सामान्य ज्ञान

मुद्रा स्फीति

Posted Date : 13-Jun-2018



मुद्रा स्फीति नापने की मुख्यत: तीन विधियां प्रयोग में लाई जाती हैं- 1. थोक मूल्य सूचकांक, 2. औद्योगिक श्रमिकों के लिए जीवन निर्वाह सूचकांक तथा 3. सकल घरेलू उत्पाद अवस्फीतक
थोक मूल्य सूचकांक के अंतर्गत वस्तुओं के थोक मूल्यों में होने वाले परिवर्तनाकं के आधार पर मूल्य स्तर में वृद्घि या मुद्रा स्फीति की दर ज्ञात की जाती है। इस आधार पर मुद्रा स्फीति का आंकलन करते समय केवल वस्तुओं को शामिल किया जाता है, सेवाओं को शामिल नहीं किया जाता है। जीवन निर्वाह सूचकांक का निर्माण करते समय इसमें वस्तुओं तथा सेवाओं दोनों को शामिल किया जाता है तथा यह विभिन्न औद्योगिक नगरों में विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं के फुटकर मूल्यों की मासिक घट-बढ़ को मापता है। सकल घरेलू उत्पाद अवस्फीतक (जीडीपी)  चालू मूल्य पर जीडीएफ को स्थिर मूल्य पर जीडीपी से भाग देकर प्राप्त किया जाता है। यह प्रदर्शित करता है कि किसी वर्ष में जीडीपी की कितनी वृद्घि अंतत: वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्यों में परिवर्तन वृद्घि के कारण हैं। उनके उत्पादन में वास्तविक वृद्घि के कारण नहीं। उपर्युक्त तीनों विधियों में जीडीपी अवस्फीतक सबसे विस्तृत तथा विश्वसनीय विधि है।

सोवा -रिगपा
 चिकित्सा की सोवा-रिगपा प्रणाली विश्व की ऐसी परंपरागत बहुत पुरानी कार्यरत स्वास्थ्य प्रणाली है जिसे हाल ही में मान्यता प्रदान की गई है और इसका इतिहास 2500 वर्षों से अधिक का रहा है। इसका प्रचलन और इसकी उपयोग हिमालय क्षेत्र में खासकर, लेह और लद्दाख (जम्मू और कश्मीर), हिमालच प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम, दार्जिलिंग आदि में किया जाता रहा  है।
 सोवा-रिगपा प्रणाली अस्थमा, ब्रोंकिटिस, अर्थराइटिस जैसी क्रॉनिक बीमारियों के लिए प्रभावशाली मानी गई है। 
सोवा-रिगपा का मूल सिद्धांत का खुलासा इस प्रकार किया गया है (1) इलाज के लिए शरीर और मन का विशेष महत्व है (2) एन्टीडॉट, अर्थात इलाज (3) इलाज की पद्धति यद्यपि एन्टीडॉट (4) बीमारी को ठीक करने वाली दवाईयां ; और  (5) फार्माकॉलॉजी। सोवा-रिगपा  मानव शरीर के निर्माण में पांच भौतिक तत्वों, विकारों की प्रकृति तथा इनके समाधान के उपायों के महत्व पर बल देता है। । उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में सोवा-रिगपा के कुछ शैक्षणिक संस्थान हैं।

 




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