संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गालियां ही नाशुक्रे इंसानों की जान बचाने के काम आ रही हैं..
21-Oct-2021 1:08 PM (109)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : गालियां ही नाशुक्रे इंसानों की जान बचाने के काम आ रही हैं..

हिंदुस्तान और दूसरे बहुत से देशों की अलग-अलग जुबान में सूअर को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। ठीक उसी तरह जिस तरह की कुत्ते को, या सांप को। जबकि सूअर दुनिया के बहुत से देशों में लोगों के खाने के काम भी आता है, और गंदगी को साफ भी करता है। इस पर भी लोग उसे बहुत बुरी गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं और कुछ धर्मों में तो सूअर को बहुत ही बुरा माना जाता है, और अगर उस धर्म के लोगों को भडक़ाना हो तो किसी एक सूअर को मारकर उस धर्म के धर्मस्थल पर फेंक देना दंगा शुरू करवाने की पर्याप्त वजह हो सकती है। सूअर को लोग गाली की तरह अपने घर-परिवार के सामने या क्लास के बच्चों के सामने इस्तेमाल करते हैं। किसी ने कोई बहुत बुरा काम किया तो उसे कहा जाता है कि सूअर जैसा काम मत करो, मानो कि सूअर बहुत बुरा काम करता है। आमतौर पर जानवरों के खिलाफ जितने किस्म की कहावतें और मुहावरे प्रचलन में रहते हैं, उन्हें देखते हुए हम कई बार इस जगह पर लिखते हैं कि इंसानों को अपनी भाषा से बेइंसाफी खत्म करनी चाहिए। लेकिन कहावतें और मुहावरे उसी युग के बने हुए हैं जिस वक्त जानवरों के अधिकारों का सम्मान करना तो दूर रहा, खुद इंसानों में शूद्रों का सिर्फ अपमान होता था, महिलाओं का सिर्फ अपमान होता था, और किसी किस्म की गंभीर बीमारी, विकलांगता वाले लोग गाली बनाने के ही काम के माने जाते थे। इसलिए अब जब सूअर को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो आज की 2 खबरें याद पड़ती हैं।

यूरोप में हालैंड के एमस्टरडम एयरपोर्ट के आसपास किसान एक मीठी कंद उगाते हैं, और जब मिट्टी खोदकर फसल निकाली जाती है तो कंद के कुछ टुकड़े जमीन में रह जाते हैं और कंद के साथ-साथ कुछ तरह के केंचुए वगैरह बाहर आ जाते हैं। इनको खाने के लिए वहां पर बड़े-बड़े पंछी टूट पड़ते हैं, और लगे हुए एयरपोर्ट पर आते-जाते विमानों के लिए खतरा बन जाते हैं। विमानों के जेट इंजन में अगर कोई बड़ा पंछी चले जाए तो क्रैश लैंडिंग करने की नौबत भी आ जाती है। ऐसे में इस एयरपोर्ट ने एक तरकीब निकाली है, उसने ऐसे खेतों के एक हिस्से में 20 सूअर छोड़ दिए जो कि निकली हुई कंद को तेजी से खाकर खत्म कर रहे थे और एक दिन के भीतर ही उन्होंने कंद के निकले हुए सारे टुकड़े खत्म कर दिए। नतीजा यह हुआ कि यहां पंछियों का आना रुक गया। दूसरी तरफ एयरपोर्ट के एक अलग तरह तरफ, इतनी ही जमीन को बिना सूअर रखा गया और वहां फसल से निकले गए मीठे कंद के टुकड़े पड़े रहे, और उन्हें खाने के लिए बड़े-बड़े पंछी पहुंचते रहे। अब एयरपोर्ट के आसपास के इलाके को पंछियों से मुक्त रखने के लिए यह तरकीब दूसरी जगहों पर भी आजमाने की बात चल रही है।

लेकिन एक दूसरी खबर यूरोप से अलग अमेरिका के न्यूयॉर्क से आई है जहां पर चिकित्सा वैज्ञानिकों ने एक सूअर की किडनी को एक इंसान के शरीर से जोड़ दिया है और वह किडनी ठीक से काम कर रही है। इस ट्रांसप्लांट के पहले सूअर के जींस में इंसानी जींस भी डाले गए थे ताकि मानव शरीर सूअर की किडनी को तुरंत खारिज ना कर दे। यह प्रयोग ब्रेन डेड घोषित हो चुके एक मरीज के शरीर पर उसके परिवार की इजाजत से किया गया, और सूअर की किडनी को इस मरीज के शरीर के बाहर ही रखा गया था जहां वह मरीज की खून की नलियों के साथ ठीक से काम करते रही। डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट के इस प्रयोग को पूरी तरह सामान्य बतलाया है और इसे पहली बार दूसरे प्राणी की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट भी कहा है। आज दुनिया भर में एक लाख से अधिक लोग अंग प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं जिसमें से 90 हजार सिर्फ किडनी की कतार में हैं।

यह बात कई बरस पहले भी सामने आई थी जब यह कहा गया था कि सूअर का शरीर इंसान के शरीर से सबसे अधिक मिलता-जुलता है और किसी दिन सूअर के अंग इंसान को लग सकेंगे, इससे दो किस्म की नैतिक अड़चन आ रही थी एक तो यह कि कई धर्मों में सूअर को बहुत ही निकृष्ट प्राणी माना जाता है, ऐसे धर्म के लोग सूअर के अंग लगे हुए इंसानों को क्या मानेंगे? इंसान मानेंगे या सूअर मानेंगे? दूसरा नैतिक सवाल यह खड़ा होता है कि सूअर को इंसान के करीब लाने के लिए जब इंसान के जींस सूअर के शरीर में डाले जाते हैं, तो फिर वह सूअर क्या खाने के काम में भी लाया जा सकता है? या उसे खाना इंसानों के एक हिस्से को खाने जैसा तो नहीं मान लिया जाएगा? लेकिन ये दोनों नैतिक सवाल ऐसे नहीं हैं जिनका रास्ता न निकल सके। सूअर के अंग लगवाना तो दूर की बात है, आज भी अलग-अलग धर्मों के लोग अलग-अलग किस्म से काटे गए जानवरों को ही खाते हैं। मुस्लिमों के तरीके से काटे गए जानवरों को सिक्ख नहीं खाते और सिक्खों के तरीके से काटे गए जानवरों को मुस्लिम नहीं खाते। ऐसा ही कुछ और धर्मों में भी है। लेकिन परहेज की अपनी सीमाएं हैं, जिनको मानने में किसी को बहुत दिक्कत भी नहीं होती। इसी तरह जिन इंसानों को सूअर की किडनी या उसके दूसरे अंगों से परहेज नहीं होगा वही ऐसे अंग लगवाएंगे, और जिन्हें सूअर से परहेज है, वे या तो इंसानी अंग का इंतजार करेंगे या चल बसेंगे।

अभी हम इस बहस में पडऩा नहीं चाहते कि एक जानवर को उसके अंगों के लिए इस तरह से मारना कितनी बड़ी हिंसा है। क्योंकि उसके अंगों के लिए नहीं तो उसके मांस के लिए उसे मारा तो जाता ही है। इसलिए किसी जानवर का मारा जाना इतना बड़ा नहीं नैतिक मुद्दा भी नहीं है और वैज्ञानिक मुद्दा तो है ही नहीं। देखना यही है कि जिस सूअर को सबसे गंदा और सबसे निकृष्ट प्राणी मानकर लोग जिससे नफरत करते हैं, और बिना किसी वजह के नफरत करते हैं, उस प्राणी के बचाए हुए लोग बचना चाहेंगे या नहीं बचना चाहेंगे?

फिलहाल तो लोगों को अपनी जुबान सुधारनी चाहिए और पशु-पक्षियों को गालियां देना बंद करना चाहिए। ऐसा इसलिए भी करना चाहिए कि कुछ विज्ञान कथाओं में पहले भी ऐसा जिक्र हुआ है जिसमें इंसानों की नस्ल के करीब के माने जाने वाले बन्दर जैसे किसी प्राणी के शरीर में इंसान के जींस डालकर उसे एक टापू पर रेडियो कॉलर लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जिस दिन उस इंसान को अंग प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है तो वह पहुंचकर उस टापू के अस्पताल में भर्ती होते हैं, और रेडियो कॉलर के रास्ते उस प्राणी को ढूंढकर लाया जाता है, और उसके शरीर के अंग निकालकर इंसान को लगाए जाते हैं। रॉबिन कुक नाम के एक विज्ञान उपन्यासकार ने दशकों पहले यह कहानी लिखी थी जो कि अभी न्यूयॉर्क में सही साबित होते दिख रही है, और ठीक उस कहानी की तरह पहले सूअर के शरीर में इंसान के जींस डाले गए ताकि उसके अंग इस तरह तैयार रहें कि इंसान का शरीर उन्हें तुरंत ही रिजेक्ट ना कर दे। जानवर आज भी इंसानों के काम आ रहे हैं और आगे भी काम आते रहेंगे। इसलिए लोगों को अपनी कहावतें और मुहावरे सुधारने चाहिए, अपनी बोलचाल की और लिखने की भाषा भी सुधारनी चाहिए और कुत्ते, सूअर इन सबको गालियों की तरह इस्तेमाल करना बंद करना चाहिए।
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