संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : असहमति वाली विचारधारा की जगह तो ठीक है, लेकिन वह है कैसी यह भी देखना
16-Sep-2021 4:56 PM (260)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  असहमति वाली विचारधारा की जगह तो ठीक है, लेकिन वह है कैसी यह भी देखना

वामपंथी राज वाले केरल के कन्नूर विश्वविद्यालय में अभी एक नया बवाल चल रहा है कि वहां पर एमए, शासन एवं राजनीति, के पाठ्यक्रम में हिंदुत्व के बड़े-बड़े नामों की लिखी हुई किताबों को शामिल किया गया है। विनायक दामोदर सावरकर, एमएस गोलवलकर, और दीनदयाल उपाध्याय की किताबों को कोर्स में शामिल करने पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग उबल पड़े हैं, और उन्होंने इसे शिक्षा के भगवाकरण का एक काम बताया है। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय के कुलपति का यह कहना है कि पोस्ट ग्रेजुएट छात्र-छात्राओं को सभी विचारधाराओं को पढऩे की जरूरत है ताकि वे बाकी विचारधाराओं के साथ तुलना करके एक आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकें। कुलपति का कहना है कि पोस्ट ग्रेजुएट नौजवान छोटे बच्चे नहीं होते हैं कि वे किसी के लिखे हुए को पढक़र उससे सीधे प्रभावित हो जाएं बल्कि अलग-अलग विचारधाराओं को पढऩे के बाद विश्लेषण की उनकी क्षमता बढ़ती है। कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति ने देश के दूसरे प्रमुख विश्वविद्यालयों का नाम भी गिनाये हैं जहां पर सावरकर और गोलवलकर का लिखा हुआ पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

दूसरी तरफ केरल के उच्च शिक्षा मंत्री ने पाठ्यक्रम में इस जोड़-घटाने को अति संवेदनशील मामला बतलाया है और कहा है कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सांप्रदायिक सोच को जोडऩा एक खतरनाक काम है, अगर जरूरत रही तो पाठ्यक्रम से इन चीजों को हटाया जाएगा। इस मुद्दे को लेकर केरल, और केरल के बाहर के भी अलग-अलग तबकों का अलग-अलग कहना है। एक दिलचस्प फेसबुक पोस्ट कांग्रेस के सांसद और कांग्रेस के भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हुए शशि थरूर की है। थरूर एक सुपरिचित लेखक भी हैं और वे केरल से निर्वाचित लोकसभा सदस्य भी हैं। उन्होंने लिखा है कि कुछ दोस्तों ने शैक्षणिक आजादी की हिमायत करते हुए मेरे कथन को खारिज किया है, मेरा यह मानना है कि हमें हर नजरिए को पढऩे की जरूरत रहती है, उस नजरिए को भी जिससे कि हम असहमत रहते हैं। अगर हम सावरकर और गोलवलकर को नहीं पढ़ेंगे तो किस आधार पर उनकी सोच का विरोध करेंगे? उन्होंने कहा कि कन्नूर विश्वविद्यालय तो गांधी और टैगोर को भी पढ़ाता है। थरूर का कहना है कि किसी समाज में दलगत राजनीति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बौद्धिक आजादी रहती है। उन्होंने लिखा कि यह सोचना बेवकूफी की बात होगी कि किसी की विचारधारा से अपरिचित रहने से उस विचारधारा को परास्त करने में मदद मिलेगी। उन्होंने लिखा-मैंने अपनी किताबों में सावरकर, गोलवलकर को काफी खुलासे से लिखा है, और उनका विरोध किया है।

हिंदुस्तान में उच्च शिक्षा ही नहीं प्राथमिक और बाकी स्कूल शिक्षा भी राजनीतिक और धार्मिक सोच से समय-समय पर प्रभावित होती रही हैं। जैसी राज्य सरकार रहती है वैसी सोच में किताबें ढल जाती हैं. पाठ्यक्रम को तय करने में किसी तरह की कोई आजादी नहीं रहती, न ही स्कूलों को, न विश्वविद्यालयों को। आज हरियाणा और गुजरात जैसे राज्यों में स्कूलों में कई किस्म की सांप्रदायिक बातें पढ़ाई जा रही हैं, जिन्हें लेकर लोगों की बड़ी आपत्ति है, लेकिन क्योंकि सरकार चलाने वाली पार्टी की सोच वैसी है, इसलिए वहां पर अब किताबें उस सोच को पढ़ा रही हैं। इस विवाद को हम कुछ दूर से बैठकर देख रहे हैं, अभी हमने कन्नूर विश्वविद्यालय के पूरे पाठ्यक्रम को नहीं देखा है कि वहां पर इनकी किताबें इनकी विचारधारा को बताने की हैं, या उस विचारधारा का प्रोपेगेंडा है? फिर भी है कि यही पैमाना गांधी या दूसरे धर्मनिरपेक्ष सोच रखने वाले लोगों पर भी लागू होगा कि उनकी किताबें या उनके लिखे हुए का कौन सा हिस्सा पढ़ाया जा रहा है? क्या वह हिस्सा उनकी विचारधारा से परिचय कराने वाला है, या इस परिचय से कहीं आगे बढक़र, कहीं अलग जाकर उनकी विचारधारा का प्रचार करने वाला है? यह बहुत नाजुक पक्की बात है, लेकिन यह बहुत महत्वपूर्ण बात भी है। केरल के इस विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम तय करने वाली कमेटी ने क्या सोचकर इन चीजों को पाठ्यक्रम में जोड़ा है, यह तो उसकी बैठकों की कार्रवाई में अगर दर्ज हुआ होगा तो उससे समझा जा सकता है, लेकिन हम इस बात को इतना आसान भी नहीं मान रहे हैं जितना इसे शशि थरूर कह रहे हैं। पहली बात तो यह है कि कौन सी विचारधारा कितनी महत्वपूर्ण है इसका मूल्यांकन करना भी पाठ्यक्रम कमेटी का काम होना चाहिए। अब अगर विचारधारा के नाम पर आसाराम या राम रहीम की विचारधारा को भी पढ़ाया जाए और कहा जाए कि जिसे खारिज करना है उसकी विचारधारा को पढऩा जरूरी है तो फिर अलग-अलग किस्मों से कई लोगों की विचारधाराओं को पढ़ाना चाहिए, जिसमें नक्सलियों की विचारधारा भी हो सकती है, जिसमें दूसरे किस्म के कई और अपराधियों की विचारधारा भी हो सकती है, हिटलर की विचारधारा भी हो सकती है, और फूलन देवी की विचारधारा भी हो सकती है। किस विचारधारा का कौन सा हिस्सा किस अनुपात में पढ़ाया जाए, उसे किस संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में पढ़ाया जाए, उसके साथ किस हिसाब से एक तुलनात्मक विश्लेषण किया जाए, यह एक बहुत जटिल और नाजुक मामला है।

दूसरी बात यह कि पोस्ट ग्रेजुएट  छात्र-छात्राओं को बहुत अधिक परिपच् को मान लेना भी ज्यादती होगी। इस देश में नौजवान पीढ़ी की परिपच्ता ऐसी बहुत अधिक दिख नहीं रही है। अगर नौजवान वोटर जो पहली बार या दूसरी बार वोट डाल रहे हैं, वे अगर इतने ही परिपच् रहते, इतने ही जिम्मेदार रहते, उनकी राजनीतिक समझ इतनी मजबूत हो चुकी रहती, तो देश-प्रदेश में कई जगह कई किस्म के लोग, और कई किस्म की पार्टियां भला कैसे जीत जाते?  इसलिए पाठ्यक्रम को तय करने वाले लोगों की अपनी सोच और विश्वविद्यालय को चलाने वाली विद्या परिषद और कार्यपरिषद जैसे फोरम को भी अपनी सोच का इस्तेमाल करना चाहिए, और अभिव्यक्ति की, विचारों की सारी स्वतंत्रता के साथ-साथ एक बड़ी बात यह भी है कि नौजवानों के दिल-दिमाग में भारतीय संविधान के मूल तत्व, भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी बातों को बैठाना जरूरी है, जो कि किसी भी दलगत राजनीति से परे की निर्विवाद बातें हैं। अगर देश की कोई सोच है इन बातों को कमजोर करने वाली है, इनके खिलाफ लोगों को सांप्रदायिक बनाती हैं, धर्मांध बनाती हैं, कट्टर बनाती हैं, वैज्ञानिकता से दूर ले जाती हैं, तो उन बातों का एक ऐसा विश्लेषण ही कोर्स में शामिल करना चाहिए जिससे उन बातों को महिमामंडित ना किया जाए, बल्कि उनकी उनका आलोचनात्मक विश्लेषण किया जाए। इस देश में कुछ किस्म की सोच ने लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है और लोकतंत्र के साथ-साथ इस देश में लोकतंत्र के आने के पहले से जो धार्मिक सहिष्णुता चली आ रही थी, उसे भी हिलाकर रख दिया है। इसलिए वैचारिक उदारता के नाम पर, विचारधारा की विविधता के नाम पर, छात्र-छात्राओं के सामने एक जिम्मेदार विश्लेषण पेश होना चाहिए और किसी भी तरह से विध्वंसक विचारधारा को बढ़ावा देना इस देश के लिए ठीक नहीं होगा। वैसे भी यह देश सामाजिक समरसता की तबाही की कगार पर पहुंचा हुआ है,  इसे और धक्का देने की गुंजाइश नहीं है।
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