विधायकों) ने अपनी सीटों (इलाकों) पर हर साल लगभग दो प्रतिशत की दर से आर्थिक सुधार किया है।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने केंद्र से 40 अरब डॉलर की वित्तीय मदद से बनी चार लाख किलोमीटर की सड़क परियोजना के डेटा पर नजर डाली। इस परियोजना के तहत कथित तौर पर साल 2000 से 2015 के बीच लगभग दो लाख गाँवों तक सड़कों को पहुँचाया गया। इस डेटा को देखने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि सड़कों के अनुबंध हासिल करने में महिलाएं भी पुरुषों के बराबर ही प्रभावी थीं। हालांकि जिन सीटों महिला विधायक थीं, उन सीटों पर सड़कों का काम या तो जल्दी पूरा हुआ या तेजी से किया गया।
ऐसेक्स यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर सोनिया भलोत्रा ने बताया कि इसका मतलब ये है कि जिन क्षेत्रों में अधिक सड़कें बनीं, उन क्षेत्रों में लोग पुरुषों की जगह महिलाओं को चुनते हैं।
शोधकर्ता इस बात पर भी जोर डालते हैं कि महिला नेताओं के इलाकों में ज्यादा विकास इसलिए भी होता है, क्योंकि वो पुरुषों की तुलना में कम भ्रष्ट होती हैं और उनकी तुलना में अपराध के मामलों में भी कम शामिल रहती हैं।
इस अध्ययन में ये भी पाया गया है कि भारत में 13 प्रतिशत महिला विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। ऐसे मामले, जिनमें या तो अभियोग की कार्यवाही चल रही है या चार्जशीट दायर की जा चुकी है। लेकिन पुरुष राजनेताओं से इसकी तुलना की जाए तो ये संख्या एक तिहाई के करीब है।
भ्रष्ट आचरण और आपराधिक मामलों में लिप्त होना, दोनों ही विकास के लिए स्पष्ट रूप से बाध्यकारी हैं। इस अध्ययन से एक दिलचस्प बात ये भी सामने आई है कि महिला राजनेता पुरुषों की तुलना में उसी सीट से दोबारा चुनाव लडऩे की अधिक चाहत रखती हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि मतदाता उन्हें उनके प्रदर्शन के लिए पुरस्कृत करेंगे। 
लेकिन भारत की महिला राजनेताओं के लिए ये यात्रा आसान नहीं रही। बहुत से लोगों का ये मानना है कि ज्यादातर महिला विधायकों को उनके घर के पुरुषों के नेतृत्व में रहकर काम करना पड़ता है। इस वजह से उन्हें उनके पतियों के कहे पर चलने का आरोप लगता है।
लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका कोई व्यवस्थित सबूत नहीं है। प्रोफेसर सोनिया भलोत्रा कहती हैं कि यह एक मिथक के सिवा कुछ नहीं है।
महिला नेताओं को लेकर अफवाहें भी खूब उड़ाई जाती हैं। कई बार उन्हें यौन उत्पीडऩ झेलना पड़ता है। अपने पहनावे और चेहरे-मोहरे के लिए कुतर्क सुनने पड़ते हैं और अब तो सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल भी किया जाने लगा है।
फिर घर की जिम्मेदारियों को छोड़कर राजनीति को बतौर करियर चुनने पर उन्हें कई तरह के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं। कुछ साल पहले की ही बात है, जब बिहार की एक महिला राजनेता ने अपने पति से कहा कि वो फुलटाइम राजनीति में जा रही हैं, तो उनके पति का पहला सवाल था कि तुम घर का ख्याल रखोगी या राजनीति का?
उस महिला राजनेता का जवाब था कि मैं घर का ख्याल रखूंगी और राजनीति भी करूंगी। एक पत्रकार ने इस दंपति पर एक रिपोर्ट भी लिखी थी। इसमें कहा गया था कि वो महिला इस बात को लेकर पाँच साल तक अपने पति से दूर रही। और तब ही वो वापस लौटी जब उसके पति ने उसे और उसके राजनीतिक जीवन को पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर लिया।
इस शोध से ये तो जाहिर है कि महिलाएं विकास लाने के मामले में पुरुषों से आगे हैं। तो क्यों भारत की राजनीतिक पार्टियाँ महिला उम्मीदवारों को पर्याप्त सीटें नहीं देती हैं?
इस बारे में प्रोफेसर सोनिया भलोत्रा कहती हैं कि मुझे लगता है कि इसका एक बड़ा कारण ये भी हो सकता है कि लोगों को ये पता ही नहीं है कि विकास के मामले में और आर्थिक प्रदर्शन के मामले में महिलाओं का प्रदर्शन बेहतर है। और यही वजह हो सकती है कि सरकार में उन्हें पर्याप्त जगह नहीं मिलती। (बीबीसी)




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