संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कैदी को कुछ घंटे रिहाई मिली तो आजादी बहुत भारी पड़ गई
05-Oct-2021 5:39 PM (185)
 ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कैदी को कुछ घंटे रिहाई मिली तो आजादी बहुत भारी पड़ गई

बीती शाम से रात तक कुछ घंटों के लिए दुनिया का सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक बंद रहा, और इसी कंपनी के दो और कारोबार, व्हाट्सएप मैसेंजर और इंस्टाग्राम नाम का एक फोटो-वीडियो प्लेटफार्म भी बंद रहे। कंपनी के लोग कंप्यूटर पर कुछ फेरबदल कर रहे थे और उनकी किसी गलती से यह हुआ। कोई स्थाई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन कुछ घंटों की इस गड़बड़ी से इस कंपनी के शेयर 5 फीसदी गिर गए और इसके मालिक के अरबों रूपये डूब गए। इन सबसे परे, बचे हुए एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर लोगों ने इन घंटों में खूब लिखा, अपनी तकलीफ भी बताई, और मजा भी लिया। मैसेंजर और सोशल मीडिया के बिना कुछ घंटों जिंदगी भी किस तरह थम गई यह कल सामने आया। जबकि लोगों के पास दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी थे, और दूसरी बहुत सी मैसेंजर सर्विस भी थीं जो कि बंद नहीं हुई थीं।

अब इस छोटे से हादसे से यह समझने की जरूरत है कि लोगों की जिंदगी किस तरह इन सहूलियत ऊपर टिक गई है, उनकी मोहताज हो गई है। इनके बिना होना तो यह चाहिए था कि लोग कुछ देर अपने आसपास के दायरे में जी लेते, कुछ देर परिवार और दोस्तों का सीधा मजा ले लेते, लेकिन उनकी दिमागी बेचैनी ने उन्हें ऐसा कुछ नहीं करने दिया। लोग लगातार कभी अपने फोन को चेक करते, तो कभी इंटरनेट को, और कभी इन्हें बंद करके फिर शुरू कर देखते कि क्या उनके सिरे पर कोई गड़बड़ी है? इस बात को लेकर लोगों को यह सोचना चाहिए कि क्या इंटरनेट और फोन-कंप्यूटर से परे कुछ देर रह लेना उनकी अपनी सेहत, और रिश्तों के लिए ठीक नहीं है? यह भी सोचना चाहिए कि क्या एक हठयोग की तरह कुछ देर वह ऑफलाइन भी रह सकते हैं? आप बिना इंटरनेट के और टेलीफोन के रह सकते हैं? लोगों को यह बड़ा मुश्किल काम लग सकता है क्योंकि दिल और दिमाग हर कुछ मिनटों में किसी मैसेज की उम्मीद करते हैं, या किसी कॉल की, ये दोनों न आएं तो लोग खुद कोई मैसेज करने लगते हैं। लोगों के हाथ हर थोड़ी देर में अपने फोन को ढूंढने और टटोलने लगते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि सिगरेट पीने वालों के हाथ सिगरेट के पैकेट और माचिस या लाइटर को टटोलकर, अपने पास पाकर एक तसल्ली पाते हैं, और फिर चाहे उनका अगली सिगरेट का वक्त हुआ हो या ना हुआ हो, उन्हें यह भरोसा तो रहता है कि जब जरूरत रहेगी, यह पास में है। ठीक इसी तरह लोगों को इंटरनेट, फोन और कंप्यूटर, इन पर बैटरी चार्जिंग की तसल्ली इतनी ही जरूरी हो गई है जितनी कि किसी नशे या लत के सामान की रहती है।

इन सबसे परे अगर कुछ देर के लिए लोग अपने परिवार में बैठ जाएं या दोस्तों के साथ बैठ जाएं और तमाम लोग यह तय कर लें कि कोई इतनी देर न फोन देखेंगे, न कंप्यूटर देखेंगे, और शायद टीवी भी देखने से परहेज करेंगे, तो लोगों को घर के भीतर ही एक-दूसरे के बारे में कई नई बातें पता लग सकती हैं। लोग अगर फोन पर बात किए बिना सुबह शाम की सैर पर जा सकते हैं, तो उन्हें कुदरत के बारे में कई नई बातें पता लग सकती हैं, पेड़ों और पंछियों के बारे में कुछ पता लग सकता है, और जिंदगी की रोज की चीजों से परे वे कुछ नई कल्पनाएं भी कर सकते हैं। कई लोग बातचीत में आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग की बात करते हैं, यानी बंधे बंधाए ढर्रे से परे कुछ नया सोचना, कुछ नए तरह से सोचना, लीक से हटकर कुछ सोचना। लेकिन जब जिंदगी का अधिकतर जागा हुआ वक्त फोन और कंप्यूटर से ही बंधा हुआ है, इन्हीं चीजों के भीतर कैद है तो फिर आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग आ कहां से सकती है?

हमारी अधिकतर सोच उन बातों से जुड़ गई है जो बातें दूसरे लोग हमें भेजते हैं, या जो सोशल मीडिया हमें अपने पेज पर दूसरों का लिखा हुआ दिखाता है। ऐसे में अपनी मौलिक सोच के लिए वक्त और गुंजाइश यह दोनों बचते ही कहां हैं? अपनी खुद की फिक्र के लिए, अपनों की फिक्र के लिए कहां जगह निकलती है? इसलिए कल जब कुछ घंटों के लिए लोगों के हाथ से व्हाट्सएप और फेसबुक निकल गया, तो लोगों को लगा कि उनके हाथ-पैर कट गए, और अब उनका दिल-दिमाग कैसे काम करेगा? लोगों को यह याद रखना चाहिए कि जब उनके सोचने की शुरुआत दूसरों के लिखे हुए, दूसरों के पोस्ट किए हुए और दूसरों के भेजे हुए संदेशों से होती है, तो वह मौलिक कहां से हो सकती है? अब इस जगह इस मुद्दे पर और अधिक लिखकर हम एक बक्सा बनाना नहीं चाहते जिसके बाहर लोगों का सोचना मुश्किल हो, हम सिर्फ इस मुद्दे को छोडक़र बात को खत्म करना चाहते हैं ताकि लोग अपने-अपने हिसाब से इस बारे में सोचें।
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