संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गांवों की छुआ-छूत, महानगरों में अब आर्थिक आधार पर भी
21-Sep-2021 5:41 PM (245)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गांवों की छुआ-छूत, महानगरों में अब आर्थिक आधार पर भी

हिंदुस्तान के सोशल मीडिया पर अभी किसी इमारत में लिफ्ट के बगल में लगाए गए एक नोटिस की तस्वीर घूम रही है जो कि जाहिर तौर पर किसी हिंदी इलाके का है। अगर वह गैर हिंदी इलाके का होता तो अंग्रेजी के साथ किसी क्षेत्रीय भाषा में लिखा हुआ होता, लेकिन इसमें हिंदी में लिखा हुआ है कि खाना पहुंचाने के लिए आने वाले लोग लिफ्ट से ऊपर नहीं जा सकते उन्हें सीढिय़ों से जाना है। अब आज भारत के महानगरों में रिहायशी इमारतें भी 25-50 मंजिला होने लगी हैं। यह इमारत कितने मंजिल की है यह तो साफ नहीं है लेकिन बंधुआ मजदूर की तरह काम करने वाले, खाना पहुंचाने वाले लोग क्या खाने का बैग टांगकर हर जगह कई मंजिल पैदल चढक़र जा सकते हैं? और फिर एक सवाल यह भी है कि यह किस किस्म का सामंती मिजाज है जो उसी इमारत में लोगों के लिए खाना लेकर आने वाले लोगों को लिफ्ट की बुनियादी सहूलियत देने से मना कर रहा है? यह ठीक वैसा ही हो गया जैसे बड़ी कारों के पार्किंग के अहाते में किसी कोने में भी मोटरसाइकिल को जाने से रोक दिया जाए, या जैसा कि हिंदुस्तान के बहुत से पांच सितारा होटलों में होता है, ऑटो रिक्शा में पहुंचने वाले लोगों को सडक़ पर उतरना पड़ता है, क्योंकि होटल के दरबान ऑटो रिक्शा को होटल के भीतर पोर्च तक जाने नहीं देते।

जिंदगी में बुनियादी सहूलियत क्या है और ऐशो-आराम की चीजें क्या हैं, इनमें फर्क करना हिंदुस्तान का संपन्न तबका कई बार नहीं कर पाता, या शायद अक्सर नहीं करता। अगर किसी इमारत में वहां बसे हुए लोगों के लिए कोई स्विमिंग पूल बना है, तब तो यह बात हो सकती है कि इमारत में काम करने वाले कर्मचारी उसका इस्तेमाल ना करें। लेकिन वे कर्मचारी लिफ्ट का इस्तेमाल ना करें, कई महानगरों में कई रिहायशी इमारतों में ऐसे नोटिस भी लगे रहते हैं कि काम करने वाले लोग लिफ्ट से ना आए-जाएं। यह सिलसिला समाज के भीतर कमाई के आधार पर एक बहुत ही घटिया किस्म के भेदभाव का है जिसमें इंसानों को इंसान नहीं माना जाता, और जिन लोगों को चर्बी हटाने की जरूरत है वे लोग सीढ़ी से आने-जाने के बजाय लिफ्ट से आते जाते हैं, और जो गरीब मजदूर काम करके वैसे भी थके हुए रहते हैं, उन्हें लिफ्ट में चढऩे को मना कर दिया जाता है। यह बात बताती है कि हिंदुस्तान में किसी छोटे तबके में अतिसंपन्नता तो आ गई है, लेकिन सभ्यता उन्हें छू भी नहीं गई है। दुनिया में जो सभ्य समाज हैं वहां पर इस किस्म का कोई भेदभाव नहीं रहता। कुछ बरस पहले जब बराक ओबामा राष्ट्रपति थे, तो उनकी एक तस्वीर आई थी जिसमें वे राष्ट्रपति भवन के गलियारे में चलते हुए एक सफाई कर्मचारी से हाथ टकराते हुए और उसका अभिवादन करते हुए दिखते हैं। हिंदुस्तान में राष्ट्रपति अगर निकलने को हों तो सफाई कर्मचारी उनके सामने भी शायद नहीं पड़ सकेंगे। कई जगहों पर तो कम तनख्वाह वाले कर्मचारियों को दीवार की तरफ मुंह करके खड़ा रहने के लिए कह दिया जाता है, जब उनके मालिक या कोई ताकतवर व्यक्ति गलियारे से निकलते हैं।

हिंदुस्तान में मुगल खत्म हो गए, अंग्रेज आकर चले गए, देश में लोकतंत्र आए पौन सदी का वक्त हो गया, लेकिन लोगों का मिजाज अभी तक सामंती बना हुआ है। हर हफ्ते-पखवाड़े में देश में कहीं ना कहीं से किसी नेता की बिगड़ैल औलाद का या खुद नेता का ऐसा वीडियो सामने आता है जिसमें वे कहीं टोल टैक्स कर्मचारी को पीट रहे हैं तो कहीं पेट्रोल पंप कर्मचारी को कहीं ट्रैफिक पुलिस से मारपीट कर रहे हैं तो कहीं किसी और सरकारी कर्मचारी को धमका रहे हैं कि जानते नहीं हो कि मैं कौन हूँ? देश तो आजाद हो गया है लेकिन लोगों के दिमाग में अपनी ताकत और दूसरों की गुलामी की बात इतने गहरे बैठी हुई है कि वह निकलने को तैयार नहीं है। फिर इस देश में जो प्रचलित धर्म है उनमें से अधिकतर में लोगों की बराबरी की कोई गुंजाइश नहीं है। जाति व्यवस्था कायम रहती है, धर्म का अपना ढांचा हावी रहता है। और मजे की बात यह है कि अभी पंजाब में एक दलित सिख को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया है, उस पंजाब में दलित आबादी 30 फ़ीसदी है, इस तरफ भी लोगों का ध्यान नहीं था, उस पंजाब में यह पहला दलित मुख्यमंत्री बना है, यह बात भी लोगों को हैरान कर रही है। यह पूरा सिलसिला लोगों को पहली बार यह जानकारी दे रहा है कि सिखों के बीच भी एक जाति व्यवस्था कायम है वरना गुरुद्वारे में एक साथ बैठकर खाने की परंपरा को देखते हुए पंजाब के बाहर के गैर सिख लोग यह मान बैठे थे कि सिखों में कोई जाति व्यवस्था है ही नहीं।

भारत में अब जाति व्यवस्था बड़े शहरों में कुछ हद तक घट रही है, तो वहां पर गरीब कामगार और अमीर मालिक के बीच की एक नई व्यवस्था कायम हो रही है जिसमें कुछ लोग खाना पहुंचाने वाले लोगों से मारपीट भी करते दिखते हैं, और जैसा कि यह नोटिस कई इमारतों में लगा हुआ है, उससे भी जाहिर है कि उनकी सेवा करने वाले लोगों को भी लोग इंसान का दर्जा देने से इनकार करते हैं। अगर सफाई कर्मचारी कूड़े का या गंदगी का कोई डिब्बा लेकर लिफ्ट में साथ में जाए, तो भी हो सकता है कि एक बार लोगों को वह खटके, लेकिन बैग में बंद खाना लेकर अगर कोई कर्मचारी लिफ्ट से जा रहा है, तो उसमें भी लोगों को आपत्ति है, जो कि जाहिर तौर पर उस व्यक्ति के गरीब होने को लेकर है कि इतना गरीब कामगार कैसे उसी लिफ्ट में सवार होकर जा सकता है, जिसमें कि महंगे फ्लैट के मालिक ऊपर-नीचे आते-जाते हैं। हमारा ख्याल है कि चाहे ये रिहायशी इमारतें निजी क्यों न हों, ऐसे नोटिस के खिलाफ उन प्रदेशों के मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी करना चाहिए, और ऐसे प्रतिबंध को गैरकानूनी करार देना चाहिए क्योंकि किसी से ऐसी मेहनत करवाना जिसकी कि कोई जरूरत नहीं है, और जो बिल्डिंग में कानूनी रूप से लगाई जाने वाली अनिवार्य सहूलियत हैं, उनके इस्तेमाल से लोगों को रोकने के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
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