संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 जून : एक आत्महत्या से उठे कुछ सवाल

Posted Date : 13-Jun-2018



मध्यप्रदेश के बहुत से लोगों के लिए बीती दोपहर एक सदमा लेकर आई जब इस राज्य के एक प्रमुख संत कहे जाने वाले भय्यूजी महाराज ने खुदकुशी कर ली। उनकी सेहत अच्छी थी, कोई ऐसी बीमारी नहीं थी जिससे थककर वे आत्महत्या करते, लेकिन शायद दिमागी सेहत ठीक नहीं थी, और बिना खुलासे वाले एक तनाव का जिक्र करते हुए उन्होंने दो लाईनें लिखीं, और पिस्तौल से खुदकुशी कर ली। उनके नाम की चर्चा मध्यप्रदेश के बाहर के लोगों के बीच राजनेताओं के बीच मध्यस्थता के लिए, या कि अन्ना हजारे जैसे चर्चित लोगों की भूख हड़ताल खत्म करवाने के लिए होती थी। वे मोटे तौर पर आरएसएस या भाजपा के लोगों के करीब थे, लेकिन कांग्रेस के लोगों के बीच भी उनके अच्छे संबंध थे। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आत्महत्या के बाद कहा कि भय्यूजी महाराज का उनके पास फोन आया था, और वे इस बात से परेशान थे कि मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी के किनारे शिवराज सरकार द्वारा अवैध खुदाई की जा रही है। दिग्विजय ने कहा कि उन्हें मुंह बंद रखने के लिए मंत्री पद का ऑफर भी दिया गया था, और इस बारे में उन्होंने (भय्यूजी महाराज) ने फोन पर बताया था कि उन्होंने यह ऑफर ठुकरा दिया था। दूसरी तरफ भय्यूजी महाराज की पहली पत्नी के गुजर जाने के बाद उन्होंने दूसरी शादी की थी, और पहले की बेटी की दूसरी पत्नी के साथ पट नहीं रही थी, और यह तनाव सार्वजनिक बयानों में भी सामने आया है। 
अब एक गृहस्थ संत की आत्महत्या के पीछे चाहे जो वजहें रही हो, इसके दो पहलुओं पर चर्चा की जरूरत है। पहली बात तो यह कि धर्म या आध्यात्म में गहरी जड़ें होने पर भी कोई व्यक्ति अपने आपको तनाव से बचा नहीं सका, और उसने जान दे देना बेहतर समझा। दूसरी बात यह कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सरकार ने एक हैप्पीनेस मंत्रालय बनाया हुआ है ताकि प्रदेश की जनता को खुश रखा जा सके। इसी सरकार ने कोई आधा दर्जन साधु-संतों को मंत्री का दर्जा देकर कुछ महीने पहले एक बहुत बुरी परंपरा डाली, और इसके लिए उसकी खासी आलोचना भी हुई। ऐसे मंत्रालय के बनने के बाद न तो कर्ज में डूबे किसानों की खुदकुशी बंद हुई, न ही बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी में खुशी की कोई किरण आई, और न ही वहां जगह-जगह पिटते हुए दलितों की जिंदगी बदली। सरकार का ऐसा मंत्रालय उसका ही मुंह चिढ़ा रहा है। और अब भाजपा और आरएसएस के एक बड़े समर्थक और सहारा माने जाने वाले भय्यूजी महाराज की आत्महत्या और उसे लेकर दिग्विजय सिंह की बात से एक नया बखेड़ा शुरू होता है। क्या वे सचमुच ही नर्मदा के किनारे अवैध रेत खुदाई को लेकर परेशान थे? क्योंकि ऐसी ही बात कुछ दूसरे साधुओं और बाबाओं ने उठाई थी, और जिनका मुंह बंद करने के लिए, जिनका घोषित आंदोलन रोकने के लिए शिवराज सरकार ने उन्हें रातोंरात मंत्रियों का दर्जा दे दिया था। 
कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, और भी बहुत से राजनीतिक पार्टियों में तरह-तरह के संतों और साधुओं, बाबाओं और स्वामियों का बोलबाला हमेशा से रहते आया है। ऐसे लोगों को अपने से कोसों दूर रखने वाले नेहरू की बेटी की वह तस्वीर लोगों को भूले नहीं भूलती जिसमें वे मचान पर टंगे हुए देवरहा बाबा के टंगे हुए पैर के नीचे खड़ी होकर अपना सिर उनके पैरतले रख रही हैं। नेहरू के साथ ही देश में वैज्ञानिक सोच को सोच-समझकर खत्म किया गया, और आज हाल यहां तक पहुंच गया। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि धर्म और आध्यात्म की जिंदगी लोगों को खुद को तनाव से मुक्त रखती है, उन लोगों की धारणा तोडऩे के लिए यह ताजा हादसा काफी होना चाहिए। बाकी जिन लोगों की जैसी श्रद्धा हो, भक्ति हो, वे उसी तरह से जिसे चाहें उसे मानें, लेकिन जिस तरह मध्यप्रदेश में शिवराज सरकार जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल करते हुए बाबाओं को मंत्रियों का दर्जा दे चुकी है, वह लोकतंत्र का एक बड़ा मखौल है। धर्म को राजनीति से दूर रखना चाहिए, और सरकार को भी धर्म के चंगुल में नहीं आने देना चाहिए। 
- सुनील कुमार 




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