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जब हिटलर के लोगों ने तिब्बत में की थी आर्य मूल को तलाशने की कोशिश
16-Sep-2021 7:26 PM (67)
जब हिटलर के लोगों ने तिब्बत में की थी आर्य मूल को तलाशने की कोशिश

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के तानाशाह हिटलर का आर्य प्रेम किसी से नहीं छिपा है. अपनी महत्वाकांक्षा और यहूदियों से घृणा के चलते उसने पूरी दुनिया को विनाशकारी युद्ध में झोंक दिया था. हिटलर ने अपने नाजीवाद में दुनिया में आर्यों के वर्चस्व की बात कही थी और यहां तक की नाजी के निशान के रूप में स्वास्तिक तक को अपना लिया था. जो आर्यों का एक पवित्र धार्मिक चिह्न माना जाता है. इतना ही नहीं हिटलर ने विश्वयुद्ध से पहले नाजियों का एक दल तिब्बत में भेजा था जिसका मकसद आर्य जाति के मूल को खोजना था.

आर्य जाति के मूल की खोज
हिटलर की की नाजी पार्टी के प्रमुख सदस्य हेनरिच हिमलेर ने 1938 में 5 सदस्यीय टीम को तिब्बत भेजा था. इस दल का मकसद आर्य जाति का मूल की तिब्बत में खोज करना था. बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार यह अभियान भारत से होकर शुरू हुआ था. हिमलेर का मानना था कि मूल आर्यों के कुछ लोग अब भी तिब्बत में मिल सकते हैं.

हिटलर और आर्य
हिटलर का मानना था कि खानाबदोश आर्य भारत में उत्तर से 1500 साल पहले दाखिल हुए थे और आर्यों ने स्थानीय अनार्यों से अनुवांशकीय रूप से ‘मिल जाने’ का अपराध किया था. इससे वे उन विशेषताओं को खो बैठे जो उन्हें पृथ्वी के दूसरे लोगों से श्रेष्ठ बनाती थीं.

अटलांटिस की पौराणिक कथा
सफेद खानाबदोश श्रेष्ठ जाति को मानने वाले एटलाटिंस नाम के गुम हो चुके काल्पनिक शहर में विश्वास करते हैं. कहा जाता है कि इस शहर में कभी शुद्धतम खून वाले लोग रहा करते थे. यह पौराणिक द्वीप इंग्लैंड और पुर्तगाल के बीच में अटलांटिक महासागर में कहीं स्थित माना जाता है,  जो दैवीय बिजली के गिरने से डूब गया था.

बचे हुए मूल आर्यों की तलाश
इस घटना के बाद जो भी आर्य बचे थे वे दूसरी सुरक्षित जगहों पर चले गए थे. इसके लिए हिमालय का क्षेत्र सुरक्षित जगह माना जाता है. खास तौर से तिब्बत को तो दुनिया की छत कहा जाता है. साल 1935  में हिमलेर ने एक कुख्यात नाजी संगठन एसएस के तहत एनेनर्बे की स्थापना की थी जो पूर्वजों की विरासत का ब्यूरो था. इसका मकसद अटलांटिस के उन लोगों की खोज करना था जो बिजली गिरने के बाद कहीं चले गए थे जिससे इस महान जाति के लोगों को खोजा सके.

दल के दो अहम सदस्य
हिमलेर ने1938 में 5 जर्मनों के इस खोजी अभियान पर तिब्बत भेजा था. इस दल में से एक 28 साल का अर्नेस्ट शेफर था जो दो बार भारत-चीन-तिब्बत सीमा पर आ चुका था, और दूसरा,  मानवविज्ञान शास्त्री ब्रूनो बेगर था जिसे खोपड़ियों और चेहरे की विस्तृत जानकारी लेनी थी, बहुत अहम सदस्य थे.

तिब्बत तक की यात्रा
इस दल को लेकर जर्मन जहाज श्रीलंका के कोलंबो पहुंचा जहां से मद्रास और फिर कलकत्ता पहुंचा शुरु में ब्रिटिश अधिकारियों ने इन्हें जर्मन जासूस समझा और भारत से गुजरने की इजाजत नहीं दी. यहां तक कि सिक्किम राज्य ने इन्हें संदेह के नजरिए से देखा, लेकिन अंततः यह टीम तिब्बत पहुंच ही गई. तिब्बत में 131 वें दलाई लामा के 1933 में मरने के बाद राज्य संरक्षक का शासन था.

विश्वयुद्ध की बाधा
इस दल का तिब्बत में शासन और लोगों की तरफ से खुले दिल स्वागत हुआ. बेगर ने भी खुद को एक डॉक्टर के रूप में पेश किया. लेकिन बुद्ध तिब्बती यह नहीं जानते थे कि नाजी भी हिंदू धर्म की तरह बौद्ध धर्म को भी आर्यों को कमजोर करने वाला धर्म मानते थे. इससे पहले शेफर और उनके साथी छद्म रूप में अपने वास्तविक शोधकार्य में और समय लगा पाते, अगस्त 1939 में विश्व युद्ध निश्चित होने पर उनका अभियान रोककर उन्हें वापस बुला लिया गया.

क्या लेकर गया यह दल
बेगर ने तब तक 376 तिब्बतियों के सिर के और अन्य मान मापों के साथ दो हजार तस्वीरें ले ली थीं. इसमें 17 लोगों के सिर, चेहरे , हाथ और कानों के ढांचे बना लिये थे और दूसरे 350 हाथ और ऊंगलियों के छापे ले लिए थे. उसने दो हजार मानव विज्ञान संबंधी शिल्पकृतियां जमा कर ली थी. दूसरे साती ने 18 हजार मीटरी की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म और 40 हाजार तस्वीरें ले ली थीं.

हिमलेर ने इस दल की वापसी की व्यवस्था की. और यह तिब्बती खजाना साल्जबर्ग के किले में पहुंच गया और युद्ध के दौरान वहीं रहा. लेकिन एक बार मित्र राष्ट्र 1945 में महल में घुसी तो बहुत सी तिब्बती तस्वीरें और अन्य सामग्री खराब हो चुकी थी.  अभियान में किए गए प्रयोगों के नतीजों का भी यही हश्र हुआ. और इस तरह से यह खोजी अभियान अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका. (news18.com)

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