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इंसानों में क्यों व्यस्क होने के बाद ही निकलती है अक्ल की दाढ़
15-Oct-2021 9:50 AM (79)
इंसानों में क्यों व्यस्क होने के बाद ही निकलती है अक्ल की दाढ़

इंसान के परिपक्व युवा होने में समय लगता है. मानव के उद्भव की प्रक्रियाओं को समझने के कोशिश में हमारे वैज्ञानिकों ने पाया है कि केवल चिम्पांजी ही मानव से मिलते जुलते हैं. लेकिन उनके भी एक बात अलग है. उनके पूरे दांत जल्दी ही पूरी तरह से विकसित हो जाते हैं जबकि मानव के दातों के साथ ऐसा नहीं होता है. मानव की अक्ल की दाढ़ काफी उम्र बीत जाने के बाद निकलती है. इस दाढ़ के निकलने का मानव के उद्भव से गहरा संबंध है. नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह बात साबित करने में सफलता पाई है. 

अमेरिका की एरिजोना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया है. इस शोध की प्रमुख लेखिका मानविज्ञानशास्त्री हेल्स्का ग्लोवाका का कहना है कि मानव के जैविक विकास में अक्ल की दाढ़ के विकास और जीवन के इतिहास में सटीक संयोजन का आना एक रहस्य था. ग्लोवाका ने एरीजोना यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन ओरिजिन्स के जीवाश्वम मानवविज्ञान शास्त्री गैरी श्ववार्ट्ज की मदद से अलग अलग मानव खोपड़ियों का अध्ययन किया. 21 प्रजातियों के प्राइमेट की हड्डियों और दातों के थ्रीडी मॉडल बनाकर शोधकर्ताओं ने पाया का अक्ल की दाढ़ के विकास का खोपड़ी की बायोमैकेनिक्स से गहरा संबंध है. 

इंसान के जो व्यस्क दांत खाने को चबा कर पेस्ट बनाने के लिए काम आते हैं वे तीन चरणों में निकलते हैं जो 6, 12 और 18 साल की उम्र के आसपास काम करते हैं. वहीं दूसरे प्राइमेट में व्यस्क अक्ल की दाढ़ पहले आती है. जैसे चिम्पांजियों में यह 3, 6 और 12 साल तक आती है. पीले बबून में यह केवल साल की उम्र तक पूरी विकसित हो जाती है. वहीं रीसिस मकाक में केवल छह साल की उम्र में ही विकसित हो जाती है. समय में इस अंतर की वजहों में दातों की जगह भी एक कारक होता है.

मानव के मुंह में कोई बहुत ज्यादा जगह नहीं होता है. हमारी प्रजाति के लिए अक्ल की दाढ़ एक बड़ी समस्या है. लेकिन यह इसकी वजह नहीं है कि हमारे जीवन में यह दाढ़ इतनी देर से क्यों विकसित होती है. चबाने की क्रिया में केवल दांतों का ही नहीं बल्कि मांसपेशियों और हड्डियों की भी भूमिका होती है जिससे पर्याप्त दबाव बनता है और खाना टूटता है और चबाया जा सकता है. 

श्ववार्ट्ज बताते हैं कि हमारे जबड़े धीरे विकसित होते हैं, इसकी वजह हमारा धीमा जीवन और छोटे चेहरे, सुरक्षित जगह का धीमा विकसित होना जैसे कारक हैं. इससे हमारी अक्ल की दाढ़ काफी देर से निकलने लगी. जहां प्राइमेट में अक्ल की दाढ़ दो टेम्पोरोमैंडिबुलर जोड़े के ठीक सामने निकलती है, जो जबड़े और खोपड़ी के बीच जोड़ बनाती है. हमारे शरीर के दूसरे जोड़ों के विपरीत केंद्रक बिंदुओं में समन्वय होना जरूरी है जिससे बल का स्थानांतरण समुचित तरीके से हो सके. खाना चबाने के मामले में ऐसा कई बिंदुओं पर होता है. 

जैवयांत्रिकी में यह तीन बिंदुओं वाली प्रक्रिया कंस्ट्रेंड लेवल मॉडल के सिंद्धांतों से निर्धारित होती है. गलत जगह पर दांत रखने से बल जबड़ों के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. लंबे जबड़े वाली प्रजातियों में खोपड़ी सही दातों के लिए मांसपेशियों के पास सही संरचना विकसित करने में कम समय लेती है. मानव का चेहरा सपाट होता है इसलिए उसके साथ ऐसा नहीं हो पाता और उसकी अक्ल की दाढ़ विकसित होने में समय लगता है. 

इससे हमें दातों की स्थितियों के विकास के नए तरीके पता चले हैं, लेकिन इससे जीवाश्व विज्ञानियों को हमारे पूर्वजों में विशेष जबड़ों के विकास को समझने में भी मदद मिलेगी. ग्लोवाका का कहना है कि इस अध्ययन से हमें दांतों और जबड़ों के विकास आदि के संबधों को समझने के लिए नया तरीका मिलता है. यह अध्ययन साइंस एडवांस में प्रकाशित हुआ है.(news18.com)

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